23 फरवरी : उसके स्वरूप में होना

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23 फरवरी : उसके स्वरूप में होना
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“जिन्हें उसने पहले से जान लिया है, उन्हें पहले से ठहराया भी है कि उसके पुत्र के स्वरूप में हों, ताकि वह बहुत भाइयों में पहिलौठा ठहरे।”  रोमियों 8:29

जो दम्पति बहुत अधिक समय से विवाहित हैं, उनसे यह अक्सर ही पूछ लिया जाता है कि क्या वे भाई-बहन हैं, क्योंकि उन्होंने एक-दूसरे के कई गुण अपना लिए होते हैं।

आंशिक रूप से यह बात तर्कसंगत भी है, है न? हम जिस तरह की संगति में रहते हैं, हम वैसे ही बन जाते हैं। मसीह के साथ चलने में भी हमारे लिए यही बात सत्य ठहरनी चाहिए।

आपके जीवन के लिए परमेश्वर का उद्देश्य है आपको उसके पुत्र के स्वरूप की समानता में ढालना। इस बारे में सोचकर देखें। यीशु की मानवीय पूर्णताओं पर विचार करें और अनुभव करें कि आपको उसके जैसे बनने का अवसर मिल जाए! परमेश्वर इसके लिए गम्भीरतापूर्वक प्रतिबद्ध है; यह एक ऐसा कार्य है जिसे वह “यीशु मसीह के दिन तक पूरा करने” की प्रतिज्ञा करता है (फिलिप्पियों 1:6)। परमेश्वर आज के दिन क्या कर रहा है? हम सरल शब्दों में इसका सार इस तरह से प्रस्तुत सकते हैं कि वह हमें मसीह की समानता में और अधिक बना रहा है।

हममें से बहुत से लोग रोमियों 8:28 के आश्वासन से परिचित हैं, “जो लोग परमेश्‍वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिए सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन्हीं के लिए जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं।” परन्तु इसके बाद का पद हमें बताता है कि हमारा सर्वशक्तिमान परमेश्वर हमारे जीवन के सभी पहलुओं में किस “भलाई” को उत्पन्न कर रहा है। वह यह है कि वह हमें “उसके पुत्र के स्वरूप में” ढाल रहा है।

परमेश्वर आपकी सुख-सुविधाओं से कहीं अधिक आपके मसीह-समान होने की चिन्ता करता है। सफलता और हँसी की तुलना में प्रायः निराशा और असफलता के द्वारा अधिक आत्मिक प्रगति होती है। ऐसा नहीं है कि हम कष्ट को ढूँढ-ढूँढ कर खोजने लगें, हम यह मान सकते हैं कि हमारा पिता बेहतर जानता है तथा कोई भी बात उसे आश्चर्यचकित नहीं करती है। जब हम किसी ऐसी प्रार्थना का अनुभव करते हैं, “जिसका उत्तर नहीं मिला” या जब हमारी चुनौतियाँ और पीड़ाएँ हमारी इच्छा से कहीं अधिक लम्बे समय तक बनी रहती हैं, उस समय हमें यह देखने में आशा मिलती है कि परमेश्वर का अनन्त उद्देश्य उसकी सन्तानों के जीवन में और उनके जीवनों के द्वारा पूरा हो रहा है।

आप और मैं अकेले नहीं हैं, जिन्होंने निःशब्द आशाहीनता का सामना किया है या जो अभी भी निराशा भरे समय में से होकर जा रहे हैं, जब हम यह पूछने के प्रलोभन में आ जाते हैं कि “परमेश्वर क्या कर रहा है? ” जब स्तिफनुस के सताने वालों ने अपने कपड़े उतारे और उस पर पथराव करने लगे तब वह क्या कर रहा था (प्रेरितों 7:58)? जब पौलुस को दमिश्क से बाहर निकलना पड़ा, उसे टोकरे में बैठाया गया और शहरपनाह पर से लटकाकर उतारा गया (9:25), तब वह क्या कर रहा था? जब पतरस को राजा हेरोदेस ने बन्दी बना लिया था (12:3), तब वह क्या कर रहा था? यह देखना भले ही कठिन हो, किन्तु परमेश्वर अपनी अनन्त योजना को पूरा कर रहा था, अर्थात् अपने अनुयायियों को यीशु के समान बना रहा था, जब वे यीशु के पास अपने घर जा रहे थे।

हर सवेरे जागते समय आपकी आशा का स्रोत यही होता है। चाहे बारिश हो या धूप, चाहे हर्ष हो या निराशा, परमेश्वर निश्चित रूप से दिन भर आपके जीवन में अपने उद्देश्यों को पूरा करेगा। आपके स्वर्गिक पिता के पास उस प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक योजना और उद्देश्य है, जिसे वह अपना कहता है। हो सकता है कि आप उसके द्वारा कार्य के होते समय देख सकें कि वह इसे कैसे कर रहा है, या कुछ महीनों बाद देखने पाएँ, या सम्भव है कि तब तक न देख पाएँ जब तक आप अनन्त काल में मसीह के साथ खड़े नहीं हो जाते। किन्तु यह बात जान लें कि आज एक और दिन है, जब आपका पिता आपको अपने पुत्र की समानता में बना रहा है।      

रोमियों 8:26-39

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