9 सितम्बर : गलत दिशा में सहानुभूति का खतरा

Alethia4India
Alethia4India
9 सितम्बर : गलत दिशा में सहानुभूति का खतरा
Loading
/

“लोगों की बड़ी भीड़ उसके पीछे हो ली और उसमें बहुत सी स्त्रियाँ भी थीं जो उसके लिए छाती–पीटती और विलाप करती थीं। यीशु ने उनकी ओर मुड़कर कहा, ‘हे यरूशलेम की पुत्रियो, मेरे लिए मत रोओ; परन्तु अपने और अपने बालकों के लिए रोओ।’” लूका 23:27-28

भीड़ से उठने वाली “क्रूस पर चढ़ाओ!” की चिल्लाहटें थम चुकी थीं। उनका उद्देश्य पूरा हो चुका था: पिलातुस ने यीशु को मृत्यु के लिए सौंप दिया था। अब मृत्यु की माँग करने वाली आवाज़ों के स्थान पर एक नई ध्वनि उठी—उन स्त्रियों के रोने की ध्वनि “जो उसके लिए छाती–पीटती और विलाप करती थीं।”

यदि थका हुआ यीशु अपनी क्रूस-यात्रा के मार्ग पर लड़खड़ाते हुए उन स्त्रियों की ओर, “जो उसके लिए छाती–पीटती और विलाप करती थीं,” केवल दृष्टि डाल देता, उनकी सहानुभूति को देख लेता या स्वीकार कर लेता, तो इसमें कोई आश्चर्य न होता। परन्तु उसने इससे कहीं अधिक किया। वह वास्तव में रुका, उनकी ओर मुड़ा, और उनसे कहा, “मेरे लिए मत रोओ; परन्तु अपने और अपने बालकों के लिए रोओ।” अर्थात्, उसने उन्हें बताया कि उनकी सहानुभूति गलत दिशा में थी—कि उसके लिए बुरा महसूस करने के बजाय उन्हें अपनी ही संकटपूर्ण अवस्था पर विचार करना चाहिए।

यीशु के शब्द कोई कठोर डाँट नहीं थे, मानो इन स्त्रियों का विलाप करना गलत था। बल्कि वह चाहता था कि वे यह देखें कि एक ऐसी बात भी है जिसके लिए उन्हें कहीं अधिक गहरी चिन्ता के साथ रोना चाहिए—अर्थात् वह न्याय जो यरूशलेम की प्रतीक्षा कर रहा था यदि उसके निवासी अपने अविश्वास में बने रहते और उसे अस्वीकार करते रहते।

एक सप्ताह से भी कम पहले यीशु ने यरूशलेम के विनाश के विषय में कहा था: “[इस्राएल के शत्रु]  तुझे और तेरे बालकों को जो तुझ में हैं, मिट्टी में मिलाएँगे, और तुझ में पत्थर पर पत्थर भी न छोड़ेंगे; क्योंकि तूने उस अवसर को जब तुझ पर कृपा दृष्‍टि की गई न पहिचाना” (लूका 19:44)। इन स्त्रियों ने इतना तो पहचाना कि वे यीशु के घायल और टूटे हुए शरीर के प्रति सहानुभूति प्रकट करें। उन्होंने पहचाना कि यह दृश्य दुखद था, न्याय का अपमान और विकृति था। परन्तु उन्होंने अब तक परमेश्वर के उनके पास आने के समय को नहीं पहचाना था। और जो यह नहीं पहचानते कि यीशु में परमेश्वर अपने वचनों को पूरा करने और अपने न्याय से उद्धार देने आया है, उन्हें उसी न्याय का सामना करना पड़ेगा। यरूशलेम के लिए, उस अन्तिम न्याय की एक झलक ईस्वी सन् 70 में आई, जब नगर पर रोमी सेना ने अधिकार किया, उसके नागरिक मारे गए, और उसका मन्दिर ढा दिया गया।

तब की भाँति आज भी, यीशु हमें केवल सहानुभूति के लिए नहीं बुला रहा। उसे इसकी आवश्यकता नहीं है! आज यीशु क्रूस पर नहीं है; वह ऊँचे पर पिता की दाहिनी ओर विराजमान है। तब उन स्त्रियों से कहे गए यीशु के शब्द—और आज हमसे कहे गए उसके शब्द—उन लोगों के लिए चेतावनी हैं जो उसे अन्याय का शिकार मानकर उस पर तरस तो खाते हैं, परन्तु इस सच्चाई का सामना नहीं करते कि मानवजाति योग्य और भयानक न्याय का सामना कर रही है। हमें मानवता की अवस्था पर विलाप करना चाहिए और पश्चाताप तथा विश्वास के साथ उसके पास आना चाहिए, क्योंकि उस अन्तिम न्याय के दिन उससे कोई शरण नहीं होगी। शरण केवल उसी में है।

  लूका 19:41-46

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 7– 8; यूहन्ना 3:16-36 ◊

Leave A Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *