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30 सितम्बर : पवित्रता का मार्ग

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30 सितम्बर : पवित्रता का मार्ग
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“क्योंकि यदि तुम शरीर के अनुसार दिन काटोगे तो मरोगे, यदि आत्मा से देह की क्रियाओं को मारोगे तो जीवित रहोगे।” रोमियों 8:13

आपकी पवित्रता महत्त्वपूर्ण है।

पुराने नियम में “पवित्र” शब्द सदा नैतिक अवस्था को ही नहीं दर्शाता; प्रायः वह एक सम्बन्ध को दर्शाता है। नगरों को पवित्र नगर कहा गया है, पात्रों को पवित्र पात्र, और भवनों को पवित्र स्थान कहा गया है। इसका अर्थ यह है कि वे परमेश्वर के साथ एक विशेष सम्बन्ध में खड़े थे। और उद्धार में भी ऐसा ही है: हमें परमेश्वर के साथ एक विशेष सम्बन्ध में रखा गया है। हमें एक पवित्र उपयोग के लिए अलग किया गया है।

यदि आप विवाहित हैं, तो सम्भव है कि अपने जीवनसाथी के साथ जिस सम्बन्ध का आप अब आनन्द लेते हैं, उससे पहले आपके अन्य सम्बन्ध रहे हों। मेरा विवाह 1975 की गर्मियों में हुआ था। उस दिन, मेरे अतीत के जितने भी रोमांटिक सम्बन्ध थे, वे सब समाप्त हो गए—पूरी तरह खत्म हो गए—क्योंकि मैं अपनी पत्नी के साथ एक हो गया। मैं नया बन गया। मैं विवाह में एक व्यक्ति के रूप में आया; और विवाहित होकर निकला। मेरी पत्नी और मैं एक-दूसरे के लिए अलग किए गए, उन प्रतिज्ञाओं के द्वारा, उस वाचा के द्वारा, जो हमने एक-दूसरे से बाँधी।

हम प्रभु यीशु मसीह से प्रतिज्ञाएँ बाँधकर फिर उसके साथ मनचाहा व्यवहार नहीं कर सकते। हम पवित्रता के विषय में हल्कापन नहीं बरत सकते। क्यों? क्योंकि पवित्रता के बिना “कोई प्रभु को कदापि न देखेगा” (इब्रानियों 12:14)। प्रेरित पौलुस यहाँ तक कहता है कि “आत्मा से देह की क्रियाओं को मारो।” प्यूरिटनों ने इसे “शरीर का मरण” कहा। और यह मरण अपने आप नहीं हो जाता। यह अनजाने में नहीं होता। यह निकट सम्पर्क के प्रभाव की प्रक्रिया नहीं है। इसके बजाय, हमें भय और काँपते हुए अपने उद्धार के कार्य को प्रकट करने का परिश्रम के साथ दिन-प्रतिदिन अभ्यास करना है (फिलिप्पियों 2:12)। हमें आत्मा की प्रेरणा और सामर्थ्य चाहिए, जो हमें स्मरण दिलाए कि हमें सोच-समझकर और सचेत रूप से अपने पापों पर शोक करना है, उनसे मन फिराना है, उन्हें छोड़ना है, और अपने प्रभु की आज्ञा मानने का प्रयत्न करना है—और यह केवल उन पापों के साथ ही नहीं जो स्पष्ट और प्रकट हैं, बल्कि उन भीतरी पापों के साथ भी करना है, जैसे ईर्ष्या, घमण्ड, द्वेष, कपट, और आत्म-धार्मिकता। वह एक अद्‌भुत दिन होता है जब परमेश्वर हमें उस पाप की कुरूपता दिखाता है जो हमारे भीतर बसा हुआ रहा है और हमें उससे निपटने के लिए प्रेरित करता है। पाप से निपटने का यही मार्ग है: निर्दयता, तुरन्त, और निरन्तर।

जब सच्ची पवित्रता हमारे जीवन में जड़ पकड़ने लगती है, तो वह हमें न्यायप्रिय या कठोर नहीं बनाती। वह तो कर्मकाण्डवाद है, जहाँ हम नियमों के पालन के गर्व के लिए अपने आप को अलग करते हैं; यह पवित्रता नहीं है, जहाँ हम परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए अलग किए जाते हैं। इसके विपरीत, पवित्रता अपने आप को अनुग्रह, मधुरता, और भलाई में प्रकट करती है। इस प्रकार पवित्रता आकर्षक होती है। जब हम उसे दूसरों में देखते हैं—चाहे हम उसे पवित्रता कहें या न कहें—तो हम उसकी ओर खिंचते हैं और उसके लिए लालायित होते हैं। और पवित्रता सम्भव है, क्योंकि प्रभु यीशु ने हमारे शरीर की दुर्बलताओं के लिए मृत्यु सही और अपनी आत्मा को हमारे भीतर वास करने के लिए भेजा, ताकि हम पाप से संघर्ष करें और अनन्त जीवन की ओर चलें।

उस पवित्रता का मार्ग इस बात पर मनन करने से प्रकट होता है कि यीशु ने हमारे लिए क्या-क्या अद्‌भुत कार्य किए हैं। उस मार्ग पर विचार करें। यीशु से प्रार्थना करें कि वह उसे आपके लिए इस प्रकार वास्तविक बना दे, जैसा वह पहले कभी न रहा हो। और जब आप चलते जाएँ, तो अपनी आँखें “विश्‍वास के कर्ता और सिद्ध करने वाले” यीशु पर स्थिर रखें (इब्रानियों 12:2)।

  रोमियों 6:1–11

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 24–26; यूहन्ना 13:21-38

29 सितम्बर : विश्वास और भय के बीच

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29 सितम्बर : विश्वास और भय के बीच
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“‘मेरे हाथ और मेरे पाँव को देखो कि मैं वही हूँ। मुझे छूकर देखो, क्योंकि आत्मा के हड्डी माँस नहीं होता जैसा मुझ में देखते हो।’ यह कहकर उसने उन्हें अपने हाथ पाँव दिखाए। जब आनन्द के मारे उनको प्रतीति न हुई, और वे आश्चर्य करते थे, तो उसने उनसे पूछा, ‘क्या यहाँ तुम्हारे पास कुछ भोजन है?’” लूका 24:39-41

चेले वास्तविक लोग थे—और उनके लिए पुनरुत्थान पर विश्वास करना कठिन था। यीशु के पुनरुत्थान का समाचार उनके भीतर भावनाओं का उतार-चढ़ाव ले आया। एक क्षण वे शिखर पर प्रतीत होते थे, और अगले ही क्षण भूमि की ओर गिरते हुए दिखते थे। खाली कब्र की खबर को विस्मय और अविश्वास की मिली-जुली भावनाओं से ग्रहण किया गया। वास्तव में, जिन स्त्रियों को यह सबसे पहले पता चला था, उनके शब्द उन्हें “कहानी सी जान पड़ीं, और उन्होंने उनकी प्रतीति न की” (लूका 24:11)।

यहाँ तक कि जब यीशु अचानक प्रकट होकर उनके बीच खड़ा हुआ, तब भी उनके शोक शान्त न हुए और उनके भय दूर न हुए। इसके विपरीत, हम पाते हैं कि वे अब भी घबराए हुए थे। पुनरुत्थित मसीह का सामना करके “वे घबरा गए और डर गए, और समझे कि हम किसी भूत को देख रहे हैं” (लूका 24:37)। यीशु द्वारा अपने हाथ और पाँव दिखाने के बाद भी वे उस अविश्वास से जूझते रहे जो उभरते हुए आनन्द से टकरा रहा था।

यह कितना ईमानदार चित्र है, है न? यहाँ हम उन लोगों के समूह को देखते हैं जो कलीसिया के स्तम्भ बनने वाले थे, और जो मूलतः सामान के पीछे छिपे हुए और अलमारियों से बाहर झाँकते हुए कह रहे थे, हमें लगा कि हमने भूत देखा है!

भय और अविश्वास के विरुद्ध चेलों का संघर्ष उन लोगों के लिए बड़ा उत्साह है जो आशा और निराशा के बीच झूलते रहते हैं। यह एक बात है कि हम किसी सुहावने रविवार की सुबह मसीहियों की भीड़ के बीच पुनरुत्थान में अपने विश्वास की घोषणा करें। परन्तु यह बिलकुल दूसरी बात है कि किसी कठिन मंगलवार की दोपहर को हम इसे दृढ़ता के साथ उन लोगों के बीच ऐलान करें जो इसे व्यर्थ कथा मानते हों, या जब हम डॉक्टर के कक्ष में जाँच के परिणामों की प्रतीक्षा कर रहे हों, या अकेलेपन से जूझ रहे हों।

एक सच्चा मसीही वह नहीं है जिसे कभी सन्देह न हो; बल्कि सच्चा मसीही वह है जो अपने सन्देहों को खाली कब्र के तथ्य के सामने लाता है और स्वयं को स्मरण दिलाता है कि हमारा विश्वास ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित है, और वे घटनाएँ हमें आनन्दित होने और परमेश्वर पर आश्चर्य करने के लिए प्रेरित करती हैं। यदि आज आप भय और अविश्वास के संघर्ष में हैं, तो परमेश्वर को पुकारें, और मरकुस 9 के उस मनुष्य की प्रार्थना करें: “मैं विश्‍वास करता हूँ, मेरे अविश्वास का उपाय कर!” (मरकुस 9:24)। चेलों के सन्देह और भय ने उन्हें परमेश्वर के राज्य से बाहर नहीं कर दिया; न ही उन्होंने उन्हें परमेश्वर के राज्य के काम से वंचित कर दिया। इसलिए आज परमेश्वर से विनती करें कि वह आपके विश्वास की रक्षा करे, और आगे बढ़ते हुए चलें, यह स्मरण रखते हुए कि यीशु सचमुच जी उठा है और उसके पास आपके लिए सचमुच काम है।

  1 कुरिन्थियों 15:50–58

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 22–23; यूहन्ना 13:1-20 ◊

28 सितम्बर : परमेश्वर की बुद्धि

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28 सितम्बर : परमेश्वर की बुद्धि
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“देखो, मैंने केवल यह बात पाई है कि परमेश्‍वर ने मनुष्य को सीधा बनाया, परन्तु उन्होंने बहुत सी युक्तियाँ निकाली हैं।” सभोपदेशक 7:29

एक बार मुझे एक युवक का पत्र मिला, जिसने अमेरिका और ब्रिटेन दोनों के विश्वविद्यालयों में सर्वोच्च शिक्षा प्राप्त की थी। उस पत्र में उसने लिखा, “मुझे कहना होगा कि संसार की सारी शिक्षा ने मुझे सबसे मूर्ख और अज्ञान मनुष्य बना दिया है।” ऐसे विद्वान से ऐसे शब्द सुनना कठिन लगता है—परन्तु वास्तव में, वह इतना जानता था कि समझ सके कि मूर्खता का सम्बन्ध मानसिक क्षमता से नहीं, बल्कि नैतिक विद्रोह से है।

मानवीय मूर्खता हमारे उस परमेश्वर के विरुद्ध अवज्ञाकारी स्वभाव से उत्पन्न होती है जो सच्ची बुद्धि और प्रकाश का एकमात्र स्रोत है। ऐसा विद्रोह परमेश्वर और दूसरों से अलगाव का कारण बनता है। और क्योंकि परमेश्वर को पाप का दण्ड देना ही होता है, इसलिए मनुष्य की मूर्खता दोषारोपण की ओर ले जाती है। हमें “सीधा” बनाया गया था, परन्तु हम आत्म-निर्भर और आत्म-प्रशंसा से भरी युक्तियों की ओर झुक जाते हैं। हम विकृत और अवरुद्ध हो जाते हैं क्योंकि हम अपने सृष्टिकर्ता के लिए जीने के स्थान पर अपने लिए जीते हैं। इस प्रकार हम बहुत कुछ जान सकते हैं, फिर भी कुछ नहीं जानते। फिर भी, हमारी इस निराशाजनक स्थिति में, परमेश्वर की बुद्धि प्रभु यीशु मसीह में हमारे लिए प्रकट की गई है (कुलुस्सियों 2:2-3)। यह बुद्धि तभी हमारी बनती है जब हम उसे अपना परमेश्वर और उद्धारकर्ता मानकर उस पर विश्वास करते हैं, क्योंकि “यहोवा का भय मानना बुद्धि का मूल है” (नीतिवचन 1:7, बल दिया गया है)। परमेश्वर का आत्मा हमें हमारे पुराने जीवन के मार्ग से फिरने और एक नई यात्रा आरम्भ करने में समर्थ बनाता है। जब हम मन फिराकर उसकी ओर लौटते हैं, तब प्रभु हमें हमारी पापमयता में भी स्वीकार करता है। और फिर, अपनी महान शक्ति से वह हमें अपने अनुग्रह के द्वारा बदल देता है।

यही परमेश्वर की बुद्धि है। यह आपको किसी आत्म-सहायता की पुस्तक में नहीं मिलेगी। यह आपको केवल धर्म या दर्शनशास्त्र में नहीं मिलेगी। यह आपको श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में भी नहीं मिलेगी। वे सब बन्द गलियाँ हैं। यह आपको केवल यीशु मसीह में ही मिलेगी, जो आपकी बुद्धि और धार्मिकता बनने की पेशकश करता है। अपनी मूर्खता में हम सब उससे दूर भागे हैं जिसने हमें बनाया है—परन्तु उसने हमारा पीछा किया, हमें हमारी दशा बताई, और अपने पुत्र को हम पर प्रकट करने का निश्चय किया। परमेश्वर की अनन्त बुद्धि और अद्‌भुत अनुग्रह के लिए उसकी स्तुति करने के लिए समय निकालें! और फिर यह विचार करें: यदि आप अपने जीवन के सभी निर्णय और दिशा “यहोवा का भय” मानने से आरम्भ करते, न कि मनुष्य की युक्तियों से, तो क्या कुछ बदलना न पड़ता?

  कुलुस्सियों 2:1-4

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 20–21; यूहन्ना 12:27-50

27 सितम्बर : रहस्यमय प्रावधान

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27 सितम्बर : रहस्यमय प्रावधान
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“दूसरे दिन हम ने सैदा में लंगर डाला, और यूलियुस ने पौलुस पर कृपा करके उसे मित्रों के यहाँ जाने दिया कि उसका सत्कार किया जाए।” प्रेरितों 27:3

प्रेरितों 7:58 में लिखा है कि तरसुस का शाऊल उन लोगों के वस्त्रों की रखवाली कर रहा था जो सर्वप्रथम शहीद स्तिफनुस का पथराव कर रहे थे। इसके तुरन्त बाद, शाऊल (जो बाद में पौलुस कहलाया) उस उत्पीड़न का अगुवा बना जिसके कारण मसीही लोग यरूशलेम से तितर-बितर होकर आस-पास के प्रदेशों में भाग गए और उनके साथ सुसमाचार भी फैलता गया (प्रेरितों 8:3-4)! और फिर शाऊल का मन-परिवर्तन हुआ: जब वह “प्रभु के चेलों को धमकाने और घात करने की धुन में था” (प्रेरितों 9:1), तभी मसीह उसे विश्वास में ले आया और उसे प्रेरित नियुक्त किया।

इस प्रकार प्रेरितों 27:3 तक, शाऊल के—जो अब केवल पौलुस कहलाता था—सैदा में मसीही मित्र थे, जो सम्भवतः उस समुदाय के सदस्य थे जो स्तिफनुस की मृत्यु के बाद हुए उत्पीड़न और बिखराव के समय उस नगर में स्थापित थे। सैदा में पौलुस के लिए उपलब्ध मित्र वहाँ इसलिए थे क्योंकि तरसुस का शाऊल इतना भयानक उत्पीड़क रहा था। सचमुच, परमेश्वर “अपने आश्चर्यकर्म करने के लिए रहस्यमय रीति से कार्य करता है।”[1]

यदि हम उन लोगों में होते जिन्हें शाऊल ने सताया था, तो सम्भव है कि हम उनके विलाप में शामिल होते और कहते, हे प्रभु, हम सब तितर-बितर हो रहे हैं। हमारे परिवार बिखर रहे हैं। हमारे समुदाय टूट रहे हैं। क्या यह भयानक और दुखद बात नहीं है? उनके दृष्टिकोण से यह निश्चय ही ऐसा प्रतीत होता। फिर भी, इतनी बड़ी त्रासदी के बीच हम परमेश्वर के रहस्यमय प्रावधान को देखते हैं: पौलुस स्वयं—जो अब मसीही था—उसी नगर की कलीसिया से मसीही कृपा प्राप्त कर रहा था, जो आंशिक रूप से इसलिए अस्तित्व में आई थी क्योंकि वह स्वयं इतना दृढ़ उत्पीड़क रहा था।

समय आने पर, हमारे वर्तमान जीवन की उलझी हुई गड़बड़ियाँ, हमारी कठिनाइयाँ और निराशाएँ, सब अपने उचित परिप्रेक्ष्य में रखी जाएँगी। हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि…

जो वह आशीष देता है वही हमारा भला है,

और जो आशीष-रहित भला है वह बुरा है;

और जो सबसे गलत प्रतीत होता है वह भी सही है,

यदि वह उसकी मधुर इच्छा हो! [2]

पौलुस के जीवन की यह छोटी-सी घटना उस सत्य को दोहराती है जिसे यूसुफ ने अपने भाइयों से उस समय कहा था जब उन्होंने उसे मिस्र में बेचने के लिए उससे क्षमा माँगी थी: “यद्यपि तुम लोगों ने मेरे लिए बुराई का विचार किया था; परन्तु परमेश्‍वर ने उसी बात में भलाई का विचार किया” (उत्पत्ति 50:20)। परमेश्वर मनुष्यों की बुरी मनशाओं को भी अपनी सन्तान के लिए अपनी योजनाओं की पूर्ति में सम्मिलित कर सकता है। वह विश्वासयोग्य और अपरिवर्तनशील है। उसके रहस्यमय प्रावधान में शान्ति पाएँ, यह जानते हुए कि वह आप पर ऐसा कुछ भी नहीं आने देगा जिसे अन्ततः आपके भले और उसकी महिमा के लिए उपयोग न किया जाए।

  उत्पत्ति 45:4-15

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 18–19; यूहन्ना 12:1-26 ◊


[1] विलियम कूपर, “गॉड मूव्स इन अ मिस्टीरियस वे” (1774).

[2] फ़्रेडरिक डब्ल्यू. फ़ैबर, “आई वर्शिप दी, स्वीट विल ऑफ़ गॉड” (1849).

26 सितम्बर : जीवन का मुकुट

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26 सितम्बर : जीवन का मुकुट
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“धन्य है वह मनुष्य जो परीक्षा में स्थिर रहता है, क्योंकि वह खरा निकलकर जीवन का वह मुकुट पाएगा जिसकी प्रतिज्ञा प्रभु ने अपने प्रेम करने वालों से की है।” याकूब 1:12

आवश्यक कक्षाएँ लिए बिना स्नातक होने की चाहत रखना आसान है। परन्तु कक्षाएँ लिए बिना परीक्षा के लिए तैयार होना सम्भव नहीं, और परीक्षा के बिना स्नातक होना सम्भव नहीं। जो बात शिक्षा के क्षेत्र में सत्य है, वह हमारे विश्वास के विषय में भी सत्य है: यह सोचना मूर्खता होगी कि हम मसीही जीवन में आवश्यक पाठ्यक्रम लिए बिना और परीक्षाओं से गुज़रे बिना परिपक्वता और पूर्णता तक पहुँच सकते हैं।

जब याकूब उस विश्वासी के विषय में लिखता है जिसने “खरा निकलकर” स्थिरता दिखाई है, तो वह dokimos शब्द का प्रयोग करता है, जिसका अर्थ है—परखा हुआ, ताया हुआ और स्वीकृत। ऐसे व्यक्ति के जीवन पर परमेश्वर की स्वीकृति की मुहर होती है, और यह उसकी स्थिरता के द्वारा और अधिक स्पष्ट होती जाती है।

“जीवन का वह मुकुट” या अधिक सटीक रूप से वह मुकुट जो जीवन से बना है, “अनन्त जीवन का चित्र”[1] है, जिसे देने की प्रतिज्ञा परमेश्वर ने अपने लोगों से की है। यह इस विचार को दर्शाता है कि समापन रेखा पर परमेश्वर हमारा स्वागत करेगा और हमें सम्मान, आशीष और अनन्त जीवन का मुकुट पहनाएगा। इसलिए परीक्षा की अवधि हमारे सारे जीवन की अवधि है। हमारी परीक्षा तब तक चलती है जब तक मसीह लौट नहीं आता या हमें अपने पास नहीं बुला लेता—और इसलिए यह अन्त तक स्थिर रहने का बुलावा है।

यही दृष्टिकोण और यह प्रतिज्ञा हमारे जीवन की सबसे कठिन घड़ियों का सामना करने के ढंग को बदल देती है। हम अक्सर व्यक्तिगत परीक्षाओं को घुसपैठिए मानते हैं और उन्हें “आनन्द की बात” नहीं समझते (याकूब 1:2)। परन्तु जब हम समझ जाते हैं कि हमारा पूरा जीवन ही परीक्षाओं की एक शृंखला है, तो यह हमें आश्वस्त करता है और हमें यथार्थवादी दृष्टि से अपने अनुभवों पर विचार करने का अवसर देता है। हम निश्चय के साथ जान सकते हैं कि भविष्य में हमारे लिए यीशु के साथ अनन्त जीवन का मुकुट धरा है, और हमारी परीक्षाएँ धीरज सीखने और मसीह के समान बनने के अवसर हैं, जो संसार को यह घोषित करता है कि जिसकी ओर हम बढ़ रहे हैं, वह न केवल जीवन के लिए, बल्कि आनन्द के लिए भी पर्याप्त है।

मसीही जीवन में वास्तविकता से पहले कोई अभ्यास-चरण नहीं है; यह हर समय, हर दिन, वास्तविक अनुभव है। हमें यह जानने का अवसर नहीं मिलता कि हम अपने बच्चों का पालन-पोषण कैसे करेंगे, किसी प्रियजन की अचानक मृत्यु से कैसे निपटेंगे, या जो कुछ भी हमारे सामने आएगा उस पर कैसे प्रतिक्रिया देंगे—जब तक कि वे बातें वास्तव में हमारे सामने न आ जाएँ। यही वे वास्तविक जीवन की कक्षाएँ हैं जिन्हें हमें आत्मिक परिपक्वता की उपाधि पाने के लिए लेना होता है। आज आप किन परीक्षाओं से गुजर रहे हैं? ये वही कक्षाएँ हैं—भले ही आपने इन्हें चुना न हो—जिनके द्वारा प्रभु जानता है कि आप स्थिर रहना सीखेंगे और अपने मुकुट के लिए तैयार होंगे। आज तूफानों में उसकी कृपा से स्थिर रहते हुए स्मरण रखें कि आप “धन्य” हैं—अभी एक आसान जीवन की झूठी आशीष से नहीं, बल्कि आने वाले “जीवन के मुकुट” की अनन्त आशीष से।

  याकूब 1:2-4

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 16–17; यूहन्ना 11:28-57


[1] डेरेक प्राइम, फ्रॉम ट्रायल्स टू ट्रायम्फ्स (रीगल, 1982), पृ. 28.

25 सितम्बर : धन्य त्रिएकता

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25 सितम्बर : धन्य त्रिएकता
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“उस समय जो कोई यहोवा से प्रार्थना करेगा, वह छुटकारा पाएगा।” योएल 2:32

कुछ ऐसे “बाइबल-आधारित” शब्द हैं जो वास्तव में बाइबल में शब्दशः नहीं मिलते। उदाहरण के लिए, आपको अपनी बाइबल में प्रतिस्थापन शब्द नहीं मिलेगा, फिर भी यह शब्द उस सौन्दर्य को व्यक्त करता है जो तब हुआ जब परमेश्वर के पुत्र ने पापियों के स्थान पर मृत्यु सही। इसी प्रकार, त्रिएकता शब्द भी पवित्रशास्त्र में नहीं मिलता, फिर भी यह इस सत्य का प्रतिनिधित्व करता है कि परमेश्वर कौन है। और यह जिस सत्य को व्यक्त करता है, वह अद्‌भुत है।

त्रिएकता के सिद्धान्त की अद्‌भुतता इस तथ्य से और बढ़ जाती है कि यह शिक्षा ऐसे विश्वास से उत्पन्न हुई जो परमेश्वर की एकता के प्रति पूर्णतः समर्पित था। परमेश्वर के एक होने का सत्य पुराने नियम के विश्वासियों के लिए मूलभूत था। वह पद जो इब्रानी विश्वास के एकेश्वरवादी हृदय को व्यक्त करता है और जिसे हर यहूदी कण्ठस्थ जानता था, यह घोषणा करता है: “यहोवा हमारा परमेश्‍वर है, यहोवा एक ही है” (व्यवस्थाविवरण 6:4)। उद्धार इसी एक परमेश्वर में पाया जाता है: “जो कोई यहोवा से प्रार्थना करेगा, वह छुटकारा पाएगा।” परमेश्वर की एकता का सत्य पुरानी वाचा के लोगों की सोच में कितनी गहराई से रचा-बसा था, उस पर जितना बल दिया जाए उतना कम है।

यह तब भी सत्य था जब यरूशलेम में प्रारम्भिक कलीसिया का जन्म हुआ। पतरस और पौलुस जैसे लोगों के लिए परमेश्वर की एकता एक स्वयं-सिद्ध सत्य थी। इसलिए उनके लिए यह समझना, कि वही एक परमेश्वर तीन व्यक्तियों में विद्यमान है, तभी सम्भव था जब परमेश्वर ने स्वयं को उन पर इस प्रकार प्रकट किया। और ठीक यही यीशु मसीह के माध्यम से हुआ, जिसने पापों को क्षमा करने का अधिकार जताया और उस अधिकार की पुष्टि ऐसे कार्य करके की, जो केवल परमेश्वर ही कर सकता है (मरकुस 2:1-12)। इस प्रकार यीशु ने स्वयं को दिव्य पिता का दिव्य पुत्र प्रकट किया, और वे दोनों अपने लोगों के पास दिव्य आत्मा को भेजने जा रहे थे (यूहन्ना 14:23-26)। फिर स्वर्गारोहण से पहले, इसी यीशु ने अपने चेलों को आज्ञा दी कि वे सब जातियों को चेला बनाएँ और उन्हें एक ही नाम में बपतिस्मा दें, जो तीन व्यक्तियों—परमेश्वर पिता, परमेश्वर पुत्र, और परमेश्वर पवित्र आत्मा—का प्रतिनिधित्व करता है (मत्ती 28:19-20)। चेले समझ गए थे कि पुराने नियम का यहोवा इसी यीशु में उनके साथ था। मछली पकड़ते समय वह उनके साथ था, उसके चरणों में बैठ चुके थे, और उसके अद्‌भुत काम देख चुके थे। और वे समझ गए थे कि जब वे लोगों से उद्धार के लिए यहोवा का नाम लेने का आग्रह करते हैं, तो वे वास्तव में यीशु मसीह का नाम लेने का आग्रह कर रहे हैं (प्रेरितों 2:21; रोमियों 10:13)।

चेलों के लिए यह समझ पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा आई, जब उन्होंने यीशु की शिक्षाओं और उसके कार्यों पर मनन किया। हमारे लिए यह समझ तब आती है जब हम पवित्रशास्त्र पर मनन करते हैं और पवित्र आत्मा उन पृष्ठों को हमारे लिए प्रकाशित कर देता है। फिर भी, परमेश्वर के त्रिएक स्वरूप का सत्य केवल बौद्धिक अभ्यास के लिए नहीं है; इसे हमारे हृदयों को भी हमारे विशाल, रहस्यमय और महान परमेश्वर की आराधना से भर देना चाहिए, जो फिर भी हमारे निकट आता है। और चेलों की तरह यह हमें भी इस अविश्वासी संसार में साहस के साथ जाने के लिए प्रेरित करे, इस विश्वास के साथ कि यह त्रिएक परमेश्वर—पिता, पुत्र और आत्मा—सुसमाचार के प्रचार के द्वारा लोगों को अपनी ओर खींचेगा।

  योएल 2:21-32

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 14–15; यूहन्ना 11:1-27 ◊

24 सितम्बर : समीप आना

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24 सितम्बर : समीप आना
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“तो आओ, हम सच्चे मन और पूरे विश्‍वास के साथ, और विवेक का दोष दूर करने के लिए हृदय पर छिड़काव लेकर, और देह को शुद्ध जल से धुलवाकर परमेश्‍वर के समीप जाएँ।” इब्रानियों 10:22

पुरानी वाचा के अधीन रहने वाली परमेश्वर की विशाल प्रजा के लिए परमेश्वर तक पहुँच केवल महायाजक के द्वारा ही सम्भव थी। केवल वही किसी भी प्रकार की निकटता के भाव के साथ परमेश्वर के पास शारीरिक रूप से जा सकता था—और वह भी वर्ष में केवल एक बार, प्रायश्चित्त के दिन! इसलिए इब्रानियों के लेखक का अपने पाठकों को प्रार्थना में परमेश्वर के “समीप आने” के लिए प्रेरित करना नाटकीय और क्रान्तिकारी था।

ऐसा क्या हुआ जिसने परमेश्वर के पास आने के तरीके में इतना गहरा परिवर्तन ला दिया? संक्षेप में उत्तर है—कलवरी। जब “यीशु ने फिर बड़े शब्द से चिल्लाकर प्राण छोड़ दिए। और देखो, मन्दिर का परदा ऊपर से नीचे तक फटकर दो टुकड़े हो गया” (मत्ती 27:50-51)। पुरानी वाचा के अधीन यह परदा परमेश्वर की उपस्थिति तक पहुँच को रोकता था—परन्तु अब वह बाधा नष्ट कर दी गई थी। अब मसीह की प्रायश्चितकारी मृत्यु के आधार पर स्त्री और पुरुष सीधे परमेश्वर की उपस्थिति में प्रवेश कर सकते थे। अब वे उस परमेश्वर के निकट आ सकते थे जो अपनी पवित्रता में महान है, और जिसकी उपस्थिति में कोई पापी जीवित नहीं रह सकता था—जब तक कि कलवरी पर यीशु की मृत्यु न हुई।

तो हमें लेखक के इस निमन्त्रण का उत्तर कैसे देना चाहिए? पहला, हमें विश्वास के साथ निकट आना चाहिए। लेखक अपने उपदेश की भूमिका इस वाक्य से करता है: “जब हमें . . . पवित्रस्थान में प्रवेश करने का हियाव हो गया है” (इब्रानियों 10:19)। जहाँ पहले परमेश्वर के पास हमारा आना सदा संकोचपूर्ण और भय से भरा होता था, अब हम “यीशु के लहू” (पद 19) के आधार पर विश्वास और महान आनन्द के साथ निडर होकर आ सकते हैं।

दूसरा, हमें कृतज्ञता के साथ निकट आना चाहिए। हमें इस अद्‌भुत सत्य को पहचानना चाहिए कि हम सीधे उसकी उपस्थिति में आ सकते हैं। हमें लापरवाही या हल्केपन से निकट नहीं आना है, क्योंकि “नए और जीवते मार्ग” (इब्रानियों 10:19) को खोलने के लिए परमेश्वर के पुत्र की मृत्यु से कीमत चुकाई गई है। इसलिए हमें दीनता और श्रद्धा के साथ धन्यवाद करते हुए उसके पास आना है।

जैसा कि फ्रांज डेलिट्श कहते हैं, पुराने नियम का मार्ग “केवल एक निर्जीव पथ था जिस पर केवल महायाजक चलता था,”[1] परन्तु जिस मार्ग पर हम अब चलते हैं, वह सचमुच नया और जीवित है। परमेश्वर का धन्यवाद हो कि अब हम यीशु के द्वारा इस पूर्ण निश्चय के साथ निकट आते हैं कि हमारे सृष्टिकर्ता ने हमें स्वीकार किया है। क्या आप अपने पाप की जागरूकता के कारण सर्वशक्तिमान पिता से प्रार्थना करने में संकोच कर रहे हैं? निश्चय जानिए कि यीशु के लहू ने उसे ढाँप दिया है। क्या आप यह समझते हैं कि परमेश्वर के स्वीकार किए जाने के लिए आपको पहले अपने काम सुधारने और अपने अच्छे काम प्रस्तुत करने होंगे? स्पष्ट जानिए कि परदा फट चुका है और यीशु ने सब कुछ पूरा कर दिया है। क्या आप उदासीनता या व्यस्तता के कारण परमेश्वर के निकट आना छोड़ देते हैं? स्मरण रखें कि यीशु ने आपको यह विशेषाधिकार देने के लिए मृत्यु सही। कलवरी के कारण हम आज निडर और कृतज्ञ आनन्द के साथ समीप आ सकते हैं और हमें आना भी चाहिए।

  इब्रानियों 12:18-24

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 11–13; यूहन्ना 10:22-42


[1] कॉमेण्ट्री ऑन द एपिस्टल टू द हिब्रूज़, अनुवादक थॉमस एल. किंग्सबरी (एडिनब्रा, 1870), 2:171.

23 सितम्बर : ईर्ष्या पर कैसे विजय पाएँ

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23 सितम्बर : ईर्ष्या पर कैसे विजय पाएँ
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“क्रोध तो क्रूर, और प्रकोप धारा के समान होता है, परन्तु जब कोई जल उठता है, तब कौन ठहर सकता है।” नीतिवचन 27:4

ईर्ष्या मानवजाति के आरम्भ से ही हमारे पतन का कारण रही है।

उत्पत्ति 4 में कैन ने अपने भाई हाबिल से ईर्ष्या के फलस्वरूप उसकी हत्या कर दी। यद्यपि यह सोचना आसान है कि यह कथा हम पर लागू नहीं होती, क्योंकि हमारा हत्या का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और न ही हम ऐसा कुछ करने का प्रलोभन रखते हैं, फिर भी हम बिना हाथ उठाए भी उन लोगों का विनाश कर सकते हैं जिनसे हम ईर्ष्या करते हैं—कभी तीखे शब्दों से, तो कभी कोई आशीष रोक कर। इतना ही नहीं, यदि ईर्ष्या को हमारे हृदय में अनदेखा छोड़ दिया जाए, तो वह हमें कुचल देगी और पराजित कर देगी।

ईर्ष्या तब पनपती है जब दूसरों को हमसे अधिक मिलता है या वे हमसे बेहतर उपलब्धि प्राप्त करते हैं। यह हमारे मन में तब भी प्रवेश कर सकती है जब हम ऐसे लोगों के जीवन को देखते हैं जिन्हें हम ठीक से जानते भी नहीं, केवल इसलिए कि हमें लगता है कि उनके पास कोई ऐसा लाभ है जो हमारे लिए उपलब्ध नहीं है। जब कोई अन्य व्यक्ति सफलता या अच्छी प्रतिष्ठा के कारण आनन्दित होता है, तो ईर्ष्या हमारे भीतर अपने लिए एक प्रकार के दुख के रूप में प्रकट हो सकती है, जिसमें दूसरे के लिए कोई हर्ष नहीं होता। उड़ाऊ पुत्र के दृष्टान्त पर विचार करें (लूका 15:11–32): जब बड़े भाई ने अपने पिता को अपने भटके हुए छोटे भाई की वापसी पर उत्सव मनाते देखा, तो उसने आनन्द में भाग लेने से इनकार कर दिया। क्यों? क्योंकि यद्यपि उसने कभी अपने पिता की कृपा नहीं खोई थी, फिर भी वह उस आनन्दपूर्ण क्षमा और मान्यता से खिन्न था जो किसी और को दी गई।

ईर्ष्या हमें उन लोगों के प्रति भी शत्रुतापूर्ण बना सकती है जिन्होंने कभी हमें हानि पहुँचाने का इरादा नहीं किया। जब यूसुफ के भाइयों ने देखा कि उनका पिता उनसे अधिक उससे प्रेम करता है, तो “वे उससे बैर करने लगे और उसके साथ ठीक से बात भी नहीं करते थे” (उत्पत्ति 37:4)। अचानक, उनके नाश्ते की मेज़ पर सम्बन्ध टूट गए—और यह यूसुफ की किसी गलती के कारण नहीं हुआ था! उसने जानबूझकर अपने भाइयों को हानि पहुँचाने या उनके जीवन में कोई बाधा उत्पन्न करने के लिए कुछ नहीं किया था, परन्तु वे उससे घृणा करने लगे क्योंकि ईर्ष्या के बीज उनके हृदय में गहराई से बोए गए थे।

ईर्ष्या यह भी नहीं पहचानती कि जब परमेश्वर वरदान बाँटता है, तो वह जानता है कि वह क्या कर रहा है। जब हम किसी और की सफलता से ईर्ष्या करते हैं, तो हम परमेश्वर से कहते हैं, “तुझे समझना चाहिए कि मुझे वहाँ होना चाहिए था . . . मुझे उसके जैसा दिखना चाहिए . . . मेरे पास वह होना चाहिए जो उसके पास है।” परन्तु क्या कुम्हार को मिट्टी से ऐसे प्रश्न सहने पड़ेंगे? (यशायाह 64:8)। हम क्यों सोचते हैं कि हम परमेश्वर की ईश्वरीय बुद्धि पर प्रश्न उठा सकते हैं, जब वह हमारे और दूसरों के साथ व्यवहार करता है? उसने हमें वैसा बनाया है और हमारी परिस्थितियों को ठीक वैसे ही व्यवस्थित किया है जैसा उसे भाया है।

बहुत कम पुरुष या स्त्री होंगे जो किसी न किसी समय, किसी न किसी कारण से, ईर्ष्या से संघर्ष न करते हों। तो फिर इसका उपचार क्या है? पवित्र आत्मा की सहायता से ईर्ष्या को उस पाप के रूप में पहचानना जो वह है, और उससे प्रार्थना करना कि वह हमें प्रतिदिन सोच समझकर और कठोरता से उसे जड़ से उखाड़ने में सहायता दे। और फिर, आत्मा की ही सहायता से हम उस पर विचार कर सकते हैं जो मसीह में हमारे पास है—क्योंकि जब हम उन आत्मिक आशिषों के विषय में सोचते हैं जो उसके द्वारा हमारी हैं, तो ईर्ष्या मुरझा जाती है और उसके स्थान पर सन्तोष बढ़ता है। आज अपने हृदय में ईर्ष्या को बढ़ने न दें—और जहाँ कहीं वह बढ़ चुकी हो, उसे जड़ से उखाड़ फेंकें।

  1 तीमुथियुस 6:6–10

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 8–10; यूहन्ना 10:1-21 ◊

22 सितम्बर : यीशु, आपका मित्र

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22 सितम्बर : यीशु, आपका मित्र
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“मेरी आज्ञा यह है, कि जैसा मैं ने तुम से प्रेम रखा, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो। इससे बड़ा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिए अपना प्राण दे। जो आज्ञा मैं तुम्हें देता हूँ, यदि उसे मानो तो तुम मेरे मित्र हो। अब से मैं तुम्हें दास न कहूँगा, क्योंकि दास नहीं जानता कि उसका स्वामी क्या करता है; परन्तु मैं ने तुम्हें मित्र कहा है, क्योंकि मैं ने जो बातें अपने पिता से सुनीं, वे सब तुम्हें बता दीं।” यूहन्ना 15:12-15

लोक और पॉप गायक प्रायः अलगाव के विषय में गीत लिखते हैं, क्योंकि इससे तीव्र भावनाएँ उत्पन्न होती हैं। पॉल साइमन ने इसे अच्छी तरह व्यक्त किया, जब उसने प्रेम और हँसी को ठुकराते हुए अपने जीवन में अभेद्य दीवारें खड़ी करने और स्वयं को “चट्टान” और “द्वीप” बनाने की बात कही, क्योंकि “मित्रता दुख देती है।”[1]

परन्तु वह सच्चाई जिसे हम सब अपने मन की गहराई में जानते हैं, यह है कि मित्रता हम में से प्रत्येक के लिए अत्यन्त आवश्यक है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने हमें एक-दूसरे की चिन्ता करने के लिए रचा है। हम सम्बन्धों की लालसा रखते हैं: पहचाने जाने की, प्रेम पाए जाने की। हम जानते हैं कि इस संसार में एक सच्चा मित्र भी हमें वास्तव में धनी बना देता है। हम द्वीप नहीं बनना चाहते।

फिर भी, यद्यपि हमारे पास सच्चे मित्र हो सकते हैं जो वफादार, संवेदनशील और ईमानदार हों, अन्तिम और पूर्ण मित्रता हमें केवल यीशु में मिलती है। वही एकमात्र मित्र है जो “कल और आज और युगानुयुग एक–सा है” (इब्रानियों 13:8)। उसकी मित्रता मानवीय मित्रता की सीमाओं से कहीं आगे बढ़ जाती है; वह महसूल लेने वालों और पापियों का भी सच्चा मित्र बनना जानता था (मत्ती 11:19; लूका 7:34)। कुछ लोगों के लिए मित्रता कठिन इसलिए लगती है क्योंकि इसमें खुलापन और भेद्यता की माँग होती है। परन्तु यीशु कभी खराब मनोदशा में नहीं होता, कभी हमें निराश नहीं करता, कभी मनमाने ढंग से व्यवहार नहीं करता। और वह हमारा और आपका मित्र बनना चाहता है! जब आप विश्वास से उसके पास आते हैं, तो वह, जिसके द्वारा सब कुछ सृजा गया, आपको अपना मित्र कहने में आनन्द पाता है। इस बात को अपने मन में उतरने दें।

हर मित्रता में प्रयास लगता है, और यीशु के साथ मित्रता भी इससे भिन्न नहीं है! इसी कारण यीशु कहता है, “जो आज्ञा मैं तुम्हें देता हूँ, यदि उसे मानो तो तुम मेरे मित्र हो।” जब हम यीशु को मित्र के रूप में ग्रहण करते हैं, तो हम उसे अपना राजा भी स्वीकार करते हैं।

सम्भव है कि मानवीय सम्बन्ध आपको दुखद या क्षणिक लगे हों। सम्भव है कि आप बहुत मित्रों से घिरे हों, या सम्भव है कि आपका एक भी मित्र न हो। हर स्थिति में, यहाँ एक अद्‌भुत मित्र है: वह जो हमें पूरी तरह जानता है और फिर भी हमसे प्रेम करता है। उसमें हमें ऐसा मित्र मिलता है “जो भाई से भी अधिक मिला रहता है” (नीतिवचन 18:24)।

पृथ्वी के मित्र हमें छोड़ सकते हैं या असफल हो सकते हैं,

एक दिन ढाढ़स बँधाएँ, अगले दिन दुख दें;

पर यह मित्र हमें कभी धोखा नहीं देगा:

ओह, वह हमसे कितना प्रेम करता है! [2]

  यूहन्ना 15:12–17

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 5–7; यूहन्ना 9:24-41


[1] पॉल साइमन, “आई एम अ रॉक” (1965).

[2] मैरिएन नन, “वन देयर इज़ अबव ऑल अदर्स” (1817).

21 सितम्बर : उसके वचन का विशेषाधिकार

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21 सितम्बर : उसके वचन का विशेषाधिकार
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“क्योंकि उसकी ईश्वरीय सामर्थ्य ने सब कुछ जो जीवन और भक्ति से सम्बन्ध रखता है, हमें उसी की पहचान के द्वारा दिया है, जिसने हमें अपनी ही महिमा और सद्‌गुण के अनुसार बुलाया है।” 2 पतरस 1:3

आखरी बार कब आपने ठहरकर इस बात पर विचार किया कि परमेश्वर के वचन तक लगभग असीमित पहुँच होना कितना बड़ा विशेषाधिकार है? आज के दिनों में हम उसे अपनी जेब में लिए फिरते हैं और कुछ ही क्षणों में किसी भी अध्याय और पद को खोल सकते हैं, या यहाँ तक कि पूरी बाइबल में खोज कर सकते हैं।

सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र तक त्वरित पहुँच हमें बहुत सामान्य लग सकती है। और फिर भी, हमें इस सम्मान पर अचम्भित होना चाहिए! इसके लेखक ने अपनी अंगुलियों से आकाश को रचा (भजन 8:3)। उसने स्वयं पवित्रशास्त्र को प्रेरित किया (2 तीमुथियुस 3:16)। इसकी सामग्री उत्तम सोने से भी अधिक अनमोल है (भजन 19:10), और इसकी सच्चाई सदा बनी रहेगी (1 पतरस 1:24)। बाइबल में हमें जीवन और भक्ति के लिए आवश्यक सब कुछ मिलता है—और वह कुछ भी नहीं जो हमें नहीं चाहिए। प्रत्येक अनुच्छेद सम्पूर्ण कथा में अपनी विशिष्ट भूमिका निभाता है, और फिर भी हर भाग उस एक महान कहानी में योगदान देता है। सबसे बढ़कर, यही वह साधन है जिसके द्वारा पवित्र आत्मा हमें परमेश्वर की “पहचान” में और गहराई से ले जाता है—जिसे हम “सम्बन्ध” भी कह सकते हैं, क्योंकि जिस यूनानी शब्द epignosis का पतरस उपयोग करता है, उसमें केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, बल्कि सम्बन्धात्मक ज्ञान का भाव निहित है। वचन के द्वारा ही हम अपने सृष्टिकर्ता को और अधिक निकटता से जान पाते हैं, जिसे महिमा देने और सदा आनन्दित होने के लिए हमें रचा गया है।[1]

हमारे प्रभु यीशु की सबसे लम्बी प्रार्थना में, जो पवित्रशास्त्र में दर्ज है, वह अपने लोगों के लिए बहुत समय तक प्रार्थना करता है। एक विशेष विनती में वह कहता है: “सत्य के द्वारा उन्हें पवित्र कर : तेरा वचन सत्य है” (यूहन्ना 17:17)। स्वयं यीशु परमेश्वर के वचन के सामर्थ्य को जानता था। जब शैतान ने उसे मरुभूमि में परखा, तो उसने पवित्रशास्त्र के सत्य से उत्तर दिया। एक स्थान पर उसने व्यवस्थाविवरण 8:3 से उद्धरण देकर हमें यह स्मरण दिलाया कि “मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्‍वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा” (मत्ती 4:4)। यदि यीशु मसीह ने अपनी आत्मा को परमेश्वर के वचन से पोषित किया, तो हमें इसकी आवश्यकता कितनी अधिक है!

कभी-कभी किसी वस्तु तक निरन्तर और सहज पहुँच होने से हम उसके विशेषाधिकार को समझ नहीं पाते—जैसे पानी या बिजली। जब नल और बत्तियाँ ठीक से काम कर रही होती हैं, तो हम शायद ही उन्हें ध्यान में लाते हैं। परन्तु जब वे नहीं होतीं, तब हमें उनका मूल्य समझ में आता है! आइए हम परमेश्वर के वचन के साथ ऐसा व्यवहार न करें। परमेश्वर ने हमें अपने सत्य तक इतनी स्वतन्त्र पहुँच दी है। क्यों न हम उसे उठाएँ और पढ़ें? आप पवित्रशास्त्र में कैसे डूबेंगे और सत्य की उन किरणों में कैसे स्नान करेंगे, जिनमें जीवन और भक्ति के लिए आवश्यक सब कुछ समाहित है?

  भजन 119:33–40

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 3–4; यूहन्ना 9:1-23 ◊


[1] वेस्टमिंस्टर शॉर्टर कैटेकिज़्म, उत्तर 1.