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10 सितम्बर : पुनरुत्थान के जीवन की आशा

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10 सितम्बर : पुनरुत्थान के जीवन की आशा
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“जैसा वह मिट्टी का था, वैसे ही वे भी हैं जो मिट्टी के हैं; और जैसा वह स्वर्गीय है, वैसे ही वे भी हैं जो स्वर्गीय हैं। और जैसे हम ने उसका रूप धारण किया जो मिट्टी का था वैसे ही उस स्वर्गीय का रूप भी धारण करेंगे।” 1 कुरिन्थियों 15:48-49

चाहे हम अपनी सारी कल्पना-शक्ति को एकत्र कर लें, फिर भी उस संसार की पूरी कल्पना करना हमारे लिए असम्भव है जैसा उसे होना चाहिए—और वास्तव में जैसा वह होगा। क्या आप ऐसे संसार की कल्पना कर सकते हो जहाँ भूकम्प, आँधियाँ, और बवण्डर अब विनाश और तबाही न मचाए? ऐसा संसार जहाँ कैंसर शब्द किसी के हृदय में भय न उत्पन्न करे? ऐसा शरीर जिसमें न दुर्बलता हो, न संक्रमण, न रोग, न शोक, और न मृत्यु?

सच तो यह है कि हम में से कोई भी उस संसार की पूरी कल्पना नहीं कर सकता। परन्तु हमारे पास अपने प्रभु यीशु मसीह में पुनरुत्थान के जीवन की आशा की एक प्रतिमा अवश्य है। मरे हुओं में से जी उठकर, वह उन सब के लिए पहला फल ठहरा है जो उस पर विश्वास करते हैं। जो हम उसमें देखते हैं, वही हम एक दिन बनेंगे।

स्वभाव से हम सब “आदम में” हैं और मृत्यु के लिए ठहराए गए हैं; परन्तु जो कोई मसीह में है, उसके लिए परमेश्वर नई आशा की प्रतिज्ञा करता है (1 कुरिन्थियों 15:22)। मृत्यु पर जय पाकर, मसीह ने, जो “अन्तिम आदम” है (पद 45), हमें स्वर्ग में अविनाशी जीवन के मार्ग पर स्थापित किया है। एक समय हम “मिट्टी” के मनुष्य के मार्ग पर चलते थे, परन्तु अब जो कोई मसीह में है, वह “उस स्वर्गीय का रूप भी धारण” करता है।

जब वह स्वर्गीय मनुष्य पृथ्वी पर लौटेगा और स्वर्ग को अपने साथ लाएगा, तब जीवन कैसा होगा? पवित्रशास्त्र सभी विवरण प्रकट नहीं करता। परन्तु हम यह जानते हैं कि नाशमान होने के स्थान पर हमारे शरीर अविनाशी होंगे। अभी हमारा जीवन सीमित अवधि का है, परन्तु हमें ऐसे अनन्त जीवन की प्रतिज्ञा और आशा दी गई है जिसका कोई अन्त नहीं। हम सदा जीवित रहेंगे (1 कुरिन्थियों 15:42), और उस अनन्तता का प्रत्येक दिन महिमामय होगा, क्योंकि वहाँ कुछ भी नाश न होगा, न बिगड़ेगा, और न मुरझाएगा (1 पतरस 1:4)। हम यह भी जानते हैं कि परमेश्वर हमें अपमान और दुर्बलता की दशा से बदलकर सामर्थ्य और महिमा की नई अवस्था में रूपान्तरित करेगा (1 कुरिन्थियों 15:43)।

न तो आप और न ही मैं ऐसे पुनरुत्थान के जीवन को पूरी तरह समझने की क्षमता रखते हैं। आप जो कुछ भी कल्पना कर सकें, वास्तविकता उससे कहीं उत्तम होगी! परन्तु इस बात के विषय में निश्चिन्त रहें: वह जीवन अवश्य आपकी प्रतीक्षा कर रहा है, क्योंकि आपके जी उठे हुए प्रभु यीशु मसीह ने एक बार सदा के लिए मृत्यु को पैरों तले रौंद दिया है। उसकी अपरिवर्तनीय विजय ने मृत्यु को निगल लिया है (1 कुरिन्थियों 15:54)।

आज भी आप अपने चारों ओर—यहाँ तक कि अपने भीतर भी—मृत्यु की शक्तियों को कार्य करते हुए देखेंगे। सम्भव है कि इन शब्दों को पढ़ते समय आप किसी न किसी रीति से इसका अनुभव कर रहे हैं। परन्तु यह निश्चय जानें कि ज्योति का राज्य अन्धकार के अधिकार पर पहले ही जय पा चुका है। वास्तव में, आपकी नागरिकता पहले से ही पुनरुत्थान के जीवन के राज्य की है। कभी-कभी आप अभी भी क्षय और मिट्टी का अनुभव करेंगे, परन्तु आप इस आशा में स्थिर रह सकते हैं कि वह स्वर्गीय मनुष्य एक दिन आपकी “दीन–हीन देह का रूप बदलकर, अपनी महिमा की देह के अनुकूल बना देगा” (फिलिप्पियों 3:21)—और वह भी सदा के लिए!

         1 थिस्सलुनीकियों 5:1-11

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 9–10; यूहन्ना 4:1-30

10 September : चिंतेशी सुयुद्ध कसे करावे

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10 September : चिंतेशी सुयुद्ध कसे करावे
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त्याच्यावर तुम्हीं ‘आपली’ सर्व ‘चिंता टाका’ कारण तो तुमची काळजी घेतो. (1 पेत्र 5:7)

स्तोत्र 56:3 म्हणते, “मला भीती वाटेल तेव्हा मी तुझ्यावर भरवसा टाकींन.”

लक्ष द्या: हे वचन “मला कधीही भीती वाटणार नाहीं” असे म्हणत नाहीं. भीती हल्ला करते आणि मग एक संघर्ष सुरू होतो. त्यामुळें खऱ्या विश्वासणाऱ्यांना कोणतीही चिंता नसते असे बायबल गृहीत धरत नाहीं. तर, जेव्हा चिंता प्रहार करतांत तेव्हा त्यांशी कसे सुयुद्ध करावे ते बायबल आपल्याला सांगते.

जसे कीं 1 पेत्र 5:7 म्हणते, “त्याच्यावर तुम्हीं ‘आपली’ सर्व ‘चिंता टाका’ कारण तो तुमची काळजी घेतो.” हे वचन असे म्हणत नाहीं कीं तुम्हांला कधीही चिंता वाटणार नाहीं. ते म्हणते, जेव्हा तुम्हांला चिंता वाटतील तेव्हा तुम्हीं त्यां सर्व देवावर टाका. तुम्हीं गाडी चालवत असतांना जर अचानक चिखल तुमच्या कारच्या समोरील काचेवर (विंडशील्डवर) उडून येतो आणि लगेच समोरचे दृश्य तात्पुरते अस्पष्ट होऊन जाते, आणि तुम्हीं चिंतेने हडबडू लागता, तेव्हा तुम्हीं त्वरित तुमचे वायपर चालू करता आणि कारचे विंडशील्ड वॉशर देखील सुरु करता, व चिखलाने माखलेली काच स्वच्छ करता.

म्हणून एखादी व्यक्ती जिला दररोज चिंतेच्या भावनांशी संघर्ष करावा लागतो तिला माझे उत्तर हेच आहे: चिंता ह्या सामान्य आहेत. कमीतकमी माझ्याबाबतींत तरी ते खरे आहे, विशेषकरून माझ्या किशोरवयीन काळापासूनच प्रश्न     आहे: आपण त्यांच्याशी कसे सुयुद्ध करतो?

या प्रश्नाचे उत्तर आहे : आपण अविश्वासाविरुद्ध लढा देत व भावी काळातील कृपेवर विश्वासाची धाव धावीत आपल्या चिंतेंशी सुयुद्ध करतो. आणि ज्या प्रकारे तुम्हीं हे “विश्वासासंबंधीचे सुयुद्ध” लढता (1 तीमथ्य 6:12; 2 तीमथ्य 4:7) ते म्हणजें भविष्यातील कृपेच्या देवाच्या अभिवचनांवर मनन करित व त्याच्या आत्म्याच्या सहाय्यासाठीं प्रार्थना करित.

विंडशील्ड वाइपर ही देवाची वचने आहेत जी अविश्वासाचा चिखल स्वच्छ करतांत आणि विंडशील्डवर आपण जे पाण्याचे फव्वारे मारतो ते पवित्र आत्म्याचे साहाय्य आहे. आपण पापापासून – त्यांत चिंतेचे देखील पाप आहे – मुक्तीचे सुयुद्ध “आत्म्याच्या द्वारे व सत्यावरच्या विश्वासात” लढतो (2 थेस्सलनीकाकर 2:13).

आत्म्याचे कार्य आणि सत्याचे वचन. ही दोन्ही मिळून मोठा विश्वास निर्माण करतांत. चिखल मऊ करणाऱ्या पवित्र आत्म्याच्या कार्याशिवाय, वचनाचे वाइपर केवळ विंडशील्डवरील अविश्वासाच्या आंधळ्या गुच्छांवर खरवडतांत.

दोन्ही आवश्यक आहेत : आत्मा व वचन. आपण देवाची वचने वाचतो आणि त्याच्या आत्म्याच्या सहाय्यासाठीं प्रार्थना करतो. आणि जसजसे विंडशील्ड स्वच्छ होत जाते, जेणेंकरून देवानें आपल्यासाठीं जे कल्याणाची योजना आखली आहे ती आपण पाहू शकू (यिर्मया 29:11), तसतसा आपला विश्वास बळकट होत जातो आणि चिंता ह्या नाहींश्या होऊं लागतांत.

9 सितम्बर : गलत दिशा में सहानुभूति का खतरा

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9 सितम्बर : गलत दिशा में सहानुभूति का खतरा
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“लोगों की बड़ी भीड़ उसके पीछे हो ली और उसमें बहुत सी स्त्रियाँ भी थीं जो उसके लिए छाती–पीटती और विलाप करती थीं। यीशु ने उनकी ओर मुड़कर कहा, ‘हे यरूशलेम की पुत्रियो, मेरे लिए मत रोओ; परन्तु अपने और अपने बालकों के लिए रोओ।’” लूका 23:27-28

भीड़ से उठने वाली “क्रूस पर चढ़ाओ!” की चिल्लाहटें थम चुकी थीं। उनका उद्देश्य पूरा हो चुका था: पिलातुस ने यीशु को मृत्यु के लिए सौंप दिया था। अब मृत्यु की माँग करने वाली आवाज़ों के स्थान पर एक नई ध्वनि उठी—उन स्त्रियों के रोने की ध्वनि “जो उसके लिए छाती–पीटती और विलाप करती थीं।”

यदि थका हुआ यीशु अपनी क्रूस-यात्रा के मार्ग पर लड़खड़ाते हुए उन स्त्रियों की ओर, “जो उसके लिए छाती–पीटती और विलाप करती थीं,” केवल दृष्टि डाल देता, उनकी सहानुभूति को देख लेता या स्वीकार कर लेता, तो इसमें कोई आश्चर्य न होता। परन्तु उसने इससे कहीं अधिक किया। वह वास्तव में रुका, उनकी ओर मुड़ा, और उनसे कहा, “मेरे लिए मत रोओ; परन्तु अपने और अपने बालकों के लिए रोओ।” अर्थात्, उसने उन्हें बताया कि उनकी सहानुभूति गलत दिशा में थी—कि उसके लिए बुरा महसूस करने के बजाय उन्हें अपनी ही संकटपूर्ण अवस्था पर विचार करना चाहिए।

यीशु के शब्द कोई कठोर डाँट नहीं थे, मानो इन स्त्रियों का विलाप करना गलत था। बल्कि वह चाहता था कि वे यह देखें कि एक ऐसी बात भी है जिसके लिए उन्हें कहीं अधिक गहरी चिन्ता के साथ रोना चाहिए—अर्थात् वह न्याय जो यरूशलेम की प्रतीक्षा कर रहा था यदि उसके निवासी अपने अविश्वास में बने रहते और उसे अस्वीकार करते रहते।

एक सप्ताह से भी कम पहले यीशु ने यरूशलेम के विनाश के विषय में कहा था: “[इस्राएल के शत्रु]  तुझे और तेरे बालकों को जो तुझ में हैं, मिट्टी में मिलाएँगे, और तुझ में पत्थर पर पत्थर भी न छोड़ेंगे; क्योंकि तूने उस अवसर को जब तुझ पर कृपा दृष्‍टि की गई न पहिचाना” (लूका 19:44)। इन स्त्रियों ने इतना तो पहचाना कि वे यीशु के घायल और टूटे हुए शरीर के प्रति सहानुभूति प्रकट करें। उन्होंने पहचाना कि यह दृश्य दुखद था, न्याय का अपमान और विकृति था। परन्तु उन्होंने अब तक परमेश्वर के उनके पास आने के समय को नहीं पहचाना था। और जो यह नहीं पहचानते कि यीशु में परमेश्वर अपने वचनों को पूरा करने और अपने न्याय से उद्धार देने आया है, उन्हें उसी न्याय का सामना करना पड़ेगा। यरूशलेम के लिए, उस अन्तिम न्याय की एक झलक ईस्वी सन् 70 में आई, जब नगर पर रोमी सेना ने अधिकार किया, उसके नागरिक मारे गए, और उसका मन्दिर ढा दिया गया।

तब की भाँति आज भी, यीशु हमें केवल सहानुभूति के लिए नहीं बुला रहा। उसे इसकी आवश्यकता नहीं है! आज यीशु क्रूस पर नहीं है; वह ऊँचे पर पिता की दाहिनी ओर विराजमान है। तब उन स्त्रियों से कहे गए यीशु के शब्द—और आज हमसे कहे गए उसके शब्द—उन लोगों के लिए चेतावनी हैं जो उसे अन्याय का शिकार मानकर उस पर तरस तो खाते हैं, परन्तु इस सच्चाई का सामना नहीं करते कि मानवजाति योग्य और भयानक न्याय का सामना कर रही है। हमें मानवता की अवस्था पर विलाप करना चाहिए और पश्चाताप तथा विश्वास के साथ उसके पास आना चाहिए, क्योंकि उस अन्तिम न्याय के दिन उससे कोई शरण नहीं होगी। शरण केवल उसी में है।

  लूका 19:41-46

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 7– 8; यूहन्ना 3:16-36 ◊

9 September : कृपा ही विनामूल्य असावी हे आवश्यक आहे

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9 September : कृपा ही विनामूल्य असावी हे आवश्यक आहे
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तुला निराळेपण कोणी दिलें? आणि जे तुला दिलेंले नाहीं असे तुझ्याजवळ काय आहे? तुला दिलेंले असता, दिलेंले नाहीं असा अभिमान तू का बाळगतोस? (1 करिंथ 4:7)

तुम्हीं ज्या घरांत राहता त्या घराप्रमाणें तारणाचे चित्रण उभारा.

ते तुमचे संरक्षण करते. त्यात तुम्हीं आपल्या खाण्या-पिण्याच्या वस्तूंचा साठा ठेवता ज्यामुळें त्यां वस्तू टिकून राहतांत. ते कधीही कुजत नाहीं किंवा त्याचा चुराडाही होत नाहीं. त्याच्या खिडक्या अशा दिशेनें उघडतांत जिथून तुम्हांला अशा वैभवाचा कळस दिसून येतो जो पाहून तुम्हांला सार्वकालिक संतुष्टी मिळते.

देवानें ते खुद्द स्वतःचे आणि त्याचा प्रिय पुत्र याचे प्रचंड मोल देऊन ते बांधले आणि त्यानें ते तुम्हांला विनामूल्य आणि लखलखीत अशा अवस्थेत दिलें.

या घराच्या “खरेदी” कराराला “नवा करार” म्हणतांत. त्यां कराराच्या अटींमध्यें असे लिहिले आहे: “जर तुम्हीं हे घर भेटवस्तू स्वरूपात स्वीकार करतां आणि पिता व पुत्र जे या घरात तुमच्याबरोबर वस्ती करतील त्यांच्याठायीं आनंद करतां तर हे घर तुमचे होईल आणि सर्वकाळासाठीं तुमचेच राहील. तुम्हीं इतर देवतांना आश्रय देऊन देवाच्या घराला अपवित्र करणार नाहीं किंवा इतर वस्तूंकडें आपलें मन वळवणार नाहीं, तर या घरात देवाच्या सहवासात आपलें सर्व समाधान शोधणार.”

या कराराला हो म्हणणें, पण नंतर मात्र त्या घराचे मासिक हप्ते भरण्यासाठीं या आशेने बँकेतून कर्ज घेणें कीं तुम्हीं या घरासाठीं किंमत मोजाल, हे मूर्खपणाचे ठरणार नाहीं का?

तुम्हीं त्यां घराला भेटवस्तू म्हणून मिळालेले नाहीं तर खरेदी करून मिळविलेले घर म्हणून मानाल. देव यापुढे विनामूल्य उपकार करणारा राहणार नाहीं. आणि तुम्हीं स्वतःला अशा विचित्र मागण्यांचे गुलाम बनवून घ्याल ज्यां त्यानें तुमच्यावर टाकण्याचे स्वप्नही पाहिले नव्हते.

जर कृपा ही विनामूल्य व्हावयाची असेल – जो कृपेचा खरा अर्थ आहे – तर आपल्याला त्या कृपेची परतफेड करावी लागेल अशी वागणूक आपण तिला देऊ शकत नाहीं.

8 सितम्बर : आत्मा के लिए पोषण

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8 सितम्बर : आत्मा के लिए पोषण
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“वह तो यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता; और उसकी व्यवस्था पर रात दिन ध्यान करता रहता है।” भजन संहिता 1:2

परमेश्वर का सत्य अपने सब विरोधियों से भारी है और उनसे अधिक स्थाई है। जैसा कि भविष्यद्वक्ता यशायाह घोषणा करता है, “घास तो सूख जाती, और फूल मुर्झा जाता है; परन्तु हमारे परमेश्‍वर का वचन सदैव अटल रहेगा” (यशायाह 40:8)।

जब भजन-संग्रह का आरम्भ होता है, तो हम पाते हैं कि धन्य पुरुष—सचमुच आनन्दित व्यक्ति—परमेश्वर के वचन के स्थाई सत्य में आनन्द लेता है। प्रभु के वचन उसके लिए बहुमूल्य हैं; प्रत्येक वचन मधु से भी अधिक मीठा लगता है (भजन 19:10)। फिर भी ऐसा व्यक्ति केवल यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न ही नहीं होता, वह उस पर ध्यान भी करता है।

ध्यान करना या मनन करना पाचन की प्रक्रिया के समान है। शारीरिक रूप से, भोजन को केवल मुँह में रख लेना और उसके साथ कुछ न करना सम्भव है, परन्तु उससे शरीर को कोई पोषण नहीं मिलता। हम तब भी यही जोखिम उठाते हैं, जब हम रविवार-दर-रविवार और दिन-प्रतिदिन परमेश्वर के वचन के पास आते हैं, परन्तु सोच-समझकर उस पर मनन नहीं करते।

अक्सर हमें ऐसा लगता है कि हमारा जीवन सौ मील प्रति घण्टे की गति से भाग रहा है। परमेश्वर के वचन में प्रतिदिन का समय केवल एक दैनिक कार्य बन जाता है जिसे पूरा करना है, बस यह कहने के लिए कि हमने कर लिया। इसके बजाय, हमें परमेश्वर के वचन को अपने हृदय में संचित करने के मार्ग खोजने चाहिएँ (भजन 119:11)। हमें सचेत रूप से समय निकालना चाहिए कि उसे चबाएँ, और दिन भर यह पूछते रहें, “इस पद का वास्तव में क्या अर्थ है? इस परिस्थिति में यह मेरे विचारों और कार्यों को कैसे आकार देगा? यह मुझे परमेश्वर की महिमा के विषय में क्या दिखा रहा है? परमेश्वर इसे कैसे उपयोग कर सकता है कि मुझे मसीह की समानता में ढाले?”

हमें पवित्रशास्त्र पर केवल नाश्ता करने के लिए नहीं, परन्तु उन्हें भोज की भाँति ग्रहण करने के लिए बुलाया गया है। क्योंकि परमेश्वर की महिमा का कोई अन्त नहीं है, इसलिए उसके वचन की सम्पदा का भी कोई अन्त नहीं है। आपके लिए उसपर मनन करने का क्या अर्थ होगा? प्रार्थना के द्वारा परमेश्वर के आत्मा से सहायता माँगें कि वह आपके हृदय और मन को अपने वचन के साथ बाँध दे। ध्यानपूर्वक विचार करें कि बाइबल क्या कहती है। उस पर मनन करें। उसे परखें। दिन भर उसे चबाते रहें ताकि आत्मा को पोषण देने वाले अधिक से अधिक तत्त्व निकल सकें। और जब आप अपने प्रभु की व्यवस्था पर मनन करते हैं, तो परमेश्वर से यह भी माँगें कि वह न केवल उसके ज्ञान में आपकी वृद्धि करे, परन्तु आपको भीतर से बदल दे कि आप उसके पुत्र के समान बनें। जैसे-जैसे आप उसके वचन को अपने हृदय, मन, और जीवन में कार्य करते हुए देखेंगे, वैसे-वैसे आप उसे पढ़ने और उसके अनुसार जीने में अधिक से अधिक आनन्द पाएँगे।

  यशायाह 40:6-9

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 4–6; यूहन्ना 3:1-15

8 September : देवाची परतफेड कशी करावी

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8 September : देवाची परतफेड कशी करावी
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परमेश्वराने माझ्यावर केलेंल्यां सर्व उपकाराची मी कशी परतफेड करू? मी तारणाचा प्याला उंचावून परमेश्वराच्या नावाने हाक मारीन. त्याच्या सर्व लोकांसमोर, मी परमेश्वरास केलेंले नवस पूर्ण करीन. (स्तोत्र 116:12-14)

“परमेश्वराने माझ्यावर केलेंल्या सर्व उपकाराची मी कशी परतफेड करू” ही भाषा मला अस्वस्थ करते. “उपकाराची परतफेड” हे शब्द इतक्या सहजपणें असे सूचित करत असल्यासारखे जाणवतांत कीं कृपा जणू अशी आहे जिला देव आपल्याकडें गहाण ठेवतो. ती खरोखर औदार्यपूर्ण तर आहे, परंतु तुम्हांला तिची परतफेड करावी लागेल.

पौलाने प्रेषितांची कृत्ये 17:25 मध्यें असे म्हटले आहे, कीं “माणसांच्या हातून त्याची सेवा घडावी असेही नाहीं; कारण जीवन, प्राण व सर्वकाहीं तो स्वतः सर्वांना देतो.” दुसऱ्या शब्दांत सांगायचे झालें तर, तुम्हीं देवाला असे काहींही देऊ शकत नाहीं किंवा देवासाठीं असे काहींही करू शकत नाहीं जे त्यानें तुम्हांला आधीच दिलें नाहीं आणि जे त्यानें तुमच्यासाठीं आधीच केलें नाहीं.

1 करिंथ 15:10 मध्यें तुम्हीं हीच गोष्ट पुन्हा पाहूं शकतां, “तरी जो काहीं मी आहे तो देवाच्या कृपेने आहे आणि माझ्यावर त्याची जी कृपा झाली आहे ती व्यर्थ झाली नाहीं; परंतु ह्या सर्वांपेक्षा मी अतिशय श्रम केलें, ते मी केलें असे नाहीं, तर माझ्याबरोबर असणार्‍या देवाच्या कृपेने केलें.” तर मग आपलें कोणतेही काम देवाची परतफेड कधीही करू शकत नाहीं, कारण ते काम देखील देवाचे एक कृपादानच आहे. आपण देवासाठीं करत असलेले प्रत्येक काम आपल्यावर त्याच्या कृपेचे ऋण अधिकच वाढवत जाते.

ह्याप्रमाणें स्तोत्र 116 मध्यें नवस पूर्ण करण्याच्या कृतीला जी गोष्ट कर्जाची परतफेड केलीं जात आहे असा गैरसमज होण्याच्या धोक्यांपासून मुक्त ठेवते ती म्हणजें ही कीं “नवस पूर्ण करणें” ही खरे पाहता एक सामान्य परतफेड नाहीं, तर प्राप्त करून घेण्याची आणखी एक कृती आहे जी देवाच्या वर्तमान समयी होत असलेल्या कृपेला उंचाविते. नवस पूर्ण करणें हे आपल्या साधनसंपत्तीला उंचावत नाहीं.

“परमेश्वराने माझ्यावर केलेंल्या सर्व उपकाराची मी कशी परतफेड करू” या स्तोत्रकर्त्याने स्वतःला केलेंल्या प्रश्नाचे उत्तर “मी तारणाचा प्याला उंचावून परमेश्वराच्या नावाने हाक मारीन” हे आहे. दुसऱ्या शब्दांत सांगायचे तर, माझा तारणाचा प्याला भरून वाहावा अशी मी देवाकडें हाक मारतो. परमेश्वराची परतफेड करणें म्हणजें परमेश्वराकडून अधिक प्राप्त करत जाणें कीं जेणेंकरून परमेश्वराच्या अक्षय चांगुलपणाचे गौरव अधिकाधिक होईल.

तारणाचा प्याला उंचावून धरणें हे परमेश्वराचे संतुष्टीदायक तारण हातांत घेणें आणि त्यातुन पिणें आणि त्याची अधिक अभिलाषा धरणें होय. आपण हे पुढील वाक्यप्रयोगामुळें समजतो: “मी . . . परमेश्वराच्या नावाने हाक मारीन.” मी अधिक साहाय्यासाठीं धावा करीन. परमेश्वराने दया करून माझ्या हाकेकडें आपलें कान लाविलें त्या उपकाराची मी कशी परतफेड करू? उत्तरः मी पुन्हा त्याला हाक मारीन. मी देवाचे या गोष्टीसाठीं स्तवन करीन व त्याचा सम्मान करीन कीं त्याला माझ्याकडून कधीच कोणत्याही वस्तूची, कींबहुंना माझी देखील गरज पडत नाहीं, तर उलट जेव्हा मला त्याची गरज असते (जी माझी नित्य गरज आहे) तेव्हा तो सर्व वेळी माझे कल्याणच करत असतो.

मग स्तोत्रकर्ता आपलें तिसरे वक्तव्य बोलतो, “मी परमेश्वरास केलेंले नवस पूर्ण करीन.” पण तो आपलें केलेंले नवस पूर्ण कसे करील? ते नवस तो तारणाचा प्याला उंचावून व परमेश्वराच्या नावाने हाक मारून पूर्ण करील. म्हणजेंच, आपल्याला कायमस्वरूपी कृपेवर कृपा मिळत जाईल- सर्व भरून काढणारी अशी पुरेशी कृपा – या अभिवचनावरील विश्वासाने ते नवस पूर्ण केलें जातील.

7 सितम्बर : आपकी अनुग्रह, आपकी दया, और आपकी शान्ति

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7 सितम्बर : आपकी अनुग्रह, आपकी दया, और आपकी शान्ति
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“परमेश्‍वर पिता, और पिता के पुत्र यीशु मसीह की ओर से अनुग्रह और दया और शान्ति, सत्य और प्रेम सहित हमारे साथ रहेंगे।” 2 यूहन्ना 3

मसीही विश्वास की सबसे मूलभूत और सबसे अद्‌भुत सच्चाइयों में से एक यह है कि परमेश्वर हमें वह देता है जिसके हम योग्य नहीं हैं। पापी होने के कारण—अन्तिम पुरुष, स्त्री, और बालक तक—हम मृत्यु के योग्य हैं। और इसके स्थान पर परमेश्वर हमें क्या देता है? “परमेश्‍वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन है” (रोमियों 6:23)।

यह उलटफेर—कि परमेश्वर हमें वह देता है जिसके हम योग्य नहीं हैं और उस बात को रोक लेता है जिसके हम योग्य हैं—इतना मूल्यवान है कि इसके लिए हमारे पास एक विशेष शब्द है: अनुग्रह। अपने अनुग्रह के द्वारा परमेश्वर सबसे अयोग्य पात्र को जीवन का सबसे सुन्दर वरदान देता है।

और हमें पाप और दोष से मुक्त करके और यीशु मसीह में हर आशीष देकर वह यह अनुग्रह हम पर कैसे कर सकता है? अपनी दया के कारण। यह परमेश्वर की महान दया ही है जो उसे हमें वह देने को प्रेरित करती है जिसके हम योग्य नहीं हैं—और उसी दया के द्वारा वह हम पर अनुग्रह की वर्षा करता है।

ऐसे अनुग्रह और दया से शान्ति की प्रचुरता बह निकलती है। शान्ति उनका अनुभव है जो परमेश्वर से मेल कर लिए गए हैं, जो अब उससे अलग नहीं रहे, परन्तु उसके साथ संगति में और उसके अनुग्रह के सहभागी लोगों के समुदाय में रहते हैं। यह शान्ति परमेश्वर के अनुग्रह और दया का ऐसा पारलौकिक अनुभव है कि वह “समझ से परे है” (फिलिप्पियों 4:7)।

ऐसे संसार में जो निराशा और खतरे से भरा हुआ प्रतीत होता है, और कभी-कभी अर्थ और उद्देश्य से रिक्त लगता है, ऐसे अलौकिक अनुग्रह, दया, और शान्ति से बढ़कर हम और क्या चाह सकते हैं? वे स्थिर हैं। वे टिकाऊ हैं। वे स्थाई हैं। और परमेश्वर पिता सदा प्रसन्न होता है कि अपने बहुमूल्य पुत्र यीशु मसीह के द्वारा अपने पास आने वालों को इन्हें उदारता से प्रदान करे। यदि आप मसीह पर भरोसा रखते हैं, तो अनुग्रह, दया, और शान्ति आपके साथ रहेंगी। इसलिए आगे बढ़ने से पहले ठहरें और इन तीन शब्दों के अर्थ और महिमा को अपने मन में उतर जाने दें। परमेश्वर का अनुग्रह आपका है, परमेश्वर की दया आपकी है, परमेश्वर की शान्ति आपकी है—सब कुछ यीशु के द्वारा, जो आपका उद्धारकर्ता है।

  2 यूहन्ना

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 1–3; यूहन्ना 2 ◊

7 September : देवानें दिलेंलें विरोधक आणि देवानें दिलेंला विश्वास

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7 September : देवानें दिलेंलें विरोधक आणि देवानें दिलेंला विश्वास
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सांगायचे ते इतकेच कीं, ख्रिस्ताच्या सुवार्तेस शोभेल असे आचरण ठेवा……आणि विरोध करणार्‍या लोकांकडून कशाविषयीही भयभीत झाला नाहींत;….कारण त्याच्यावर विश्वास ठेवावा इतकेच केवळ नव्हे, तर ख्रिस्ताच्या वतीने त्याच्याकरता दुःखही सोसावे अशी कृपा तुमच्यावर झाली आहे. (फिलिप्पै 1:27-29)

पौलाने फिलिप्पैकरांना सांगितले कीं ख्रिस्ताच्या सुवार्तेस शोभेल असे आचरण ठेवणें म्हणजें आपल्या शत्रूंपुढे निर्भय असणें होय. त्यानंतर तो त्या निर्भयपणामागे असलेलें तर्कशुद्ध कारण सांगतो.

तर्कशुद्ध कारण हे आहे : देवानें तुम्हांला फक्त एक नाहीं तर दोन अशी कृपादानें दिलीं आहेत, विश्वास आणि दुःख. 29 वे वचन नेमके हेच सांगत आहे. “कारण त्याच्यावर विश्वास ठेवावा इतकेच केवळ नव्हे, तर ख्रिस्ताच्या वतीने त्याच्याकरता दुःखही सोसावे अशी कृपा तुमच्यावर झाली आहे.” तुम्हीं विश्वास ठेवावा असे कृपादान तुम्हांला देण्यांत आलें, आणि तुम्हीं दुःखही सोसावे हे कृपादान देखील तुम्हांला देण्यांत आलें.

या संदर्भात याचा अर्थ असा होतो : दुःखाचे प्रसंग येतांत तेव्हां तुमचा ‘विश्वास’ आणि तुमचे ‘दुःख’ ही दोन्ही देवाची कृपादानें आहेत. जेव्हा पॉल म्हणतो, विरोध करणार्‍या लोकांकडून कशाविषयीही भयभीत होऊं नका, तेव्हा त्यांनी भयभीत का होऊं नये यामागची त्याच्या मनात दोन कारणें होती :

1. पहिले कारण म्हणजें विरोधक हें देवाच्या हातांत आहेत. ते विरोध करतांत हे देवानें तुम्हांला दिलेंलें कृपादान आहे. विरोध हा त्याच्या अधिपत्याखाली होतो. हा 29 व्या वचनाचा पहिला मुद्दा आहे.

2. आणि भयभीत न होण्यामागचे दुसरे कारण म्हणजें तुमची निर्भयता, म्हणजेंच तुमचा विश्वास हा सुद्धा देवाच्या हातांत आहे. ते सुद्धा देवानें दिलेंलें कृपादानच आहे. हा 29 व्या वचनाचा दुसरा मुद्दा आहे.

त्यामुळें संकटे येतांत त्यावेळी निर्भय असण्यामागे असलेलें तर्कशुद्ध कारण हे दोन पदरी सत्य आहे : तुमची संकटे आणि संकटाच्या वेळी टिकाव धरणारा तुमचा विश्वास ही दोन्ही देवाची कृपादानें आहेत.

अशा जगण्याला “ख्रिस्ताच्या सुवार्तेस शोभेल असे आचरण” का म्हटले जाते? कारण सुवार्ता ही ह्या चांगल्या गोष्टींची बातमी आहे कीं ख्रिस्तानें आपल्या नव्या कराराच्या रक्ताद्वारे त्याच्या सर्व लोकांना विश्वासाचे कृपादान प्राप्त व्हावे आणि त्यांनी आपल्या वैऱ्यांवर प्रभूत्व करावें हे आपल्यात घडून येणारे देवाचे सार्वभौम कार्य साध्य केलें आहे – आणि हे सर्व त्यानें आपलें सार्वकालिक कल्याण व्हावे म्हणून केलें. हेच सुवार्तेने साध्य केलें आहे. म्हणून, सुवार्तेस शोभेल असे आचरण ठेऊन जगणें हे सुवार्तेचे सामर्थ्य आणि चांगुलपण प्रमाणित करते.

म्हणून, भयभीत होऊं नका. तुमचे विरोधक देवानें त्यांना जी सीमा ठरविली आहे त्यापलीकडें जास्त काहीं करू शकत नाहींत. आणि तो तुम्हांला आवश्यक असलेला सर्व विश्वास देईल. ही अभिवचनें रक्ताने विकत घेतलेली आहेत आणि त्यावर शिक्कामोर्तब करण्यांत आलें आहे. ही सुवार्तेची अभिवचनें आहेत.

6 सितम्बर : आनन्दित हृदय

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6 सितम्बर : आनन्दित हृदय
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“तब हन्ना ने प्रार्थना करके कहा, ‘मेरा मन यहोवा के कारण मगन है; मेरा सींग यहोवा के कारण ऊँचा हुआ है। मेरा मुँह मेरे शत्रुओं के विरुद्ध खुल गया, क्योंकि मैं तेरे किए हुए उद्धार से आनन्दित हूँ।’” 1 शमूएल 2:1

परमेश्वर की जितनी स्तुति की जाए उतनी कम है और उसके लोगों के प्रति उसके प्रेम को देखकर अपने हृदयों में जितना आनन्दित हुआ जाए उतना कम है। जब हम अपने जीवनों में परमेश्वर का कार्य देखते हैं, तो हमें तुरन्त उसकी स्तुति करनी चाहिए; परन्तु साथ ही हमें उस आशीष को उसके लोगों के प्रति सामूहिक भलाई के सन्दर्भ में भी देखना चाहिए। हम यह बात पवित्रशास्त्र में बार-बार देखते हैं। उदाहरण के लिए, 1 शमूएल में, जब हन्ना ने सहायता के लिए यहोवा से विनती की, तो उसने ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जो केवल उसकी व्यक्तिगत परिस्थिति से नहीं, बल्कि परमेश्वर के लोगों से जुड़े थे: “हे सेनाओं के यहोवा . . .” (1 शमूएल 1:11)। उसकी विनती यह थी कि परमेश्वर उस पर वैसी ही दृष्टि करे जैसी उसने अतीत में अपने लोगों पर की थी।

जब परमेश्वर ने उसे वह पुत्र दिया जिसकी वह लालसा करती थी, तो उसका धन्यवाद इस्राएल की महान छुड़ौती के अवसरों की भाषा में गूँज उठा। जब परमेश्वर के सामर्थ्य से उसके लोग मिस्र की दासता से छुड़ाए गए थे, तब मूसा ने गीत गाया था, और मरियम ने अपनी डफली के साथ नृत्य में अगुवाई की थी (निर्गमन 15)। हन्ना के पास भी गाने के लिए एक गीत था—या कहें, तो धन्यवाद की एक प्रार्थना थी। और उसकी प्रार्थना उसकी व्यक्तिगत परिस्थितियों की सीमाओं को पार कर गई। वह इस बात से आनन्दित हुई कि जो कुछ परमेश्वर ने उसके लिए व्यक्तिगत रूप से किया था, उसका सम्बन्ध उस कार्य से था जो वह अपने लोगों के लिए सामूहिक रूप से कर रहा था।

ऐसा करते हुए उसका मन मगन हो उठा। जब बाइबल में “मन” शब्द का प्रयोग होता है, तो वह हमारे अस्तित्व के केन्द्र की बात करता है, जिसमें हमारा हृदय, हमारी इच्छा और हमारी भावनाएँ सम्मिलित हैं। इसलिए जब हन्ना ने कहा, “मेरा मन यहोवा के कारण मगन है,” तो वह यह व्यक्त कर रही थी कि उसके अस्तित्व का केन्द्र परमेश्वर की महानता में डूब गया था। उसके हृदय की परिपूर्णता से उसका मुँह बोला।

जैसे हन्ना ने सम्भवतः मरियम के उदाहरण में आनन्द पाया होगा, वैसे ही हन्ना की प्रार्थना के लगभग एक हज़ार वर्ष बाद एक और स्त्री ने इसी प्रकार परमेश्वर के लिए गीत गाया। यीशु का माता मरियम निश्चय ही हन्ना की प्रार्थना को जानती थी और सम्भव है कि उसने उसमें से कुछ शब्द भी लिए होंगे, और इस प्रकार उस परम्परा को आगे बढ़ाया जिसे हम “मैग्निफ़िकैट” के नाम से जानते हैं (लूका 1:46-55)।

और हम क्या करते हैं? जब परमेश्वर हमारे जीवनों में व्यक्तिगत रूप से और अपने लोगों में सामूहिक रूप से कार्य करता है, तो क्या हम भी ऐसे ही उल्लास से प्रत्युत्तर देते हैं? या कहीं ऐसा तो नहीं कि हमें हन्ना की स्तुति कुछ अधिक लगती है? यदि कोई “मरियम” उठकर डफली बजाने लगे, तो हम कैसी प्रतिक्रिया देंगे? कभी-कभी हम अपनी स्तुति में बहुत मापे-तौले हुए, या केवल औपचारिक हो जाते हैं। हम कलीसिया में प्रभु की सामर्थ्य, शक्ति, भलाई और करुणा के विषय में गीत गाते हैं, और फिर भी हम अपने मुँह ठीक से खोलकर गाते या मुस्कराते तक नहीं। हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि हम किसी दार्शनिक विचार, किसी अवधारणा, या अपने भीतर पाई जाने वाली किसी बात से व्यवहार नहीं कर रहे। नहीं, हम जीवित परमेश्वर के विषय में गा रहे हैं और उससे प्रार्थना कर रहे हैं, जो अपने लोगों की ओर से और उनके लिए कार्य करता है!

इसलिए, मरियम, हन्ना और यीशु की माता मरियम की तरह, अपने जीवन में परमेश्वर की योजनाओं और कार्यों को अपनाएँ। प्रार्थना में तत्पर रहें, स्तुति में तत्पर रहें, और दोनों में हृदय से जुड़े रहें। आज समय निकालें कि आपका हृदय यहोवा में मगन हो जाए!

  1 शमूएल 2:1-10

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 148–150; यूहन्ना 1:29-51

6 September : विद्यमान आणि सर्वसमर्थ अशी प्रीति

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ख्रिस्ताच्या प्रीतिपासून आपल्याला कोण विभक्त करील? क्लेश, आपत्ती, छळणूक, उपासमार, नग्नता, संकट किंवा तलवार ही विभक्त करतील काय? (रोमकरांस 8:35)

रोमकरांस 8:35 मध्यें प्रकट तीन गोष्टींकडें लक्ष द्या.

  1. ख्रिस्त सांप्रतकाळी आम्हांवर प्रीति करतो.

एखादी स्त्री कदाचित् तिच्या हयात नसलेल्या पतीविषयी म्हणेंल: कोणतीही वस्तू मला त्याच्या प्रीतिपासून विभक्त करायला समर्थ होणार नाहीं. तिच्या या वक्तव्याचा अर्थ असा असू शकतो कीं तिच्या अंत:करणांत त्याच्या प्रीतिच्या आठवणी तिला आयुष्यभर गोडवा देणारी आणि शक्तिवर्धक अशा असतील. पण पौल इथे जें म्हणत आहे त्याचा अर्थ तो होत नाहीं.

रोमकरांस 8:34 मध्यें स्पष्टपणें असे म्हटले आहे कीं, “जो मेला इतकेच नाहीं, तर मेलेल्यांतून उठला आहे, जो देवाच्या उजवीकडें आहे आणि जो आपल्यासाठीं मध्यस्थीही करत आहे तो ख्रिस्त येशू आहे.” कोणतीही वस्तू आपल्याला ख्रिस्ताच्या प्रीतिपासून विभक्त करायला समर्थ होणार नाहीं असे पौल म्हणू शकतो याचे कारण हे कीं ख्रिस्त जिवंत आहे आणि आत्ताही तो आपल्यावर प्रीति करतो.

तो देवाच्या उजवीकडें आहे आणि म्हणून तो आम्हांसाठीं सर्व वस्तूंवर राज्य करत आहे. एवढेच नाहीं, तर तो आपल्यासाठीं मध्यस्थी देखील करत आहे, याचा अर्थ असा कीं त्यानें आमच्या मुक्तीसाठीं जे कार्य साध्य केलें ते आम्हांला क्षणोक्षणी तारून नेत आहे आणि सार्वकालिक असा जो आनंद त्यांत आपल्याला सुरक्षितपणें घेऊन येत आहे, याकडें तो पुरेपूर लक्ष्य देतोय. त्याची प्रीति फक्त आठवणी नाहींत. ही सर्वसमर्थ, देवाच्या जिवंत पुत्राची क्षणोक्षणी जिवंत असलेली एक क्रिया आहे, जी आपल्याला सार्वकालिक आनंद देते.

2. ख्रिस्ताची ही प्रीति आम्हांला विभक्त होण्यापासून वाचवण्यात प्रबळ आहे, आणि म्हणून ही प्रीति सर्वांवर असलेली सामान्य वैश्विक प्रीति नाहीं तर त्याच्या लोकांसाठीं असलेली विशिष्ट अशी वैयक्तिक प्रीति आहे – म्हणजें रोमकरांस 8:28 म्हणते त्याप्रमाणें, त्यांच्यावर असलेली प्रीति जे देवावर प्रीति करतांत आणि त्याच्या संकल्पाप्रमाणें बोलाविलेलें आहेत.

ही इफिस 5:25 मध्यें वर्णिलेली प्रीति आहे, “पतींनो, जशी ख्रिस्तानें मंडळीवर प्रीति केलीं तशी तुम्हींही आपापल्या पत्नीवर प्रीति करा; ख्रिस्तानें मंडळीवर प्रीति केलीं आणि स्वतःस तिच्यासाठीं समर्पण केलें.” ही ख्रिस्ताची आपल्या मंडळीवर, जी त्याची नवरी आहे, प्रीति आहे. ख्रिस्ताची सर्वांवर प्रीति आहे, आणि जी प्रीति त्याला आपल्या वधूसाठीं आहे ती विशेष, तारणदायी, राखणारी प्रीति आहे. जर तुमचा ख्रिस्तावर विश्वास असेल तर तुम्हीं त्या वधूचा भाग आहात हे आपल्याला ठाऊक आहे. जो कोणी – यांत अपवाद नाहींच – जो कोणी ख्रिस्तावर विश्वास ठेवतो तो हे म्हणू शकतो कीं, मी त्याच्या वधूचा, त्याच्या मंडळीचा भाग आहे; जें त्याचे बोलाविलेले आणि निवडलेलें आहेंत त्यांपैकीं एक आहे, म्हणजें त्यांपैकीं ज्यांची रोमकरांस 8:35 मध्यें सांगितल्याप्रमाणें, काहींही झालें तरी, युगानुयुग राखण केलीं जाते आणि ज्यांचे संरक्षण केलें जाते.

3. ही सर्वसमर्थ, प्रबळ, राखून ठेवणारी प्रीति आपल्याला या जीवनातील संकटांपासून वाचवत नाहीं, तर त्यां संकटांद्वारे आपल्याला सुरक्षितपणें देवासोबत सार्वकालिक आनंदात घेऊन येते.

आपण सर्वांना मरण येईल, परंतु ते मरण आपल्याला विभक्त करण्यांस समर्थ होणार नाहीं. म्हणून जेव्हा पौल वचन 35 मध्यें म्हणतो कीं “तलवार” आपल्याला ख्रिस्ताच्या प्रीतिप्रेमापासून विभक्त करण्यांस समर्थ होणार नाहीं, तेव्हा त्याचा अर्थ असा आहे : जरी आपण जिवे मारिलें गेलो तरी आपण ख्रिस्ताच्या प्रीतिप्रेमापासून विभक्त केलें जाणार नाहीं.

ह्याप्रमाणें वचन 35 चा सारांश असा आहे : येशू ख्रिस्त सांप्रतकाळी आपल्या लोकांवर अशा प्रीतिने प्रेम करतो जी सर्वसमर्थ, क्षणोक्षणी वर्तमान अशी आहे, जी आपल्याला नेहमीच संकटांतून सोडवत नाहीं, तर दुःख व मरण यांतूनही त्याच्या उपस्थितीत आम्हांला सार्वकालिक आनंद प्राप्त व्हावा म्हणून आम्हांला राखून ठेविते.