27 फरवरी : सहायता करने वाले शब्द

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27 फरवरी : सहायता करने वाले शब्द
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“एक ही मुँह से धन्यवाद और शाप दोनों निकलते हैं। हे मेरे भाइयो, ऐसा नहीं होना चाहिए। क्या सोते के एक ही मुँह से मीठा और खारा जल दोनों निकलता है? क्या अंजीर के पेड़ में जैतून, या दाख की लता में अंजीर लग सकते हैं? वैसे ही खारे सोते से मीठा पानी नहीं निकल सकता।”  याकूब 3:10-12

हमारे जीवन में हम अन्याय, निर्दयता, अप्रिय परिस्थितियों और प्रायः अप्रिय लोगों का सामना करते हैं। इन परिस्थितियों में मौखिक रूप से प्रतिक्रिया देने से पहले हमें अपने प्रभु से सीखी गई इस सच्चाई को स्मरण करना चाहिए कि हमारे शब्द हमारे हृदयों को दर्शाते हैं (मत्ती 12:34)। यदि हमारे शब्द मसीह के समान नहीं हैं, तो हमें सबसे पहले अपने मुँह को नहीं परन्तु अपने हृदयों को देखना चाहिए। इसी प्रकार, जब हम संघर्ष और चुनौती का उत्तर ऐसे शब्दों से देते हैं जो हानि पहुँचाने के स्थान पर सहायता करते हैं, तो यह हमारे भीतर हमारे प्रभु के कार्य का संकेत देता है।

हमारी जीभ में अपार शक्ति होती है, और हम उनका उपयोग सहायता करने, प्रोत्साहित करने, पुष्टि करने, समृद्ध करने, मेल-मिलाप करने, क्षमा करने, एक करने, शान्त करने और आशीष देने के लिए कर सकते हैं। यह मात्र एक संयोग नहीं है कि पुराने नियम के बहुत सारे नीतिवचनों के पद हमारे द्वारा बोले गए शब्दों को सम्बोधित करते हैं। सुलैमान के अनुसार “धर्मी का मुँह तो जीवन का सोता है” (नीतिवचन 10:11)। वह शब्दों के इस प्रयोग की तुलना उन सुन्दर बालियों से करता है, जो उसे पहनने वाली की सुन्दरता को निखारती हैं और उन सुन्दर आभूषणों से करता है जो घर की सुन्दरता को बढ़ाते हैं (नीतिवचन 25:12)। सम्भवतः वाणी की शक्ति के बारे में उसका सबसे उत्कृष्ट कथन उसका यह अवलोकन है, “जैसे चाँदी की टोकरियों में सोने के सेब हों, वैसा ही ठीक समय पर कहा हुआ वचन होता है” (वचन 11)।

वह क्या है, जिससे ऐसी जीवनदायक भाषा प्राप्त होती है? हमारे मुँह कैसे दूसरों के लिए आशीष ला सकते हैं? आशीष के शब्द “प्रेम में सच्चाई से चलते हुए” सच्चरित्रता से भरे होते हैं (इफिसियों 4:15)। वे विचारशील होते हैं, जो उस व्यक्ति द्वारा बोले जाते हैं जो “मन में सोचता है कि क्या उत्तर दूँ” (नीतिवचन 15:28)। वे प्रायः कम होते हैं और तर्कों से भरे होते हैं: “जो सम्भलकर बोलता है, वह ज्ञानी ठहरता है, और जिसकी आत्मा शान्त रहती है, वही समझ वाला पुरुष ठहरता है” (नीतिवचन 17:27)। और, निस्सन्देह, सहायक शब्द कोमल शब्द होते हैं। यद्यपि कठिन परिस्थितियों में इसे स्मरण रखना कठिन हो सकता है, तौभी यह सच है कि “कोमल उत्तर सुनने से गुस्सा ठण्डा हो जाता है” (नीतिवचन 15:1)। निस्सन्देह, नैतिक क्षमता से कोमल प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है; निरंकुश धुन और क्रोध को स्थान देने की तुलना में कोमलता के साथ उत्तर देने के लिए कहीं अधिक आत्म-संयम की आवश्यकता होती है।

आपके शब्दों की पहचान क्या होगी? क्या आप अपनी जीभ का उपयोग, जो आपके शरीर का एक छोटा-सा किन्तु अति-शक्तिशाली अंग है, शाप देने के बदले आशीष देने के लिए, जीवन नष्ट करने के बदले जीवन देने के लिए और हानि पहुँचाने के बदले सहायता करने के लिए समर्पित करेंगे?

आज ही संकल्प लें कि अपने हृदय में मसीह का आदर करते हुए और अपनी वाणी में उसकी मीठी सुगन्ध को भरते हुए आप अपने शब्दों का उपयोग उन लोगों की भलाई के लिए करेंगे जिनके साथ आप बातचीत करते हैं। फिर दीनतापूर्वक स्वीकार करें कि आप स्वयं ऐसा नहीं कर सकते (याकूब 3:8) और उससे कहें कि वह आपको अपने आत्मा से भरे, उस आत्मा से जो आपके हृदय और आपकी वाणी दोनों में शान्ति, कोमलता और संयम को विकसित करता है (गलातियों 5:22-23)।      
गलातियों 5:16-25

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