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18 अगस्त : एक चिन्ता का विषय

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18 अगस्त : एक चिन्ता का विषय
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“जिस रेंड़ के पेड़ के लिए तू ने कुछ परिश्रम नहीं किया, न उसको बढ़ाया, जो एक ही रात में हुआ, और एक ही रात में नष्ट भी हुआ; उस पर तू ने तरस खाई है। फिर यह बड़ा नगर नीनवे, जिसमें एक लाख बीस हज़ार से अधिक मनुष्य हैं जो अपने दाहिने बाएँ हाथों का भेद नहीं पहचानते, और बहुत से घरेलू पशु भी उसमें रहते हैं, तो क्या मैं उस पर तरस न खाऊँ?” योना 4:10-11

योना ने खुद को एक पीड़ित माना। उसे इस बात में पूरी तरह से यकीन था कि नीनवे को न्याय मिलना चाहिए था और यह कि उस नगर को बचाकर परमेश्वर ने गलत किया था। उसे इस बात में भी यकीन था कि छाँव देने वाले पौधे को मुरझा कर परमेश्वर ने गलत किया था, जिसके कारण उसे गर्मी में कष्ट भोगना पड़ रहा था।

इस पर परमेश्वर ने भविष्यवक्ता से उसकी दुख भरी आपत्ति पर बात नहीं की, बल्कि एक महत्त्वपूर्ण सवाल उठाया: “तेरा क्रोध, जो रेंड़ के पेड़ के कारण भड़का है, क्या वह उचित है?” (योना 4:9)। परमेश्वर ने छोटे से बड़े तक तर्क किया: यदि योना एक पौधे के लिए इतना चिन्तित हो सकता है, जो 24 घण्टे में आकर चला गया, तो क्या परमेश्वर को नीनवे के लोगों के बारे में चिन्ता करने का अधिकार नहीं था? परमेश्वर योना को अपनी प्राथमिकताओं का पुनः मूल्यांकन करने के लिए कह रहा था।

परमेश्वर ने जो सवाल योना से पूछा था, वह सवाल हमारे सामने भी आता है। क्या हमारे जीवन में ऐसी कोई चीज़ है जो हमें इससे अधिक चिन्तित करती हो कि अविश्वासी लोग यीशु मसीह के समर्पित अनुयायी बन जाएँ? यदि हम अपने दिलों को लेकर जागृत हैं, तो हम देख पाएँगे कि हमारे समय, पैसे, वरदानों, और स्वतन्त्रता को लेकर हमारा जो रवैया पहले “बस इतना ही काफी है” वाला था, वह जल्दी ही बदलकर “मुझे और चाहिए” वाला हो जाता है। शायद हमें देखने वाले लोग सोचें कि जिन लोगों ने अभी तक सुसमाचार नहीं सुना है, उनके बारे में चिन्तित होने के बजाय हम अपने आराम की स्थिति के बारे में कहीं ज्यादा चिन्तित हैं।

परमेश्वर के सवाल पर योना का उत्तर क्या था? हम नहीं जानते। योना की पुस्तक इसी दिव्य सवाल के साथ खत्म हो जाती है। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि योना ने क्या उत्तर दिया होगा। इस पुस्तक का पूरा जोर परमेश्वर की दया पर है। सबसे महत्त्वपूर्ण सवाल यह है: हम, जो इस पुस्तक को पढ़ते हैं, परमेश्वर के अनुग्रह को कैसे देखते हैं? क्या उसका उदाहरण हममें दूसरों के लिए एक चिन्ता की पद्धति स्थापित करेगा, जिससे हम उनके पाप से फिरने और परमेश्वर पर विश्वास करने की कामना करेंगे? क्या हमारे दिल योना के जैसे होंगे या परमेश्वर के जैसे?

समय आ गया है कि हम अपनी किसी भी सांसारिक चिन्ता को उन खोई हुई आत्माओं के प्रचार के ऊपर न रखें, जो हमारे समुदायों में मसीह को नहीं जानते। हमें यीशु के माध्यम से अपने जीवन में परमेश्वर की दया का अनुभव करने का आनन्द मिला है। और इस महान विशेषाधिकार का उपयुक्त उत्तर यही है कि हम अपने आप को इस प्रकार दें ताकि अन्य लोग भी उसे जान सकें। आप सबसे ज्यादा किस बात की चिन्ता करते हैं? आपके घर की? आपकी सम्पत्ति की? आपके तकनीकी गैजेट्स की? या आपकी गली के उन लोगों की, जो यीशु को नहीं जानते?

मत्ती  28:16-20

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 100–102; गलातियों 3 ◊

17 अगस्त : रहस्यमयी प्रावधान

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17 अगस्त : रहस्यमयी प्रावधान
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“तब यहोवा परमेश्‍वर ने एक रेंड़ का पेड़ उगाकर ऐसा बढ़ाया कि योना के सिर पर छाया हो, जिससे उसका दुख दूर हो। योना उस रेंड़ के पेड़ के कारण बहुत ही आनन्दित हुआ। सबेरे जब पौ फटने लगी, तब परमेश्‍वर ने एक कीड़े को भेजा, जिस ने रेंड़ का पेड़ ऐसा काटा कि वह सूख गया।” योना 4:6-7

नीनवे को बचा लिया गया था, लेकिन जब भविष्यवक्ता योना वहाँ से बाहर निकला, तो वह नाखुश था। उसने प्रभु से कहा, मुझे पहले ही पता था कि तू उन्हें उनके सारे बुरे कर्मों के बावजूद क्षमा कर देगा। अब अपने शत्रुओं को क्षमा होते हुए देखने से अच्छा है कि मैं मर जाऊँ (योना 4:2-3)।

योना ने सम्भवतः पत्थरों या मिट्टी की ईंटों से अपने लिए एक छोटा-सा छप्पर बनाया (पद 5)। उस चिलचिलाती धूप में खुले आकाश के नीचे बैठना उसके लिए बहुत ही असहज होता। कल्पना करें कि वह अपनी छोटी-सी झोंपड़ी में बैठा मृत्यु की इच्छा कर रहा था, और फिर उसने देखा कि उसके पास एक पौधा उगकर बड़ा हो रहा है। अचानक उस पौधे की छाया से दिन की गर्मी कम हो गई—और योना बहुत, बहुत खुश हुआ।

लेकिन उसकी यह खुशी क्षणिक थी। जिस परमेश्वर ने योना के आराम के लिए वह पौधा प्रदान किया था, उसी परमेश्वर ने एक कीड़ा भी भेजा जिसने उस पौधे को नष्ट कर दिया। यह पौधा किसी अस्वाभाविक कारण से नहीं सूखा, बल्कि यह सब परमेश्वर के दिव्य नियन्त्रण के तहत सामान्य प्रक्रियाओं के कारण हुआ।

सृष्टिकर्ता परमेश्वर अपनी बनाई हर चीज़ पर सम्प्रभु है। अपने रहस्यमयी प्रावधान के माध्यम से वह अपने सेवक के साथ अपनी इच्छा के अनुसार काम कर रहा था। योना की पुस्तक में एक वाक्यांश बार-बार दोहराया गया है: “यहोवा ने . . . ठहराया था।” उसने एक बड़े जल-जन्तु, एक पौधे, एक कीड़े और पुरवाई से बहने वाली लू को ठहराया था—उसने यह सब अपने सेवक के प्रति अपने प्रेम और चिन्ता को प्रकट करने के लिए किया था (योना 1:17; 4:8)। चाहे वह एक विशाल जल-जन्तु हो या एक छोटा कीड़ा, परमेश्वर अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए हर चीज़ को नियन्त्रित कर रहा था, जैसा कि वह आज भी कर रहा है।

हम प्रावधान की इस शिक्षा को हीडलबर्ग कैटेकिज़म के प्रश्न 27 में भी देखते हैं: “आप परमेश्वर के प्रावधान को कैसे समझते हो?” उत्तर मिलता है: “परमेश्वर का प्रावधान उसका सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी सामर्थ्य है, जिसके द्वारा वह आकाश और पृथ्वी और सभी सृजित वस्तुओं को मानो अपने हाथ से सम्भाले रखता है, और उन्हें इस प्रकार नियन्त्रित करता है कि हर पत्ता और घास, वर्षा और सूखा, फलदायक और अकाल के वर्ष, भोजन और पेय, स्वास्थ्य और बीमारी, धन और गरीबी—वास्तव में, सब कुछ किसी संयोग से नहीं, बल्कि उस पिता के प्रेमी हाथ से आता है।”[1]

अपने जीवन की यात्रा में जब आप “पौधों” को देखते हैं जो आपको आराम और खुशी देते हैं और जब आप “कीड़ों” को देखते हैं जो उस आराम को छीन लेते हैं, तो यह जानकर उत्साह प्राप्त करें कि आप किसी अंधे, भाग्यवादी बल के नियन्त्रण में नहीं हैं। बल्कि आपका स्वर्गिक पिता, जो आपको अपने प्रेमपूर्ण आलिंगन में रखता है, हर चीज़ को इस प्रकार व्यवस्थित कर रहा है कि वह आपके जीवन में अपने परम उद्देश्य को पूरा कर सके—ताकि आपको अपने पुत्र के समान बनाए और आपको अपने पास ले आए।

तो अपने जीवन पर विचार करें। आपके जीवन में कौन से “पौधे” हैं? कौन से “कीड़े” हैं? और क्या आप यह जानते हुए दोनों के लिए धन्यवाद देंगे कि ये सब एक प्रेमी पिता द्वारा आपके अनन्त कल्याण के लिए दिए गए हैं?

याकूब 1:9-18

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 97–99; गलातियों 2


[1] हीडलबर्ग कैटेकिज़म, प्र. 27.

16 अगस्त : अयोग्य सेवक

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16 अगस्त : अयोग्य सेवक
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“[योना] ने यहोवा से यह कहकर प्रार्थना की, ‘हे यहोवा, जब मैं अपने देश में था, तब क्या मैं यही बात न कहता था? इसी कारण मैं ने तेरी आज्ञा सुनते ही तर्शीश को भाग जाने के लिए फुर्ती की; क्योंकि मैं जानता था कि तू अनुग्रहकारी और दयालु परमेश्‍वर है, और विलम्ब से कोप करने वाला करुणानिधान है, और दुख देने से प्रसन्न नहीं होता’ . . . यहोवा ने कहा, “तेरा जो क्रोध भड़का है, क्या वह उचित है?’” योना 4:2, 4

जब बच्चे कुछ गलत करते हैं, तो वे अक्सर अपने माता-पिता से क्षमा मांगते हैं, उसे प्राप्त करते हैं, और फिर कहते हैं, “मुझे पता है कि मैं गलत था, लेकिन . . . जो कुछ मैंने किया उसके पीछे एक बहुत अच्छा कारण था।” हम कुछ ऐसा ही भविष्यवक्ता योना के साथ देखते हैं। परमेश्वर ने उसे क्षमा किया, उसे उठाया, और उसे सही मार्ग पर वापस रखा—फिर भी उसने अपनी पिछली अवज्ञा को उचित ठहराने की कोशिश की। वह एक ही समय में क्रोधित हो रहा था, तर्क कर रहा था, और प्रार्थना कर रहा था—जो आसान कार्य नहीं है!

ध्यान दें कि योना के इस तर्क-वितर्क में “मैं” शब्द कितनी बार उभरकर आता है। उसकी बातचीत में बहुत अधिक “योना” था—और इसलिए उसके हृदय में भी—क्योंकि वह इस पूरे विषय को अपनी इच्छा और परमेश्वर की इच्छा के बीच की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत कर रहा था। उसने मूर्खतापूर्वक यह मान लिया था कि उसकी योजना परमेश्वर की योजना से बेहतर थी।

योना की शिकायत एक दोहरे मापदण्ड पर आधारित थी। हालाँकि हाल ही में वह स्वयं परमेश्वर की करुणा और दया का पात्र बना था, फिर भी उसने उसी दया को नीनवे के लोगों पर प्रकट करने के लिए परमेश्वर को दोषी ठहराया, जिन्हें वह उद्धार के योग्य नहीं समझता था।

योना के लिए सबसे बड़ी समस्या थी परमेश्वर का सम्प्रभु अनुग्रह। वह इस बात से क्रोधित था कि परमेश्वर ने उस तरीके से कार्य किया था जिसे वह न तो समझता था और न ही स्वीकार करता था। लेकिन बहुत पहले ही प्रभु ने घोषणा कर दी थी, “जिस पर मैं अनुग्रह करना चाहूँ उसी पर अनुग्रह करूँगा, और जिस पर दया करना चाहूँ उसी पर दया करूँगा” (निर्गमन 33:19)। पापियों के प्रति परमेश्वर का अनुग्रह कभी समझाया नहीं जा सकता। इसका कोई कारण नहीं होता; यह केवल परमेश्वर के स्वभाव को दर्शाता है।

योना की प्रतिक्रिया के उत्तर में प्रभु ने उससे यह नहीं पूछा कि क्या वह क्रोधित है, बल्कि यह पूछा कि क्या उसे क्रोधित होने का कोई अधिकार है। यही असली मुद्दा था: क्या योना को परमेश्वर की दया पर आपत्ति करने का कोई उचित कारण था—जो स्वयं एक ऐसे राष्ट्र का प्रतिनिधि था जिसे परमेश्वर ने अनुग्रहपूर्वक आशीषित किया था, भले ही वे पथभ्रष्ट हो गए थे, और जिसने अपनी अवज्ञा में व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर के उद्धारक हाथ का अनुभव किया था? उत्तर स्पष्ट है: नहीं। और न ही हमारे पास यह अधिकार है कि हम परमेश्वर से प्रश्न करें कि वह किस पर और कैसे अपनी दया प्रकट करता है या वह अपने लोगों को बचाने के लिए और अपने पुत्र की महिमा करने के लिए सभी चीज़ों को कैसे संचालित करता है।

यदि हम स्वयं को परमेश्वर से नाराज़ पाते हैं और उसके द्वारा अपनी योजनाओं को पूरा करने के तरीके पर शिकायत करते हुए पाते हैं, तो यह इसलिए है क्योंकि हम यह भूल गए हैं कि हम स्वयं उसकी दया और अनुग्रह के अयोग्य हैं। सबसे बड़ा खतरा यह है: कि हम अपनी अवज्ञा के इतने आदी हो जाएँ कि हम स्वयं को परमेश्वर की कृपा और आशीष के योग्य समझने लगें। लेकिन प्रतिदिन सब कुछ केवल अनुग्रह से ही प्राप्त होता है। केवल जब हम इस अनुग्रह से पूरी तरह प्रभावित होंगे, तब ही हम परमेश्वर की उस असीमित दया में आनन्दित हो सकेंगे जो वह अपने अयोग्य संतों पर लुटाता है।

योना 4

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 94–96; गलातियों 1 ◊

15 अगस्त : परमेश्वर की योजना के साथ सामंजस्य में

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15 अगस्त : परमेश्वर की योजना के साथ सामंजस्य में
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“जब परमेश्‍वर ने उनके कामों को देखा, कि वे कुमार्ग से फिर रहे हैं, तब परमेश्‍वर ने अपनी इच्छा बदल दी, और उनकी जो हानि करने की ठानी थी, उसको न किया। यह बात योना को बहुत ही बुरी लगी, और उसका क्रोध भड़का।” योना 3:10 – 4:1

यहाँ तक कि भविष्यवक्ताओं को भी कभी-कभी बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता होती है।

जल-जन्तु के पेट में समय बिताने के बाद योना अब परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर रहा था, लेकिन अपनी आज्ञाकारिता में अब वह उलझन में था। वह अभी भी परमेश्वर की सम्प्रभु कृपा को समझने के लिए संघर्ष कर रहा था। पहले, जब उसने परमेश्वर की योजना से भागने की कोशिश की थी, तब उसकी अवज्ञा स्पष्ट थी; लेकिन अब, जब उसने वह किया जो उसे करने के लिए कहा गया था और वहाँ गया जहाँ उसे भेजा गया था, तब भी वह नीनवे के लिए परमेश्वर की दयालु योजना के साथ पूरी तरह सामंजस्य में नहीं था। एक ऐसे नगर में आत्मिक जागृति आ गई थी जो इस्राएल के परमेश्वर के प्रति पूरी तरह कठोर हो चुका था—और परमेश्वर का भविष्यवक्ता इस पर क्रोधित हो गया!

फिर भी, भले ही योना कठोर और संकीर्ण दृष्टिकोण वाला था और परमेश्वर की भलाई पर गलत प्रतिक्रिया दे रहा था, फिर भी परमेश्वर ने उसे त्यागा नहीं। जिस परमेश्वर ने उसे अवज्ञा से बचाने के लिए एक बड़ी जल-जन्तु भेजा था, वह उसे उचित रूप से दण्ड देने के लिए एक बड़ा सिंह भी भेज सकता था! लेकिन उसने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वह अनुग्रहकारी और दयालु है। परमेश्वर ने उसे धैर्य और कोमलता से सम्भाला, ताकि वह यह समझ सके कि सबसे बड़ी समस्या उसकी परिस्थिति नहीं, बल्कि उसका अपना मनोभाव था।

नीनवे के लोगों के पश्चाताप पर योना की प्रतिक्रिया एक प्रचारक के लिए अजीब थी। हमें उससे यह अपेक्षा करनी चाहिए थी कि वह इस बात के लिए आभारी होगा कि परमेश्वर ने उसे त्यागने के बजाय अपनी सेवा में उपयोग होने का सौभाग्य दिया था। लेकिन इसके बजाय, पूरे नगर के पश्चाताप से योना का “क्रोध भड़का।” इस पद का एक शाब्दिक अनुवाद इसे और भी आगे ले जाता है: “योना की दृष्टि में यह बुरी बात थी, बहुत बुरी बात।” जिस विपत्ति की उसने नीनवे पर गिरने की आशा की थी—जिसका उसने अनुमान लगाया था और जिसकी उसने कामना की थी—उसकी अनुपस्थिति स्वयं उसके अपने मन और विचारों में एक विपत्ति बन गई।

यद्यपि यह सुनने में कटु लगता है, हम योना की भावनाओं और प्रतिक्रियाओं को अपने जीवन में भी प्रतिबिम्बित देख सकते हैं। हम वहाँ जा सकते हैं जहाँ हमें जाने के लिए कहा गया है, हम वह कह सकते हैं जो हमें कहने के लिए कहा गया है, हम बाहरी रूप से परमेश्वर की सभी आज्ञाओं का पालन कर सकते हैं . . . और फिर भी, अपने जीवन के मूल में हम वास्तव में उसके उद्देश्य के साथ सामंजस्य में नहीं हो सकते हैं। हम न्याय की कामना कर सकते हैं, जबकि परमेश्वर दया दिखाना चाहता है। हम इस बात से बेचैन हो सकते हैं कि परमेश्वर दूसरों को उस तरीके से आशीषित कर रहा है जैसा उसने हमें नहीं किया—या दूसरों को बिना किसी प्रतिबद्धता के आशीष दे रहा है, जबकि हमें लगता है कि हमने उसके लिए अधिक प्रयास किया है। हम स्वयं परमेश्वर को बताने लग सकते हैं कि उसे अपने संसार को कैसे संचालित करना चाहिए!

फिर, हमें उसकी दया के साथ सामंजस्य में लाने और खुशी-खुशी उसके मिशन में भेजने के लिए क्या आवश्यक है? केवल यही: यह समझना कि हम किसी से भी बेहतर नहीं हैं—हम उसकी दया के उतने ही अयोग्य हैं जितने अन्य लोग हैं और हम उसके क्रोध के उतने ही योग्य हैं जितने अन्य लोग हैं। परमेश्वर की दया को प्रकट करते हुए क्रूस हमारे हृदयों को नम्र करता है और इसमें वही करुणा तथा अनुग्रह भरता है, जिसने उसके पुत्र को कलवरी तक पहुँचाया। क्या आप दूसरों के प्रति ऐसी करुणा दिखाने में संघर्ष कर रहे हैं? क्रूस की ओर निहारें और प्रभु से प्रार्थना करें कि वह आपको वही सिखाए जो योना को भी सीखने की आवश्यकता थी।

कुलुस्सियों 1:21-29

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 91–93; 1 पतरस 5

14 अगस्त : हमारा अपरिवर्तनीय परमेश्वर

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14 अगस्त : हमारा अपरिवर्तनीय परमेश्वर
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“जब परमेश्‍वर ने उनके कामों को देखा, कि वे कुमार्ग से फिर रहे हैं, तब परमेश्‍वर ने अपनी इच्छा बदल दी, और उनकी जो हानि करने की ठानी थी, उसको न किया।” योना 3:10

बाइबल स्पष्ट रूप से बताती है कि परमेश्वर अपरिवर्तनीय है। साथ ही, योना की पुस्तक यह पुष्टि करती है कि वह लोगों के प्रति अपने दृष्टिकोण और उनके साथ व्यवहार करने के अपने तरीके को बदल सकता है और बदलता भी है। हम इस स्पष्ट विरोधाभास को कैसे समझें?

हम इस प्रकार के विरोधाभास को अन्य स्थानों पर भी पाते हैं। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर ने राजा शाऊल के साथ व्यवहार किया, तो उसने कहा, “मैं शाऊल को राजा बना के पछताता हूँ; क्योंकि उसने मेरे पीछे चलना छोड़ दिया, और मेरी आज्ञाओं का पालन नहीं किया” (1 शमूएल 15:11)। लेकिन कुछ ही पदों बाद कहा गया है, “जो इस्राएल का बलमूल है वह न तो झूठ बोलता और न पछताता है; क्योंकि वह मनुष्य नहीं है कि पछताए” (पद 29)। ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर को अपने निर्णय पर पछतावा हुआ, फिर भी यह कहा गया कि वह पछताता नहीं है।

फिर भी, इन दोनों प्रकार की अभिव्यक्तियों में कोई परम असंगति नहीं है। जब परमेश्वर को पछताने या मन बदलने वाला कहा जाता है, तो यह वर्णनात्मक भाषा हमारी सीमित मानव समझ के अनुरूप होती है। ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर बदल गया है, लेकिन वास्तव में जो बदला है, वह हमारा मानवीय आचरण है। सरल शब्दों में, शाऊल अब वह व्यक्ति नहीं रहा जो वह पहले था। वह निरन्तर अवज्ञाकारी हो गया था, और परमेश्वर ने उस बदले हुए हालात का जिस प्रकार उत्तर दिया, वह पूरी तरह उसके चरित्र के अनुसार था।

इसी तरह, योना के प्रचार के परिणामस्वरूप नीनवेवासियों ने अपना व्यवहार बदल लिया—इस बार विपरीत दिशा में, अर्थात वे बुराई से दूर हो गए। परमेश्वर सदा पाप के विरुद्ध और पश्चाताप तथा विश्वास के पक्ष में रहता है; उसका चरित्र नहीं बदलता। उसकी चेतावनियाँ भटके हुए लोगों को सचेत करने और उन्हें पश्चाताप की ओर ले जाने के लिए होती हैं—और जब पश्चाताप होता है, तो परमेश्वर उसी के अनुसार उत्तर देता है।

चूंकि परमेश्वर इस प्रकार उत्तर देता है, इस कारण यीशु पर विश्वास करने वाला पापी उसकी स्वीकृति को प्राप्त कर सकता है। क्योंकि “यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक–सा है” (इब्रानियों 13:8), हम यह निश्चयपूर्वक जान सकते हैं कि जब हम पश्चाताप और सरल विश्वास के साथ उसके पास आते हैं, तो वह हमें करुणा और दया के साथ ग्रहण करता है। यही उसका वास्तविक स्वभाव है, और वह कभी नहीं बदलेगा। हमारे दृष्टिकोण से यह प्रतीत हो सकता है कि उसने अपना मन बदल लिया है—परन्तु परमेश्वर सदा अपने प्रत्येक वचन के प्रति सच्चा रहता है। एक ऐसे संसार में, जो निरन्तर बदल रहा है और जहाँ हममें से सर्वश्रेष्ठ लोग भी हमेशा अपने वचन को निभाने में असफल हो सकते हैं, यही आपके आत्मविश्वास और आनन्द का महान आधार है।

योना 3

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 89–90; 1 पतरस 4 ◊

13 अगस्त : पश्चाताप का एक अनुस्मारक

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13 अगस्त : पश्चाताप का एक अनुस्मारक
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“तब नीनवे के मनुष्यों ने परमेश्‍वर के वचन की प्रतीति की; और उपवास का प्रचार किया गया और बड़े से लेकर छोटे तक सभों ने टाट ओढ़ा। तब यह समाचार नीनवे के राजा के कान में पहुँचा; और उसने सिंहासन पर से उठ, अपने राजकीय वस्त्र उतारकर टाट ओढ़ लिया, और राख पर बैठ गया।” योना 3:5-6

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि आपके देश का राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री एक राष्ट्रीय प्रसारण में पूरे राष्ट्र से आग्रह करे कि वे अपनी हिंसक गतिविधियाँ छोड़ दें, अपनी बुराइयों से विमुख हों, और परमेश्वर की दया की याचना करें ताकि वह आकर अपने न्याय से उन्हें बचा सके? वास्तव में, योना की आँखों के सामने नीनवे में यही हुआ।

यह वास्तव में आश्चर्यजनक है कि नीनवेवासियों ने परमेश्वर पर इतनी शीघ्रता और पूर्णता से विश्वास किया। जब उन्होंने योना द्वारा दिए गए न्याय के सन्देश को सुना, तो उनकी प्रतिक्रिया व्यापक और सच्चे हृदय से हुई थी, जिसे उनके पश्चाताप के वस्त्रों से देखा जा सकता था। और इस सार्वजनिक प्रतिक्रिया के अनुरूप ही राजा ने भी प्रतिक्रिया की थी। राजा ने अपने वस्त्र बदले और अपने राजसी वस्त्र उतारकर टाट ओढ़ लिए; उसने अपनी जगह बदली और अपने सिंहासन को छोड़कर धूल में बैठ गया; और उसने अपने शब्द बदले और पश्चाताप की घोषणा जारी कर दी।

यह यीशु के समय के लोगों, और शायद हमारे अपने समय के लोगों से बिल्कुल विपरीत है। स्वयं यीशु ने सिखाया कि नीनवेवासियों ने “योना का प्रचार सुनकर मन फिराया,” जबकि जिनसे यीशु ने बात की, उनमें से बहुतों ने यह पहचानने से इनकार कर दिया कि “देखो, यहाँ वह है जो योना से भी बड़ा है”—अर्थात स्वयं मसीह (लूका 11:32)। उन्होंने वह अस्वीकार कर दिया जो नीनवे के राजा ने समझ लिया था जब उसने कहा, वे . . . पश्चाताप करें। सम्भव है, परमेश्‍वर दया करे और अपनी इच्छा बदल दे, और उसका भड़का हुआ कोप शान्त हो जाए और हम नष्ट होने से बच जाएँ (योना 3:8-9)। राजा समझ गया था कि नीनवेवासियों के पश्चाताप का अर्थ यह नहीं था कि परमेश्वर अनिवार्य रूप से उन्हें क्षमा कर देगा। वह अब भी अनिश्चित था कि उनके पश्चाताप के साथ परमेश्वर भी अपना निर्णय बदलेगा या नहीं।

यह हमें एक महत्त्वपूर्ण सत्य की याद दिलाता है: यहाँ तक कि पश्चाताप करने वालों के पास भी परमेश्वर की स्वीकृति के लिए कोई दावा नहीं है। वे पूरी तरह से परमेश्वर के अनुग्रह पर निर्भर होते हैं। पश्चाताप क्षमा के लिए आवश्यक है, लेकिन यह उसे अर्जित नहीं करता। जैसे कि उड़ाऊ पुत्र ने कहा था, वैसे ही सच्चा पश्चाताप करने वाला व्यक्ति भी कहता है, “पिता जी, मैं ने स्वर्ग के विरोध में और तेरी दृष्‍टि में पाप किया है। अब इस योग्य नहीं रहा कि तेरा पुत्र कहलाऊँ” (लूका 15:18-19)। सच्चा पश्चाताप यह स्वीकार करने से आरम्भ होता है कि हम वास्तव में परमेश्वर के न्याय के योग्य हैं और हमें उसकी दया की अत्यन्त आवश्यकता है।

चूंकि “यहाँ वह है जो योना से भी बड़ा है,” इसलिए हम जान सकते हैं और घोषित कर सकते हैं कि पश्चाताप के उत्तर में हमेशा क्षमा ही मिलेगी, क्योंकि “जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा” (रोमियों 10:13)। लेकिन हमें इस गैर-यहूदी राजा से यह सीख लेना चाहिए कि हम अपने पश्चाताप या आज्ञाकारिता के द्वारा परमेश्वर को नियन्त्रित नहीं कर सकते, और यह कि सच्चा पश्चाताप केवल बाहरी नहीं बल्कि हृदय से होता है, जिसमें हमेशा हमारे दृष्टिकोण और व्यवहार में परिवर्तन शामिल होता है। यह एक ऐसा पाठ है जिसे हमें अपने मसीही जीवन के हर दिन अपनाना चाहिए—क्योंकि, जैसा कि मार्टिन लूथर ने कहा था, “जब हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह ने कहा, ‘पश्चाताप करो,’ तो उसका आशय था कि विश्वासियों का पूरा जीवन पश्चाताप होना चाहिए।”[1]

  लूका 11:29-32

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 87– 88; 1 पतरस 3


[1] द नाइनटी-फाईव थेसिस, फर्स्ट थेसिस

12 अगस्त : दया का ऐलान

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12 अगस्त : दया का ऐलान
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“तब यहोवा का यह वचन दूसरी बार योना के पास पहुँचा : ‘उठकर उस बड़े नगर नीनवे को जा, और जो बात मैं तुझ से कहूँगा, उसका उस में प्रचार कर।’ तब योना यहोवा के वचन के अनुसार नीनवे को गया। नीनवे एक बहुत बड़ा नगर था, वह तीन दिन की यात्रा का था।” योना 3:1-3

परमेश्वर दूसरा मौका देने वाला परमेश्वर है।

योना ने अपनी अवज्ञा के कारण नीनवे को आने वाले न्याय के बारे में चेतावनी देने के लिए परमेश्वर की आवाज़ का पालन करने के बजाय भागने का निर्णय लिया। लेकिन जब बुलावा दूसरी बार आया, तो उसने दूसरी बार आलसी होकर काम नहीं किया। अपनी असफलता और परमेश्वर की कृपा को जानकर वह पहले ही अवसर पर उन्हें प्रचार करने के लिए तत्पर दिखाई दिया।

जब हम आखिरकार योना को लोगों को पश्चाताप का बुलावा देते हुए पढ़ते हैं, तो हम यह कल्पना कर सकते हैं कि उसके ऊपर अपने स्वयं के अनुभवों का बोझ कितना अधिक होगा, जब वह अवज्ञा पर आने वाले दिव्य न्याय के बारे में बता रहा होगा। उसने चेतावनी दी, और इसमें निश्चित रूप से यह व्यक्तिगत गवाही भी शामिल थी कि परमेश्वर पापी लोगों को भी सबसे कठिन परिस्थितियों में से बचाने के लिए इच्छुक और सक्षम है। हालाँकि वह बाद में यह साबित करेगा कि उसने परमेश्वर की कृपा की विशालता और सीमा को पूरी तरह से नहीं समझा था (योना 4:1-3), परन्तु परमेश्वर की जो कृपा योना पर हुई थी, वह निश्चित रूप से उसके सन्देश में नीनवेवासियों तक पहुँची थी। जिस व्यक्ति को जल-जन्तु के रूप में दिव्य प्रावधान से दूसरा मौका मिला था, उसने अब एक ऐसे नगर को दूसरा मौका दिया था जो परमेश्वर से पूरी तरह विमुख हो चुका था।

क्या आप यह समझ पाए हैं कि परमेश्वर दूसरा (और तीसरा और चौथा) मौका देने वाला परमेश्वर है? क्या आप यह समझ पाए हैं कि न तो आप परमेश्वर की कृपा से तेज भाग सकते हैं या न ही उसकी कृपा की अथाह गहराइयों में पहुँच सकते हैं? यदि आप यह समझ गए हैं, तो आप निश्चित रूप से दूसरों को सुसमाचार का सन्देश देंगे। और जिस तरह से आप इसे साझा करेंगे, वह परमेश्वर की दी हुई कृपा को दर्शाएगा। यदि मसीही लोग अपने विश्वास के बारे में बात करते हुए कठोर, दयाहीन और कर्मकाण्डवादी प्रतीत होते हैं, तो इसका अर्थ है कि उन्होंने अभी तक अपने दिलों को परमेश्वर की कृपा, अनुग्रह और प्रेम से पर्याप्त रूप से कोमल नहीं किया है। लेकिन यदि किसी मसीही के शब्दों और कार्यों में परमेश्वर की कृपा का आकर्षण और सौम्यता है, तो यह इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि उसने ऐसी कृपा को स्वयं अनुभव किया है।

भजन लेखक चार्ल्स वेस्ले ने, जिसे परमेश्वर की कृपा ने जीत लिया था, यह घोषणा की:

कृपा की गहराई! क्या मेरे लिए अब भी कृपा बची है?

क्या मेरा परमेश्वर अपने क्रोध को सह सकता है? मुझे, सबसे बड़े पापी को बचा सकता है?

मैंने लम्बे समय तक उसकी कृपा का विरोध किया है: लम्बे समय तक उसे क्रोध दिलाया है;

मैंने उसकी पुकारों को नहीं सुना; बार-बार असफलताओं से उसे दुखी किया . . .

उद्धारकर्ता मेरे लिए वहाँ खड़ा है, अपने घाव दिखाता है और अपने हाथ फैलाता है:

परमेश्वर प्रेम है! मैं जानता हूँ, मैं महसूस करता हूँ; यीशु रोता है, लेकिन फिर भी मुझसे प्रेम करता है।[1]

अभी परमेश्वर की कृपा पर विचार करें—कि कैसे वह आपको विश्वास तक लाया है, आपके प्रति धीरज धरता है और आपको क्षमा करता रहता है। उसके साथ आपके व्यवहार में जो आश्चर्य की भावना है, वह आपकी कहानी में झलकनी चाहिए जब आप दूसरों को उसकी उद्धारक प्रेम कथा सुनाते हैं। और यदि कोई ऐसा व्यक्ति है जिसे आप परमेश्वर की दया दिखाने में असफल रहे हों या जब अवसर था तब उसे उसके बारे में बताने से चूक गए हों, तो अब उसके लिए एक दूसरा अवसर मिलने की प्रार्थना करें—और जब वह अवसर मिले, तो उसे पकड़ लें।

  भजन 30

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 84–86; 1 पतरस 2 ◊


[1] चार्ल्स वैस्ले, “डेप्थ ऑफ मर्सी” (1740).

11 अगस्त : किनारा सामने है

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11 अगस्त : किनारा सामने है
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“तब योना ने उसके पेट में से अपने परमेश्‍वर यहोवा से प्रार्थना करके कहा, ‘मैं ने संकट में पड़े हुए यहोवा की दोहाई दी, और उस ने मेरी सुन ली है; अधोलोक के उदर में से मैं चिल्ला उठा, और तू ने मेरी सुन ली।’” योना 2:1-2

यह वचन संघर्षशील विश्वासियों के लिए हैं, प्रभु से विमुख हो चुके विश्वासियों के लिए है और हम में से उन लोगों के लिए है जो अपनी अवज्ञा के कारण गहरे संकट में हैं।

योना की पुस्तक का जोर योना की परेशानियों पर नहीं बल्कि परमेश्वर के प्रावधान पर है। परमेश्वर ने योना को उसके पाप और अवज्ञा से बचाने के लिए असाधारण उपायों का उपयोग किया। भविष्यद्वक्ता यह स्वीकार करता है कि यह परमेश्वर ही था जिसने उसे “गहरे सागर में समुद्र की थाह तक डाल दिया” (योना 2:3)। हाँ, यह नाविक थे जिन्होंने योना को समुद्र में फेंका था, लेकिन योना ने पहचाना कि जो कुछ भी हुआ था वह परमेश्वर के सर्वशक्तिमान हाथ के नीचे हुआ था और नाविक तो केवल परमेश्वर के कार्य का माध्यम बने थे। परमेश्वर ने उसका पीछा किया और उसे उफनते समुद्र में फेंक दिया ताकि वह उस स्थिति में आ सके जहाँ वह कह सके, “मैं ने संकट में पड़े हुए यहोवा की दोहाई दी, और उस ने मेरी सुन ली है।”

इसके अलावा, बड़े जल-जन्तु के पेट में भविष्यद्वक्ता ने परमेश्वर से अलग होने का दर्द महसूस किया, मानो वह कह रहा हो “मैं [उसके] सामने से निकाल दिया गया हूँ” (योना 2:4)। योना के लिए समुद्र में लगभग डूब जाने का शारीरिक आतंक और जल-जन्तु द्वारा निगले जाने का भय उतना अधिक नहीं था, जितना उसके परमेश्वर से सदा के लिए अलग हो जाने का था। योना परमेश्वर के प्रेम को जानता था; वह जानता था कि परमेश्वर की उपस्थिति में होना क्या होता है। वह यह समझ गया था कि परमेश्वर से अलग होने का क्या अर्थ होता है, हालाँकि उसने स्वयं ही परमेश्वर से अलग होने का चुनाव किया था—और यही पाप का विकृत पहलू है।

यह हमारे लिए कितना महत्त्वपूर्ण सन्देश है! जब हम परमेश्वर से दूर हो जाते हैं, तो वह हमसे मिलने के लिए आँधियों और घाटियों में आता है, जो हमारी परिस्थितियों को बदलता है ताकि वह हमारा ध्यान आकर्षित कर सके, जो हमें अकेला और अलग महसूस करने देता है, ताकि हम कह सकें, “यह वह स्थान नहीं है जहाँ मुझे होना चाहिए। यह वह नहीं है जो परमेश्वर मेरे लिए चाहता है। मैं इस परिस्थिति से बाहर नहीं निकल सकता। लेकिन वह सक्षम है।”

आज आप गहरी असफलता और पछतावे की भावना से जूझ रहे हो सकते हैं। आप भाग रहे थे। आपने परमेश्वर की स्पष्ट आवाज़ की अवज्ञा की और छिपने की कोशिश की। लेकिन आपकी कहानी वहीं खत्म नहीं होनी चाहिए। अपनी कृपा और दया में परमेश्वर तय कर चुका है कि वह आपको बचाएगा और उस कार्य को पूरा करेगा, जिसे उसने आपके जीवन में आरम्भ किया है (फिलिप्पियों 1:6)। मसीही जीवन में हमेशा पश्चाताप की आवश्यकता होती है, लेकिन कभी भी निराश होने का कोई कारण नहीं होता।

जब योना किनारे पर पहुँचा, तो यह इसलिए नहीं हुआ क्योंकि वह इसके योग्य था। यह परमेश्वर के अनुग्रह के कारण हुआ था। इसी तरह, केवल परमेश्वर ही है जो हमारे पाप और अवज्ञा में हमारे पास आता है, ताकि वह हमें शुद्ध करे, हमें बचाए और उसके उद्देश्यों के लिए हमें फिर से स्थापित करे। क्या आप आज किनारा देख पा रहे हैं?

योना 2

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 81– 83; 1 पतरस 1

10 अगस्त : समस्त सृष्टि का प्रभु

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10 अगस्त : समस्त सृष्टि का प्रभु
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“योना यहोवा के सम्मुख से तर्शीश को भाग जाने के लिए उठा, और याफा नगर को जाकर तर्शीश जानेवाला एक जहाज़ पाया; और भाड़ा देकर उस पर चढ़ गया कि उनके साथ यहोवा के सम्मुख से तर्शीश को चला जाए। तब यहोवा ने समुद्र में एक प्रचण्ड आँधी चलाई, और समुद्र में बड़ी आँधी उठी, यहाँ तक कि जहाज़ टूटने पर था।” योना 1:3-4

हम सृष्टि पर नियन्त्रण नहीं रखते। लेकिन परमेश्वर रखता है—और इसलिए वह हमारी सारी प्रशंसा और आराधना के योग्य है।

महासागरों पर—वास्तव में सम्पूर्ण सृष्टि पर—परमेश्वर का नियन्त्रण भजनकारों के कार्य में निरन्तर प्रशंसा का कारण था। जब हम भजनों को पढ़ते हैं, तो हम बार-बार पाते हैं कि सृष्टि की रचना पर, महासागरों पर, यहाँ तक कि उनके ज्वारों और लहरों के उतार-चढ़ाव पर भी परमेश्वर के नियन्त्रण रखने के परम सामर्थ्य की प्रशंसा करने में परमेश्वर के लोग आनन्दित होते हैं।

उदाहरण के लिए हम भजन 33 में देखते हैं कि “वह समुद्र का जल ढेर के समान इकट्ठा करता; वह गहिरे सागर को अपने भण्डार में रखता है” (पद 7)। यह एक नाटकीय चित्र है—और यह परमेश्वर की उत्कृष्टता और महिमा का हिस्सा है। जैसे हम एक जग नींबू पानी को हिला कर उसे एक बर्तन में से दूसरे बर्तन में डाल सकते हैं, वैसे ही सर्वशक्तिमान परमेश्वर पृथ्वी के सभी महासागरों को इकट्ठा करके मटकों में रख सकता है। इसलिए यह कितना सही और उचित है कि हम अपने सृष्टिकर्ता परमेश्वर की आराधना श्रद्धा और आदर के साथ करें!

इसी तरह, सृष्टि पर परमेश्वर की सत्ता हमें उसके प्रावधान पर विश्वास करने के लिए प्रोत्साहित करती है। योना की कहानी में आगे हम पाते हैं कि प्रभु ने “रेंड़ का पेड़ उगाकर बढ़ाया,” परमेश्‍वर ने “एक कीड़े को भेजा,” और “परमेश्‍वर ने पुरवाई बहाकर लू चलाई” ताकि वह योना और नीनवे के लोगों के लिए अपनी योजनाओं को पूरा कर सके (योना 4:6-8)। यह उस समय के और आज के परमेश्वर-विहीन लोगों की मानसिकता से बहुत अलग है।

योना के जहाज के चालक समुद्र को एक अप्रत्याशित और निरंकुश प्राचीन शक्ति मानते थे, जिसकी दया पर वे सभी बन्दी थे। उसी तरह, आज हम इस विचार का सामना करते हैं कि “प्रकृति माँ” एक ऐसी निर्दयी ताकत है, जिसे वश में नहीं किया जा सकता। लेकिन सच्चाई यह है कि सभी चीजें, सम्पूर्ण सृष्टि, परमेश्वर के सेवक हैं (भजन 119:91)। हम भाग्य के सागर में बहने या अंधी, निराकार शक्तियों के प्रहार सहने के लिए छोड़ नहीं दिए गए हैं। नहीं, परमेश्वर “तारों को गिनता, और उनमें से एक-एक का नाम रखता है” (भजन 147:4)।

केवल सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता प्रभु ही सागर को ढेरों में इकट्ठा कर सकता है और सम्पूर्ण सृष्टि को अपने निर्देशों का पालन करने का आदेश दे सकता है। केवल यही नहीं, वह अपने आदेशों को अपने लोगों के भले के लिए निर्देशित करता है। वह बड़ा तूफान जिसे परमेश्वर ने समुद्र पर भेजा था, जब योना का जहाज तर्शीश की ओर जा रहा था, वह उसके ऊपर शाप नहीं था, बल्कि यह उसे अपने परमेश्वर के प्रति विश्वासपूर्वक आज्ञाकारिता में वापस लौटने के लिए एक पुकार थी। जो कुछ परमेश्वर ने योना पर भेजा, उससे परमेश्वर ने उसे बचाया भी। कितना अद्‌भुत है: परमेश्वर ने एक बड़ी आँधी की शक्ति को केवल एक भटके हुए बच्चे को घर वापस लाने के लिए बुलाया।

सचमुच, सभी चीजें परमेश्वर की महिमा और उसके लोगों के भले के लिए व्यवस्थित हैं—जिसमें आप भी शामिल हैं। यही वह परमेश्वर है जिसकी हम वन्दना करते हैं, यही वह परमेश्वर है जिस पर हम विश्वास करते हैं, और यही वह परमेश्वर है जिसे हम अपने जीवन अर्पित करते हैं। आज इस सत्य को अपनी जुबान पर रखें: “यहोवा महान और अति स्तुति के योग्य है, और उसकी बड़ाई अगम है” (भजन 145:3)।

भजन 145

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 79– 80; प्रेरितों 28 ◊

9 अगस्त : अवज्ञा और हिचकिचाहट

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9 अगस्त : अवज्ञा और हिचकिचाहट
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“योना यहोवा के सम्मुख से तर्शीश को भाग जाने के लिए उठा, और याफा नगर को जाकर तर्शीश जाने वाला एक जहाज़ पाया; और भाड़ा देकर उस पर चढ़ गया कि उनके साथ यहोवा के सम्मुख से तर्शीश को चला जाए।” योना 1:3

अवज्ञा का मार्ग हमेशा एक नीचे की ओर जाने वाला मार्ग होता है—जब तक कि परमेश्वर हस्तक्षेप नहीं करता।

योना ने जब नीनवेवासियों को पश्चाताप का सन्देश देने के लिए प्रभु के आदेश से भागने की जल्दी की, तो वह नीचे की ओर “याफा नगर को” गया, जहाज़ के “निचले भाग में” उतर गया और फिर नीचे “पहाड़ों की जड़ तक पहुँच गया” (योना 2:6), जहाँ वह जल-जन्तु के पेट में बन्द हो गया था।

जब परमेश्वर से भागने की कोशिश में योना जहाज के निचले भाग में गहरी नींद में सो रहा था, “तब यहोवा ने समुद्र में एक प्रचण्ड आँधी चलाई . . . यहाँ तक कि जहाज़ टूटने पर था” (1:4)। फिर भी, प्रचण्ड तूफान और नाविकों की उत्तेजित गतिविधियों के बीच—जो चिल्ला रहे थे, रो रहे थे, प्रार्थना कर रहे थे, और अपना सामान समुद्र में फेंक रहे थे—योना सो रहा था।

योना इतना थका हुआ कैसे हो सकता था? निश्चित रूप से, वह परमेश्वर से भागने के अपने निर्णय के कारण शारीरिक और मानसिक रूप से थक गया होगा। जबकि अवज्ञा उस पल में रोमांचक हो सकती है—यह एक क्षणिक उत्तेजना दे सकती है—परन्तु अन्त में यह हमेशा थकावट का कारण बनती है। यह पैने पर लात मारने जैसा होता है (प्रेरितों 26:14)। परमेश्वर के वचन के विरुद्ध हमारे विद्रोह के बाद और फिर हर किसी से छुपने की इच्छा में बिस्तर की एकान्तता में शरण लेने के बाद जो नींद आती है, उससे अधिक दुखदायी या निराशाजनक नींद शायद ही कोई और हो।

योना चाहता था कि परमेश्वर उसे अकेला छोड़ दे। परन्तु परमेश्वर बहुत दयालु था कि उसने ऐसा नहीं किया। इसलिए परमेश्वर ने एक तूफान भेजा और उस तूफान ने जहाज के कप्तान को योना को खोजने और उसे जगाने के लिए भेजा। कप्तान ने वही शब्द इस्तेमाल किया जो परमेश्वर ने पहले योना से कहा था: “उठ, अपने देवता की दोहाई दे!” (योना 1:6, विशेष रूप से बल दिया गया है; 1:2 से तुलना करें)।

यहाँ हमें एक बड़ी हिचकिचाहट का चित्र देखने को मिलता है—न केवल योना द्वारा उसे दिए गए काम को पूरा करने की हिचकिचाहट, बल्कि परमेश्वर की हिचकिचाहट भी, जो अपने सेवक को उसकी पापी हालत और दुखों में अकेला नहीं छोड़ना चाहता। वे तीन दिन, जो योना को विशाल जल-जन्तु के पेट में बिताने थे, इस सत्य का और भी प्रमाण देते हैं। यद्यपि योना की अवज्ञा के कारण दण्ड मिलना चाहिए था, परमेश्वर जल्द ही उसे समुद्र में नष्ट होने से बचाने वाला था और उसे वापिस भेजने वाला था, ताकि वह नीनवेवासियों में न्याय और दया का सन्देश प्रचार कर सके।

परमेश्वर हमारी अवज्ञा में बार-बार हमारे पास आता है और हमें हमारे पाप में धसने नहीं देता। भले ही हम अपनी अंगुलियाँ अपने कानों में डालकर यह दिखाएँ कि हम उसे नहीं सुन रहे हैं और भले ही हम पूरी तरह से उसकी आज्ञा मानने से मना कर दें, परमेश्वर अपने भटकते हुए बच्चों का पीछा करता है। वह हमें इतना प्यार करता है कि वह हमें हमारी अपनी चालों में छोड़ना नहीं चाहता। हम अपने पाप में फँसे रहकर परमेश्वर की दया से भाग नहीं सकते, क्योंकि वह हमें कभी नहीं छोड़ेगा और कभी नहीं त्यागेगा।

योना 1

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 77–78; प्रेरितों 27:27-44