“हे बालको, प्रभु में अपने माता–पिता के आज्ञाकारी बनो, क्योंकि यह उचित है। ‘अपनी माता और पिता का आदर कर (यह पहली आज्ञा है जिसके साथ प्रतिज्ञा भी है) कि तेरा भला हो, और तू धरती पर बहुत दिन जीवित रहे।’” इफिसियों 6:1-3
दो अवसरों पर जब पौलुस अपने पाठकों को भक्तिहीनता के कुरूप फलों की एक लम्बी सूची प्रदान करता है, तो उसके बीच में हमें “माता-पिता की आज्ञा न मानने वाले” (रोमियों 1:30; 2 तीमुथियुस 3:2) के रूप में एक छोटा वाक्यांश मिलता है। इसके विपरीत, जब आप कलीसिया का इतिहास पढ़ते हैं तो आप पाते हैं कि जब-जब आत्मिक जागृति आती थी, तब-तब व्यावहारिक रूप से भक्ति में भी बढ़त होती थी, जिसमें बच्चों का अपने माता-पिता के भक्तिपूर्ण अधिकार की अधीनता में आना भी शामिल होता था।
बच्चों का अपने माता-पिता की आज्ञा मानना केवल एक सुझाव नहीं है; यह एक दायित्व है। पवित्रशास्त्र सिखाता है कि ऐसी आज्ञाकारिता परमेश्वर की सृष्टि के प्राकृतिक क्रम के अनुसार है, उसकी व्यवस्था के अनुरूप है और सुसमाचार के प्रति प्रत्युत्तर के रूप में भी सही है। माता-पिता को आज्ञाकारिता की माँग करने और उसकी प्रशंसा करने से डरना नहीं चाहिए। किन्तु पौलुस केवल यह नहीं कहता कि आज्ञाकारिता एक उचित बात है; वह यह भी कहता है कि इसका प्रतिफल भी मिलता है। प्रभु यीशु में परमेश्वर की आज्ञाओं और प्रतिज्ञाओं पर ध्यान देने के साथ एक आशीष भी मिलती है। और जब माता-पिता और बच्चों के सम्बन्ध में प्रेम, भरोसा और आज्ञाकारिता दिखाई देते हैं, तो हम केवल स्वस्थ लोगों का ही निर्माण नहीं करते, अपितु हम एक स्वस्थ समाज का भी निर्माण करते हैं। माता-पिता के लिए भला होगा कि वे इन पाँच महत्त्वपूर्ण सच्चाइयों को स्मरण रखें, जो बाइबल हमारे बच्चों के बारे में सिखाती है:
1. “लड़के यहोवा के दिए हुए भाग हैं” (भजन 127:3)। वे एक वरदान और एक आशीष हैं। अपने बच्चों के बारे में सोचते हुए हममें उन बच्चों को प्रदान करने वाले के प्रति आभार का भाव उत्पन्न होना चाहिए।
2. हम अपने बच्चों के स्वामी नहीं हैं; वे परमेश्वर के हैं। वे हमें सीमित समय के लिए उधार पर दिए गए हैं।
3. बच्चे जन्म से ही दोषपूर्ण होते हैं, पाप के दोषी होते हैं और अनन्त जीवन के योग्य नहीं होते, ठीक वैसे ही जैसे हम सभी हैं (भजन 58:3; रोमियों 3:23)।
4. क्योंकि बच्चे पापी हैं, इसलिए उन्हें परमेश्वर की आज्ञाओं की आवश्यकता है। माता-पिता के रूप में हम उन्हें आरम्भिक दिनों से ही परमेश्वर की व्यवस्था के बारे में बताने के लिए उत्तरदायी हैं।
5. हमारे बच्चे केवल अनुग्रह से ही बचाए जा सकते हैं। इसलिए उद्धार के लिए हमें उन्हें केवल यीशु की ओर देखना सिखाना चाहिए।
हममें से बहुत से लोग ऐसी संस्कृति में रहते हैं, जहाँ इन सच्चाइयों का विरोध किया जाता है। एक ओर बच्चों को स्वाभाविक रूप से भला माना जाता है और उनकी शिक्षा या स्वास्थ्य या खुशी को सर्वोच्च भलाई के रूप में देखा जाता है। दूसरी ओर वे प्रायः मज़ाक का पात्र या कुड़कुड़ाने का विषय होते हैं। कभी-कभी कलीसिया के भीतर भी पालन-पोषण के बारे में स्पष्ट, बाइबल आधारित बातों का अभाव होता है। किन्तु इस विषय में परमेश्वर यह कहता है कि एक परिवार के सभी बच्चों को अपने माता-पिता की आज्ञा माननी चाहिए; माता-पिता को अपने बच्चों का पालन-पोषण इस प्रकार करना चाहिए कि वे परमेश्वर की व्यवस्था और परमेश्वर के अनुग्रह को जानें। यदि हम अपने घरों और अपनी कलीसियाओं में एक ऐसी पीढ़ी को देखना चाहते हैं, जो हमसे अधिक भक्तिमय और सरगर्म हो, तो हमें अपने बच्चों का पालन-पोषण परमेश्वर के सत्यों के साथ करना होगा। हममें से बहुत से माता-पिता ऐसे हैं, जिनके बच्चे अभी भी उनके साथ उनके घरों में रहते हैं। हम सभी ऐसी कलीसियाओं के सदस्य हैं, जहाँ हमारे बीच बच्चे हैं। तो फिर अगली पीढ़ी के आत्मिक स्वास्थ्य में आपका योगदान कैसा होना चाहिए? नीतिवचन 2