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5 सितम्बर : भेजे हुए और भेजने वाला

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5 सितम्बर : भेजे हुए और भेजने वाला
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“यीशु ने फिर उनसे कहा, ‘तुम्हें शान्ति मिले; जैसे पिता ने मुझे भेजा है, वैसे ही मैं भी तुम्हें भेजता हूँ।’ यह कहकर उसने उन पर फूँका और उनसे कहा, ‘पवित्र आत्मा लो।’” यूहन्ना 20:21-22

यीशु पृथ्वी पर एक उद्देश्य के साथ आया था, और पृथ्वी छोड़ते समय उसने अपने लोगों को उसी उद्देश्य के लिए बुलाया।

यीशु ने आरम्भ से ही स्पष्ट कर दिया था कि वह सुसमाचार सुनाने आया है: “समय पूरा हुआ है, और परमेश्‍वर का राज्य निकट आ गया है; मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्‍वास करो” (मरकुस 1:15)। यह आज भी उतना ही सत्य है, और इसलिए यह पूर्णतः उचित है कि जब उसकी पृथ्वी की यात्रा समाप्त होने को थी, तब प्रभु ने अपने चेलों को उस मिशन को आगे बढ़ाने के लिए भेजा। पहले पुनरुत्थान के दिन की सन्ध्या को अपने मित्रों के सामने प्रकट होकर उसने उन्हें क्षमा के मार्ग का प्रचार करने की आज्ञा देने में कोई विलम्ब नहीं किया, और साथ ही यह भी स्मरण दिलाया कि उसकी अनुपस्थिति में पवित्र आत्मा उनकी सहायता करेगा।

चेलों के लिए पिछले कुछ दिन अत्यन्त भारी रहे थे। केवल बहत्तर घण्टों में, उन्होंने पहली बार एक साथ प्रभु-भोज में भाग लिया था, अपने उद्धारकर्ता और मित्र को अन्यायपूर्वक मुकदमे में और क्रूस पर चढ़ते देखा था, और शोक की ऐसी अवस्था में प्रवेश किया था जिसने उन्हें पूरी तरह घेर लिया था। परन्तु यीशु के पुनरुत्थान के बाद लौट आने से उनका शोक उलट गया। अब जीवन का अर्थ था वही करना जो उसने कहा था: इस अद्‌भुत कहानी का—सुसमाचार, क्षमा, और परमेश्वर के प्रेम का— प्रचार करना। यही उनके जीवन का उद्देश्य बन गया—और अधिकांश मामलों में, वे इसी के लिए मर भी गए।

केवल कुछ सप्ताह बाद, हम पतरस को एक उपदेश देते हुए पाते हैं। उसने कहा:

“हे इस्राएलियो, ये बातें सुनो : यीशु नासरी एक मनुष्य था जिसका परमेश्‍वर की ओर से होने का प्रमाण उन सामर्थ्य के कामों और आश्चर्य के कामों और चिह्नों से प्रगट है, जो परमेश्‍वर ने तुम्हारे बीच उसके द्वारा कर दिखाए जिसे तुम आप ही जानते हो। उसी यीशु को, जो परमेश्‍वर की ठहराई हुई योजना और पूर्व ज्ञान के अनुसार पकड़वाया गया, तुम ने अधर्मियों के हाथ से क्रूस पर चढ़वाकर मार डाला। परन्तु उसी को परमेश्‍वर ने मृत्यु के बन्धनों से छुड़ाकर जिलाया; क्योंकि यह अनहोना था कि वह उसके वश में रहता” (प्रेरितों 2:22-24)।

पतरस ने सीधे उस स्थिति को सम्बोधित किया जिसमें उसके सुनने वाले खड़े थे: वे ऐसे विद्रोही थे जो परमेश्वर की भलाई के योग्य नहीं थे, और उन्होंने उस राजा को ठुकरा दिया था जिसे परमेश्वर ने उनके बीच रहने और स्वयं को प्रकट करने के उद्देश्य से भेजा था। फिर भी, अब वही परमेश्वर पापियों के स्थान पर अपने एकलौते पुत्र को दण्ड देकर यीशु के अनुयायियों को मुख से उनके लिए क्षमा का प्रस्ताव कर रहा था।

मसीह का यह बुलावा, कि हम अपने भीतर की आशा का कारण बताएँ (1 पतरस 3:15), आज हमारे लिए भी उतना ही प्रासंगिक है जितना तब उसके चेलों के लिए था। हम मृत्यु, निराशा, रिक्तता, पछतावे और भय से घिरे हुए हैं। हम निरन्तर एक अज्ञात भविष्य की ओर देखते रहते हैं। हमारे प्रभाव-क्षेत्र में रहने वालों को यह जानने की आवश्यकता है कि क्षमा और शान्ति उन्हें केवल यीशु में ही मिलती है। परमेश्वर का धन्यवाद हो कि उसका आत्मा हमारे आगे-आगे चलता है। यदि आपको यह ज्ञात हो कि आप ईश्वरीय नियुक्ति से, ईश्वरीय मिशन का भाग होकर भेजे गए हैं, तो दूसरों से कहे जाने वाले आपके शब्दों में क्या परिवर्तन आएगा? यीशु कहता है “जैसे पिता ने मुझे भेजा है, वैसे ही मैं भी तुम्हें भेजता हूँ।”

  यूहन्ना 20:19-21

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 146–147; यूहन्ना 1:1-28 ◊

5 September : ख्रिस्ताच्या प्रेमाचे ध्येय

“हे माझ्या पित्या, माझी अशी इच्छा आहे कीं, तू जे मला दिलें आहेत त्यांनीही जेथे मी आहे तेथे माझ्याजवळ असावे; ह्यासाठीं कीं, जो माझा गौरव तू मला दिला आहेस तो त्यांनी पाहावा” (योहान 17:24).

येशूवर विश्वास ठेवणारे देवाच्या दृष्टित मौल्यवान आहेत (आम्हीं त्याची वधू आहोत!). आणि तो आम्हांवर इतकीं प्रीति करतो कीं आमची जी मौल्यवानता आहे तिला तो आमच्यासाठीं भजनीय दैवत बनू देणार नाहीं.

अर्थातच, देवानें आपल्यासाठीं बरेच काहीं केलें आहे (तो आपल्याला दत्तक घेऊन त्याचे कुटुंबीय बनवतो!), परंतु तो असे करतो याचे कारण म्हणजें हे कीं आपण त्याच्या महानतेचा (गौरवाचा) आनंद घ्यावा म्हणून तो आधी आपल्याला आमच्या स्व:पणातून बाहेर काढतो.

आपापले परीक्षण करा. कल्पना करा, कीं जर येशू तुमच्यासोबत दिवस घालवण्यासाठीं येतो, तुमच्या शेजारी पलंगावर बसतो आणि म्हणतो, “माझं तुझ्यावर खरं प्रेम आहे,” तर आता ज्याअर्थी तुम्हीं त्याच्याबरोबर दिवस घालविला, तर उर्वरित दिवस तुम्हीं कशावर लक्ष केंद्रित करून घालवाल?

मला असे वाटते कीं अशी बरीच गीतें आणि प्रवचने आहेत जी आपल्याला चुकींचे उत्तर देऊन सोडतांत. त्यांचे उत्तर आमच्या अंत:करणांत अशी छाप सोडतांत कीं आमचा आनंद तेव्हां काठोकाठ भरतो जेव्हां आमच्यावर प्रीति केल्याची भावना आम्हांला वारंवार जाणवते. “तो माझ्यावर प्रेम करतो!” “तो माझ्यावर प्रेम करतो!” निश्चितच, हा आनंद खरा आहे यांत शंका नाहीं. पण हा आनंद काठोकाठ नाहीं, आणि हा त्या मागचा मुख्य हेतूही नाहीं.

जेव्हां आपण म्हणतो “मजवर प्रीति केलीं गेलीं” तेव्हां आपण काय म्हणत आहोत? आम्हांला काय म्हणायचे आहे? “मजवर प्रीति केलीं गेलीं” ह्याचे खरे औचित्य काय आहे?

दिवसभर येशूला निरक्षून आणि “अहाहा तू किती गौरवी आहेस!” “अहाहा! काय तुझे ते गौरव!” असे मोठ्याने उद्गार काढण्यात सर्वात मोठा, व ख्रिस्ताला उंचवणारा आनंद मिळणार नाहीं का?

  • तो सर्वात अवघड अशा प्रश्नाचे उत्तर देतो म्हणजें त्याचे शहाणपण गौरवी आहे.
  • तो घाणेंरड्या, रक्तस्त्राव होणाऱ्या फोडाला स्पर्श करतो, म्हणजें त्याचा कळवळा गौरवी आहे.
  • तो वैद्यकींय परीक्षकांच्या कार्यालयात जाऊन मृत झालेंल्या एका महिलेला उठवतो म्हणजें त्याचे सामर्थ्य गौरवी आहे.
  • तो दुपारच्या घडामोडींचे भाकींत करतो म्हणजें त्याचे पूर्वज्ञान गौरवी आहे.
  • भूकंपाच्या वेळी तो शांत झोप घेतो म्हणजें त्याची निर्भयता गौरवी आहे.
  • तो म्हणतो, “अब्राहामाचा जन्म झाला त्यापूर्वी मी आहे” (योहान 8:58), म्हणजें त्याची वचनें गौरवी आहेत.

आम्हीं दिवसभर त्याच्याबरोबर चालतो-फिरतो, आणि जे आम्हांला दिसते ते पाहून त्याच्या गौरवाने भारावून जातो.

त्याला आपल्यासाठीं जे काहीं करणें अगत्याचे आहे (ज्यात आमच्यासाठीं मरण सोसणें देखील आहे) ते तो आपल्यासाठीं करावयास आवेशी आहे जेणेंकरुन आपण त्याला पाहून आश्चर्य करावें आणि त्यानें आम्हांस भस्म करू नये, ही त्याची आपल्यासाठीं प्रीति नाहीं का? पापमुक्ती, प्रायश्चित्त, अपराधांची क्षमा, नीतिमान ठरविले जाणें, देवाबरोबर समेट – हे सर्व होणें अगत्याचे होते. ही सर्व प्रीतिची कार्य आहेत.

परंतु जी प्रीति त्या कृत्यांना प्रीतिचे स्वरूप देते त्या प्रीतिचे ध्येय हे कीं आपण त्याच्याबरोबर असावे आणि थक्क करणारे असे जे त्याचे गौरव ते आम्हीं पाहावे आणि चकित व्हावे. हे असे क्षण आहेत जेव्हां आपण स्वतःला विसरून जातो आणि देव त्याच्याद्वारे आम्हांबरोबर आहे हे पाहण्यांस समर्थ होतो.

म्हणून मी पाळकांना आणि शिक्षकांना विनंती करतो : ख्रिस्तानें त्याचे प्रीतिचे जे कार्य केलें तेंच त्याच्या प्रीतिचे ध्येय आहे हे मंडळीला आवर्जून सांगा आणि प्रीतिच्या बाबतींत त्यांच्या विचारसरणीत बदल घडवून आणा. जर पापमुक्ती, प्रायश्चित्त, अपराधांची क्षमा, नीतिमान ठरविले जाणें, देवाबरोबर समेट – हे सर्व आपल्याला स्वतः येशूमध्यें आनंद करण्याकडें घेऊन जात नसतील तर ही प्रीतिची कार्यें नाहींत.

तुमचा संदेश व शिक्षण यावर केंद्रित असू द्या. योहान 17:24 मध्यें येशूनें याचसाठींच प्रार्थना केलीं होती, “हे माझ्या पित्या, माझी अशी इच्छा आहे कीं, तू जे मला दिलें आहेत त्यांनीही जेथे मी आहे तेथे माझ्याजवळ असावे; ह्यासाठीं कीं, जो माझा गौरव…तो त्यांनी पाहावा.”

4 सितम्बर : और कोई बड़ी विजय नहीं

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4 सितम्बर : और कोई बड़ी विजय नहीं
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“अतः अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं।” रोमियों 8:1

मसीहियत के विषय में एक पुरानी और बार-बार दोहराई जाने वाली गलतफहमी यह है कि परमेश्वर हम में से प्रत्येक को एक जीवित तराजू की तरह देखता है: एक ओर हमारे पाप और असफलताएँ भरती जाती हैं, दूसरी ओर हमारे भले काम और विजय डाली जाती हैं, और यदि अन्त में अच्छे कामों का पलड़ा भारी हो जाए, तो परिणाम परमेश्वर के लिए पर्याप्त होगा—क्या ऐसा नहीं है?

परन्तु वास्तविकता यह है कि यदि हम अपने पापों को गिनें और उनकी तुलना अपनी आज्ञाकारिता से करें, तो हम सदा हारते ही पाए जाते हैं। यह वास्तव में कोई प्रतियोगिता भी नहीं है। जैसे जब कोई पेशेवर टीम किसी अनाड़ी टीम के विरुद्ध खेलती है, तो परिणाम एकतरफ़ा होता है। फिर भी हम में से बहुत से लोग यह सोचकर अपने आप को धोखा देते हैं कि हमारे पास वापसी के लिए समय है—कि अन्तिम सीटी बजने से पहले हम स्वयं को थोड़ा ठीक कर लेंगे, या इतना परिश्रम कर लेंगे कि अन्त में विजयी निकल आएँ।

ऐसी सोच सुसमाचार की बराबरी कभी नहीं कर पाती। और यह अनुग्रह से पूरी तरह चूक जाती है।

परमेश्वर के सामने हमारे अपने प्रयास हमारे पलड़े को कभी भारी नहीं कर सकते। नहीं, यह काम तो मसीह का है। पौलुस इफिसियों को लिखता है कि हमारा उद्धार हमारी “ओर से नहीं, वरन् परमेश्‍वर का दान है” (इफिसियों 2:8)। वह दान हमारे स्थान पर मसीह का सिद्ध लेखा है। उसकी पूर्ण धार्मिकता से कम कुछ भी पर्याप्त नहीं।

जब आप सुसमाचार को वास्तव में समझने लगते हैं, तो वह इतना अच्छा प्रतीत होता है कि मानो सत्य ही न हो। ऐसा उदार अनुग्रह कौन पाने के योग्य है? परन्तु यही तो बात है। हमारा उद्धार पूर्णतः एक दान है, और वह पूरी तरह अयोग्य लोगों को दिया गया है। हम न तो अभी इसके योग्य हैं, और न कभी हो सकते हैं। फिर भी परमेश्वर हम पर दया करता है। वह हमें विजयी घोषित करता है—दण्ड की आज्ञा नहीं!—यीशु मसीह के कारण, और केवल उसी के कारण।

मसीही होना आपको अपने जीवन को एक तराजू की दृष्टि से देखने से स्वतः सुरक्षित नहीं कर देता। पौलुस ने गलातिया की कलीसिया को पूरा पत्र इसी कारण लिखा कि वे अनुग्रह को न छोड़ें। हमें लगातार यह स्मरण रखने के लिए संघर्ष करना पड़ता है कि हमारे प्रदर्शन से नहीं बल्कि केवल मसीह के कारण और सदा मसीह में ही हम पर “दण्ड की आज्ञा नहीं” है। क्या आपने अपने उद्धार का आनन्द खो दिया है? इसका सम्भवतः कारण यह हो सकता है कि आप यीशु की ओर कम और अपनी ओर अधिक देख रहे हैं। मसीही जीवन में न तो निराशा का स्थान है और न घमण्ड का, क्योंकि यह कभी आपके विषय में नहीं है; यह सदा उसी के विषय में है।

मसीह यीशु में परमेश्वर आपको विजय देता है। इससे बड़ा कोई दान नहीं, इससे बड़ी कोई विजय नहीं, और इससे बड़ा कोई आनन्द नहीं।

  गलातियों 4:21–5:1

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 143–145; 2 कुरिन्थियों 13

4 September : नव्या कराराविषयी नवे असे काय आहे

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4 September : नव्या कराराविषयी नवे असे काय आहे
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“त्या दिवसांनंतर मी इस्राएलच्या घराण्याशी हा करार करीन, असे परमेश्वर म्हणतो: मी माझा नियम त्यांच्यामध्यें ठेवीन आणि मी ते त्यांच्या हृदयावर लिहीन. आणि मी त्यांचा देव होईन आणि ते माझे लोक होतील.” (यिर्मया 31:33)

येशू आज्ञा आणि प्रीति यांमध्यें असलेली कोणतीही अजोड आडभिंत उद्ध्वस्त करून टाकतो.

तो म्हणतो, “माझ्यावर तुमची प्रीति असली तर तुम्हीं माझ्या आज्ञा पाळाल. . . . ज्याच्याजवळ माझ्या आज्ञा आहेत व जो त्या पाळतो तोच माझ्यावर प्रीति करणारा आहे; आणि जो माझ्यावर प्रीति करतो त्याच्यावर माझा पिता प्रीति करील” (योहान 14:15, 21). “जसा मी आपल्या पित्याच्या आज्ञा पाळून त्याच्या प्रीतित राहतो तसे तुम्हीं माझ्या आज्ञा पाळाल तर माझ्या प्रीतित राहाल” (योहान 15:10).

आज्ञा आणि आज्ञापालन या दृष्टीने विचार केला, तर ह्या दोन्हीं गोष्टी येशूला त्याच्या पित्याच्या प्रीतिचा आनंद घेण्यापासून थांबवू शकल्या नाहीं. म्हणून त्याला अशी अपेक्षा आहे कीं आपण जेव्हां त्याच्याकडें आज्ञा देणारा प्रभू म्हणून पाहतो तेव्हां त्याच्याबरोबरचे असलेले आपलेंही प्रीतिचे नाते धोक्यात येणार नाहींत.

हे लक्षात घेणें अत्यंत महत्त्वाचे आहे कारण येशू ख्रिस्ताद्वारे देवाबरोबर असलेले आपलें नव्या कराराचे नाते म्हणजें असा करार नाहीं जो आज्ञांविरहित असेल. देवानें मोशेच्या द्वारे देऊ केलेंला जुना करार आणि देवानें ख्रिस्ताद्वारे देऊ केलेंला नवा करार यातील मूलभूत फरक हा नाहीं कीं एका करारात आज्ञा होत्या आणि दुसऱ्या करारात आज्ञा नाहींत.

यां दोन करारातील मुख्य फरक पुढीलप्रमाणें आहे: (1) मशीहा, म्हणजें येशू प्रकट झाला आणि त्यानें नव्या कराराचे रक्त ओतले (मत्तय 26:28; इब्री 10:29) जेणेंकरून यापुढे त्यानें ह्या नव्या कराराचा मध्यस्थ व्हावे, जेणेंकरून सर्वांचे तारण व्हावे, करार पाळणारा विश्वास हा त्याच्यावर जाणीवपूर्वक विश्वास आहे; (2) त्यामुळें जुना करार “जीर्ण” झाला आहे (इब्री 8:13) आणि नव्या कराराचे म्हटलेले जें देवाचे लोक त्यांच्यावर यापुढे त्याचे आधिपत्य चालत नाहीं (2 करिंथ 3:7-18; रोम 7:4,6; गलती 3:19) ; आणि (3) वचनदत्त नवे हृदय आणि पवित्र आत्म्याचे समर्थ बनविणारे सामर्थ्य हे विश्वासाद्वारे देण्यांत आलेंले आहेंत.

जुन्या करारात, आम्हांला देवाची आज्ञा पाळण्यास समर्थ बनविणारे कृपेचे सामर्थ्य त्या पूर्णतेने ओतले गेलें नव्हते ज्या पूर्णतेने ते येशू प्रकट झाल्यापासून ओतण्यांत आलें आहे. “पण आजपर्यंत परमेश्वराने तुम्हांला समजायला मन, पाहायला डोळे व ऐकायला कान दिलें नाहींत.” (अनुवाद 29:4). नव्या कराराविषयी जे नवे आहे त्याच्या अर्थ असा होत नाहीं कीं त्या करारात कोणत्याही आज्ञा नाहींत, तर हे कीं देवानें जी अभिवचने दिली होती ती पूर्णत्वास आलीं आहेत! “मी माझा नियम त्यांच्यामध्यें ठेवीन आणि मी ते त्यांच्या हृदयावर लिहीन” (यिर्मया 31:33). “मी तुमच्या ठायीं माझा आत्मा घालीन आणि तुम्हीं माझ्या नियमांनी चालाल, माझे निर्णय पाळून त्यांप्रमाणें आचरण कराल असे मी करीन ” (यहेज्केल 36:27).

3 सितम्बर : स्वर्ग का एक स्वाद

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3 सितम्बर : स्वर्ग का एक स्वाद
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“अतः अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं।” रोमियों 8:1

हमारे युग की बड़ी और घातक विधर्मताओं में से एक “समृद्धि का सुसमाचार” है। इस झूठी शिक्षा के समर्थक पुरुषों और स्त्रियों को यह विश्वास दिलाने का प्रयास करते हैं कि यदि उनके पास पर्याप्त विश्वास हो या वे उन्हें थोड़ा और धन दे दें, तो उनके लिए स्वास्थ्य, धन और सामान्य समृद्धि जैसी बड़ी भौतिक आशिषें निश्चित हैं। परन्तु परमेश्वर ने ऐसी कोई प्रतिज्ञा कभी नहीं की। ऐसी समृद्धि की प्रतिज्ञाएँ हमारे लिए, जरूरी नहीं है कि अभी के लिए हैं, बल्कि अनन्तकाल में रखी गई हैं। अनेक विश्वासियों के जीवन झूठे शिक्षकों द्वारा नष्ट कर दिए गए हैं, जिन्होंने अभी वह देने का वादा किया जो परमेश्वर केवल अनन्तकाल में देने का वचन देता है।

परन्तु समृद्धि के सुसमाचार से सावधान रहते हुए, हमें इस महिमामय सत्य को नहीं भूलना चाहिए कि मसीह में स्वर्ग की कुछ आशिषें हमारे सांसारिक जीवन में अभी भी प्रवेश करती हैं। वास्तव में, परमेश्वर की दया की सबसे प्रचुर वर्षा में से एक अभी हमारी है: “अतः अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं।” निश्चय ही, अपने सृष्टिकर्ता के साथ अभी मेल में लाया जाना—और वह भी अनन्तकाल के लिए—इससे अधिक आकर्षक प्रस्ताव शायद ही कोई हो।

“दण्ड की आज्ञा नहीं” की यह अवस्था केवल वह नहीं है जिसकी हम आकांक्षा करते हैं और जिसे हम अन्ततः प्राप्त करेंगे। पौलुस कहता है कि यह धन्य स्थिति अभी हमारे लिए है। यदि हम “मसीह यीशु में” हैं, अर्थात विश्वास के द्वारा उससे एक किए गए हैं, तो हम पहले ही परमेश्वर के साथ मेल में प्रवेश कर चुके हैं। हम पहले ही अनुग्रह में खड़े हैं, दण्ड में नहीं।

अनुग्रह में खड़े होने और दण्ड में खड़े होने के बीच कोई मध्य भूमि नहीं है। यदि हम धर्मी नहीं ठहराए गए—यदि हम मसीह के बल पर धर्मी घोषित नहीं किए गए—तो हम दण्ड के अधीन हैं। यीशु इसे हमारे लिए स्पष्ट शब्दों में कहता है: “जो उस पर विश्‍वास करता है, उस पर दण्ड की आज्ञा नहीं होती, परन्तु जो उस पर विश्‍वास नहीं करता, वह दोषी ठहर चुका; इसलिए कि उसने परमेश्‍वर के एकलौते पुत्र के नाम पर विश्‍वास नहीं किया” (यूहन्ना 3:18)। खड़े होने के लिए और कोई मध्य भूमि नहीं है।

परन्तु किसी मध्य भूमि में खड़े होने का प्रयास करने की कोई आवश्यकता भी नहीं है। जो पापी मन फिराव और विश्वास के साथ यीशु की ओर मुड़ता है, उसकी वर्तमान वास्तविकता जीवित आशा में बदल जाती है; परमेश्वर उसे मृत्यु से जीवन में ले आता है। वह उसे अपने अनुग्रह की मिट्टी में रोपता है, जहाँ वह उसे स्थिर आशा से पोषित करता है। वे उसकी दया की अनन्त मुस्कान के नीचे दृढ़ता से जड़ पकड़ लेते हैं। इससे बढ़कर और कौन-सी समृद्धि हो सकती है?

हम में से अधिकांश के लिए यह देखना आसान है कि हमारे पास क्या नहीं है। शायद आज आपके पास यह इच्छा करने का कारण हो कि परमेश्वर आपको अभी अधिक स्वास्थ्य या धन, या अधिक समय, या भिन्न सम्बन्ध दे। परन्तु एक क्षण के लिए ठहरें और देखें कि आपके पास क्या है जिसे आप खो नहीं सकते। आप परमेश्वर की मुस्कान का आनन्द लेते हैं। आप कभी भी उसके दण्ड का सामना नहीं करेंगे। यही उसकी प्रतिज्ञा है, और संसार जो कुछ भी दे सकता है, यह उससे कहीं अधिक मूल्यवान है—और जो कुछ वह प्रतिज्ञा करता है, उसे वह पूरा भी करता है।

  यूहन्ना 3:10-21

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 140–142; 2 कुरिन्थियों 12 ◊

3 September : परमेश्वराच्या “मी करीन” अभिव्यक्तीं

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3 September : परमेश्वराच्या "मी करीन" अभिव्यक्तीं
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“यरुशलेमेत माणसे व गुरेढोरे फार झाल्यामुळें भिंती नसलेल्या खेड्यांप्रमाणें तिच्यात वस्ती होईल. परमेश्वर म्हणतो, तिच्या सभोवार मी तिला अग्नीचा कोट होईन, व तिच्या ठायीं मी तेजोरूप होईन.” (जखऱ्या 2:4-5)

असे काहीं पहाटेचे प्रसंग आहेत जेव्हा मला बिछान्यावरून उठताच दुर्बळपणा जाणवतो. म्हणजें असहाय. असे का हे अनेकदा कळत नाहीं. धोका कसलाही नसतो. कसलीही कमजोरी नसते. असते ती केवळ एक अशी स्वरूप नसलेली भावना कीं काहींतरी वाईट होणार आहे आणि त्यासाठीं मीच जबाबदार असेल.

असे सहसा तेव्हां होते जेव्हां माझी बरीच टीका झालेंलीं असते. किंवा कदाचित तेव्हां जेव्हां माझ्याकडून बऱ्याच अपेक्षां केल्यां जातांत ज्यांच्या मुदती ठराविक आहेत आणि त्या पूर्ण करण्याच्या दृष्टीनें खूप मोठ्या आणि खूप जास्त वाटतांत.

जेव्हां मी अशा नियतकालिक पहाटे झालेंल्या प्रसंगावर विचार करतांना  सुमारे 50 वर्षांहून अधिक काळ मागे वळून पाहतो, तेव्हां मला या गोष्टीचे आश्चर्य वाटते कीं कशाप्रकारे प्रभु येशूनें माझ्या जीवनाचा व सेवेचा सांभाळ केला आहे. अशा तणावापासून दूर पळण्याच्या ज्यां परीक्षा माझ्यावर आल्या त्यां कधीही विजयी होऊं शकल्या नाहीं- आजवर तर नाहीं. हे अद्भुत आहे. यासाठीं मी माझ्या महान देवाची उपासना व गौरव करतो.

मला भीतीच्या अर्धांगवायूमध्यें बुडू देण्याऐवजी किंवा मला हिरव्या गवताच्या मृगजळात पळून जाऊ देण्याऐवजी, तो मला जागे करायचा कीं अशा वेळी मी त्याच्याकडें मदतीसाठीं धावा केला पाहिजे आणि नंतर तो मला आपल्या ठोस अभिवचनांची आठवण देऊन उत्तरही द्यायचा.

मी एक उदाहरण देतो. आणि हा प्रसंग नुकताच घडला. मी एका पहाटे उठलो तेव्हां मला भावनिकदृष्ट्या दुर्बळपणा जाणवत होता. असहाय. असुरक्षित. मी प्रार्थना केलीं: “प्रभु मला मदत कर. प्रार्थना कशी करावी हेही मला कळत नाहींये.”

एका तासानंतर मी जखऱ्याचे पुस्तक वाचू लागलो आणि ज्या मदतीसाठीं मी धावा केला होता तिचा शोध घेऊ लागलो. आणि मला ते सहाय्य या वचनांत पुरविण्यात आलें :-

“यरुशलेमेत माणसे व गुरेढोरे फार झाल्यामुळें भिंती नसलेल्या खेड्यांप्रमाणें तिच्यात वस्ती होईल. परमेश्वर म्हणतो, तिच्या सभोवार मी तिला अग्नीचा कोट होईन, व तिच्या ठायीं मी तेजोरूप होईन.” (जखऱ्या 2:4-5)

देवाच्या लोकांची अशी समृद्धी आणि वाढ होईल कीं यरुशलेमेला स्वतः भोवती यापुढे तटबंदी देखील उभारता येणार नाहीं. “माणसे व गुरेढोरे” इतके वाढतील कीं यरुशलेम भिंती नसलेल्या अनेक खेड्यांप्रमाणें होईल.

समृद्धी तर ठीक आहे, पण संरक्षणाचे काय?

वचन 5 मध्यें परमेश्वर याचे उत्तर देतो, “परमेश्वर म्हणतो, तिच्या सभोवार मी तिला अग्नीचा कोट होईन.” होय. बस इतके पुरे आहे. हेच ते अभिवचन आहे. परमेश्वराच्या “मी करीन” यां अभिव्यक्तीं. मला त्याचीच गरज आहे.

आणि जर ते यरुशलेमेच्या असुरक्षित खेड्यांच्या बाबतींत खरे आहे तर मग मी जो देवाचे मुल आहे, ते माझ्या बाबतींत देखील सत्य आहे. मी जुन्या करारातील ही अशी अभिवचनें देवाच्या लोकांवर या  पद्धतीनेच लागू करतो. सर्व अभिवचने मला ख्रिस्ताठायीं होय हेच आहेत (2 करिंथ 1:20). जे ख्रिस्तामध्यें आहेत त्यांच्यासाठीं प्रत्येक वचनानंतर “किती विशेषकरून” अशी घोषणा आहे. देव माझ्या सभोवार “अग्नीचा कोट” होईन. होय. तो होईल. तो झाला आहे. आणि तो पुढेही होईल. 

आणि हे अंशा-अंशाने अधिक चांगले होत जाते. संरक्षणाच्या त्या अग्नी-कोटातून तो म्हणतो, “तिच्या ठायीं मी तेजोरूप होईन.” देव आपलें संरक्षण करण्यासाठीं आपला केवळ अग्नी-कोट बनून तिथेच थांबत नाहीं; तर आपल्याला त्याच्या उपस्थितीचा सुखद आनंद द्यावा हा त्याचा अंतीम हेतू. मला देवाची “मी करीन” ह्या अभिव्यक्तीं खूप आवडतांत!

2 सितम्बर : सुसमाचार का विरोधाभास

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2 सितम्बर : सुसमाचार का विरोधाभास
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“अतः अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं।” रोमियों 8:1

क्या आप कभी अपने आप से निराश होते हैं? शायद आपको लगता है कि पवित्रता की ओर आपकी यात्रा अत्यन्त धीमी और कष्टदायक है। सम्भव है कि न्यूटन के तीसरे नियम का कोई रूप आपके मसीही जीवन पर लागू होता हुआ प्रतीत हो: हर एक विजय के बदले एक समान और विपरीत विफलता।

आप अकेले नहीं हैं। महान प्रेरित पौलुस ने भी पाप के साथ अपने निरन्तर संघर्ष में गहरी निराशा प्रकट की: “मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ! मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?” (रोमियों 7:24)। पौलुस की हताशा की गहराई को पढ़ते हुए यह विचार करना उचित है कि शायद हम पर्याप्त रूप से निराश ही नहीं होते। आखिरकार, अपनी कलीसिया में बाइबल-अध्ययन के दौरान अपनी ही दुष्टता पर विलाप करते हुए चिल्ला उठना तो सामान्य व्यवहार नहीं है!

फिर भी, अपनी निराशा की अवस्था में भी पौलुस जानता था कि पाप, चाहे कितना ही गम्भीर क्यों न हो, अन्तिम निर्णय नहीं देगा—और न दे सकता है। अगले ही पद में आशा प्रकट होती है: “हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्‍वर का धन्यवाद हो!” (रोमियों 7:25)। फिर, अगले वाक्य में समस्या दोहराई जाती है, और हम सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र की सबसे ऊँची चोटियों में से एक पर पहुँचते हैं: रोमियों 8, जो आज के शीर्षक पद की महिमामय प्रतिज्ञा से आरम्भ होता है।

पौलुस अपनी असफलताओं के उत्तर में क्यों कहता है, “परमेश्वर का धन्यवाद हो”? क्योंकि “अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं।” अब भी नहीं, और कभी भी नहीं! यहाँ हमारे सामने सुसमाचार का एक अत्यन्त अद्‌भुत विरोधाभास है: मैं निर्बल हूँ, असफल हूँ, और दोषी हूँ; परन्तु उसी समय, मसीह में मैं सुरक्षित हूँ, दृढ़ हूँ, और प्रेम किया गया हूँ।

यह कैसे हो सकता है? इसका उत्तर पाने के लिए हम रोमियों की पुस्तक में एक और महान “अतः” की ओर देख सकते हैं: “अतः जब हम विश्‍वास से धर्मी ठहरे, तो अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्‍वर के साथ मेल रखें” (रोमियों 5:1)। हम ऐसे अनुग्रह के योग्य नहीं हैं। परमेश्वर न्यायपूर्वक हमें हमारे अभागेपन में डूबने दे सकता था। परन्तु इसके स्थान पर, यीशु के द्वारा वह हमें मेल प्रदान करता है और हमें आशा देता है। हम धर्मी ठहराए गए हैं; यीशु ने हमारा दण्ड अपने ऊपर ले लिया है, ताकि अब, जब उसका पिता हमें देखता है, तो वह यीशु और उसकी सम्पूर्ण सिद्धता को देखता है।

आप और मैं पापी हैं—हाँ, अत्यन्त पापी हैं, और हम अब भी वैसे ही हैं। परन्तु हम सर्वोच्च रीति से प्रेम किए गए हैं, पूर्ण रूप से क्षमा किए गए हैं, और दण्ड के किसी भी खतरे में कभी नहीं हैं। अपनी निरन्तर कमियों और असफलताओं पर होने वाली निराशा को न तो कभी दबाएँ और न ही अनदेखा करें। बल्कि यह आपको कृतज्ञता और विश्राम के साथ यीशु की ओर लौट आने के लिए प्रेरित करे। जितना अधिक हम अपने पाप के प्रति सचेत होंगे, उतना ही अधिक हमें यह सत्य अद्‌भुत प्रतीत होगा कि मसीह यीशु में रहने वालों के लिए दिव्य दण्ड का कोई अंश नहीं है—और न कभी होगा।

  भजन संहिता 103

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 137–139; 2 कुरिन्थियों 11:16-33

2 September : उद्ध्वस्त आणि आनंदित

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2 September : उद्ध्वस्त आणि आनंदित
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“कारण तू आपला देव परमेश्वर ह्याची पवित्र प्रजा आहेस, तू त्याची खास प्रजा व्हावेस म्हणून सार्‍या पृथ्वीवरील राष्ट्रांतून तुझा देव परमेश्वर ह्याने तुला निवडून घेतले आहे.” (अनुवाद 7:6)

कृपेचे सिद्धांत – कीं आमचे तारण हे केवळ देवाच्या सार्वभौम कृपेनेच होते ह्या कॅल्विनवादी शिकवणीसाठीं पारंपारिकरित्या उपयोगांत आणलेली जुनी प्युरिटन संज्ञा (TULIP) – ह्या झाडातील प्रत्येक फांदी जर संत ऑगस्टीन यांच्या आनंदाशी समतुल्य  अशा आनंदाच्या भरात (ज्याला “ख्रिस्ती विश्वासाचा परमानंद म्हणतांत”) डोलत असेल तर या कृपेच्या सिद्धांतांची अनुभूती काय असेल बरे?

  • सार्वत्रिक नैतिक अध:पात (Total depravity) म्हणजें केवळ स्वभावात असलेला वाईटपणा नव्हे, तर देवाचे वैभव पाहण्यापासून आंधळेपण आणि परम आनंद याविषयी मृतावस्था.
  • अटविरहित निवड (Unconditional election)  म्हणजें ख्रिस्तांत असलेला आपला परम आनंद, म्हणजें त्रिएक देव स्वतःमध्यें घेतो तो काठोकाठ आनंद, आपण अस्तित्वात येण्यापूर्वीच आपल्यासाठीं नियोजित करण्यात आला होता.
  • (लोकसंख्येच्या दृष्टिने) मर्यादित प्रायश्चित्त (Limited atonement)  हे या गोष्टीची खात्री आहे कीं देवामध्यें असलेला अविनाशी आनंद नव्या कराराच्या रक्ताद्वारे देवाच्या लोकांसाठीं निर्णायकपणें साध्य करण्यांत आला आहे.
  • अप्रतिकारक कृपा (Irresistible grace)  ही देवाच्या प्रीतिची वचनबद्धता आणि सामर्थ्य आहे ज्याद्वारे आपल्याला ह्या जगातील आत्मघातकीं सुखांना बिलगून राहण्यापासून व अविनाशी असा जो आनंद त्याच्या प्राप्तीसाठीं आपल्याला सार्वभौम सामर्थ्याने बंधमुक्त केलें जाते.
  • पवित्रजनांच्या विश्वासाची चिकाटी (Perseverance of the saints)  हे सर्वसमर्थ देवाचे कार्य आहे जे आपल्याला अति निकृष्ट दर्जाच्या आनंदाच्या कायमस्वरूपी बंधनात पडू देत नाहीं, तर आपल्याला त्याच्या सान्निध्यात विपुल आनंदाचा वारसा मिळावा म्हणून व आपल्याला त्याच्या उजवीकडें असलेले सार्वकालिक सुख प्राप्त व्हावें म्हणून आपल्याला सर्व संकटे व दु:खें यांमध्यें राखून ठेवते.

या पाच मुद्द्यांपैकीं, अटविरहित निवड हा मुद्दा माझ्या जिवाच्या बाबतींत सर्वात कठोर आणि अति गोड असे दोन न्यायनिवाडे देतो. ही निवड अटविरहित आहे हे सत्य माझा सर्व गर्विष्ठपणा उद्ध्वस्त करते (कठोर बाजू); आणि हे कीं ही निवड  मला त्याचे अनमोल धन बनवते (अति गोड बाजू).

यां बायबलसम्मत कृपेच्या सिद्धांतांची एक वैभवी बाजू ही आहे : जे सिद्धांत आमचा  गर्विष्ठपणा उद्ध्वस्त करतांत, तेंच खरे पाहता आपल्याला परम आनंदासाठीं सज्ज करतांत.

जर ही निवड कोणत्याही प्रकारे आमच्यातील सद्गुणांवर अवलंबून असती तर यां वचनाच्या प्रकाशांत जिथें देव म्हणतो कीं “कारण तू आपला देव परमेश्वर ह्याची पवित्र प्रजा आहेस, तू त्याची खास प्रजा व्हावेस म्हणून सार्‍या पृथ्वीवरील राष्ट्रांतून तुझा देव परमेश्वर ह्याने तुला निवडून घेतले आहे” (अनुवाद 7:6), आपण स्वतःला कसे श्रेष्ठ समजू शकतो? परंतु आढ्यता बाळगण्यापासून आपल्याला सुरक्षित ठेवण्यासाठीं, परमेश्वर आपल्याला शिकवतो कीं आपली निवड ही पूर्णपणें अट-विरहित आहे (अनुवाद 7:7-9). “त्यानें एक दयनीय जिवाला आपलें धन असे केलें” असे जे आपण एक भजन गातो अगदी त्याप्रमाणें.

कृपेने झालेंल्या ह्या निवडीची अटविरहित बाजूच आहे — ज्या पाठोपाठ ह्या तारणदायी कृपेचा इतर सर्व अनुक्रम येतो — जी आपल्याला कोणतीही आढ्यता न बाळगू देता अशा दानांचा आनंद घ्यावयांस समर्थ बनविते.

1 सितम्बर : जीवन के लिए धर्मशास्त्र

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1 सितम्बर : जीवन के लिए धर्मशास्त्र
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“परमेश्‍वर से मेरी प्रार्थना है कि क्या थोड़े में क्या बहुत में, केवल तू ही नहीं परन्तु जितने लोग आज मेरी सुनते हैं, इन बन्धनों को छोड़ वे मेरे समान हो जाएँ।” प्रेरितों 26:29


पौलुस का विश्वास जीवन की भट्ठी में तपाया गया था। जब उसके पैरों के नीचे से मानो भूमि खींच ली गई, तब उसने और भी अधिक यह सीखा कि परमेश्वर ही सब बातों पर नियन्त्रण रखता है।

रोम में पौलुस की दो वर्षों की कैद के समय ही उसने इफिसियों, फिलिप्पियों और कुलुस्सियों की कलीसियाओं को, और अपने मित्र फिलेमोन को पत्र लिखे। इसी दुख के काल में परमेश्वर ने उसे यीशु के विषय में यह लिखने के लिए प्रेरित किया, “सब वस्तुएँ उसी में स्थिर रहती हैं” (कुलुस्सियों 1:17)। जब उसने इफिसियों को लिखा, तो उसने उन्हें यह देखने के लिए उत्साहित किया कि जो परमेश्वर सब पर प्रभुता रखता है, उसने सब कुछ यीशु के पैरों तले कर दिया है (इफिसियों 1:22)। ये सत्य केवल कागजी नहीं थे। पौलुस ने अपने जीवन के सबसे कठिन समयों में इन्हीं पर भरोसा रखा।

पौलुस के अनुभवों ने निस्सन्देह उसे यह और गहराई से समझने में सहायता की कि उसे सुसमाचार की आवश्यकता केवल उद्धार के लिए ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जीवन के लिए है। हमें भी प्रतिदिन सुसमाचार की आवश्यकता है—यह शुभ समाचार कि यीशु पापियों के स्थान पर मरा, कि वह हमारे धर्मी ठहराए जाने के लिए जीवित किया गया, और कि उसने हमें पवित्र करने और हमें भर देने के लिए पवित्र आत्मा को भेजा।

सुसमाचार हमारे भीतर यीशु की वापसी की एक आश्वस्त प्रत्याशा उत्पन्न करता है। वह हमें संसार को स्वर्गिक दृष्टिकोण से देखने योग्य बनाता है।
जॉन स्टॉट ने, जिनकी विशाल सामग्री को समेटने और संक्षेप में प्रस्तुत करने की क्षमता अद्वितीय थी, पौलुस की कैद का उसके धर्मशास्त्र पर प्रभाव इस प्रकार संक्षेप में प्रस्तुत किया: “पौलुस का दृष्टिकोण समायोजित हुआ, उसका क्षितिज विस्तृत हुआ, उसकी दृष्टि स्पष्ट हुई और उसकी गवाही समृद्ध हुई।” उसकी जंजीरें निराशा या पश्चात्ताप का कारण नहीं बनीं। बल्कि उसकी परीक्षाएँ, जिन्होंने उसे निर्बलता और परमेश्वर पर निर्भरता की स्थिति में रखा, उसके दृष्टिकोण को बदलने वाला और क्षितिज को प्रकाशित करने वाला माध्यम सिद्ध हुईं। वह एक रोमी राज्यपाल, एक राजा और एक रानी के सामने खड़ा होकर कह सका, जो आपके पास है, उसे आप रख नहीं सकते। जो मेरे पास है, उसे मैं खो नहीं सकता। काश कि आप भी मेरे समान हो जाते—अनुग्रह से बचाए गए पापी, अनन्त जीवन के वारिस। मैं नहीं चाहता कि आप मेरी जंजीरों में मेरे सहभागी बनें, परन्तु मैं चाहता हूँ कि आप मेरे विश्वास में मेरे सहभागी अवश्य बनें।

पौलुस ने उसी सत्य का अनुभव किया जिसे उसने वर्षों पहले रोमियों को लिखा था: “हम जानते हैं कि जो लोग परमेश्‍वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिए सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन्हीं के लिए जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं” (रोमियों 8:28)। यह केवल पौलुस के लिए ही नहीं, बल्कि उन सब के लिए सत्य है जिन्होंने यीशु मसीह में विश्वास रखा है। क्या आप किसी निराशाजनक परीक्षा का सामना कर रहे हैं? साहस रखें! आपके पास वह सब है जिसकी आपको वास्तव में आवश्यकता है, और आप उसे खो नहीं सकते। संसार जो भी धन और सान्त्वना दे सकता है, वह उस धन के सामने कुछ भी नहीं जो आपके पास सुसमाचार में है—“मसीह जो महिमा की आशा है तुम में रहता है” (कुलुस्सियों 1:27)। मसीही धर्मशास्त्र राजमहलों के लिए नहीं, बल्कि कारागार की कोठरी के लिए है, परीक्षाओं के लिए है। सुसमाचार के सत्यों को अपने प्राण को दृढ़ करने और अपने दृष्टिकोण को आकार देने दें, जब आप उस आशा को थामे रहते हैं जिसे मसीह ने आपके लिए मोल लिया है।

प्रेरितों के काम 26:1-29

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 135–136; 2 कुरिन्थियों 11:1-15 ◊

1 September : त्याला योग्य दिसते ते सर्व तो करतो

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1 September : त्याला योग्य दिसते ते सर्व तो करतो
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आमचा देव स्वर्गात आहे; त्याला योग्य दिसते ते सर्व तो करतो. (स्तोत्र 115:3)

हे वचन शिकवते कीं देव ज्या ज्यावेळी एखादे कार्य करतो, तो ते त्याला योग्य दिसते त्याप्रमाणें करतो.

देवाला ज्या गोष्टीचा तिटकारा वाटतो ती करण्यास तो बंधनकारक नाहीं. त्याच्यावर असला प्रसंग कधीही येत नाहीं जिथे त्याला एखाद्या गोष्टीचा एकमात्र तोडगा काढण्यासाठीं असे काहींतरी करणें भाग पडते जे त्याला योग्य दिसत नाहीं.

त्याच्या इच्छेस येईल ते तो करतो. आणि म्हणूनच, एका अर्थाने, तो जे काहीं करतो त्यापासून  त्याला आनंद होतो.

हे असे ज्ञान आहे कीं आपण देवासमोर नतमस्तक होऊन त्याच्या सार्वभौम स्वातंत्र्याची स्तुती करण्यास प्रवृत्त झालों पाहिजे – म्हणजें असे कीं, त्याला जे योग्य व संतुष्टीदायक आहे त्यावर अंमलबजावणी करून तो नेहमी आपल्या स्वतंत्र इच्छेनुसार  स्वत: च्या “सत्संकल्पाप्रमाणें” सर्वकाहीं करतो.

देव कधीच कुठल्याही परिस्थितीला बळी पडत नाहीं. त्याच्यावर अशी परिस्थिती कधीही उद्भवत नाहीं जी त्याला असे काहींतरी करण्यांस आवरून धरते ज्यामध्यें तो आनंद करू शकत नाहीं. त्याचा उपहास व्हायचा नाहीं. गुप्तपणें फासा मांडून त्याला अडकविले जाऊ शकत नाहीं, किंवा त्याच्या इच्छे विरुद्ध काहीं करण्यांस त्याच्यावर दबाव टाकला जाऊ शकत नाहीं.

देवासाठीं एका अर्थाने सर्वात कठीण जर एखादी गोष्ट असेल जी त्यानें इतिहासात एका समयी केलीं तर ती म्हणजें, जेव्हां त्यानें “आपल्या स्वतःच्या पुत्रास राखून” ठेविले नाहीं (रोम 8:32). देव स्वतंत्र होता आणि त्याला जे योग्य दिसायचे ते सर्व तो करत असे. पौल म्हणतो कीं ख्रिस्तानें मरण सोसून जेव्हां स्वतःला अर्पण केलें, ते त्यानें “देवाला सुवास मिळावा म्हणून स्वत:ला आपल्याकरता अर्पण व यज्ञ म्हणून दिलें” होते (इफिस 5:2). जगात घडलेले हे महापाप, आणि हे महामरण, व सर्वात कठीण अशी देवाची ही कृती, हे सर्व गोपनीय दृष्ट्या पित्याला जे योग्य दिसते त्याप्रमाणेंच झालें.

आणि कॅल्वरीच्या कृसाकडें जात असतांना, साक्षांत देवदूतांचे सैन्य त्याची सेवा करीत होते. “कोणी [माझा जीव]  माझ्यापासून घेत नाहीं, तर मी होऊनच तो देतो” (योहान 10:18) — त्याला जे योग्य दिसले — आणि इब्री 12:2 म्हणते त्याप्रमाणें हे सर्व त्यानें “जो आनंद त्याच्यापुढे होता” त्यासाठीं केलें. विश्व-इतिहासाची ही वेळ जिथे असें दिसत होते कीं जणू येशूला फासा मांडून अडकविले गेलें, त्या सर्व घटनाक्रमावर पूर्णपणें त्याचेच आधिपत्य होते आणि त्याला जे योग्य दिसलें तेच तो करत होता – म्हणजें आम्हां अनीतिमानांना नीतिमान ठरविण्यात देवाच्या नीतिमत्वाचे गौरव व्हावें म्हणून त्यानें मरण पत्करले.

तर, आपण भय व आदर मानूं. आणि “आमचा देव स्वर्गात आहे; त्याला योग्य दिसते ते सर्व तो करतो” यावर देवाच्या सार्वभौमत्वाविषयी आपल्या स्तुतीचाच नाहीं तर आम्हांसाठीं ख्रिस्ताच्या मृत्यूद्वारे जे तारण साध्य करणांत आलें त्याचा पाया देखील यावरच बांधलेला आहे, हे जाणून आपण थरथर कापूं: