“यीशु ने उनको पास बुलाकर उनसे कहा, ‘तुम जानते हो कि जो अन्यजातियों के हाकिम समझे जाते हैं, वे उन पर प्रभुता करते हैं; और उनमें जो बड़े हैं, उन पर अधिकार जताते हैं। पर तुम में ऐसा नहीं है।’” मरकुस 10:42-43
लगभग प्रत्येक पीढ़ी में पाया जाने वाला एक बड़ा झूठ यह है कि परमेश्वर के लोग अपने अविश्वासी पड़ोसियों तक सुसमाचार पहुँचाने में अधिक सफल तब होंगे, जब वे अधिक से अधिक उनके जैसे दिखेंगे, बोलेंगे, काम करेंगे और जीएँगे। न तो नया नियम इसका समर्थन करता है, और न ही कलीसिया का इतिहास। इसके विपरीत, इतिहास उस बात का समर्थन करता है जो बाइबल सिखाती है, अर्थात्, परमेश्वर के लोग सदैव किसी भिन्न संस्कृति में सबसे अधिक प्रभावी तब होते हैं, जब उनके जीवन और जीवनशैली दोनों स्पष्ट रूप से स्थानीय संस्कृति के विपरीत होते हैं (1 पतरस 2:11-12)।
यीशु के इन शब्दों से ठीक पहले याकूब और यूहन्ना, जो “गर्जन के पुत्र” कहलाते हैं, यीशु से एक सहायता माँगने के लिए गए। वे उसके राज्य में आदर के स्थान चाहते थे (मरकुस 10:35-45)। यद्यपि उस समय के रोमी शासकों के समान, जो अपने आप को दूसरों से अत्यधिक सक्षम दिखाना चाहते थे, उनकी यह इच्छा निष्ठा से नहीं, बल्कि अपरिपक्व महत्वाकांक्षा से उत्पन्न हुई थी।
यीशु अपने उत्तर में बहुत ही सीधे-सीधे बोला। उसकी भाषा कठोर थी। उसके चेले उसके अनुयायी थे और उन्हें दूसरों से अलग होना था। उन्हें यह समझने की आवश्यकता थी कि परमेश्वर के राज्य में ऊपर जाने का मार्ग वास्तव में नीचे से होकर जाता है। आदर देने वालों को आदर मिलता है, आदर माँगने वालों को नहीं। महानता सेवा करने में दिखाई देती है, सेवा करवाने में नहीं। इस सिद्धान्त का सबसे बड़ा उदाहरण स्वयं यीशु है, जिसने “जिसने परमेश्वर के स्वरूप में होकर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा। वरन् अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया। और मनुष्य के रूप में प्रगट होकर अपने आप को दीन किया, और यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हाँ, क्रूस की मृत्यु भी सह ली” (फिलिप्पियों 2:6-8)।
यह बात चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि हम एक ऐसी संस्कृति में रहते हैं, जो अपनी क्षमताओं में विश्वास करने में, अपने आप को अधिक मूल्यवान दिखाने में और अपने प्रयासों से सफल बनने में व्यस्त है। फिर भी, यदि हम यीशु के अनुयायी होने का दावा करते हैं, तो यहाँ कहे गए उसके शब्द हमें याद दिलाते हैं कि हममें हमारी प्रचलित संस्कृति के नहीं, बल्कि यीशु के गुण दिखने चाहिएँ।
हम महत्त्वपूर्ण माने जाने, बौद्धिक रूप से समझदार और सामाजिक रूप से स्वीकार्य माने जाने के बारे में अस्वस्थ रीति से व्यस्त हैं। सुसमाचार का कार्य करने के लिए यह कब एक प्रभावी रणनीति रही है? विकल्प स्पष्ट है, या तो हम वही करेंगे जो यीशु कहता है या हम वही करेंगे जो संस्कृति कहती है।
हमें न तो यीशु के शब्दों के प्रभाव को और न ही उसकी चुनौती के स्तर को कम करना चाहिए। परन्तु हमें निराश होने की भी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हम इस तथ्य से प्रोत्साहन प्राप्त कर सकते हैं कि यूहन्ना अन्ततः इसे उचित रीति से समझ गया था। अपने जीवन के अन्त के निकट उसने लिखा, “हम ने प्रेम इसी से जाना कि उसने हमारे लिए अपने प्राण दे दिए; और हमें भी भाइयों के लिए प्राण देना चाहिए” (1 यूहन्ना 3:16)। असुविधाजनक अनुग्रह के इस वचन को सुनें, “तुम में ऐसा नहीं है,” और सेवा तथा प्रेम में अपने अधिकारों और अपनी प्रतिष्ठा को त्यागने के लिए तैयार रहते हुए यीशु के स्वरूप के अनुरूप बनते जाएँ। फिलिप्पियों 2:1-11