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1 मार्च : हमारी आत्माओं के लिए एक गढ़

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1 मार्च : हमारी आत्माओं के लिए एक गढ़
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“हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्‍वर और पिता का धन्यवाद हो कि उसने हमें मसीह में स्वर्गीय स्थानों में सब प्रकार की आत्मिक आशीष दी है। जैसा उसने हमें जगत की उत्पत्ति से पहले उसमें चुन लिया कि हम उसके निकट प्रेम में पवित्र और निर्दोष हों। और अपनी इच्छा के भले अभिप्राय के अनुसार हमें अपने लिए पहले से ठहराया कि यीशु मसीह के द्वारा हम उसके लेपालक पुत्र हों।”  इफिसियों 1:3-5

परमेश्वर ने आपको बहुत पहले से प्रेम किया है।

इफिसियों को लिखे अपने पत्र के आरम्भ में पौलुस द्वारा स्तुति का इस प्रकार उण्डेला जाना, हमें उन सभी कार्यों की महिमा के बारे में बताता है, जो परमेश्वर ने मसीह में हमारे लिए किए हैं। इस काम को इतना प्रभावशाली बनाने वाली एक विशेषता यह है कि इसका आरम्भ परमेश्वर से होता है, जो हमें याद दिलाता है कि हमारे अस्तित्व में आने से पहले ही उसने लोगों को अपने पास लाने की पहल की। हमारे सामने यह प्रलोभन आ सकते हैं कि हमें मानवीय प्रयासों के द्वारा परमेश्वर की खोज करने की आवश्यकता है; और निस्सन्देह, संसार के कई धर्म यही बात सिखाते भी हैं। परन्तु अपने आरम्भ से ही बाइबल यह सिखाती है कि वास्तव में परमेश्वर स्वयं हम तक पहुँचता है।

मसीह में हमारा चुनाव सृष्टि की रचना के बाद किसी समय में किया गया कोई विचार नहीं है; यह सृष्टि की रचना से पूर्व अनन्त काल का विचार है। यह बात सच है कि हम स्वयं मसीह के पीछे चलने का निर्णय लेते हैं, किन्तु यह जानना कितनी दीनता लाता है कि यदि परमेश्वर ने हमें जगत की उत्पत्ति से पहले नहीं चुना होता तो हम कभी भी परमेश्वर को नहीं चुन सकते थे। यदि उसने पहले आपको अपनी सन्तान बना लेने का निर्णय नहीं लिया होता, तो आप उसके पीछे चलने का निर्णय लेने में सक्षम नहीं होते।

परमेश्वर की सम्प्रभुता के साथ मनुष्य के उत्तरदायित्व का सामंजस्य स्थापित करने में एक नाजुक तनाव व्याप्त होता है। बहुत से लोग मानते हैं कि उन्हें इन दोनों में से किसी एक को चुनना होगा, जबकि वास्तव में दोनों ही विचार बाइबल आधारित हैं और आपस में जुड़े हुए हैं। ये दो ऐसे सत्य हैं, जो एक दूसरे से जुड़े हुए और एक ही ओर उन्मुख हैं। ये हमारे सीमित मानवीय मनों को परस्पर-विरोधी लगते हैं, परन्तु फिर भी दोनों पूरी तरह से सत्य हैं। हमें इनको वास्तविकता से परे सिद्धान्तों के रूप में लेते हुए उनके बारे में बहुत अधिक चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। इसके विपरीत, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की हमारे पक्ष में हुई दया से चकित होते हुए हम आदर के साथ प्रत्युत्तर दे सकते हैं।

चुनाव की सैद्धान्तिक शिक्षा कोई ऐसा ध्वज नहीं है जिसके तले हम चलते हैं, अपितु यह हमारी आत्माओं के लिए एक गढ़ है।[1] यह बात हमारी सुरक्षा और हमारे आनन्द को महत्त्व प्रदान करती है। जैसे ही आप दीनता के साथ यह जान जाते हैं कि समय के आरम्भ से पहले ही मसीह में आपकी पहचान उस क्षण स्थापित हो गई थी, जब उसने पहली बार आप पर अपना स्नेह सुनिश्चित किया था, तभी से आप स्वतन्त्र हो जाते हैं और आप में हियाव आ जाता है। आपको अपने आप में कोई ऐसा कारण खोजने की आवश्यकता नहीं है, जिसके द्वारा आप यह समझ सकें कि आपको उसका अद्‌भुत अनुग्रह क्यों मिला है; आप केवल यह जानकर आनन्दित हो सकते हैं कि उसने आपको इसलिए चुना क्योंकि वह आपसे प्रेम करता है। क्योंकि आपको लगता है कि आप अपने मसीही जीवन में बहुत कम प्रगति कर रहे हैं, इस कारण आपको अपने पापों के कारण बोझिल रहने या कुचले रहने की आवश्यकता नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उसका प्रेम कभी भी आपके कार्यों या भले कार्य कर पाने की आपकी प्रतिज्ञा पर आधारित नहीं था। आप इस जीवन के उतार-चढ़ावों में से इस आश्वासन के साथ होकर जा सकते हैं कि जो आपको प्रेम करता है उसी ने सभी वस्तुओं को बनाया है तथा सभी वस्तुओं उसी के चलाए चलती हैं और यह भी कि क्योंकि आपको कभी भी उसका प्रेम प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं पड़ी, इसलिए आप इसे कभी खो भी नहीं सकते हैं।       
यूहन्ना 6:35-51

28 फरवरी : समर्पित और अटल

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28 फरवरी : समर्पित और अटल
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“मैं ने अपने परमेश्‍वर यहोवा की पूरी रीति से बात मानी। तब उस दिन मूसा ने शपथ खाकर मुझसे कहा, ‘तू ने पूरी रीति से मेरे परमेश्‍वर यहोवा की बातों का अनुकरण किया है, इस कारण निस्सन्देह जिस भूमि पर तू अपने पाँव धर आया है वह सदा के लिए तेरा और तेरे वंश का भाग होगी।’”  यहोशू 14:8-9

बहुत से लोग जीवन में आरम्भ तो बहुत अच्छा करते हैं, परन्तु बाद में वे वह सब खो देते हैं जिसने उन्हें सफल बनाया था। हो सकता है कि युवावस्था में वे विख्यात रहे हों। 40 वर्ष की आयु में उनके जीवन में प्रसिद्धि, प्रभाव और प्रतिष्ठा थी। कलीसिया में, हम ऐसे व्यक्तियों को परमेश्वर के लिए अत्यन्त उपयोगी व्यक्तियों के रूप में देख सकते हैं, निस्सन्देह हम अपने आप को  भी उसी प्रकार देख सकते हैं। परन्तु प्रायः हम बीते हुए कल के विजेता बन कर रह जाने के प्रलोभन में फँस जाते हैं, उन “अच्छे वर्षों” को पीछे मुड़कर देखते रहते हैं और जिस तरह से सारी बातें आज के समय में हो रही हैं, उसके बारे में कुड़कुड़ाते रहते हैं।

यद्यपि यह बात बहुत से लोगों के लिए सच होती है, परन्तु कालेब के लिए यह बात बिल्कुल भी सच नहीं थी, जो इस सम्भावित उदासीनता से दूर रहा और विश्वास में बना रहा। उसने अपनी वृद्धावस्था से पहले के वर्ष अधिक चाहने योग्य परिवेश में नहीं बिताए थे। 40 वर्ष की आयु से वह चार दशकों तक मरुभूमि में भटकता रहा, क्योंकि उसके आस-पास के लोग परमेश्वर में विश्वास करने में विफल रहे थे। फिर भी निराशा और भटकते रहने के इस समय में कालेब कड़वाहट और असन्तोष से मुक्त रहा।

वास्तव में, अन्त में बातें इतनी बिगड़ गईं कि लोगों ने एक ऐसे अगुवे को खोजना आरम्भ कर दिया जो उन्हें पुराने अच्छे दिनों में वापस ले जा सके (गिनती 14:4)। अब, किसी को पीछे जाने के लिए सच में किसी अगुवे की आवश्यकता नहीं होती; आप स्वयं ही पीछे जा सकते हैं! हमें आगे बढ़ाने के लिए अगुवों की आवश्यकता होती है। आगे एक आने वाला कल है। आगे आने वाली कई पीढ़ियाँ हैं। हमारे संसार के लिए परमेश्वर की योजना में अभी भी ऐसे उद्देश्य हैं जिनका हमारे सामने उजागर होना अभी शेष है।

कालेब इसी भावना को प्रकट करता है। उसके आरम्भिक जीवन के स्पष्ट समर्पण का उसके मध्य वर्षों में उसकी निरन्तरता के साथ मिलन हो गया। वह न केवल 40, बल्कि 50, 60 और 70 की आयु में भी समर्पित और अटल रहा। उन सारे दशकों में उसने “पूरी रीति से प्रभु की बातों का अनुसरण किया।”

कई लोगों के लिए विवाह, घर, गृहस्थी, व्यावसायिक चिन्ताएँ, स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ, इत्यादि के क्षेत्र में प्रायः आत्मिक उत्साह और प्रभावशीलता में कमी आ जाती है। ऐसे लोग भी होते हैं जो बहुत सारे संसाधन, ऊर्जा और ज्ञान प्रदान कर सकते हैं, परन्तु ऐसा करने के विपरीत वे सेवाकार्य के काम को अगली पीढ़ी के लिए छोड़कर आराम करने का निर्णय ले लेते हैं। उन इस्राएलियों के समान जो मरुभूमि में थे, वे भी उदासीनता, आलोचना और निराशावाद में ही उलझे रह जाते हैं और अपने आत्मिक जीवन में होने वाली गिरावट को नहीं देख पाते।

आपके समर्पण, आपकी बातचीत और आपकी आत्मिक बढ़त का स्तर आज क्या है? क्या वे पहले जैसी ही हैं? इस्राएल की मरुभूमि वाली पीढ़ी की तरह आज की कलीसिया को भी विश्वास रखने वाले अनुभवी पुरुषों और स्त्रियों की बहुत आवश्यकता है, जो अच्छे और बुरे समय में, प्रत्येक मौसम में और प्रत्येक परिस्थिति में निरन्तर समर्पण के साथ जीवन जीते हों और वर्षों से वे उस मीरास की ओर बढ़ते जा रहे हैं जिसकी प्रतिज्ञा प्रभु ने अपने विश्वासयोग्य अनुयायियों से की है। आपके लिए आज उस मीरास की ओर चलना कैसा है और दस साल के बाद यह कैसा होगा?      न्यायियों 1:1-20

27 फरवरी : सहायता करने वाले शब्द

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27 फरवरी : सहायता करने वाले शब्द
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“एक ही मुँह से धन्यवाद और शाप दोनों निकलते हैं। हे मेरे भाइयो, ऐसा नहीं होना चाहिए। क्या सोते के एक ही मुँह से मीठा और खारा जल दोनों निकलता है? क्या अंजीर के पेड़ में जैतून, या दाख की लता में अंजीर लग सकते हैं? वैसे ही खारे सोते से मीठा पानी नहीं निकल सकता।”  याकूब 3:10-12

हमारे जीवन में हम अन्याय, निर्दयता, अप्रिय परिस्थितियों और प्रायः अप्रिय लोगों का सामना करते हैं। इन परिस्थितियों में मौखिक रूप से प्रतिक्रिया देने से पहले हमें अपने प्रभु से सीखी गई इस सच्चाई को स्मरण करना चाहिए कि हमारे शब्द हमारे हृदयों को दर्शाते हैं (मत्ती 12:34)। यदि हमारे शब्द मसीह के समान नहीं हैं, तो हमें सबसे पहले अपने मुँह को नहीं परन्तु अपने हृदयों को देखना चाहिए। इसी प्रकार, जब हम संघर्ष और चुनौती का उत्तर ऐसे शब्दों से देते हैं जो हानि पहुँचाने के स्थान पर सहायता करते हैं, तो यह हमारे भीतर हमारे प्रभु के कार्य का संकेत देता है।

हमारी जीभ में अपार शक्ति होती है, और हम उनका उपयोग सहायता करने, प्रोत्साहित करने, पुष्टि करने, समृद्ध करने, मेल-मिलाप करने, क्षमा करने, एक करने, शान्त करने और आशीष देने के लिए कर सकते हैं। यह मात्र एक संयोग नहीं है कि पुराने नियम के बहुत सारे नीतिवचनों के पद हमारे द्वारा बोले गए शब्दों को सम्बोधित करते हैं। सुलैमान के अनुसार “धर्मी का मुँह तो जीवन का सोता है” (नीतिवचन 10:11)। वह शब्दों के इस प्रयोग की तुलना उन सुन्दर बालियों से करता है, जो उसे पहनने वाली की सुन्दरता को निखारती हैं और उन सुन्दर आभूषणों से करता है जो घर की सुन्दरता को बढ़ाते हैं (नीतिवचन 25:12)। सम्भवतः वाणी की शक्ति के बारे में उसका सबसे उत्कृष्ट कथन उसका यह अवलोकन है, “जैसे चाँदी की टोकरियों में सोने के सेब हों, वैसा ही ठीक समय पर कहा हुआ वचन होता है” (वचन 11)।

वह क्या है, जिससे ऐसी जीवनदायक भाषा प्राप्त होती है? हमारे मुँह कैसे दूसरों के लिए आशीष ला सकते हैं? आशीष के शब्द “प्रेम में सच्चाई से चलते हुए” सच्चरित्रता से भरे होते हैं (इफिसियों 4:15)। वे विचारशील होते हैं, जो उस व्यक्ति द्वारा बोले जाते हैं जो “मन में सोचता है कि क्या उत्तर दूँ” (नीतिवचन 15:28)। वे प्रायः कम होते हैं और तर्कों से भरे होते हैं: “जो सम्भलकर बोलता है, वह ज्ञानी ठहरता है, और जिसकी आत्मा शान्त रहती है, वही समझ वाला पुरुष ठहरता है” (नीतिवचन 17:27)। और, निस्सन्देह, सहायक शब्द कोमल शब्द होते हैं। यद्यपि कठिन परिस्थितियों में इसे स्मरण रखना कठिन हो सकता है, तौभी यह सच है कि “कोमल उत्तर सुनने से गुस्सा ठण्डा हो जाता है” (नीतिवचन 15:1)। निस्सन्देह, नैतिक क्षमता से कोमल प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है; निरंकुश धुन और क्रोध को स्थान देने की तुलना में कोमलता के साथ उत्तर देने के लिए कहीं अधिक आत्म-संयम की आवश्यकता होती है।

आपके शब्दों की पहचान क्या होगी? क्या आप अपनी जीभ का उपयोग, जो आपके शरीर का एक छोटा-सा किन्तु अति-शक्तिशाली अंग है, शाप देने के बदले आशीष देने के लिए, जीवन नष्ट करने के बदले जीवन देने के लिए और हानि पहुँचाने के बदले सहायता करने के लिए समर्पित करेंगे?

आज ही संकल्प लें कि अपने हृदय में मसीह का आदर करते हुए और अपनी वाणी में उसकी मीठी सुगन्ध को भरते हुए आप अपने शब्दों का उपयोग उन लोगों की भलाई के लिए करेंगे जिनके साथ आप बातचीत करते हैं। फिर दीनतापूर्वक स्वीकार करें कि आप स्वयं ऐसा नहीं कर सकते (याकूब 3:8) और उससे कहें कि वह आपको अपने आत्मा से भरे, उस आत्मा से जो आपके हृदय और आपकी वाणी दोनों में शान्ति, कोमलता और संयम को विकसित करता है (गलातियों 5:22-23)।      
गलातियों 5:16-25

26 फरवरी : चोट पहुँचाने वाले शब्द

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26 फरवरी : चोट पहुँचाने वाले शब्द
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“जीभ भी एक आग है; जीभ हमारे अंगों में अधर्म का एक लोक है, और सारी देह पर कलंक लगाती है, और जीवन–गति में आग लगा देती है, और नरक कुण्ड की आग से जलती रहती है . . . पर जीभ को मनुष्यों में से कोई वश में नहीं कर सकता।”  याकूब 3:6, 8

तीन वस्तुएँ कभी लौटकर नहीं आतीं: चला हुआ तीर, बोला हुआ शब्द और खोया हुआ अवसर। हम जो बोलते हैं, उसे वापस नहीं लिया जा सकता। इसके अतिरिक्त, हमें अपने द्वारा बोले गए प्रत्येक शब्द का न्याय के दिन लेखा देना होगा, यहाँ तक कि हमारे लापरवाह शब्दों का भी (मत्ती 12:36 देखें)। जैसा कि राजा सुलैमान ने कहा, “जो अपने मुँह की चौकसी करता है, वह अपने प्राण की रक्षा करता है, परन्तु जो गाल बजाता है उसका विनाश हो जाता है” (नीतिवचन 13:3); और “जीभ के वश में मृत्यु और जीवन दोनों होते हैं” (नीतिवचन 18:21)। हमारे शब्द प्रोत्साहित करने, पोषण करने और चंगा करने का काम कर सकते हैं। परन्तु वे झगड़े कराने, मतभेद उत्पन्न करने और हानि पहुँचाने का कारण भी बन सकते हैं। सुलैमान हमें ऐसे हानिकारक शब्दों का बहुआयामी चित्रण प्रदान करता है। वह हानि पहुँचाने वाले शब्दों को बिना सोचे-समझे बोले गए “तलवार के समान चुभने वाले” (नीतिवचन 12:18) शब्दों के रूप में वर्णित करता है। हमारे शब्द प्रायः बिना सोचे-समझे निकल जाते हैं और हम ऐसे व्यक्ति बन जाते हैं जो “बिना बात सुने उत्तर देते हैं” (नीतिवचन 18:13)। “जहाँ बहुत बातें होती हैं, वहाँ अपराध भी होता है” (नीतिवचन 10:19)।

हो सकता है कि आपने यह कहावत सुनी होगी कि लाठी और पत्थर तो हमारी हड्डियाँ तोड़ सकते हैं, किन्तु शब्द हमें कभी हानि नहीं पहुँचा सकते, किन्तु यह बात पूरी तरह गलत है। खरोचें मिट सकती हैं और उनके निशान भुलाए जा सकते हैं, परन्तु हमसे कहे गए और हमारे लिए कहे गए चोट पहुँचाने वाले शब्द लम्बे समय तक हमारे साथ रहते हैं। ये पंक्तियाँ अधिक सच बोलती हैं:

बिना सोचे-समझे बोला गया एक शब्द झगड़े को भड़का सकता है,

एक क्रूर शब्द जीवन का नाश कर सकता है,

एक कड़वा शब्द घृणा उत्पन्न कर सकता है,

एक कठोर शब्द कष्ट दे सकता है और मार सकता है।

यह अनुमान लगाना कठिन होगा कि हानिकारक शब्दों के कारण कितनी दोस्तियाँ टूट जाती हैं, कितने लोगों की प्रतिष्ठा का नाश हो जाता है, और कितने घरों की शान्ति खण्डित हो जाती है। याकूब के अनुसार ऐसे सभी बैरभाव और अपमानजनक भाषा का स्रोत कोई और नहीं परन्तु नरक ही है। हाँ, हमारी जीभ “एक आग” है और परमेश्वर के पवित्र आत्मा के कार्य के बिना “मनुष्यों में से कोई भी जीभ को वश में नहीं कर सकता।”

रुकें और सोचें कि आपने पिछले 24 घण्टों में कितने शब्दों का प्रयोग किया होगा और उनका प्रयोग कैसे किया होगा। “मृत्यु और जीवन जीभ के वश में होते हैं,” तो क्या आपके किसी शब्द ने किसी दूसरे को किसी तरह से नीचा दिखाने के द्वारा उसको हानि पहुँचाई होगी? यह एक ऐसा पाप है, जिसका पश्चाताप किया जाना चाहिए और जिससे दूर हट जाना चाहिए। क्या परमेश्वर के सामने और उस व्यक्ति के सामने, जिससे वे शब्द कहे गए थे, आपको यह कार्य करने की आवश्यकता है?

अब उन शब्दों के बारे में सोचें जो आप अगले 24 घण्टों में बोल सकते हैं। उनका उपयोग जीवन पहुँचाने के लिए कैसे किया जा सकता है? आप ऐसा व्यक्ति कैसे बन सकते हैं, जिसने “न तो पाप किया और न उसके मुँह से छल की कोई बात निकली”? इसके विपरीत, “वह गाली सुनकर गाली नहीं देता था, और दुख उठाकर किसी को भी धमकी नहीं देता था . . . वह आप ही हमारे पापों को लिए हुए चढ़ गया . . . जिससे हम पापों के लिए मरकर धार्मिकता के लिए जीवन बिताएँ” (1 पतरस 2:22-24)।   याकूब 3:2-12

25 फरवरी : तेज दौड़ें

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25 फरवरी : तेज दौड़ें
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“क्या तुम नहीं जानते कि दौड़ में तो दौड़ते सब ही हैं, परन्तु इनाम एक ही ले जाता है? तुम वैसे ही दौड़ो कि जीतो। हर एक पहलवान सब प्रकार का संयम करता है; वे तो एक मुरझाने वाले मुकुट को पाने के लिए यह सब करते हैं, परन्तु हम तो उस मुकुट के लिए करते हैं जो मुरझाने का नहीं। इसलिए मैं तो इसी रीति से दौड़ता हूँ, परन्तु लक्ष्यहीन नहीं।”  1 कुरिन्थियों 9:24-26

नए नियम के समय पूर्वी रोमी साम्राज्य में व्याप्त यूनानी संस्कृति में खेलों की प्रतियोगिताएँ महत्त्वपूर्ण हुआ करती थीं। एक टीकाकार ने कुरिन्थुस को एक ऐसे शहर के रूप में वर्णित किया है, जहाँ लोग केवल दो वस्तुओं की माँग करते थे, रोटी और खेल।[1]

छोटे स्तर की स्थानीय प्रतियोगिताओं में कई पुरस्कार दिए जाते थे, परन्तु प्रमुख आयोजनों में केवल एक ही पुरस्कार होता था जो कि प्रायः लॉरेल (कल्पवृक्ष) या पाइन (देवदार) के मुकुट होते थे। प्रतियोगी अपने जीवन के कई महीने उन सभी बातों से दूर रहते थे, जिनका वे अन्यथा आनन्द लिया करते थे, जिनमें सम्बन्ध, भोजन वस्तुएँ और खाली समय में की जाने वाली वे सभी गतिविधियाँ शामिल होती थीं, जो उनकी जीतने की क्षमता को कम कर सकती थीं, जिससे उनकी दृष्टि कल्पवृक्ष के मुकुट पर टिकी रहे। पौलुस इस चित्रण का उपयोग करके विश्वासियों को मसीह की महिमा करने और उसके साथ एक होने के अनन्त पुरस्कार पर दृष्टि बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करता है।

विद्यालय के खुले मैदानों में होने वाली दौड़ें, जिनका आरम्भ तो एक बड़े झुण्ड के रूप में होता है, प्रायः शीघ्र ही तीन छोटे समूहों में बँट जाती हैं। इनमें से एक छोटे समूह का लक्ष्य स्वर्ण पदक जीतना होता है, उसके बाद वाले धावकों का बड़ा समूह “केवल दौड़ने” के लिए दौड़ रहा होता है, और जो पीछे रह जाते हैं वे सामान्यतः दोष ढूँढने वाली, अशान्त, आशा-रहित, दुखी आत्माएँ होती हैं। इस पद में पौलुस द्वारा प्रयुक्त शब्द “दौड़ना” का आशय न तो पीछे रह जाने वाले के रूप में दौड़ने से है, न ही बिना लक्ष्य के दौड़ने से और न ही आधे-अधूरे मन से दौड़ने से है, बल्कि पुरस्कार विजेता के रूप में दौड़ने से है। मसीहियों के रूप में हमें लक्ष्यहीन नहीं दौड़ना चाहिए। हमें स्वर्ण पदक प्राप्त करने के लिए प्रयास करना चाहिए। पुरस्कार पर ध्यान देते हुए जीने के लिए बलिदान की आवश्यकता होती है। विशेष रूप से, ऐसी किसी भी इच्छा का बलिदान, जो परमेश्वर की इच्छा के विपरीत हो। पद 25 में “पहलवान” शब्द का अनुवाद यूनानी शब्द एगोनिज़ोमेनोस  से किया गया है, जिससे हमें हिन्दी का “पीड़ा” शब्द मिलता है। खिलाड़ी होने का आशय है सुविधाजनक रीति से न रहने के विकल्प को चुनना। मसीही होना भी ऐसे ही विकल्प को चुनना है। क्या हम मसीह के लिए पीड़ा सहने और बलिदान देने के लिए तैयार हैं, यह जानते हुए कि तभी हम उसके लिए अच्छी तरह से जीए गए जीवन का पुरस्कार जीतने के आनन्द का अनुभव कर सकेंगे।

परन्तु हम इस तरह का बलिदान कैसे दें या इस तरह के ध्यान के साथ कैसे दौड़ें? ऐसा हम अपनी स्वयं की क्षमता या आत्म-धार्मिकता के बल पर नहीं कर पाएँगे। यह तो झूठे धर्म की आत्मा और सार है। कदापि नहीं, केवल मसीह के साथ हमारा मिलन ही हमें इस परिवर्तन के लिए सामर्थ्य और क्षमता प्रदान करता है। यीशु ने अनन्त पुरस्कार को ध्यान में रखते हुए स्वेच्छा से बलिदान हो जाने का उदाहरण प्रस्तुत किया है (इब्रानियों 12:2)। जब वह हमारे हृदय और जीवन को नया आधार प्रदान करता है, तो हम उसके लिए दौड़ते हुए और उसके पीछे चलते हुए जितनी दूर तक आनन्दपूर्वक जा सकते हैं, उसकी कोई सीमा नहीं है।

जब स्कॉटलैण्ड के रहने वाले प्रसिद्ध ओलम्पिक खिलाड़ी और मिशनरी एरिक लिडेल से उस दौड़ की योजना के बारे में पूछा गया जिसमें उन्होंने 1924 के ओलम्पिक में 400 मीटर में स्वर्ण पदक जीता था, तो उन्होंने यह उत्तर दिया था, “मैं पहले 200 मीटर जितना हो सके उतनी तेजी से दौड़ता हूँ। फिर शेष 200 मीटर के लिए परमेश्वर की सहायता से मैं और भी तेज दौड़ता हूँ।” तो फिर आज लक्ष्यहीन या धीरे-धीरे न दौड़ें, बल्कि परमेश्वर की सहायता से उसके लिए और उसकी महिमा के लिए स्वर्ण पदक पाने के लिए और भी तेज दौड़ें।

 इब्रानियों 12:1-3

24 फरवरी : चुप्पी में से आशा

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24 फरवरी : चुप्पी में से आशा
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देखो, मैं अपने दूत को भेजता हूँ, और वह मार्ग को मेरे आगे सुधारेगा, और प्रभु, जिसे तुम ढूँढ़ते हो, वह अचानक अपने मन्दिर में आ जाएगा; हाँ, वाचा का वह दूत, जिसे तुम चाहते हो, सुनो, वह आता है, सेनाओं के यहोवा का यही वचन है।”  मलाकी 3:1

परमेश्वर के लोग प्रतीक्षा करने वाले लोग हैं।

बेबीलोन में अपनी बँधुआई से परमेश्वर के लोगों के लौटने के बाद “लघु भविष्यद्वक्ता” हाग्गै, जकर्याह और मलाकी उनके पास परमेश्वर का वचन लेकर आए। उनका सन्देश वैसा ही था, जैसा उनके पहले के भविष्यद्वक्ताओं ने लोगों के बन्दी बनाए जाने से पहले कहा था कि तुम इस्राएली लोग मूर्ख हो! तुम वाचा को तोड़ते रहते हो। और यदि तुम वाचा को तोड़ते रहोगे, तो परमेश्वर न्याय लेकर आएगा।

लेकिन लघु भविष्यद्वक्ताओं का सन्देश केवल  न्याय के बारे में नहीं था। उसमें आशा भी थी।

वे भले ही शारीरिक रूप से देश में लौट आए थे, किन्तु आत्मिक रूप से वे लोग अभी भी बँधुआई में थे। इस्राएल का जो कुछ बचा था, अर्थात् यहूदा, इस आशा को थामे रहा कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करेगा, जिससे कि उसके लोग उसकी आशिषों का आनन्द उठा सकें। परन्तु परमेश्वर का राज्य अभी भी उस तरह से नहीं आया था, जैसा कि पहले के भविष्यद्वक्ताओं ने घोषित किया था क्योंकि परमेश्वर का राजा अभी तक नहीं आया था। इसलिए लोग प्रभु के लौटने और उद्धार की सभी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने की प्रतीक्षा कर रहे थे।

पुराने नियम का अन्तिम भविष्यद्वक्ता, मलाकी, दृढ़ता से कहता रहा कि वह राजा आएगा, परन्तु उसके बाद भी 400 वर्षों तक चुप्पी बनी रही। लोग पैदा होते रहे, अपने सामान्य कार्यों को करते रहे, कारोबार करते रहे, मर गए, और यह चक्र इसी प्रकार चलता रहा। हो सकता है कि उन्होंने एक-दूसरे से पूछा हो, “उन शब्दों का क्या हुआ कि ‘मैं अपने दूत को भेजूँगा, और वह मार्ग को मेरे आगे सुधारेगा’? उस प्रतिज्ञा को तो सदियाँ बीत चुकी हैं।”

अन्ततः हो सकता है कि उनमें से कुछ लोग बाजार की ओर जा रहे होंगे जब विचित्र कपड़े पहने और विचित्र भोजन खाने वाला एक असामान्य सा दिखने वाला व्यक्ति सड़कों पर दिखाई दिया होगा, जो पुराने नियम में लिखी बातें बोल रहा था, “देख, मैं अपने दूत को तेरे आगे भेजता हूँ, जो तेरे लिए मार्ग सुधारेगा। जंगल में एक पुकारने वाले का शब्द सुनाई दे रहा है कि प्रभु का मार्ग तैयार करो, और उसकी सड़कें सीधी करो” (मरकुस 1:2-3)। इन शब्दों के साथ यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने पीढ़ियों की चुप्पी तोड़ दी। कई वर्षों की प्रतीक्षा के बाद परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने में विश्वासयोग्य रहा, जैसा कि वह सदा से है। उसने अपने दूत और अपने राजा दोनों को भेजा कि सभी लोग उसकी आशीष का अनुभव कर सकें, अर्थात्, यीशु मसीह के द्वारा उद्धार की पूर्ति का अनुभव कर सकें।

हमारे दिनों में परमेश्वर के लोग अभी भी प्रतीक्षा कर रहे हैं। हम जानते हैं कि यीशु आ चुका; हम यह भी जानते हैं कि वह आने वाला है। परमेश्वर का राज्य अभी तक अपनी पूर्ण महिमा में नहीं आया है। इस कारण, तात्कालिक आनन्द की प्राप्ति के इच्छुक इस संसार में हम धीरज के साथ प्रतीक्षा करने वाले लोग हैं और एक ऐसे संसार में जहाँ लोगों की आशा तीव्रता से भंग हो जाती है, हम धीरज के साथ आशा रखने वाले लोग हैं। जब ऐसा लगे कि परमेश्वर आपके जीवन में अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने में बहुत अधिक समय ले रहा है, तब भी आशा मत खोइए। पीढ़ी से पीढ़ी तक वह विश्वासयोग्य रहा है और यीशु को भेजने के द्वारा उसने प्रत्येक प्रतिज्ञा को पूरा करने वाले का परिचय भी दे दिया है। आप उसकी समरूपता में विश्राम कर सकते हैं। “हाँ,” यीशु कहता है, “मैं शीघ्र आने वाला हूँ” (प्रकाशितवाक्य 22:20)। वह वही करेगा जो उसने कहा है।      2 पतरस 3:1-13

23 फरवरी : उसके स्वरूप में होना

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23 फरवरी : उसके स्वरूप में होना
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“जिन्हें उसने पहले से जान लिया है, उन्हें पहले से ठहराया भी है कि उसके पुत्र के स्वरूप में हों, ताकि वह बहुत भाइयों में पहिलौठा ठहरे।”  रोमियों 8:29

जो दम्पति बहुत अधिक समय से विवाहित हैं, उनसे यह अक्सर ही पूछ लिया जाता है कि क्या वे भाई-बहन हैं, क्योंकि उन्होंने एक-दूसरे के कई गुण अपना लिए होते हैं।

आंशिक रूप से यह बात तर्कसंगत भी है, है न? हम जिस तरह की संगति में रहते हैं, हम वैसे ही बन जाते हैं। मसीह के साथ चलने में भी हमारे लिए यही बात सत्य ठहरनी चाहिए।

आपके जीवन के लिए परमेश्वर का उद्देश्य है आपको उसके पुत्र के स्वरूप की समानता में ढालना। इस बारे में सोचकर देखें। यीशु की मानवीय पूर्णताओं पर विचार करें और अनुभव करें कि आपको उसके जैसे बनने का अवसर मिल जाए! परमेश्वर इसके लिए गम्भीरतापूर्वक प्रतिबद्ध है; यह एक ऐसा कार्य है जिसे वह “यीशु मसीह के दिन तक पूरा करने” की प्रतिज्ञा करता है (फिलिप्पियों 1:6)। परमेश्वर आज के दिन क्या कर रहा है? हम सरल शब्दों में इसका सार इस तरह से प्रस्तुत सकते हैं कि वह हमें मसीह की समानता में और अधिक बना रहा है।

हममें से बहुत से लोग रोमियों 8:28 के आश्वासन से परिचित हैं, “जो लोग परमेश्‍वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिए सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन्हीं के लिए जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं।” परन्तु इसके बाद का पद हमें बताता है कि हमारा सर्वशक्तिमान परमेश्वर हमारे जीवन के सभी पहलुओं में किस “भलाई” को उत्पन्न कर रहा है। वह यह है कि वह हमें “उसके पुत्र के स्वरूप में” ढाल रहा है।

परमेश्वर आपकी सुख-सुविधाओं से कहीं अधिक आपके मसीह-समान होने की चिन्ता करता है। सफलता और हँसी की तुलना में प्रायः निराशा और असफलता के द्वारा अधिक आत्मिक प्रगति होती है। ऐसा नहीं है कि हम कष्ट को ढूँढ-ढूँढ कर खोजने लगें, हम यह मान सकते हैं कि हमारा पिता बेहतर जानता है तथा कोई भी बात उसे आश्चर्यचकित नहीं करती है। जब हम किसी ऐसी प्रार्थना का अनुभव करते हैं, “जिसका उत्तर नहीं मिला” या जब हमारी चुनौतियाँ और पीड़ाएँ हमारी इच्छा से कहीं अधिक लम्बे समय तक बनी रहती हैं, उस समय हमें यह देखने में आशा मिलती है कि परमेश्वर का अनन्त उद्देश्य उसकी सन्तानों के जीवन में और उनके जीवनों के द्वारा पूरा हो रहा है।

आप और मैं अकेले नहीं हैं, जिन्होंने निःशब्द आशाहीनता का सामना किया है या जो अभी भी निराशा भरे समय में से होकर जा रहे हैं, जब हम यह पूछने के प्रलोभन में आ जाते हैं कि “परमेश्वर क्या कर रहा है? ” जब स्तिफनुस के सताने वालों ने अपने कपड़े उतारे और उस पर पथराव करने लगे तब वह क्या कर रहा था (प्रेरितों 7:58)? जब पौलुस को दमिश्क से बाहर निकलना पड़ा, उसे टोकरे में बैठाया गया और शहरपनाह पर से लटकाकर उतारा गया (9:25), तब वह क्या कर रहा था? जब पतरस को राजा हेरोदेस ने बन्दी बना लिया था (12:3), तब वह क्या कर रहा था? यह देखना भले ही कठिन हो, किन्तु परमेश्वर अपनी अनन्त योजना को पूरा कर रहा था, अर्थात् अपने अनुयायियों को यीशु के समान बना रहा था, जब वे यीशु के पास अपने घर जा रहे थे।

हर सवेरे जागते समय आपकी आशा का स्रोत यही होता है। चाहे बारिश हो या धूप, चाहे हर्ष हो या निराशा, परमेश्वर निश्चित रूप से दिन भर आपके जीवन में अपने उद्देश्यों को पूरा करेगा। आपके स्वर्गिक पिता के पास उस प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक योजना और उद्देश्य है, जिसे वह अपना कहता है। हो सकता है कि आप उसके द्वारा कार्य के होते समय देख सकें कि वह इसे कैसे कर रहा है, या कुछ महीनों बाद देखने पाएँ, या सम्भव है कि तब तक न देख पाएँ जब तक आप अनन्त काल में मसीह के साथ खड़े नहीं हो जाते। किन्तु यह बात जान लें कि आज एक और दिन है, जब आपका पिता आपको अपने पुत्र की समानता में बना रहा है।      

रोमियों 8:26-39

22 फरवरी : परमेश्वर को जानना

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22 फरवरी : परमेश्वर को जानना
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“तब उन्हें फिर एक दूसरे से यह न कहना पड़ेगा कि यहोवा को जानो, क्योंकि, यहोवा की यह वाणी है, छोटे से लेकर बड़े तक, सब के सब मेरा ज्ञान रखेंगे।”  यिर्मयाह 31:34

यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता के दिनों में परमेश्वर ने अपने लोगों के साथ की गई वाचा को तोड़ने से इनकार कर दिया। यद्यपि उसकी महा करुणा के होने पर भी परमेश्वर के लोग पाप करते रहे। इससे एक समस्या उत्पन्न हो गई कि परमेश्वर अपने लोगों को आशीषित करने की अपनी प्रतिज्ञाओं को कैसे पूरा कर सकता था, जब कि वे लगातार उसके साथ विश्वासघात करते जा रहे थे?

अपनी महान योजना के एक भाग के रूप में परमेश्वर ने एक नई वाचा की प्रतिज्ञा की कि वह आन्तरिक पुनर्निर्माण का कार्य करेगा। जैसा कि थियोलॉजियन ऐलेक मौटियर लिखते हैं, “जब उसके लोग उसके मानकों की ऊँचाई तक नहीं पहुँच पाते हैं, तो प्रभु उनकी क्षमता के अनुरूप अपने मानकों को कम नहीं कर देता, बल्कि वह अपने लोगों को ही पूरी तरह से बदल देता है।”[1]

यह नई वाचा प्रभु यीशु के लहू के द्वारा हृदयों को नया जीवन प्रदान करने की परमेश्वर की योजना और प्रतिज्ञा है। जैसे किसी पहेली में एक टुकड़ा बिठाना हो, वैसे ही वह हमारे हृदयों को लेता है और उन्हें ऐसा सिद्ध आकार देता है कि उसकी व्यवस्था हमारे लिए हर्ष की बात बन जाती है।

परमेश्वर द्वारा इस नई वाचा का वर्णन किए जाने में क्रिया शब्द “जानना” ही कुंजी है। मूल इब्रानी भाषा में उत्पत्ति की पुस्तक के आरम्भ में ही इसका अर्थ स्पष्ट है। यह स्पष्ट वक्तव्य कि आदम ने अपनी पत्नी को “जाना” और उनके बच्चे हुए (उत्पत्ति 4:1), यह दर्शाता है कि यह कितनी निकटता व्यक्त करता है। परमेश्वर कह रहा है कि जब उसके लोग उसके प्रेम को समझ जाएँगे, तो वे केवल दूर से बाइबल अध्ययन नहीं करेंगे; वे ऐसे लोग बन जाएँगे जो वास्तव में उसे जानते होंगे।

यिर्मयाह जिस बात को भविष्य काल में कह रहा था, हम वर्तमान में उसका आनन्द लेने में सक्षम हैं, क्योंकि उसकी भविष्यद्वाणी और हमारे समय के बीच प्रभु यीशु ने मरने से एक रात पहले कटोरा लिया और कहा, “यह कटोरा मेरे उस लहू में, जो तुम्हारे लिए बहाया जाता है, नई वाचा है” (लूका 22:20)। परमेश्वर के अनुग्रह से आप और मैं राजाओं के राजा और प्रभुओं के प्रभु को जान सकते हैं। इतना ही नहीं, बल्कि वह हम में से प्रत्येक को व्यक्तिगत रूप से नाम से जानता है और हमारी आवश्यकताओं को भी जानता है तथा हमारी भलाई के लिए प्रतिबद्ध है। यीशु पिता के समक्ष हमारे नाम की साक्षी देता है, और वह जो कुछ भी है और उसने जो कुछ भी किया है उसके कारण हमारे नाम जीवन की पुस्तक में लिखे गए हैं।

यह किस तरह का राजा है? इसका उत्तर पूरी तरह से समझ पाना हमारी क्षमता से परे है। एक दिन हम उसे आमने-सामने देखेंगे और आज की तुलना में कहीं अधिक समझ सकेंगे। परन्तु फिर भी, आज आप उस हियाव के साथ आगे बढ़ सकते हैं, जो इस बात को जानने से आता है कि आप उस परमेश्वर को जानते हैं, जिसने आपको अपने पुत्र के द्वारा छुटकारा दिलाया है, जो अपने आत्मा के द्वारा आप में वास करता है और कार्य करता है, और जिसके सिंहासन के कक्ष में एक दिन आप खड़े होंगे।

यिर्मयाह 31:31-40

21 फरवरी : तुम में ऐसा नहीं है

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21 फरवरी : तुम में ऐसा नहीं है
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“यीशु ने उनको पास बुलाकर उनसे कहा, ‘तुम जानते हो कि जो अन्यजातियों के हाकिम समझे जाते हैं, वे उन पर प्रभुता करते हैं; और उनमें जो बड़े हैं, उन पर अधिकार जताते हैं। पर तुम में ऐसा नहीं है।’”  मरकुस 10:42-43

लगभग प्रत्येक पीढ़ी में पाया जाने वाला एक बड़ा झूठ यह है कि परमेश्वर के लोग अपने अविश्वासी पड़ोसियों तक सुसमाचार पहुँचाने में अधिक सफल तब होंगे, जब वे अधिक से अधिक उनके जैसे दिखेंगे, बोलेंगे, काम करेंगे और जीएँगे। न तो नया नियम इसका समर्थन करता है, और न ही कलीसिया का इतिहास। इसके विपरीत, इतिहास उस बात का समर्थन करता है जो बाइबल सिखाती है, अर्थात्, परमेश्वर के लोग सदैव किसी भिन्न संस्कृति में सबसे अधिक प्रभावी तब होते हैं, जब उनके जीवन और जीवनशैली दोनों स्पष्ट रूप से स्थानीय संस्कृति के विपरीत होते हैं (1 पतरस 2:11-12)।

यीशु के इन शब्दों से ठीक पहले याकूब और यूहन्ना, जो “गर्जन के पुत्र” कहलाते हैं, यीशु से एक सहायता माँगने के लिए गए। वे उसके राज्य में आदर के स्थान चाहते थे (मरकुस 10:35-45)। यद्यपि उस समय के रोमी शासकों के समान, जो अपने आप को दूसरों से अत्यधिक सक्षम दिखाना चाहते थे, उनकी यह इच्छा निष्ठा से नहीं, बल्कि अपरिपक्व महत्वाकांक्षा से उत्पन्न हुई थी।

यीशु अपने उत्तर में बहुत ही सीधे-सीधे बोला। उसकी भाषा कठोर थी। उसके चेले उसके अनुयायी थे और उन्हें दूसरों से अलग होना था। उन्हें यह समझने की आवश्यकता थी कि परमेश्वर के राज्य में ऊपर जाने का मार्ग वास्तव में नीचे से होकर जाता है। आदर देने वालों को आदर मिलता है, आदर माँगने वालों को नहीं। महानता सेवा करने में दिखाई देती है, सेवा करवाने में नहीं। इस सिद्धान्त का सबसे बड़ा उदाहरण स्वयं यीशु है, जिसने “जिसने परमेश्‍वर के स्वरूप में होकर भी परमेश्‍वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा। वरन् अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया। और मनुष्य के रूप में प्रगट होकर अपने आप को दीन किया, और यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हाँ, क्रूस की मृत्यु भी सह ली” (फिलिप्पियों 2:6-8)।

यह बात चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि हम एक ऐसी संस्कृति में रहते हैं, जो अपनी क्षमताओं में विश्वास करने में, अपने आप को अधिक मूल्यवान दिखाने में और अपने प्रयासों से सफल बनने में व्यस्त है। फिर भी, यदि हम यीशु के अनुयायी होने का दावा करते हैं, तो यहाँ कहे गए उसके शब्द हमें याद दिलाते हैं कि हममें हमारी प्रचलित संस्कृति के नहीं, बल्कि यीशु के गुण दिखने चाहिएँ।

हम महत्त्वपूर्ण माने जाने, बौद्धिक रूप से समझदार और सामाजिक रूप से स्वीकार्य माने जाने के बारे में अस्वस्थ रीति से व्यस्त हैं। सुसमाचार का कार्य करने के लिए यह कब एक प्रभावी रणनीति रही है? विकल्प स्पष्ट है, या तो हम वही करेंगे जो यीशु कहता है या हम वही करेंगे जो संस्कृति कहती है।

हमें न तो यीशु के शब्दों के प्रभाव को और न ही उसकी चुनौती के स्तर को कम करना चाहिए। परन्तु हमें निराश होने की भी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हम इस तथ्य से प्रोत्साहन प्राप्त कर सकते हैं कि यूहन्ना अन्ततः इसे उचित रीति से समझ गया था। अपने जीवन के अन्त के निकट उसने लिखा, “हम ने प्रेम इसी से जाना कि उसने हमारे लिए अपने प्राण दे दिए; और हमें भी भाइयों के लिए प्राण देना चाहिए” (1 यूहन्ना 3:16)। असुविधाजनक अनुग्रह के इस वचन को सुनें, “तुम में ऐसा नहीं है,” और सेवा तथा प्रेम में अपने अधिकारों और अपनी प्रतिष्ठा को त्यागने के लिए तैयार रहते हुए यीशु के स्वरूप के अनुरूप बनते जाएँ। फिलिप्पियों 2:1-11

20 फरवरी : चिन्ता का उपाय

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20 फरवरी : चिन्ता का उपाय
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“किसी भी बात की चिन्ता मत करो; परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्‍वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ। तब परमेश्‍वर की शान्ति, जो सारी समझ से परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी।”  फिलिप्पियों 4:6-7

यदि मैं आपसे कहूँ कि इस सप्ताह में या आज के दिन में ही आप जिन बातों को लेकर चिन्तित हैं उन्हें लिखें, तो मुझे लगता है कि आपकी यह सूची बहुत लम्बी होगी। मैं जानता हूँ कि मेरी सूची तो अवश्य ही लम्बी होगी। और फिर भी परमेश्वर का वचन हमसे कहता है, “किसी भी बात  की चिन्ता मत करो।” तो फिर, जब हम अपने आप को चिन्ता से जूझते हुए पाते हैं, तो हमें किस प्रकार प्रत्युत्तर देना चाहिए?

पौलुस कहता है कि घुटन भरी चिन्ता का उपाय है प्रार्थना करना और धन्यवाद देना। यह प्रत्युत्तर स्वाभाविक नहीं होता। वास्तव में, यह सीधे-सीधे हमारे पापी हृदयों की प्रवृत्ति के विरुद्ध होता है। हममें से अधिकांश लोगों को चिन्ता उत्पन्न करने वाली बातें प्रार्थना में परमेश्वर के सामने लाने के विपरीत एक कोने में जाकर कुड़कुड़ाना या उन्हें अपने नियन्त्रण में लाने के प्रयास में चिन्ताजनक परिस्थितियों के बारे में सोचते रहना अधिक सरल लगता है। अपने घुटनों पर आकर परमेश्वर को पुकारने के विपरीत, चिन्ता की स्थिति में बने रहकर चिन्ता को हम पर हावी होने देना जितना सरल है, उतना ही निरर्थक भी है।

प्रार्थना हमारे ध्यान को हम पर से हटाकर परमेश्वर के प्रावधान पर लगाने के द्वारा इस प्रश्न को निगल जाती है, “मैं इसका सामना कैसे करूँगा?” प्रार्थना हमारा ध्यान परमेश्वर की ओर मोड़ देती है, जो पूरी तरह से सक्षम है, जो हमारी आवश्यकताओं को अच्छी तरह से जानता है, और जो हमें या तो वह दे देगा जो हम माँगते हैं या उससे भी कहीं अधिक अच्छा देगा, जिसकी हम कल्पना भी न कर सकते। और एक धन्यवादी हृदय हमें परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को स्मरण कराने में सहायता करने के द्वारा बिना किसी कड़वाहट के इस प्रश्न का सामना करने में सहायता करता है, “मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?” वह सदैव एक उद्देश्य के साथ काम करता है, अपनी योजना को पूरा करता है, और पूरी तरह से जानता है कि वह क्या कर रहा है। हममें से कुछ के माता-पिता ऐसे थे जो हमारे घर पर रहने के समय हमारे लिए अलार्म घड़ी का काम करते थे। जब हमें सवेरे किसी निश्चित समय पर जागना आवश्यक होता था, तो हमें अपनी माता या अपने पिता को केवल यह बताना होता था और हमें पूरा भरोसा होता था कि वे हमें जगा देंगे। और फिर, हमें सोने के अतिरिक्त और कुछ नहीं करना होता था! चिन्ता से सामना होने पर पौलुस हमसे इसी तरह का प्रत्युत्तर चाहता है। हमें सीधे अपने स्वर्गिक पिता के पास जाना है और कहना है, “क्या आप मेरे लिए इस स्थिति को सम्भाल लेंगे?” और परमेश्वर सदा यही उत्तर देता है कि मैं इससे निपट लूँगा। मुझ पर भरोसा करो।

जब हम समझ जाते हैं कि परमेश्वर सभी बातों पर नियन्त्रण रखता है, तो हम अपने सभी संघर्षों और चुनौतियों को उसके पास ले जाएँगे। वह जो शान्ति प्रदान करता है, वह हमारे हृदयों के लिए एक दृढ़ गढ़ ठहरेगी।

यद्यपि परेशानियाँ आती हैं और संकट डराते हैं,

यद्यपि घनिष्ठ मित्र हमें निराश कर देते हैं

और शत्रु सभी एक हो जाते हैं, फिर भी एक बात है,

जो हमें सुरक्षित रखती है, चाहे कुछ भी हो,

वह प्रतिज्ञा हमें आश्वस्त करती है कि “प्रभु प्रावधान करेगा।” [1]

तो क्यों न उन बातों की सूची बनाएँ, जिन्हें लेकर आप इस सप्ताह चिन्तित रहे हैं? फिर उनके बारे में प्रार्थना करें, उन परिस्थितियों को स्वर्ग के सिंहासन के सामने ले जाएँ और उन्हें वहीं छोड़ दें। और फिर उसमें लिखी प्रत्येक बात के आगे आप वह लिख सकते हैं, जो परमेश्वर आपसे कहता है, अर्थात् मैं इससे निपट लूँगा। मुझ पर भरोसा करो।

 1 पतरस 5:6-11