“हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर और पिता का धन्यवाद हो कि उसने हमें मसीह में स्वर्गीय स्थानों में सब प्रकार की आत्मिक आशीष दी है। जैसा उसने हमें जगत की उत्पत्ति से पहले उसमें चुन लिया कि हम उसके निकट प्रेम में पवित्र और निर्दोष हों। और अपनी इच्छा के भले अभिप्राय के अनुसार हमें अपने लिए पहले से ठहराया कि यीशु मसीह के द्वारा हम उसके लेपालक पुत्र हों।” इफिसियों 1:3-5
परमेश्वर ने आपको बहुत पहले से प्रेम किया है।
इफिसियों को लिखे अपने पत्र के आरम्भ में पौलुस द्वारा स्तुति का इस प्रकार उण्डेला जाना, हमें उन सभी कार्यों की महिमा के बारे में बताता है, जो परमेश्वर ने मसीह में हमारे लिए किए हैं। इस काम को इतना प्रभावशाली बनाने वाली एक विशेषता यह है कि इसका आरम्भ परमेश्वर से होता है, जो हमें याद दिलाता है कि हमारे अस्तित्व में आने से पहले ही उसने लोगों को अपने पास लाने की पहल की। हमारे सामने यह प्रलोभन आ सकते हैं कि हमें मानवीय प्रयासों के द्वारा परमेश्वर की खोज करने की आवश्यकता है; और निस्सन्देह, संसार के कई धर्म यही बात सिखाते भी हैं। परन्तु अपने आरम्भ से ही बाइबल यह सिखाती है कि वास्तव में परमेश्वर स्वयं हम तक पहुँचता है।
मसीह में हमारा चुनाव सृष्टि की रचना के बाद किसी समय में किया गया कोई विचार नहीं है; यह सृष्टि की रचना से पूर्व अनन्त काल का विचार है। यह बात सच है कि हम स्वयं मसीह के पीछे चलने का निर्णय लेते हैं, किन्तु यह जानना कितनी दीनता लाता है कि यदि परमेश्वर ने हमें जगत की उत्पत्ति से पहले नहीं चुना होता तो हम कभी भी परमेश्वर को नहीं चुन सकते थे। यदि उसने पहले आपको अपनी सन्तान बना लेने का निर्णय नहीं लिया होता, तो आप उसके पीछे चलने का निर्णय लेने में सक्षम नहीं होते।
परमेश्वर की सम्प्रभुता के साथ मनुष्य के उत्तरदायित्व का सामंजस्य स्थापित करने में एक नाजुक तनाव व्याप्त होता है। बहुत से लोग मानते हैं कि उन्हें इन दोनों में से किसी एक को चुनना होगा, जबकि वास्तव में दोनों ही विचार बाइबल आधारित हैं और आपस में जुड़े हुए हैं। ये दो ऐसे सत्य हैं, जो एक दूसरे से जुड़े हुए और एक ही ओर उन्मुख हैं। ये हमारे सीमित मानवीय मनों को परस्पर-विरोधी लगते हैं, परन्तु फिर भी दोनों पूरी तरह से सत्य हैं। हमें इनको वास्तविकता से परे सिद्धान्तों के रूप में लेते हुए उनके बारे में बहुत अधिक चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। इसके विपरीत, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की हमारे पक्ष में हुई दया से चकित होते हुए हम आदर के साथ प्रत्युत्तर दे सकते हैं।
चुनाव की सैद्धान्तिक शिक्षा कोई ऐसा ध्वज नहीं है जिसके तले हम चलते हैं, अपितु यह हमारी आत्माओं के लिए एक गढ़ है।[1] यह बात हमारी सुरक्षा और हमारे आनन्द को महत्त्व प्रदान करती है। जैसे ही आप दीनता के साथ यह जान जाते हैं कि समय के आरम्भ से पहले ही मसीह में आपकी पहचान उस क्षण स्थापित हो गई थी, जब उसने पहली बार आप पर अपना स्नेह सुनिश्चित किया था, तभी से आप स्वतन्त्र हो जाते हैं और आप में हियाव आ जाता है। आपको अपने आप में कोई ऐसा कारण खोजने की आवश्यकता नहीं है, जिसके द्वारा आप यह समझ सकें कि आपको उसका अद्भुत अनुग्रह क्यों मिला है; आप केवल यह जानकर आनन्दित हो सकते हैं कि उसने आपको इसलिए चुना क्योंकि वह आपसे प्रेम करता है। क्योंकि आपको लगता है कि आप अपने मसीही जीवन में बहुत कम प्रगति कर रहे हैं, इस कारण आपको अपने पापों के कारण बोझिल रहने या कुचले रहने की आवश्यकता नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उसका प्रेम कभी भी आपके कार्यों या भले कार्य कर पाने की आपकी प्रतिज्ञा पर आधारित नहीं था। आप इस जीवन के उतार-चढ़ावों में से इस आश्वासन के साथ होकर जा सकते हैं कि जो आपको प्रेम करता है उसी ने सभी वस्तुओं को बनाया है तथा सभी वस्तुओं उसी के चलाए चलती हैं और यह भी कि क्योंकि आपको कभी भी उसका प्रेम प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं पड़ी, इसलिए आप इसे कभी खो भी नहीं सकते हैं।
यूहन्ना 6:35-51