“तब हन्ना ने प्रार्थना करके कहा, ‘मेरा मन यहोवा के कारण मगन है; मेरा सींग यहोवा के कारण ऊँचा हुआ है। मेरा मुँह मेरे शत्रुओं के विरुद्ध खुल गया, क्योंकि मैं तेरे किए हुए उद्धार से आनन्दित हूँ।’” 1 शमूएल 2:1
परमेश्वर की जितनी स्तुति की जाए उतनी कम है और उसके लोगों के प्रति उसके प्रेम को देखकर अपने हृदयों में जितना आनन्दित हुआ जाए उतना कम है। जब हम अपने जीवनों में परमेश्वर का कार्य देखते हैं, तो हमें तुरन्त उसकी स्तुति करनी चाहिए; परन्तु साथ ही हमें उस आशीष को उसके लोगों के प्रति सामूहिक भलाई के सन्दर्भ में भी देखना चाहिए। हम यह बात पवित्रशास्त्र में बार-बार देखते हैं। उदाहरण के लिए, 1 शमूएल में, जब हन्ना ने सहायता के लिए यहोवा से विनती की, तो उसने ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जो केवल उसकी व्यक्तिगत परिस्थिति से नहीं, बल्कि परमेश्वर के लोगों से जुड़े थे: “हे सेनाओं के यहोवा . . .” (1 शमूएल 1:11)। उसकी विनती यह थी कि परमेश्वर उस पर वैसी ही दृष्टि करे जैसी उसने अतीत में अपने लोगों पर की थी।
जब परमेश्वर ने उसे वह पुत्र दिया जिसकी वह लालसा करती थी, तो उसका धन्यवाद इस्राएल की महान छुड़ौती के अवसरों की भाषा में गूँज उठा। जब परमेश्वर के सामर्थ्य से उसके लोग मिस्र की दासता से छुड़ाए गए थे, तब मूसा ने गीत गाया था, और मरियम ने अपनी डफली के साथ नृत्य में अगुवाई की थी (निर्गमन 15)। हन्ना के पास भी गाने के लिए एक गीत था—या कहें, तो धन्यवाद की एक प्रार्थना थी। और उसकी प्रार्थना उसकी व्यक्तिगत परिस्थितियों की सीमाओं को पार कर गई। वह इस बात से आनन्दित हुई कि जो कुछ परमेश्वर ने उसके लिए व्यक्तिगत रूप से किया था, उसका सम्बन्ध उस कार्य से था जो वह अपने लोगों के लिए सामूहिक रूप से कर रहा था।
ऐसा करते हुए उसका मन मगन हो उठा। जब बाइबल में “मन” शब्द का प्रयोग होता है, तो वह हमारे अस्तित्व के केन्द्र की बात करता है, जिसमें हमारा हृदय, हमारी इच्छा और हमारी भावनाएँ सम्मिलित हैं। इसलिए जब हन्ना ने कहा, “मेरा मन यहोवा के कारण मगन है,” तो वह यह व्यक्त कर रही थी कि उसके अस्तित्व का केन्द्र परमेश्वर की महानता में डूब गया था। उसके हृदय की परिपूर्णता से उसका मुँह बोला।
जैसे हन्ना ने सम्भवतः मरियम के उदाहरण में आनन्द पाया होगा, वैसे ही हन्ना की प्रार्थना के लगभग एक हज़ार वर्ष बाद एक और स्त्री ने इसी प्रकार परमेश्वर के लिए गीत गाया। यीशु का माता मरियम निश्चय ही हन्ना की प्रार्थना को जानती थी और सम्भव है कि उसने उसमें से कुछ शब्द भी लिए होंगे, और इस प्रकार उस परम्परा को आगे बढ़ाया जिसे हम “मैग्निफ़िकैट” के नाम से जानते हैं (लूका 1:46-55)।
और हम क्या करते हैं? जब परमेश्वर हमारे जीवनों में व्यक्तिगत रूप से और अपने लोगों में सामूहिक रूप से कार्य करता है, तो क्या हम भी ऐसे ही उल्लास से प्रत्युत्तर देते हैं? या कहीं ऐसा तो नहीं कि हमें हन्ना की स्तुति कुछ अधिक लगती है? यदि कोई “मरियम” उठकर डफली बजाने लगे, तो हम कैसी प्रतिक्रिया देंगे? कभी-कभी हम अपनी स्तुति में बहुत मापे-तौले हुए, या केवल औपचारिक हो जाते हैं। हम कलीसिया में प्रभु की सामर्थ्य, शक्ति, भलाई और करुणा के विषय में गीत गाते हैं, और फिर भी हम अपने मुँह ठीक से खोलकर गाते या मुस्कराते तक नहीं। हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि हम किसी दार्शनिक विचार, किसी अवधारणा, या अपने भीतर पाई जाने वाली किसी बात से व्यवहार नहीं कर रहे। नहीं, हम जीवित परमेश्वर के विषय में गा रहे हैं और उससे प्रार्थना कर रहे हैं, जो अपने लोगों की ओर से और उनके लिए कार्य करता है!
इसलिए, मरियम, हन्ना और यीशु की माता मरियम की तरह, अपने जीवन में परमेश्वर की योजनाओं और कार्यों को अपनाएँ। प्रार्थना में तत्पर रहें, स्तुति में तत्पर रहें, और दोनों में हृदय से जुड़े रहें। आज समय निकालें कि आपका हृदय यहोवा में मगन हो जाए!
1 शमूएल 2:1-10
◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 148–150; यूहन्ना 1:29-51