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31 दिसम्बर : जीवन की संक्षिप्तता

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31 दिसम्बर : जीवन की संक्षिप्तता
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“मनुष्य की आयु घास के समान होती है,वह मैदान के फूल के समान फूलता है,जो पवन लगते ही ठहर नहीं सकता,और न वह अपने स्थान में फिर मिलता है। परन्तु यहोवा की करुणा उसके डरवैयों पर युग-युग,और उसका धर्म उनके नाती–पोतों पर भी प्रगट होता रहता है।” भजन 103:15-17

जीवन हमारी कल्पना से कहीं अधिक शीघ्रता से बीत जाता है। मुझे अपने पहले पुत्र का जन्म आज भी जीवन्त रूप से स्मरण है—और फिर ऐसा प्रतीत हुआ मानो कुछ ही सप्ताह में वह किशोरावस्था में पहुँच गया हो। जब हम बच्चे थे, तब 1 दिसम्बर से लेकर 25 दिसम्बर तक का समय मानो कई वर्षों लम्बा लगता था; अब तो वर्ष स्वयं पंख लगाकर उड़ जाते हैं। अचानक हम नींद से जागते हैं और पाते हैं कि हम वृद्ध हो गए हैं, या किसी ऐसे जन की मृत्यु का समाचार सुनते हैं जो हमारी ही आयु का था—और हमें इस सत्य का बोध होता है कि जीवन वास्तव में अत्यन्त क्षणिक है। हम कुछ समय के लिए फलते-फूलते हैं, परन्तु सदा के लिए नहीं।

जैसे-जैसे हम वृद्ध होते हैं, हमारी शारीरिक और मानसिक शक्तियाँ क्षीण होती जाती हैं, पुराने मित्र विदा हो जाते हैं, जिन रीति-रिवाज़ों को हमने जीवनभर अपनाया था, वे धीरे-धीरे लुप्त हो जाते हैं, और हमारे दीर्घकालिक लक्ष्य या तो असम्भव हो जाते हैं, या आकर्षणहीन हो जाते हैं। किन्तु ये सत्य हमें निराशा में न धकेलें, बल्कि उत्साह में प्रेरित करें। हम घास के समान हैं—हमारे दिन गिने हुए हैं—परन्तु हर दिन में अवसर उपलब्ध है! बाइबल-विज्ञानी डेरेक किडनर ने ठीक ही लिखा है: “मृत्यु ने अभी हमें छूआ नहीं है: तो उसकी जंजीरों की खनखनाहट हमें जगा दे, और हमें कर्म की ओर प्रेरित करे।”[1]

हमारा जो समय शेष बचा है, उसमें हम अपनी दृष्टि उठाएँ और उन “खेतों” की ओर देखें—उन लोगों की ओर जो हमारे चारों ओर रहते और काम करते हैं, परन्तु जिन्होंने अब तक यीशु को अपने उद्धारकर्ता और प्रभु के रूप में नहीं जाना है, और जो यहोवा की स्थायी और अनन्त प्रेमभरी करुणा में सहभागी नहीं हुए हैं। जैसा कि यीशु ने कहा कि वे खेत अब “कटनी के लिए पक चुके हैं।” (यूहन्ना 4:35)

बाइबल हमें यह नहीं कहती कि पहले हम स्नातक हो जाएँ, या विवाह कर लें, या स्थिर हो जाएँ, या अपना जीवन “ठीक कर लें”, या सेवानिवृत्त हों—फिर मसीह की सेवा में लगें। नहीं! यह हमें आज ही बुलाती है। बुद्धिमान व्यक्ति जानता है कि समय सीमित है और इसका सर्वोत्तम उपयोग यही है कि स्वयं को प्रभु के कार्यों में लगाया जाए।

तो चाहे आप जीवन के प्रारम्भ में हों, या जीवन के सर्वोत्तम काल में, या जीवन में पीछे मुड़ कर देख रहे हों—इससे पहले कि आपके हाथों की शक्ति क्षीण हो जाए, और आपके दाँत, नेत्र, और कान दुर्बल हो जाएँ—क्या आप मसीह यीशु के लिए पूर्णतः समर्पित जीवन जीने को चुनेंगे? यदि आप आने वाले कल तक प्रतीक्षा करेंगे, तो सम्भव है कि कल बहुत देर हो जाए। जैसा कि सी.टी. स्टड ने कहा:

केवल एक ही जीवन,

यह शीघ्र बीत जाएगा।

केवल वही सदा के लिए रहेगा,

जो मसीह के लिए किया गया है।

इसलिए अपने जीवन के दिनों को “घास” के समान देखें, और उन्हें उस परमेश्वर के भय और प्रेम में बिताएँ, जो अनन्तकाल तक आपसे प्रेम करेगा। अपने दिनों को रेत के किले बनाने में मत बिताएँ, परन्तु उस राज्य की सेवा में लगाएँ जो अनन्तकाल तक स्थिर रहेगा। और प्रार्थना करें कि जब आप ऐसा करें, तो यहोवा स्वयं आपके “हाथों के काम को दृढ़ करे” (भजन 90:17)—आज भी, और उस आने वाले वर्ष में भी जो आने वाला कल लेकर आएगा।

  भजन 90

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: मलाकी; लूका 24:36-53


[1] द मैसेज ऑफ एक्लेज़िआस्टेस, द बाइबल स्पीक्स टूडे (आई.वी.पी. यू.के., 1976), पृ. 104.

30 दिसम्बर : सब कुछ नया किया जाएगा

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30 दिसम्बर : सब कुछ नया किया जाएगा
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“परमेश्‍वर आप उनके साथ रहेगा और उनका परमेश्‍वर होगा। वह उनकी आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा; और इसके बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहली बातें जाती रहीं।” प्रकाशितवाक्य 21:3-4

नए आकाश और नई पृथ्वी के विचार को समझना हमारे लिए कठिन हो सकता है, परन्तु हम सम्पूर्ण निश्चय के साथ यह कह सकते हैं कि परमेश्वर वर्तमान को रूपान्तरित करेगा, और उसने ठाना है कि कोई भी और कुछ भी उसके सिद्ध राज्य को नष्ट न कर सके। हम यह इसलिए विश्वासपूर्वक कह सकते हैं, क्योंकि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने में सामर्थी है, जिसका सबसे महिमामयी प्रमाण वह काठ का क्रूस और वह खाली कब्र हैं। वर्तमान में, इतिहास के परदे के पीछे, परमेश्वर अपने राज्य को सम्पूर्णता में लाने की तैयारी कर रहा है—और यह वह कार्य है जिसकी योजना उसने अनादि काल से बनाई है।

जब मसीह लौटेगा, वह इस नए राज्य को लेकर आएगा—एक नया आकाश और नई पृथ्वी, जिसमें धार्मिकता का वास होगा।

जब परमेश्वर का सिद्ध राज्य स्थापित होगा, पाप दण्डित हो चुका होगा, न्याय पूर्ण हो चुका होगा, और बुराई का अन्त हो चुका होगा। फिर न कोई मृत्यु रहेगी, न शोक, न रोना, और न ही पीड़ा। ये सब “पहली बातें” होंगी, जो “बीत चुकी” होंगी। जब परमेश्वर अपने राज्य को लाएगा, जब उसकी सिद्ध योजना प्रकट होगी, तो न कोई व्यक्ति और न ही कोई शक्ति उसे बिगाड़ नहीं सकेंगे।

“नया” शब्द, जैसा कि प्रकाशितवाक्य में “नए आकाश और नई पृथ्वी” के लिए प्रयुक्त हुआ है, समय या उत्पत्ति का नहीं, बल्कि प्रकार और गुण का वर्णन करता है। अर्थात, परमेश्वर सृष्टि को इस प्रकार रूपान्तरित करेगा कि वह उस महिमा और भव्यता को प्रतिबिम्बित करे, जिसे उसने प्रारम्भ में इसके लिए ठहराया था। शैतान को वह तृप्ति नहीं मिलेगी कि वह परमेश्वर को अपनी सृष्टि को नष्ट करते देखे। वरन्, परमेश्वर अग्नि से इसे शुद्ध करेगा, जैसे उसने नूह के दिनों में जल का उपयोग किया (2 पतरस 3:5–7)।

इसलिए नई पृथ्वी अब भी पृथ्वी ही होगी—एक भौतिक स्थान, जिसमें भौतिक जन वास करेंगे, परन्तु अब यह ऐसी होगी, अर्थात “पृथ्वी यहोवा के ज्ञान से ऐसी भर जाएगी जैसा जल समुद्र में भरा रहता है” (यशायाह 11:9)। इसमें आश्चर्य नहीं कि सम्पूर्ण सृष्टि अब अधीरता से बाट जोह रही है कि वह पाप और क्षय की दासता से मुक्त की जाए (रोमियों 8:19–22)!

यह नई सृष्टि प्रतीक्षा के योग्य है। यह जीने के योग्य है, और यदि हो, तो मरने के योग्य भी। परमेश्वर सब वस्तुओं को नया करेगा—हमारी आत्माओं को, हमारे मनों को, हमारे शरीरों को, और यहाँ तक कि उस वातावरण को भी जिसमें हम रहते हैं। वे सब बातें जो आज पृथ्वी पर जीवन को कलुषित करती हैं, वहाँ नहीं होंगी—और जिन बातों की हमें आशा है, और जिन बातों की हमें प्रत्याशा है, वे सब पूरी की जाएँगी।

इसलिए हम “बाट जोहते हैं” (रोमियों 8:23)। हमें निराश होने की आवश्यकता नहीं है, चाहे जीवन कितना ही अन्धकारमय क्यों न हो—क्योंकि वह दिन निकट है जब परमेश्वर तुम्हारे आँसू पोंछ देगा। और हम “धीरज से उसकी बाट जोहते भी हैं” (पद 25)। अब ही सब कुछ पाने की लालसा रखने की कोई आवश्यकता नहीं है, चाहे वह कितना ही आकर्षक क्यों न प्रतीत हो—क्योंकि वह दिन भी निकट है जब परमेश्वर आपको वह सम्पूर्ण आनन्द और तृप्ति देगा, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। इसलिए आज आपका ध्येय उत्सुकता और धैर्य हो।

रोमियों 8:18-25

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: जकर्याह 13–14; लूका 24:1-35 ◊

29 दिसम्बर : प्रतीक्षा का समय

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29 दिसम्बर : प्रतीक्षा का समय
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“[परमेश्वर] ने उसको बाहर ले जा के कहा, ‘आकाश की ओर दृष्‍टि करके तारागण को गिन, क्या तू उनको गिन सकता है?’फिर उसने उससे कहा, ‘तेरा वंश ऐसा ही होगा।’ उसने यहोवा पर विश्‍वास किया; और यहोवा ने इस बात को उसके लेखे में धर्म गिना। उत्पत्ति 15:5-6

यदि हमारे विश्वास की नींव दीर्घ प्रतीक्षा के समयों में भी अटल रहनी है, तो हमें इन दो सत्यों में दृढ़ विश्वास रखना होगा: पहला, कि परमेश्वर में सामर्थ्य है कि जो कुछ उसने प्रतिज्ञा किया है, वह उसे पूरा करे; और दूसरा, कि परमेश्वर स्वयं हमारे हर काल में हमारी प्रत्येक आवश्यकता के लिए पर्याप्त है।

अब्राहम का विश्वास उसके जीवन के प्रतीक्षा कक्ष में परखा गया। वह कई वर्षों तक एक परदेशी भूमि में रहा और परमेश्वर की प्रतिज्ञा के पूर्ण होने की बाट जोहता रहा कि उसका “निज पुत्र” संसार में आएगा (उत्पत्ति 15:4)। और यह उसकी प्रतीक्षा के बीच परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास ही था, जिसे परमेश्वर ने “उसके लेखे में धर्म गिना।”

प्रेरित पौलुस जब अब्राहम के इस विश्वास का वर्णन करता है, तो वह लिखता है: “न अविश्वासी होकर परमेश्‍वर की प्रतिज्ञा पर सन्देह किया, पर विश्‍वास में दृढ़ होकर परमेश्‍वर की महिमा की; और निश्चय जाना कि जिस बात की उसने प्रतिज्ञा की है, वह उसे पूरा करने में भी समर्थ है” (रोमियों 4:20–21)। दूसरे शब्दों में, अब्राहम ने यह विश्वास किया कि कोई भी वस्तु, कोई भी शक्ति, परमेश्वर के वचन की पूर्ति में बाधा नहीं डाल सकती—यहाँ तक कि जब उसे यह भी दिखाई नहीं दे रहा था कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा को किस प्रकार पूरी करेगा। उसका विश्वास अन्धकार में एक अन्धी छलांग नहीं था; वरन् यह विश्वास परमेश्वर के चरित्र पर आधारित था।

आज के युग में, हम भी एक महान प्रतिज्ञा को थामे हुए हैं—कि प्रभु यीशु ने हमसे यह वादा किया है कि वह हमारे लिए एक स्थान तैयार कर रहा है और वह हमें अपने पास ले जाने के लिए लौटेगा (यूहन्ना 14:3)। इसलिए जब हम उसके वचन को थामते हैं, तो हमें स्वर्ग की आशा मिलती है। हमें यह पूर्ण निश्चय है कि यीशु व्यक्तिगत रूप से लौटेगा, वह दृश्य रूप से प्रकट होगा और वह अपने लोगों के लिए आएगा। ये प्रतिज्ञाएँ उतनी ही अटल और निश्चित हैं जितनी कि वह प्रतिज्ञा जो परमेश्वर ने अब्राहम को दी थी, जिसके पूर्ण होने के लिए उसे 25 वर्षों तक प्रतीक्षा करनी पड़ी।

इसके अतिरिक्त हम अब्राहम के अनुभव से यह भी सीखते हैं कि केवल परमेश्वर ही पर्याप्त है कि वह हमें प्रतीक्षा के समयों से निकाल कर अपने समय में अपने उद्देश्य की ओर ले चले। उत्पत्ति 17 में, परमेश्वर ने फिर से अब्राहम पर प्रगट होकर उसके विश्वास को दृढ़ किया। कैसे? अपने आपको प्रकट करके कि वह वास्तव में कौन है: “जब अब्राम निन्यानवे वर्ष का हो गया, तब यहोवा ने उसको दर्शन देकर कहा, ‘मैं सर्वशक्तिमान [एल-शद्दाई] परमेश्वर हूँ; मेरी उपस्थिति में चल और सिद्ध होता जा’” (उत्पत्ति 17:1)। इब्रानी शब्द “एल-शद्दाई” का अर्थ है: “परमेश्वर जो पर्याप्त है।” अर्थात, परमेश्वर ने अब्राहम को अपनी प्रतिज्ञाओं का आश्वासन अपने ही चरित्र के आधार पर दिया।

मसीही जीवन प्रतीक्षा का जीवन है। और परमेश्वर के प्रत्येक “अभी नहीं” और “थोड़ा ठहरो,” उसके उद्देश्य का भाग हैं। प्रतीक्षा का हर समय एक अवसर है कि आप परमेश्वर के वचन पर विश्वास करें। और जब आप प्रतीक्षा में हों, तब निश्चयपूर्वक यह जान लें कि वही परमेश्वर आपकी हर आवश्यकता को पूरा करने में सक्षम है। इसी में विश्राम पाएँ: जिस परमेश्वर पर आपने विश्वास किया है, वह अपनी प्रत्येक प्रतिज्ञा को पूरा करने में सक्षम है।

उत्पत्ति 17:1-8

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: जकर्याह 9–12; लूका 23:26-56

28 दिसम्बर : अहंकार का उपाय

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28 दिसम्बर : अहंकार का उपाय
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“देखो, फरीसियों के खमीर और हेरोदेस के खमीर से चौकस रहो।मरकुस 8:15

यह विचार अत्यन्त गम्भीर और मन को झकझोरने वाला है कि कितने ही लोगों ने प्रभु यीशु को देखा, उसका वचन सुना, उसके अद्‌भुत कार्यों को अपनी आँखों से देखा—और फिर भी विश्वास नहीं किया।

जिस दिन उन्होंने देखा कि उसने कुछ रोटियों और मछलियों से चार हज़ार लोगों को तृप्त किया—और इस प्रकार अपने को वह परमेश्वर प्रगट किया जो मरुभूमि में अपनी प्रजा की आवश्यकताओं को पूरा करता है (मरकुस 8:1–10; निर्गमन 16 देखें)—उसी दिन फरीसी उससे “स्वर्गीय चिह्न” माँगने लगे (मरकुस 8:11)। इसके उत्तर में यीशु ने अपने चेलों को यह चेतावनी दी, “फरीसियों के खमीर और हेरोदेस के खमीर से चौकस रहो।”

फरीसियों की पहचान थी कपट और हेरोदेस की पहचान थी शत्रुता। फरीसी अपने धार्मिक घमण्ड को पकड़ कर रखना चाहते थे कि उन्होंने परमेश्वर की आशीष पाने का अधिकार कमा लिया है, इसलिए उन्हें उद्धारकर्ता की कोई आवश्यकता नहीं थी। हेरोदेस अपनी प्रजा पर अपनी सत्ता और प्रभाव को बनाए रखना चाहता था, इसलिए उसके जीवन में उस राजा के लिए कोई स्थान न था जो वास्तव में राज्य करने आया था। इस कारण वे सत्य के प्रति अन्धेपन में प्रतिबद्ध हो गए थे। उन्होंने यह विश्वास करने या समझने से जानबूझकर इनकार कर दिया कि यीशु कौन है। उनके हृदय की यह दशा थी: मैं जानना ही नहीं चाहता कि यीशु का क्या अर्थ है, और मैं निश्चित रूप से उसे अपना उद्धारकर्ता या राजा स्वीकार नहीं करूँगा। यीशु ने हमें उस मनोवृत्ति के विरुद्ध सावधान किया, क्योंकि अविश्वास का थोड़ा-सा खमीर भी सम्पूर्ण जीवन को प्रभावित कर सकता है।

जब घमण्ड अपना भद्दा सिर उठाता है, तब वह हमें इस दिशा में ले जाता है कि हम परमेश्वर के वचन से सीखने के बजाय उसमें खोट ढूँढने का प्रयास करने लगते हैं। और जब हम परमेश्वर के वचन में खोट ढूँढने की भूमिका में खड़े हो जाते हैं, तब जो बात हमें मामूली और तुच्छ लगती है, अर्थात सत्य में किया गया छोटा सा परिवर्तन, तो वह खमीर बनकर हमारे सम्पूर्ण विश्वास को प्रभावित करने लगता है।

यीशु हमें यह चुनौती देता है कि हम उसे उस रूप में स्वीकार करें जैसा वह है—हमारे पापों से हमें बचाने वाला उद्धारकर्ता और हमारे सम्पूर्ण जीवन पर राज्य करने वाला राजा। वह बार-बार धैर्यपूर्वक हमें स्मरण दिलाता है कि वह कौन है। उसकी यह चुनौती भविष्यदर्शी और पितृत्व पूर्ण होने के साथ-साथ स्पष्ट और प्रेममय भी है।

हमें मसीह के कार्य की आवश्यकता है, जिससे हम घमण्ड के खमीर से मुक्त हो सकें। यह परमेश्वर के आत्मा का कार्य है जो हमें यीशु को पहचानने और समझने में सहायता करता है। यही कारण है कि बहुत से लोग बाइबल को पढ़ते हैं और फिर भी कुछ नहीं देख पाते; सुसमाचार को सुनते हैं और फिर भी कुछ नहीं समझ पाते। जब तक हमारी समझ की आँखें नहीं खुलतीं और आत्मा के कान नहीं खुलते, तब तक हम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। परन्तु हर वह दिन जब परमेश्वर का आत्मा हमें यीशु की महिमा को दिखाता है, और हमें इस कटु सत्य की याद दिलाता है कि उसके बिना हम खोए हुए हैं, तब हमारा मन और हृदय एक नया गा सकते हैं:

मुझे नहीं पता कि आत्मा कैसे मनुष्यों को पाप का बोध कराता है,

वचन के द्वारा यीशु को प्रकट करता है, और उसमें विश्वास उत्पन्न करता है।

परन्तु मैं जानता हूँ कि मैंने किस पर विश्वास किया है और मुझे पूरा विश्वास है कि वह सामर्थी है।[1]

फरीसियों और हेरोदेस के खमीर का प्रतिरोधक आत्मा का कार्य ही है। इसलिए अपने आप को इतना घमण्डी न समझें कि आपको उसकी आवश्यकता नहीं है। प्रार्थना करें कि आज वह आपको अपने वचन में से यीशु को पुनः प्रकट करे, ताकि आप अपने उद्धारकर्ता और राजा की आराधना अपने सम्पूर्ण जीवन से कर सकें।

  लूका 18:9-14

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: जकर्याह 5–8; लूका 23:1-25 ◊


[1] डैनियल वैबस्टर व्हिटल, “आई नो हूम आई हैव बिलीव्ड” (1883).

27 दिसम्बर : जीवन की नश्वरता

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27 दिसम्बर : जीवन की नश्वरता
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“तुम जो यह कहते हो, ‘आज या कल हम किसी और नगर में जाकर वहाँ एक वर्ष बिताएँगे, और व्यापार करके लाभ कमाएँगे।’ और यह नहीं जानते कि कल क्या होगा। सुन तो लो, तुम्हारा जीवन है ही क्या? तुम तो भाप के समान हो, जो थोड़ी देर दिखाई देती है फिर लोप हो जाती है। इसके विपरीत तुम्हें यह कहना चाहिए, ‘यदि प्रभु चाहे तो हम जीवित रहेंगे, और यह या वह काम भी करेंगे।’” याकूब 4:13-15

बाइबल व्यापारिक बुद्धिमत्ता या भविष्य की योजना बनाने को गलत नहीं ठहराती। परन्तु बाइबल जिसे गलत ठहराती है, वह एक घमण्डी और आत्म-केन्द्रित मनोवृत्ति है—ऐसी विचारधारा जो जान-बूझकर या अनजाने में परमेश्वर को हमारे निर्णयों और योजनाओं से बाहर रखती है। यह ऐसा दृष्टिकोण है जो उन बातों को निश्चित मानता है, जिनकी हमें कोई प्रतिज्ञा नहीं की गई है।

याकूब हमें बिना किसी झिझक के हमारे सीमित ज्ञान और समझ की सच्चाई से सामना कराता है। वह हमें स्मरण कराता है कि हमें उन बातों को स्वीकार करना चाहिए जो हम नहीं जानते। क्या हम आने वाले सप्ताहों और महीनों की योजनाएँ बनाने में सक्षम होना चाहते हैं? निश्चय ही! परन्तु याकूब यह स्पष्ट करता है कि हम तो यह भी नहीं जानते कि कल क्या होगा। यह तो घमण्ड ही है जो हमें यह मानने को प्रेरित करता है कि हमारा अगला श्वास भी निश्चित है।

इसके बाद वह हमें हमारी नश्वरता की भी याद दिलाता है। हमारा जीवन तो “भाप के समान है, जो थोड़ी देर दिखाई देती है, फिर लोप हो जाती है।” जैसे प्रातःकालीन कुहासा घास पर मँडराता है और सूर्य की पहली किरण पड़ते ही गायब हो जाता है, वैसे ही हमारा जीवन भी क्षणभंगुर है, जो अन्ततः लुप्त हो जाता है, और भविष्य की पीढ़ियों के लिए कोई चिह्न भी नहीं छोड़ता।

हमारी इस नश्वरता और सीमाओं के प्रकाश में, हमें भविष्य के विषय में किस रीति से विचार करना चाहिए? याकूब केवल हमारी घमण्डी योजनाओं को ही उजागर नहीं करता, वरन् इसका उपाय भी प्रस्तुत करता है। वह कहता है कि हमें नम्रता में योजना बनाना सीखना है, यह मानते हुए कि हम पूर्णतः परमेश्वर के संरक्षणकारी प्रावधान पर निर्भर हैं। सम्पूर्ण सृष्टि में कुछ भी—यहाँ तक कि हम भी—परमेश्वर के बिना एक क्षण के लिए भी अस्तित्व में नहीं रह सकते। जैसा कि एलेक मोट्यर ने लिखा है: “हम अपने जीवन में एक और दिन किसी प्राकृतिक आवश्यकता के कारण, या किसी यान्त्रिक नियम के कारण, या हमारे अधिकार के कारण, या फिर प्रकृति की कृपा के कारण प्राप्त नहीं करते, बल्कि परमेश्वर की प्रतिज्ञात करुणा के कारण प्राप्त करते हैं।”[1]

आने वाले कल की प्रतिज्ञा किसी को भी सुनिश्चित तौर पर नहीं दी गई है। हम उसकी योजना बना सकते हैं, परन्तु उसे नियन्त्रित नहीं कर सकते। यह केवल परमेश्वर की दया है, जो हमें प्रत्येक नए दिन में जगाती है। जब हम यह समझते हैं कि हमारा सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर की निरन्तर बनी रहने वाली अनुकम्पा में स्थिर है, तब अहंकारपूर्ण योजना बनाना एक मूर्खता ठहरती है। हम अपनी सीमाओं और जीवन की क्षणभंगुरता को अनदेखा नहीं कर सकते; परन्तु हम इन सच्चाइयों को अपनाकर अपने विचारों, अपने निर्णयों और अपने भविष्य की योजनाओं को उसकी महिमा के लिए रूपान्तरित कर सकते हैं।

इसलिए आज के दिन की, आने वाले कल की, अगले वर्ष की, और अपने जीवन के आगे के वर्षों की अपनी योजनाओं पर विचार करें। क्या आपने उनके लिए प्रार्थना की है? क्या आपने यह स्वीकार किया है कि उसकी योजनाएँ सर्वोपरि हैं, और आपकी सभी योजनाएँ केवल उसकी इच्छा पर निर्भर हैं? अब अपने सारे विचार और योजनाएँ उसके चरणों में रख दीजिए। आप भविष्य को नियन्त्रित नहीं कर सकते—परन्तु आपको इसकी आवश्यकता भी नहीं है, क्योंकि आप उसे जानते हैं जो उस पर नियन्त्रण रखता है।

  मत्ती 6:25-34

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: जकर्याह 1–4; लूका 22:47-71


[1] द मैसेज ऑफ जेम्स, द बाइबल स्पीक्स टूडे (आई.वी.पी. अकैडेमिक, 1985), पृ. 162.

26 दिसम्बर : मसीह के दृष्टिकोण से क्रिसमस

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26 दिसम्बर : मसीह के दृष्टिकोण से क्रिसमस
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“इसी कारण वह जगत में आते समय कहता है,‘बलिदान और भेंट तू ने न चाही,पर मेरे लिए एक देह तैयार की। होमबलियों और पापबलियों से तू प्रसन्न नहीं हुआ।’” इब्रानियों 10:5-6

मत्ती और लूका के सुसमाचार हमें क्रिसमस के उन पात्रों का परिचय देते हैं, जिनसे हम काफी परिचित हो चुके हैं: यूसुफ, मरियम, चरवाहे, ज्योतिषी और अन्य कई पात्र। कभी-कभी हम उन लोगों पर भी ध्यान करते हैं जो कुछ कम प्रसिद्ध हैं, जैसे जकर्याह, इलीशिबा, हन्ना और शमौन। प्रत्येक वर्ष जब क्रिसमस का पर्व आता है, तब इन पात्रों के दृष्टिकोण से कई उपदेश और शिक्षाएँ प्रस्तुत की जाती हैं। परन्तु एक बात ध्यान देने योग्य है: बहुत कम लोग हैं जिन्होंने यीशु के दृष्टिकोण से क्रिसमस पर मनन किया है।

इब्रानियों को लिखे पत्र में लेखक यह प्रकट करता है कि जब प्रभु यीशु इतिहास के मंच पर प्रकट हुआ, तब उसने भजन संहिता 40 के वचन अपने होंठों पर लिए। जैसे कि सिंडरेला की कांच की जूती केवल उसी के पैर में ही सही बैठी, वैसे ही ये वचन केवल यीशु पर ही लागू होते हैं।

परमेश्वर ने पुराने नियम के युगों में ही पहले क्रिसमस की तैयारी आरम्भ कर दी थी, क्योंकि पुराने नियम की बलि-व्यवस्था केवल उस सच्चाई की छाया थी जिसकी पूर्ति मसीह में हुई। उन बलिदानों में ऐसे पशुओं की बलि दी जाती थी, जिन्हें हाँक कर वेदी तक ले जाया जाता था, वे स्वेच्छा से वहाँ नहीं जाते थे—उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध ही चढ़ाया जाता था। परन्तु यीशु मसीह ने देह धारण करने से पूर्व ही यह जान लिया था कि उसकी भूमिका—उसका बलिदान—भिन्न होगा। उसने स्वेच्छा से सहमति दी। दीनता की अवस्था में और एक अत्यन्त अनापेक्षित स्थान में परमेश्वर का पुत्र एक ऐसे शरीर में प्रकट हुआ जो उसके लिए रचा गया था और “बहुतों की छुड़ौती के लिए” तैयार किया गया था (मत्ती 20:28)। उसने इस टूटे हुए और पापमय संसार को देखा, और अपने पिता से कहा, हाँ, मैं वहाँ जाऊँगा। मैं उनके समान बनूँगा और उनके लिए प्राण दूँगा।

प्रेरित पतरस मसीह के बलिदान की गम्भीरता को व्यक्त करते हुए लिखता है, “वह आप ही हमारे पापों को अपनी देह पर लिए हुए क्रूस पर चढ़ गया, जिससे हम पापों के लिए मरकर धार्मिकता के लिए जीवन बिताएँ: उसी के मार खाने से तुम चंगे हुए” (1 पतरस 2:24)। यीशु, जो पूर्णतः परमेश्वर और पूर्णतः मनुष्य था, इस जगत में इसलिए आया कि वह अपने शरीर में वह कार्य करे जो किसी बलिदान का कोई पशु नहीं कर सकता था: उसने हमारे दण्ड को सहा, हमारे विवेक को शुद्ध किया, और हमें परमेश्वर की करुणा प्रदान की। उसने वह सब कुछ सिद्ध रीति से पूरा किया जो पापी पुरुषों और स्त्रियों के लिए परमेश्वर के साथ संगति में आने हेतु आवश्यक था।

यह खोखले धर्म के वायदे से बहुत भिन्न है, जहाँ नियमों और प्रयासों के द्वारा स्वर्ग तक पहुँचने का प्रयत्न व्यर्थ सिद्ध होता है। इसके विपरीत, चरनी का सन्देश मुक्ति देने वाली करुणा का सन्देश है। परमेश्वर ने अद्‌भुत रीति से पहल की और यीशु के द्वारा हमें बचाने के लिए स्वयं आ गया। हमें परमेश्वर की खोज में कोई लम्बी यात्रा करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मसीह, जो नवजात राजा है, अपने उद्देश्य को भली-भाँति जानता था। तो उचित प्रत्युत्तर क्या है? केवल यह कि हम दीनता से उसके चरणों में झुकें, सम्पूर्ण मन से उसकी स्तुति करें, और अपने जीवन भर उसकी बाट जोहते रहें।

भजन 40

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: मीका 6–7; लूका 22:21-46 ◊

25 दिसम्बर : आओ, घुटने टेककर आराधना करो

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25 दिसम्बर : आओ, घुटने टेककर आराधना करो
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“‘आओ, हम बैतलहम जाकर यह बात जो हुई है, और जिसे प्रभु ने हमें बताया है, देखें।’ और उन्होंने तुरन्त जाकर मरियम और यूसुफ को, और चरनी में उस बालक को पड़ा देखा।” लूका 2:15-16

बैतलहम आओ और देखो

जिसका जन्म स्वर्गदूत गाते हैं;

आओ, घुटने टेककर आराधना करो,

मसीह प्रभु की—नवजात राजा की।[1]

जब हम क्रिसमस के गीतों में ऐसे शब्द गाते हैं, तो हममें से अधिकतर लोग वास्तव में घुटने नहीं टेकते। हम जानते हैं कि यह निमन्त्रण एक रूपक है। फिर भी, यदि हम सचमुच मसीह को देखना चाहते हैं, तो हमें अपने हृदय की स्थिति में झुके हुए घुटनों के साथ आना पड़ेगा। इसका अर्थ क्या है? इसका अर्थ है—विनम्रता और प्रत्याशा के साथ आना, और इस पहचान के साथ कि यह व्यक्ति—यीशु—ऐसी आराधना के योग्य है।

चरवाहों की तरह ही, हम भी परमेश्वर की ओर आकर्षित होते हैं क्योंकि वह एक खोजने वाला परमेश्वर है। जन्म-कथा में हम देखते हैं कि परमेश्वर ने अद्‌भुत पहल की—उसने अपने पुत्र को एक असहाय बालक के रूप में संसार में भेजा और स्वर्गदूत के माध्यम से चरवाहों से बोला: “मत डरो; क्योंकि देखो, मैं तुम्हें बड़े आनन्द का सुसमाचार सुनाता हूँ जो सब लोगों के लिए होगा, कि आज दाऊद के नगर में तुम्हारे लिए एक उद्धारकर्ता जन्मा है, और यही मसीह प्रभु है” (लूका 2:10–11)।

परमेश्वर ने अनुग्रह में पहल की, और चरवाहों ने विश्वास में प्रत्युत्तर दिया। उन्होंने स्वर्गदूत के सन्देश पर विश्वास किया और आत्मीय उत्साह के साथ उस चरनी की ओर निकल पड़े। उन्होंने अपनी जीविका और परिचित संसार की बातों से ऊपर उद्धारकर्ता को जानने की लालसा रखी। यह हमारे लिए एक सुन्दर उदाहरण है कि हम परमेश्वर के सन्देश पर किस प्रकार प्रतिक्रिया करें।

कुछ लोग इन चरवाहों को मूर्ख समझ सकते हैं और उनके साधारण से विश्वास और प्रत्युत्तर को तुच्छ जान सकते हैं। लेकिन जो बात मनुष्य को परमेश्वर पर भरोसा करने से रोकती है, वह केवल यह है: अहंकार। यही अहंकार चरवाहों को खेत में ही रोके रख सकता था—लेकिन ऐसा होने पर स्वर्गदूत का सन्देश तो उनके पास होता, परन्तु मसीह के साथ सम्बन्ध नहीं। यही अहंकार हमें भी मसीह के पास आकर घुटने टेकने से रोकता है और इस सच्चाई से अन्धा कर देता है कि परमेश्वर को जानने के लिए एक टूटे और नम्र हृदय की आवश्यकता होती है (भजन 51:17)।

बैतलहम के “चर्च ऑफ द नेटिविटी” में आप सीधे नहीं चल सकते। उसका द्वार इतना नीचा है कि प्रवेश करने के लिए आपको झुकना ही पड़ता है। यदि आप उस स्थान में प्रवेश करना चाहते हैं जो प्रभु यीशु के जन्म का प्रतिनिधित्व करता है, तो एक ही तरीका है: झुकिए, नीचे आइए, और घुटनों के बल आइए। यह एक सुन्दर चित्र है—और हमें आत्म-जाँच के लिए प्रेरित करता है: क्या मैं मसीह के सामने स्वयं को दीन करने के लिए तैयार हूँ? क्या मैं उन चरवाहों की तरह अपने पूर्व विचारों और योजनाओं को त्यागने को तैयार हूँ ताकि इस उद्धारकर्ता को जान सकूँ और उसका अनुसरण कर सकूँ?

इस क्रिसमस दिवस पर अपने हृदय को जाँचें: क्या इसका झुकाव परमेश्वर की महिमा के सामने झुकने का है? क्या यह उस बालक राजा की आराधना करता है, जिसने पहले स्वयं को नम्र किया और हमारे पास आया?

  लूका 2:1-20

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: मीका 4–5; लूका 22:1-20


[1] जेम्स चैडविक, “एंजल्स व्ही हैव हर्ड ऑन हाई” (1862), पारम्परिक फ्रेंच क्रिसमस गीत “लेस एंजेस डैंस नोस कैम्पेनेस” का अनुवाद।

24 दिसम्बर : क्रिसमस का सेवक

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24 दिसम्बर : क्रिसमस का सेवक
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“मैं तुझे प्रजा के लिए वाचा और जातियों के लिए प्रकाश ठहराऊँगा; कि तू अन्धों की आँखें खोले, बन्दियों को बन्दीगृह से निकाले और जो अन्धियारे में बैठे हैं उनको काल-कोठरी से निकाले।” यशायाह 42:6-7

क्रिसमस पर, जब हम उस परिचित जन्म-कथा पर मनन करते हैं, तो हममें से बहुतों के मन में एक सुखद और आत्मीय भावना भर जाती है। इस कथा से हमारी भावनाएँ जुड़ी होती हैं, लेकिन यह भी सम्भव है कि इस परिचित दृश्य से हमारी दृष्टि इतनी ढक जाए कि हम परमेश्वर की महान योजना के विस्मयकारी सत्य को न देख पाएँ: कि जब हम बैतलहम की चरनी में लेटे हुए उस शिशु को देखते हैं, तो हम परमेश्वर के सेवक को देख रहे होते हैं।

यह सेवक यीशु एक उद्देश्य के साथ आया था। मरियम और यूसुफ को भी शायद पूरी तरह से यह ज्ञात नहीं था कि वह क्या-क्या पूरा करेगा। लेकिन यीशु के आने से सैकड़ों वर्ष पहले, परमेश्वर ने यह घोषित कर दिया था कि वह अपनी योजना को कैसे पूरा करेगा (यशायाह 42:1–4)।

यीशु उन लोगों की आँखें खोलने आया था जो आत्मिक रूप से अन्धे हैं। अपने पृथ्वी के सेवाकाल में उसने शारीरिक अन्धों को दृष्टि देकर इस सत्य का एक अद्‌भुत उदाहरण प्रस्तुत किया। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण बात शरीर नहीं, आत्मा की थी। वह परमेश्वर के सत्य के प्रति अन्धे मनुष्यों की आँखें खोलने आया था।

यह सेवक बन्दियों को बन्दीगृह से छुड़ाने भी आया था। हममें से कई ने दोष और अपराध-बोध की जंजीरों को महसूस किया है—और हमने अनगिनत उपायों से उसे धो डालने की कोशिश की है। परन्तु यीशु के अलावा और कुछ भी काम नहीं आता। वही हमारी बेड़ियाँ तोड़ता है और हमें स्वतन्त्र करता है। हम जो पाप के दास थे, अब छुड़ाए गए हैं। हमारा उद्धारकर्ता उन्हें अन्धकार की काल-कोठरी से बाहर लाता है जो वहाँ बैठे हुए हैं—लेकिन तभी यदि वे उसकी ज्योति को देख लें।

इस सेवक की कथा इस बारे में नहीं है कि हमें क्या करना है, बल्कि इस बारे में है कि यीशु ने क्या किया है। वह हमारे अन्धकार में, हमारी बेड़ियों में, हमारी असफलताओं में उतर आया और कहा: तुम विफल हो गए हो, तुमने व्यवस्था-विधान को तोड़ा है, और तुम अपनी दशा को स्वयं ठीक करने में असमर्थ हो। परन्तु मैं पापियों को उद्धार देता हूँ। मैं अन्धों को दृष्टि देता हूँ। मैं बन्दियों को मुक्त करता हूँ। मैं प्रकाश लाता हूँ। मैंने तुम्हारे लिए वह सब कुछ कर दिया है जो आवश्यक था। मुझ पर सरल विश्वास और बालक-समान भरोसा रखो—और तुम देखोगे, तुम स्वतन्त्र हो जाओगे, और तुम्हारा अन्धकार उजाले में बदल जाएगा।

वह जिसने यह सब किया है, वही है जिसे आप उस परिचित क्रिसमस दृश्य में निहारते हैं। यह दृश्य आपको हर बार प्रेरित करे—आराधना करने के लिए, धन्यवाद देने के लिए, और परमेश्वर के पुत्र की महिमा के लिए, जो हमारे लिए सेवक बनकर आया।

लूका 1:26-56

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: मीका 1–3; लूका 21:20-38 ◊

23 दिसम्बर : प्रभु, तू तो सब कुछ जानता है

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23 दिसम्बर : प्रभु, तू तो सब कुछ जानता है
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“उसने तीसरी बार उससे कहा, ‘हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रीति रखता है?’पतरस उदास हुआ कि उसने उससे तीसरी बार ऐसा कहा, ‘क्या तू मुझ से प्रीति रखता है?’और उससे कहा, ‘हे प्रभु, तू तो सब कुछ जानता है; तू यह जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूँ।’” यूहन्ना 21:17

मसीही विश्वास का मूल किसी व्यवस्थित थिओलॉजी के कोर्स को पूरा करने या सैद्धान्तिक शिक्षाओं को याद करके दोहराने में नहीं है। इसका केन्द्र बिन्दु यीशु मसीह के साथ एक जीवन्त सम्बन्ध है—अर्थात उसे जानना और उससे प्रेम प्राप्त करना, और बदले में उससे प्रेम करना।

यह हमें प्रत्यक्ष रूप से उस समय दिखाई देता है जब पुनरुत्थित यीशु ने अपने चेलों के साथ झील के किनारे भोजन करने के बाद पतरस से एक निजी बातचीत आरम्भ की। इस बातचीत के परिणाम में पतरस के मन में अपराध-बोध आया और उसे एक बुलावा मिला। परन्तु सर्वोपरि, यह मसीह के उन लोगों के प्रति गहन ज्ञान और देखभाल को प्रकट करती है जो उससे प्रेम करते हैं। मसीह की सबसे बड़ी चिन्ता थी पतरस द्वारा इस प्रश्न का उत्तर: “क्या तू मुझ से प्रेम करता है?”

इस संवाद में यीशु ने पतरस से यह प्रश्न बार-बार पूछा। यह केवल भावुकता को उकसाने के लिए नहीं था; इसने एक निर्णय की माँग की। इस प्रश्न की पुनरावृत्ति पतरस के उन तीन बार इनकार की कठोर याद दिलाती है जब उसने कहा था कि वह यीशु को नहीं जानता (यूहन्ना 18:15–18, 25–27)। इससे पतरस को यह स्वीकार करना पड़ा कि उसके हाल के कार्य मसीह के प्रति उसके प्रेम को सिद्ध नहीं करते थे। वह अपने कामों के द्वारा अपने प्रेम का प्रमाण नहीं दे सका था।

जब हम अपने जीवन में ठोकर खाते हैं, तब हम भी इसी सच्चाई पर पहुँचते हैं। जब मसीह हमसे वही प्रश्न पूछता है, तो हमारे पास ऐसा कुछ नहीं होता जिसे दिखाकर हम अपने प्रेम का प्रमाण दे सकें। पतरस परमेश्वर पिता के सामने और मसीह के सामने केवल एक बात का सहारा ले सकता था: परमेश्वर का सर्वज्ञ होना—“प्रभु . . . तू यह जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूँ।” वैसे ही, हम भी केवल यीशु के समझने वाले हृदय की ओर देख सकते हैं।

हमारे कार्य हमें हतोत्साहित कर सकते हैं, हमारी परिस्थितियाँ हमें झकझोर सकती हैं, और परमेश्वर के प्रति हमारा प्रेम क्षीण हो सकता है—लेकिन हम इस सत्य में दिलासा पा सकते हैं कि यीशु हमारे हृदयों को जानता है! वह जानता है कि हमारा हृदय असफल हो सकता है। वह जानता है कि हमारा विश्वास कमज़ोर हो सकता है। लेकिन यही असफलताएँ तो हैं जिनके कारण वह इस संसार में आया, क्रूस पर मरा, और फिर जी उठा।

यदि हम अपने जीवन में पुनः स्थापन की आवश्यकता महसूस करें, परन्तु हमारे पास अपनी सफाई में कहने को कुछ न हो, तो हमारी अद्‌भुत आशा यह है कि हम कह सकते हैं, “प्रभु, तू जानता है।” और यदि हमें लगे कि हमारा प्रेम ठण्डा पड़ गया है और उसे पुनः प्रज्वलित करने के लिए हमारे अन्दर कुछ नहीं बचा है, तो अद्‌भुत सत्य यह है कि हम उस मसीह की ओर देख सकते हैं जो हमारे लिए क्रूस पर टंगा रहा: “हम इसलिए प्रेम करते हैं, कि पहले उसने हम से प्रेम किया” (1 यूहन्ना 4:19)।

एक क्षण ठहरकर परमेश्वर के अनुग्रह और प्रेम की महानता और निकटता पर मनन करें। यीशु ने आपके सारे अपराधों को क्रूस पर उठा लिया, ताकि आप पाप के लिए मरकर उसके लिए जीवित रहें (1 पतरस 2:24), और वह आज भी आपके सारे दोषों के बावजूद आपसे सम्बन्ध बनाए रखना चाहता है। वह आपको पूर्णतः जानता है, और फिर भी पूरी रीति से प्रेम करता है।

क्या आप उससे प्रेम करते हैं? क्योंकि निश्चित ही, उससे अधिक योग्य और कोई नहीं है।

1 यूहन्ना 3:16-24

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: नहेम्याह 12–13; लूका 21:1-19

22 दिसम्बर : आलस्य के विरुद्ध चेतावनी

“मैं आलसी के खेत के पास से और निर्बुद्धि मनुष्य की दाख की बारी के पास से होकर जाता था,तो क्या देखा कि वहाँ सब कहीं कंटीले पेड़ भर गए हैं;और वह बिच्छू पौधों से ढँक गई है;और उसके पत्थर का बाड़ा गिर गया है . . . छोटी सी नींद,एक और झपकी,थोड़ी देर हाथ पर हाथ रख के और लेटे रहना. . .नीतिवचन 24:30-31, 33

कल्पना करें कि आप सड़क पर गाड़ी चला रहे हैं और एक ऐसे घर के पास से गुजरते हैं जो पूरी तरह से टूटा-फूटा है और जहाँ हर ओर झाड़ियाँ उग आई हैं। पहले तो आप यही सोचेंगे कि शायद यहाँ कोई नहीं रहता। लेकिन फिर आप एक टूटी खिड़की से किसी व्यक्ति को देखते हैं। आप सोचते हैं, शायद मालिक बीमार है और अपने घर की देखभाल नहीं कर पा रहा। फिर वह व्यक्ति बाहर आता है—और पूर्णतः स्वस्थ दिखाई देता है। तब आप समझ जाते हैं: वह केवल आलसी है।

इस नीतिवचन में इसी दृश्य को वर्णित किया गया है: एक आलसी व्यक्ति उस भूमि पर रहता है, और उसकी दाख की बारी उसके आलस्य की गवाही देती है।

आलसी लोग गरीबी और अपमान में जीने की इच्छा लेकर नहीं उठते। बल्कि जब उन्हें परिश्रम करने की चुनौती मिलती है, तो उनका रवैये में कुछ ऐसे लक्षण दिखाई देते हैं, जो हममें से कई लोग अपने भीतर पहचान सकते हैं यदि हम परमेश्वर के वचन के दर्पण में झाँकने को तैयार हों।

एक आलसी व्यक्ति केवल अपने बिस्तर का आनन्द नहीं लेता—वह मानो एक किवाड़ के समान उस पर झूलता रहता है। वह हिल-जुल तो बहुत करता है, परन्तु किसी वास्तविक कार्य की ओर कोई प्रगति नहीं करता (नीतिवचन 26:14)। वह किसी कार्य को करने से सीधे मना नहीं करता, बल्कि धीरे-धीरे, एक क्षण से दूसरे क्षण तक, उसे टालता जाता है—और अपने आप को धोखा देता है कि वह कभी-न-कभी उसे कर ही लेगा।

आलसी व्यक्ति बहाने बनाने में निपुण होता है। कार्य करने की इच्छा न होने के कारण, वह हमेशा कुछ न कुछ कारण खोज लेता है ताकि वह अपनी निष्क्रियता को जारी रख सके। कूड़ेदान बाहर फेंकना कोई कठिन कार्य नहीं है, परन्तु आलसी व्यक्ति उस सरल कार्य को भी टालने के लिए कोई-न-कोई तर्क गढ़ ही लेता है।

आश्चर्यजनक रूप से, आलसी व्यक्ति हमेशा तृप्ति की भूख में रहता है, क्योंकि उसकी आत्मा की स्थिति के कारण उसे वह कभी नहीं मिलती। वह सन्तोष को कहीं दूर “बाहर” खोजता है, परन्तु उसे कभी प्राप्त नहीं करता। आलसी व्यक्ति लालसा तो बहुत वस्तुओं की करता है, परन्तु प्राप्त कुछ भी नहीं करता, इसलिए नहीं कि वह इसमें सक्षम नहीं है, बल्कि इसलिए कि वह इसके लिए अनिवार्य परिश्रम नहीं करता। विश्राम की अधिकता में भी वह बेचैन रहता है।

जब आलस्य हमारे जीवन की पहचान बन जाता है, तो हम स्वयं को यह समझाने लगते हैं कि हम दस मील दौड़ने के लिए तैयार हैं, उस लेख को लिखना आरम्भ करने जा रहे हैं, या उस परियोजना को पूरा करने ही वाले हैं—लेकिन जब तक परमेश्वर का सामर्थ्य और अनुग्रह हमारी वास्तविकता को नहीं बदलते, तब तक ये बातें केवल कल्पनाओं में ही रहती हैं।

आलस्य को कभी छोटा या तुच्छ दोष समझने की भूल न करें। आलस्य कोई कमजोरी नहीं है, बल्कि एक पाप है। धीरे-धीरे यह हमारे पूरे जीवन को प्रभावित कर सकता है, और बिना हमें महसूस कराए, अपनी शक्ति में बढ़ता जाता है—और शैतान यही चाहता है कि हम निष्क्रियता में हार मान लें। आप किन क्षेत्रों में आलस्य के प्रति आकर्षित होते हैं? क्या कोई ऐसा कार्य है जिसे आप टाल रहे हैं या जिसके लिए आप बहाना बना रहे हैं? क्यों? क्या आप इस पाप का सामना करेंगे और परमेश्वर से माँगेंगे कि वह आपकी सहायता करे कि आप इस पाप से निर्दयता, अनिवार्यता और निरन्तरता के साथ निपटें?

2 थिस्सलुनीकियों 3:6-15

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: नहेम्याह 10–11; लूका 20:27-47 ◊