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2 मई : उसकी मृत्यु का उद्देश्य हमें पवित्र करना था

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2 मई : उसकी मृत्यु का उद्देश्य हमें पवित्र करना था
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“क्या तुम नहीं जानते कि अन्यायी लोग परमेश्‍वर के राज्य के वारिस न होंगे? धोखा न खाओ; न वेश्यागामी, न मूर्तिपूजक, न परस्त्रीगामी, न लुच्‍चे, न पुरुषगामी, न चोर, न लोभी, न पियक्‍कड़, न गाली देनेवाले, न अन्धेर करने वाले परमेश्‍वर के राज्य के वारिस होंगे। और तुम में से कितने ऐसे ही थे, परन्तु तुम प्रभु यीशु मसीह के नाम से और हमारे परमेश्‍वर के आत्मा से धोए गए और पवित्र हुए और धर्मी ठहरे।” 1 कुरिन्थियों 6:9-11

दुष्ट शैतान इसमें कोई रुचि नहीं रखता कि वह हमें हमारे कई मसीही कार्यों को छोड़ने के लिए मजबूर करे—लेकिन वह इसमें बहुत रुचि रखता है कि हम परमेश्वर के स्वभाव और चरित्र से सम्बन्धित परम सत्यों को और उसके राज्य की नैतिकता से सम्बन्धित परम सत्यों को छोड़ दें। इसे समझते हुए, पौलुस ने कुरिन्थुस के विश्वासियों को चेतावनी दी कि वे ईश्वरहीन आचरण के खतरनाक क्षेत्र में न चले जाएँ। पौलुस कहता है, “धोखा न खाना” क्योंकि अधर्मी लोग “परमेश्‍वर के राज्य के वारिस नहीं होंगे।”

पौलुस ऐसे कई बुरे आचरणों का विवरण देता है, जो कुरिन्थुस में कई सामाजिक तौर पर स्वीकार्य माने जाते थे। यह शहर व्यापार का एक बड़ा केन्द्र था, जहाँ विभिन्न जातियों, आस्थाओं और भाषाओं के लोग बसे थे। लेकिन संस्कृति के रूप में यह शहर दिशाहीन और उग्र था। वास्तव में, यह इतना भ्रष्ट था कि “कुरिन्थुस” शब्द ही अनैतिकता का प्रतीक बन गया था। तो पौलुस ने क्या किया? वह एक योजना के साथ वहाँ गया। वह “वचन सुनाने की धुन में यहूदियों को गवाही देने लगा कि यीशु ही मसीह है” (प्रेरितों 18:5)। उसका उद्देश्य कोई कानून लागू करना नहीं था, बल्कि सत्य का प्रचार करना था।

कोई भी कानूनी व्यवस्था संस्कृति में सुधार नहीं ला सकती। इसके बजाय, परमेश्वर ने एक सन्देश दिया है जो पुरुषों और महिलाओं को स्वतन्त्र करने वाला सन्देश है और वह सन्देश केवल इतना है: “यीशु मसीह वरन् क्रूस पर चढ़ाए हुए मसीह को छोड़” और कोई है ही नहीं (1 कुरिन्थियों 2:2)। सुसमाचार ही इस संसार के लिए परमेश्वर की योजना है। वह अपने वचन की शक्ति और विश्वास से लोगों के जीवन में कार्य करता है और उन्हें पूरी तरह बदल देता है।

पौलुस ने जटिल तर्कों में विश्वास नहीं किया। उसके पास केवल एक सन्देश था, और वह बार-बार उसी को कहता रहा। वह जानता था कि केवल मसीह की क्रूस पर दी गई बलि ही पुरुषों और महिलाओं को उनके पापों से मुक्त कर सकती है, ताकि वे “नए जीवन की सी चाल” चलें (रोमियों 6:4)।

पाप में बने रहना न केवल खतरनाक है, बल्कि यह अनावश्यक भी है। आज भी सुसमाचार का सन्देश उतना ही स्पष्टता और प्रभावशाली रूप से गूंज रहा है जितना कि कुरिन्थुस की गलियों में गूंजा था। यह संसार के भ्रामक विचारों और इस धारणा को काटता है कि केवल कानून ही लोगों के हृदयों को बदल सकता है या उनमें विश्वास उत्पन्न कर सकता है। हमारे जीवन, हमारे शहरों और हमारे राष्ट्रों की सबसे बड़ी जरूरत यही है कि पापियों को उद्धार मिले। इस धोखे में मत आना कि पाप कोई मायने नहीं रखता। इस धोखे में मत आना कि हमारे समाज को परमेश्वर के राज्य के सुसमाचार से बढ़कर किसी और चीज़ की अधिक जरूरत है। हमें क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह का सन्देश स्वीकार करने और प्रचार करने की आवश्यकता है:

वह मरा कि हम क्षमा पाएँ,

वह मरा कि हम धर्मी बनें,

कि हम अन्ततः स्वर्ग जा सकें,

उसके अनमोल लहू से बचाए जा सकें[1]

प्रेरितों 18:1-11

1 मई : सोता हुआ उद्धारकर्ता

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1 मई : सोता हुआ उद्धारकर्ता
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“पर वह आप पिछले भाग में गद्दी पर सो रहा था। तब उन्होंने उसे जगाकर उससे कहा, ‘हे गुरु, क्या तुझे चिन्ता नहीं कि हम नष्ट हुए जाते हैं?’ तब उसने उठकर आँधी को डाँटा, और पानी से कहा, ‘शान्त रह, थम जा!’” मरकुस 4:38-39

शिष्यों की स्थिति में खुद को रखकर देखें, जब वे तूफानी समुद्र में नाव चला रहे थे और यीशु नाव के पिछले हिस्से में सो रहा था। उनमें से कई अनुभवी मछुआरे थे और जानते थे कि डूबने का खतरा बहुत वास्तविक था—फिर भी उनका गुरु गहरी नींद में था, मानो उसने उन्हें इस संकट में अकेला छोड़ दिया हो।

यह तथ्य, कि यीशु को नींद की जरूरत थी, दिखाता है कि उसके पास एक वास्तविक मानवीय शरीर था, जो थकान, प्यास और भूख को महसूस करता था। उसने शारीरिक दुर्बलताओं का स्वयं अनुभव किया। यहाँ तक कि वे सोने के लिए तकिया ढूँढने की परेशानी से भी गुजरा, जिससे यह पता चलता है कि वह जानता था कि असुविधा क्या होती है। जिसने सारी सृष्टि की रचना की, वह चाहते तो उस लकड़ी को एक आरामदायक बिस्तर में बदल सकता था, लेकिन इसके बजाय, महिमा के प्रभु ने हमारे जैसे ही एक तकिए पर सिर रखा।

यदि यीशु ने मानवीय दुर्बलताओं और प्रलोभनों को अनुभव न किया होता, तो वह एक करुणामय महायाजक न होता, जो हमें स्वर्गीय सिंहासन से दया और अनुग्रह प्रदान कर सकता (इब्रानियों 4:14-16)। लेकिन बाइबल स्पष्ट रूप से बताती है कि उसने इन सब का अनुभव किया। उदाहरण के लिए, उसने अस्वीकृति का दर्द सहा: “वह अपने घर आया, और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया” (यूहन्ना 1:11)। यहाँ तक कि उसके कुछ वफादार शिष्यों ने—इसी नाव में मौजूद कुछ लोगों ने भी—आखिरकार उसे छोड़ दिया या उसका इनकार कर किया। उसने उस बदनामी को भी सहा, जिसने उसके अद्‌भुत और पवित्र स्वभाव को गलत तरीके से प्रस्तुत किया (उदाहरण के लिए, लूका 7:34 देखें)। उसने चालीस दिन और रातें शैतान के झूठ और प्रलोभनों से संघर्ष में बिताईं (मत्ती 4:1-11)। उसने क्रूस पर गहरी पीड़ा और क्लेश झेला, जब उसने पुकारकर कहा, “हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?” (मत्ती 27:46)। ऐसा कोई भी दर्द या अपमान नहीं है, जिससे हम गुजरते हैं, जो यीशु के हृदय को न चुभा हो—और क्योंकि वह इन संघर्षों को जानता है, इसलिए वह हमें आमन्त्रित करता है कि जब हम इनसे गुजरें, तो उसके पास आएँ।

मरकुस के सुसमाचार के आरम्भ में ही यह छोटी-सी घटना हमें जीवन बदलने वाली यह सच्चाई याद दिलाती है कि यीशु जीवित मसीह, एक दयालु उद्धारकर्ता और एक विश्वासयोग्य साथी हैं। उस गुरु से बढ़कर और कोई नहीं है जो हमारे जीवन की कठिन परिस्थितियों को बेहतर रीति से सम्भाल सके, जिसे शिष्यों ने नाव में गहरी नींद में सोते हुए पाया था। जैसे उन्होंने उसे पुकारा था, वैसे ही आप भी उसे पुकार सकते हैं और जान सकते हैं कि जो उस नाव में सो रहा था, वही तूफान को शान्त कर सकता है—वही प्रभु, जो स्वर्ग के सिंहासन पर शासन करता है, जो न कभी सोएगा, न ऊँघेगा, और जो आपके पाँव को फिसलने नहीं देगा (भजन 121:3-4)।

आज आपके मन में कौन सा डर है? निश्चिन्त रहें कि प्रभु यीशु इस जीवन की वास्तविकता को समझता है। अपने डर को उसके पास ले आओ और “अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दो, क्योंकि उसको तुम्हारा ध्यान है” (1 पतरस 5:7)।

भजन 121

30 अप्रैल : किसी दूसरे की सफलता पर प्रतिक्रिया देना

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30 अप्रैल : किसी दूसरे की सफलता पर प्रतिक्रिया देना
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“फिर उसने एक और स्वप्न देखा, और अपने भाइयों से उसका भी यों वर्णन किया, ‘सुनो, मैं ने एक और स्वप्न देखा है, कि सूर्य और चन्द्रमा और ग्यारह तारे मुझे दण्डवत कर रहे हैं’ . . . उसके भाई उससे डाह करते थे।” उत्पत्ति 37:9, 11

ईर्ष्या एक ऐसा अहसास है, जो मनुष्यजाति में सामान्य है। यह एक राक्षस भी है—एक ऐसा दानव जो किसी को भी जिन्दा खा सकता है।

आप ईर्ष्या से किस तरह संघर्ष करते हैं? वे कौन लोग हैं जो आपके प्रभाव क्षेत्र में हैं या आपकी दृष्टि के क्षेत्र में हैं, जो सफलता या कृपा का अनुभव कर रहे हैं और जिनके बारे में आप सोचते हैं कि काश आप उनके स्थान पर होते? हमें सावधान रहना चाहिए। जॉर्ज लॉसन लिखते हैं, “ईर्ष्या का घृणित जुनून दूसरों की तबाही की चाहत रखते हुए स्वयं को ही पीड़ित करता रहता है और अन्ततः स्वयं को नष्ट कर देता है।”[1] ईर्ष्या अक्सर ईर्ष्यालु को नष्ट कर देती है।

यूसुफ के भाइयों को अभी तक यह नहीं पता था कि वे झूठ, द्वेष, और अपने ही भाई को गुलाम बनाने के पापों के मार्ग पर चल रहे थे—जो क्रूरता के सबसे घृणित रूप थे। उस मार्ग पर उनका पहला कदम यूसुफ से उनकी ईर्ष्या थी। लेकिन वे इसे नहीं देख पाए, और इसलिए वे ऐसे कार्यों की ओर बढ़ते गए जो शायद उन्होंने यूसुफ के भव्य स्वप्नों के बारे में बात करने के समय विचार नहीं किए थे।

हमें अपनी ईर्ष्या को पहचानने और इससे निपटने की कला सीखनी चाहिए। तो फिर हम बिना कड़वाहट और ईर्ष्या में डूबे हुए दूसरों की सफलता पर कैसे प्रतिक्रिया दें?

पहला, हम यह स्वीकार करें कि परमेश्वर मनुष्यों के कार्यों पर सर्वोच्च अधिकार रखता है। परमेश्वर ने ही निर्धारित किया था कि यूसुफ के पास क्या होगा और वह क्या बनेगा—और उसने यूसुफ के भाइयों के लिए कम महत्त्वपूर्ण स्थिति निर्धारित की थी। यदि वे इस सत्य को मानने के लिए तैयार होते, हालाँकि यह कठिन हो सकता था, तो वे स्वयं को अपनी ईर्ष्यालु घृणा के आत्म-पीड़ित दर्द से बचा सकते थे। दूसरा, हम परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं। 19वीं सदी के महान प्रचारक, एफ.बी. मेयर ने एक बार बताया कि कैसे एक अन्य प्रचारक उसी क्षेत्र में सेवा करने के लिए आया, जहाँ वह पहले से सेवा कर रहे थे, और अचानक उनकी मण्डली से लोग खिसकने लगे। ईर्ष्या ने उनके दिल को पकड़ लिया, और उन्होंने जो स्वतन्त्रता पाई, वह इस अन्य प्रचारक के लिए प्रार्थना करने में थी—कि परमेश्वर उस दूसरे प्रचारक की सेवा को आशीर्वाद दे। प्रार्थना हमारे दिलों से ईर्ष्या की पकड़ को ढीला करती है।

परमेश्वर ही वह हैं लोगों को स्थापित करता है और नीचे ले आता है। यदि यूसुफ के भाइयों ने इस सत्य को समझ लिया होता, तो उनके पास ईर्ष्या करने का कोई कारण नहीं होता। परमेश्वर ही है जो हमें हर साँस एक उपहार के रूप में देता है। यदि उन्होंने यह समझ लिया होता, तो उनके मन में कड़वाहट बढ़ने के बजाय आभार और धन्यवाद का भाव होता। आज अपने दिल को जाँचें, किसी भी ईर्ष्या को पहचानें जो जड़ पकड़ चुकी है, और अपने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सामने विनम्रता और आभार के साथ सिर झुका लें।

1 शमूएल 2:1-10

29 अप्रैल : उपयुक्त रीति से ऊँचा उठाया गया

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29 अप्रैल : उपयुक्त रीति से ऊँचा उठाया गया
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“इस कारण परमेश्‍वर ने उसको अति महान भी किया।” फिलिप्पियों 2:9

फिलिप्पियों 2:5-8 मसीह की मानवता, दिव्यता, सेवा, और दीनता के बारे में एक सुन्दर वक्तव्य है। परमेश्वर के देहधारी पुत्र की विनम्रता को क्रूस पर उसकी मृत्यु तक देखने के बाद आपके मन में अगली क्या बात आती है? स्वाभाविक रूप से हम पुनरुत्थान के बारे में सोचते हैं। लेकिन पौलुस ऐसा नहीं करता। वह हमें मसीह को ऊँचा उठाए जाने की ओर ले जाता है।

पौलुस कहता है कि यीशु की विनम्रता और उसे ऊँचा उठाए जाने के बीच एक तार्किक सम्बन्ध है: “इस कारण  परमेश्‍वर ने उसको अति महान भी किया।” (पद 8, बल दिया गया)। महिमा में ऊँचा उठाए जाने का क्या अर्थ है? वह यह है कि पिता ने अपने पुत्र को सिंहासन दिया है और इस संसार को इस प्रकार व्यवस्थित किया है कि एक दिन “जो स्वर्ग में और पृथ्वी पर और पृथ्वी के नीचे हैं, वे सब यीशु के नाम पर घुटना टेकें; और परमेश्‍वर पिता की महिमा के लिए हर एक जीभ अंगीकार कर ले कि यीशु मसीह ही प्रभु है” (पद 10-11)।

लेकिन उसे ऊँचा उठाया जाना उपयुक्त क्यों है? पवित्रशास्त्र हमें कई उत्तर देता है। पहला, मसीह को ऊँचा उठाया जाना उपयुक्त है क्योंकि यह पुराने नियम की भविष्यवाणी को पूरा करता है और दिखाता है कि परमेश्वर अपने वचन को निभाता है। सारा संसार यीशु को प्रभु स्वीकारेगा क्योंकि परमेश्वर ने ऐसा करने की प्रतिज्ञा की थी। यीशु के मानव इतिहास के मंच पर आने से छः सौ साल पहले यशायाह ने परमेश्वर के ये शब्द दर्ज किए: “देखो, मेरा दास बुद्धि से काम करेगा, वह ऊँचा, महान और अति महान हो जाएगा” (यशायाह 52:13)। अतः मसीह इस संसार के दर्द और पाप को अपने ऊपर उठाने आया, दुखी सेवक के रूप में कार्य किया, क्रूस पर मरा और फिर महिमा में अपने सिंहासन पर विराजमान होने के लिए ऊँचा उठाया गया। जैसा अन्य स्थान पर पौलुस ने लिखा, “परमेश्‍वर की जितनी प्रतिज्ञाएँ हैं, वे सब उसी में ‘हाँ’ के साथ हैं” (2 कुरिन्थियों 1:20)।

दूसरा, मसीह को ऊँचा उठाया जाना उपयुक्त है, क्योंकि वह परमेश्वर है। बाइबल हमें सिखाती है कि पुत्र और पिता एक हैं। उसकी दिव्यता के कारण उसे ऊँचा उठाया जाना अनिवार्य है; परमेश्वर के बैठने के लिए कोई अन्य स्थान उपयुक्त नहीं है! पुत्र के बैठने के लिए अपने पिता के दाहिने हाथ के अतिरिक्त कोई अन्य स्थान उपयुक्त नहीं है।

अन्त में, मसीह को ऊँचा उठाया जाना उपयुक्त है, क्योंकि वह अपने पिता का प्रिय पुत्र है। परमेश्वर पिता ने अपने पुत्र को छुटकारे की वाचा को पूरा करने के लिए क्रूस पर जाते हुए देखा और उसे दर्द में यह पुकारते हुए सुना, “हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया?” (मत्ती 27:46)। पिता जानता था कि पुत्र ने वह पीड़ा अपने पिता के प्रति प्रेम और अपनी प्रजा के प्रति प्रेम के कारण सहन की। पिता ने अपने सिद्ध पुत्र को उस भयानक स्थिति में नहीं छोड़ा। पिता का प्रेम कैसे कुछ और कर सकता था सिवाय इसके कि वह पुत्र को उसकी निम्न स्थिति से ऊँचा करे?

हमारे लिए मसीह की दीनता और हमारे ऊपर उसे ऊँचा उठाया जाना निस्सन्देह हमें उस बिन्दु तक लाते हैं, जहाँ हम उनके प्रति हर्षित समर्पण में सिर झुकाते हैं। ये हमें दिखाते हैं कि एक ऐसा है जिसके पास हमारी अधीनता की माँग करने का दर्जा है और हमारी आराधना का पात्र होने का चरित्र है। ये हमें याद दिलाते हैं कि स्वर्ग का सबसे अच्छा हिस्सा स्वर्ग में सबसे महिमामय व्यक्ति होगा:

मैं महिमा को नहीं देखूँगा, बल्कि अपने अनुग्रह के राजा को निहारूँगा;

उस मुकुट को नहीं जो वह हमें देता है, बल्कि उसके छिद्रित हाथों को देखूँगा;

मेमना ही इम्मानुएल की भूमि की सारी महिमा है।[1]

 प्रेरितों 13:16-43

28 अप्रैल : यीशु हमें उठाकर खड़ा करता है

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28 अप्रैल : यीशु हमें उठाकर खड़ा करता है
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“तब वह चिल्लाकर और उसे बहुत मरोड़ कर, निकल आई; और बालक मरा हुआ सा हो गया, यहाँ तक कि बहुत लोग कहने लगे कि वह मर गया। परन्तु यीशु ने उसका हाथ पकड़ के उसे उठाया, और वह खड़ा हो गया।” मरकुस 9:26-27ऐसा कोई भी नहीं है, जिसकी मदद यीशु न कर सकें।

मरकुस 9 में, हम यीशु की एक बच्चे के साथ बातचीत के बारे में पढ़ते हैं, जो लम्बे समय से एक अशुद्ध आत्मा द्वारा पीड़ित था। लड़के की यह स्थिति बचपन से बनी हुई थी। वह न तो बोल सकता था और न ही सुन सकता था। जब भी दुष्ट आत्मा उसे पकड़ता, तो उसे गिरा देता और उसके मुँह से झाग निकलती, वह दाँत पीसता, और अकड़ जाता था (मरकुस 9:18)। यह युवक एक भयंकर परिस्थिति में फँसा हुआ था, असल में वह अपने शरीर में कैद था और अपने पिता, परिवार या दोस्तों से सान्त्वना की कोई भी बात सुनने में असमर्थ था, और अपने दर्द तथा भय को व्यक्त भी नहीं कर सकता था। उसमें मौजूद परमेश्वर की छवि को विकृत और नष्ट किए जाने के प्रयासों के कारण उसका जीवन कष्टों से भर गया था।

ऐसी निराशाजनक स्थिति में यीशु ने हस्तक्षेप किया और उस दुष्ट आत्मा को एक दिव्य फटकार लगाई। मसीह की इस शक्तिशाली फटकार ने शत्रु के नाकाम गुस्से को भड़का दिया और दुष्ट आत्मा ने लड़के को बुरी तरह से मरोड़ने के बाद उसे छोड़ दिया। लड़का ऐसे हो गया जैसे मर गया हो। और फिर यीशु ने उसे उठाकर खड़ा किया।

यीशु यही करता है। जिन लोगों के जीवन नष्ट हो चुके हैं और जो विनाश की ओर बढ़ रहे हैं, यीशु उन्हें थामता है और वही करता है, जो वह कर सकता है: वह उनके जीवन में प्रवेश करता है, उनका हाथ थामता है, उन्हें उठाकर खड़ा करता है . . . और वे खड़े हो जाते हैं।

केवल यीशु ही है जो सचमुच यह कह सकता है, “पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूँ; जो कोई मुझ पर विश्‍वास करता है वह यदि मर भी जाए तौभी जीएगा, और जो कोई जीवित है और मुझ पर विश्‍वास करता है, वह अनन्तकाल तक न मरेगा” (यूहन्ना 11:25-26)। केवल वही है जो किसी ऐसे व्यक्ति को, जो पूरी तरह से असहाय और खुद में परिवर्तन लाने में सक्षम नहीं होता, नया जीवन दे सकता है।

तो आज, यीशु आपके पास आता है और कहते है, तुम अपने बोझ मेरे पास क्यों नहीं लाते? तुम शिक्षा का सहारा लेकर दर्द और दुख से बाहर नहीं निकल सकते। तुम्हारे सारे घावों और उलझनों का स्थाई उत्तर चिकित्सा नहीं है। सच में, यह अच्छा है कि तुम जानते हो कि तुम यह सब अकेले नहीं कर सकते। अपने बोझ मेरे पास लाओ।

केवल यही नहीं, बल्कि वह आपके माध्यम से दूसरों के पास भी आ सकता है। आपके सम्पर्क में आने वाला कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है, जिसे यीशु की मदद की जरूरत नहीं है और ऐसा कोई भी नहीं है जिसकी मदद यीशु न कर सके। चाहे किसी का जीवन कितना भी उज्ज्वल क्यों न लगे, आमतौर पर भीतर से वे पछतावे और चिन्ता से भरे होते हैं और फिर यदि यीशु हस्तक्षेप न करे, तो पाप हम सभी को धीरे-धीरे विनाश की ओर ले जा रहा है। जब आप अपने आस-पास के लोगों को इस दृष्टिकोण से देखना सीखते हैं, तब आप उनके साथ मसीह को साझा करने की इच्छा करते हैं; क्योंकि ऐसा कोई भी नहीं  है जिसकी मदद यीशु न कर सके।

लूका 19:1-10

28 April : मोठी अदलाबदल

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28 April : मोठी अदलाबदल
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“कारण मला ख्रिस्ताच्या सुवार्तेची लाज वाटत नाहीं; कारण विश्वास ठेवणाऱ्या प्रत्येकाला – प्रथम यहूद्याला मग हेल्लेण्याला – तारणासाठीं ती देवाचे सामर्थ्य आहे. कारण तिच्यात देवाचे नीतिमत्त्व विश्वासाने विश्वासासाठीं प्रकट झालेंले आहे; “नीतिमान विश्वासाने जगेल” ह्या शास्त्रलेखाप्रमाणे हे आहे” (रोम 1:16-17)

देवाला स्वीकारणीय ठरावे म्हणून आम्हांला नीतिमत्वाची गरज आहे. पण आमच्यांत ते नीतिमत्व नाहीं. आमच्यांत जे आहे ते म्हणजें पाप.

तर, देवाजवळ जाण्यासाठीं आपल्याला ज्याची गरज आहे आणि ज्यास आम्हीं पात्र नाहीं ते आहे  – नीतिमत्व; आणि आमच्यांत जे आहे, म्हणजें पाप, देव त्याचा तिरस्कार करतो, ते नाकारतो. देवानें या परिस्थितीचे कसे समाधान केलें?

त्याचे समाधान आहे येशू ख्रिस्त, देवाचा पुत्र जो आमच्यां बद्दल, म्हणजें आपल्या जागी मरण पावला आणि ज्याने ती दंडाज्ञा स्वतःवर घेतली जी भोगावायांस आम्हीं पात्र आहोंत. “देवानें आपल्या स्वतःच्या पुत्राला पापमय देहासारख्या देहाने व पापाबद्दल पाठवून देहामध्ये पापाला दंडाज्ञा ठरवली” (रोम 8:3). कोणाच्या देहाने दंडाज्ञा सहन केलीं? त्याच्या देहानें. कोणाच्या पापास दंडाज्ञा मिळत होती? आमच्यां. ही मोठी अदलाबदल आहे. येथे पुन्हा 2 करिंथ 5:21 मध्ये म्हटलें आहे, “ज्याला पाप ठाऊक नव्हते त्याला त्यानें तुमच्या-आमच्यांकरता पाप असे केलें; ह्यासाठीं कीं, आपण त्याच्या ठायीं देवाचे नीतिमत्त्व असे व्हावे.”

देव आमची पापें ख्रिस्तावर टाकतो आणि त्यांस त्याच्याठायीं दंडाज्ञा देतो. आणि ख्रिस्ताच्या आज्ञाधारक मृत्यूमध्ये, देव त्याचे नीतिमत्व पूर्ण करतो आणि प्रमाणित करतो, आणि ते आमच्यां लेखी जोडतो. ख्रिस्तावर आमचे पाप; त्याचे नीतिमत्व आमच्यांवर. अहाहा!

आमच्या सर्वात मोठ्या जीवनाच्या प्रश्नावर ख्रिस्त हा देवाचे उत्तर आहे, आपण याविषयी अधिक अतिशयोक्ती करूं शकत नाहीं. हे सर्व ख्रिस्तामुळे आहे.

तुम्ही ख्रिस्तावर किती अधिक प्रीति कराल? तुम्हीं त्याच्याबद्दल किती अधिक विचार कराल? किंवा कुठल्या गोष्टीपलीकडें त्याचे अतिशय आभार मानू शकता? अथवा त्याच्यावर जास्त अवलंबून राहू शकता?. आमची सर्व क्षमा, आमचे सर्व नीतिमत्व, आमची सर्व धार्मिकता ख्रिस्ताठायीं आहे.

हेच शुभवर्तमान आहे – ही सुवार्ता आहे कीं आमची पापे ख्रिस्तावर टाकली गेली आहेत आणि त्याचे नीतिमत्व आम्हांला परिधान करण्यांत आले आहे आणि ही मोठी अदलाबदल आपल्या कृत्याद्वारे नव्हें तर केवळ विश्वासाने होते. “कारण कृपेनेच विश्वासाच्या द्वारे तुमचे तारण झालेंले आहे आणि हे तुमच्या हातून झालें असे नाहीं, तर हे देवाचे दान आहे; कोणी आढ्यता बाळगू नये म्हणून कर्मे केल्याने हे झालें नाहीं” (इफिस 2:8-9). ही ती सुवार्ता आहे जी आमचे ओझे उचलते आणि आनंद देते आणि दृढ करते.

27 अप्रैल : सही तरीके से माँगना

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27 अप्रैल : सही तरीके से माँगना
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“तुम्हें इसलिए नहीं मिलता कि माँगते नहीं। तुम माँगते हो और पाते नहीं, इसलिए कि बुरी इच्छा से माँगते हो, ताकि अपने भोग–विलास में उड़ा दो।” याकूब 4:2-3

तुम एक राजा के पास आ रहे हो,

बड़ी याचिकाएँ अपने साथ लाओ;

क्योंकि उसका अनुग्रह और सामर्थ्य ऐसे हैं

कि कोई भी कभी भी उससे इतना नहीं माँग सकता,

जो परमेश्वर के लिए बहुत ज्यादा हो।[1]

जॉन न्यूटन द्वारा लिखा गया यह गीत हमें यीशु के शब्दों की याद दिलाता है: “जो कुछ तुम प्रार्थना करके माँगो, तो प्रतीति कर लो कि तुम्हें मिल गया, और तुम्हारे लिए हो जाएगा” (मरकुस 11:24)। एक अन्य स्थान पर यीशु ने अपने शिष्यों से कहा, “जब तुम बुरे होकर, अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएँ देना जानते हो, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने माँगने वालों को अच्छी वस्तुएँ क्यों न देगा!” (मत्ती 7:11)। हम परमेश्वर के पास जा सकते हैं और उससे अच्छे उपहार माँग सकते हैं। हम परमेश्वर से कभी भी इतना नहीं माँग सकते, जो परमेश्वर के लिए बहुत ज्यादा हो। फिर भी, जैसा कि याकूब कहता है, हममें से कई लोग इन उपहारों को इसलिए प्राप्त नहीं करते क्योंकि हम यीशु की शिक्षा पर कार्य करने की हिम्मत नहीं रखते और बस माँगते नहीं। या हम माँगते तो हैं, लेकिन हम ऐसी वस्तुएँ माँगते हैं जो उसकी इच्छा के अनुरूप नहीं हैं, बल्कि हम उससे इसलिए प्राप्त करना चाहते हैं ताकि हम “अपने भोग–विलास में उड़ा” दें—ताकि अपनी प्राथमिकताओं को पूरा करें, न कि उसकी सेवा करने के लिए।

जब हम ध्यान देते हैं कि परमेश्वर का वचन प्रार्थना के बारे में क्या सिखाता है, तो हम पाते हैं कि हमें उससे माँगना है—और विनम्रता, ईमानदारी, और प्रेम के साथ माँगना है, और इस समझ के साथ कि परमेश्वर सम्प्रभु है और उसकी इच्छा ही है, जिसे हम सबसे अधिक पूरा करना चाहते हैं। जब यीशु गतसमनी के बाग में था, तो उसने प्रार्थना की, “हे अब्बा, हे पिता, तुझसे सब कुछ हो सकता है; इस कटोरे को मेरे पास से हटा ले : तौभी जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, पर जो तू चाहता है वही हो” (मरकुस 14:36)। यहाँ सन्तुलन को देखें। यीशु को परमेश्वर की शक्ति पर पूरा विश्वास था, उसके पास परमेश्वर से ऐसा कुछ करने के लिए कहने का साहस था, जो मानवता के लिए असम्भव था और फिर भी उसने पिता की इच्छा के प्रति पूरा समर्पण दिखाया। यह केवल परमेश्वर का सम्प्रभु उद्देश्य ही था, जिसने उस प्याले को हटने से रोका, जैसा कि मसीह ने प्रार्थना की थी। ऐसा नहीं था कि मसीह के पास ऐसा होता देखने के लिए “पर्याप्त विश्वास” नहीं था। उसी तरह, जब हम परमेश्वर से असम्भव कार्य करने को कहते हैं, तो हमारा साहस, बच्चों जैसा भरोसा और उत्साह उसकी सम्प्रभुता से कमजोर नहीं पड़ जाते; बल्कि ये दयालु रूप से इसके द्वारा नियन्त्रित किए जाते हैं।

परमेश्वर की सन्तान के रूप में आप साहसपूर्वक अपने पिता के पास आ सकते हैं, यह विश्वास रखते हुए कि वह आपकी आवश्यकता और आपकी माँगों को पूरा करेगा जो उसकी इच्छा के अनुरूप हैं। यीशु के उदाहरण का पालन करते हुए, आप अपनी इच्छाओं को अपने पिता की प्रेमपूर्ण सम्प्रभुता के प्रति समर्पित कर सकते हैं। जब आप परमेश्वर से सही तरीके से सही वस्तु पाने के लिए विश्वास करते हैं, तो आप आश्वस्त हो सकते हैं कि वह हमेशा सही प्रतिक्रिया देगा। आप कभी भी ऐसा कुछ नहीं माँग सकते जो परमेश्वर के लिए बहुत अधिक हो। तो बस माँगो!

लूका 18:1-8

26 अप्रैल : हमारे शरीरों में परमेश्वर की महिमा करना

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26 अप्रैल : हमारे शरीरों में परमेश्वर की महिमा करना
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“मैं तो यही हार्दिक लालसा और आशा रखता हूँ कि मैं किसी बात में लज्जित न होऊँ, पर जैसे मेरे प्रबल साहस के कारण मसीह की बड़ाई मेरी देह के द्वारा सदा होती रही है, वैसी ही अब भी हो, चाहे मैं जीवित रहूँ या मर जाऊँ।” फिलिप्पियों 1:20

आपका शरीर और आप इसके साथ जो करते हैं, मायने रखता है।

अपने लेखन में कई बार प्रेरित पौलुस लोगों के शरीरों के बारे में गहरी चिन्ता व्यक्त करता है। उदाहरण के लिए, वह कुरिन्थुस के विश्वासियों से पूछता है, “क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारी देह पवित्र आत्मा का मन्दिर है, जो तुममें बसा हुआ है और तुम्हें परमेश्‍वर की ओर से मिला है?” फिर वह कहता है, “तुम अपने नहीं हो, क्योंकि दाम देकर मोल लिए गए हो, इसलिए अपनी देह के द्वारा परमेश्‍वर की महिमा करो” (1 कुरिन्थियों 6:19-20)। दूसरे शब्दों में, हमारे शरीर उस परमेश्वर के हैं जिसने उन्हें बनाया है और जो उन्हें सम्भालता है। इस प्रकार की सोच पौलुस की थियोलॉजी का केन्द्र है।

पौलुस को यह जानकर बहुत खुशी होती थी कि उसके शरीर के द्वारा यीशु को सम्मान मिलेगा और उसकी महिमा होगी। यह उसका मुख्य उद्देश्य और प्रार्थना थी कि वह अपनी सेवा में साहस और विश्वास के साथ ऐसा करे। पौलुस के लिए, मसीह को ऊँचा करने का अर्थ था उसके महान नाम को ऊँचा उठाना: उसे महिमा देना। हम यह दृष्टिकोण बपतिस्मा देने वाले यूहन्ना में भी देखते हैं, जिसने यीशु के बारे में कहा, “अवश्य है कि वह बढ़े और मैं घटूँ” (यूहन्ना 3:30)। इसी तरह, आप कभी भी पौलुस को खुद पर ध्यान आकर्षित करते हुए नहीं पाएँगे। उसने खुद को केवल एक मार्गदर्शक के रूप में देखा, जो मसीह की ओर ले जाता था।

इसी कारण, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि जब पौलुस ने अपने आप को प्रेरित के रूप में प्रमाणित करना चाहा, तो उसने यह नहीं कहा, “कोई मुझे परेशान न करे,” केवल इसलिए कि वह एक महान प्रेरित था या क्योंकि वह परमेश्वर द्वारा सुसमाचार प्रचार करने के लिए उपयोग किया जाता था। नहीं—उसने कहा, “आगे को कोई मुझे दुख न दे, क्योंकि मैं यीशु के दागों को अपनी देह में लिए फिरता हूँ” (गलातियों 6:17, जोर दिया गया)। उसके शरीर के माध्यम से उसकी प्रतिबद्धता प्रकट होती थी। उसे मसीह के प्रति अपनी निष्ठा के लिए लगातार दुर्व्यवहार सहना पड़ा। अन्ततः वह अपने जीवन के अन्त में दाग, शारीरिक शोषण और विकृति के साथ मर गया—फिर भी अपनी परीक्षाओं के मध्य में वह कहता रहा, “मैं आनन्दित रहूँगा।”

परमेश्वर पौलुस के पूरे जीवन पर प्रभु था: उसके शरीर, उसके समय, उसके सम्पूर्ण अस्तित्व पर। केवल यही वह बात थी जो उसे इतनी खुशी दे सकती थी। केवल यही वह बात थी जो हमें भी इतनी खुशी दे सकती है।

सारांश यह है कि आप अपने नहीं हैं। जो कुछ भी आपके पास है, वह आपका नहीं है। चाहे परमेश्वर ने आपको अधिक दिया हो या कम, सब कुछ आपके प्रबन्ध के अधीन है। आप अपने परमेश्वर के हैं, जो आपका सृष्टिकर्ता और आपका उद्धारकर्ता है। एक दिन, वह हमें महिमापूर्ण, अमर शरीरों के साथ जीवित करेगा (1 कुरिन्थियों 15:42-44, 51-54)। इस समय, इस जीवन में वह हमें इस शरीर में उसकी सेवा करने के लिए बुलाता है। इसलिए जो कुछ भी आप अपने शरीर के साथ करते हैं, उसे परमेश्वर के सामने प्रसन्नता से चढ़ावे के रूप में अर्पित करें।

1 कुरिन्थियों 6:12-20

25 अप्रैल : अंधे के लिए दया

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25 अप्रैल : अंधे के लिए दया
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“वह यह सुनकर कि यीशु नासरी है, पुकार-पुकार कर कहने लगा, ‘हे दाऊद की सन्तान, यीशु मुझ पर दया कर!’” मरकुस 10:47

अंधा बरतिमाई पूरी तरह अंधकार में बैठा था। वह चलने-फिरने की आहट, भीड़ की आवाज़ें और लोगों की बातों का शोर सुन सकता था। वह उस हंगामे को सुन सकता था जो यह संकेत दे रहा था कि नासरत का यीशु अंधेरे में कहीं पर है, लेकिन वह उसे देख नहीं सकता था।

यह महसूस करते हुए कि उसके पास यीशु का ध्यान खींचने का केवल यही एक मौका हो सकता है, उसने व्याकुल होकर शोर मचाया, “हे दाऊद की सन्तान, यीशु मुझ पर दया कर!”

बरतिमाई  की प्रार्थना की सादगी और स्पष्टता उसके विश्वास की गवाही थी; यह इस बात का संकेत था कि वह सचमुच विश्वास करता था कि यीशु वह कर सकता है, जो वह उससे माँग रहा था। परमेश्वर की कृपा से अंधे बरतिमाई  ने वह देखा जो अनगिनत लोग नहीं देख पाए थे: उसने देखा कि यीशु में वह परमेश्वर की दया पा सकता है। और जब यीशु ने उसकी ज़रूरत का समाधान किया, तो बरतिमाई और इस आश्चर्यकर्म को देखने वाले लोग समझ गए कि उसका विश्वास ही उसकी चंगाई का कारण था। लेकिन बरतिमाई ने यह गलती नहीं की कि केवल उसकी शारीरिक दृष्टि ही उसकी असली जरूरत थी। यही कारण था कि जैसे ही उसे यीशु से दृष्टि मिली, वह “मार्ग में उसके पीछे हो लिया” (मरकुस 10:52)।

इस आश्चर्यकर्म में हम पूरे सुसमाचार का एक सूक्ष्म रूप देखते हैं। बाइबल मनुष्यों की वास्तविक स्थिति का वर्णन करने के लिए अक्सर अंधेपन का उपयोग करती है। उदाहरण के लिए, प्रेरित पौलुस कहता है, “उन अविश्वासियों के लिए, जिनकी बुद्धि इस संसार के ईश्वर ने अंधी कर दी है, ताकि मसीह जो परमेश्‍वर का प्रतिरूप है, उसके तेजोमय सुसमाचार का प्रकाश उन पर न चमके” (2 कुरिन्थियों 4:4); और यीशु ने स्वयं कहा, “मैं इस जगत में न्याय के लिए आया हूँ, ताकि जो नहीं देखते वे देखें” (यूहन्ना 9:39)। और मरकुस के सुसमाचार में हम पढ़ते हैं कि हालाँकि शिष्य यीशु का अनुसरण कर रहे थे, फिर भी वह जो कुछ भी उन्हें सिखा रहा था, उसे वे पूरी तरह से समझ नहीं पाए थे, इसलिए उसने पूछा, “क्या आँखें रखते हुए भी नहीं देखते, और कान रखते हुए भी नहीं सुनते?” (मरकुस 8:18)।

तो फिर, अंधों को दृष्टि कैसे मिलती है? वैसे ही जैसे बरतिमाई को मिली: यीशु के पास जाकर और उससे दया की पुकार करके, और वह प्रेमपूर्ण क्षमा और नया जीवन माँगकर जो केवल वही प्रदान कर सकता है। आप कभी भी यीशु मसीह को अपने जीवन में एक वास्तविकता के रूप में नहीं जान पाएँगे, जब तक कि आप उसे एक आवश्यकता के रूप में न जान लें। यह वह सत्य है जिसे हमें उसके पीछे चलने के पहले दिन का आनन्द लेने के लिए समझना जरूरी है; लेकिन यह ऐसा सत्य भी है जिसे हमें हमेशा याद रखना है ताकि हम अपने जीवन में उसके पीछे चलना जारी रख सकें। जिस भी तरह से आपको इस समय दया की आवश्यकता है, उसे विश्वास की आँखों से देखिए और बस माँगिए। खुशखबरी यह है कि यीशु अभी भी सुनता है, यीशु अभी भी परवाह करता है, यीशु अभी भी रुकता है, यीशु अभी भी उत्तर देता है, और यीशु अभी भी उद्धार देता है।

मरकुस 10:46-52

24 अप्रैल : दुख से आनन्द की ओर

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24 अप्रैल : दुख से आनन्द की ओर
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“यह कहकर उसने अपना हाथ और अपना पंजर उनको दिखाए। तब चेले प्रभु को देखकर आनन्दित हुए।” यूहन्ना 20:20

पहला ईस्टर एक सामान्य ईस्टर उत्सव जैसा नहीं दिखा।

यीशु के पुनरुत्थान का समाचार आने से पहले वह दिन आँसुओं, तबाही और उलझन से भरा हुआ था—उसमें आनन्द, आशा और स्तुति बिल्कुल नहीं थे। शिष्य डर के मारे एक साथ इकट्ठा थे, एक-दूसरे को बचाने के लिए, यह गाने के लिए नहीं, “मसीह प्रभु आज जी उठा है, हालेलुयाह!”[1] वे दुखी बैठे थे; उनकी कहानी अचानक थम गई थी और अगला पन्ना खाली था।

या यह उनकी अपनी सोच थी।

बाइबल यीशु की क्रूस पर मृत्यु के बाद उसके अनुयायियों द्वारा महसूस किए गए दुख को नकारने या कम करने का प्रयास नहीं करती। वे नहीं समझ पाए थे कि क्या हुआ था और निश्चित रूप से उन्हें यह नहीं पता था कि आगे क्या होने वाला था। उनका दुख मनुष्यजाति की सीमाओं को दर्शाता है कि हम बड़ी तस्वीर को पूरी तरह से नहीं समझ सकते। पुराने नियम की भविष्यवाणियों और यीशु द्वारा अपनी मृत्यु की नबूवत के बावजूद (मरकुस 8:31; 9:31; 10:33-34) यूहन्ना का सुसमाचार हमें बताता है कि “वे तो अब तक पवित्रशास्त्र की वह बात न समझे थे कि उसे मरे हुओं में से जी उठना होगा” (यूहन्ना 20:9)। वे यह नहीं समझे थे कि जब यीशु ने क्रूस से कहा, “पूरा हुआ” (19:30), तो वह पराजय की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि विजय की घोषणा थी।

इस विजय का अर्थ पुनरुत्थान था। और जब मृतकों में से जी उठा उद्धारकर्ता अपने शिष्यों के अंधकार, भय और दुख में आया, तो उनके लिए एक परिवर्तन ले आया। उनका अविश्वास विश्वास में और उनका दुख आनन्द में बदल गया। वह आनन्द इस तथ्य में निहित था कि वे समझ गए थे कि यीशु मृतकों में से जी उठा था। उनका विश्वास और भविष्य लौट आए थे, और इस अद्‌भुत वास्तविकता में जड़ें जमा ली थीं। उनकी निराशा के अंधकार ने पुनरुत्थान के प्रकाश को और भी महिमामय बना दिया था।

यदि आप किसी ऐसे देवता की तलाश में हैं जो आपको केवल आनन्द दे, तो आपको बाइबल के परमेश्वर की तलाश नहीं करनी चाहिए। वह हमें आनन्दित करता है—किसी भी अन्य व्यक्ति या वस्तु से अधिक—परन्तु वह अक्सर हमें दुख देकर आरम्भ करता है। हम इस टूटे हुए संसार से दुखी होते हैं, अपने पाप से दुखी होते हैं, इस बात से दुखी होते हैं कि यीशु ने हमारे पापों, अवज्ञा और उदासीनता के लिए क्रूस पर अपने प्राण दे दिए। केवल ऐसे सच्चे दुख की भावना से ही हम उस आनन्द को पूरी तरह समझ सकते हैं, जो हमारे हिसाब को चुकता करने, हमारे कर्ज को चुकाने और हमारे अपराधों को माफ करने के साथ आता है।

हम उस प्रेम का आनन्द ले सकते हैं जो हमें उस स्थिति में भी प्रेम करता है, जब हम इसके लायक नहीं होते—जो हमें तब भी प्रेम करता है जब हम सुनना नहीं चाहते। यह कैसा प्रेम है? यही है मनुष्यों के लिए, आपके और मेरे लिए परमेश्वर का प्रेम! आज, अपने आप से आँखें हटाकर उसे देखिए। यही प्रेम है, और जब हम जान जाते हैं कि हमें इस तरह से प्रेम किया गया है, तो हम कष्टों में भी चंगाई देख सकते हैं और यह समझ सकते हैं कि दुख वह भूमि हो सकता है जिसमें अनन्त आनन्द पनपता है। आपके जीवन के किस भाग के बारे में—जो भाग शायद दर्द, पछतावे, या चिन्ता से भरा हुआ है—आपको आज यह सुनने की आवश्यकता है? याद रखें कि आप जिस भी परिस्थिति में से गुजर रहे हैं, यह सत्य कायम रहता है कि मसीह प्रभु जी उठा है। हालेलुयाह!

 यूहन्ना 20:19-23