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31 मार्च : सहायता के लिए पुकारना

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31 मार्च : सहायता के लिए पुकारना
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“जब-जब इस्राएली बीज बोते तब-तब मिद्यानी और अमालेकी और पूर्वी लोग उनके विरुद्ध चढ़ाई करते . . . मिद्यानियों के कारण इस्राएली बड़ी दुर्दशा में पड़ गए; तब इस्राएलियों ने यहोवा की दोहाई दी।”  न्यायियों 6:3, 6

जब हम असहाय होते हैं, तो हम सच्चा विश्वास सीखने के लिए सबसे उपयुक्त स्थिति में होते हैं। न्यायियों 6 के आरम्भ में इस्राएल के लोगों ने एक बार फिर “यहोवा की दृष्टि में बुरा किया” (न्यायियों 6:1)। उन्होंने एक बार फिर विद्रोह और पश्चाताप के बार-बार दोहराए जाने वाले चक्र में अपने आप को फँसा लिया था, जो सीखने में धीमे थे और सीखी हुई बातों को जल्दी भूल जाते थे कि उनकी कठिन परिस्थितियाँ प्रायः उनकी अवज्ञा के कारण होती थीं। अन्ततः, इस्राएलियों को यह समझने में संघर्ष करना पड़ा कि परमेश्वर उन्हें ऐसी स्थिति में आने देगा जहाँ उनकी एकमात्र प्रतिक्रिया दोहाई देना रह जाएगी, कि वह उन्हें अपने साथ, अपनी महिमा और उनकी भलाई के लिए सहभागिता में ला सके। वह उन लोगों के जीवन में अपने उद्देश्यों को पूरा करते हुए, जो अपने को असहाय जानते हैं, आज भी हमारे लिए ऐसा ही करता है। ये वे लोग हैं जो जानते हैं कि वे “मन के दीन हैं” हैं, न कि वे जो सोचते हैं कि वे अपने आप में पर्याप्त हैं, जिनके लिए यीशु ने राज्य की प्रतिज्ञा की है (मत्ती 5:3)।

हममें से कुछ लोग इस गलत धारणा को अपनाए बैठे हैं कि यदि हम केवल यीशु के पीछे चलते रहें तो सब कुछ सदैव ठीक होता जाएगा। अन्दर ही अन्दर हम यह सोचते रहते हैं कि परमेश्वर सदैव और तुरन्त कठिनाई को दूर करने के लिए हस्तक्षेप करेगा। जब परमेश्वर हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर उस तरह या उस समय पर नहीं देता जैसे हम चाहते हैं, तो हम यह सोचने लगते हैं कि क्या हम अब भी भरोसा कर सकते हैं कि वह सब कुछ जानता है। हो सकता है कि आप आज ऐसी ही स्थिति में हैं।

सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में बार-बार परमेश्वर हमारी सहायता करने की प्रतिज्ञा करता है जब हम माँगते हैं: “न तो दिन को धूप से, और न रात को चाँदनी से तेरी कुछ हानि होगी। यहोवा सारी विपत्ति से तेरी रक्षा करेगा; वह तेरे प्राण की रक्षा करेगा। यहोवा तेरे आने जाने में तेरी रक्षा अब से लेकर सदा तक करता रहेगा” (भजन संहिता 121:6-8)। ये परमेश्वर के वचन के आश्वासन हैं। फिर भी जिस तरह से वह ऐसी प्रतिज्ञाओं को पूरा करता है, वह प्रायः पथरीले स्थानों में, अन्धेरी घाटियों के मध्य और असुविधाजनक प्रतीक्षा के कक्षों में होता है।

जब परमेश्वर ने न्यायियों की पुस्तक में अपने लोगों के लिए मध्यस्थी की, तो उसने उन्हें उनके पापों के विषय में समझाते हुए उन्हें अपने वचन की ओर फेरा। भविष्यद्वक्ता ने परमेश्वर के वचनों को बोलते हुए इस्राएलियों को वह याद दिलाया, जो उन्हें जानने की आवश्यकता थी, “मैं तुम को मिस्र में से ले आया, और दासत्व के घर से निकाल ले आया . . . मैंने तुमसे कहा, ‘मैं तुम्हारा परमेश्‍वर यहोवा हूँ . . .’ परन्तु तुमने मेरा कहना नहीं माना” (न्यायियों 6:8, 10)। परन्तु फिर कहानी में मोड़ आता है, जब हम परमेश्वर के न्याय की आशा करते हैं, तो हम पढ़ते हैं, “यहोवा के दूत ने दर्शन देकर” दया के इन शब्दों को कहा कि “यहोवा तेरे संग है” (न्यायियों 6:12)।

दिन-प्रतिदिन अपनी दया को प्रदर्शित करने के विपरीत यदि परमेश्वर हमें उस न्याय को हम पर आने देता जिसके हम योग्य हैं तो हम कहाँ होते? उसने इस्राएल के लोगों को वह नहीं दिया जिसके वे योग्य थे, न ही उसने आपके और मेरे साथ ऐसा किया है। परमेश्वर की दया और अनुग्रह का कोई अन्त नहीं है। परन्तु अपनी भलाई में वह प्रायः हमारे जीवन में कठिन परिस्थितियों का उपयोग करके हमें यह सिखाता है कि वह ही वह सब है जिसकी हमें आवश्यकता है। किसी भली वस्तु को हटाए जाने से पीड़ा होती है, परन्तु यह हमें परमेश्वर की दोहाई देने और उसमें अपना बल, शान्ति और आशा खोजने के लिए भी प्रेरित कर सकती है। सहायता के लिए उसे पुकारें, इस आशा के साथ कि जो परमेश्वर आपकी सुनता है वह वास्तव में जानता है कि सर्वोत्तम क्या है। प्रभु आपके साथ है!       

रोमियों 5:1-11

30 मार्च : अन्तहीन लाभ

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30 मार्च : अन्तहीन लाभ
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“क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे, वह उसे खोएगा; और जो कोई मेरे लिए अपना प्राण खोएगा, वह उसे पाएगा। यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे, और अपने प्राण की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा?”  मत्ती 16:25-26

यीशु प्रश्न पूछने में निपुण था, विशेषकर ऐसे प्रश्न जो लोगों को रुककर ध्यान देने पर बाध्य कर देते थे। जब हमारा सामना यीशु के प्रश्नों से होता है, जैसा कि यहाँ चेलों के साथ हुआ, तो हमें सावधान रहना चाहिए कि हम उनके प्रभाव को टालने का प्रयास न करें।

पहली नजर में हो सकता है कि यीशु का यह प्रश्न, जो भौतिक सफलता के लिए प्राण की हानि उठाने के बारे में है, प्राथमिक रूप से एक चेतावनी के रूप में लगे जैसे कि किसी स्वार्थी व्यक्ति पर दण्ड आने का संकेत दे रहा हो। हम यीशु के प्रश्न को इस तरह से पढ़ने के लिए प्रलोभित होते हैं, मानो वह एक माँ के समान है जो अपने बच्चे को कठोर चेतावनी देकर कह रही है, “अब यदि तुम इसे अपनी बहन के साथ नहीं बाँटोगे, तो तुम जानते हो कि क्या होगा!” परन्तु यह प्रश्न एक अवलोकन है। यीशु दिखा रहा है कि जब हम अपने जीवन और निर्णयों को अपनी पापी अभिलाषाओं, जैसे कि अपनी सम्पत्ति, अपनी उपलब्धियों, अपनी इच्छित पहचान के आधार पर दिशा देते हैं, तब क्या होता है। वह कहता है कि इस तरह से जीना अपने जीवन की हानि उठाना है।

इस कारण, यहाँ यीशु जिस जीवन की हानि की बात कर रहा है, वह तात्कालिक और अनन्त दोनों है। यदि हम जीवन को उससे प्राप्त होने वाली वस्तुओं से अधिक कुछ नहीं मानते, तो हम वास्तव में इसके सबसे बड़े आनन्द से वंचित रह जाते हैं; अन्ततः हमारा केवल अस्तित्व रह जाता है, किन्तु हम वास्तव में जी नहीं पाते। इसके अतिरिक्त, जब हम अपने आप को अपने जीवन के सिंहासन पर बिठा देते हैं, तो हम यीशु को उसके उचित स्थान से हटा देते हैं और इस वास्तविकता को स्वीकार करते हैं कि स्वाभाविक रूप से हम संसार के पीछे चलना पसन्द करते हैं, न कि हमारी इच्छाओं को छोड़कर मसीह के पीछे चलना। यदि हम इसी तरह चलते रहेंगे, तो हम अनन्त जीवन के वरदान को खो देंगे, जिसे वह अपने अनुयायियों को देना पसन्द करता है।

तो हम वर्तमान समय में सांसारिक अभिलाषाओं से कैसे लड़ सकते हैं? सबसे पहले हमें यह पहचानना होगा कि जैसे 17वीं सदी के गणितज्ञ और धर्म-विज्ञानी ब्लेज़ पास्कल ने कहा था, हमारे अस्तित्व के सबसे गहन स्तर पर परमेश्वर के आकार का एक छेद है और इस छेद को परमेश्वर के अतिरिक्त कोई भी नहीं भर सकता। हम क्षण भर के सुखों का पीछा करने के लिए नहीं, अपितु जीवित परमेश्वर के साथ सम्बन्ध का आनन्द लेने के लिए अस्तित्व में हैं। फिर दूसरा, हमें अपनी आत्माओं के मूल्य पर निरन्तर चिन्तन करना चाहिए जैसा कि यरूशलेम के बाहर उस क्रूर दृश्य में स्पष्ट है, जहाँ तिरस्कृत, बहिष्कृत, छिदे हुए, घावों से भरे हुए और ठुकराए हुए निष्पाप मसीह को क्रूस पर लटका दिया गया था, ताकि हम परमेश्वर के साथ सही सम्बन्ध में लाए जाएँ और मुक्त रूप से अनन्त जीवन प्राप्त करें। यीशु का बलिदान इस बात को उजागर करता है कि परमेश्वर के लिए हमारी आत्माओं का अनन्त भविष्य कितना महत्त्व रखता है।

यीशु को अपने उद्धारकर्ता और अपने राजा के रूप में मानना ​​और उसके मूल्य को किसी भी सांसारिक खजाने से ऊपर स्वीकारना एक क्षणिक निर्णय नहीं है; यह एक आजीवन प्रतिबद्धता है, जिसे प्रतिदिन जीया जाता है। यदि आप तैयार हैं कि प्रतिदिन उसके क्रूस तक आएँगे, दीनता से स्वीकार करेंगे कि वह कौन हैं, और अपना जीवन, अपनी इच्छाएँ, आराम, धन उसके लिए दे देंगे, तो अब और सदा तक आपका लाभ अन्तहीन होगा। हमारे लिए बेहतर होगा कि हम अपने हर दिन के आरम्भ में अपने आप से वह प्रश्न पूछें, जो यीशु ने उस दिन सड़क पर अपने चेलों से पूछा था, यदि मैं सारे जगत को प्राप्त कर लूँ और अपने प्राण की हानि उठाऊँ तो मुझे क्या लाभ होगा?       

मत्ती 16:13-27

29 मार्च : सच्चा इस्राएल

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29 मार्च : सच्चा इस्राएल
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“जब इस्राएल बालक था, तब मैंने उससे प्रेम किया, और अपने पुत्र को मिस्र से बुलाया। परन्तु जितना वे उनको बुलाते थे, उतना ही वे भागे जाते थे; वे बाल देवताओं के लिए बलिदान करते, और खुदी हुई मूरतों के लिए धूप जलाते गए।”  होशे 11:1-2

जब यीशु का जन्म हुआ तो मरियम और यूसुफ उसे राजा हेरोदेस के सताव से बचाने के लिए मिस्र ले गए। जब ​​मत्ती उस घटना के बारे में लिखता है, तो वह होशे के इन शब्दों को सम्मिलित करता है जो सात शताब्दियों से भी पहले कहे गए थे और समझाता है कि वे वास्तव में एक भविष्यद्वाणी थी जिसे यीशु ने पूरा किया (मत्ती 2:13-15)। किन्तु होशे के शब्द किसी व्यक्ति को सन्दर्भित नहीं कर रहे थे, अपितु एक राष्ट्र के बारे में थे (“उनको बुलाते थे . . . वे भाग जाते थे . . . वे बलिदान करते गए”)। तो फिर हो सकता है कि हम यह सोचें कि यहाँ मत्ती ने बिना पूरी तरह से सोचे-समझे पवित्रशास्त्र का उपयोग किया है।

किन्तु वास्तविकता में मत्ती जानता है कि वह क्या कर रहा है। वह जानबूझकर यीशु को इस्राइल के साथ जोड़ रहा है। जैसे परमेश्वर ने अपने प्रिय लोगों, अर्थात् अपने “पुत्र” को मिस्र से बाहर बुलाया था ताकि वे प्रतिज्ञा किए गए देश में उसकी आराधना करें, मत्ती कहता है कि वैसे ही अब परमेश्वर अपने एकलौते पुत्र, प्रभु यीशु को मिस्र से बाहर बुला रहा था और प्रतिज्ञा किए गए देश में वापस ला रहा था। यद्यपि यीशु अलग था। इस्राएलियों के समान उसे जंगल में परीक्षा का सामना करना पड़ा, परन्तु इस्राएलियों के विपरीत उसने पाप नहीं किया (मत्ती 4:1-11; निर्गमन 32:1-6 भी देखें)। यीशु सच्चा इस्राएल है, सच्चा पुत्र है।

अपने सेवाकार्य के आरम्भ में यीशु ने बारह चेलों को चुना (मत्ती 10:1-4)। यह एक महत्त्वपूर्ण संख्या थी। यीशु ने बारह चेलों को चुनकर एक स्पष्ट और महत्त्वपूर्ण सन्देश दिया। वह, सच्चा इस्राएल, लोगों को एक नए इस्राएल का भाग बनने के लिए बुला रहा था। इस्राएल के बारह गोत्रों से उलट, उसके बारह चेले अब इसकी नींव थे। इस चयन में परमेश्वर के लोगों का केन्द्र बदल गया। यह बदलाव पहले हुआ था और अब भी जारी है। तब से सच्चा इस्राएल अब मध्य-पूर्व में नहीं पाया जाता है, न ही इसमें केवल अब्राहम के जैविक वंशज सम्मिलित हैं। इसके विपरीत, इसमें अब्राहम के आत्मिक वंशज सम्मिलित हैं, जो यहूदी और गैर-यहूदी दोनों हैं। परमेश्वर की सन्तान वे हैं जो परमेश्वर की उन प्रतिज्ञाओं पर भरोसा करके, जो यीशु में पूरी होती हैं, अब्राहम के उदाहरण का अनुसरण करते हैं।

पौलुस कहता है कि प्रतिज्ञा “विश्वास पर आधारित है” और सदा “अनुग्रह की रीति पर” है (रोमियों 4:16)। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप यहूदी हैं या गैर-यहूदी, अमीर हैं या गरीब, पुरुष हैं या स्त्री। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कौन हैं या आपने क्या किया है। एक ही सिद्धान्त सदा लागू होता है कि “यदि तुम मसीह के हो तो अब्राहम के वंश और प्रतिज्ञा के अनुसार वारिस भी हो” (गलातियों 3:29)। हम सब “मसीह में एक हैं” (गलातियों 3:28)। सुसमाचार सभी के लिए समान है क्योंकि क्रूस के तले भूमि समतल है। धार्मिक और नैतिक लोगों को उसी उद्धार की आवश्यकता है जैसे किसी ऐसे व्यक्ति को जो कभी कलीसिया में नहीं जाता और जिसने किसी भी मानक या पंथ के प्रति कोई सम्मान नहीं दिखाया। हमारे पास बताने के लिए केवल एक कहानी है, किन्तु यह वही एकमात्र कहानी है जो हमारे लिए या किसी के लिए भी आवश्यक है।

हम निर्विवाद रूप से असिद्ध हैं। पहले इस्राएल की तरह हम भी अपने पिता से भटकने और मूर्तियों को पूजने के लिए प्रवृत्त हैं। किन्तु यीशु, जो सिद्ध रीति से धर्मी है, बेहतर और सच्चा इस्राएल है, हमारे पापों को उठाने के लिए मर गया ताकि हम आकर उसकी दया पर पूर्ण रूप से अपने आप को डाल दें। हम इस्राएल के सच्चे राज्य की संरचना में उसके महान समुदाय में एक किए गए हैं और यह हमारे वजूद के कारण या हमारे कामों के कारण नहीं हुआ है, बल्कि उसके वजूद के कारण और उसके द्वारा पूरे किए गए काम के कारण हुआ है। आज उस विश्वास के कारण जो मसीह यीशु में है, आप परमेश्वर की सन्तान हैं और उतने ही प्रिय हैं जितना वह था और है (गलतियों 3:26)।

      मत्ती 4:1-11

28 मार्च : ठोस आहार

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28 मार्च : ठोस आहार
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“तुम ऊँचा सुनने लगे हो . . . यह आवश्यक हो गया है कि कोई तुम्हें परमेश्‍वर के वचनों की आदि शिक्षा फिर से सिखाए। तुम तो ऐसे हो गए हो कि तुम्हें अन्न के बदले अब तक दूध ही चाहिए। क्योंकि दूध पीने वाले बच्चे को तो धर्म के वचन की पहिचान नहीं होती, क्योंकि वह बालक है। पर अन्न सयानों के लिए है।”  इब्रानियों 5:11-14

कल्पना कीजिए कि आप अपने पसन्दीदा रेस्तराँ में जाएँ और देखें कि सभी ग्राहक अपनी मेजों पर बैठे हैं और दूध पीने वाली बड़ी-बड़ी बोतलों से दूध पी रहे हैं। यह कितना विचित्र दृश्य होगा! फिर भी यही वह चित्र है जिसे इब्रानियों के लेखक ने चित्रित किया था जब उसने अपने समय के यहूदी मसीहियों से अधिक से अधिक मसीह के समान बनने के लिए लालायित बने रहने की विनती की थी। वह जानता था कि बहुत से लोग पहले से ही अपने विश्वास में उदासीन हो रहे थे। जिन्हें अब तक गुरु हो जाना चाहिए था, उन्हें अपनी बुनियादी बातों की फिर से समीक्षा करने की आवश्यकता थी।

इन विश्वासियों के लिए बाइबल के सिद्धान्तों को समझने में कठिनाई न तो किसी जटिल विषय-वस्तु के कारण हुई थी और न ही लेखक की स्पष्ट रूप से व्याख्या करने में असमर्थता के कारण। इसके विपरीत, उनके सीखने के प्रयास में कमी थी। जब लेखक लिखता है कि वे “ऊँचा सुनने लगे” थे, तो “ऊँचा” के लिए वह उसी शब्द का उपयोग करता है, जिसका उपयोग वह बाद में उन्हें “आलसी” न होने की चेतावनी देते समय करता है (इब्रानियों 6:12)। वहाँ वह अपने पाठकों के इस प्रकार के आलसी रवैये को सहन करने के विपरीत “उनका अनुकरण करने” के लिए प्रोत्साहित करता है, “जो विश्वास और धीरज के द्वारा प्रतिज्ञाओं के वारिस होते हैं।”

यदि ये आरम्भिक मसीही लोग कर्तव्यनिष्ठ होते जो ध्यान से सुन रहे होते और बाइबल की अवधारणाओं को समझने का पूरा प्रयास कर रहे होते और केवल ऐसा करने में उन्हें कठिनाई हो रही होती, तो सम्भवतः लेखक उनके साथ इतना कठोर नहीं होता। परन्तु ऐसा नहीं था। उसे कलीसिया के इन सदस्यों को फटकारना पड़ा क्योंकि जिन्हें उत्सुकता से सत्य को ग्रहण करना चाहिए था, वे उदासीन हो गए थे। उनका उत्साह कम हो गया था। उन्होंने ध्यान देना बन्द कर दिया था। इसका परिणाम यह हुआ कि वे समझने में असफल रहे, जिससे परमेश्वर के सत्य के द्वारा उनमें बदलाव आना रुक गया था।

यदि हम सचेत नहीं रहते हैं, तो हमारे साथ भी यही हो सकता है। हम दलिया, डबलरोटी और दूध के आहार के सहारे अपना जीवन नहीं चला सकते। दूध अच्छा होता है। इसे अपने आहार के भाग के रूप में लेना भी ठीक है। परन्तु आहार के रूप में केवल इसी का ही सेवन करना ठीक नहीं है। यह शिशुओं के लिए है और हमें शिशु नहीं बने रहना है। हमें अधिक पौष्टिक भोजन खाना सीखना चाहिए और अपनी रुचि को बढ़ाना चाहिए।

अपना लक्ष्य बनाएँ कि आप “हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के अनुग्रह और पहचान में बढ़ते” जाएँ (2 पतरस 3:18), ताकि आप सच्चे मसीही अनुभव के पहलुओं का सामना कर सकें। ऐसे व्यक्ति न बनें जो सुसमाचार के शुभ समाचार को सुनता और अपने मन में कहता है, “ओह, यह तो मैं जानता हूँ। मैं अब ध्यान हटा सकता हूँ।” ऐसे व्यक्ति न बनें जो रविवार की सुबह के प्रवचन को पूरे सप्ताह के लिए पर्याप्त आत्मिक भोजन मानता हो। ऐसे व्यक्ति न बनें जो उथले पानी में छपछपाते हुए चलता हो और कभी भी परमेश्वर के वचन की गहराई में उतरने का प्रयास नहीं करता। ऐसे व्यक्ति बनें जो सुसमाचार से प्रेम करता हो और जो परमेश्वर के अनुग्रह से इसे सुनने से कभी थकता नहीं है; और जो परमेश्वर के वचन से प्रेम करता है, जो इसे पीना और इसे चबाना पसन्द करता है, और बार-बार इसकी सच्चाई से प्रेरित होता है, जब आप इसके महान विषय, अर्थात् हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता की समानता में अधिकाधिक बनते जाते हैं।       

भजन संहिता 119:33-48

27 मार्च : बलिदान द्वारा बचाए गए

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27 मार्च : बलिदान द्वारा बचाए गए
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“और जिन घरों में तुम रहोगे उन पर वह लहू तुम्हारे लिए चिह्न ठहरेगा; अर्थात् मैं उस लहू को देखकर तुम को छोड़ जाऊँगा, और जब मैं मिस्र देश के लोगों को मारूँगा, तब वह विपत्ति तुम पर न पड़ेगी और तुम नष्ट न होगे।”  निर्गमन 12:13

प्रभु-भोज में क्या होता है? क्यों मसीही लोग रोटी खाते हैं और प्याले में से पीते हैं?

इन प्रश्नों के उत्तर ढूँढते हुए, हममें से बहुत से लोग मूसा की ओर देखने के बारे में नहीं सोचते। यदि हम उसकी कहानी के विवरण में बहुत अधिक ध्यान केन्द्रित करने लगेंगे तो हमारे पास केवल सरकंडों, जलती हुई झाड़ी और विपत्तियों का एक सीमित दृष्टिकोण होगा। परन्तु यदि हम अपने आप को थोड़ा पीछे खींच लें, तो हम परमेश्वर की पूरी योजना की महिमा को देखेंगे और उसके भागीदार बनने में सक्षम हो सकेंगे।

अपनी प्रजा इस्राएल के कूच की प्रक्रिया को आरम्भ करने के लिए न्याय करने हेतु देश से होकर जाते हुए, परमेश्वर ने मिस्र पर दस विपत्तियों में से अन्तिम विपत्ति भेजी और प्रत्येक मिस्री का पहिलौठे मार दिया गया। इस्राएल के पहिलौठे भी मारे जाने के खतरे में थे, क्योंकि वे पाप से निर्दोष नहीं थे, और पाप मृत्यु की ओर ले जाता है (रोमियों 6:23)। परन्तु परमेश्वर ने फसह के द्वारा उनके बचाव का एक उपाय प्रदान किया। जब प्रभु ने बलि के मेमने का लहू द्वार की चौखट पर देखा, जिसे जूफा के पौधे से लगाया गया था (निर्गमन 12:22), तो वह उस घराने को लाँघकर आगे बढ़ गया।

पुराने नियम में परमेश्वर द्वारा इस प्रकार लाँघकर जाना उसके उद्धार का महान कार्य था। इसमें और इसके द्वारा परमेश्वर ने अपने लोगों को एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त सिखाया कि परमेश्वर प्रतिस्थापन द्वारा बचाता है।  उसने इन लोगों को इसलिए बचाया क्योंकि उनके स्थान पर पशुओं की बलि दी गई थी। जिस प्रकार मूसा लिखता है कि मिस्र में उस रात “एक भी ऐसा घर न था जिसमें कोई मरा न हो” (निर्गमन 12:30)। एक पुत्र मरा था या एक मेमना मरा था। परमेश्वर के लोग अपने पापों के लिए मृत्यु के पात्र थे, परन्तु क्योंकि उन्होंने दूसरे के बलिदान पर भरोसा किया, जैसा कि परमेश्वर ने आज्ञा दी थी और जिसे परमेश्वर ने प्रदान किया था, वे बचा लिए गए। पुराने नियम के इतिहास में प्रत्येक वर्ष परमेश्वर के लोग इस घटना की ओर देखा करते और उस महान सत्य को याद करते कि परमेश्वर प्रतिस्थापन द्वारा बचाता है।

वे सभी वर्ष और वे सभी पर्व उस क्षण के महत्त्व को रेखांकित करते हैं, जब बपतिस्मा देने वाला यूहन्ना यीशु को आते देखकर कहता है, “देखो, यह परमेश्‍वर का मेमना है जो जगत का पाप उठा ले जाता है” (यूहन्ना 1:29)। ठीक फसह के मेमने की तरह, यहाँ कोई ऐसा व्यक्ति था जो अपने लोगों को पाप से बचाने और अपने लोगों को स्वतन्त्र करने के लिए परमेश्वर का प्रावधान था।

इस्राएल का कूच मानवजाति के महान कूच का पूर्वाभास है। जब परमेश्वर के न्याय के योग्य पुरुष या स्त्रियाँ क्रूस पर उनके लिए बहाए गए लहू पर भरोसा करते हैं, तो उन्हें पाप से मुक्ति मिल जाती है। हर बन्धन टूट जाता है, ठीक वैसे ही जैसे इस्राएलियों की जंजीरें तब टूट गई थीं जब उन्हें दासत्व से मुक्त कराया गया था।

अगली बार जब आप प्रभु-भोज के बारे में सोच रहे हों, तो मूसा, जलती हुई झाड़ी और विपत्तियों की कहानी पर विचार कीजिएगा। फिर उनके बीच के सम्बन्धों को समझिएगा और याद रखिएगा कि हम प्रभु-भोज इसलिए लेते हैं क्योंकि यीशु हमारा बलिदान है। वह परमेश्वर का मेमना है। वह आपका प्रतिस्थापन है। आपको किसी न्याय से डरने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उसका आपकी वर्तमान स्थिति पर कोई प्रभाव नहीं है, वह क्रूस पर चुकाया जा चुका है और उसका समाधान किया जा चुका है। आप प्रतिज्ञा के देश की ओर जा रहे हैं।       यूहन्ना 19:16ब-37

26 मार्च : अपने आप को परमेश्वर के प्रेम में बनाए रखना

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26 मार्च : अपने आप को परमेश्वर के प्रेम में बनाए रखना
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“अपने आप को परमेश्‍वर के प्रेम में बनाए रखो; और अनन्त जीवन के लिए हमारे प्रभु यीशु मसीह की दया की बाट जोहते रहो।”  यहूदा 21

यद्यपि परमेश्वर आपको “ठोकर खाने से बचाने” और विश्वास में बने रहने में पूरी तरह सक्षम है (यहूदा 24), फिर भी वह आपको मसीही जीवन में आगे बढ़ने में सक्रिय भूमिका निभाने का, अर्थात् अपने आप को उसके प्रेम में बनाए रखने का बुलावा देता है।

हमारे जीवन में परमेश्वर के प्रेम का पीछा करना एक निरन्तर कार्य होना चाहिए। यही कारण है कि बाइबल में इसके बारे में इतना कुछ कहा गया है! विश्वास के मार्ग में हम निष्क्रिय नहीं रह सकते; हमारा विश्वास अपने आप दृढ़ नहीं होगा। तो फिर कौन सी विशिष्ट क्रियाएँ या दृष्टिकोण आपको परमेश्वर के प्रेम में बने रहने में सहायता करते हैं?

सबसे पहले, पवित्रशास्त्र हमें सिखाता है कि परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम को बनाए रखने के लिए हमें सब पापों से निरन्तर घृणा करनी चाहिए (नीतिवचन 8:13; भजन संहिता 97:10; रोमियों 12:9 देखें)। यदि हम पाप के साथ खेलें, उसे बढ़ावा दें, या अपने आप को उसके प्रति आकर्षित होने दें, तो परमेश्वर के प्रति आपका प्रेम अनिवार्य रूप से घटने लगेगा। दूसरा, हम परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम को उन विधियों में आनन्दित रहने के द्वारा बढ़ा सकते हैं, जो उसने कलीसिया को दी हैं। उदाहरण के लिए, यीशु ने प्रभु-भोज की स्थापना एक ऐसे माध्यम के रूप में की है जिसके द्वारा वह एक विशेष तरीके से हमसे मिलता है, उसने स्वयं को हमें दिखाया ताकि हम उसके प्रेम को जान सकें और उससे प्रेम भी कर सकें। यदि हम परमेश्वर के द्वारा स्थापित अनुग्रह के साधनों से स्वयं को अलग कर लेते हैं, तो हमारे लिए उसके साथ स्वस्थ सम्बन्ध बनाए रखना असम्भव हो जाता है।

तीसरा, हमें यह याद रखने की आवश्यकता है कि अपने आप को परमेश्वर के प्रेम में बनाए रखना न केवल एक व्यक्तिगत प्रयास है, बल्कि एक सामूहिक प्रयास भी है। हम मसीह के पास आते तो व्यक्तिगत रूप से हैं, किन्तु हम उसमें अकेले रहकर नहीं जीते। जीवित पत्थरों के समान हम एक आत्मिक घर में बनते जाते हैं, ताकि हम विश्वासी मिलकर पवित्र याजकों का एक समाज बन सकें (1 पतरस 2:5)। परमेश्वर से प्रेम करने वाले अन्य लोगों के साथ गहरी और सच्ची मित्रता बढ़ाना हमें  परमेश्वर से प्रेम करने में सहायता करता है। सम्बन्ध कभी तटस्थ नहीं होते। यदि हम अपने विश्वास में बढ़ना चाहते हैं, तो हमें धर्मी मित्रों की संगति खोजनी चाहिए।

हमारा विश्वास में बढ़ना, क्रिया और जवाबदेही की माँग करता है किन्तु इसके लिए धैर्य की भी आवश्यकता होती है, क्योंकि हम “अनन्त जीवन के लिए हमारे प्रभु यीशु मसीह की दया की बाट जोहते हैं।” जबकि हम उत्सुकता से अपनी देह के छुटकारे और परमेश्वर के उद्देश्यों की पूर्ण पूर्णता की प्रतीक्षा कर रहे हैं (रोमियों 8:23), हमें अपने स्वर्गिक पिता के साथ एक गहरा और दृढ़ सम्बन्ध स्थापित करना है, पाप से फिरना है और दूसरों के साथ उनके वरदानों का आनन्द लेना है, जिनके पास एक नया स्वभाव है और जिनमें पवित्र आत्मा वास करता है।

इसलिए “डरते और काँपते हुए अपने-अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाओ; क्योंकि परमेश्‍वर ही है जो तुम में कार्य करता है” (फिलिप्पियों 2:12-13)। हम उद्धार पाने के लिए काम नहीं करते, बल्कि अपने जीवन के सभी क्षेत्रों में इस प्रकार कार्य करते हैं कि हम उद्धार पा चुके हैं। आपको कौन से पाप से लड़ना है? आपको गहरी मसीही मित्रता को किस प्रकार बढ़ावा देना है? अपने आप को परमेश्वर के प्रेम में बनाए रखें।    

  1 यूहन्ना 5:12-21

25 मार्च : मसीही तरीके से सोचना

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25 मार्च : मसीही तरीके से सोचना
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“इसलिए हे भाइयो, जो जो बातें सत्य हैं, और जो जो बातें आदरणीय हैं, और जो जो बातें उचित हैं, और जो जो बातें पवित्र हैं, और जो जो बातें सुहावनी हैं, और जो जो बातें मनभावनी हैं, अर्थात् जो भी सद्‌गुण और प्रशंसा की बातें हैं उन पर ध्यान लगाया करो।”  फिलिप्पियों 4:8

कई मायनों में, हम वही होते हैं जो हम सोचते हैं। हमारे मन हमारे कार्यों के पीछे का कारण होते है, और हमारे मन के माध्यम से ही हमारे भाव जागृत होते हैं। इसलिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि हम उचित बातों के बारे में सोचें और उचित तरीके से सोचना सीखें। दूसरे शब्दों में, हमें मसीही तरीके से सोचना सीखना चाहिए।

कुछ लोग कहेंगे कि मसीही तरीके से सोचने का अर्थ है एक ऐसा मन होना जो केवल मसीही विषयों पर ही विचार करता है और प्रत्येक दूसरी धारणा के लिए अपने को बन्द कर लेता है। किन्तु यह मसीही सोच के उस वर्णन के अनुरूप नहीं है, जो हमें पवित्रशास्त्र में मिलता है। बाइबल सिखाती है कि हमें वास्तव में प्रत्येक बात  के बारे में सोचना चाहिए, परन्तु हमें बाइबल के दृष्टिकोण से ऐसा करना सीखना चाहिए (2 कुरिन्थियों 10:5)। हमें संगीत, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, कला, न्याय, स्वतन्त्रता और प्रेम, अर्थात् मानव अस्तित्व के पूरे विस्तार पर परमेश्वर के वचन की प्रकट सच्चाइयों के चश्मे के माध्यम से विचार करना चाहिए।

प्रेरित पौलुस ने इसे समझा इसलिए उसने हमें उन गुणों की एक सूची दी जिसके साथ हम अपनी सोच का ढांचा तैयार कर सकते हैं। पौलुस ने कहा कि मसीह के अनुयायी होने के कारण हमारे विचारों को सत्य, आदर, न्याय और पवित्रता जैसे गुणों द्वारा निर्देशित और नियन्त्रित होना चाहिए।

वह कहता है कि हमें उन बातों के बारे में सोचना चाहिए जिनमें “कोई भी सद्‌गुण” है। “सद्‌गुण” के लिए वह जिस शब्द का उपयोग करता है वह यूनानी भाषा का शब्द areté है, जो यूनानी भाषा में “सद्‌गुण” के लिए सबसे व्यापक शब्द है। दूसरे शब्दों में, पौलुस हमें वह मानक प्रदान करता है जिसके आधार पर हम नियमित रीति से अपने सोचने के तरीकों को परख सकते हैं। हम परमेश्वर के वचन को देखकर यह पूछ सकते हैं, “जिस बारे में सोचने का चयन कर रहा हूँ और जिस तरह से मैं इसके बारे में सोचने का चयन कर रहा हूँ, क्या वह नैतिक सद्‌गुण के अनुरूप है? क्या वह परमेश्वर की स्वीकृति के अनुसार है?”

यह कितनी बड़ी चुनौती है! इस तरह की सोच शून्यता में या बहुत प्रयास करे बिना नहीं आएगी। यदि हम इसे विकसित करना चाहते हैं, तो हमें दिन-रात परमेश्वर के वचन पर ध्यान देना होगा (यहोशू 1:8)। जब हमारे मन के नए हो जाने से हम अपने चाल–चलन को बदलने का निरन्तर प्रयास करते हैं (रोमियों 12:2), तो हम न केवल परमेश्वर को महिमा देंगे, बल्कि अपनी बातचीत में सुसमाचार को दृढ़तापूर्वक कहने की अपनी क्षमता में भी सुदृढ़ होते जाएँगे।

तो जब आप अपने विचारों के बारे में सोचें, तब इस पद को अपने जीवन में लागू करने के लिए आपको तीन प्रश्न पूछने चाहिएँ:

क्या ऐसी कोई बात है जिसके बारे में मुझे और अधिक सोचना चाहिए?

क्या ऐसी कोई बात है जिसके बारे में मुझे कम सोचना चाहिए, या बिल्कुल नहीं सोचना चाहिए?

क्या ऐसी कोई बात है जिसके बारे में मुझे अलग तरीके से सोचना चाहिए?       

भजन संहिता 1

24 मार्च : पक्षपात की मूर्खता

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24 मार्च : पक्षपात की मूर्खता
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“इस्राएल अपने सब पुत्रों से बढ़ के यूसुफ से प्रीति रखता था, क्योंकि वह उसके बुढ़ापे का पुत्र था : और उसने उसके लिए एक रंगबिरंगा अंगरखा बनवाया। परन्तु जब उसके भाइयों ने देखा कि हमारा पिता हम सब भाइयों से अधिक उसी से प्रीति रखता है, तब वे उससे बैर करने लगे और उसके साथ ठीक से बात भी नहीं करते थे।”  उत्पत्ति 37:3-4

सम्बन्धों में पक्षपाती होना मूर्खता है।

हम पुराने नियम में परमेश्वर के लोगों की सम्पूर्ण कहानी में इसे देख सकते हैं, किन्तु ऐसा लगता है कि यह यूसुफ के जीवन में सबसे अधिक दिखाई देता है, क्योंकि वह अपने पिता याकूब की विशेष रुचि का पात्र था। यूसुफ राहेल का, जिससे याकूब ने आजीवन अत्यन्त प्रीति रखी और “[याकूब के] बुढ़ापे का पुत्र” था। इसलिए याकूब, जिसका नाम परमेश्वर ने इस्राएल रखा था, इस पुत्र से दूसरों से अधिक प्रीति रखता था। पक्षपात की इस जड़ के कारण इस परिवार में बहुत बुरा फल उत्पन्न हुआ।

याकूब ने एक उपहार के द्वारा अपना पक्षपात व्यक्त किया, वह एक “रंगबिरंगा अंगरखा” था जिसे उसने स्वयं बनाया था। यह स्पष्ट रूप से पक्षपात का एक प्रतीक था, जिसे पहनना यूसुफ को बहुत पसन्द था। इस विवादास्पद अंगरखे ने यूसुफ के भाइयों में अत्यन्त शत्रुता को भड़का दिया। उनकी शत्रुता से द्वेष और हत्या की मंशा उत्पन्न हो गई। उन्होंने अन्ततः अपने भाई को गुलाम के तौर पर बेचने और फिर उसकी मृत्यु हो जाने का स्वांग तक रच डाला।

यदि उपहार में दिया गया अंगरखा ऐसी प्रतिक्रिया को भड़का सकता है, तो निश्चित रूप से समस्या उस अंगरखे से कहीं अधिक बड़ी थी। निश्चय ही गुप्त रूप से पाप कहीं भीतर दृढ़ता से स्थापित रहा होगा। और यही बात हम यूसुफ के भाइयों के साथ भी पाते हैं। उनकी प्रमुख समस्या यह नहीं थी कि वह अंगरखा बहुत मूल्यवान था, किन्तु यह थी कि वह यूसुफ को उनसे अलग श्रेणी में स्थापित कर रहा था। उसे यह उपहार देकर याकूब ने यूसुफ को उसके भाई-बहनों से ऊपर उठा दिया था और यह बात उन्हें चुभती थी। जब किसी एक को प्रिय चुना जाता है, तो यह सदैव स्वाभाविक रूप से यह संकेत करता है कि दूसरा अप्रिय है, जो प्रिय के रूप में चुने गए व्यक्ति में अहंकार और घमण्ड दोनों को जन्म देता है और जो नहीं चुने गए हैं, उनमें क्रोध और कड़वाहट को जन्म देता है। आपने अपने आस-पास या अपने जीवन में भी प्रिय होने या उस प्रतिष्ठा के लिए अनदेखा किए जाने के विनाशकारी प्रभावों को देखा होगा।

याकूब को उस समस्या के बारे में अधिक भले ढंग से समझना चाहिए था, क्योंकि उसने स्वयं अतीत में अनुचित पक्षपात का अनुभव किया था, उसकी अपनी माँ ने उसे उसके भाई एसाव से अधिक प्रिय जाना था और इसके कारण अराजकता फैल गई थी। यूसुफ के अपने भाइयों के साथ सम्बन्धों के समान एसाव के साथ उसका सम्बन्ध कई वर्षों तक बिगड़ा रहा था।

तौभी हमें याकूब या उसके पुत्रों की मानसिकता और कार्यों से अपने आप को दूर करने में शीघ्रता नहीं करनी चाहिए, जैसे कि हम कभी भी कुछ ऐसा करने के दोषी नहीं हो सकते। हम सभी को सम्बन्धों में पक्षपात करने की मूर्खता और इसके साथ प्रायः जन्म लेने वाले रोष से सावधान रहना चाहिए। पक्षपात एक सामान्य और समझने योग्य भूल है, किन्तु इसकी छाया गहरी, काली और विनाशकारी होती है।

याकूब की मूर्खता के बारे में आलोचना करने के विपरीत, आइए हम उससे सीखें। प्रत्येक सम्बन्ध परमेश्वर की ओर से एक अनूठा वरदान होता है। जिस भी मात्रा में हम अपने आस-पास के लोगों के प्रति पक्षपात दिखाते हैं, चाहे वह किसी भी कारण से हो, तो हमें जान लेना चाहिए कि यह सम्बन्धों को तोड़ देगा और नष्ट कर देगा। परन्तु यदि हम प्रत्येक मित्र, पारिवारिक सदस्य और पड़ोसी को प्रत्यक्ष प्रेम और स्नेह के साथ संजोते हैं, तो हम परमेश्वर को आदर देते हैं और उन लोगों के हृदयों को प्रोत्साहित करते हैं जिन्हें उसने हमारे आस-पास रखा है।       

उत्पत्ति 37

23 मार्च : हर एक अच्छा और उत्तम वरदान

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23 मार्च : हर एक अच्छा और उत्तम वरदान
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“क्योंकि हर एक अच्छा वरदान और हर एक उत्तम दान ऊपर ही से है, और ज्योतियों के पिता की ओर से मिलता है, जिसमें न तो कोई परिवर्तन हो सकता है, और न अदल बदल के कारण उस पर छाया पड़ती है।”  याकूब 1:17

क्या आप कभी उपहार खरीदने गए हैं और आपको पता ही नहीं था कि उस व्यक्ति को किस वस्तु की आवश्यकता है या उसे क्या चाहिए? आपको नहीं पता था कि कौन से नाप का या रंग का स्वेटर खरीदना है या बच्चे का खिलौना उसकी आयु के अनुसार उपयुक्त है या नहीं, इसलिए अन्ततः आपने हार मान ली हो और कहा, “मैं कुछ तो खरीद ही लेता हूँ! वे इसे वैसे भी वापस ले लेंगे। कौन इतनी चिन्ता करे?”

उपहार देना सदैव उतना सरल या आनन्ददायक नहीं होता जितना होना चाहिए। सच तो यह है कि हममें से सबसे उत्तम लोग भी हर बार उत्तम उपहार नहीं दे सकते क्योंकि हममें कमियाँ हैं। हमारे पास उचित उपहार देने के लिए ज्ञान और समझ की कमी होती है, और कभी-कभी संसाधनों या इच्छा-शक्ति की भी कमी होती है। इस बात में हम परमेश्वर से पूरी तरह से अलग हैं, क्योंकि परमेश्वर उत्तम वरदान देने वाला है, और केवल  उत्तम वरदान ही देता है। वह स्वभाव से ही भला है और उदारता से भरपूर है। वह बदले में कुछ भी उम्मीद किए बिना देता है और वह प्राप्त करने वाले व्यक्तियों की योग्यता के आधार पर अपनी भलाई को सीमित नहीं करता। और उसके द्वारा दिए गए किसी भी वरदान को कभी भी वापस करने की आवश्यकता नहीं होती।

न केवल परमेश्वर उत्तम रीति से उदार है, अपितु उस उदारता में कभी बदलाव नहीं आता। यहाँ तक ​​कि संसार के सबसे भले माता-पिताओं के पास भी सही समय पर और सही तरीके से जाना पड़ता है, क्योंकि वे सदैव एक समान नहीं होते। बच्चे सीखते हैं कि वे अपने समय को कैसे चुनें। जब मेरे पिता बिजली कम्पनी के साथ बात करने के लिए फोन पर प्रतीक्षा कर रहे होते थे, तब एक किशोर के रूप में मुझे उनके हाव-भाव समझना सरल लगता था और सोचा करता था, “मुझे नहीं लगता कि मेरी कार के लिए दो नए टायर माँगने का अभी सही समय है।”

यद्यपि हमारे स्वर्गिक पिता के साथ हमें यह सोचने की आवश्यकता नहीं है कि उसके पास जाना ठीक है या नहीं। वह न तो अस्थिर स्वभाव का है और न ही जल्दी क्रोध करने वाला। हम हियाव रख सकते हैं कि वह सर्वदा उचित रीति से कार्य करेगा। हम उसे किसी भी बात में अनजान, असमर्थ, अनुपलब्ध या अनिच्छुक नहीं पाएँगे। मसीह के द्वारा वह हमारे हृदय की प्रार्थनाओं और हमारी प्रतिदिन की चिन्ताओं के लिए उपलब्ध और प्रतिक्रियाशील है।

हम परमेश्वर के बच्चे हैं, और हमारे लिए अपने प्रेम को व्यक्त करने के तरीकों में से एक है हमारे लिए उसके उत्तम वरदान। इसलिए उसके प्रत्येक बच्चे में पाया जाने वाला एक गुण कृतज्ञता होना चाहिए। यदि हम अपने पिता के चरित्र को जानते हैं तो हम आभारी होने के अतिरिक्त और क्या हो सकते हैं, तब भी जब उसके वरदान वे न हों जिन्हें हमने स्वयं चुना हो? इसलिए ध्यान से अपनी आशिषों को प्रतिदिन गिना करें। याद रखें कि सभी भली वस्तुएँ उसी की देन हैं। और उससे यह कहा करें:

महान है तेरी विश्वासयोग्यता, हे परमेश्वर मेरे पिता,

न किसी परिवर्तन के कारण तुझ पर छाया पड़ती है…

जो कुछ भी मुझे चाहिए था, तेरे हाथ ने दिया—

महान है तेरी विश्वासयोग्यता, प्रभु, मेरे लिए!  [1]       

भजन संहिता 103

22 मार्च : ऐश्वर्य-पूर्ण आत्मसमर्पण

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22 मार्च : ऐश्वर्य-पूर्ण आत्मसमर्पण
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“तब यहूदा सैनिकों के एक दल को और प्रधान याजकों और फरीसियों की ओर से प्यादों को लेकर, दीपकों और मशालों और हथियारों को लिए हुए वहाँ आया। तब यीशु, उन सब बातों को जो उस पर आने वाली थीं जानकर, निकला और उनसे कहा, ‘किसे ढूँढ़ते हो?’ उन्होंने उसको उत्तर दिया, ‘यीशु नासरी को।’ यीशु ने उनसे कहा, ‘मैं हूँ।’ उसका पकड़वाने वाला यहूदा भी उनके साथ खड़ा था। उसके यह कहते ही, ‘मैं हूँ,’ वे पीछे हटकर भूमि पर गिर पड़े।”  यूहन्ना 18:3-6

सुसमाचार के सभी लेखकों ने यीशु के जीवन की समान घटनाओं को वर्णित किया है, परन्तु उनमें से प्रत्येक घटनाक्रम यीशु की पहचान के विशेष विवरण और पहलुओं पर प्रकाश डालता है। यूहन्ना का एक उद्देश्य यह था कि वह यीशु की श्रेष्ठता को और उन सभी परिस्थितियों पर उसकी विजय प्राप्ति को स्थापित करे जो उसका अनादर करने और उसे अपमानित करने के लिए निर्धारित की गई थीं। गतसमनी के बगीचे में यीशु को बन्दी बना लिए जाने पर विचार करें। उसने अपनी इच्छा से किन्तु अधिकारपूर्वक आत्मसमर्पण किया और संसार के उद्धारकर्ता के रूप में अपनी महिमा को प्रकट किया। एक समय ऐसा था जब लोग यीशु पर एक राजा का मुकुट थोपना चाहते थे, परन्तु वह पीछे हट गया था क्योंकि वह जानता था कि सांसारिक राजपद उसके लिए नहीं था (यूहन्ना 6:15)। यहाँ जब सैनिक उस पर एक क्रूस थोपने आए, तो वह जानता था कि आगे क्या-क्या आने वाला था। वे निश्चित रूप से यह उम्मीद कर रहे थे कि इस कुख्यात गलीली बढ़ई को ढूँढने के लिए दूर-दूर तक जाना पड़ेगा। इसके विपरीत, यहाँ वह स्वेच्छा से आत्मसमर्पण कर रहा था, उसकी वाणी में ऐश्वर्य था, उसकी आँखों में एक भाव था और जिस प्रकार उसने अपने आप को प्रस्तुत किया था, उस उपस्थिति ने उस क्षण की गम्भीरता को बढ़ा दिया था। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि वे “पीछे हटकर भूमि पर गिर पड़े।”

जब यीशु ने उन लोगों के सामने आत्मसमर्पण किया जो उसे ईश-निन्दक और अपराधी मानते थे, तो उसने अपनी पहचान का इनकार नहीं किया। सच यह है कि उसने ऐसी भाषा का उपयोग किया जो उसकी दिव्य पहचान और अधिकार को व्यक्त करती थी। यीशु ने “मैं हूँ” वाक्यांश का प्रयोग न केवल सैनिकों को यह बताने के लिए किया कि वही नासरत का यीशु था, अपितु इस वाक्यांश से उसने अपनी पहचान उस परमेश्वर के रूप में भी दिखाई जो मूसा के सामने जलती झाड़ी में प्रकट हुआ था (निर्गमन 3:14)। यह वही वाक्यांश था जिसके कारण कुछ महीनों पहले उसको लगभग पथराव किए जाने की स्थिति पर पहुँचा दिया था (यूहन्ना 8:58-59), क्योंकि यह एक स्पष्ट दावा था कि वह स्वयं सर्व-विद्यमान, जीवित परमेश्वर था।

अब यहाँ यह परमेश्वर है, जो आगे बढ़कर अपने मित्रों को विरोध करने से रोक रहा है और अपने शत्रुओं को अपनी हत्या कर देने की अनुमति दे रहा है। क्यों? जब मसीह बगीचे में सामने आया तो वह न केवल अपने चेलों की रक्षा कर रहा था अपितु अपने लोगों के लिए प्रावधान भी कर रहा था। वह पापी मनुष्यों के बदले में सामने आया, उस सब की पूर्ति के रूप में जिसकी लम्बे समय से आशा की जा रही थी। वह जानता था कि वह किस ओर कदम बढ़ा रहा था, और वह यह था, “मसीह ने भी, अर्थात् अधर्मियों के लिए धर्मी ने, पापों के कारण एक बार दुख उठाया, ताकि हमें परमेश्‍वर के पास पहुँचाए” (1 पतरस 3:18)।

अपने आत्मसमर्पण और दिव्य अधिकार के संयोजन में मसीह ने क्रूस की ओर अगला कदम बढ़ाया, जहाँ उसके बलिदान ने हमारे उद्धार को जीत लिया। वह क्रूस से भागा नहीं, बल्कि दृढ़ता से उसकी ओर बढ़ा। और उसने यह आपके लिए किया।

यह बहुत ही अद्भुत बात है,

लगभग इतनी अद्भुत कि यह हो भी सके,

कि परमेश्वर का अपना पुत्र स्वर्ग से आए,

और मेरे जैसे बच्चे को बचाने के लिए मर जाए। [1]    
यूहन्ना 18:1-14