2 मई : उसकी मृत्यु का उद्देश्य हमें पवित्र करना था

Alethia4India
Alethia4India
2 मई : उसकी मृत्यु का उद्देश्य हमें पवित्र करना था
Loading
/

“क्या तुम नहीं जानते कि अन्यायी लोग परमेश्‍वर के राज्य के वारिस न होंगे? धोखा न खाओ; न वेश्यागामी, न मूर्तिपूजक, न परस्त्रीगामी, न लुच्‍चे, न पुरुषगामी, न चोर, न लोभी, न पियक्‍कड़, न गाली देनेवाले, न अन्धेर करने वाले परमेश्‍वर के राज्य के वारिस होंगे। और तुम में से कितने ऐसे ही थे, परन्तु तुम प्रभु यीशु मसीह के नाम से और हमारे परमेश्‍वर के आत्मा से धोए गए और पवित्र हुए और धर्मी ठहरे।” 1 कुरिन्थियों 6:9-11

दुष्ट शैतान इसमें कोई रुचि नहीं रखता कि वह हमें हमारे कई मसीही कार्यों को छोड़ने के लिए मजबूर करे—लेकिन वह इसमें बहुत रुचि रखता है कि हम परमेश्वर के स्वभाव और चरित्र से सम्बन्धित परम सत्यों को और उसके राज्य की नैतिकता से सम्बन्धित परम सत्यों को छोड़ दें। इसे समझते हुए, पौलुस ने कुरिन्थुस के विश्वासियों को चेतावनी दी कि वे ईश्वरहीन आचरण के खतरनाक क्षेत्र में न चले जाएँ। पौलुस कहता है, “धोखा न खाना” क्योंकि अधर्मी लोग “परमेश्‍वर के राज्य के वारिस नहीं होंगे।”

पौलुस ऐसे कई बुरे आचरणों का विवरण देता है, जो कुरिन्थुस में कई सामाजिक तौर पर स्वीकार्य माने जाते थे। यह शहर व्यापार का एक बड़ा केन्द्र था, जहाँ विभिन्न जातियों, आस्थाओं और भाषाओं के लोग बसे थे। लेकिन संस्कृति के रूप में यह शहर दिशाहीन और उग्र था। वास्तव में, यह इतना भ्रष्ट था कि “कुरिन्थुस” शब्द ही अनैतिकता का प्रतीक बन गया था। तो पौलुस ने क्या किया? वह एक योजना के साथ वहाँ गया। वह “वचन सुनाने की धुन में यहूदियों को गवाही देने लगा कि यीशु ही मसीह है” (प्रेरितों 18:5)। उसका उद्देश्य कोई कानून लागू करना नहीं था, बल्कि सत्य का प्रचार करना था।

कोई भी कानूनी व्यवस्था संस्कृति में सुधार नहीं ला सकती। इसके बजाय, परमेश्वर ने एक सन्देश दिया है जो पुरुषों और महिलाओं को स्वतन्त्र करने वाला सन्देश है और वह सन्देश केवल इतना है: “यीशु मसीह वरन् क्रूस पर चढ़ाए हुए मसीह को छोड़” और कोई है ही नहीं (1 कुरिन्थियों 2:2)। सुसमाचार ही इस संसार के लिए परमेश्वर की योजना है। वह अपने वचन की शक्ति और विश्वास से लोगों के जीवन में कार्य करता है और उन्हें पूरी तरह बदल देता है।

पौलुस ने जटिल तर्कों में विश्वास नहीं किया। उसके पास केवल एक सन्देश था, और वह बार-बार उसी को कहता रहा। वह जानता था कि केवल मसीह की क्रूस पर दी गई बलि ही पुरुषों और महिलाओं को उनके पापों से मुक्त कर सकती है, ताकि वे “नए जीवन की सी चाल” चलें (रोमियों 6:4)।

पाप में बने रहना न केवल खतरनाक है, बल्कि यह अनावश्यक भी है। आज भी सुसमाचार का सन्देश उतना ही स्पष्टता और प्रभावशाली रूप से गूंज रहा है जितना कि कुरिन्थुस की गलियों में गूंजा था। यह संसार के भ्रामक विचारों और इस धारणा को काटता है कि केवल कानून ही लोगों के हृदयों को बदल सकता है या उनमें विश्वास उत्पन्न कर सकता है। हमारे जीवन, हमारे शहरों और हमारे राष्ट्रों की सबसे बड़ी जरूरत यही है कि पापियों को उद्धार मिले। इस धोखे में मत आना कि पाप कोई मायने नहीं रखता। इस धोखे में मत आना कि हमारे समाज को परमेश्वर के राज्य के सुसमाचार से बढ़कर किसी और चीज़ की अधिक जरूरत है। हमें क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह का सन्देश स्वीकार करने और प्रचार करने की आवश्यकता है:

वह मरा कि हम क्षमा पाएँ,

वह मरा कि हम धर्मी बनें,

कि हम अन्ततः स्वर्ग जा सकें,

उसके अनमोल लहू से बचाए जा सकें[1]

प्रेरितों 18:1-11

Leave A Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *