26 अप्रैल : हमारे शरीरों में परमेश्वर की महिमा करना

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26 अप्रैल : हमारे शरीरों में परमेश्वर की महिमा करना
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“मैं तो यही हार्दिक लालसा और आशा रखता हूँ कि मैं किसी बात में लज्जित न होऊँ, पर जैसे मेरे प्रबल साहस के कारण मसीह की बड़ाई मेरी देह के द्वारा सदा होती रही है, वैसी ही अब भी हो, चाहे मैं जीवित रहूँ या मर जाऊँ।” फिलिप्पियों 1:20

आपका शरीर और आप इसके साथ जो करते हैं, मायने रखता है।

अपने लेखन में कई बार प्रेरित पौलुस लोगों के शरीरों के बारे में गहरी चिन्ता व्यक्त करता है। उदाहरण के लिए, वह कुरिन्थुस के विश्वासियों से पूछता है, “क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारी देह पवित्र आत्मा का मन्दिर है, जो तुममें बसा हुआ है और तुम्हें परमेश्‍वर की ओर से मिला है?” फिर वह कहता है, “तुम अपने नहीं हो, क्योंकि दाम देकर मोल लिए गए हो, इसलिए अपनी देह के द्वारा परमेश्‍वर की महिमा करो” (1 कुरिन्थियों 6:19-20)। दूसरे शब्दों में, हमारे शरीर उस परमेश्वर के हैं जिसने उन्हें बनाया है और जो उन्हें सम्भालता है। इस प्रकार की सोच पौलुस की थियोलॉजी का केन्द्र है।

पौलुस को यह जानकर बहुत खुशी होती थी कि उसके शरीर के द्वारा यीशु को सम्मान मिलेगा और उसकी महिमा होगी। यह उसका मुख्य उद्देश्य और प्रार्थना थी कि वह अपनी सेवा में साहस और विश्वास के साथ ऐसा करे। पौलुस के लिए, मसीह को ऊँचा करने का अर्थ था उसके महान नाम को ऊँचा उठाना: उसे महिमा देना। हम यह दृष्टिकोण बपतिस्मा देने वाले यूहन्ना में भी देखते हैं, जिसने यीशु के बारे में कहा, “अवश्य है कि वह बढ़े और मैं घटूँ” (यूहन्ना 3:30)। इसी तरह, आप कभी भी पौलुस को खुद पर ध्यान आकर्षित करते हुए नहीं पाएँगे। उसने खुद को केवल एक मार्गदर्शक के रूप में देखा, जो मसीह की ओर ले जाता था।

इसी कारण, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि जब पौलुस ने अपने आप को प्रेरित के रूप में प्रमाणित करना चाहा, तो उसने यह नहीं कहा, “कोई मुझे परेशान न करे,” केवल इसलिए कि वह एक महान प्रेरित था या क्योंकि वह परमेश्वर द्वारा सुसमाचार प्रचार करने के लिए उपयोग किया जाता था। नहीं—उसने कहा, “आगे को कोई मुझे दुख न दे, क्योंकि मैं यीशु के दागों को अपनी देह में लिए फिरता हूँ” (गलातियों 6:17, जोर दिया गया)। उसके शरीर के माध्यम से उसकी प्रतिबद्धता प्रकट होती थी। उसे मसीह के प्रति अपनी निष्ठा के लिए लगातार दुर्व्यवहार सहना पड़ा। अन्ततः वह अपने जीवन के अन्त में दाग, शारीरिक शोषण और विकृति के साथ मर गया—फिर भी अपनी परीक्षाओं के मध्य में वह कहता रहा, “मैं आनन्दित रहूँगा।”

परमेश्वर पौलुस के पूरे जीवन पर प्रभु था: उसके शरीर, उसके समय, उसके सम्पूर्ण अस्तित्व पर। केवल यही वह बात थी जो उसे इतनी खुशी दे सकती थी। केवल यही वह बात थी जो हमें भी इतनी खुशी दे सकती है।

सारांश यह है कि आप अपने नहीं हैं। जो कुछ भी आपके पास है, वह आपका नहीं है। चाहे परमेश्वर ने आपको अधिक दिया हो या कम, सब कुछ आपके प्रबन्ध के अधीन है। आप अपने परमेश्वर के हैं, जो आपका सृष्टिकर्ता और आपका उद्धारकर्ता है। एक दिन, वह हमें महिमापूर्ण, अमर शरीरों के साथ जीवित करेगा (1 कुरिन्थियों 15:42-44, 51-54)। इस समय, इस जीवन में वह हमें इस शरीर में उसकी सेवा करने के लिए बुलाता है। इसलिए जो कुछ भी आप अपने शरीर के साथ करते हैं, उसे परमेश्वर के सामने प्रसन्नता से चढ़ावे के रूप में अर्पित करें।

1 कुरिन्थियों 6:12-20

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