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7 सितम्बर : परमेश्वर की प्रजा

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7 सितम्बर : परमेश्वर की प्रजा
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“यहूदी वह नहीं जो प्रगट में यहूदी है; और न वह खतना है जो प्रगट में है और देह में है। पर यहूदी वही है जो मन में है; और खतना वही है जो हृदय का और आत्मा में है, न कि लेख का।” रोमियों 2:28-29

हर राज्य के नागरिक होते हैं, और परमेश्वर का राज्य भी अलग नहीं है। फिर, परमेश्वर के राज्य में नागरिक कौन हैं? परमेश्वर की प्रजा कौन हैं?

परमेश्वर की प्रजा वे लोग हैं, जिन्होंने यीशु मसीह में अपना विश्वास रखा है। ये लोग परमेश्वर के राज्य का हिस्सा अपनी बुद्धि, शक्ति, या किसी अन्य बाहरी कारण से नहीं हैं, बल्कि केवल और केवल इसलिए हैं, क्योंकि परमेश्वर ने उनसे प्रेम किया और उन्हें अपने पुत्र में विश्वास का उपहार दिया। यीशु ने फरीसियों को डाँटे क्योंकि वे सोचते थे कि अपने वंश के कारण वे परमेश्वर के परिवार का सदस्य हैं: “यीशु ने उनसे कहा, ‘यदि तुम अब्राहम की सन्तान होते, तो अब्राहम के समान काम करते’” (यूहन्ना 8:39)। और अब्राहम ने क्या किया? उसने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास किया; उसने “परमेश्वर पर विश्वास किया और यह उसके लिए धार्मिकता गिनी गई” (गलातियों 3:6)।

तो फिर, हम परमेश्वर के परिवार के पूर्ण सदस्य हमारे द्वारा किए गए किसी काम के कारण नहीं हैं, बल्कि परमेश्वर के आत्मा के कार्य से हैं, जो हमारे हृदयों को कायल करता है, हमें विश्वास करने के लिए प्रेरित करता है, और हमें पश्चाताप की ओर ले जाता है। हमें परमेश्वर की प्रजा में शामिल होने के लिए यहूदी कानून के आनुष्ठानिक नियमों का पालन करने या अब्राहम के शारीरिक वंशज होने की आवश्यकता नहीं है। रोमियों 2:29 में, पौलुस मूल रूप से यह पूछता है, अब्राहम की सन्तान कौन हैं? इसका उत्तर है: वही जो हृदय का खतना करवाता है।

जब हम इन सत्यों पर ध्यान करते हैं, तो हम यह सवाल कर सकते हैं कि क्या पौलुस को यहूदी होने का कोई लाभ लगता था। पौलुस ने यह स्पष्ट किया कि वास्तव में इसका एक अद्‌भुत लाभ था, क्योंकि यहूदियों ने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को सबसे पहले प्राप्त किया, जिससे उन्हें मसीह में पूरे होने वाली भविष्यवाणियों को समझने का एक अद्वितीय अवसर मिला (रोमियों 3:1-2)। लेकिन इस समझ से कोई भी परमेश्वर के राज्य का नागरिक नहीं बनता। यह अवसर केवल उन लोगों के लिए खुला और आरक्षित है, जो उसके राजा के अधीन होते हैं। चाहे हम यहूदी हों या अन्यजाति—हमारी पृष्ठभूमि चाहे जो भी हो, हम चाहे जहाँ भी पैदा हुए हों, और चाहे जैसे भी पले-बढ़े हों— परमेश्वर मसीह में विश्वास करने वाले सभी लोगों को उद्धार प्रदान करता है। परमेश्वर के राज्य में हमारी नागरिकता जाति या बाहरी बातों से नहीं जुड़ी होती, बल्कि मसीह में विनम्र, बालक जैसे विश्वास से जुड़ी होती है।

संसार भर में लोग यह जानने के लिए संघर्ष करते हैं कि उनका सही स्थान कहाँ है और वे किसी कम्पनी, समाज, मित्र मण्डल, या यहाँ तक कि अपने परिवार में अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए भी संघर्ष करते हैं। परमेश्वर आपसे संघर्ष करने या प्रयास करने को नहीं कहता, बल्कि केवल आनन्द लेने को कहता है। यदि आप यीशु में विश्वास करके परमेश्वर की प्रजा के लोग हैं, तो आप उसके नाम से उद्धार पाए हैं, आप लज्जा से मुक्त हो गए हैं, और आप उसकी प्रजा हैं। यहीं पर आपको आपका सही स्थान मिलता है, यहीं पर आपको अपना घर मिलता है।

इफिसियों 2:11-22

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 1–3; यूहन्ना 2 ◊

6 सितम्बर : ईर्ष्या के परिणाम

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6 सितम्बर : ईर्ष्या के परिणाम
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“शान्त मन, तन का जीवन है, परन्तु मन के जलने से हड्डियाँ भी जल जाती हैं।” नीतिवचन 14:30

ईर्ष्या आत्मिक कैंसर के समान है, जो व्यक्ति को भीतर से नष्ट कर देती है।

ईर्ष्या के परिणाम गम्भीर होते हैं। राजा सुलैमान इस घातक रोग के बारे में हमें स्पष्ट शब्दों में सचेत करता है और इसके स्थान पर हमें स्वास्थ्य और शान्ति का जीवन अपनाने के लिए प्रेरित करता है।

ईर्ष्या हमें नुकसान पहुँचाती है। भले ही यह दूसरों को प्रत्यक्ष रूप से कोई हानि न पहुँचाए, लेकिन यह ईर्ष्या करने वाले व्यक्ति को भीतर से खोखला कर देती है। यह दूसरों के प्रति हमारे दृष्टिकोण को प्रभावित करती है। यह एक नकारात्मक तथा आलोचनात्मक दृष्टिकोण को जन्म देती है, जिससे हम अपने पड़ोसियों को अनुचित सन्देह और क्रोध की दृष्टि से देखने लगते हैं। यह हमें दूसरों की खुशी में सहभागी होने से रोकती है और हमारे सन्तोष को छीन लेती है, क्योंकि हमेशा कोई न कोई ऐसा होगा जिसके पास हमसे अधिक होगा और जिससे तुलना करके हम असन्तोष में घिर सकते हैं। ईर्ष्या हड्डियों को गला देती है।

ईर्ष्या अचानक और चुपचाप हमारे मन में घर कर सकती है। प्रेरित पतरस इसका एक उदाहरण है। क्रूस पर यीशु की मृत्यु से ठीक पहले उसने मसीह का तीन बार इनकार कर दिया और परिस्थितियों को और बिगाड़ दिया। यूहन्ना अपने सुसमाचार में बताता है कि पुनरुत्थान के बाद यीशु ने पतरस और अन्य चेलों के लिए समुद्र के किनारे नाश्ता तैयार किया और पतरस से बातचीत की। इस मुलाकात में यीशु ने पतरस के साथ अपने सम्बन्ध को पुनः स्थापित किया, उसे फिर से अपने पीछे चलने के लिए बुलाया, और उसे अपने लोगों की चरवाही करने की ज़िम्मेदारी सौंपी। यदि उससे एक दिन पहले पतरस से पूछा जाता कि उसके हृदय की सबसे बड़ी लालसा क्या है, तो वह यही होती। लेकिन जब यीशु ने कहा कि पतरस को भविष्य में उसके लिए अपना जीवन देना होगा, तो पतरस की क्या प्रतिक्रिया थी? उसने यूहन्ना की ओर देखकर पूछा, “हे प्रभु, इसका क्या हाल होगा?”

यीशु, जो ईर्ष्या के खतरों को भली-भाँति जानता था, उत्तर देता है, “यदि मैं चाहूँ कि वह मेरे आने तक ठहरा रहे, तो तुझे इससे क्या? तू मेरे पीछे हो ले!” (यूहन्ना 21:22)।

यह कितनी सरलता से हो जाता है कि जब हम आत्मिक उन्नति की ओर बढ़ रहे होते हैं, तब भी ईर्ष्या हमें जकड़ लेती है और हमें यह भुला देती है कि यीशु ने हमारे लिए क्या किया है और हमें क्या दिया है! तो फिर, इस आत्मिक बीमारी का कोई इलाज कैसे सम्भव है?

जो कार्य हम सबसे आखिर में करना चाहते हैं, वही हमें सबसे पहले करने की आवश्यकता है: ईर्ष्या को पाप के रूप में पहचानना और इसे परमेश्वर की उपस्थिति में अंगीकार करके प्रकाश में लाना। इसके बाद, हम प्रार्थना के द्वारा ईर्ष्या को हर क्षण में त्यागने का संकल्प लें, और पवित्र आत्मा से सहायता माँगें कि वह हमें स्मरण कराए कि मसीह में हमें कितना कुछ प्राप्त हुआ है। जब तक हमारे हृदय ईर्ष्या से नहीं, बल्कि आनन्द से भर न जाएँ, तब तक हमें सतत प्रयास करते रहना है। जो लोग अपनी आशिषों को गिनते हैं, वे दूसरों को मिली आशिषों के लिए परमेश्वर की स्तुति करने में अधिक सक्षम होते हैं। और एक शान्त चित्त जीवन प्रदान करता है।

अपनी ईर्ष्या को अनियन्त्रित रूप से आपको खोखला न करने दें। यह किस रूप में आपको जकड़े हुए है? इसे स्वीकार करें, इसके लिए प्रार्थना करें, और सुसमाचार के सत्य से इसका विरोध करें।

यूहन्ना 21:15-23

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 148–150; यूहन्ना 1:29-51

5 सितम्बर : पतियों के लिए एक सन्देश

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5 सितम्बर : पतियों के लिए एक सन्देश
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“हे पतियो, अपनी-अपनी पत्नी से प्रेम रखो जैसा मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिए दे दिया कि उसको वचन के द्वारा जल के स्नान से शुद्ध करके पवित्र बनाए।” इफिसियों 5:25-26

परमेश्वर के अनुग्रह से प्रत्येक मसीही विवाह केवल विवाह तक सीमित नहीं रहता।

मनुष्य के विवाह का उद्देश्य स्वयं विवाह से आगे संकेत करना है, उस परम विवाह की ओर जो स्वर्ग में ठहराया गया है—अर्थात जिसमें दूल्हा मसीह है और कलीसिया उसकी दुल्हन है। दूसरे शब्दों में, विवाह परमेश्वर की परम योजना को दर्शाने के लिए है, जिसके अन्तर्गत “जो कुछ स्वर्ग में है और जो कुछ पृथ्वी पर है, सब कुछ वह मसीह में एकत्र” करेगा (इफिसियों 1:10)। यही कारण है कि पौलुस पतियों के लिए विशेष निर्देश देता है, ताकि उनके विवाह उस मिलन को प्रकट कर सकें जिसे परमेश्वर ने ठहराया है।

विवाह में पति का मुख्य उद्देश्य केवल अपनी पत्नी की शारीरिक और भावनात्मक देखभाल करना नहीं है। हाँ, यह भी आवश्यक है, लेकिन उसका परम उद्देश्य यह होना चाहिए कि उसकी पत्नी यीशु से मिलने के लिए तैयार हो।

इसीलिए पौलुस यहाँ जिस “प्रेम” शब्द का उपयोग करता है, वह महत्त्वपूर्ण है। यूनानी भाषा में “अगापे” प्रेम आत्म-त्याग और आत्म-न्यूनता को व्यक्त करता है। यह प्रेम पाने के बारे में नहीं, बल्कि देने के बारे में है। यह इस बात पर केन्द्रित नहीं कि हमें क्या मिलना चाहिए, बल्कि इस पर कि हमें क्या देना है। यह स्वार्थी हितों की खोज नहीं, बल्कि अपनी पत्नी के वास्तविक हित के लिए स्वयं को समर्पित करने का प्रेम है, जिससे वह “पवित्र और निर्दोष हो” (इफिसियों 5:27)। यही कारण था कि मसीह ने अपने जीवन को अपनी कलीसिया के लिए दे दिया, और पति के रूप में यही प्रेम हमें अपनी पत्नियों के लिए रखना चाहिए।

लेकिन एक पति अपने दैनिक जीवन में इस प्रेम को कैसे व्यक्त कर सकता है? इसका एक व्यावहारिक तरीका यह है कि पति शारीरिक, भावनात्मक और आत्मिक रूप से अपनी पत्नी की उपेक्षा न करें—और यदि आपका पेशा, या सामाजिक या कलीसियाई जिम्मेदारियाँ किसी भी प्रकार की बाधा बनती हैं, तो आपको अपनी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करना होगा। आपको अत्याचार का त्याग भी करना होगा, जिसमें न केवल गम्भीर पाप शामिल हैं, बल्कि इसमें अपनी पत्नी को नीचा दिखाना, उस पर हुक्म जमाना, उसे नज़रअन्दाज़ करना, या ऐसा व्यवहार करना जैसे वह आपसे विवाह करके बहुत सौभाग्यशाली है—ये सब भी शामिल हैं। और अन्त में, आपको यह भी सुनिश्चित करना होगा कि आप अपनी शादी को कभी भी हल्के में न लें, जो कि समय के साथ होना सम्भव हो सकता है।

फिर भी, ये व्यावहारिक सुझाव चाहे जितने भी सहायक हों, असली मापदण्ड और प्रेरणा का स्रोत क्रूस पर मसीह का अपनी कलीसिया के प्रति प्रेम है। यदि हम स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते कि यीशु ने अपनी कलीसिया से कैसा प्रेम किया है, तो हमारी अच्छी इच्छाएँ भी असफल हो जाएँगी, और हमारी कमियाँ हमें तोड़ देंगी। इसलिए हमें मसीह की ओर देखना चाहिए, जिसे स्वयं किसी व्यक्ति या वस्तु की ज़रूरत नहीं थी, तौभी उसने अपने आपको दे दिया ताकि हम—जो ज़रूरतमन्द हैं, विद्रोही हैं, और खाली हैं—उसकी बाँहों में समा सकें, उसके हृदय में स्वागत पा सकें, उसके परिवार में शामिल हो सकें, और उसकी दुल्हन का हिस्सा माने जा सकें।

क्या आप यह सोचकर चकित होते हैं, “उसने मुझसे इतना प्रेम क्यों किया?” यदि हाँ, तो आप समझ सकते हैं कि पतियों के लिए यह आदेश कि “अपनी-अपनी पत्नी से प्रेम रखो जैसा मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिए दे दिया,” कितना ऊँचा है। यदि आप एक पति हैं, या भविष्य में बनना चाहते हैं, तो इसे प्रार्थना से आरम्भ करें—प्रार्थना करें कि पवित्र आत्मा आपको बाइबल आधारित सोचने, आज्ञाकारिता से जीने, और वास्तव में निःस्वार्थ प्रेम करने में सक्षम बनाए। और यदि आप एक पत्नी हैं, या भविष्य में बनने की आशा रखती हैं, तो आप यह प्रार्थना अपने पति के लिए भी करें, जिससे आपकी और उसकी प्रसन्नता सुनिश्चित हो, और सबसे बढ़कर, परमेश्वर को महिमा मिले।

इफिसियों 5:22-32

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 146–147; यूहन्ना 1:1-28 ◊

4 सितम्बर : विवाह के लिए परमेश्वर की योजना

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4 सितम्बर : विवाह के लिए परमेश्वर की योजना
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“इस कारण पुरुष अपने माता–पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा, और वे एक ही तन बने रहेंगे। आदम और उसकी पत्नी दोनों नंगे थे, पर लजाते न थे।” उत्पत्ति 2:24-25

विवाह परमेश्वर द्वारा दिया गया एक उपहार है, जिसे हमने अपने पाप के कारण मलिन कर दिया है। ये बाइबल-पद एक पूर्ण विश्वास से भरे, पूर्ण रूप से निर्बोध, और प्रेम में पूर्णतः एकता से जुड़े हुए सम्बन्ध को दर्शाते हैं। दुर्भाग्यवश, पतित संसार में रहने का एक स्पष्ट प्रभाव यह है कि फिल्मों के अतिरिक्त वास्तविक जीवन में कोई भी विवाह केवल और हमेशा ऐसा नहीं होता। मानव पाप का सबसे बड़ा दुख यह है कि हमारी प्रवृत्ति ही यह है कि हम परमेश्वर द्वारा बनाई गई अच्छी चीज़ों को भ्रष्ट कर दें, जिससे विवाह की सुन्दरता और आनन्द, जैसा कि परमेश्वर ने उसे रचा था, नष्ट हो जाता है। लेकिन एक आशा है! विश्वासियों के लिए, परमेश्वर का आत्मा हमें विवाह को उसकी मूल योजना के अनुसार समझने में सहायता करता है।

सबसे पहले, हमें यह स्वीकार करना होगा कि मसीह के बिना, हम सभी परमेश्वर की योजना के विरुद्ध विद्रोह में जी रहे हैं। समस्या केवल यह नहीं कि हम विवाह के स्वरूप को लेकर भ्रमित हैं, बल्कि यह भी है कि हमारी पाप से भरी इच्छाएँ विवाह की हमारी थोड़ी सी समझ को भी पूरी तरह अस्वीकार कर देती हैं। आज के संसार में विवाह को अक्सर एक बन्धन, एक सीमा, या एक पुरानी परम्परा के रूप में देखा जाता है, जो अब किसी काम की नहीं। यदि हम विवाह को इसी दृष्टि से देखते हैं, तो इसका कारण यह है कि हमारी प्रवृत्ति यही कहने की है, “मुझे परमेश्वर की योजना पसन्द नहीं। मैं इसे अपनी तरह से करूँगा।”

लेकिन जब हम मसीह में होते हैं, तब परमेश्वर हमें विवाह को उसकी योजना के अनुसार देखने की बुद्धि और सामर्थ्य प्रदान करता है। चाहे कोई भी सरकार कुछ भी तय करे, पवित्रशास्त्र पूरी तरह स्पष्ट है कि विवाह केवल एक पुरुष और एक स्त्री के बीच ही हो सकता है और न तो एक पुरुष एक से अधिक पत्नी रख सकता है और न ही एक स्त्री एक से अधिक पति रख सकती है। यही विवाह का मूल स्वरूप है, क्योंकि यही वह योजना है जिसे परमेश्वर ने सृष्टि के आरम्भ से निर्धारित किया था (उत्पत्ति 2)। यीशु ने भी उत्पत्ति 2 में विवाह के वर्णन को प्रमाणित किया और कहा कि परमेश्वर की योजना आरम्भ से लेकर अभी तक कभी नहीं बदली (मत्ती 19:4-6)।

हमें बाइबल को आधुनिक समाज के अनुसार बदलने या उसमें संशोधन करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। यद्यपि यह पतित संसार बाइबल-आधारित विवाह के स्वरूप को अस्वीकार कर सकता है, परन्तु यदि हम विश्वास करते हैं कि बाइबल परमेश्वर का वचन है, तो हम उसकी शिक्षाओं का पालन करेंगे—अपने स्वयं के जीवन में, और जब हम दूसरों के विवाह के बारे में बात करते हैं और उनके लिए प्रार्थना करते हैं।

विश्वासियों के रूप में, हमें यह पहचानना चाहिए कि हर संस्कृति और हर युग में विवाह के प्रति परमेश्वर का उद्देश्य यह है कि यह मसीह के प्रेम और उसके लोगों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को प्रतिबिम्बित करे (इफिसियों 5:22-25)। और हमें यह भी याद रखना चाहिए कि जो कुछ पाप के कारण नष्ट और विकृत हो गया है, उसे प्रभु यीशु पुनर्स्थापित करने और सुधारने आया था।

केवल मसीह में और मसीह के द्वारा ही हम विवाह को परमेश्वर की योजना और स्वरूप के अनुसार देख सकते हैं। जहाँ संसार कहता है कि हम अपनी मर्जी से जीएँगे, वहीं परमेश्वर हमें प्रेमपूर्वक आमन्त्रित करता है कि हम अपने हृदय को उसकी योजना के अधीन करें। कुछ लोगों के लिए इस क्षेत्र में परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना एक बड़े व्यक्तिगत बलिदान की मांग कर सकता है। और हम सब के लिए, 21वीं सदी में, संसार के मार्ग का विरोध करने और परमेश्वर के मार्ग पर दृढ़ता से चलने के लिए साहस की आवश्यकता होगी। आपकी विशेष परिस्थिति और सन्दर्भ में, परमेश्वर द्वारा विवाह जैसे महान उपहार के लिए बनाई गई उसकी योजना को प्रतिबिम्बित करने वाले ढंग से सोचना, बोलना और कार्य करना आपके लिए क्या मायने रखेगा?

उत्पत्ति 2

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 143–145; 2 कुरिन्थियों 13

3 सितम्बर : पत्नियों के लिए एक सन्देश

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3 सितम्बर : पत्नियों के लिए एक सन्देश
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“हे पत्नियो, अपने-अपने पति के ऐसे अधीन रहो जैसे प्रभु के।” इफिसियों 5:22

“अधीनता” शब्द अक्सर तरह-तरह की नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करता है। इसका एक कारण यह है, जैसा कि जॉन स्टॉट ने 40 साल पहले लिखा था, “आज के युग में अधिकार की अधीनता में आने का विचार पुराना हो चुका है। यह वर्तमान समय की स्वच्छन्दता और स्वतन्त्रता की मानसिकता से पूरी तरह मेल नहीं खाता।”[1] बीते दशकों में अधीनता की नकारात्मक छवि और भी गहरी हो गई है, जिसे विशेष रूप से विवाह के सन्दर्भ में देखा जा सकता है।

फिर भी यह तथ्य बना हुआ है कि यदि इसे सही रूप में समझा और लागू किया जाए, तो सम्बन्धों के केन्द्र में अधीनता ही होती है, जैसा कि परमेश्वर ने उन्हें स्थापित किया है। बच्चे अपने माता-पिता के अधीन होते हैं (इफिसियों 6:1), कलीसिया के सदस्य अपने अगुवों के अधीन होते हैं (इब्रानियों 13:17), और इसी प्रकार पत्नियाँ अपने पतियों के वैसे ही अधीन होती हैं, “जैसे प्रभु के” (इफिसियों 5:22)। हमारे जीवन में हमें जिन भूमिकाओं के लिए बुलाया गया है, उनके अनुसार दूसरों की अधीनता में आना हमारे सम्बन्धों का एक स्वाभाविक भाग है। इस दृष्टि से, एक पत्नी का अपने पति की अधीनता में आना विवाह के लिए परमेश्वर की दिव्य व्यवस्था को प्रतिबिम्बित करता है। लेकिन हमें इस शिक्षा को कैसे समझना चाहिए?

पहली बात, पत्नी को अपने पति की अधीनता में होने की आज्ञा का अर्थ यह नहीं कि वह अपने पति से कम मूल्यवान या हीन है। बाइबल स्पष्ट रूप से सिखाती है कि पुरुष और स्त्री दोनों समान सम्मान के योग्य हैं, क्योंकि दोनों ही परमेश्वर के स्वरूप में सृजे गए हैं (उत्पत्ति 1:27)। विश्वासियों के रूप में, हम छुटकारे में भी समान हैं—और यह समानता इस बात में प्रकट होती है कि हम परमेश्वर के अनुग्रह के संयुक्त उत्तराधिकारी हैं (1 पतरस 3:7)। परमेश्वर के सामने पुरुषों और स्त्रियों की स्थिति पूरी तरह से समान है।  भूमिका में अन्तर का अर्थ मूल्य में अन्तर नहीं होता।

दूसरी बात, पत्नियों को अपने-अपने पति के अधीन होने के लिए कहा गया है, न कि सभी पुरुषों के अधीन। पौलुस समाज में महिलाओं की स्थिति को लेकर कोई सामान्य आदेश नहीं दे रहा है, बल्कि वह परिवार में पत्नी की भूमिका के बारे में एक विशिष्ट निर्देश दे रहा है। इस सन्दर्भ में, पत्नी का प्रभु की अधीनता में आना उसके अपने पति की अधीनता में आने के द्वारा प्रकट होता है।

तीसरी बात, यह अधीनता अंधी और बिना शर्त आज्ञाकारिता नहीं है। पति अपनी पत्नियों को बलपूर्वक अधीनता के लिए बाध्य नहीं कर सकते, और न ही वे उनसे कोई भी ऐसी माँग कर सकते हैं जो प्रभु की इच्छा के विरुद्ध हो। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि पत्नी को अपने पति के हर आदेश को बिना किसी प्रश्न के मानना होगा। इसके विपरीत, पति को “अपनी पत्नी से अपने समान प्रेम” रखना है, उसके लिए अपना जीवन देना है और उसे पवित्रता में अगुवाई करनी है (इफिसियों 5:33)। यदि आप पति हैं, तो आपके लिए यह समझना आवश्यक है कि यदि आप अपनी पत्नी को मसीह की आज्ञा मानने से रोकने या उससे दूर ले जाने का प्रयास करते हैं, तो उसे बाइबल के अनुसार आपका अनुसरण करने की कोई बाध्यता नहीं है।

यदि आप पत्नी हैं, तो बाइबल आपको अंधी और दासत्व जैसी आज्ञाकारिता के लिए नहीं बुलाती। बल्कि, आपकी अधीनता एक आनन्दमयी निष्ठा और अपने पति के नेतृत्व का अनुसरण करने की प्रतिबद्धता होनी चाहिए—एक पारस्परिक सहभागिता का हिस्सा, जो हर बात में परमेश्वर की महिमा को खोजती है। सम्पूर्ण हृदय से, बिना किसी अनिच्छा के की गई यह अधीनता केवल परमेश्वर की शक्ति से सम्भव है, ताकि आप अपने पति से “अपने जीवन के सारे दिनों में बुरा नहीं, वरन् भला ही व्यवहार” करें (नीतिवचन 31:12)।

बाइबल पर आधारित यह अधीनता निश्चित रूप से आज के संसार में लोकप्रिय नहीं है। यह अक्सर आसान भी नहीं होती। लेकिन परमेश्वर और उसके लोगों की दृष्टि में यह अत्यन्त सुन्दर है।

  नीतिवचन 31:10-31

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 140–142; 2 कुरिन्थियों 12 ◊


[1] द मैसेज ऑफ इफिशियंस: द बाइबल स्पीक्स टूडे (आई.वी.पी. अकेडेमिक, 1979), पृ. 215.

2 सितम्बर : मसीह के प्रति श्रद्धा

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2 सितम्बर : मसीह के प्रति श्रद्धा
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“. . . मसीह के भय से एक दूसरे के अधीन रहो।” इफिसियों 5:20-21

लोग कई कारणों से एक-दूसरे के अधीन होते हैं—राजनीति, सामाजिक संरचनाओं, या यहाँ तक कि व्यवहारिकता के आधार पर। कभी-कभी दूसरों के अधीन होना बहुत आसान (और निश्चित रूप से सुखद) होता है, बजाय इसके कि असभ्य या टकरावपूर्ण प्रतीत होने का जोखिम उठाया जाए।

तौभी ये कारण मसीही अधीनता के प्रेरक कारक नहीं हैं। इसके बजाय, हमारी परस्पर अधीनता की विशिष्ट विशेषता यह होनी चाहिए कि इसे “मसीह के प्रति श्रद्धा” के कारण किया जाए। यीशु के सामने घुटने टेकने से हमें आत्म-केन्द्रित होने से बचने में मदद मिलती है। मसीह के प्रति श्रद्धा न केवल हमें स्वयं से दूर खींचती है, बल्कि यह हमें यीशु की ओर आकर्षित भी करती है। उसी में हम अधीनता के आह्वान को समझना सीखते हैं, क्योंकि यीशु ने स्वयं सिखाया, “जो तुम में प्रधान होना चाहे, वह तुम्हारा दास बने . . . जैसे कि मनुष्य का पुत्र; वह इसलिए नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए, परन्तु इसलिए आया कि आप सेवा टहल करे, और बहुतों की छुड़ौती के लिए अपने प्राण दे” (मत्ती 20:26, 28)। उसने न केवल ये बातें कहीं, बल्कि उन्हें अपने जीवन में पूरा भी किया।

उदाहरण के लिए, यूहन्ना 13 में यीशु द्वारा चेलों के पाँव धोने की घटना पर विचार करें। यूहन्ना लिखता है: “यीशु ने, यह जानकर कि पिता ने सब कुछ मेरे हाथ में कर दिया है और मैं परमेश्‍वर के पास से आया हूँ और परमेश्‍वर के पास जाता हूँ, भोजन पर से उठकर अपने ऊपरी कपड़े उतार दिए, और अँगोछा लेकर अपनी कमर बाँधी। तब बरतन में पानी भरकर चेलों के पाँव धोने और जिस अँगोछे से उसकी कमर बँधी थी उसी से पोंछने लगा” (यूहन्ना 13:3-5)।

यहाँ क्या हो रहा था? यही कि परमेश्वर पुत्र परमेश्वर पिता के अधीन हो रहा था। जो परमेश्वर से आया था और स्वयं परमेश्वर था, उसने स्वयं को विनम्र बनाया और “दास का स्वरूप धारण किया” (फिलिप्पियों 2:7)।

यीशु अपनी इच्छा पूरी करने नहीं, बल्कि अपने पिता की इच्छा पूरी करने आया था (यूहन्ना 6:38)। परिणामस्वरूप, उसने कठिनाइयाँ स्वीकार कीं। उसे अलग-थलग किया गया और दुर्व्यवहार सहना पड़ा। उसने द्वेष, गलतफहमियों और मृत्यु तक को झेला। यीशु तोड़ा गया ताकि हमारे टूटे हुए जीवन को पुनः स्थापित और परिवर्तित किया जा सके। वह अपने पिता की इच्छा के अधीन होकर क्रूस पर मरने के लिए आया था, ताकि वह उन सभी के लिए छुटकारे का प्रबन्ध करे, जो विनम्र होकर झुकते हैं और स्वीकार करते हैं, “यही वह उद्धारकर्ता है, जिसकी मुझे आवश्यकता है।”

जब हम मसीह को वैसे देखते हैं जैसा वह वास्तव में है, तो हम उसे आदर और श्रद्धा देने के लिए बाध्य हो जाते हैं। त्रिएक परमेश्वर के दूसरे व्यक्ति के अतिरिक्त और कौन है जिसे हम अधिक सम्मान और प्रेम दे सकते हैं, जिसने अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए और अपने लोगों की भलाई के लिए स्वयं को मृत्यु तक अधीन कर दिया? जब हम मसीह की श्रद्धा करते हैं, तो हम उसी मनोभाव को अपनाने के लिए तैयार होते हैं जो मसीह का था—एक ऐसा मनोभाव जो प्रभुता प्राप्त करने की लालसा नहीं करता, अधिकार के लिए संघर्ष नहीं करता, या अपने अधिकारों पर अड़ा नहीं रहता, बल्कि ऐसा मनोभाव जो परमेश्वर की आज्ञा का पालन करता है और अपने भाइयों-बहनों के हितों को अपनी इच्छाओं से ऊपर रखता है।

कई कारण हो सकते हैं जिनके कारण हम किसी के अधीन होने या न होने का चुनाव करते हैं। लेकिन आपके बारे में यह बात सत्य हो: कि आप मसीह की श्रद्धा के कारण अपनी कलीसिया में दूसरों के अधीन हों—जो अपने पिता के अधीन हुआ और ऐसा करते हुए आपका उद्धारकर्ता बन गया।

फिलिप्पियों 2:17-30

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 137–139; 2 कुरिन्थियों 11:16-33

1 सितम्बर : उदारता से भरपूर

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1 सितम्बर : उदारता से भरपूर
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“फिर मूसा ने इस्राएलियों की सारी मण्डली से कहा, ‘जिस बात की आज्ञा यहोवा ने दी है वह यह है। तुम्हारे पास से यहोवा के लिए भेंट ली जाए, अर्थात् जितने अपनी इच्छा से देना चाहें वे यहोवा की भेंट करके ये वस्तुएँ ले आएँ।’” निर्गमन 35:4-5

परमेश्वर के लोग उसके अनुग्रह के प्रत्युत्तर में आभार से भरकर दान देते हैं।

या कम से कम, हमें ऐसा अवश्य करना चाहिए। लेकिन अक्सर हमारे दान देने के कारण बहुत अलग होते हैं। कई लोग दान देने को एक ऐसा कार्य मानते हैं, जिसे करना उनके लिए अनिवार्य है या कर्तव्य है। ऐसा वे शायद उनकी सामाजिक स्थिति या दूसरों की धारणा के कारण करते हैं। कुछ लोग अपराध-बोध की भावना से दान देते हैं और अपने बुरे कर्मों का प्रायश्चित करने का प्रयास करते हैं। अन्य लोग भय से दान देते हैं, यह सोचकर कि “मेरे लिए दान देना ही अच्छा है, नहीं तो परमेश्वर मुझे आशीर्वाद नहीं देगा।”

लेकिन बाइबल में दिया गया दान देने का सिद्धान्त इससे बहुत अलग है।

जब इस्राएली मरुभूमि में परमेश्वर के लिए पवित्र निवास स्थान स्वरूप तम्बू बनाने की तैयारी कर रहे थे, तो मूसा ने इस कार्य के लिए सामग्री का संग्रह आरम्भ किया। उसकी अपील जबरदस्ती या छलपूर्वक नहीं थी; उसने बस लोगों से कहा कि परमेश्वर उन सभी से प्राप्त करने को तैयार हैं जो स्वेच्छा से देना चाहते हैं, और हर उदार व्यक्ति ने भेंट चढ़ाई। उन्होंने न केवल अपनी सम्पत्ति में से दिया, बल्कि अपने कौशल और योग्यताओं के आधार पर भी दिया, जो परमेश्वर ने उन्हें दिए थे—चाहे वह निर्माण कार्य हो, कपड़ा बुनाई हो, कारीगरी हो या कला हो।

बहुतों ने दिया, और उन्होंने अत्यधिक दिया। परिणामस्वरूप, मूसा को दूसरा निर्देश देना पड़ा और पूरी छावनी में सन्देश भेजना पड़ा: “क्या पुरुष, क्या स्त्री, कोई पवित्रस्थान के लिए और भेंट न लाए” (निर्गमन 36:6)। उन्हें यह एहसास था कि परमेश्वर ने ही उन्हें सब कुछ दिया था। परमेश्वर की भलाई की विशालता से प्रेरित होकर वे उदारता से भर उठे—यहाँ तक कि मूसा को उन्हें रोकने के लिए कहना पड़ा!

परमेश्वर को किसी भी चीज़ की आवश्यकता नहीं है, फिर भी वह उन लोगों से प्राप्त करने के लिए तैयार रहता है, जो उसके अनुग्रह से उसके अनेक आशीर्वादों के भागीदार हैं। परमेश्वर अपने अनुग्रह को प्रतिशत में नहीं देता; वह उसे प्रचुर मात्रा में उण्डेलता है—और अपने हृदय की इसी उदारता से उसने यीशु के माध्यम से अपने लोगों को एक के बाद एक आशीर्वाद दिया है। जब हम, जो उसके अनुग्रह के प्राप्तकर्ता हैं, अपने समय, धन, प्रतिभा या किसी भी अन्य चीज़ को प्रचुरता और कृतज्ञता से देते हैं, तो परमेश्वर की महिमा होती है।

परमेश्वर हमेशा उदार हृदयों की इच्छा रखता है। उसके पास अपने पुत्र के कार्य के माध्यम से लोगों को बचाने की योजना है, और वह ऐसे अनुयायियों की लालसा रखता है जो दान देने के द्वारा सुसमाचार के कार्य में शामिल होने के लिए तैयार हों। यह केवल अनुग्रह ही है जो किसी व्यक्ति को बलिदानी रूप से और प्रसन्नतापूर्वक देने के लिए प्रेरित करता है। यदि आपका देना—चाहे वह आपका समय हो, आपकी प्रतिभा हो या आपका धन—सीमित या अनिच्छा से हो रहा है, तो इस बात पर मनन करें कि परमेश्वर ने आपको कितना अधिक दिया है, विशेष रूप से प्रभु यीशु में। उसके अनुग्रह से प्रेरित हों, और आप कृतज्ञता से भर जाएँगे, जो उदारता में परिवर्तित होगी, तथा परमेश्वर की महिमा और स्तुति लाएगी।

यूहन्ना 12:1-8

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 135–136; 2 कुरिन्थियों 11:1-15 ◊

31 अगस्त : हम धर्मी कैसे ठहराए जाते हैं?

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31 अगस्त : हम धर्मी कैसे ठहराए जाते हैं?
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“परन्तु जो जो बातें मेरे लाभ की थीं, उन्हीं को मैं ने मसीह के कारण हानि समझ लिया है . . . जिसके कारण मैं ने सब वस्तुओं की हानि उठाई, और उन्हें कूड़ा समझता हूँ, जिससे मैं मसीह को प्राप्त करूँ और उसमें पाया जाऊँ।” फिलिप्पियों 3:7-9

हमारे जीवन में यह प्रश्न प्रायः आम होता है कि हमें प्रवेश या स्वीकृति प्राप्त करने के लिए क्या करना होगा। “उस स्कूल में प्रवेश पाने के लिए मुझे क्या करना होगा? उस सामाजिक मण्डली का हिस्सा बनने के लिए मुझे क्या करना होगा? उच्च कार्यकारी स्थिति प्राप्त करने के लिए मुझे क्या करना होगा?” स्वाभाविक रूप से मनुष्य आत्मिक मामलों के बारे में भी यही सवाल पूछते हैं: “अनन्त जीवन का अधिकारी होने के लिए मैं क्या करूँ?” (लूका 18:18, अतिरिक्त बल दिया गया है)।

हम अक्सर अपनी गतिविधियों पर निर्भर रहते हैं, जैसे कलीसिया में उपस्थित होना, प्रार्थना करना, बाइबल पढ़ना। जब हम इन्हें करते हैं, तो हमें आत्मविश्वास महसूस होता है, और जब नहीं करते, तो हम खुद को दोषी महसूस करते हैं। हम परमेश्वर के विधान को एक सीढ़ी के रूप में देखते हैं, जिस पर चढ़कर हम उसकी स्वीकृति प्राप्त करते हैं।

इस वचन से पहले के पदों में पौलुस ने अपने जीवन के सभी भौतिक “लाभों” का उल्लेख किया है, जो उसने विरासत में प्राप्त किए थे और अपनी शिक्षा के आधार पर भी प्राप्त किए थे। उसका कुलीन वंश कभी सवालों के घेरे में नहीं आया था। पौलुस वास्तव में कहता है, यदि ये सभी चीजें परमेश्वर के पास स्वीकृति प्राप्त करने के लिए आवश्यक हैं, तो देखो, मुझे इनमें से सब कुछ प्राप्त था। क्या मैंने सभी आध्यात्मिक कर्तव्यों और धार्मिक दायित्वों को पूरा किया था? बिल्कुल किया था।

एक समय पर पौलुस को लगता था कि वह आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यन्त धनी था और वह पवित्रता में उन्नति कर रहा था। फिर एक दिन सब कुछ बदल गया। यरूशलेम से दमिश्क तक की एक यात्रा में पौलुस ने यह जान लिया कि वह आध्यात्मिक रूप से निर्धन था—और वह पवित्रता की राह पर भी नहीं चल रहा था।

वह क्या था जिसने पौलुस को आशा दी? उसी यात्रा में उसकी मुलाकात क्रूस पर मरे और फिर मृतकों में से जी उठे यीशु से हो गई (प्रेरितों 9:1-19), और उसने धर्मी ठहराए जाने के सिद्धान्त की समझ प्राप्त की: कि परमेश्वर पापी मनुष्यों को अपने पुत्र के पूर्ण कार्य के आधार पर धर्मी घोषित करता है।

परमेश्वर का विधान कोई सीढ़ी नहीं है, बल्कि यह एक दर्पण जैसा है, जो हमें यह दिखाता है कि हम गलत हैं और खुद को सही नहीं कर सकते। पौलुस की तरह जो कुछ भी हमें पहले लाभ लगता था, वह अब एक हानि, एक विफलता के रूप में देखा जाता है।

आप कैसे जान सकते हैं कि मसीह आपको स्वीकार करता है? यह इस कारण नहीं कि आप उसके पास अपनी कोई धार्मिकता लेकर आते हैं; बल्कि इस कारण कि आपका पाप मसीह के खाते में स्थानान्तरित कर दिया गया, जिसने कभी पाप नहीं किया और आपके लिए पाप बन गया, ताकि आप उसकी पूर्ण धार्मिकता प्राप्त कर सकें (2 कुरिन्थियों 5:21)। आप परमेश्वर के साथ धर्मी ठहराए जाने में कुछ भी जोड़ या घटा नहीं सकते। धर्मी ठहराया जाना पूर्ण इसलिए हुआ है, क्योंकि परमेश्वर विश्वासियों को मसीह की धार्मिकता देता है, और यह अन्तिम है क्योंकि यह केवल उपहार के रूप में मिले परमेश्वर के पुत्र पर निर्भर करता है।

एक बार जब आप जान जाते हैं कि आप अनन्त जीवन में अपने प्रवेश को खो नहीं सकते, तो आप अपना सब कुछ—अपनी प्रतिष्ठा, सम्पत्ति, प्रसिद्धि, स्थिति, सम्पत्ति—उसकी खातिर त्यागने के लिए तैयार हो जाते हैं, जिसने आपको यह प्रवेश दिलाया है। जो कुछ भी आप पहले लाभ मानते थे, आप अब खुशी से उसे हानि मान सकते हैं। आप मसीह के लिए अपना जीवन खोने के लिए तैयार हैं, क्योंकि आप जानते हैं कि मसीह के द्वारा ही आपको सच्चा जीवन प्राप्त हुआ है। आप मसीह के लिए क्या त्यागने में संघर्ष करते हैं? अपने धर्मी ठहराए जाने को अपने समर्पित आज्ञाकारिता का प्रोत्साहन बनाएँ।

प्रेरितों 26:1-29

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 132–134; 2 कुरिन्थियों 10

30 अगस्त : सही समय पर की गई प्रार्थना

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30 अगस्त : सही समय पर की गई प्रार्थना
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“‘अब हे प्रभु, उनकी धमकियों को देख; और अपने दासों को यह वरदान दे कि तेरा वचन बड़े हियाव से सुनाएँ’ . . . जब वे प्रार्थना कर चुके, तो वह स्थान जहाँ वे इकट्ठे थे हिल गया, और वे सब पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गए, और परमेश्‍वर का वचन हियाव से सुनाते रहे।” प्रेरितों 4:29, 31

जब हमें लगता है कि हमारा समाज अधिक दृढ़ता से सुसमाचार से मुँह मोड़ रहा है और पवित्रशास्त्र के दावों का बड़ी आक्रामकता से विरोध कर रहा है, तो स्वाभाविक सवाल यह होता है: हमें क्या करना चाहिए? हमारी प्रतिक्रिया यह नहीं होनी चाहिए कि हमें क्या आरामदायक लगता है, बल्कि यह होनी चाहिए कि बाइबल क्या कहती है।

प्रारम्भिक कलीसिया सामाजिक उथल-पुथल से अपरिचित नहीं थी। यह जानते हुए कि आशा और उद्धार मसीह के मृत्यु और पुनरुत्थान में ही पाया जाता है, पतरस ने पिन्तेकुस्त के दिन निडर होकर प्रचार किया, बस कुछ सप्ताह बाद ही जब उसने यीशु को जानने और उनका अनुयायी होने से इनकार किया था (प्रेरितों 2:1-41)। पतरस और अन्य प्रेरितों का साहसी प्रचार कलीसिया के त्वरित विकास का कारण बना—लेकिन साथ ही यह विश्वासियों के लिए हिंसा और उत्पीड़न का कारण भी बना (पद 1-22)।

तो फिर हमें यह पढ़ते हुए कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि उन्होंने परमेश्वर के सामने अपनी आवाज उठाई। उन्हें जिस विरोध का सामना करना पड़ रहा था, वे उसे जानते थे और उन्होंने ज्ञान के साथ, बाइबल के तरीके से, और साहस से प्रार्थना की।

“अब हे प्रभु . . .” यदि हमसे यह प्रार्थना पूरी करने के लिए कहा जाए, तो हम शायद परमेश्वर से धमकियों को दूर करने, विरोध को दबाने, या उत्पीड़न से बचाने के लिए कहेंगे। हालाँकि प्रारम्भिक विश्वासियों की प्रार्थना यह नहीं थी। इसके बजाय, उन्होंने यह प्रार्थना की कि वे “बड़े हियाव से” सुसमाचार का प्रचार करें।

उनकी प्रार्थना आज भी प्रासंगिक है। निस्सन्देह, यीशु मसीह की कलीसिया की इस समय की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है: आत्मा से प्रेरित और मसीह पर केन्द्रित साहस। हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जिसे विभिन्न विचारों और तनावों का मिश्रण आकार दे रहा है। इसी सन्दर्भ में परमेश्वर ने हमें यह कहने के लिए बुलाया है: “मैं सुसमाचार से नहीं लजाता, इसलिए कि वह हर एक विश्वास करने वाले के लिए, पहले तो यहूदी फिर यूनानी के लिए, उद्धार के निमित्त परमेश्‍वर की सामर्थ्य है” (रोमियों 1:16)।

जब हम ऐसा करते हैं, तो हमें यह याद रखना चाहिए कि सुसमाचार के केन्द्र में क्रूस है। यदि हम सचमुच साहस के साथ ये शब्द बोलना चाहते हैं, तो हम यशायाह के शब्दों में यह घोषणा करेंगे कि क्रूस पर यीशु “हमारे ही अपराधों के कारण घायल किया गया, वह हमारे अधर्म के कामों के कारण कुचला गया; हमारी ही शान्ति के लिए उस पर ताड़ना पड़ी, कि उसके कोड़े खाने से हम लोग चंगे हो जाएँ” (यशायाह 53:5)। जैसा कि रिको टाइस ने बताया है, इसका मतलब यह है कि हमें दर्द की सीमा को पार करने और विरोध करने वाले लोगों की शत्रुता का जोखिम उठाने के लिए साहसी होना होगा, ताकि हम उन लोगों के बीच भूख पा सकें जिनमें परमेश्वर पहले से काम कर रहा है।[1]

सम्पूर्ण सुसमाचार सम्पूर्ण कलीसिया को सम्पूर्ण संसार तक पहुँचाने के लिए दिया गया है। चाहे आप संगीतकार, अभियन्ता, किसान या फार्मासिस्ट हों, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; परमेश्वर का आदेश हममें से प्रत्येक के लिए यह है कि हम उसके वचन और सुसमाचार के रहस्य को बोलें।

तो क्या आप साहस के साथ साहस के लिए प्रार्थना करने के लिए तैयार हैं? आसान या आरामदायक या स्वस्थ या प्रशंसा पाने वाले जीवन के लिए नहीं, बल्कि एक साक्षी के जीवन के लिए? क्या आप प्रारम्भिक कलीसिया की प्रार्थना को प्रतिदिन अपनी प्रार्थना बनाएँगे, यह माँगते हुए कि आप परमेश्वर के आत्मा से भरपूर और साहसी हों, ताकि आप किसी भी क़ीमत पर सुसमाचार को ऐसे संसार के साथ साझा कर सकें, जो सत्य के लिए तरस रहा है?

  प्रेरितों 4:1-22

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 129–131; 2 कुरिन्थियों 9 ◊


[1] ऑनेस्ट इवेंजेलिज़म (द गुड बुक कम्पनी, 2015), p 15.

29 अगस्त : एक नाम जो अद्वितीय है

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29 अगस्त : एक नाम जो अद्वितीय है
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“यहोवा के नाम की स्तुति करो, क्योंकि केवल उसी का नाम महान है; उसका ऐश्वर्य पृथ्वी और आकाश के ऊपर है।” भजन 148:13

परमेश्वर ने हमें अपना नाम प्रकट करके स्वयं को हम पर प्रकट किया है। जब हम परमेश्वर के नाम के बारे में सोचते हैं, तो हमें उसके स्वभाव—उसकी वास्तविकता, उसके चरित्र और उसके गुणों—के बारे में सोचना चाहिए। उसका नाम उसे हर किसी से और हर चीज़ से अलग करता है, क्योंकि यह उसके सम्पूर्ण अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करता है।

निर्गमन 3 में मूसा और जलती हुई झाड़ी में परमेश्वर से उसकी मुलाकात की घटना परमेश्वर के नाम और उसके चरित्र के बीच के सम्बन्ध को दर्शाती है। जब मूसा झाड़ी के पास आया, तो परमेश्वर ने उससे कहा कि वह अपने पैरों से जूते उतार दे, क्योंकि वह पवित्र भूमि पर खड़ा था। इसके बाद जब परमेश्वर ने मूसा को फिरौन के पास जाकर इस्राएलियों की मुक्ति की माँग करने की आज्ञा दी, तो मूसा ने पूछा, “जब मैं इस्राएलियों के पास जाकर उनसे कहूँ, ‘तुम्हारे पितरों के परमेश्‍वर ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है,’ तब यदि वे मुझ से पूछें, ‘उसका क्या नाम है?’ तब मैं उनको क्या बताऊँ?” परमेश्वर ने उत्तर दिया, “मैं जो हूँ सो हूँ” (निर्गमन 3:13-14)।

परमेश्वर ने “मैं हूँ” कहकर अपने नाम को प्रकट किया। इस उत्तर के द्वारा उसने स्वयं को सभी झूठे देवताओं से अलग कर दिया, जिन्हें वास्तव में “मैं नहीं हूँ” कहना चाहिए। मूर्तियाँ मनुष्यों के हाथों से बनाई जाती हैं—या फिर आज के समय में अक्सर हमारे हृदयों के भीतर गढ़ी जाती हैं। कारीगर उन्हें लकड़ी, पत्थर, या हाथी दाँत से बनाते हैं और उन्हें किसी चबूतरे पर स्थापित करते हैं। फिर भी, वे अनिवार्य रूप से गिर जाती हैं और उन्हें फिर से खड़ा करने की आवश्यकता होती है। एक मूर्ति हमारी सेवा की माँग करती है, लेकिन यह हमें बचा नहीं सकती। यह कभी भी वह पूरा नहीं करती जिसका यह वादा करती है।

परन्तु सम्पूर्ण सृष्टि के रचयिता के लिए यह उचित और सही है कि वह “मैं हूँ” के रूप में जाना जाए, क्योंकि वह किसी और के समान नहीं है। वह कभी उत्पन्न नहीं हुआ। वह पूर्णतः आत्म-विद्यमान और आत्म-निर्भर है। उसे किसी भी व्यक्ति या वस्तु की आवश्यकता नहीं है। जो कुछ उसके पास सदा से था, वह उसके पास अब भी है। उसका न तो कोई आरम्भ है और न अन्त। वह अपनी सभी प्रतिज्ञाओं को पूर्ण करता है। वह अनन्त जीवन और असीम सामर्थ्य का परमेश्वर है।

हमारा एकमात्र उद्देश्य यह है कि हम केवल उसी के नाम को ऊँचा उठाएँ। हम सभी इस बात के लिए संघर्ष करते हैं कि हम मूर्तियों के आगे न झुकें—वे बनाई गई चीज़ें जिन्हें हम पूजते हैं और जिनके सामने यह सोचकर बलिदान चढ़ाते हैं कि वे हमें जीवन देंगी। परन्तु यदि हम परमेश्वर की आराधना सही रीति से करना चाहते हैं, तो हमें अपने जीवन की सभी मूर्तियों को उसके सामने गिरने देना होगा। वही एकमात्र सृष्टिकर्ता है, वही “मैं हूँ” है—वही जो स्वर्ग और पृथ्वी पर राज्य करता है।

यशायाह 46:3-11

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 126–128; 2 कुरिन्थियों 8