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20 सितम्बर : दूसरों के लिए मन

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20 सितम्बर : दूसरों के लिए मन
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“उसके महात्म्य और पराक्रम के कामों, और मोर्दकै की उस बड़ाई का पूरा ब्योरा, जो राजा ने उसकी की थी, क्या वह मादै और फारस के राजाओं के इतिहास की पुस्तक में नहीं लिखा है? यहूदी मोर्दकै, क्षयर्ष राजा ही के नीचे था, और यहूदियों की दृष्‍टि में बड़ा था, और उसके सब भाई उससे प्रसन्न थे, क्योंकि वह अपने लोगों की भलाई की खोज में रहा करता था और अपने सब लोगों से शान्ति की बातें कहा करता था।” एस्तेर 10:2-3

कभी-कभी इतिहास के क्रम में ऐसा होता है कि कोई एक व्यक्ति उठ खड़ा होता है, जिसकी उपस्थिति के बिना सब कुछ भिन्न होता। ऐसा ही एक व्यक्ति विंस्टन चर्चिल था—ब्रिटेन का पूर्व प्रधानमन्त्री, राजनेता और स्वतन्त्रता का रक्षक। इतिहास का कोई भी विद्यार्थी ईमानदारी से इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि यदि चर्चिल आगे न बढ़ा होता, तो द्वितीय विश्व युद्ध और उसके परिणामों का इतिहास पूरी तरह भिन्न होता। यद्यपि प्रायः इतिहास की धारा किसी एक व्यक्ति के कार्यों की परवाह किए बिना आगे बढ़ती हुई प्रतीत होती है, फिर भी आप अपने ही देश और समाज में ऐसे लोगों के विषय में सोच सकते हैं जिन्होंने निर्णायक रूप से इतिहास की दिशा मोड़ दी।

पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व में मोर्दकै ऐसा ही एक व्यक्ति था। उसके जीवन का पूरा ब्योरा मादै और फारस के राजाओं के इतिहास की पुस्तक में लिखा गया, क्योंकि यदि वह न उठा होता, तो परिस्थितियाँ स्पष्ट रूप से भिन्न होतीं।

मोर्दकै फारसी नहीं था। वह यहूदी था और एक भिन्न परमेश्वर (एकमात्र सच्चे परमेश्वर) का आदर करता हुआ, फारसियों से भिन्न रीति से जीवन बिताता हुआ और भिन्न परम्पराओं का पालन करता हुआ एक यहूदी के रूप में ही जीवन व्यतीत करता था। फिर भी, यद्यपि वह इतना भिन्न था, वह फारसियों के द्वारा सम्मानित हुआ, इसलिए नहीं कि उसने दोहरी बात की या राजा क्षयर्ष की कृपा पाने का यत्न किया, बल्कि इसलिए कि उसमें पूर्ण सत्यनिष्ठा और नैतिक स्थिरता थी। मोर्दकै ने लोकप्रिय बनने का लक्ष्य नहीं रखा; उसने वही करने का निश्चय किया जो सही था—जो परमेश्वर ने उसे करने के लिए दिया था।

जब किसी को बड़े प्रभाव का पद दिया जाता है, तो प्रायः अन्य लोग ईर्ष्या के कारण उससे अप्रिय हो जाते हैं। अपने सहयहूदियों में मोर्दकै की स्थाई लोकप्रियता असामान्य थी। सम्भवतः इसका एक कारण यह था कि वह उनकी चिन्ता करता था। वह अपनी प्रजा से अलग-थलग या उदासीन नहीं हुआ, और अपने पद का उपयोग अपने स्वयं के समृद्धि के लिए नहीं बल्कि दूसरों के कल्याण के लिए करता रहा और “अपने लोगों की भलाई की खोज में रहा करता था।” जैसा कि एक व्याख्याकार ने इसे संक्षेप में कहा है, “मोर्दकै की स्थाई विरासत यह है कि उसने राजा की सेवा और अपनी प्रजा की सेवा को एक साथ जोड़ा, और किसी में भी समझौता नहीं किया। वह दोनों की सेवा करता है और दोनों के लिए बोलता है, दोनों की भलाई और शान्ति चाहता है।”[1]

मोर्दकै से सीखें। वही करने का लक्ष्य रखें जो सही है—जो परमेश्वर ने आपको करने के लिए दिया है, उस स्थान और उस समय में जिसे उसने आपके लिए ठहराया है। मोर्दकै के समान, आपकी विरासत ऐसी हो कि लोग पहचान सकें कि क्योंकि आपका मन परमेश्वर के लिए है, इसलिए आपका मन दूसरों के लिए भी है और इस प्रकार उनके हित में विश्राम, कल्याण, शान्ति और समृद्धि लाने के लिए जो कुछ आप कर सकते हैं, करते रहें। आपके काम इस संसार की इतिहास की पुस्तकों में लिखे जाएँ या न लिखे जाएँ—परन्तु अनन्तकाल में वे लिखे जाएँगे और मनाए जाएँगे।

    एस्तेर 10:1–3

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 1–2; यूहन्ना 8:30-59


[1] डेब्रा रीड, एस्तेर, टिण्डेल ओल्ड टेस्टामेण्ट कॉमेण्ट्रीज़ (इण्टरवर्सिटी, 2008).

19 सितम्बर : एक दृढ़ प्रतिबद्धता

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19 सितम्बर : एक दृढ़ प्रतिबद्धता
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“यहूदियों ने अपने-अपने लिए और अपनी सन्तान के लिए, और उन सभों के लिए भी जो उनमें मिल गए थे यह अटल प्रण किया, कि उस लेख के अनुसार प्रति वर्ष उसके ठहराए हुए समय में वे ये दो दिन मानें; और पीढ़ी-पीढ़ी, कुल-कुल, प्रान्त-प्रान्त, नगर-नगर में ये दिन स्मरण किए और माने जाएँगे, और पूरीम नाम के दिन यहूदियों में कभी न मिटेंगे और उनका स्मरण उनके वंश से जाता न रहेगा।” एस्तेर 9:27-28

आधुनिक पश्चिमी संस्कृति में “प्रतिबद्धता” एक कम प्रचलित शब्द है।

लोग प्रायः कहते हैं, “मैं नहीं चाहता कि आप किसी प्रकार अपने को प्रतिबद्ध महसूस करें।” परन्तु प्रतिबद्धता अक्सर आवश्यक और अच्छी होती है। मैं चाहता हूँ कि मैं अपनी पत्नी के लिए प्रतिबद्ध रहूँ, और मैं चाहता हूँ कि वह मेरे लिए प्रतिबद्ध रहे। जब मेरे बच्चे छोटे थे, तो मैं चाहता था कि वे माता-पिता के अधिकार के सम्बन्ध में हमारे लिए प्रतिबद्ध रहें। वास्तव में, मनुष्यों के बीच जो भी सम्बन्धों के जो प्रतिबद्धताएँ होती हैं, वे सबसे पहले स्वयं परमेश्वर के लिए प्रतिबद्धताएँ होती हैं।

हामान के हाथों विनाश से बचाए जाने के बाद यहूदियों ने “यह अटल प्रण किया” कि वे इस दिन को एक स्मारक के तौर पर मनाएँगे। वे इस नई परम्परा को मानने के लिए आधे मन से सहमत नहीं हुए, कि जब सुविधा हो तभी ऐसा करेंगे। उन्होंने निश्चय किया कि वे इसे अवश्य पूरा करेंगे। यही कर्तव्य का स्वभाव है।

यहूदियों ने केवल स्वयं के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी सन्तानों और “उन सभों के लिए भी जो उनमें मिल गए थे,” इस दायित्व की प्रतिबद्धता स्थापित की। उन्होंने इसे हर स्थान और हर पीढ़ी के लिए एक व्यापक प्रतिबद्धता बनाया। और 2500 बाद भी पूरीम की यह परम्परा जारी है। संसार भर का यहूदी समाज आज भी इस पर्व को मनाता है, क्योंकि उस समय के लोगों ने यह निश्चय किया था कि एस्तेर के समय में और एस्तेर के साहस के द्वारा परमेश्वर के हस्तक्षेप को आने वाली पीढ़ियाँ कभी न भूलें।

हमारी संस्कृति हमें सिखाती है कि हमें किसी व्यक्ति या किसी बात के लिए प्रतिबद्ध महसूस करने की आवश्यकता नहीं है, कि हम केवल वर्तमान में अपने लिए जी सकते हैं, और यह कि अधिकांश प्रतिबद्धताओं पर भविष्य में फिर से विचार किया जा सकता है यदि वे असुविधाजनक या अस्थिर लगें। परन्तु परमेश्वर के राज्य में प्रतिबद्धता का महत्त्व है। आखिरकार, परमेश्वर ने स्वयं को अपनी प्रजा को बचाने और सम्भालने के लिए प्रतिबद्ध किया है। जिन बातों के प्रति आप प्रतिबद्ध रहते हो और जिन्हें थामे रहते हो, वे यह प्रकट करती हैं कि आपके लिए सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण क्या है। इसलिए सुसमाचार के उत्सव के प्रति स्वयं को समर्पित करें, और उन महान अवसरों में भाग लें जिन्हें परमेश्वर ने हमें यह स्मरण करने के लिए दिया है कि उसने हमारे लिए क्या किया है—अर्थात् बपतिस्मा और प्रभु भोज के संस्कार। और जहाँ तक आपके वश में है, यह सुनिश्चित करें कि ये बातें एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचें। यदि मसीह हजार वर्ष बाद भी न लौटे, तब भी ऐसे लोग होंगे जो सुसमाचार को जानेंगे और उसके लिए खड़े रहेंगे, क्योंकि हमारी पीढ़ी ने यह प्रतिबद्धता की है।

  एस्तेर 9:20–32

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: आमोस 7–9; यूहन्ना 8:1-29 ◊

18 सितम्बर : महान उलटफेरों का परमेश्वर

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18 सितम्बर : महान उलटफेरों का परमेश्वर
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“जिस दिन राजा की आज्ञा और नियम पूरे होने को थे, और यहूदियों के शत्रु उन पर प्रबल होने की आशा रखते थे, परन्तु इसके विपरीत यहूदी अपने बैरियों पर प्रबल हुए।” एस्तेर 9:1

हामान और उसके साथियों को पूरा विश्वास था कि बारहवें महीने के तेरहवें दिन यहूदी जाति का विनाश अवश्यम्भावी है। यह आज्ञा सारे राज्य में घोषित हो चुकी थी। यहूदियों का सर्वनाश होना तय समझा जा रहा था। परन्तु जब वह दिन आया, तो यहूदियों ने अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त की। हामान और उसके मित्रों ने लगभग एक वर्ष यह ठहराने में लगाया था कि उनके शत्रुओं को मारने के लिए कौन सा दिन सबसे उपयुक्त होगा (एस्तेर 3:7)। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि लेखक उस दिन को विशेष रूप से चिह्नित करता है, जब बड़ा उलटफेर हुआ—“जिस दिन” को हामान ने चुना था!

यह एस्तेर की पुस्तक में कई बड़े उलटफेरों में से केवल एक है। इससे पहले हामान अभी राजा और रानी एस्तेर के साथ भोज से निकलकर ऐसा अनुभव कर रहा था मानो वह संसार की चोटी पर हो। वह अपने घर गया और अपनी पत्नी और मित्रों से “अपने धन के वैभव, और अपने बाल–बच्चों की बढ़ती” का वर्णन किया (एस्तेर 5:11)। परन्तु उसी दिन, जिस दिन को हामान ने चुना था, उसके दसों पुत्र—जो उसकी शान थे—मार डाले गए (9:7–10)। उसका घराना वैभव से गिरकर विनाश में पहुँच गया।

मौर्दकै का अनुभव इसके ठीक विपरीत था। वह गुमनामी और स्पष्ट महत्त्वहीनता से उठकर राजा के अधीन सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बन गया। उसका आरम्भ इस साधारण रीति से हुआ था, “शूशन गढ़ में मोर्दकै नामक एक यहूदी रहता था” (एस्तेर 2:5), जो राजा के फाटक पर बैठता था—जो कुछ खास नहीं लगता! परन्तु पुस्तक के अन्त तक वह ऐसा हो गया कि “मोर्दकै तो राजा के यहाँ बहुत प्रतिष्ठित था, और उसकी कीर्ति सब प्रान्तों में फैल गई; वरन् उस पुरुष मोर्दकै की महिमा बढ़ती चली गई” (9:4)।

मौर्दकै और एस्तेर ने अपने शत्रुओं के विनाश पर घमण्ड नहीं किया। परन्तु उन्होंने अपने यहूदी समाज के साथ नृत्य किया और आनन्द मनाया (एस्तेर 9:18), क्योंकि उन्होंने पहचाना कि ये उलटफेर परमेश्वर की ओर से थे, और इसलिए वे उनकी दृष्टि में अद्‌भुत थे (भजन 118:23)। हम उन्हें मानो उद्धार का यह गीत गाते हुए सुन सकते हैं:

तू ने मेरे लिए विलाप को नृत्य में बदल डाला;

तू ने मेरा टाट उतरवाकर मेरी कमर में आनन्द का पटुका बाँधा है,

ताकि मेरी आत्मा तेरा भजन गाती रहे और कभी चुप न हो।

हे मेरे परमेश्‍वर यहोवा, मैं सर्वदा तेरा धन्यवाद करता रहूँगा!” (भजन 30:11–12)

परमेश्वर महान उलटफेरों का परमेश्वर है। वह शाप को आशीष में बदल सकता है। वह असम्भव को सिद्ध करता है; “अपरिवर्तनीय” शब्द उसके लिए अर्थहीन है, और कोई भी परिस्थिति उसके लिए अजेय नहीं है। कलवरी का क्रूस इसका सर्वोच्च और अनन्त प्रमाण है।

यदि आप ऐसी परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं जो निराशाजनक प्रतीत होती हैं, तो सहायता के लिए परमेश्वर को पुकारें। चाहे आपको अपनी सारी सांसारिक यात्रा में प्रतीक्षा ही क्यों न करनी पड़े, वह आपको छुड़ाने की प्रतिज्ञा करता है। और यदि आप अपने जीवन में पहले ही परमेश्वर के किसी उलटफेर का अनुभव कर चुके हैं, तो समय निकालकर उसका धन्यवाद करें और उसकी स्तुति गाएँ। वह निश्चय ही भला है!

  एस्तेर 9:1–19

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: आमोस 4– 6; यूहन्ना 7:28-53

17 सितम्बर : रोना, विनती करना, और बोलना

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17 सितम्बर : रोना, विनती करना, और बोलना
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“फिर एस्तेर दूसरी बार राजा से बोली; और उसके पाँव पर गिर, आँसू बहा बहाकर उससे गिड़गिड़ाकर विनती की कि अगागी हामान की बुराई और यहूदियों की हानि की उसकी युक्ति निष्फल की जाए।” एस्तेर 8:3

परमेश्वर की सन्तान के लिए स्वार्थ कभी स्वीकार्य नहीं है।

यदि एस्तेर का उद्देश्य केवल इतना ही होता कि हामान को उसके कर्मों का उचित फल मिल जाए, और उसका अपना जीवन बच जाए तथा उसका ऊँचा पद सुरक्षित रहे, तो हामान की मृत्यु के साथ ही उसका लक्ष्य पूरा हो जाता। परन्तु उसका उद्देश्य इससे कहीं बढ़कर था—उसमें न केवल हामान का दण्ड और उसकी अपनी सुरक्षा सम्मिलित थी, बल्कि पूरे यहूदी राष्ट्र का उद्धार भी शामिल था। जब तक उसकी प्रजा विनाश के खतरे में थी, तब तक केवल स्वयं का बच जाना एस्तेर के लिए पर्याप्त नहीं था।

जब एस्तेर “दूसरी बार राजा से बोली,” तो अभी कुछ ही घण्टे बीते थे जब हामान केवल अपने ही विषय में चिन्तित होकर एस्तेर के पाँवों पर गिर पड़ा था (एस्तेर 7:7-8)। इसके विपरीत, एस्तेर राजा के पाँवों पर अपनी प्रजा के लिए चिन्तित होकर गिरी। वह उनका विनाश सहन नहीं कर सकती थी।

सदियों बाद, एक और यहूदी ने, जब उसका जीवन परमेश्वर द्वारा पूरी तरह पकड़ लिया गया, यह कहा, “मुझे बड़ा शोक है, और मेरा मन सदा दुखता रहता है, क्योंकि मैं यहाँ तक चाहता था कि अपने भाइयों के लिए जो शरीर के भाव से मेरे कुटुम्बी हैं, स्वयं ही मसीह से शापित हो जाता। वे इस्राएली हैं, और लेपालकपन का अधिकार और महिमा और वाचाएँ और व्यवस्था और उपासना और प्रतिज्ञाएँ उन्हीं की हैं” (रोमियों 9:2-4)। प्रेरित पौलुस इस बात से सन्तुष्ट नहीं था कि वह अकेला दमिश्क के मार्ग पर यीशु से मिला था। वह यह लालसा रखता था कि उसके लोग भी मसीह के उद्धारक ज्ञान तक पहुँचे। इसमें उसने अपने प्रभु और उद्धारकर्ता का अनुसरण किया, जो अपने स्वर्गिक सिंहासन से उतरकर चरनी की दीन दशा में आया, ताकि अपनी प्रजा को कीचड़ भरे गड्ढे से निकालकर अपने अनन्त स्वर्ग में ले जाए। स्वयं प्रभु यीशु उन लोगों के लिए रोया जिन्होंने यह न पहचाना कि उसके आगमन में परमेश्वर उनके सामने युद्ध के स्थान पर शान्ति और न्याय के स्थान पर उद्धार रख रहा था (लूका 19:41-44)।

जब कोई पुरुष या स्त्री मसीह के उद्धार को जान लेता है, तो न केवल वह परमेश्वर के साथ सही सम्बन्ध में स्थापित होता है, बल्कि वह यह भी समझने लगता है कि जिन लोगों ने यीशु पर विश्वास नहीं किया है, उनका परमेश्वर के साथ सम्बन्ध अभी भी टूटा हुआ है और वे न्याय का सामना कर रहे हैं, तथा उसकी प्रेममय उपस्थिति से दूर अनन्तता की ओर बढ़ रहे हैं।

हमें कभी हामान के समान नहीं होना चाहिए, जो केवल अपने ही विषय में चिन्तित था। जब हम ऐसे होते हैं, तो परमेश्वर हमें क्षमा करे। यह उचित है कि हम रोएँ, जब हम यह पहचानते हैं कि जो लोग मसीह में शरण नहीं लेते, उनके सामने कैसी विपत्ति खड़ी है—चाहे वे हमारे परिवार के हों, मित्र हों, या पड़ोसी। पौलुस के समान, हमें अपने उद्धार से भी अधिक उनके उद्धार की चिन्ता करनी चाहिए। परन्तु पौलुस के ही समान, हम केवल रो ही नहीं सकते, क्योंकि हमारे आँसू प्रार्थनाओं के साथ जुड़ सकते हैं कि जिनसे हम प्रेम करते हैं, वे यीशु की ओर फिरें और उसे अपना मसीह ग्रहण करें, और सुसमाचार की घोषणा के साथ भी, इस आशा में कि प्रभु हमें प्रयोग करे ताकि उनका मार्ग मृत्यु से जीवन की ओर मोड़ दे, जैसे उसने एस्तेर के द्वारा यहूदियों को बचाया। आज आप किसके लिए रोएँगे, किसके लिए प्रार्थना करेंगे, और किससे बोलने का प्रयत्न करेंगे?

  एस्तेर 8:1–17

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: आमोस 1–3; यूहन्ना 7:1-27 ◊

16 सितम्बर : क्या परमेश्वर को हमारी आवश्यकता है?

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16 सितम्बर : क्या परमेश्वर को हमारी आवश्यकता है?
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“एस्तेर रानी ने उत्तर दिया, ‘हे राजा! यदि तू मुझ पर प्रसन्न है, और राजा को यह स्वीकार हो, तो मेरे निवेदन से मुझे, और मेरे माँगने से मेरे लोगों को प्राणदान मिले। क्योंकि मैं और मेरी जाति के लोग बेच डाले गए हैं, और हम सब घात और नष्ट किए जाने वाले हैं। यदि हम केवल दास–दासी हो जाने के लिए बेच डाले जाते, तो मैं चुप रहती; चाहे उस दशा में वह विरोधी राजा की हानि भर न सकता।’” एस्तेर 7:3-4

हम जोखिम उठाते हैं और अपने परमेश्वर की सेवा करते हैं, क्योंकि हमारी सफलता हम पर निर्भर नहीं करती।

वह समय आ गया था जब एस्तेर को मौर्दकै की चुनौती के अनुसार कार्य करना था और परमेश्वर की प्रजा के लिए राजा से बोलना था (एस्तेर 4)। उसने जानबूझकर उस आज्ञा-पत्र के शब्दों का प्रयोग किया: “घात” और “नष्ट” (3:13)। इसके अतिरिक्त, एस्तेर ने राजा से उसकी नैतिकता के आधार पर विनती नहीं की। इसके बजाय, उसने राजा के स्वार्थ—उसकी प्रिय रानी की हत्या—के आधार पर अपील की। एस्तेर ने कुशलता से ऐसे शब्द बोले कि राजा को दोषी ठहराए बिना ध्यान हामान पर केन्द्रित हो गया। जब राजा ने पूछा, “वह कौन है, और कहाँ है, जिसने ऐसा करने का निश्चय किया है?” (7:5), तो एस्तेर न्यायसंगत रूप से उसे दर्पण दिखा सकती थी—परन्तु वह बुद्धिमानी न होती!

इन सब के माध्यम से, परमेश्वर उन घटनाओं में कार्य कर रहा था जिन पर एस्तेर का कोई नियन्त्रण नहीं था। और वह उस ढंग में भी कार्य कर रहा था जिसमें एस्तेर ने अपनी बुद्धि, कौशल, आज्ञाकारिता आदि का प्रयोग किया—उसके व्यक्तित्व के वे पक्ष जिन पर उसका नियन्त्रण था।

ऐसा नहीं था कि परमेश्वर को एस्तेर की इतनी आवश्यकता थी कि यदि वह कार्य न करती तो उसकी योजना विफल हो जाती। ऐसा सोचना मानवीय उत्तरदायित्व को अत्यधिक महत्त्व देना होता। परन्तु यह भी सत्य नहीं है कि परमेश्वर एस्तेर की सहभागिता की परवाह किए बिना जो चाहता वह कर ही लेता। ऐसी सोच उसकी सार्वभौमिक सत्ता को मानवीय सहभागिता से अलग कर देती है। यह एक महान रहस्य है! परमेश्वर मनुष्यों को साधन के रूप में उपयोग कर सकता है, परन्तु वह हमारे बिना भी कार्य कर सकता है। और जब वह हमें उपयोग करता भी है, तब भी सफलता न तो उसके सेवकों पर और न उनके कार्यों पर निर्भर करती है।

यह हमारे लिए भी सत्य है, जब हम लोगों को यीशु के विषय में बताने या परमेश्वर के वचन की शिक्षा देने का प्रयास करते हैं। परमेश्वर जैसे चाहे वैसे अपने आप को प्रकट कर सकता है और अपनी प्रजा के विश्वास को जैसे चाहे वैसे बढ़ा सकता है, परन्तु वह हमें भी एक भूमिका देता है। वह हमें सिखाने, एक-दूसरे को प्रोत्साहित करने, और सुसमाचार का प्रचार करने की आज्ञा देता है। और इसलिए हम ऐसा करते हैं। परन्तु अन्ततः, हम जानते हैं कि किसी भी हृदय और जीवन का परिवर्तन जीवते परमेश्वर के कार्य के बिना कभी नहीं होता। वही कठोर हृदयों को कोमल करता है और अन्धकार में डूबी आँखों को खोलता है। वही साधनों और परिणाम, दोनों को ठहराने में समर्थ है।

और यही कारण है कि क्योंकि परमेश्वर सम्प्रभु है, आपके पास उसकी आज्ञा मानने के लिए हर कारण है। यद्यपि सफलता आप पर निर्भर नहीं करती, फिर भी जिस परमेश्वर ने सम्पूर्ण सृष्टि की रचना की है, उसने आपको उपयोग करने का चुनाव किया है। वह अपना भला कार्य पूरा करेगा (फिलिप्पियों 1:6)। वह अपनी प्रजा को अपने लोगों तक पहुँचाने और अपने लोगों की सेवा करने के लिए उपयोग करेगा। यह समझ आपको दीन बनाए, और साथ ही आपको उन कार्यों का सामना करने के लिए उत्साह दे जिनके लिए आपको बुलाया गया है—जोखिम उठाने, और उसकी सेवा करने और आज्ञा मानने के लिए, जब वह आप में और आपके द्वारा कार्य करता है।

  एस्तेर 6:12–7:10

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: विलापगीत 3–5; यूहन्ना 6:52-71

15 सितम्बर : दीन विश्वासयोग्यता

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15 सितम्बर : दीन विश्वासयोग्यता
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“जब हामान भीतर आया, तब राजा ने उससे पूछा, ‘जिस मनुष्य की प्रतिष्ठा राजा करना चाहता हो तो उसके लिए क्या करना उचित होगा?’ हामान ने यह सोचकर, कि मुझ से अधिक राजा किसकी प्रतिष्ठा करना चाहता होगा’ . . . राजा ने हामान से कहा, ‘फुर्ती करके अपने कहने के अनुसार उस वस्त्र और उस घोड़े को लेकर, उस यहूदी मोर्दकै से जो राजभवन के फाटक में बैठा करता है, वैसा ही कर। जैसा तू ने कहा है उसमें कुछ भी कमी होने न पाए।’” एस्तेर 6:6, 10

यह बाइबल के उन महान क्षणों में से एक है जो मन को स्तब्ध कर देते हैं।

हामान एक घमण्डी और धृष्ट व्यक्ति था, और इसी कारण उसने एक बड़ी भूल की। जब उसने सुना कि एक “मनुष्य की प्रतिष्ठा राजा करना चाहता” है, तो उसने मान लिया कि वह मनुष्य वह स्वयं है। इसलिए उसने राजसी वस्त्रों, राजसी घोड़े, मुकुट और सार्वजनिक प्रशंसा से सम्बन्धित एक महिमामय योजना प्रस्तुत की, क्योंकि उसके मन में अपने सिवा कोई और नहीं था (एस्तेर 6:8-9)। हम कल्पना कर सकते हैं कि जब राजा ने उससे कहा, “फुर्ती करके अपने कहने के अनुसार उस वस्त्र और उस घोड़े को लेकर . . .” तब हामान का हृदय कैसे फूल उठा होगा। और फिर उसने सुना . . . “उस यहूदी मोर्दकै से जो राजभवन के फाटक में बैठा करता है, वैसा ही कर।”

वह नाम सुनते ही हामान के हृदय पर कैसा आघात पहुँचा होगा!

उस दिन हामान मौर्दकै को फाँसी पर लटकाने निकला था (एस्तेर 6:4)। और अब उसे आदेश दिया जा रहा था कि वह उसी मनुष्य को सार्वजनिक स्थान से होकर घुमाए, और उस एक व्यक्ति के लिए—जिससे वह सबसे अधिक घृणा करता था—राजा के उदार पुरस्कार की घोषणा करे। क्या चित्र है! क्या दृश्य है!

इसके विपरीत, मौर्दकै के जीवन की दीनता और सामान्यता केवल एक वाक्य में प्रकट होती है: “तब मोर्दकै तो राजभवन के फाटक में लौट गया” (एस्तेर 6:12)। मौर्दकै ने हामान की तरह अपनी तुरही नहीं बजाई, जैसा हामान ने रानी एस्तेर के पहले भोज से निकलते समय किया था (एस्तेर 5:11-12)। यद्यपि मौर्दकै को नगर में घुमाया गया—एक अकल्पनीय सम्मान, राजा के घोड़े पर एक अकल्पनीय सवारी—फिर भी वह लौटकर वहीं बैठ गया जहाँ वह सदा बैठता था।

दीन विश्वासयोग्यता में कुछ आकर्षक होता है—प्रतिदिन वही करना जो हमें करना है, प्रशंसा की आशा में नहीं, बल्कि इसलिए कि वही सही है। उस समय यह बहुत बड़ा कार्य प्रतीत नहीं होता। फिर भी, जब बच्चे और पोते-पोतियाँ अपने विश्वासयोग्य माता-पिता और दादा-दादी के जीवन पर विचार करते हैं, तो वे अक्सर कहते हैं, “वह सदा यही करती थीं,” “वह सदा वहीं बैठते थे,” “यही वह समय था जब वह सदा प्रार्थना करती थीं,” या “उनकी बाइबल सदा यहीं रहती थी।”

मौर्दकै ने सही कार्य इसलिए किया क्योंकि वह सही था, न कि इसलिए कि वह पहचाना जाए या सम्मानित किया जाए। आज, यह पर्याप्त होने दें कि आप परमेश्वर की दृष्टि में जो सही है वही करें—चाहे आपके आस-पास के लोग आपको आदर दें, जैसे मौर्दकै को दिया गया, या आप इतिहास के अनेक विश्वासयोग्य विश्वासियों की तरह शीघ्र ही भुला दिए जाएँ। एक दिन सब तराजू फिर से ठीक किए जाएँगे, और जहाँ आदर बाकी है वहाँ आदर दिया जाएगा। तब तक, किसी भी घमण्डी भिन्नता की खोज को अलग रख दें, और अपनी प्रतिदिन की साधारण दिनचर्या में विश्वासयोग्यता और दीनता के साथ बने रहें।

  एस्तेर 6:1-11

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: विलापगीत 1–2; यूहन्ना 6:22-51 ◊

14 सितम्बर : अहंकार से ग्रसित

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14 सितम्बर : अहंकार से ग्रसित
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“उस दिन हामान आनन्दित और मन में प्रसन्न होकर बाहर गया। परन्तु जब उसने मोर्दकै को राजभवन के फाटक में देखा, कि वह उसके सामने न तो खड़ा हुआ, और न हटा, तब वह मोर्दकै के विरुद्ध क्रोध से भर गया।” एस्तेर 5:9

हामान एक आत्म-मुग्ध व्यक्ति था। वह अपने चारों ओर ऐसे लोगों को रखता था जो निरन्तर उसके अपने ही विषय में बातें सुनते और चापलूसी के साथ उसके महत्त्व और महानता को स्वीकार करते थे। वह इस भ्रान्त धारणा के साथ जीता था कि वह सारी सृष्टि का केन्द्र है। हामान आज की पश्चिमी संस्कृति में भी पूरी तरह फिट बैठता, जहाँ सामाजिक-मीडिया फ़ीड और समाचार माध्यम अक्सर उन लोगों की कहानियों से भरे रहते हैं जिन्होंने वास्तव में कुछ विशेष नहीं किया, फिर भी ध्यान और मान-सम्मान के लिए जीते और उसकी अपेक्षा रखते हैं। (निश्चय ही, हमारे हृदय भी प्रशंसा की घमण्डी लालसा में बहुत भिन्न नहीं हैं। अन्तर प्रायः यह नहीं होता कि हम अधिक धर्मी हैं, बल्कि यह कि हमारे पास स्वयं को प्रदर्शित करने का अवसर नहीं होता।)

इस प्रकार, रानी एस्तेर द्वारा दिए गए उस विशेष भोज में सम्मिलित होने के बाद, हामान राज्य में अपने ऊँचे पद के कारण—जहाँ उसे सम्मानित अतिथि के रूप में बुलाया गया था—“आनन्दित और मन में प्रसन्न” होकर निकला। फिर भी, सारा आनन्द, प्रतिष्ठा और प्रशंसा भी उसे इस बात से पूरी तरह विचलित होने से न रोक सकीं कि मौर्दकै उसके सामने खड़ा नहीं हुआ। उसका आनन्द इतना भंगुर था कि इस छोटी सी प्रतीत होने वाली अवहेलना ने उसके भीतर क्रोध को भड़काकर उसे निगल लिया।

अहंकार मनुष्य के साथ ऐसा ही करता है। उसके लिए कुछ भी कभी पर्याप्त नहीं होता। घमण्डी व्यक्ति के लिए सदा कोई और पदोन्नति, कोई और पुरस्कार, कोई और धनराशि होती है—कुछ न कुछ ऐसा जो अभी उसकी पहुँच से बाहर है। राजा सुलैमान ऐसे व्यक्ति के विषय में लिखता है, “यदि तू ऐसा मनुष्य देखे जो अपनी दृष्‍टि में बुद्धिमान बनता हो, तो उससे अधिक आशा मूर्ख ही से है” (नीतिवचन 26:12)। यह हामान के जीवन में सत्य सिद्ध हुआ। अहंकार ही उसे हत्या—यहाँ तक कि नरसंहार—की योजना बनाने तक ले गया। अहंकार ही था जिसने उसे जो कुछ उसके पास था उसका आनन्द लेने से रोका और उसे केवल उस बात पर क्रोधित किया जो उसके पास नहीं थी।

हम हामान के घमण्ड पर सिर हिला सकते हैं। परन्तु फिर हम परमेश्वर के वचन में पढ़ते हैं कि परमेश्वर होते हुए भी यीशु ने “अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया। और मनुष्य के रूप में प्रगट होकर अपने आप को दीन किया, और यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हाँ, क्रूस की मृत्यु भी सह ली” (फिलिप्पियों 2:7-8)। तब हमें यह पूछने के लिए बाध्य होना पड़ता है कि हम किसके अधिक समान हैं—यीशु के या हामान के। जब हम यीशु की दीनता के स्वरूप पर विचार करते हैं, तब हमें अपने ही घमण्डी हृदय की सच्चाई दिखाई देती है।

हम जॉर्ज व्हाइटफ़ील्ड के शब्दों को दोहराने में भला करेंगे: “काश, मैं सदा अपने आप को अपने असली रंग में देख पाता! तब मुझे अपने आप को दण्डवत करके पूजने का बहुत कम कारण मिलता। हे परमेश्वर, मुझ पापी पर दया कर!”[1] जब हम हामान के घमण्ड और उसके अन्तिम पतन को देखते हैं और अपने भीतर झाँकते हैं, तो निश्चय ही हम परमेश्वर की दया के लिए पुकारते हैं कि वह हमें यीशु के समान दीनता में चलने में सहायता करे—क्योंकि “परमेश्‍वर अभिमानियों का विरोध करता है, पर दीनों पर अनुग्रह करता है” (याकूब 4:6)।

  एस्तेर 5:9-14

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 19–21; यूहन्ना 6:1-21


[1] द टू फ़र्स्ट पार्ट्स ऑफ़ हिज़ लाइफ़, विद हिज़ जर्नल्स (डब्ल्यू. स्ट्रेहन, 1756), पृ. 75.

13 सितम्बर : केवल मूर्ख ही उतावले होते हैं

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13 सितम्बर : केवल मूर्ख ही उतावले होते हैं
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“और जब राजा ने एस्तेर रानी को आँगन में खड़ी हुई देखा, तब उसने प्रसन्न होकर सोने का राजदण्ड जो उसके हाथ में था उसकी ओर बढ़ाया। तब एस्तेर ने निकट जाकर राजदण्ड की नोक छूई। तब राजा ने उससे पूछा, ‘हे एस्तेर रानी, तुझे क्या चाहिये? तू क्या माँगती है? माँग और तुझे आधा राज्य तक दिया जाएगा।’ एस्तेर ने कहा, ‘यदि राजा को स्वीकार हो, तो आज हामान को साथ लेकर उस भोज में आए, जो मैं ने राजा के लिए तैयार किया है।’” एस्तेर 5:2-4

“जहाँ स्वर्गदूत भी कदम रखने से डरते हैं, वहाँ मूर्ख दौड़ पड़ते हैं।”[1] एस्तेर यह समझती हुई प्रतीत होती है। जब वह राजा क्षयर्ष से विनती करने की तैयारी कर रही थी, तब उसने परमेश्वर की आज्ञाकारिता का मार्ग अपनाने का दृढ़ निश्चय किया, यद्यपि वह मर भी सकती थी—परन्तु उसने उस क्षण का सामना सूक्ष्म बुद्धि के साथ किया। वह एक साथ साहसी, उपयुक्त, सावधान, नम्र, कुशल, कोमल और सटीक थी। राजा के सामने उसका प्रवेश चतुराई से रचा गया, सावधानी से योजनाबद्ध और क्रियान्वित किया गया था।

उपवास और तैयारी का समय समाप्त हो गया, और एस्तेर ने उचित रीति से अपने राजसी वस्त्र पहनकर स्वयं को तैयार किया (एस्तेर 5:1)। उसने निर्धारित शाही रीति के अनुसार राजा के पास जाने का साहस किया। वह जानती थी कि वह एक विशेष रूप से जोखिम भरे वातावरण में प्रवेश कर रही है। जब क्षयर्ष ने उस पर कृपा दिखाई, तो उसने राजदण्ड के सिरे को छूकर नम्रता से उसे स्वीकार किया।

यद्यपि राजा ने आधे राज्य की पेशकश करके अतिशयोक्ति की, फिर भी वह यह कह रहा था कि वह अपनी रानी के लिए बहुत कुछ करने को तैयार है, क्योंकि उसने उसकी दृष्टि में अनुग्रह पाया था। उत्तर में एस्तेर द्वारा राजा को भोज पर बुलाना कुछ फीका सा प्रतीत होता है! फिर भी, उस महान भोज के निमन्त्रण में कुशल बुद्धि प्रकट हुई। वह जानती थी कि इस मनुष्य के हृदय तक पहुँचने का मार्ग उसके पेट से होकर जाता है, इसलिए उसने उसे अपने साथ भोजन करने के लिए बुलाया। राजा एस्तेर के निवेदन से बहुत प्रसन्न हुआ। आखिरकार, स्वयं के लिए भोज का आयोजन करना एक बात है, जैसा कि क्षयर्ष ने पहले किया था (एस्तेर 1); परन्तु अपने सम्मान में तैयार किए गए भोज का निमन्त्रण पाना बिल्कुल दूसरी बात है।

एस्तेर जानती थी कि जो वह राजा से माँगने जा रही है, वह कोई छोटी बात नहीं है। राजा शीघ्र ही एस्तेर की वास्तविक पहचान जान लेगा, और मूलतः वह उससे यह माँगने जा रही थी कि वह अपने सारे राज्य के सामने अपमान सह ले। उसकी विनती को कोमल भी होना था और सटीक भी।

हम में से बहुत लोग एक बार जब हम कुछ करने का निश्चय कर लेते हैं, तो हम बिना यह सोचे सीधे उसमें लग जाते हैं कि इससे दूसरों पर क्या प्रभाव पड़ेगा या किसी को ठेस पहुँचेगी। आखिरकार, कुछ तो किया ही जाना है! परन्तु हम अक्सर स्वयं को ऐसे ढंग से कार्य करते हुए पाते हैं जो पूर्णतः अनुपयोगी और अविवेकी होता है। सही काम को गलत तरीके से करना भी सम्भव है।

अगली बार जब आप ऐसी स्थिति का सामना करें जो आज्ञाकारिता और साहस की माँग करती हो, तो एस्तेर की पुस्तक को एक बार फिर से पढ़ें, और केवल यह ही न सोचें कि आपको क्या करना है, बल्कि यह भी कि उसे कैसे उत्तम रीति से करना है। परमेश्वर की आज्ञा मानने और उसके सुसमाचार को साझा करने के लिए जोखिम उठाना उचित है; परन्तु उसे करने के तरीके में जोखिम बढ़ाना बुद्धिमानी नहीं है। इस रानी की तरह, आप साहसी भी हो सकते हैं—और मनोहर भी।

  एस्तेर 5:1-8

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 16–18; यूहन्ना 5:25-47 ◊


[1] अलेक्ज़ैंडर पोप, एन एस्से ऑन क्रिटिसिज़्म (1711).

12 सितम्बर : परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पित

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12 सितम्बर : परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पित
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“तब एस्तेर ने मोर्दकै के पास यह कहला भेजा, ‘तू जाकर शूशन के सब यहूदियों को इकट्ठा कर, और तुम सब मिलकर मेरे निमित्त उपवास करो, तीन दिन रात न तो कुछ खाओ, और न कुछ पीओ। मैं भी अपनी सहेलियों सहित उसी रीति उपवास करूँगी; और ऐसी ही दशा में मैं नियम के विरुद्ध राजा के पास भीतर जाऊँगी; और यदि नष्ट हो गई तो हो गई।’” एस्तेर 4:15-16

केवल जब हम मरने से नहीं डरते, तब ही हम सचमुच जीने के लिए स्वतन्त्र होते हैं।

एस्तेर की पुस्तक में इस बिन्दु तक मोर्दकै निर्देश भेजता रहा और एस्तेर मुख्यतः उत्तर देती रही। परन्तु अब एस्तेर स्वयं निर्णय लेती है कि उसे क्या करना है। वह निष्क्रिय से सक्रिय हो जाती है—और वह यह पूर्ण, दृढ़ संकल्प के साथ करती है। वह अपने लोगों की ओर से राजा के पास जाएगी और उससे बात करेगी।

यद्यपि वह अकेली राजा के पास जाने वाली थी, फिर भी रानी का यह प्रयत्न एकाकी नहीं होने वाला था। उसका यहूदी समुदाय उसके साथ उसके लिए उपवास करने वाला था; वे सब इसमें एक साथ थे। यह उपवास शोक का नहीं, बल्कि अपनी घोर आवश्यकता को प्रकट करने का था ताकि परमेश्वर हस्तक्षेप करे। एस्तेर जान गई कि उसे कुछ करना है, परन्तु वह राजा के पास अव्यवस्थित रीति से नहीं जाना चाहती थी—केवल अपने रूप या इस आधार पर कि वह उसके लिए क्या मायने रखती है। वह राजा के पास केवल इस सामर्थ्य पर जाना चाहती थी कि परमेश्वर कौन है और वह क्या चाहता है।

परमेश्वर की इच्छा के प्रति एस्तेर की भक्ति स्पष्ट और प्रभावशाली थी: “यदि नष्ट हो गई तो हो गई।” वह राजा के पास जाने के लिए प्रतिबद्ध थी, यद्यपि यह व्यवस्था के विरुद्ध था और उसकी मौत का कारण भी हो सकता था (एस्तेर 4:10-11)। यद्यपि इसमें जोखिम था, तौभी वह समझती थी कि परमेश्वर की माँग अन्य सभी विचारों से ऊपर है। वह जानती थी कि वह परमेश्वर की प्रजा के भले के लिए जो कुछ कर सकती है, उसे करना चाहिए—और इसलिए वह अपना जीवन जोखिम में डालने को तैयार थी।

साधारण बुद्धि एस्तेर से कहती कि वह सुरक्षित रहे—चुप रहे और आशा करे कि शायद राजा स्वयं उसे अपनी उपस्थिति में बुला ले। परन्तु साधारण बुद्धि और विश्वास की बुद्धि सदा एक-दूसरे के अनुरूप नहीं होतीं। आखिरकार, साधारण बुद्धि तर्क देती है कि जीवन के साथ सबसे बुरा जो हो सकता है वह यह है कि हम उसे खो दें, जबकि विश्वास की बुद्धि मृत्यु को “लाभ” और “बहुत ही अच्छा” मानती है, क्योंकि वह मसीह के साथ रहने के लिए प्रस्थान है (फिलिप्पियों 1:21, 23)।

एस्तेर इस आवश्यक कार्य को करने के लिए मरने को भी तैयार थी। उसने ठान लिया था कि आज्ञाकारी होकर नाश होना, अवज्ञाकारी होकर जीवित रहने से उत्तम है। केवल जब हम अपनी आत्मिक यात्राओं में इस बिन्दु तक पहुँचते हैं जहाँ हम सच्चे मन से कह सकें, “यदि नष्ट हो जाऊँ तो हो जाऊँ,” तभी हम परमेश्वर के लिए जीवित रह सकते हैं। जोखिम बड़ा हो सकता है, परन्तु प्रतिफल अनन्त रूप से महान है। आज परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह आपके हृदय को ऐसी दिशा दे कि आप भजनकार के साथ मिलकर यह कह सकें, “तेरे आँगनों में का एक दिन और कहीं के हज़ार दिन से उत्तम है। दुष्‍टों के डेरों में वास करने से अपने परमेश्‍वर के भवन की डेवढ़ी पर खड़ा रहना ही मुझे अधिक भावता है” (भजन 84:10)। यदि आपका दृष्टिकोण ऐसा है, तो आप पाएँगे कि साहस और आज्ञाकारिता कहीं अधिक सरल और आनन्दपूर्ण हो जाएँगे।

  एस्तेर 4:1-16

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 13–15; यूहन्ना 5:1-24

11 सितम्बर : जीवन के साथ क्या करना है

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11 सितम्बर : जीवन के साथ क्या करना है
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“वह जिसमें पहले दुष्टात्माएँ थीं, उससे विनती करने लगा, ‘मुझे अपने साथ रहने दे।’ परन्तु उसने उसे आज्ञा न दी, और उससे कहा, ‘अपने घर जाकर अपने लोगों को बता कि तुझ पर दया करके प्रभु ने तेरे लिए कैसे बड़े काम किए हैं।’ वह जाकर दिकापुलिस में इस बात का प्रचार करने लगा कि यीशु ने मेरे लिए कैसे बड़े काम किए।” मरकुस 5:18-20

यदि हम पराए और अनजाने वातावरणों में मिशनरियों को भेजना मूल्यवान समझते हैं, और यदि हम उन लोगों की सराहना करते हैं जो अपना देश छोड़कर विदेश जाते हैं, तो हमें इस प्रश्न का सामना करना चाहिए: “मैं दूसरों को यीशु के विषय में बताने के लिए क्या कर रहा हूँ? अपनी गली, अपने कार्यस्थल, और अपने प्रभाव के क्षेत्रों के विषय में मैं क्या कर रहा हूँ? क्या मैं निर्भीक होकर उस स्वतन्त्रता और जीवन का प्रचार कर रहा हूँ जिसकी प्रतिज्ञा मसीह में की गई है?”

हमारा मसीही जीवन बहुत सहज और आरामदेह हो सकता है। हम सोच सकते हैं, “मैं एक ठीक-ठाक मनुष्य हूँ। हर रविवार कलीसिया में जाता हूँ। बाइबल से प्रेरणा पाता हूँ। अपने परिवार का ध्यान रखता हूँ।” परन्तु यह उस परिवर्तित जीवन का वर्णन नहीं है जिसके लिए मसीह ने हमें बुलाया था, जब उसने कहा कि जाओ और चेले बनाओ (मत्ती 28:18-19)। ऐसा जीवन वह नहीं है जिसने इतिहास भर में संसार में अविश्वासियों को परिवर्तित किया है। ऐसी आत्म-सन्तुष्टि विश्वास को केवल एक अतिरिक्त वस्तु समझती है—एक ऐसा निर्णय जो चलते-चलते रास्ते में ले लिया जाता है, जैसे कोई व्यक्ति केवल इसलिए जिम की सदस्यता ले लेता है क्योंकि वह जानता है कि यह उसके लिए अच्छा है।

मरकुस 5 के दुष्टात्माग्रस्त मनुष्य के समान, प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में मसीह का जोश के साथ प्रचार करने से पहले हमें यह गहराई से समझना होगा कि हम कितने असहाय हैं: अपने पाप के कारण बन्दी हैं और मृत्यु के देश में भटक रहे हैं। तभी हम उस स्वतन्त्रता, आनन्द और जीवन को पूरी तरह समझ पाएँगे जिनके लिए यीशु मसीह हमें छुटकारा दिया है। यदि हमने यह समझ लिया है कि मसीह ने हमारे लिए क्या किया है, तो हमें यह बताने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी कि ऐसा दयालु छुटकारा अपने तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि उसे साझा किया जाना चाहिए—चाहे पृथ्वी के छोर तक, या केवल अपने आस-पास के लोगों के साथ।

यीशु के विषय में बताने के लिए आपको न तो पुस्तकें पढ़ने की और न किसी कक्षा में जाने की आवश्यकता है। आप बस यह बता सकते हैं कि मसीह ने आपको कैसे सीधा खड़ा कर दिया। मरकुस 5 में यीशु ने उस मनुष्य से कहा कि वह अपने परिवार और मित्रों से आरम्भ करे। उस क्षेत्र में सुसमाचार के फैलने की उसकी योजना एक परिवर्तित जीवन से आरम्भ हुई। इसलिए सम्भव है कि आप अपने मित्रों के सभी प्रश्नों के उत्तर न दे सकें। सम्भव है कि आप त्रिएकता के सिद्धान्त के विषय में सब कुछ न जानते हों। परन्तु यदि आप मसीह में हैं, तो आप यह जानते हैं कि जहाँ पहले आप अन्धे थे, अब देखते हैं।

कलीसिया सुख-भ्रमण का स्थान नहीं, बल्कि जीवन-रक्षक नावों का स्टेशन है। हमारा कर्तव्य और हमारा सौभाग्य यह है कि हम उस छुटकारा पाए मनुष्य के समान करें: जीवन के समुद्र में निकल जाएँ और . . .

नाशमान को बचाओ, मरते हुओं की सुधि लो,

दया से उन्हें पाप और कब्र से छुड़ा लो;

भटके हुओं पर रोओ, गिरे हुओं को उठाओ,

उन्हें यीशु के विषय में बताओ, जो उद्धार करने में सामर्थी है। [1]

आज यीशु आपको किसके पास जाने के लिए बुला रहा है?

  लूका 8:26-39

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 11–12; यूहन्ना 4:31-54 ◊


[1] फैनी क्रॉस्बी, “रेस्क्यू द पेरिशिंग” (1869).