ArchivesTruth For Life

9 मई : पूरी सहानुभूति

Alethia4India
Alethia4India
9 मई : पूरी सहानुभूति
Loading
/

“इस कारण उसको चाहिए था, कि सब बातों में अपने भाइयों के समान बने; जिससे वह उन बातों में जो परमेश्‍वर से सम्बन्ध रखती हैं, एक दयालु और विश्वासयोग्य महायाजक बने ताकि लोगों के पापों के लिए प्रायश्चित करे। क्योंकि जब उसने परीक्षा की दशा में दुख उठाया, तो वह उनकी भी सहायता कर सकता है जिनकी परीक्षा होती है।” इब्रानियों 2:17-18

हममें से कई लोग इस बात से हतोत्साहित होते हैं कि हमें कितनी बार प्रलोभन का सामना करना पड़ता है। हम अपने जीवन में प्रलोभन के अपार आकर्षण से शर्मिन्दा हो सकते हैं। यह हम पर पूरी तरह से हावी हो सकता है। ऐसे क्षणों में यह याद रखना महत्त्वपूर्ण है कि प्रलोभन का अनुभव करना अपने आप में पाप नहीं है—क्योंकि मसीह ने भी, जो निष्पाप था, इसका सामना किया था। लेकिन क्योंकि उसने प्रलोभनों के आगे आत्मसमर्पण नहीं किया, जैसा कि हम अक्सर करते हैं, इसलिए धार्मिकता का पालन करने में वह हमारे लिए परम आदर्श है।

जब मसीह ने मानव स्वभाव को अपनाया, तो वह इसकी सीमाओं और परीक्षणों के अधीन हो गया। इसलिए, हालाँकि यीशु परमेश्वर का दिव्य पुत्र और हमारा महान महायाजक है, केवल एक सामान्य इंसान नहीं है, हम यह जानकर हिम्मत पा सकते हैं कि वह हमारे संघर्षों के साथ पूरी तरह से सहानुभूति रख सकता है।

आपके और मेरे सामने आने वाली परीक्षाओं के मध्य में मसीह की सहानुभूति पाप के अनुभव पर निर्भर नहीं है, बल्कि पाप के प्रलोभन के अनुभव पर निर्भर है, जिसे केवल वही पूरी तरह जान सकता है जो वास्तव में निष्पाप है। यीशु दूर रहकर सहानुभूति नहीं दिखाता; वह प्रलोभन का सामना करने की पीड़ा और चुनौती को गहराई से जानता है। उसने हमारी पृथ्वी पर की राहों पर चलकर इसे अनुभव किया है।

तो फिर, जब आप प्रलोभन का सामना करने के बारे में सबसे ज्यादा जागरूक होते हैं और अपनी कमजोरियों के बारे में सबसे ज्यादा जागरूक होते हैं, तब आप इस स्थान पर जा सकते हैं। 21वीं सदी के “महान प्रधान याजकों” की सांसारिक बुद्धि पर भरोसा मत करें, जो आपको बताएँगे कि प्रलोभन इच्छाओं को पूरा करने के लिए ही आते हैं, कि दोषी महसूस करना एक बीमारी है जिसे नकारा जाना चाहिए, और कि शर्म हमेशा अनावश्यक और हानिकारक होती है। इसके बजाय सच्चे महान महायाजक की ओर मुड़ें, जो आपको बताता है कि प्रलोभनों का प्रतिरोध किया जाना चाहिए और जो आपको ऐसा करने की शक्ति भी प्रदान करता है (1 कुरिन्थियों 10:13), और जो आपको यह भी आश्वस्त करता है कि जब आप प्रलोभनों में आत्मसमर्पण कर देते हैं, तो आपका दोष और शर्म उसके शरीर में सहन कर लिया गया है और क्रूस पर मिटा दिया गया।

प्रभु यीशु मसीह के साथ सम्बन्ध में सबसे सुन्दर बात यह है कि आप पूरे आत्मविश्वास के साथ उसके पास जा सकते हैं, जिसने आपके लिए अपने प्राण दे दिए ताकि आप अपने विश्वास को दृढ़ता से पकड़ सकें। आप नियमित रूप से, विनम्रता से, विश्वास के साथ सर्वशक्तिमान परमेश्वर की उपस्थिति में आ सकते हैं, जो आपको सहानुभूति देने वाले मसीह के माध्यम से आपका स्वागत करता है। और अन्ततः, अनन्त काल में ऐसा कुछ भी नहीं होगा जिसके लिए मसीह को आपके पक्ष में प्रार्थना करने की आवश्यकता होगी। आप बस परमेश्वर के सामने खड़े हो सकेंगे और इस बात के लिए उसकी वन्दना कर सकेंगे कि उसने अपनी सिद्ध उपस्थिति में प्रवेश करने का निमन्त्रण आपको दिया। तब तक, उससे प्रार्थना करें जो यह जानता है कि प्रलोभन का सामना करना और प्रतिरोध करना क्या होता है, ताकि वह प्रलोभनों से आपके युद्ध के समय और आज आपके द्वारा उसके आज्ञापालन के प्रयासों में वह आपके साथ हो।

इब्रानियों  2:5-18

8 मई :आत्मा का सामर्थ्य

Alethia4India
Alethia4India
8 मई :आत्मा का सामर्थ्य
Loading
/

“परन्तु जब पवित्र आत्मा तुम पर आएगा तब तुम सामर्थ्य पाओगे; और यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया में, और पृथ्वी की छोर तक मेरे गवाह होगे।”  प्रेरितों 1:8

पवित्र आत्मा हमें इसलिए दिया गया है ताकि परमेश्वर के लोग परमेश्वर के वचन को परमेश्वर के संसार में लाकर फैलाएँ।

पवित्र आत्मा के बिना प्रेरितों की पुस्तक की घटनाएँ कभी नहीं हो पाती—जिसमें सुसमाचार के विस्तार की कहानी बताई गई है, जिसमें यीशु के चेले यरूशलेम की सड़कों पर जाकर मृतकों में से जी उठे मसीह के सन्देश का प्रचार करते हैं। आखिरकार, कुछ हफ्ते पहले यही शिष्य अपने क्रूसित राजा के लिए शोक करते हुए एक डरे-सहमे छोटे से समूह के रूप में बन्द दरवाजों के पीछे छिपे बैठे थे। उनके अचानक बदलाव का कारण क्या था?

इसका उत्तर यीशु की मृत्यु पर विजय और उस प्रतिज्ञा में पाया जाता है जो उसने अपने शिष्यों को दी थी—पवित्र आत्मा की प्रतिज्ञा, जो उन्हें सक्षम और सशक्त बनाने के लिए था। यह प्रतिज्ञा एक आदेश के साथ जुड़ी हुई थी: यीशु के अनुयायियों को पूरे संसार में जाकर खुशखबरी का प्रचार करना था।

इससे पहले कि शिष्य उत्साह से बाहर निकलते, यीशु ने उनके ध्यान को केन्द्रित किया। वे अभी तक यह नहीं समझ पाए थे कि उनकी चिन्ता सिर्फ इस्राएल तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह सभी लोगों के लिए थी। (और इस सत्य को पूरी तरह से समझने में उन्हें और समय लगने वाला था: प्रेरितों 10:1 – 11:18 देखें।) इसलिए यीशु ने अपने अनुयायियों से कहा कि वे “यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया में, और पृथ्वी की छोर तक मेरे गवाह होगे।”

यीशु के स्वर्गारोहण के बाद पवित्र आत्मा उसके अनुयायियों पर उतरा, जैसा कि यीशु ने प्रतिज्ञा की थी—और तब कलीसिया के पूरे संसार में फैलने की महान कहानी शुरू हुई। यह ऐसी कहानी है जो अभी तक खत्म नहीं हुई है, और इसमें हर एक विश्वासी शामिल है, क्योंकि सुसमाचार का संसार में हर जगह प्रचार हो रहा है।

यदि आप मसीह में हैं, तो आपके पास वही पवित्र आत्मा है, और आप उसकी शक्ति से यीशु के सत्य को पूरे संसार में फैलाने के लिए सक्षम हैं। पवित्र आत्मा हमें इसलिए नहीं दिया गया था कि हम बस बैठकर अपने आध्यात्मिक अनुभवों के बारे में अन्य मसीहियों से बातें करते रहे। बल्कि हमें अपने उपहारों और क्षमताओं का उपयोग करके सुसमाचार को सभी जातियों तक पहुँचाने के लिए भेजा गया है। हममें से कुछ के लिए इसका मतलब है विदेशों में मिशन पर जाना। दूसरों के लिए इसका मतलब है इसी मिशन के हिस्से के रूप में अपने रास्ते या अपने शहर में सुसमाचार का प्रचार करना।

परमेश्वर आपको उन लोगों से भी प्रेम करने और सेवा करने के लिए बुलाता है, जिनके साथ आपकी कोई सामान्य सांसारिक नागरिकता नहीं है। वह आपको विभाजन रेखाओं को पार करने और उन लोगों के पास आने के लिए बुलाता है, जिनके प्रति आप स्वाभाविक रूप से उदासीन होते हैं, या यहाँ तक कि जिनसे साथ आपकी शत्रुता हो। लेकिन वह आपको वह प्रेम और साहस इकट्ठा करने के लिए नहीं कहता, जिसकी इसके लिए आवश्यकता है। नहीं—हमें एक ऐसी शक्ति से परिवर्तित होना होगा, जो हमारे भीतर से नहीं बल्कि बाहर से आती है, और यही वह प्रतिज्ञा है जो यीशु ने की थी और जो पवित्र आत्मा प्रदान करता है। इसलिए आज आप अपने जीवन में पवित्र आत्मा को ताजगी से उण्डेलने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करें, ताकि आप साहस और उत्साह के साथ खुशखबरी का प्रचार कर सकें।

प्रेरितों 1:1-11

7 मई : हम किसी न किसी की आराधना करते हैं

Alethia4India
Alethia4India
7 मई : हम किसी न किसी की आराधना करते हैं
Loading
/

“मैं अन्धों को एक मार्ग से ले चलूँगा जिसे वे नहीं जानते और उनको ऐसे पथों से चलाऊँगा जिन्हें वे नहीं जानते। उनके आगे मैं अन्धियारे को उजियाला करूँगा और टेढ़े मार्गों को सीधा करूँगा। मैं ऐसे-ऐसे काम करूँगा और उनको न त्यागूँगा। जो लोग खुदी हुई मूरतों पर भरोसा रखते और ढली हुई मूरतों से कहते हैं, ‘तुम हमारे परमेश्वर हो,’ उनको पीछे हटना और अत्यन्त लज्जित होना पड़ेगा।” यशायाह 42:16-17

बॉब डिलन के शब्दों में, आपको किसी न किसी की सेवा करनी होगी।[1] यह सच है—हम सभी किसी न किसी की उपासना करते हैं। सवाल सिर्फ यह है कि हम किसकी उपासना करते हैं।

हमारी मानवीय मूर्खता के कारण, हम अक्सर अपनी खुद की चालाकी से बनाई हुई छोटी-छोटी सृजनाओं पर निर्भर हो जाते हैं और अन्त में उनकी उपासना करने लगते हैं। पूरे इतिहास में, मनुष्यों की बुनियादी समस्या यह रही है कि हम हमेशा झूठे देवता बनाते रहते हैं, जिनकी पूजा करके हम झूठी मुक्ति ढूँढते रहते हैं। ये मूर्तियाँ सच्चे परमेश्वर का स्थान लेने के लिए लोगों द्वारा अपने दिलों से बनाई जाती हैं। प्रभु को अपनी श्रद्धा का केन्द्र और सन्तोष का स्रोत मानने की बजाय हम उन अच्छी वस्तुओं को, जो उसने हमारे आनन्द के लिए बनाई हैं, उसके स्थान पर व्यर्थ के विकल्पों में बदल देते हैं।

सी.एस. लुईस इसे इस तरह से कहते हैं: “हम आधे-अधूरे दिल से चलने वाले प्राणी हैं, जो शराब, सेक्स और महत्वाकांक्षाओं में फँसे रहते हैं, जबकि हमें अनन्त आनन्द दिया जा रहा है, ठीक वैसे ही जैसे झुग्गी-झोंपड़ियों में रहने वाला एक अनजान बच्चा कीचड़ में खेलता रहता है, क्योंकि वह नहीं जानता कि समुद्र के किनारे छुट्टियाँ मनाने का क्या अर्थ होता है। हम बहुत आसानी से खुश हो जाते हैं।”[2]

हम चाहे दिल से बनाए गए किसी भी विकल्प पर अपनी जिन्दगी को आश्रित रखें, हम यह भूल जाते हैं कि ये मूर्तियाँ शक्तिहीन होती हैं। ये हमारी मदद नहीं कर सकतीं। जैसा कि यशायाह ने स्पष्ट किया है, इन मूर्तियों ने न तो कभी भविष्य बताया है और न ही कभी अतीत पर विचार करने में हमारी मदद की है; न ही ये हमें मार्गदर्शन दे सकती हैं। ये हमारे सवालों का जवाब केवल चुप्पी और निराशाजनक अपेक्षाओं के साथ देती हैं (यशायाह 41:22-23, 28-29)।

केवल सच्चा और जीवित परमेश्वर ही आरम्भ से अन्त तक सब कुछ जानता है। उसने चुप्पी को तोड़ा और आने वाली घटनाओं के बारे में बताया। वह अंधकार को अपनी रोशनी से हराता है। वह अधर्म के “कठिन स्थानों” को धार्मिकता की “समतल भूमि” में बदल देता है। हालाँकि हमने एक बार उससे मुँह मोड़ लिया था, तौभी उसने अपने सेवक, हमारे अद्‌भुत मार्गदर्शक, यीशु को भेजा।

आप और मैं लगातार उन मूर्तियों से घिरे होते हैं जो हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए हमें पुकारती रहती हैं और हमें परमेश्वर को छोड़कर उनके भीतर सन्तोष खोजने के लिए ललचाती हैं। कौन सी मूर्तियाँ आपको सबसे अधिक ऊँची आवाज़ में पुकारती हैं? जान लें कि वे झूठ बोल रही हैं (हालाँकि वे आपको यह नहीं बतातीं)। परमेश्वर का वचन हमें इनकी उपासना करने से आने वाली शर्म की चेतावनी देता है और हमें एक बेहतर रास्ता दिखाता है: उसकी उपासना करने और उससे सेवा प्राप्त करने में सन्तोष पाना।

आज आपको किसी न किसी की सेवा करनी होगी। सुनिश्चित कर लें कि वह जीवित, प्रेम करने वाला परमेश्वर हो।

 रोमियों 1:16-32

6 मई : सेंतमेंत दिया गया

Alethia4India
Alethia4India
6 मई : सेंतमेंत दिया गया
Loading
/

“तौभी तुम ने भला किया कि मेरे क्लेश में मेरे सहभागी हुए। हे फिलिप्पियो, तुम आप भी जानते हो कि सुसमाचार प्रचार के आरम्भ में, जब मैं मकिदुनिया से विदा हुआ, तब तुम्हें छोड़ और किसी मण्डली ने लेने देने के विषय में मेरी सहायता नहीं की।”  फिलिप्पियों 4:14-15

मसीही होने का अर्थ प्राप्त करने वाला और देने वाला होना है।

हममें से बहुतों को यह सिखाया गया है कि अपने रिटायरमेण्ट अकाउण्ट में नियमित रूप से निवेश करना कितना जरूरी है। लेकिन जहाँ समझदारी से आर्थिक फैसले लेना गलत नहीं है, वहीं एक विश्वासी के रूप में हमें अपनी उदारता और निवेश को अनन्तकाल के नजरिए से भी देखना चाहिए।

फिलिप्पी की कलीसिया को लिखे अपने पत्र में, प्रेरित पौलुस ने मसीह में अपने भाइयों और बहनों की इस बात के लिए सराहना की कि उन्होंने उसके संघर्ष में साझेदारी की—ऐसी साझेदारी जिसमें भौतिक उपहारों को साझा करना और देना भी शामिल था। फिलिप्पियों की उदारता अद्वितीय थी क्योंकि अन्य कलीसियाओं से उसे ऐसा कोई सहयोग नहीं मिला था। हालाँकि यह कलीसिया नई-नई स्थापित हुई थी, फिर भी उन्होंने शुरू से ही ठान लिया था कि वे सुसमाचार के कार्य में पौलुस का समर्थन करेंगे।

पौलुस के लिए उनका सहयोग सिर्फ विशिष्ट नहीं बल्कि स्थाई भी था। फिलिप्पियों की कलीसिया कभी-कभार देने वाली नहीं थी, बल्कि वे लगातार और निरन्तर पौलुस की जरूरतों को पूरा करने का प्रयास करते रहे। हालाँकि पौलुस द्वारा पहली बार उन्हें सुसमाचार सुनाए एक दशक बीत चुका था, लेकिन वे अब भी उसके साथ खड़े थे।

उनका दान भावनाओं के किसी क्षणिक उभार का या किसी बाहरी दबाव या प्रलोभन का परिणाम नहीं था। नहीं, यह आरम्भिक कलीसिया इस सच्चाई को समझती थी कि जो कुछ उनके पास था, वह सब परमेश्वर की देन थी। जब यीशु ने अपने चेलों को भेजा था, तो उसने उन्हें याद दिलाया था कि “तुमने सेंतमेंत पाया है, सेंतमेंत दो।” (मत्ती 10:8)। दूसरे शब्दों में, बलिदानी, उदार और संसाधन साझा करने वाली सहभागिता की नींव परमेश्वर का अनुग्रह है। यह नींव तब स्थापित होती है जब हम समझ जाते हैं कि हम जो कुछ हैं और हमारे पास जो कुछ है—हमारे सारे संसाधन, हमारे वरदान, और हमारी क्षमताएँ—सब उसी से आए हैं।

हम सबके पास देने के लिए समान साधन या सामर्थ्य नहीं है, और आर्थिक सहायता ही दान देने का एकमात्र तरीका नहीं है! लेकिन क्योंकि हम सब परमेश्वर के अनुग्रह के प्राप्तकर्ता हैं, इसलिए हमें दूसरों को देने की लालसा भी रखनी चाहिए। परमेश्वर ने अपने लोगों को इस प्रकार एक साथ रखा है कि हर कोई “उस अनुग्रह के अनुसार जो हमें दिया गया है,” दे (रोमियों 12:6)। हमें न तो इसलिए देना चाहिए क्योंकि हमें मजबूर किया गया है, न इसलिए कि कोई भावनात्मक गीत सुनकर हमारी आँखों में आँसू आ गए, और न ही इसलिए कि हमारा नाम किसी इमारत या बेंच पर लिखा जाएगा। हमें सिर्फ एक ही कारण से देना चाहिए—क्योंकि परमेश्वर ने हमें स्वतन्त्र रूप से और उदारता से दिया है।

2 कुरिन्थियों 9:1-15

5 मई : मन्दिर का शुद्धीकरण

Alethia4India
Alethia4India
5 मई : मन्दिर का शुद्धीकरण
Loading
/

“तब उसने रस्सियों का कोड़ा बनाकर, सब भेड़ों और बैलों को मन्दिर से निकाल दिया, और सर्राफों के पैसे बिखेर दिये और पीढ़ों को उलट दिया . . . तब उसके चेलों को स्मरण आया कि लिखा है, ‘तेरे घर की धुन मुझे खा जाएगी।’” यूहन्ना 2:15, 17

कोई भी पिता स्वाभाविक रूप से गुस्से से जल उठेगा यदि वह देखेगा कि नशा उसके बच्चे के जीवन को नष्ट कर रहा है। हम यह उम्मीद नहीं करेंगे कि वह इसे हल्के में लेगा। नहीं, बल्कि हम यह अपेक्षा करेंगे कि वह उस बुराई को मिटाने और अपने बच्चे को बचाने के लिए हर सम्भव प्रयास करेगा।

जब परमेश्वर-पुत्र यीशु पृथ्वी पर अपने पिता के घर में—यरूशलेम के मन्दिर—में आया और चारों ओर देखा, तो सारा दृश्य उसके लिए पीड़ादायक था। जो स्थान परमेश्वर की उपासना के लिए बनाया गया था, वह धन की पूजा का केन्द्र बन गया था। जो स्थान संसार को जीवित परमेश्वर से मिलने का बुलावा देने के लिए बनाया गया था, वह ऐसा स्थान बन गया था जो अन्यजातियों को दूर रखता था। उसे यह असहनीय लगा कि परमेश्वर के नाम और उसकी महिमा को अपमानित और कलंकित किया जा रहा था। हमें यीशु के कार्य के औचित्य पर प्रश्न उठाने की कोई आवश्यकता नहीं है। मसीह का पवित्र क्रोध लगन और पवित्रता से जल उठा। यह शिष्ट वार्ता का समय नहीं था।

यीशु को पता था कि मन्दिर का उद्देश्य क्या था। यह परमेश्वर से मिलने का स्थान था। यह पूरी पृथ्वी के लिए आनन्द का स्रोत था। लेकिन उसने वहाँ जो देखा, वह पूरी तरह इसके उद्देश्य के विपरीत था—और उसने अपने शब्दों और कार्यों से इसे पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया।

जब बाद में फरीसियों ने यीशु का सामना किया, तो उन्होंने उसके कामों को गलत नहीं ठहराया; बल्कि उन्होंने उसके अधिकार पर सवाल उठाया। जवाब में यीशु ने उलझन में डालने वाला यह कथन कहा, “इस मन्दिर को ढा दो, और मैं इसे तीन दिन में खड़ा कर दूँगा” (यूहन्ना 2:19)। यूहन्ना बताता है कि यीशु जिस मन्दिर की बात कर रहा था, वह उसका अपना शरीर था (पद 21)। एक दिन यीशु यरूशलेम में आने पर था, लेकिन इस बार उसका उद्देश्य मन्दिर में जाना नहीं था, बल्कि अपने शरीर और लहू को बलिदान के रूप में अर्पित करना और फिर मृतकों में जी उठना तथा सदा के लिए शासन करना था। इसी अधिकार के साथ उसने यह अन्तर स्पष्ट कर दिया कि परमेश्वर ने मन्दिर को क्या बनने के लिए निर्धारित किया था और लोगों ने उसे क्या बना दिया था।

यहाँ हमें एक ऐसा यीशु दिखता है जो समझौता नहीं करता—जो परमेश्वर की महिमा की रक्षा के लिए पूरी लगन के साथ प्रतिबद्ध है। यह यीशु कोई नम्र और दीन व्यक्ति या हर किसी को खुश करने वाला और चुनौती न देने वाला व्यक्ति नहीं है। यह महायाजक है, जो केवल मन्दिर को साफ करने नहीं, बल्कि हमारे दिलों को शुद्ध करने और उन्हें परमेश्वर से जोड़ने भी आया था। उसी के द्वारा परमेश्वर ने एक सच्चा मन्दिर, “सब देशों के लोगों के लिए प्रार्थना का घर” (यशायाह 56:7) स्थापित किया।

इसलिए यीशु को सही दृष्टि से देखें—जिसने परमेश्वर की महिमा के लिए कोई समझौता नहीं किया और सभी लोगों को सही रीति से उसकी आराधना करने में सक्षम बनाया। यीशु को सही दृष्टि से देखें—जिसने अपनी सिद्धता और अधिकार का उपयोग हमारे स्थान पर हमारे पापों की सजा सहने के लिए किया, ताकि हम बच सकें। यीशु को सही दृष्टि से देखें—जिसका अद्‌भुत अनुग्रह आपको प्राप्त हुआ है। और जैसे उसने परमेश्वर की महिमा के लिए जोश दिखाया, वैसे ही आपका दिल भी उसके लिए जोश से भरा रहे।

मत्ती 27:35-56

4 मई : यीशु राजा है

Alethia4India
Alethia4India
4 मई : यीशु राजा है
Loading
/

“फिर मैं ने स्वर्ग में और पृथ्वी पर और पृथ्वी के नीचे और समुद्र की सब सृजी हुई वस्तुओं को, और सब कुछ को जो उनमें हैं, यह कहते सुना, ‘जो सिंहासन पर बैठा है उसका और मेमने का धन्यवाद और आदर और महिमा और राज्य युगानुयुग रहे!’” प्रकाशितवाक्य 5:13

बाइबल बहुत स्पष्ट रीति से बताती है कि इतिहास एक निश्चित उद्देश्य के साथ एक निश्चित अन्त की ओर बढ़ रहा है। यही सच्चाई बाइबल के दृष्टिकोण की एक अनूठी विशेषता है। दूसरे शब्दों में, मसीही विश्वास इस बात में सबसे अलग है कि सभी चीज़ों का अन्त कैसे होगा।

कई बार जब हम पुरानी तस्वीरें देखते हैं, तो हम खुद से पूछते हैं, “मैं इस तस्वीर में कहाँ हूँ?” या, “क्या मैं इस तस्वीर में हूँ भी?” लेकिन जब बात परमेश्वर की योजना की आती है, तो प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में दिखाए गए इतिहास के चित्र में हर एक व्यक्ति शामिल है। कोई भी इस कहानी से बाहर नहीं है। और जब इतिहास अपने अन्तिम चरण में पहुँचेगा, तो यह विभाजन और अलगाव के साथ समाप्त होगा।

यीशु ने इस विभाजन के बारे में तब बात की जब उसने कहा कि भेड़ें और बकरियाँ अलग की जाएँगी (मत्ती 25:31-46): प्रकाश और अन्धकार अलग किए जाएँगे, और जो यीशु में विश्वास रखते हैं, वे उन लोगों से अलग किए जाएँगे जो उस पर विश्वास नहीं रखते। कोई भी इससे बाहर नहीं होगा, लेकिन दुखद रूप से, कुछ लोग स्वयं को इस आशीष से वंचित करने का चुनाव करेंगे। इसलिए इस बड़े चित्र में हमारी स्थिति महत्त्व रखती है।

इतिहास के उतार-चढ़ाव को इस दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए कि स्वर्ग में एक सिंहासन है, और वह खाली नहीं है; बल्कि उस पर परमेश्वर विराजमान है, जो सब कुछ पर सम्पूर्ण नियन्त्रण किए हुए है। यीशु राजा है, और वह परमेश्वर के दाएँ हाथ पर विराजमान है। भले ही बहुत से लोग अब तक उसके राज्य को न पहचानें, लेकिन इससे यह सच्चाई नहीं बदलती कि वह राज्य करते है।

चौथी शताब्दी के महान धर्मशास्त्री हिप्पोवासी ऑगस्टिन के शब्दों में, मानवजाति के पतन से लेकर समय के अन्त तक दो प्रतिद्वन्द्वी नगर हैं—दो अलग-अलग प्रेम। स्वाभाविक रूप से, हम मनुष्य के नगर में जी रहे हैं, और केवल परमेश्वर की कृपा से ही हम परमेश्वर के नगर में प्रवेश कर सकते हैं और उसके प्रति समर्पित हो सकते हैं।

पृथ्वी का नगर, मनुष्य का नगर, अन्ततः नष्ट हो जाएगा। लेकिन स्वर्गीय नगर, परमेश्वर का राज्य, हमेशा बना रहेगा। क्या हम यीशु को राजा के रूप में स्वीकार करते हैं? इस प्रश्न का उत्तर अनन्तकाल के लिए महत्त्वपूर्ण है। और यह केवल भविष्य के लिए ही नहीं, बल्कि हमारे वर्तमान जीवन के लिए भी मायने रखता है। यदि यीशु आपका राजा है, तो आप उसकी आज्ञाकारी प्रजा की तरह जीएँगे, भले ही उसकी आज्ञा आपकी इच्छाओं के विरुद्ध क्यों न हो। यदि यीशु आपका राजा है, तो आप सबसे बढ़कर उसके प्रति निष्ठावान रहेंगे, क्योंकि यह संसार आपका स्थाई घर नहीं है—आप तो यहाँ बस यात्री हैं। जैसा कि पौलुस ने लिखा, “हमारा स्वदेश स्वर्ग पर है; और हम एक उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के वहाँ से आने की बाट जोह रहे हैं” (फिलिप्पियों 3:20)।

इसलिए सुनिश्चित कर लें कि आप एक उत्तम देश के नागरिक और एक महान राजा की प्रजा के रूप में जीवन जी रहे हैं। हम समस्त सृष्टि के साथ मिलकर उसे आदर देने में अनन्तकाल व्यतीत करेंगे। आज भी, हमारे शब्दों और आचरण से हम यही करें।

भजन 24

3 मई : मजबूत आधार पर सुरक्षित

Alethia4India
Alethia4India
3 मई : मजबूत आधार पर सुरक्षित
Loading
/

“हे मेरे परमेश्‍वर यहोवा, मेरी ओर ध्यान दे और मुझे उत्तर दे, मेरी आँखों में ज्योति आने दे, नहीं तो मुझे मृत्यु की नींद आ जाएगी; ऐसा न हो कि मेरा शत्रु कहे, ‘मैं उस पर प्रबल हो गया; और ऐसा न हो कि जब मैं डगमगाने लगूँ तो मेरे शत्रु मगन हों। परन्तु मैं ने तो तेरी करुणा पर भरोसा रखा है; मेरा हृदय तेरे उद्धार से मगन होगा।” भजन 13:3-5

जब आप कैम्पिंग ट्रिप पर जाते हैं, तो सबसे ज़रूरी चीज़ों में से एक यह सुनिश्चित करना होता है कि आपके तम्बू के खूँटे ठोस ज़मीन में मजबूती से गाड़े गए हों। यह कदम पूरा हो जाने के बाद, आप अन्य गतिविधियों में अधिक निश्चिन्त होकर लग सकते हैं, यह जानते हुए कि आपका आश्रय किसी भी तूफान का सामना कर सकेगा—जो निश्चित रूप से इस विकल्प से बेहतर है कि आप लौटकर देखें कि आपका तम्बू उखड़ कर उड़ गया है!

इस पद में, दाऊद अपने जीवन में भुलाए जाने और निराश होने की भावना के साथ-साथ दूसरों द्वारा अनुचित विरोध का सामना करने पर प्रतिक्रिया दे रहा है। दाऊद सबसे पहले अपने मन को अपनी स्थिति पर केन्द्रित करता है; वह जो पहले से जानता है उसे याद करता है और परमेश्वर के अटल प्रेम में अपना विश्वास प्रकट करता है।

यह विश्वास उसकी इच्छा से उत्पन्न हुआ था। भले ही दाऊद के हृदय की भावनाएँ वास्तविक थीं, तौभी उसने अपने मनोभावों को परमेश्वर के चरित्र और उद्देश्यों के अधीन करने का निर्णय लिया। उसने अपनी आशा को—अपने हृदय के तम्बू के खूँटों को—परमेश्वर के स्थिर प्रेम और अटूट दया की ठोस ज़मीन में गाड़ दिया। केवल तभी वह फिर से आनन्दित हो सका।

नए स्वर्ग और नई पृथ्वी में जीवन के तूफान सदा के लिए शान्त हो जाएँगे। लेकिन तब तक, हमें आंधियों और तेज़ बारिश से होकर गुजरना पड़ेगा। हम उतनी ही अधिक खुशी के साथ इन्हें सहन कर पाएँगे, जितना कि हम अपने परमेश्वर पिता की बुद्धि पर भरोसा करेंगे। जब वह हमें कुछ नहीं देता, तो यह इसलिए होता है क्योंकि वह जानता है कि वह चीज़ हमारे पास न होना ही बेहतर है। जब वह हमें कोई कठिन स्थिति सौंपता है, तो यह इसलिए होता है क्योंकि वह हमें उस परिस्थिति में अपने अनुग्रह की गवाही देने का विशेष अवसर देता है। जब वह हमें बारिश से होकर ले जाता है, तो यह इसलिए होता है ताकि हम उसके और अधिक निकट आ सकें और हमारा चरित्र उसके समान बन सके (याकूब 1:2-4)।

जब हम अपने जीवन के सबसे कठिन अनुभवों के बिखरे हुए टुकड़ों को देखते हैं, तो ऐसा लग सकता है कि सब कुछ टूटकर गिरने वाला है। लेकिन ऐसे समय में, हम याद कर सकते हैं कि परमेश्वर “राख दूर करके सुन्दर पगड़ी बाँधता है और विलाप दूर करके हर्ष का तेल लगाता है और उदासी हटाकर यश का ओढ़ना ओढ़ाता है” (यशायाह 61:3)। हमारे सामने आने वाली हर परीक्षा हमें यह याद दिलाने का अवसर है कि दाऊद के समान हमारे लिए भी परमेश्वर का अटल प्रेम ही है, जो हमारे प्राणों को सुरक्षित रखता है और हमें उसके उद्धार में आनन्दित होने का कारण देता है।

आज, हममें से हर एक को यह प्रार्थना करनी चाहिए, “प्रभु यीशु मसीह, मेरे जीवन के खूँटे तेरे स्थिर प्रेम में दृढ़ता से गाड़ दे, ताकि जीवन और मृत्यु में, आनन्द और शोक में, स्वास्थ्य और बीमारी में, मैं आनन्दित रह सकूँ।”

इब्रानियों 12:3-11

2 मई : उसकी मृत्यु का उद्देश्य हमें पवित्र करना था

Alethia4India
Alethia4India
2 मई : उसकी मृत्यु का उद्देश्य हमें पवित्र करना था
Loading
/

“क्या तुम नहीं जानते कि अन्यायी लोग परमेश्‍वर के राज्य के वारिस न होंगे? धोखा न खाओ; न वेश्यागामी, न मूर्तिपूजक, न परस्त्रीगामी, न लुच्‍चे, न पुरुषगामी, न चोर, न लोभी, न पियक्‍कड़, न गाली देनेवाले, न अन्धेर करने वाले परमेश्‍वर के राज्य के वारिस होंगे। और तुम में से कितने ऐसे ही थे, परन्तु तुम प्रभु यीशु मसीह के नाम से और हमारे परमेश्‍वर के आत्मा से धोए गए और पवित्र हुए और धर्मी ठहरे।” 1 कुरिन्थियों 6:9-11

दुष्ट शैतान इसमें कोई रुचि नहीं रखता कि वह हमें हमारे कई मसीही कार्यों को छोड़ने के लिए मजबूर करे—लेकिन वह इसमें बहुत रुचि रखता है कि हम परमेश्वर के स्वभाव और चरित्र से सम्बन्धित परम सत्यों को और उसके राज्य की नैतिकता से सम्बन्धित परम सत्यों को छोड़ दें। इसे समझते हुए, पौलुस ने कुरिन्थुस के विश्वासियों को चेतावनी दी कि वे ईश्वरहीन आचरण के खतरनाक क्षेत्र में न चले जाएँ। पौलुस कहता है, “धोखा न खाना” क्योंकि अधर्मी लोग “परमेश्‍वर के राज्य के वारिस नहीं होंगे।”

पौलुस ऐसे कई बुरे आचरणों का विवरण देता है, जो कुरिन्थुस में कई सामाजिक तौर पर स्वीकार्य माने जाते थे। यह शहर व्यापार का एक बड़ा केन्द्र था, जहाँ विभिन्न जातियों, आस्थाओं और भाषाओं के लोग बसे थे। लेकिन संस्कृति के रूप में यह शहर दिशाहीन और उग्र था। वास्तव में, यह इतना भ्रष्ट था कि “कुरिन्थुस” शब्द ही अनैतिकता का प्रतीक बन गया था। तो पौलुस ने क्या किया? वह एक योजना के साथ वहाँ गया। वह “वचन सुनाने की धुन में यहूदियों को गवाही देने लगा कि यीशु ही मसीह है” (प्रेरितों 18:5)। उसका उद्देश्य कोई कानून लागू करना नहीं था, बल्कि सत्य का प्रचार करना था।

कोई भी कानूनी व्यवस्था संस्कृति में सुधार नहीं ला सकती। इसके बजाय, परमेश्वर ने एक सन्देश दिया है जो पुरुषों और महिलाओं को स्वतन्त्र करने वाला सन्देश है और वह सन्देश केवल इतना है: “यीशु मसीह वरन् क्रूस पर चढ़ाए हुए मसीह को छोड़” और कोई है ही नहीं (1 कुरिन्थियों 2:2)। सुसमाचार ही इस संसार के लिए परमेश्वर की योजना है। वह अपने वचन की शक्ति और विश्वास से लोगों के जीवन में कार्य करता है और उन्हें पूरी तरह बदल देता है।

पौलुस ने जटिल तर्कों में विश्वास नहीं किया। उसके पास केवल एक सन्देश था, और वह बार-बार उसी को कहता रहा। वह जानता था कि केवल मसीह की क्रूस पर दी गई बलि ही पुरुषों और महिलाओं को उनके पापों से मुक्त कर सकती है, ताकि वे “नए जीवन की सी चाल” चलें (रोमियों 6:4)।

पाप में बने रहना न केवल खतरनाक है, बल्कि यह अनावश्यक भी है। आज भी सुसमाचार का सन्देश उतना ही स्पष्टता और प्रभावशाली रूप से गूंज रहा है जितना कि कुरिन्थुस की गलियों में गूंजा था। यह संसार के भ्रामक विचारों और इस धारणा को काटता है कि केवल कानून ही लोगों के हृदयों को बदल सकता है या उनमें विश्वास उत्पन्न कर सकता है। हमारे जीवन, हमारे शहरों और हमारे राष्ट्रों की सबसे बड़ी जरूरत यही है कि पापियों को उद्धार मिले। इस धोखे में मत आना कि पाप कोई मायने नहीं रखता। इस धोखे में मत आना कि हमारे समाज को परमेश्वर के राज्य के सुसमाचार से बढ़कर किसी और चीज़ की अधिक जरूरत है। हमें क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह का सन्देश स्वीकार करने और प्रचार करने की आवश्यकता है:

वह मरा कि हम क्षमा पाएँ,

वह मरा कि हम धर्मी बनें,

कि हम अन्ततः स्वर्ग जा सकें,

उसके अनमोल लहू से बचाए जा सकें[1]

प्रेरितों 18:1-11

1 मई : सोता हुआ उद्धारकर्ता

Alethia4India
Alethia4India
1 मई : सोता हुआ उद्धारकर्ता
Loading
/

“पर वह आप पिछले भाग में गद्दी पर सो रहा था। तब उन्होंने उसे जगाकर उससे कहा, ‘हे गुरु, क्या तुझे चिन्ता नहीं कि हम नष्ट हुए जाते हैं?’ तब उसने उठकर आँधी को डाँटा, और पानी से कहा, ‘शान्त रह, थम जा!’” मरकुस 4:38-39

शिष्यों की स्थिति में खुद को रखकर देखें, जब वे तूफानी समुद्र में नाव चला रहे थे और यीशु नाव के पिछले हिस्से में सो रहा था। उनमें से कई अनुभवी मछुआरे थे और जानते थे कि डूबने का खतरा बहुत वास्तविक था—फिर भी उनका गुरु गहरी नींद में था, मानो उसने उन्हें इस संकट में अकेला छोड़ दिया हो।

यह तथ्य, कि यीशु को नींद की जरूरत थी, दिखाता है कि उसके पास एक वास्तविक मानवीय शरीर था, जो थकान, प्यास और भूख को महसूस करता था। उसने शारीरिक दुर्बलताओं का स्वयं अनुभव किया। यहाँ तक कि वे सोने के लिए तकिया ढूँढने की परेशानी से भी गुजरा, जिससे यह पता चलता है कि वह जानता था कि असुविधा क्या होती है। जिसने सारी सृष्टि की रचना की, वह चाहते तो उस लकड़ी को एक आरामदायक बिस्तर में बदल सकता था, लेकिन इसके बजाय, महिमा के प्रभु ने हमारे जैसे ही एक तकिए पर सिर रखा।

यदि यीशु ने मानवीय दुर्बलताओं और प्रलोभनों को अनुभव न किया होता, तो वह एक करुणामय महायाजक न होता, जो हमें स्वर्गीय सिंहासन से दया और अनुग्रह प्रदान कर सकता (इब्रानियों 4:14-16)। लेकिन बाइबल स्पष्ट रूप से बताती है कि उसने इन सब का अनुभव किया। उदाहरण के लिए, उसने अस्वीकृति का दर्द सहा: “वह अपने घर आया, और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया” (यूहन्ना 1:11)। यहाँ तक कि उसके कुछ वफादार शिष्यों ने—इसी नाव में मौजूद कुछ लोगों ने भी—आखिरकार उसे छोड़ दिया या उसका इनकार कर किया। उसने उस बदनामी को भी सहा, जिसने उसके अद्‌भुत और पवित्र स्वभाव को गलत तरीके से प्रस्तुत किया (उदाहरण के लिए, लूका 7:34 देखें)। उसने चालीस दिन और रातें शैतान के झूठ और प्रलोभनों से संघर्ष में बिताईं (मत्ती 4:1-11)। उसने क्रूस पर गहरी पीड़ा और क्लेश झेला, जब उसने पुकारकर कहा, “हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?” (मत्ती 27:46)। ऐसा कोई भी दर्द या अपमान नहीं है, जिससे हम गुजरते हैं, जो यीशु के हृदय को न चुभा हो—और क्योंकि वह इन संघर्षों को जानता है, इसलिए वह हमें आमन्त्रित करता है कि जब हम इनसे गुजरें, तो उसके पास आएँ।

मरकुस के सुसमाचार के आरम्भ में ही यह छोटी-सी घटना हमें जीवन बदलने वाली यह सच्चाई याद दिलाती है कि यीशु जीवित मसीह, एक दयालु उद्धारकर्ता और एक विश्वासयोग्य साथी हैं। उस गुरु से बढ़कर और कोई नहीं है जो हमारे जीवन की कठिन परिस्थितियों को बेहतर रीति से सम्भाल सके, जिसे शिष्यों ने नाव में गहरी नींद में सोते हुए पाया था। जैसे उन्होंने उसे पुकारा था, वैसे ही आप भी उसे पुकार सकते हैं और जान सकते हैं कि जो उस नाव में सो रहा था, वही तूफान को शान्त कर सकता है—वही प्रभु, जो स्वर्ग के सिंहासन पर शासन करता है, जो न कभी सोएगा, न ऊँघेगा, और जो आपके पाँव को फिसलने नहीं देगा (भजन 121:3-4)।

आज आपके मन में कौन सा डर है? निश्चिन्त रहें कि प्रभु यीशु इस जीवन की वास्तविकता को समझता है। अपने डर को उसके पास ले आओ और “अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दो, क्योंकि उसको तुम्हारा ध्यान है” (1 पतरस 5:7)।

भजन 121

6 अप्रैल : ग्रहण करने योग्य बलिदान

Alethia4India
Alethia4India
6 अप्रैल : ग्रहण करने योग्य बलिदान
Loading
/

मेरे पास सब कुछ है, वरन् बहुतायत से भी है; जो वस्तुएँ तुम ने इपफ्रुदीतुस के हाथ से भेजी थीं उन्हें पाकर मैं तृप्त हो गया हूँ, वह तो सुखदायक सुगन्ध, ग्रहण करने योग्य बलिदान है, जो परमेश्‍वर को भाता है।” फिलिप्पियों 4:18

यह आपके सोचने के लिए एक अद्‌भुत विचार है: आप परमेश्वर को प्रसन्न करने में सक्षम हैं।

यह एक चौंकाने वाला विचार है: कि हमारा सृष्टिकर्ता हमारे कार्यों से प्रसन्न होगा। फिर भी पवित्रशास्त्र हमें इस वास्तविकता को देखने के लिए प्रोत्साहित करता है। मसीही होने के नाते, हम अपने स्वर्गिक पिता की मुस्कान के तहत जीने का प्रयास करते हैं। परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता के लिए एक बाइबल में दी गई यह प्रेरणा एक बड़ा प्रोत्साहन है, “जैसे तुमने . . . परमेश्वर को प्रसन्न करना सीखा है . . . वैसे ही और भी बढ़ते जाओ” (1 थिस्सलुनीकियों 4:1)—और इसे करने का एक तरीका हमारा उदारता से दिया जाने वाला दान है, जो परमेश्वर के समक्ष “ग्रहण करने योग्य बलिदान” है। पौलुस ने फिलिप्पी की कलीसिया के दान को पुराने नियम के पशु बलिदान के अभ्यास की शब्दावली में व्यक्त किया। जब पुराने नियम में परमेश्वर के लोग अपने होमबलि लाते थे, तो उन बलिदानों के साथ धूप भी जलाया जाता था। इसलिए इस बलिदान से एक आकर्षक सुगन्ध आती थी। एक भाव में, यह परमेश्वर की दृष्टि में बलिदान की मिठास और स्वीकृति का प्रतीक था। उसी तरह, परमेश्वर पहली शताब्दी में और अब इक्कीसवीं शताब्दी में अपने लोगों कहता है, जब तुम्हारा दान मेरे साथ मेल खाते हुए दिल से आता है, तो यह एक मधुर सुगन्ध उत्पन्न करता है, और तुम्हारा बलिदान मुझे प्रसन्न करता है।”

जब हम इस प्रकार के दान पर विचार करते हैं, तो हमें “बलिदान” शब्द को जल्दी से अनदेखा नहीं कर देना चाहिए। बलिदानी दान हमेशा उदार दान के समान नहीं होता। हमारे लिए यह सम्भव है कि हम उदार हों—जैसा कि सच में कई विश्वासियों होते हैं—बिना इसके कि हमारे जीवन या परिस्थितियों पर इसका कोई वास्तविक प्रभाव पड़े।

इसी बिन्दु को स्पष्ट करते हुए, यीशु ने अपने शिष्यों का ध्यान एक गरीब विधवा की ओर आकर्षित किया, जो मन्दिर में अपनी दशमाँश राशि दे रही थी। जब उसने देखा कि यह महिला ताम्बे के दो सिक्के, जो कुछ भी मूल्य नहीं रखते थे, खजाने में डाल रही थी तो उसने उसके आस-पास खड़े अमीर लोगों के उपहारों से उसकी तुलना करते हुए कहा, “इस कंगाल विधवा ने सबसे बढ़कर डाला है। क्योंकि उन सबने अपनी-अपनी बढ़ती में से दान में कुछ डाला है, परन्तु इसने अपनी घटी में से अपनी सारी जीविका डाल दी है” (लूका 21:2-4)। अमीर लोगों का दान उदार था; परन्तु विधवा का दान बलिदानी था। उसने दान देने के लिए अपना सब कुछ त्याग दिया। और उसके प्रभु ने देखा और जो उसने देखा उससे प्रसन्न हुआ।

हम स्वभाव से बलिदानी दाता नहीं हैं। लेकिन पूरी मसीही यात्रा—प्राप्ति और दान में, देखभाल और साझेदारी में—आरम्भ से लेकर अन्त तक कृपा से भरी हुई है। जब हम एक ऐसे दिल से बलिदानी रूप में देते हैं, जो परमेश्वर को प्रसन्न करने की इच्छा करता है, तो वह वचन देता है कि वह “अपने उस धन के अनुसार जो महिमा सहित मसीह यीशु में है, तुम्हारी हर एक घटी को पूरी करेगा” (फिलिप्पियों 4:19)। इसका भाव यह है कि हम मनन करें कि परमेश्वर ने हमें क्या दिया है, और परमेश्वर हमें क्या दे रहा है, और परमेश्वर हमें क्या देगा। जब हम ऐसा करते हैं, तो इससे हमारे दिल खुल जाते हैं और हम बलिदानी रूप से और खुशी से देने की शक्ति पाते हैं। और जब हम ऐसा करते हैं, तो हम परमेश्वर को प्रसन्न करते हैं।

फिलिप्पियों का व्यवहार, और उनके खाते का विवरण, यह दिखाता है कि वे वास्तव में इस पर विश्वास करते थे। आपके विवरण कितने हद तक इस विश्वास को दर्शाते हैं?

1 थिस्सलुनीकियों 4:1-12