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26 फरवरी : चोट पहुँचाने वाले शब्द

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26 फरवरी : चोट पहुँचाने वाले शब्द
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“जीभ भी एक आग है; जीभ हमारे अंगों में अधर्म का एक लोक है, और सारी देह पर कलंक लगाती है, और जीवन–गति में आग लगा देती है, और नरक कुण्ड की आग से जलती रहती है . . . पर जीभ को मनुष्यों में से कोई वश में नहीं कर सकता।”  याकूब 3:6, 8

तीन वस्तुएँ कभी लौटकर नहीं आतीं: चला हुआ तीर, बोला हुआ शब्द और खोया हुआ अवसर। हम जो बोलते हैं, उसे वापस नहीं लिया जा सकता। इसके अतिरिक्त, हमें अपने द्वारा बोले गए प्रत्येक शब्द का न्याय के दिन लेखा देना होगा, यहाँ तक कि हमारे लापरवाह शब्दों का भी (मत्ती 12:36 देखें)। जैसा कि राजा सुलैमान ने कहा, “जो अपने मुँह की चौकसी करता है, वह अपने प्राण की रक्षा करता है, परन्तु जो गाल बजाता है उसका विनाश हो जाता है” (नीतिवचन 13:3); और “जीभ के वश में मृत्यु और जीवन दोनों होते हैं” (नीतिवचन 18:21)। हमारे शब्द प्रोत्साहित करने, पोषण करने और चंगा करने का काम कर सकते हैं। परन्तु वे झगड़े कराने, मतभेद उत्पन्न करने और हानि पहुँचाने का कारण भी बन सकते हैं। सुलैमान हमें ऐसे हानिकारक शब्दों का बहुआयामी चित्रण प्रदान करता है। वह हानि पहुँचाने वाले शब्दों को बिना सोचे-समझे बोले गए “तलवार के समान चुभने वाले” (नीतिवचन 12:18) शब्दों के रूप में वर्णित करता है। हमारे शब्द प्रायः बिना सोचे-समझे निकल जाते हैं और हम ऐसे व्यक्ति बन जाते हैं जो “बिना बात सुने उत्तर देते हैं” (नीतिवचन 18:13)। “जहाँ बहुत बातें होती हैं, वहाँ अपराध भी होता है” (नीतिवचन 10:19)।

हो सकता है कि आपने यह कहावत सुनी होगी कि लाठी और पत्थर तो हमारी हड्डियाँ तोड़ सकते हैं, किन्तु शब्द हमें कभी हानि नहीं पहुँचा सकते, किन्तु यह बात पूरी तरह गलत है। खरोचें मिट सकती हैं और उनके निशान भुलाए जा सकते हैं, परन्तु हमसे कहे गए और हमारे लिए कहे गए चोट पहुँचाने वाले शब्द लम्बे समय तक हमारे साथ रहते हैं। ये पंक्तियाँ अधिक सच बोलती हैं:

बिना सोचे-समझे बोला गया एक शब्द झगड़े को भड़का सकता है,

एक क्रूर शब्द जीवन का नाश कर सकता है,

एक कड़वा शब्द घृणा उत्पन्न कर सकता है,

एक कठोर शब्द कष्ट दे सकता है और मार सकता है।

यह अनुमान लगाना कठिन होगा कि हानिकारक शब्दों के कारण कितनी दोस्तियाँ टूट जाती हैं, कितने लोगों की प्रतिष्ठा का नाश हो जाता है, और कितने घरों की शान्ति खण्डित हो जाती है। याकूब के अनुसार ऐसे सभी बैरभाव और अपमानजनक भाषा का स्रोत कोई और नहीं परन्तु नरक ही है। हाँ, हमारी जीभ “एक आग” है और परमेश्वर के पवित्र आत्मा के कार्य के बिना “मनुष्यों में से कोई भी जीभ को वश में नहीं कर सकता।”

रुकें और सोचें कि आपने पिछले 24 घण्टों में कितने शब्दों का प्रयोग किया होगा और उनका प्रयोग कैसे किया होगा। “मृत्यु और जीवन जीभ के वश में होते हैं,” तो क्या आपके किसी शब्द ने किसी दूसरे को किसी तरह से नीचा दिखाने के द्वारा उसको हानि पहुँचाई होगी? यह एक ऐसा पाप है, जिसका पश्चाताप किया जाना चाहिए और जिससे दूर हट जाना चाहिए। क्या परमेश्वर के सामने और उस व्यक्ति के सामने, जिससे वे शब्द कहे गए थे, आपको यह कार्य करने की आवश्यकता है?

अब उन शब्दों के बारे में सोचें जो आप अगले 24 घण्टों में बोल सकते हैं। उनका उपयोग जीवन पहुँचाने के लिए कैसे किया जा सकता है? आप ऐसा व्यक्ति कैसे बन सकते हैं, जिसने “न तो पाप किया और न उसके मुँह से छल की कोई बात निकली”? इसके विपरीत, “वह गाली सुनकर गाली नहीं देता था, और दुख उठाकर किसी को भी धमकी नहीं देता था . . . वह आप ही हमारे पापों को लिए हुए चढ़ गया . . . जिससे हम पापों के लिए मरकर धार्मिकता के लिए जीवन बिताएँ” (1 पतरस 2:22-24)।   याकूब 3:2-12

25 फरवरी : तेज दौड़ें

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25 फरवरी : तेज दौड़ें
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“क्या तुम नहीं जानते कि दौड़ में तो दौड़ते सब ही हैं, परन्तु इनाम एक ही ले जाता है? तुम वैसे ही दौड़ो कि जीतो। हर एक पहलवान सब प्रकार का संयम करता है; वे तो एक मुरझाने वाले मुकुट को पाने के लिए यह सब करते हैं, परन्तु हम तो उस मुकुट के लिए करते हैं जो मुरझाने का नहीं। इसलिए मैं तो इसी रीति से दौड़ता हूँ, परन्तु लक्ष्यहीन नहीं।”  1 कुरिन्थियों 9:24-26

नए नियम के समय पूर्वी रोमी साम्राज्य में व्याप्त यूनानी संस्कृति में खेलों की प्रतियोगिताएँ महत्त्वपूर्ण हुआ करती थीं। एक टीकाकार ने कुरिन्थुस को एक ऐसे शहर के रूप में वर्णित किया है, जहाँ लोग केवल दो वस्तुओं की माँग करते थे, रोटी और खेल।[1]

छोटे स्तर की स्थानीय प्रतियोगिताओं में कई पुरस्कार दिए जाते थे, परन्तु प्रमुख आयोजनों में केवल एक ही पुरस्कार होता था जो कि प्रायः लॉरेल (कल्पवृक्ष) या पाइन (देवदार) के मुकुट होते थे। प्रतियोगी अपने जीवन के कई महीने उन सभी बातों से दूर रहते थे, जिनका वे अन्यथा आनन्द लिया करते थे, जिनमें सम्बन्ध, भोजन वस्तुएँ और खाली समय में की जाने वाली वे सभी गतिविधियाँ शामिल होती थीं, जो उनकी जीतने की क्षमता को कम कर सकती थीं, जिससे उनकी दृष्टि कल्पवृक्ष के मुकुट पर टिकी रहे। पौलुस इस चित्रण का उपयोग करके विश्वासियों को मसीह की महिमा करने और उसके साथ एक होने के अनन्त पुरस्कार पर दृष्टि बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करता है।

विद्यालय के खुले मैदानों में होने वाली दौड़ें, जिनका आरम्भ तो एक बड़े झुण्ड के रूप में होता है, प्रायः शीघ्र ही तीन छोटे समूहों में बँट जाती हैं। इनमें से एक छोटे समूह का लक्ष्य स्वर्ण पदक जीतना होता है, उसके बाद वाले धावकों का बड़ा समूह “केवल दौड़ने” के लिए दौड़ रहा होता है, और जो पीछे रह जाते हैं वे सामान्यतः दोष ढूँढने वाली, अशान्त, आशा-रहित, दुखी आत्माएँ होती हैं। इस पद में पौलुस द्वारा प्रयुक्त शब्द “दौड़ना” का आशय न तो पीछे रह जाने वाले के रूप में दौड़ने से है, न ही बिना लक्ष्य के दौड़ने से और न ही आधे-अधूरे मन से दौड़ने से है, बल्कि पुरस्कार विजेता के रूप में दौड़ने से है। मसीहियों के रूप में हमें लक्ष्यहीन नहीं दौड़ना चाहिए। हमें स्वर्ण पदक प्राप्त करने के लिए प्रयास करना चाहिए। पुरस्कार पर ध्यान देते हुए जीने के लिए बलिदान की आवश्यकता होती है। विशेष रूप से, ऐसी किसी भी इच्छा का बलिदान, जो परमेश्वर की इच्छा के विपरीत हो। पद 25 में “पहलवान” शब्द का अनुवाद यूनानी शब्द एगोनिज़ोमेनोस  से किया गया है, जिससे हमें हिन्दी का “पीड़ा” शब्द मिलता है। खिलाड़ी होने का आशय है सुविधाजनक रीति से न रहने के विकल्प को चुनना। मसीही होना भी ऐसे ही विकल्प को चुनना है। क्या हम मसीह के लिए पीड़ा सहने और बलिदान देने के लिए तैयार हैं, यह जानते हुए कि तभी हम उसके लिए अच्छी तरह से जीए गए जीवन का पुरस्कार जीतने के आनन्द का अनुभव कर सकेंगे।

परन्तु हम इस तरह का बलिदान कैसे दें या इस तरह के ध्यान के साथ कैसे दौड़ें? ऐसा हम अपनी स्वयं की क्षमता या आत्म-धार्मिकता के बल पर नहीं कर पाएँगे। यह तो झूठे धर्म की आत्मा और सार है। कदापि नहीं, केवल मसीह के साथ हमारा मिलन ही हमें इस परिवर्तन के लिए सामर्थ्य और क्षमता प्रदान करता है। यीशु ने अनन्त पुरस्कार को ध्यान में रखते हुए स्वेच्छा से बलिदान हो जाने का उदाहरण प्रस्तुत किया है (इब्रानियों 12:2)। जब वह हमारे हृदय और जीवन को नया आधार प्रदान करता है, तो हम उसके लिए दौड़ते हुए और उसके पीछे चलते हुए जितनी दूर तक आनन्दपूर्वक जा सकते हैं, उसकी कोई सीमा नहीं है।

जब स्कॉटलैण्ड के रहने वाले प्रसिद्ध ओलम्पिक खिलाड़ी और मिशनरी एरिक लिडेल से उस दौड़ की योजना के बारे में पूछा गया जिसमें उन्होंने 1924 के ओलम्पिक में 400 मीटर में स्वर्ण पदक जीता था, तो उन्होंने यह उत्तर दिया था, “मैं पहले 200 मीटर जितना हो सके उतनी तेजी से दौड़ता हूँ। फिर शेष 200 मीटर के लिए परमेश्वर की सहायता से मैं और भी तेज दौड़ता हूँ।” तो फिर आज लक्ष्यहीन या धीरे-धीरे न दौड़ें, बल्कि परमेश्वर की सहायता से उसके लिए और उसकी महिमा के लिए स्वर्ण पदक पाने के लिए और भी तेज दौड़ें।

 इब्रानियों 12:1-3

24 फरवरी : चुप्पी में से आशा

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24 फरवरी : चुप्पी में से आशा
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देखो, मैं अपने दूत को भेजता हूँ, और वह मार्ग को मेरे आगे सुधारेगा, और प्रभु, जिसे तुम ढूँढ़ते हो, वह अचानक अपने मन्दिर में आ जाएगा; हाँ, वाचा का वह दूत, जिसे तुम चाहते हो, सुनो, वह आता है, सेनाओं के यहोवा का यही वचन है।”  मलाकी 3:1

परमेश्वर के लोग प्रतीक्षा करने वाले लोग हैं।

बेबीलोन में अपनी बँधुआई से परमेश्वर के लोगों के लौटने के बाद “लघु भविष्यद्वक्ता” हाग्गै, जकर्याह और मलाकी उनके पास परमेश्वर का वचन लेकर आए। उनका सन्देश वैसा ही था, जैसा उनके पहले के भविष्यद्वक्ताओं ने लोगों के बन्दी बनाए जाने से पहले कहा था कि तुम इस्राएली लोग मूर्ख हो! तुम वाचा को तोड़ते रहते हो। और यदि तुम वाचा को तोड़ते रहोगे, तो परमेश्वर न्याय लेकर आएगा।

लेकिन लघु भविष्यद्वक्ताओं का सन्देश केवल  न्याय के बारे में नहीं था। उसमें आशा भी थी।

वे भले ही शारीरिक रूप से देश में लौट आए थे, किन्तु आत्मिक रूप से वे लोग अभी भी बँधुआई में थे। इस्राएल का जो कुछ बचा था, अर्थात् यहूदा, इस आशा को थामे रहा कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करेगा, जिससे कि उसके लोग उसकी आशिषों का आनन्द उठा सकें। परन्तु परमेश्वर का राज्य अभी भी उस तरह से नहीं आया था, जैसा कि पहले के भविष्यद्वक्ताओं ने घोषित किया था क्योंकि परमेश्वर का राजा अभी तक नहीं आया था। इसलिए लोग प्रभु के लौटने और उद्धार की सभी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने की प्रतीक्षा कर रहे थे।

पुराने नियम का अन्तिम भविष्यद्वक्ता, मलाकी, दृढ़ता से कहता रहा कि वह राजा आएगा, परन्तु उसके बाद भी 400 वर्षों तक चुप्पी बनी रही। लोग पैदा होते रहे, अपने सामान्य कार्यों को करते रहे, कारोबार करते रहे, मर गए, और यह चक्र इसी प्रकार चलता रहा। हो सकता है कि उन्होंने एक-दूसरे से पूछा हो, “उन शब्दों का क्या हुआ कि ‘मैं अपने दूत को भेजूँगा, और वह मार्ग को मेरे आगे सुधारेगा’? उस प्रतिज्ञा को तो सदियाँ बीत चुकी हैं।”

अन्ततः हो सकता है कि उनमें से कुछ लोग बाजार की ओर जा रहे होंगे जब विचित्र कपड़े पहने और विचित्र भोजन खाने वाला एक असामान्य सा दिखने वाला व्यक्ति सड़कों पर दिखाई दिया होगा, जो पुराने नियम में लिखी बातें बोल रहा था, “देख, मैं अपने दूत को तेरे आगे भेजता हूँ, जो तेरे लिए मार्ग सुधारेगा। जंगल में एक पुकारने वाले का शब्द सुनाई दे रहा है कि प्रभु का मार्ग तैयार करो, और उसकी सड़कें सीधी करो” (मरकुस 1:2-3)। इन शब्दों के साथ यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने पीढ़ियों की चुप्पी तोड़ दी। कई वर्षों की प्रतीक्षा के बाद परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने में विश्वासयोग्य रहा, जैसा कि वह सदा से है। उसने अपने दूत और अपने राजा दोनों को भेजा कि सभी लोग उसकी आशीष का अनुभव कर सकें, अर्थात्, यीशु मसीह के द्वारा उद्धार की पूर्ति का अनुभव कर सकें।

हमारे दिनों में परमेश्वर के लोग अभी भी प्रतीक्षा कर रहे हैं। हम जानते हैं कि यीशु आ चुका; हम यह भी जानते हैं कि वह आने वाला है। परमेश्वर का राज्य अभी तक अपनी पूर्ण महिमा में नहीं आया है। इस कारण, तात्कालिक आनन्द की प्राप्ति के इच्छुक इस संसार में हम धीरज के साथ प्रतीक्षा करने वाले लोग हैं और एक ऐसे संसार में जहाँ लोगों की आशा तीव्रता से भंग हो जाती है, हम धीरज के साथ आशा रखने वाले लोग हैं। जब ऐसा लगे कि परमेश्वर आपके जीवन में अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने में बहुत अधिक समय ले रहा है, तब भी आशा मत खोइए। पीढ़ी से पीढ़ी तक वह विश्वासयोग्य रहा है और यीशु को भेजने के द्वारा उसने प्रत्येक प्रतिज्ञा को पूरा करने वाले का परिचय भी दे दिया है। आप उसकी समरूपता में विश्राम कर सकते हैं। “हाँ,” यीशु कहता है, “मैं शीघ्र आने वाला हूँ” (प्रकाशितवाक्य 22:20)। वह वही करेगा जो उसने कहा है।      2 पतरस 3:1-13

23 फरवरी : उसके स्वरूप में होना

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23 फरवरी : उसके स्वरूप में होना
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“जिन्हें उसने पहले से जान लिया है, उन्हें पहले से ठहराया भी है कि उसके पुत्र के स्वरूप में हों, ताकि वह बहुत भाइयों में पहिलौठा ठहरे।”  रोमियों 8:29

जो दम्पति बहुत अधिक समय से विवाहित हैं, उनसे यह अक्सर ही पूछ लिया जाता है कि क्या वे भाई-बहन हैं, क्योंकि उन्होंने एक-दूसरे के कई गुण अपना लिए होते हैं।

आंशिक रूप से यह बात तर्कसंगत भी है, है न? हम जिस तरह की संगति में रहते हैं, हम वैसे ही बन जाते हैं। मसीह के साथ चलने में भी हमारे लिए यही बात सत्य ठहरनी चाहिए।

आपके जीवन के लिए परमेश्वर का उद्देश्य है आपको उसके पुत्र के स्वरूप की समानता में ढालना। इस बारे में सोचकर देखें। यीशु की मानवीय पूर्णताओं पर विचार करें और अनुभव करें कि आपको उसके जैसे बनने का अवसर मिल जाए! परमेश्वर इसके लिए गम्भीरतापूर्वक प्रतिबद्ध है; यह एक ऐसा कार्य है जिसे वह “यीशु मसीह के दिन तक पूरा करने” की प्रतिज्ञा करता है (फिलिप्पियों 1:6)। परमेश्वर आज के दिन क्या कर रहा है? हम सरल शब्दों में इसका सार इस तरह से प्रस्तुत सकते हैं कि वह हमें मसीह की समानता में और अधिक बना रहा है।

हममें से बहुत से लोग रोमियों 8:28 के आश्वासन से परिचित हैं, “जो लोग परमेश्‍वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिए सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन्हीं के लिए जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं।” परन्तु इसके बाद का पद हमें बताता है कि हमारा सर्वशक्तिमान परमेश्वर हमारे जीवन के सभी पहलुओं में किस “भलाई” को उत्पन्न कर रहा है। वह यह है कि वह हमें “उसके पुत्र के स्वरूप में” ढाल रहा है।

परमेश्वर आपकी सुख-सुविधाओं से कहीं अधिक आपके मसीह-समान होने की चिन्ता करता है। सफलता और हँसी की तुलना में प्रायः निराशा और असफलता के द्वारा अधिक आत्मिक प्रगति होती है। ऐसा नहीं है कि हम कष्ट को ढूँढ-ढूँढ कर खोजने लगें, हम यह मान सकते हैं कि हमारा पिता बेहतर जानता है तथा कोई भी बात उसे आश्चर्यचकित नहीं करती है। जब हम किसी ऐसी प्रार्थना का अनुभव करते हैं, “जिसका उत्तर नहीं मिला” या जब हमारी चुनौतियाँ और पीड़ाएँ हमारी इच्छा से कहीं अधिक लम्बे समय तक बनी रहती हैं, उस समय हमें यह देखने में आशा मिलती है कि परमेश्वर का अनन्त उद्देश्य उसकी सन्तानों के जीवन में और उनके जीवनों के द्वारा पूरा हो रहा है।

आप और मैं अकेले नहीं हैं, जिन्होंने निःशब्द आशाहीनता का सामना किया है या जो अभी भी निराशा भरे समय में से होकर जा रहे हैं, जब हम यह पूछने के प्रलोभन में आ जाते हैं कि “परमेश्वर क्या कर रहा है? ” जब स्तिफनुस के सताने वालों ने अपने कपड़े उतारे और उस पर पथराव करने लगे तब वह क्या कर रहा था (प्रेरितों 7:58)? जब पौलुस को दमिश्क से बाहर निकलना पड़ा, उसे टोकरे में बैठाया गया और शहरपनाह पर से लटकाकर उतारा गया (9:25), तब वह क्या कर रहा था? जब पतरस को राजा हेरोदेस ने बन्दी बना लिया था (12:3), तब वह क्या कर रहा था? यह देखना भले ही कठिन हो, किन्तु परमेश्वर अपनी अनन्त योजना को पूरा कर रहा था, अर्थात् अपने अनुयायियों को यीशु के समान बना रहा था, जब वे यीशु के पास अपने घर जा रहे थे।

हर सवेरे जागते समय आपकी आशा का स्रोत यही होता है। चाहे बारिश हो या धूप, चाहे हर्ष हो या निराशा, परमेश्वर निश्चित रूप से दिन भर आपके जीवन में अपने उद्देश्यों को पूरा करेगा। आपके स्वर्गिक पिता के पास उस प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक योजना और उद्देश्य है, जिसे वह अपना कहता है। हो सकता है कि आप उसके द्वारा कार्य के होते समय देख सकें कि वह इसे कैसे कर रहा है, या कुछ महीनों बाद देखने पाएँ, या सम्भव है कि तब तक न देख पाएँ जब तक आप अनन्त काल में मसीह के साथ खड़े नहीं हो जाते। किन्तु यह बात जान लें कि आज एक और दिन है, जब आपका पिता आपको अपने पुत्र की समानता में बना रहा है।      

रोमियों 8:26-39

22 फरवरी : परमेश्वर को जानना

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22 फरवरी : परमेश्वर को जानना
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“तब उन्हें फिर एक दूसरे से यह न कहना पड़ेगा कि यहोवा को जानो, क्योंकि, यहोवा की यह वाणी है, छोटे से लेकर बड़े तक, सब के सब मेरा ज्ञान रखेंगे।”  यिर्मयाह 31:34

यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता के दिनों में परमेश्वर ने अपने लोगों के साथ की गई वाचा को तोड़ने से इनकार कर दिया। यद्यपि उसकी महा करुणा के होने पर भी परमेश्वर के लोग पाप करते रहे। इससे एक समस्या उत्पन्न हो गई कि परमेश्वर अपने लोगों को आशीषित करने की अपनी प्रतिज्ञाओं को कैसे पूरा कर सकता था, जब कि वे लगातार उसके साथ विश्वासघात करते जा रहे थे?

अपनी महान योजना के एक भाग के रूप में परमेश्वर ने एक नई वाचा की प्रतिज्ञा की कि वह आन्तरिक पुनर्निर्माण का कार्य करेगा। जैसा कि थियोलॉजियन ऐलेक मौटियर लिखते हैं, “जब उसके लोग उसके मानकों की ऊँचाई तक नहीं पहुँच पाते हैं, तो प्रभु उनकी क्षमता के अनुरूप अपने मानकों को कम नहीं कर देता, बल्कि वह अपने लोगों को ही पूरी तरह से बदल देता है।”[1]

यह नई वाचा प्रभु यीशु के लहू के द्वारा हृदयों को नया जीवन प्रदान करने की परमेश्वर की योजना और प्रतिज्ञा है। जैसे किसी पहेली में एक टुकड़ा बिठाना हो, वैसे ही वह हमारे हृदयों को लेता है और उन्हें ऐसा सिद्ध आकार देता है कि उसकी व्यवस्था हमारे लिए हर्ष की बात बन जाती है।

परमेश्वर द्वारा इस नई वाचा का वर्णन किए जाने में क्रिया शब्द “जानना” ही कुंजी है। मूल इब्रानी भाषा में उत्पत्ति की पुस्तक के आरम्भ में ही इसका अर्थ स्पष्ट है। यह स्पष्ट वक्तव्य कि आदम ने अपनी पत्नी को “जाना” और उनके बच्चे हुए (उत्पत्ति 4:1), यह दर्शाता है कि यह कितनी निकटता व्यक्त करता है। परमेश्वर कह रहा है कि जब उसके लोग उसके प्रेम को समझ जाएँगे, तो वे केवल दूर से बाइबल अध्ययन नहीं करेंगे; वे ऐसे लोग बन जाएँगे जो वास्तव में उसे जानते होंगे।

यिर्मयाह जिस बात को भविष्य काल में कह रहा था, हम वर्तमान में उसका आनन्द लेने में सक्षम हैं, क्योंकि उसकी भविष्यद्वाणी और हमारे समय के बीच प्रभु यीशु ने मरने से एक रात पहले कटोरा लिया और कहा, “यह कटोरा मेरे उस लहू में, जो तुम्हारे लिए बहाया जाता है, नई वाचा है” (लूका 22:20)। परमेश्वर के अनुग्रह से आप और मैं राजाओं के राजा और प्रभुओं के प्रभु को जान सकते हैं। इतना ही नहीं, बल्कि वह हम में से प्रत्येक को व्यक्तिगत रूप से नाम से जानता है और हमारी आवश्यकताओं को भी जानता है तथा हमारी भलाई के लिए प्रतिबद्ध है। यीशु पिता के समक्ष हमारे नाम की साक्षी देता है, और वह जो कुछ भी है और उसने जो कुछ भी किया है उसके कारण हमारे नाम जीवन की पुस्तक में लिखे गए हैं।

यह किस तरह का राजा है? इसका उत्तर पूरी तरह से समझ पाना हमारी क्षमता से परे है। एक दिन हम उसे आमने-सामने देखेंगे और आज की तुलना में कहीं अधिक समझ सकेंगे। परन्तु फिर भी, आज आप उस हियाव के साथ आगे बढ़ सकते हैं, जो इस बात को जानने से आता है कि आप उस परमेश्वर को जानते हैं, जिसने आपको अपने पुत्र के द्वारा छुटकारा दिलाया है, जो अपने आत्मा के द्वारा आप में वास करता है और कार्य करता है, और जिसके सिंहासन के कक्ष में एक दिन आप खड़े होंगे।

यिर्मयाह 31:31-40

21 फरवरी : तुम में ऐसा नहीं है

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21 फरवरी : तुम में ऐसा नहीं है
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“यीशु ने उनको पास बुलाकर उनसे कहा, ‘तुम जानते हो कि जो अन्यजातियों के हाकिम समझे जाते हैं, वे उन पर प्रभुता करते हैं; और उनमें जो बड़े हैं, उन पर अधिकार जताते हैं। पर तुम में ऐसा नहीं है।’”  मरकुस 10:42-43

लगभग प्रत्येक पीढ़ी में पाया जाने वाला एक बड़ा झूठ यह है कि परमेश्वर के लोग अपने अविश्वासी पड़ोसियों तक सुसमाचार पहुँचाने में अधिक सफल तब होंगे, जब वे अधिक से अधिक उनके जैसे दिखेंगे, बोलेंगे, काम करेंगे और जीएँगे। न तो नया नियम इसका समर्थन करता है, और न ही कलीसिया का इतिहास। इसके विपरीत, इतिहास उस बात का समर्थन करता है जो बाइबल सिखाती है, अर्थात्, परमेश्वर के लोग सदैव किसी भिन्न संस्कृति में सबसे अधिक प्रभावी तब होते हैं, जब उनके जीवन और जीवनशैली दोनों स्पष्ट रूप से स्थानीय संस्कृति के विपरीत होते हैं (1 पतरस 2:11-12)।

यीशु के इन शब्दों से ठीक पहले याकूब और यूहन्ना, जो “गर्जन के पुत्र” कहलाते हैं, यीशु से एक सहायता माँगने के लिए गए। वे उसके राज्य में आदर के स्थान चाहते थे (मरकुस 10:35-45)। यद्यपि उस समय के रोमी शासकों के समान, जो अपने आप को दूसरों से अत्यधिक सक्षम दिखाना चाहते थे, उनकी यह इच्छा निष्ठा से नहीं, बल्कि अपरिपक्व महत्वाकांक्षा से उत्पन्न हुई थी।

यीशु अपने उत्तर में बहुत ही सीधे-सीधे बोला। उसकी भाषा कठोर थी। उसके चेले उसके अनुयायी थे और उन्हें दूसरों से अलग होना था। उन्हें यह समझने की आवश्यकता थी कि परमेश्वर के राज्य में ऊपर जाने का मार्ग वास्तव में नीचे से होकर जाता है। आदर देने वालों को आदर मिलता है, आदर माँगने वालों को नहीं। महानता सेवा करने में दिखाई देती है, सेवा करवाने में नहीं। इस सिद्धान्त का सबसे बड़ा उदाहरण स्वयं यीशु है, जिसने “जिसने परमेश्‍वर के स्वरूप में होकर भी परमेश्‍वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा। वरन् अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया। और मनुष्य के रूप में प्रगट होकर अपने आप को दीन किया, और यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हाँ, क्रूस की मृत्यु भी सह ली” (फिलिप्पियों 2:6-8)।

यह बात चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि हम एक ऐसी संस्कृति में रहते हैं, जो अपनी क्षमताओं में विश्वास करने में, अपने आप को अधिक मूल्यवान दिखाने में और अपने प्रयासों से सफल बनने में व्यस्त है। फिर भी, यदि हम यीशु के अनुयायी होने का दावा करते हैं, तो यहाँ कहे गए उसके शब्द हमें याद दिलाते हैं कि हममें हमारी प्रचलित संस्कृति के नहीं, बल्कि यीशु के गुण दिखने चाहिएँ।

हम महत्त्वपूर्ण माने जाने, बौद्धिक रूप से समझदार और सामाजिक रूप से स्वीकार्य माने जाने के बारे में अस्वस्थ रीति से व्यस्त हैं। सुसमाचार का कार्य करने के लिए यह कब एक प्रभावी रणनीति रही है? विकल्प स्पष्ट है, या तो हम वही करेंगे जो यीशु कहता है या हम वही करेंगे जो संस्कृति कहती है।

हमें न तो यीशु के शब्दों के प्रभाव को और न ही उसकी चुनौती के स्तर को कम करना चाहिए। परन्तु हमें निराश होने की भी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हम इस तथ्य से प्रोत्साहन प्राप्त कर सकते हैं कि यूहन्ना अन्ततः इसे उचित रीति से समझ गया था। अपने जीवन के अन्त के निकट उसने लिखा, “हम ने प्रेम इसी से जाना कि उसने हमारे लिए अपने प्राण दे दिए; और हमें भी भाइयों के लिए प्राण देना चाहिए” (1 यूहन्ना 3:16)। असुविधाजनक अनुग्रह के इस वचन को सुनें, “तुम में ऐसा नहीं है,” और सेवा तथा प्रेम में अपने अधिकारों और अपनी प्रतिष्ठा को त्यागने के लिए तैयार रहते हुए यीशु के स्वरूप के अनुरूप बनते जाएँ। फिलिप्पियों 2:1-11

20 फरवरी : चिन्ता का उपाय

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20 फरवरी : चिन्ता का उपाय
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“किसी भी बात की चिन्ता मत करो; परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्‍वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ। तब परमेश्‍वर की शान्ति, जो सारी समझ से परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी।”  फिलिप्पियों 4:6-7

यदि मैं आपसे कहूँ कि इस सप्ताह में या आज के दिन में ही आप जिन बातों को लेकर चिन्तित हैं उन्हें लिखें, तो मुझे लगता है कि आपकी यह सूची बहुत लम्बी होगी। मैं जानता हूँ कि मेरी सूची तो अवश्य ही लम्बी होगी। और फिर भी परमेश्वर का वचन हमसे कहता है, “किसी भी बात  की चिन्ता मत करो।” तो फिर, जब हम अपने आप को चिन्ता से जूझते हुए पाते हैं, तो हमें किस प्रकार प्रत्युत्तर देना चाहिए?

पौलुस कहता है कि घुटन भरी चिन्ता का उपाय है प्रार्थना करना और धन्यवाद देना। यह प्रत्युत्तर स्वाभाविक नहीं होता। वास्तव में, यह सीधे-सीधे हमारे पापी हृदयों की प्रवृत्ति के विरुद्ध होता है। हममें से अधिकांश लोगों को चिन्ता उत्पन्न करने वाली बातें प्रार्थना में परमेश्वर के सामने लाने के विपरीत एक कोने में जाकर कुड़कुड़ाना या उन्हें अपने नियन्त्रण में लाने के प्रयास में चिन्ताजनक परिस्थितियों के बारे में सोचते रहना अधिक सरल लगता है। अपने घुटनों पर आकर परमेश्वर को पुकारने के विपरीत, चिन्ता की स्थिति में बने रहकर चिन्ता को हम पर हावी होने देना जितना सरल है, उतना ही निरर्थक भी है।

प्रार्थना हमारे ध्यान को हम पर से हटाकर परमेश्वर के प्रावधान पर लगाने के द्वारा इस प्रश्न को निगल जाती है, “मैं इसका सामना कैसे करूँगा?” प्रार्थना हमारा ध्यान परमेश्वर की ओर मोड़ देती है, जो पूरी तरह से सक्षम है, जो हमारी आवश्यकताओं को अच्छी तरह से जानता है, और जो हमें या तो वह दे देगा जो हम माँगते हैं या उससे भी कहीं अधिक अच्छा देगा, जिसकी हम कल्पना भी न कर सकते। और एक धन्यवादी हृदय हमें परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को स्मरण कराने में सहायता करने के द्वारा बिना किसी कड़वाहट के इस प्रश्न का सामना करने में सहायता करता है, “मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?” वह सदैव एक उद्देश्य के साथ काम करता है, अपनी योजना को पूरा करता है, और पूरी तरह से जानता है कि वह क्या कर रहा है। हममें से कुछ के माता-पिता ऐसे थे जो हमारे घर पर रहने के समय हमारे लिए अलार्म घड़ी का काम करते थे। जब हमें सवेरे किसी निश्चित समय पर जागना आवश्यक होता था, तो हमें अपनी माता या अपने पिता को केवल यह बताना होता था और हमें पूरा भरोसा होता था कि वे हमें जगा देंगे। और फिर, हमें सोने के अतिरिक्त और कुछ नहीं करना होता था! चिन्ता से सामना होने पर पौलुस हमसे इसी तरह का प्रत्युत्तर चाहता है। हमें सीधे अपने स्वर्गिक पिता के पास जाना है और कहना है, “क्या आप मेरे लिए इस स्थिति को सम्भाल लेंगे?” और परमेश्वर सदा यही उत्तर देता है कि मैं इससे निपट लूँगा। मुझ पर भरोसा करो।

जब हम समझ जाते हैं कि परमेश्वर सभी बातों पर नियन्त्रण रखता है, तो हम अपने सभी संघर्षों और चुनौतियों को उसके पास ले जाएँगे। वह जो शान्ति प्रदान करता है, वह हमारे हृदयों के लिए एक दृढ़ गढ़ ठहरेगी।

यद्यपि परेशानियाँ आती हैं और संकट डराते हैं,

यद्यपि घनिष्ठ मित्र हमें निराश कर देते हैं

और शत्रु सभी एक हो जाते हैं, फिर भी एक बात है,

जो हमें सुरक्षित रखती है, चाहे कुछ भी हो,

वह प्रतिज्ञा हमें आश्वस्त करती है कि “प्रभु प्रावधान करेगा।” [1]

तो क्यों न उन बातों की सूची बनाएँ, जिन्हें लेकर आप इस सप्ताह चिन्तित रहे हैं? फिर उनके बारे में प्रार्थना करें, उन परिस्थितियों को स्वर्ग के सिंहासन के सामने ले जाएँ और उन्हें वहीं छोड़ दें। और फिर उसमें लिखी प्रत्येक बात के आगे आप वह लिख सकते हैं, जो परमेश्वर आपसे कहता है, अर्थात् मैं इससे निपट लूँगा। मुझ पर भरोसा करो।

 1 पतरस 5:6-11

19 फरवरी : कुड़कुड़ाने की कीमत

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19 फरवरी : कुड़कुड़ाने की कीमत
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“फिर वे लोग बुड़बुड़ाने और यहोवा के सुनते बुरा कहने लगे; अतः यहोवा ने सुना, और उसका कोप भड़क उठा।”  गिनती 11:1

मसीही जीवन में कुड़कुड़ाने के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए।

यह एक ऐसी सीख थी जिसे इस्राएल ने कठिन रीति से सीखा (और धीरे-धीरे सीखा)। परमेश्वर द्वारा उन्हें मिस्र की बँधुआई से मुक्त कराए जाने के बाद इस्राएलियों को परमेश्वर का व्यवस्था-विधान मिला, उन्हें उसकी आज्ञाएँ दी गईं और उन्हें अपना गन्तव्य स्थान पता लगा। वे उत्सुकता से प्रतिज्ञा किए गए देश तक पहुँचने के लिए निकल पड़े, किन्तु अभी वे बहुत दूर भी नहीं जा पाए थे—शायद सड़क के पहले मोड़ के आस-पास ही पहुँचे थे—कि वे कुड़कुड़ाने लगे। वे मन्ना नहीं मांस खाना चाहते थे, और यहाँ तक कि वे चाहते थे कि वे वापस मिस्र लौट जाएँ (गिनती 11:4-6)। जबकि एक बार उन्होंने सोचा था कि परमेश्वर द्वारा मन्ना का दैनिक प्रावधान उनके लिए उसके प्रेम का एक अद्‌भुत संकेत था, परन्तु अब वे वही पुरानी वस्तु खाने के बारे में कुड़कुड़ाने लगे थे।

कुड़कुड़ाना एक छोटी सी बात लगती है, किन्तु यह आभार की कमी की ओर संकेत करती है। जब भी आभार की कमी और अविश्वास परमेश्वर की सन्तानों के जीवन में दिखाई देती है, तो निश्चित रूप से उसके परिणाम सामने आते हैं। हो सकता है कि हमारा अन्त उन इस्राएलियों की तरह न हो, जो 40 साल तक मरुभूमि में भटकते रहे, परन्तु हमें भी हमारे कुड़कुड़ाने की कीमत चुकानी पड़ती है।

क्या आपको स्मरण है कि आपने पहली बार अपने नए विश्वास की उत्तेजना कब महसूस की थी? हो सकता है कि आपने नए नियम की अपनी पहली प्रति मोल ली हो और सोचा हो कि जो कुछ भी आपको मिलता जा रहा है, वह बहुत अच्छा है। आप उसे हर जगह पढ़ा करते थे। फिर संयोग से, चलते-चलते कुछ ऐसा हुआ कि अब वह केवल “वही पुरानी बाइबल” लगती है और आप चाहते हैं कि परमेश्वर कुछ और प्रभावशाली, कुछ बड़ा करे? क्या आपको वह समय याद है, जब आपको अपने विश्वास के बारे में दूसरों को बताना एक रोमांचक विशेषाधिकार लगता था, परन्तु अब यह एक बोझ और दायित्व की तरह लगता है? क्या आपको वह समय याद है जब आप क्रूस के लिए आभार से भरे हुए थे, परन्तु अब आप सोचते रहते हैं कि परमेश्वर आपको उन मार्गों या स्थानों पर से क्यों नहीं लेकर गया, जहाँ से आप जाना चाहते थे?

जब प्रेरित पौलुस ने प्रारम्भिक कलीसिया को लिखा तब उसने उन्हें चेतावनी के रूप में इस्राएल की कहानी स्मरण कराते हुए कहा, “न हम प्रभु को परखें, जैसा उनमें से कितनों ने किया, और साँपों के द्वारा नष्ट किए गए। और न तुम कुड़कुड़ाओ, जिस रीति से उनमें से कितने कुड़कुड़ाए और नष्ट करने वाले के द्वारा नष्ट किए गए। परन्तु ये सब बातें, जो उन पर पड़ीं, दृष्टान्त की रीति पर थीं; और वे हमारी चेतावनी के लिए जो जगत के अन्तिम समय में रहते हैं लिखी गईं हैं” (1 कुरिन्थियों 10:9-11)।

यदि हमें मसीह पर विश्वास है, तो हम पाप के दासत्व के मुक्त करा दिए गए हैं, यहाँ तक कि हमारी कुड़कुड़ाहट से भी! हम एक बलिदान द्वारा, अर्थात् क्रूस पर मसीह के लहू बहाए जाने के कारण मुक्त किए गए हैं। और हम भी एक यात्रा पर निकल पड़े हैं, जो कनान की ओर नहीं परन्तु स्वर्ग की है। उसे ध्यान में रखते हुए परमेश्वर ने हमें अद्‌भुत प्रतिज्ञाएँ और आवश्यक चेतावनियाँ दी हैं। उसके प्रावधान को कम महत्त्व का न समझें और न ही उस मार्ग के बारे में कुड़कुड़ाएँ जिस पर वह आपको ले जाता है, बल्कि उसके द्वारा भौतिक और आत्मिक रूप से प्रदान की गई सभी वस्तुओं के लिए आभार से भरे रहें। क्रूस आपके पीछे है, स्वर्ग आपके सामने है और पवित्र आत्मा आपके भीतर वास करता है। कुड़कुड़ाने की न तो कोई आवश्यकता है और न ही ऐसा करने के लिए कोई बहाना है।      भजन संहिता 95

18 फरवरी : परमेश्वर के लिए मोल लिए गए

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“तूने अपने लहू से हर एक कुल और भाषा और लोग और जाति में से परमेश्‍वर के लिए लोगों को मोल लिया है, और उन्हें हमारे परमेश्‍वर के लिए एक राज्य और याजक बनाया; और वे पृथ्वी पर राज्य करते हैं।”  प्रकाशितवाक्य 5:9-10

मैं वेल्स की रहने वाली मैरी फिशर नामक एक स्त्री के साथ बाइबल कॉलेज में था, जो मिशनरी बनने आई थी। वह शौना भाषा का अध्ययन कर रही थी, ताकि वह ज़िम्बाब्वे में युवा लड़के और लड़कियों को पढ़ा सके। उसके वहाँ पहुँचने के कुछ ही समय बाद, जिस विद्यालय में वह पढ़ा रही थी, उस पर आतंकी हमला हुआ। कई अन्य शिक्षकों और बच्चों के साथ-साथ मैरी भी बच नहीं पाई; उस हमले में उसकी जान चली गई।[1] यद्यपि उसकी मृत्यु दुखद थी, किन्तु उसके जीवन ने न केवल यहाँ, बल्कि अनन्त काल तक परमेश्वर की सेवा करने के सर्वोच्च आनन्द की साक्षी दी।

प्रकाशितवाक्य में मेमने के चारों ओर एकत्रित प्राचीनों के गीत में हमें यह स्मरण कराया जाता है कि मसीह की मृत्यु का उद्देश्य यह था कि हम परमेश्वर द्वारा मोल लिए जा सकें। हमें उस पाप से मुक्त किया गया है, जिसने हमें अपनी पकड़ में रखा था कि उसके लहू द्वारा मोल लिए जाने के बाद हम उसके लिए जीएँ। हमारी स्तुति परमेश्वर के लिए है। मैरी फिशर के समान हमारी सेवा भी परमेश्वर के लिए है।

जब पहली सदी के विश्वासियों ने अपने आस-पास देखा और जाना कि उनके कुछ मित्रों को उनके विश्वास के कारण बन्दी बना लिया गया है, तो वे मृत्यु पर मसीह के जयवन्त होने, उसके स्वर्गारोहण की जीत और उसकी वापसी की वास्तविकता को समझने का प्रयास करने लगे। जिस क्लेश का वे सामना कर रहे थे, उसे ध्यान में रखते हुए ये मसीही इस बात की स्मृति में प्रोत्साहन पा सके कि जब यीशु हमारे पापों के लिए प्रायश्चित्त कर रहा था तब भी उसका ध्यान हर समय पिता पर केन्द्रित था। उसने हमें परमेश्वर के लिए  मोल लिया था।

हम मिशनरी आत्मकथाओं में बताई गई त्रासदियों को कैसे समझ सकते हैं या शहीदों की मृत्यु में दिखने वाली स्पष्ट आक्रामक अराजकता को कैसे समझा सकते हैं? मैरी फिशर की अन्तिम रिकॉर्डिंग इस बात में स्पष्टता प्रदान करती है। एक गायिका और गिटार वादक के रूप में वह अपनी कक्षा में बच्चों को फिलिप्पियों की कलीसिया को लिखे पौलुस के शब्दों पर आधारित एक गीत के बोल सिखा रही थी: “मेरे लिए जीवित रहना मसीह है, और मर जाना लाभ है” (फिलिप्पियों 1:21)।[2] यह गीत आगे कहता है कि उसके मार्ग पर चलना और उसका हाथ थाम लेना ही शान्ति और आनन्द का मार्ग है।

17 फरवरी : बच्चों के लिए एक बात

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17 फरवरी : बच्चों के लिए एक बात
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“हे बालको, प्रभु में अपने माता–पिता के आज्ञाकारी बनो, क्योंकि यह उचित है। ‘अपनी माता और पिता का आदर कर (यह पहली आज्ञा है जिसके साथ प्रतिज्ञा भी है) कि तेरा भला हो, और तू धरती पर बहुत दिन जीवित रहे।’”  इफिसियों 6:1-3

दो अवसरों पर जब पौलुस अपने पाठकों को भक्तिहीनता के कुरूप फलों की एक लम्बी सूची प्रदान करता है, तो उसके बीच में हमें “माता-पिता की आज्ञा न मानने वाले” (रोमियों 1:30; 2 तीमुथियुस 3:2) के रूप में एक छोटा वाक्यांश मिलता है। इसके विपरीत, जब आप कलीसिया का इतिहास पढ़ते हैं तो आप पाते हैं कि जब-जब आत्मिक जागृति आती थी, तब-तब व्यावहारिक रूप से भक्ति में भी बढ़त होती थी, जिसमें बच्चों का अपने माता-पिता के भक्तिपूर्ण अधिकार की अधीनता में आना भी शामिल होता था।

बच्चों का अपने माता-पिता की आज्ञा मानना केवल एक सुझाव नहीं है; यह एक दायित्व है। पवित्रशास्त्र सिखाता है कि ऐसी आज्ञाकारिता परमेश्वर की सृष्टि के प्राकृतिक क्रम के अनुसार है, उसकी व्यवस्था के अनुरूप है और सुसमाचार के प्रति प्रत्युत्तर के रूप में भी सही है। माता-पिता को आज्ञाकारिता की माँग करने और उसकी प्रशंसा करने से डरना नहीं चाहिए। किन्तु पौलुस केवल यह नहीं कहता कि आज्ञाकारिता एक उचित बात है; वह यह भी कहता है कि इसका प्रतिफल भी मिलता है। प्रभु यीशु में परमेश्वर की आज्ञाओं और प्रतिज्ञाओं पर ध्यान देने के साथ एक आशीष भी मिलती है। और जब माता-पिता और बच्चों के सम्बन्ध में प्रेम, भरोसा और आज्ञाकारिता दिखाई देते हैं, तो हम केवल स्वस्थ लोगों का ही निर्माण नहीं करते, अपितु हम एक स्वस्थ समाज का भी निर्माण करते हैं। माता-पिता के लिए भला होगा कि वे इन पाँच महत्त्वपूर्ण सच्चाइयों को स्मरण रखें, जो बाइबल हमारे बच्चों के बारे में सिखाती है:

1. “लड़के यहोवा के दिए हुए भाग हैं” (भजन 127:3)। वे एक वरदान और एक आशीष हैं। अपने बच्चों के बारे में सोचते हुए हममें उन बच्चों को प्रदान करने वाले के प्रति आभार का भाव उत्पन्न होना चाहिए।

2. हम अपने बच्चों के स्वामी नहीं हैं; वे परमेश्वर के हैं। वे हमें सीमित समय के लिए उधार पर दिए गए हैं।

3. बच्चे जन्म से ही दोषपूर्ण होते हैं, पाप के दोषी होते हैं और अनन्त जीवन के योग्य नहीं होते, ठीक वैसे ही जैसे हम सभी हैं (भजन 58:3; रोमियों 3:23)।

4. क्योंकि बच्चे पापी हैं, इसलिए उन्हें परमेश्वर की आज्ञाओं की आवश्यकता है। माता-पिता के रूप में हम उन्हें आरम्भिक दिनों से ही परमेश्वर की व्यवस्था के बारे में बताने के लिए उत्तरदायी हैं।

5. हमारे बच्चे केवल अनुग्रह से ही बचाए जा सकते हैं। इसलिए उद्धार के लिए हमें उन्हें केवल यीशु की ओर देखना सिखाना चाहिए।

हममें से बहुत से लोग ऐसी संस्कृति में रहते हैं, जहाँ इन सच्चाइयों का विरोध किया जाता है। एक ओर बच्चों को स्वाभाविक रूप से भला माना जाता है और उनकी शिक्षा या स्वास्थ्य या खुशी को सर्वोच्च भलाई के रूप में देखा जाता है। दूसरी ओर वे प्रायः मज़ाक का पात्र या कुड़कुड़ाने का विषय होते हैं। कभी-कभी कलीसिया के भीतर भी पालन-पोषण के बारे में स्पष्ट, बाइबल आधारित बातों का अभाव होता है। किन्तु इस विषय में परमेश्वर यह कहता है कि एक परिवार के सभी बच्चों को अपने माता-पिता की आज्ञा माननी चाहिए; माता-पिता को अपने बच्चों का पालन-पोषण इस प्रकार करना चाहिए कि वे परमेश्वर की व्यवस्था और परमेश्वर के अनुग्रह को जानें। यदि हम अपने घरों और अपनी कलीसियाओं में एक ऐसी पीढ़ी को देखना चाहते हैं, जो हमसे अधिक भक्तिमय और सरगर्म हो, तो हमें अपने बच्चों का पालन-पोषण परमेश्वर के सत्यों के साथ करना होगा। हममें से बहुत से माता-पिता ऐसे हैं, जिनके बच्चे अभी भी उनके साथ उनके घरों में रहते हैं। हम सभी ऐसी कलीसियाओं के सदस्य हैं, जहाँ हमारे बीच बच्चे हैं। तो फिर अगली पीढ़ी के आत्मिक स्वास्थ्य में आपका योगदान कैसा होना चाहिए?      नीतिवचन 2