ArchivesTruth For Life

19 फरवरी : कुड़कुड़ाने की कीमत

Alethia4India
Alethia4India
19 फरवरी : कुड़कुड़ाने की कीमत
Loading
/

“फिर वे लोग बुड़बुड़ाने और यहोवा के सुनते बुरा कहने लगे; अतः यहोवा ने सुना, और उसका कोप भड़क उठा।”  गिनती 11:1

मसीही जीवन में कुड़कुड़ाने के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए।

यह एक ऐसी सीख थी जिसे इस्राएल ने कठिन रीति से सीखा (और धीरे-धीरे सीखा)। परमेश्वर द्वारा उन्हें मिस्र की बँधुआई से मुक्त कराए जाने के बाद इस्राएलियों को परमेश्वर का व्यवस्था-विधान मिला, उन्हें उसकी आज्ञाएँ दी गईं और उन्हें अपना गन्तव्य स्थान पता लगा। वे उत्सुकता से प्रतिज्ञा किए गए देश तक पहुँचने के लिए निकल पड़े, किन्तु अभी वे बहुत दूर भी नहीं जा पाए थे—शायद सड़क के पहले मोड़ के आस-पास ही पहुँचे थे—कि वे कुड़कुड़ाने लगे। वे मन्ना नहीं मांस खाना चाहते थे, और यहाँ तक कि वे चाहते थे कि वे वापस मिस्र लौट जाएँ (गिनती 11:4-6)। जबकि एक बार उन्होंने सोचा था कि परमेश्वर द्वारा मन्ना का दैनिक प्रावधान उनके लिए उसके प्रेम का एक अद्‌भुत संकेत था, परन्तु अब वे वही पुरानी वस्तु खाने के बारे में कुड़कुड़ाने लगे थे।

कुड़कुड़ाना एक छोटी सी बात लगती है, किन्तु यह आभार की कमी की ओर संकेत करती है। जब भी आभार की कमी और अविश्वास परमेश्वर की सन्तानों के जीवन में दिखाई देती है, तो निश्चित रूप से उसके परिणाम सामने आते हैं। हो सकता है कि हमारा अन्त उन इस्राएलियों की तरह न हो, जो 40 साल तक मरुभूमि में भटकते रहे, परन्तु हमें भी हमारे कुड़कुड़ाने की कीमत चुकानी पड़ती है।

क्या आपको स्मरण है कि आपने पहली बार अपने नए विश्वास की उत्तेजना कब महसूस की थी? हो सकता है कि आपने नए नियम की अपनी पहली प्रति मोल ली हो और सोचा हो कि जो कुछ भी आपको मिलता जा रहा है, वह बहुत अच्छा है। आप उसे हर जगह पढ़ा करते थे। फिर संयोग से, चलते-चलते कुछ ऐसा हुआ कि अब वह केवल “वही पुरानी बाइबल” लगती है और आप चाहते हैं कि परमेश्वर कुछ और प्रभावशाली, कुछ बड़ा करे? क्या आपको वह समय याद है, जब आपको अपने विश्वास के बारे में दूसरों को बताना एक रोमांचक विशेषाधिकार लगता था, परन्तु अब यह एक बोझ और दायित्व की तरह लगता है? क्या आपको वह समय याद है जब आप क्रूस के लिए आभार से भरे हुए थे, परन्तु अब आप सोचते रहते हैं कि परमेश्वर आपको उन मार्गों या स्थानों पर से क्यों नहीं लेकर गया, जहाँ से आप जाना चाहते थे?

जब प्रेरित पौलुस ने प्रारम्भिक कलीसिया को लिखा तब उसने उन्हें चेतावनी के रूप में इस्राएल की कहानी स्मरण कराते हुए कहा, “न हम प्रभु को परखें, जैसा उनमें से कितनों ने किया, और साँपों के द्वारा नष्ट किए गए। और न तुम कुड़कुड़ाओ, जिस रीति से उनमें से कितने कुड़कुड़ाए और नष्ट करने वाले के द्वारा नष्ट किए गए। परन्तु ये सब बातें, जो उन पर पड़ीं, दृष्टान्त की रीति पर थीं; और वे हमारी चेतावनी के लिए जो जगत के अन्तिम समय में रहते हैं लिखी गईं हैं” (1 कुरिन्थियों 10:9-11)।

यदि हमें मसीह पर विश्वास है, तो हम पाप के दासत्व के मुक्त करा दिए गए हैं, यहाँ तक कि हमारी कुड़कुड़ाहट से भी! हम एक बलिदान द्वारा, अर्थात् क्रूस पर मसीह के लहू बहाए जाने के कारण मुक्त किए गए हैं। और हम भी एक यात्रा पर निकल पड़े हैं, जो कनान की ओर नहीं परन्तु स्वर्ग की है। उसे ध्यान में रखते हुए परमेश्वर ने हमें अद्‌भुत प्रतिज्ञाएँ और आवश्यक चेतावनियाँ दी हैं। उसके प्रावधान को कम महत्त्व का न समझें और न ही उस मार्ग के बारे में कुड़कुड़ाएँ जिस पर वह आपको ले जाता है, बल्कि उसके द्वारा भौतिक और आत्मिक रूप से प्रदान की गई सभी वस्तुओं के लिए आभार से भरे रहें। क्रूस आपके पीछे है, स्वर्ग आपके सामने है और पवित्र आत्मा आपके भीतर वास करता है। कुड़कुड़ाने की न तो कोई आवश्यकता है और न ही ऐसा करने के लिए कोई बहाना है।      भजन संहिता 95

18 फरवरी : परमेश्वर के लिए मोल लिए गए

Alethia4India
Alethia4India
18 फरवरी : परमेश्वर के लिए मोल लिए गए
Loading
/

“तूने अपने लहू से हर एक कुल और भाषा और लोग और जाति में से परमेश्‍वर के लिए लोगों को मोल लिया है, और उन्हें हमारे परमेश्‍वर के लिए एक राज्य और याजक बनाया; और वे पृथ्वी पर राज्य करते हैं।”  प्रकाशितवाक्य 5:9-10

मैं वेल्स की रहने वाली मैरी फिशर नामक एक स्त्री के साथ बाइबल कॉलेज में था, जो मिशनरी बनने आई थी। वह शौना भाषा का अध्ययन कर रही थी, ताकि वह ज़िम्बाब्वे में युवा लड़के और लड़कियों को पढ़ा सके। उसके वहाँ पहुँचने के कुछ ही समय बाद, जिस विद्यालय में वह पढ़ा रही थी, उस पर आतंकी हमला हुआ। कई अन्य शिक्षकों और बच्चों के साथ-साथ मैरी भी बच नहीं पाई; उस हमले में उसकी जान चली गई।[1] यद्यपि उसकी मृत्यु दुखद थी, किन्तु उसके जीवन ने न केवल यहाँ, बल्कि अनन्त काल तक परमेश्वर की सेवा करने के सर्वोच्च आनन्द की साक्षी दी।

प्रकाशितवाक्य में मेमने के चारों ओर एकत्रित प्राचीनों के गीत में हमें यह स्मरण कराया जाता है कि मसीह की मृत्यु का उद्देश्य यह था कि हम परमेश्वर द्वारा मोल लिए जा सकें। हमें उस पाप से मुक्त किया गया है, जिसने हमें अपनी पकड़ में रखा था कि उसके लहू द्वारा मोल लिए जाने के बाद हम उसके लिए जीएँ। हमारी स्तुति परमेश्वर के लिए है। मैरी फिशर के समान हमारी सेवा भी परमेश्वर के लिए है।

जब पहली सदी के विश्वासियों ने अपने आस-पास देखा और जाना कि उनके कुछ मित्रों को उनके विश्वास के कारण बन्दी बना लिया गया है, तो वे मृत्यु पर मसीह के जयवन्त होने, उसके स्वर्गारोहण की जीत और उसकी वापसी की वास्तविकता को समझने का प्रयास करने लगे। जिस क्लेश का वे सामना कर रहे थे, उसे ध्यान में रखते हुए ये मसीही इस बात की स्मृति में प्रोत्साहन पा सके कि जब यीशु हमारे पापों के लिए प्रायश्चित्त कर रहा था तब भी उसका ध्यान हर समय पिता पर केन्द्रित था। उसने हमें परमेश्वर के लिए  मोल लिया था।

हम मिशनरी आत्मकथाओं में बताई गई त्रासदियों को कैसे समझ सकते हैं या शहीदों की मृत्यु में दिखने वाली स्पष्ट आक्रामक अराजकता को कैसे समझा सकते हैं? मैरी फिशर की अन्तिम रिकॉर्डिंग इस बात में स्पष्टता प्रदान करती है। एक गायिका और गिटार वादक के रूप में वह अपनी कक्षा में बच्चों को फिलिप्पियों की कलीसिया को लिखे पौलुस के शब्दों पर आधारित एक गीत के बोल सिखा रही थी: “मेरे लिए जीवित रहना मसीह है, और मर जाना लाभ है” (फिलिप्पियों 1:21)।[2] यह गीत आगे कहता है कि उसके मार्ग पर चलना और उसका हाथ थाम लेना ही शान्ति और आनन्द का मार्ग है।

17 फरवरी : बच्चों के लिए एक बात

Alethia4India
Alethia4India
17 फरवरी : बच्चों के लिए एक बात
Loading
/

“हे बालको, प्रभु में अपने माता–पिता के आज्ञाकारी बनो, क्योंकि यह उचित है। ‘अपनी माता और पिता का आदर कर (यह पहली आज्ञा है जिसके साथ प्रतिज्ञा भी है) कि तेरा भला हो, और तू धरती पर बहुत दिन जीवित रहे।’”  इफिसियों 6:1-3

दो अवसरों पर जब पौलुस अपने पाठकों को भक्तिहीनता के कुरूप फलों की एक लम्बी सूची प्रदान करता है, तो उसके बीच में हमें “माता-पिता की आज्ञा न मानने वाले” (रोमियों 1:30; 2 तीमुथियुस 3:2) के रूप में एक छोटा वाक्यांश मिलता है। इसके विपरीत, जब आप कलीसिया का इतिहास पढ़ते हैं तो आप पाते हैं कि जब-जब आत्मिक जागृति आती थी, तब-तब व्यावहारिक रूप से भक्ति में भी बढ़त होती थी, जिसमें बच्चों का अपने माता-पिता के भक्तिपूर्ण अधिकार की अधीनता में आना भी शामिल होता था।

बच्चों का अपने माता-पिता की आज्ञा मानना केवल एक सुझाव नहीं है; यह एक दायित्व है। पवित्रशास्त्र सिखाता है कि ऐसी आज्ञाकारिता परमेश्वर की सृष्टि के प्राकृतिक क्रम के अनुसार है, उसकी व्यवस्था के अनुरूप है और सुसमाचार के प्रति प्रत्युत्तर के रूप में भी सही है। माता-पिता को आज्ञाकारिता की माँग करने और उसकी प्रशंसा करने से डरना नहीं चाहिए। किन्तु पौलुस केवल यह नहीं कहता कि आज्ञाकारिता एक उचित बात है; वह यह भी कहता है कि इसका प्रतिफल भी मिलता है। प्रभु यीशु में परमेश्वर की आज्ञाओं और प्रतिज्ञाओं पर ध्यान देने के साथ एक आशीष भी मिलती है। और जब माता-पिता और बच्चों के सम्बन्ध में प्रेम, भरोसा और आज्ञाकारिता दिखाई देते हैं, तो हम केवल स्वस्थ लोगों का ही निर्माण नहीं करते, अपितु हम एक स्वस्थ समाज का भी निर्माण करते हैं। माता-पिता के लिए भला होगा कि वे इन पाँच महत्त्वपूर्ण सच्चाइयों को स्मरण रखें, जो बाइबल हमारे बच्चों के बारे में सिखाती है:

1. “लड़के यहोवा के दिए हुए भाग हैं” (भजन 127:3)। वे एक वरदान और एक आशीष हैं। अपने बच्चों के बारे में सोचते हुए हममें उन बच्चों को प्रदान करने वाले के प्रति आभार का भाव उत्पन्न होना चाहिए।

2. हम अपने बच्चों के स्वामी नहीं हैं; वे परमेश्वर के हैं। वे हमें सीमित समय के लिए उधार पर दिए गए हैं।

3. बच्चे जन्म से ही दोषपूर्ण होते हैं, पाप के दोषी होते हैं और अनन्त जीवन के योग्य नहीं होते, ठीक वैसे ही जैसे हम सभी हैं (भजन 58:3; रोमियों 3:23)।

4. क्योंकि बच्चे पापी हैं, इसलिए उन्हें परमेश्वर की आज्ञाओं की आवश्यकता है। माता-पिता के रूप में हम उन्हें आरम्भिक दिनों से ही परमेश्वर की व्यवस्था के बारे में बताने के लिए उत्तरदायी हैं।

5. हमारे बच्चे केवल अनुग्रह से ही बचाए जा सकते हैं। इसलिए उद्धार के लिए हमें उन्हें केवल यीशु की ओर देखना सिखाना चाहिए।

हममें से बहुत से लोग ऐसी संस्कृति में रहते हैं, जहाँ इन सच्चाइयों का विरोध किया जाता है। एक ओर बच्चों को स्वाभाविक रूप से भला माना जाता है और उनकी शिक्षा या स्वास्थ्य या खुशी को सर्वोच्च भलाई के रूप में देखा जाता है। दूसरी ओर वे प्रायः मज़ाक का पात्र या कुड़कुड़ाने का विषय होते हैं। कभी-कभी कलीसिया के भीतर भी पालन-पोषण के बारे में स्पष्ट, बाइबल आधारित बातों का अभाव होता है। किन्तु इस विषय में परमेश्वर यह कहता है कि एक परिवार के सभी बच्चों को अपने माता-पिता की आज्ञा माननी चाहिए; माता-पिता को अपने बच्चों का पालन-पोषण इस प्रकार करना चाहिए कि वे परमेश्वर की व्यवस्था और परमेश्वर के अनुग्रह को जानें। यदि हम अपने घरों और अपनी कलीसियाओं में एक ऐसी पीढ़ी को देखना चाहते हैं, जो हमसे अधिक भक्तिमय और सरगर्म हो, तो हमें अपने बच्चों का पालन-पोषण परमेश्वर के सत्यों के साथ करना होगा। हममें से बहुत से माता-पिता ऐसे हैं, जिनके बच्चे अभी भी उनके साथ उनके घरों में रहते हैं। हम सभी ऐसी कलीसियाओं के सदस्य हैं, जहाँ हमारे बीच बच्चे हैं। तो फिर अगली पीढ़ी के आत्मिक स्वास्थ्य में आपका योगदान कैसा होना चाहिए?      नीतिवचन 2

16 फरवरी : तुम मुझे क्या कहते हो

Alethia4India
Alethia4India
16 फरवरी : तुम मुझे क्या कहते हो
Loading
/

“शमौन पतरस ने उत्तर दिया, ‘तू जीवते परमेश्‍वर का पुत्र मसीह है।’ यीशु ने उसको उत्तर दिया, ‘हे शमौन, योना के पुत्र, तू धन्य है; क्योंकि मांस और लहू ने नहीं, परन्तु मेरे पिता ने जो स्वर्ग में है, यह बात तुझ पर प्रगट की है।’”  मत्ती 16:16-17

जब हम सुसमाचारों को पढ़ते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि जब लोग नासरत के यीशु के सम्पर्क में आते थे, तो शायद ही कभी वे सभ्य उदासीनता के साथ प्रतिक्रिया दे पाते थे। उसके शब्द और कार्य गूढ़ प्रेम और भक्ति को, परन्तु साथ ही भय और घृणा को भी प्रेरित करते थे। प्रतिक्रियाओं की ऐसी विविधता के लिए सम्भवतः क्या कारण हो सकता है?

कैसरिया फिलिप्पी के मार्ग पर, जैसा कि अक्सर ही होता था, इस बातचीत में उत्तर देते हुए पतरस बोल पड़ा, “तू मसीह है।” और यह उत्तर उसने केवल अपने लिए नहीं परन्तु दूसरों के लिए भी दिया था। यीशु की पहचान के लिए उसने जिस शब्द का प्रयोग किया, वह था ख्रीस्तोस,  जिसका यूनानी में अर्थ था “मसीह” या “अभिषिक्त।” पुराने नियम में परमेश्वर ने राजाओं, न्यायियों और भविष्यद्वक्ताओं का अभिषेक किया था, किन्तु वे सभी भविष्य में आने वाले मसीह, या उद्धारकर्ता, अर्थात् परमेश्वर के अभिषिक्त की ओर संकेत करने वाले प्रतिनिधि और प्रवक्ता थे। इस कारण पतरस ने जो घोषणा की वह विशेष रूप से उल्लेखनीय थी। वह यीशु से कह रहा था कि तू ही वह है। तू वही है जिसके बारे में भविष्यद्वक्ताओं ने बात की है।  

पतरस की इस बात पर यीशु का स्पष्टीकरण और भी अधिक आश्चर्यजनक है। पतरस अपने इस निष्कर्ष पर इसलिए नहीं पहुँचा था, क्योंकि वह बुद्धिमान था या उसके पास तार्किक और तर्कसंगत सोच की उन्नत क्षमता थी या क्योंकि किसी प्रेरक प्रचारक ने उसे यह बताया था। उसका यह उत्तर इसलिए सम्भव हुआ था, क्योंकि परमेश्वर पिता ने ही सचमुच उस पर यह प्रगट किया था।

हमारे विश्वास के अंगीकार के समान ही पतरस के विश्वास का अंगीकार भी उसकी अपनी क्षमता में कभी नहीं हो सकता था। विश्वास एक वरदान है, जो हमें दिया जाता है। पतरस और यीशु के बीच का यह वार्तालाप परमेश्वर के आत्मा द्वारा परमेश्वर के वचन को लेने और उसे किसी के मन और हृदय में इस प्रकार लेकर आने का एक ठोस उदाहरण है, जिससे वह यीशु के मसीह होने की घोषणा कर पाता है।

पतरस के समान यीशु को प्रभु और मसीह के रूप में घोषित करने की हमारी क्षमता हमारा अपना काम नहीं है; यह तो “परमेश्‍वर का दान है, और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे” (इफिसियों 2:8-9)। यदि हमारा विश्वास हमारी अपनी बौद्धिक क्षमता या भावनात्मक बुद्धिमत्ता या नैतिक भलाई का परिणाम होता, तो हम अपने में ही भरोसा रख सकते थे और इस कारण हम अपने पर घमण्ड कर सकते थे। परन्तु ऐसा होने पर अपने अच्छे दिनों में यह हमें घमण्डी बना देगा और बुरे दिनों में यह हमें निर्बल बना देगा। कदापि नहीं, हमारा विश्वास पूरी तरह से परमेश्वर के वरदान पर आधारित है और इसलिए हम अपना भरोसा उस पर रखते हैं और इस प्रकार हम अपने सबसे उत्कृष्ट दिनों में दीन रहते हैं और अपने सबसे बुरे दिनों में भरोसा रख पाते हैं। तो फिर आज कृतज्ञता के साथ आनन्दित हों, क्योंकि परमेश्वर अपने वचन की सच्चाई के द्वारा हृदयों और मनों को बदलने से प्रसन्न होता है, जिससे कि हम पतरस के साथ मिलकर यह घोषणा कर सकें, “तू ही मसीह है।”      

इफिसियों 2:1-10

15 फरवरी : प्रायश्चित्त का दिन

Alethia4India
Alethia4India
15 फरवरी : प्रायश्चित्त का दिन
Loading
/

“क्योंकि शरीर का प्राण लहू में रहता है; और उसको मैंने तुम लोगों को वेदी पर चढ़ाने के लिए दिया है कि तुम्हारे प्राणों के लिए प्रायश्चित्त किया जाए; क्योंकि प्राण के कारण लहू ही से प्रायश्चित्त होता है।”  लैव्यव्यवस्था 17:11

जब परमेश्वर ने इस्राएलियों को मिस्र से छुड़ाया, तो उनके छुटकारे ने परमेश्वर के साथ उनका एक सम्बन्ध स्थापित कर दिया। परमेश्वर की प्रभुता के अधीन रहते हुए लोगों ने मिलाप वाले तम्बू के माध्यम से उसकी उपस्थिति का आनन्द उठाया। परन्तु प्रारम्भ से ही इस्राएली लोग परमेश्वर की व्यवस्था का पालन नहीं कर सके थे। इससे एक दुविधा उत्पन्न हुई कि एक पवित्र परमेश्वर पापी मनुष्यों के साथ कैसे वास कर सकता था?

प्रत्येक वर्ष एक विशिष्ट दिन, जिसे प्रायश्चित्त का दिन कहा जाता था, इस्राएल के महायाजक को परमेश्वर द्वारा परम पवित्र स्थान में प्रवेश करने का निर्देश दिया गया था, अर्थात् मिलाप वाले तम्बू में वह स्थान जहाँ परमेश्वर की उपस्थिति वास करती थी कि वह लोगों के पापों के लिए बलिदान चढ़ाए। महायाजक दो निष्कलंक बकरे लेता था। पहले बकरे को वह लोगों के लिए पापबलि के रूप में बलिदान करता था और फिर उसके लहू को प्रायश्चित्त के ढक्कन पर छिड़कता था, जिसे ‘दया आसन’ के नाम से भी जाना जाता है। इस्राएली अपने पाप के कारण मृत्यु के पात्र थे, किन्तु परमेश्वर ने अपने अनुग्रह में होकर उनके स्थान पर मरने के लिए एक विकल्प के रूप में यह बकरा रखा था। लोग अब जीवित रह सकते थे, क्योंकि वह पशु मारा गया था। और दूसरे बकरे के साथ जो होता था, उसमें इस प्रायश्चित्त का परिणाम देखा जा सकता था। याजक उसके सिर पर हाथ रखता, लोगों के पापों को उस पर लाद देता और फिर उसे मरुभूमि में दूर कहीं छोड़ आता। तब महायाजक लोगों के सामने आकर यह कह सकता था कि तुम्हारे पापों का प्रायश्चित्त हो चुका है। लहू बहाया गया है, और लहू के बहाए जाने से पापों की क्षमा होती है। दूसरे बकरे को मैं मरुभूमि में दूर छोड़ आया हूँ और उसी तरह तुम्हें भी अपने पापों के बारे में चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है और न ही उन्हें अपनी पीठ पर बोझ की तरह ढोना है।  एक बहुत ही विशिष्ट तरीके से परमेश्वर इस महत्त्वपूर्ण सत्य को स्थापित कर रहा था कि वह पापी लोगों को अपनी उपस्थिति में लाने के लिए जो भी आवश्यक है, वह करने को तैयार है।  चूंकि उसके लोग उद्दण्ड थे (और आज भी हैं!), इसलिए उसे ही उनके पापों के लिए एक बलिदान प्रदान करना पड़ा, जिससे वे उसके द्वारा पूरे किए गए कार्य के आधार पर उसके पास आ सकें। और वह प्रत्येक बलिदान अपने आप से परे उस सिद्ध बलिदान की ओर इशारा करता था, जिसे मसीह क्रूस पर अपनी मृत्यु के द्वारा एक बार और सदा के लिए पाप के समाधान के रूप में चढ़ाने वाला था। परिणामस्वरूप हम परमेश्वर के समक्ष हियाव से आने का आनन्द उठा सकते हैं। परन्तु यह हियाव हमारे अपने कारण नहीं है; बल्कि “हमें यीशु के लहू के द्वारा उस नए और जीवते मार्ग से पवित्रस्थान में प्रवेश करने का हियाव हो गया है, जो उसने परदे अर्थात् अपने शरीर में से होकर हमारे लिए अभिषेक किया है” (इब्रानियों 10:19-20)।

जब भी आपको दुविधा और सन्देह हो, या अपने स्वयं के कार्यों को आश्वासन के आधार के रूप में देखने का प्रलोभन हो, तब उन दो बकरों को स्मरण करें, जो आपको क्रूस पर किए गए यीशु के कार्य की ओर दिखाते हैं। आपके पाप का दाम चुका दिया गया है और आपके पाप को हटा दिया गया है। आपका कोई भी कार्य हमारे पवित्र परमेश्वर के सामने आपकी अवस्था में न तो कुछ बढ़ाता है और न ही घटाता है। यह है वह स्थान, जहाँ पर आपको अपने लिए हियाव मिलता है:

एक ऐसे जीवन पर जो मैंने नहीं जिया,

एक ऐसी मृत्यु पर जो मुझे नहीं मिली,

दूसरे के जीवन पर, दूसरे की मृत्यु पर,

मैं अपना पूरा अनन्त काल दाव पर लगाता हूँ।
इब्रानियों 10:11-25

14 फरवरी : मसीह का एक चेला

Alethia4India
Alethia4India
14 फरवरी : मसीह का एक चेला
Loading
/

“दमिश्क में हनन्याह नामक एक चेला था, उससे प्रभु ने दर्शन में कहा, ‘हे हनन्याह!’ उसने कहा, ‘हाँ, प्रभु।’”  प्रेरितों के काम 9:10

आप प्रतिदिन अपने यश को आकार दे रहे हैं। और एक मसीही व्यक्ति के रूप में आप प्रतिदिन मसीह के यश को भी आकार दे रहे हैं। जब हम उसके चेलों के रूप में इधर-उधर चलते-फिरते हैं, तब हमारा जीवन मसीह के बारे में क्या कह रहा होता है?

सम्भवतः हनन्याह बाइबल का एक कम जाना-पहचाना पात्र हो, किन्तु पौलुस के जीवन पर और इस कारण कलीसिया के पूरे इतिहास पर उसका गहरा प्रभाव पड़ा। यह मसीह के एक चेले के रूप में उसकी दैनिक समर्पित विश्वासयोग्यता का परिणाम था। जबकि हम परमेश्वर के राज्य में उपयोग किए जाने का यत्न कर रहे हैं, तो उसकी शिष्यता के तीन ऐसे गुण हैं जो हमारे अपने चरित्र और मसीह के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को आकार देने में सहायता कर सकते हैं।

सबसे पहला, जैसा कि पवित्र बाइबल में कहा गया है कि हनन्याह “एक विशेष  चेला था” (तिरछे अक्षर में लिखा गया शब्द जोड़ा गया है)। वह एक ऐसा व्यक्ति था जिसे विशेष रूप से चुना गया था। पौलुस (तब शाऊल के नाम से जाना जाता था) को दमिश्क में लाने या हनन्याह को बुलाने से भी पहले, परमेश्वर ने यरूशलेम में पिन्तेकुस्त के दिन के बाद कलीसिया के बढ़ने को सम्प्रभुता में होकर व्यवस्थित किया, ताकि कलीसिया कम से कम 200 मील उत्तर में दमिश्क तक पहुँच सके जहाँ हनन्याह सहित विश्वासियों का एक समूह स्थापित किया गया। फिर इस समूह में से परमेश्वर ने विशेष रूप से हनन्याह को चुना कि वह पौलुस का मन-परिवर्तन हो जाने के बाद उसके पास जाए। परमेश्वर की सम्प्रभुता के ऐसे प्रगाढ़ प्रदर्शन से हमें यह भरोसा करने के लिए प्रेरणा और प्रोत्साहन मिलना चाहिए कि शायद परमेश्वर अपनी इच्छा को पूरा करने के उद्देश्य से हमें तैयार करने और उपयोग करने के लिए ऐसे तरीकों से काम कर रहा हो जो अभी तक दिखाई न दिए हों।

दूसरा, हनन्याह एक साहसिक  चेला था। उसने अपना परिचय प्रभु के अनुयायी के रूप में दिया, अर्थात् दमिश्क के उसी समूह का होने के रूप में जिसे पौलुस अपने मन-परिवर्तन से पहले घात करने जा रहा था (प्रेरितों 9:1)। हनन्याह की निष्ठा किसी स्थानीय कलीसिया, किसी एक पंथ या किसी एक धार्मिक दृष्टिकोण के प्रति नहीं थी, बल्कि प्रभु यीशु मसीह के प्रति थी। इसी प्रकार यदि यीशु ने हमारे जीवन को थाम लिया है और हमें बदल दिया है, तो हमें भी इस जीवन को बदल देने वाले तथ्य को अपने तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए। जैसे हम मसीह के उद्धार को प्राप्त करने पर पाप को न कहते हैं, वैसे ही हमें अपने विश्वास के बारे में गोपनीयता को भी न कहना है। या तो हमारी शिष्यता हमारी गोपनीयता को नष्ट कर देगी, या फिर हमारी गोपनीयता हमारी शिष्यता का अन्त कर देगी।

अन्त में, हनन्याह एक समर्पित  चेला था। आगे चलकर पौलुस हनन्याह के बारे में इस प्रकार से स्मरण करता है कि वह दमिश्क में रहने वाला एक ऐसा व्यक्ति था जो “व्यवस्था के अनुसार एक भक्त मनुष्य, जो वहाँ रहने वाले सब यहूदियों में सुनाम था” (प्रेरितों 22:12)। ऐसा यश पाँच मिनट या पाँच दिन में नहीं मिलता, बल्कि जीवन के उतार-चढ़ावों में से होकर जाते हुए धीरे-धीरे मिलता है। हनन्याह ने अपना पूरा जीवन परमेश्वर और उसके वचन का पालन करने के लिए समर्पित करने के द्वारा ही ऐसा यश उन्नत किया था। उसने अपने इस समर्पण को निश्चित रूप से अपने दैनिक व्यवहार और दूसरों के साथ बातचीत के माध्यम से प्रदर्शित किया होगा।

हनन्याह का जीवन हमें साधारण दिनों में छोटे-छोटे तरीकों से विश्वासयोग्य बने रहने की चुनौती देता है। सम्भव है कि एक दिन हमें प्रभु के लिए कुछ असाधारण करने के लिए बुलाया जाए, किन्तु हमें उसके लिए पूरे मन से जीने के लिए उस समय के आने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। चेले यही काम करते हैं कि साहसपूर्वक, समर्पित रूप से और दीनता के साथ वे परमेश्वर के पीछे चलते हैं और उस पर पूरी तरह से भरोसा करते हैं। चाहे आप पढ़ाई कर रहे हों, बच्चों की परवरिश कर रहे हों, अपना व्यावसायिक जीवन बनाने में लगे हों, या फिर अपना जीवन सेवानिवृत्ति और बुढ़ापे में क्यों न बिता रहे हों, परमेश्वर की महिमा के लिए यह सब विश्वासयोग्यता के साथ करने का प्रयास करें। अपना लक्ष्य बनाएँ कि आप हनन्याह के समान, अर्थात् यीशु मसीह के एक चेले के रूप में ही जाने जाएँगे।      

प्रेरितों के काम 9:1-19

13 फरवरी : परम वास्तविकता

Alethia4India
Alethia4India
13 फरवरी : परम वास्तविकता
Loading
/

“परमेश्‍वर जो आकाश का सृजने और तानने वाला है, जो उपज सहित पृथ्वी का फैलाने वाला और उस पर के लोगों को साँस और उस पर के चलने वालों को आत्मा देने वाला यहोवा है, वह यों कहता है : ‘मुझ यहोवा ने तुझको धर्म से बुला लिया है, मैं तेरा हाथ थामकर तेरी रक्षा करूँगा।’”  यशायाह 42:5-6

1932 में ऐल्बर्ट आयनस्टाइन ने कहा था, “इस धरती पर हमारी परिस्थिति अजीब लगती है। हम में से हर कोई यहाँ अनजाने में और बिना बुलाए थोड़े समय के लिए आता है, बिना यह जाने कि ऐसा क्यों और किस उद्देश्य से होता है।”[1] निस्सन्देह आप यह बात आमतौर पर ही सुनते रहते होंगे कि हम संयोग से भरे संसार में जी रहे हैं, जहाँ इतिहास केवल अपने को दोहराता रहता है और ब्रह्माण्ड के अस्तित्व में कोई व्यापक उद्देश्य नहीं है। यदि यह सच बात है, तो जीवन में अभिप्राय पाना कठिन है। फिर तो हमें जीने और मर जाने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं करना है।

वास्तविकता के इस दृष्टिकोण से उत्पन्न उद्देश्य की अनुपस्थिति में होकर परमेश्वर बात करता है। वह उस परम वास्तविकता की उद्‌घोषणा करता है, जो सब कुछ बदल देती है। वह अपने बारे में बतलाता है। परमेश्वर अपना परिचय देता है, अपनी पहचान प्रकट करता है। “मैं यहोवा हूँ।” यहाँ परमेश्वर का नाम (“यहोवा”) केवल वह नाम नहीं है, जिससे हम उसे पुकारते हैं; अपितु यह उसके अस्तित्व को व्यक्त करता है। बाइबल में परमेश्वर के कई नाम इस बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी देते हैं कि वह कौन है, जैसे कि अनन्तकालीन, आत्म-निर्भर, सम्प्रभु . . . और भी बहुत कुछ!

बोलते समय परमेश्वर अपनी सामर्थ्य भी प्रकट करता है। आकाश उसकी रचना है और वही है जिसने पृथ्वी को बनाया और उस पर के लोगों को आकार और जीवन दिया है। सृष्टि की स्थिरता और उत्पादकता उसी सृष्टिकर्ता में निहित है। हम अपने आप से घटित होने वाले किसी क्रम-विकास की लहर के उत्पाद नहीं हैं, बल्कि एक रचयिता के प्रत्यक्ष कार्य के फल हैं। परमेश्वर से हटकर हम अपने अस्तित्व को नहीं समझ सकते। न ही हमें कभी ऐसा करना था।

परमेश्वर ने जो कुछ भी रचा है, उसके पीछे उसका उद्देश्य क्या है? उद्धार के द्वारा पृथ्वी पर धार्मिकता स्थापित करना। “मुझ यहोवा ने तुझ को धर्म से बुला लिया है, मैं तेरा हाथ थामकर तेरी रक्षा करूँगा; मैं तुझे प्रजा के लिए वाचा और जातियों के लिए प्रकाश ठहराऊँगा।” वह यहाँ हमसे नहीं परन्तु अपने पुत्र, अर्थात् उस सेवक से बात कर रहा है, जिसका परिचय यशायाह ने दिया है। जब कभी हमें परामर्श की आवश्यकता होती है, मित्रता की आवश्यकता होती है, क्षमा की आवश्यकता होती है, उद्धार की आवश्यकता होती है, तो ऐसे सभी अवसरों के लिए परमेश्वर ने कहा है, “मेरे दास को देखो जिसे मैं सम्भाले हूँ” (यशायाह 42:1)।

हम जीवन में कभी भी उतने सन्तुष्ट नहीं होंगे जितना कि तब होंगे, जब हम मसीह में अपनी परम वास्तविकता को खोज लेंगे। उस वास्तविकता के धाराप्रवाह में हमें हमारा उद्देश्य मिल जाता है, अर्थात् “परमेश्वर की महिमा करना, और उसमें अपने परम आनन्द को समर्पित करना।”[2] यदि आप जीवन में उद्देश्य को जानना चाहते हैं और परिपूर्णता प्राप्त करना चाहते हैं, तो आपको केवल परमेश्वर की महिमा करते हुए प्रभु के दास को ग्रहण करना है और उसमें आनन्दित होना है, जैसा कि शमौन ने किया था जब उसने इस प्रकार कहा था, “मेरी आँखों ने तेरे उद्धार को देख लिया है, जिसे तू ने सब देशों के लोगों के सामने तैयार किया है कि वह अन्यजातियों को प्रकाश देने के लिए ज्योति और तेरे निज लोग इस्राएल की महिमा हो” (लूका 2:30-32)।  यशायाह 42:1-13

12 फरवरी : एकता की कुंजी

Alethia4India
Alethia4India
12 फरवरी : एकता की कुंजी
Loading
/

“जिस (यीशु मसीह) में तुम भी आत्मा के द्वारा परमेश्‍वर का निवास-स्थान होने के लिए एक साथ बनाए जाते हो।”  इफिसियों 2:22

जब कोई व्यक्ति विश्वास के द्वारा मसीह के पास आता है, तो उसकी पहचान में व्यापक रूप से परिवर्तन हो जाता है। इफिसियों 2 में पौलुस ने जिस भाषा का प्रयोग किया है, उसके अनुसार एक मरा हुआ पापी अब मसीह में जीवित है; कोप की सन्तान अब परमेश्वर की सन्तान है। परन्तु यह नई पहचान केवल व्यक्तिगत नहीं है। हम में से कोई भी मसीह में अकेला नहीं है; हम सभी परमेश्वर के लोगों के साथ  उसमें हैं। यही कारण है कि इफिसियों 2 में पौलुस अनुग्रह के हमारे व्यक्तिगत अनुभव से परमेश्वर के अनुग्रह द्वारा सम्पन्न किए जाने वाले सामूहिक कार्य की ओर आगे बढ़ता है। पौलुस हमें बताता है, “तुम अब विदेशी और मुसाफिर नहीं रहे, परन्तु पवित्र लोगों के संगी स्वदेशी और परमेश्‍वर के घराने के हो गए हो” (पद 19)। मसीह द्वारा निर्मित किया जा रहा यह “एक नया मनुष्य” (पद 15) अनुग्रह के संगी वारिसों की भीड़ के साथ महिमामय रीति से घिरा होता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हमारी व्यक्तिगत मानवीय पहचान व्यर्थ हो जाती है। हमारी पृष्ठभूमि और हमारा स्वरूप, अर्थात हमारा लिंग, जाति और व्यक्तिगत इतिहास मसीह में विलुप्त नहीं हो जाते। हम वही रहते हैं जो हम हैं, अर्थात् परमेश्वर के स्वरूप में बनाए गए तथा उसके उद्देश्यों के अनुसार गढ़े गए हैं। परन्तु जो बात हमें मसीह में  एक करती है, अर्थात् मसीह के साथ  हमारी एकता, वह शेष सभी बातों से बढ़कर है।

हमें सावधान रहना चाहिए कि कहीं हम यह न भूल जाएँ कि हमारी यह एकता किस कारण से हमें मिली है। कोई भी व्यक्ति अपनी पहचान के तत्वों को बाधाओं में—प्रतिष्ठा, वर्ण, वर्ग, व्यक्तित्व के प्रकार या व्यक्तिगत प्राथमिकताओं की बाधाओं में—बदल देने के प्रलोभन में गिर सकता है। मसीही होने के नाते हमें यह स्वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए कि ऐसी भूल हो जाना कितनी सरल बात है। यदि हम स्वयं को ऐसी गलती के लिए दोषी पाएँ, तो हमें पश्चाताप करने और उस बात के विषय में शोक करने के लिए तैयार रहना चाहिए जो परमेश्वर को पसन्द नहीं आती।

मसीही एकता की कुंजी सुसमाचार है। पौलुस जानता था कि केवल परमेश्वर ही कठोर हृदयों को नरम कर सकता है, केवल परमेश्वर ही अन्धी आँखें खोल सकता है और केवल परमेश्वर ही अलग-अलग लोगों को एक साथ लाकर उन्हें कुछ ऐसा बना सकता है, जो वास्तव में महिमामय रीति से एक हों। परमेश्वर “एक नया मनुष्य” निर्मित कर रहा है और वह उस नए मनुष्य को अपनी कलीसिया के रूप में निर्मित कर रहा है। मसीह में परमेश्वर एक “पवित्र मन्दिर” (इफिसियों 2:21) निर्मित कर रहा है, जो “आत्मा के द्वारा परमेश्‍वर का निवास-स्थान होने के लिए एक साथ बनाया जाता है।” जाति, वर्ग या प्रतिष्ठा के आधार पर पक्षपात के लिए वहाँ कोई जगह नहीं है, जहाँ परमेश्वर अपने आत्मा के द्वारा वास करता है। एक दिन आप अनन्त काल के लिए मसीह और उसके लोगों के साथ अपने मिलन की पूर्णता का अनुभव करेंगे; परन्तु उस काम को अभी प्रारम्भ होना आवश्यक है और होना भी चाहिए। जिस तरह से आप अपने समय का उपयोग करते हैं और जिस तरह से आप अपनी कलीसिया में अपने भाइयों और बहनों के बारे में सोचते हैं, उनके लिए प्रार्थना करते हैं और उनसे बात करते हैं, इन सब बातों के द्वारा आज आपके पास उस एकता को पोषण देने का विशेषाधिकार है।

हम दिन-प्रतिदिन निर्मित होते जा रहे हैं,

जैसे-जैसे क्षण बीतते जा रहे हैं,

हमारा मन्दिर, जिसे शायद संसार न देख सके;

अनुग्रह से प्राप्त होने वाली प्रत्येक जीत

अनन्त काल के लिए किए जा रहे हमारे निर्माण में

अपना स्थान अवश्य पाएगी।

1 कुरिन्थियों 13

11 फरवरी : राज्य के वारिस होना

Alethia4India
Alethia4India
11 फरवरी : राज्य के वारिस होना
Loading
/

“क्या तुम नहीं जानते कि अन्यायी लोग परमेश्‍वर के राज्य के वारिस न होंगे?”  1 कुरिन्थियों 6:9

विश्वासियों की सबसे बड़ी पहचान यह है कि यीशु मसीह के राज्य में हमें सदस्यता मिल चुकी है। यही वह बात है जो मसीहियों को अद्वितीय बनाती है। अब हम एक बिलकुल नए राज्य के सदस्य हैं। हो सकता है कि हम काले या गोरे, अमीर या गरीब, पुरुष या स्त्री हों, किन्तु जो बात हमें एक करती है, वह है एक ही राजा, अर्थात् यीशु के प्रति हमारी निष्ठा। हम उसके निर्देशों पर चलते हैं, हम उसके दल के साथ आनन्दित होते हैं और हम उसकी आज्ञा का पालन करने में प्रसन्न होते हैं।

परमेश्वर का राज्य एक धर्मी राज्य है। उसका चरित्र सिद्ध है, उसके मानक उत्कृष्ट हैं और वह पाप को नहीं देख सकता। इसलिए पौलुस चेतावनी देता है कि जो लोग उसके चरित्र को नकारते हैं और उसके मानकों को अस्वीकार करते हैं “वे परमेश्वर के राज्य के वारिस नहीं होंगे।” दुष्टता, विद्रोह और आत्मनिर्भरता से चिह्नित जीवनशैली मसीह की प्रभुता के साथ मेल नहीं खाती और इस कारण इस तरह से जीवन बिताने का निर्णय उसके राज्य की सीमाओं से बाहर रहने का निर्णय है।

हमें ध्यान देना है कि पौलुस यहाँ अधर्म के छोटे-मोटे कामों का उल्लेख नहीं कर रहा है। मसीह के राज्य का कोई भी सदस्य अनन्त महिमा के इस पार पाप रहित जीवन नहीं जीता। इसके विपरीत, पौलुस किसी ऐसे व्यक्ति का उल्लेख कर रहा है, जो निरन्तर पाप में लगा रहता है या उससे घृणा नहीं करता। वह ऐसे जीवन की बात कर रहा है जो घोषित करता हो कि “मैं नहीं चाहता कि परमेश्वर मेरी इच्छाओं में हस्तक्षेप करे, फिर भी मैं इस धारणा के साथ जीना चाहता हूँ कि मैं उसके राज्य का हूँ और उसके सभी लाभ भी चाहता हूँ।”

परमेश्वर अपने राज्य की सीमाओं का निर्धारण करता है। यह बात पूर्णतः सत्य है कि सारे मनुष्य उसके राज्य के नागरिक नहीं होगे, फिर चाहे वे कोई भी क्यों न हों, उनका विश्वास चाहे कुछ भी क्यों न हो, या वे चाहे कुछ भी क्यों न चाहते हों! यह धारणा बहुत ही स्वीकार्य लग सकती है, परन्तु परमेश्वर का वचन ऐसा कदापि नहीं सिखाता। केवल परमेश्वर यह निर्धारित करता है और उसके अतिरिक्त कोई अन्य यह तय नहीं कर सकता कि उसके राज्य में कौन होगा।

परमेश्वर कहता है कि न्याय का एक दिन आएगा। निस्सन्देह, यीशु अपनी महिमा में वापस आएगा और “सब जातियाँ उसके सामने इकट्ठा की जाएँगी; और वह उन्हें एक दूसरे से अलग करेगा” कि वे या तो परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करें या अनन्त विनाश में भेजे जाएँ (मत्ती 25:32)। परमेश्वर का राज्य ऐसा कुछ नहीं है, जिसे यीशु पुरातन से चली आ रही प्रणाली में मौजूद किसी दोष को ठीक करने के लिए लेकर आया हो। इसकी योजना अनन्तकाल से थी।

आने वाले न्याय के कारण सुसमाचार प्रचार में तत्परता की भावना उत्पन्न होनी चाहिए और इससे हममें हमारे पाप के प्रति सच्चरित्रता और निर्दयता उत्पन्न होनी चाहिए। हमें संसार के सामने यीशु के रूप में एक ऐसा जीवित उद्धारकर्ता प्रस्तुत करना चाहिए, जो ठीक वही करेगा जिसे करने के बारे में उसने कहा था और हमें स्वयं को भी यही प्रचार करना चाहिए। केवल अपने पाप को पहचानने और उद्धारकर्ता की हमारी आवश्यकता को पहचानने के द्वारा ही यह सम्भव है कि हम परमेश्वर के इस अनन्त राज्य के वारिस बन सकेंगे।      लूका 13:22-30

10 फरवरी : परमेश्वर ने विश्राम किया

Alethia4India
Alethia4India
10 फरवरी : परमेश्वर ने विश्राम किया
Loading
/

“और परमेश्‍वर ने सातवें दिन को आशीष दी और पवित्र ठहराया; क्योंकि उसमें उसने सृष्टि की रचना के अपने सारे काम से विश्राम लिया।”  उत्पत्ति 2:3

मानवता सृष्टि का चरमोत्कर्ष है। हम केवल उच्च श्रेणी के वानर नहीं हैं; परमेश्वर की सारी सृष्टि में से केवल हम ही उसके स्वरूप में बनाए गए हैं (उत्पत्ति 1:27)। हम एक सृष्टि हैं क्योंकि हमें एक सृष्टिकर्ता ने बनाया है, किन्तु हम सारी सृष्टि में अद्वितीय भी हैं क्योंकि हमें परमेश्वर की समानता में बनाया गया है। मनुष्य के पास वह गरिमा है, जो उससे अलग नहीं की जा सकती और परमेश्वर चाहता है कि हम अपने सृष्टिकर्ता का आदर करें और उसके साथ सम्बन्ध में बने रहें।

यदि मनुष्य सृष्टि का चरमोत्कर्ष है, तो विश्राम सृष्टि का चरम लक्ष्य है। जब परमेश्वर ने अपना सृजनात्मक कार्य पूरा किया, तो उसने विश्राम किया। इसका अर्थ यह नहीं है कि उसने अपने बनाए संसार में उपस्थित रहना या सक्रिय रहना बन्द कर दिया, अपितु इसका अर्थ यह है कि उसने सृजन के कार्य से विश्राम किया। उसमें आगे को कोई संशोधन करने या जोड़े जाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। किसी भी वस्तु को किसी कमी के कारण खोलकर फिर से बनाने की आवश्यकता नहीं थी। और परमेश्वर की महान योजना, अर्थात् मनुष्यों के लिए उसकी इच्छा यह है कि हम भी उसके साथ विश्राम के अद्‌भुत, निरन्तर बने रहने वाले दिन में रह सकें।

उत्पत्ति 1 में दिया गया सृष्टि के सृजन का विवरण पहले छः दिनों में से प्रत्येक के लिए “साँझ हुई फिर भोर हुआ” वाक्यांश को दोहराता है। लेकिन जब सातवें दिन की बात आती है, तो इस चक्र में बदलाव आता है। दूसरे शब्दों में, सातवाँ दिन तो एक निरन्तर चलते रहने वाला वह दिन है जिसमें परमेश्वर अपने लिए एक प्रजा को पा लेने का यत्न कर रहा है। वह मानवजाति को अपने साथ एक सम्बन्ध में लेकर आ रहा है, उनके लिए प्रावधान कर रहा है, उनकी रक्षा कर रहा है, उन्हें एक-दूसरे के साथ संगति प्रदान कर रहा है और उन्हें अपनी सृष्टि पर अधिकार दे रहा है।

जैसा कि दस आज्ञाओं में निर्देश दिया गया है कि विश्रामदिन का एक उद्देश्य इस्राएलियों को जीवन के लिए परमेश्वर के सर्वोच्च अभिप्राय के बारे में समझ प्रदान करना था (निर्गमन 20:8-11)। विश्राम करने और चिन्तन करने के द्वारा उन्हें विचार करना था कि परमेश्वर के लोगों के रूप में परमेश्वर की प्रभुता और आशीष में होकर जीने का अर्थ क्या-क्या हो सकता है।

जब यीशु लोगों को अपने पास बुलाता है, तो वह कहता है, “हे सब परिश्रम करने वालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा . . . और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे” (मत्ती 11:28-29)। इब्रानियों का लेखक इस विचार को लेता है और घोषणा करता है कि “परमेश्‍वर के लोगों के लिए सब्त का विश्राम बाकी है” (इब्रानियों 4:9)। जो अदन की सुन्दरता में रचा गया और पतन की घटना में नष्ट हो गया, वह एक दिन पुनः स्थापित हो जाएगा जब हम परमेश्वर की उपस्थिति में प्रवेश करेंगे। अभी हम अपने पापों को यीशु के पास लाने के विश्राम का अनुभव करते हैं जिससे कि हम उनसे छुटकारा पा सकें और अपनी चिन्ताओं को यीशु के पास लाने के विश्राम का अनुभव करते हैं जिससे कि हम उनमें सहायता पा सकें। हम एक दिन अपने सिद्ध परमेश्वर की पवित्रता से भरे हुए एक पुनर्स्थापित संसार में पुनरुत्थान के जीवन के सिद्ध विश्राम का अनुभव करेंगे। हमारे ताकते रहने को सन्तुष्टि प्रदान करने और इस संसार में हमारे सबसे अच्छे और सबसे बुरे दिनों में हमारे हृदयों के ध्यान को फिर से उन्मुख कर देने की आशा यही है। एक दिन हम वास्तव में शान्ति में विश्राम करने पाएँगे।

जैसे-जैसे हम इस भविष्य की ओर बढ़ते जा रहे हैं, तो परमेश्वर का आदर्श ही वह आदर्श होना चाहिए जिसका हम अनुकरण करते हैं। जैसा कि परमेश्वर ने आज्ञा दी है, हमें विश्रामदिन को पवित्र मानने के लिए स्मरण रखना है और उन सभी बातों पर विचार करने के लिए समय निकालना है जो वह हमारे लिए चाहता है, उसके साथ सहभागिता के जीवन का आनन्द लेने के लिए समय निकालना है और उसके साथ उस कार्य में लगना है जब वह सक्रिय रूप से ऐसे लोगों को पा लेने का यत्न कर रहा है जिसे वह अपनी प्रजा कह सके।      

भजन संहिता 8