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10 सितम्बर : पुनरुत्थान के जीवन की आशा

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10 सितम्बर : पुनरुत्थान के जीवन की आशा
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“जैसा वह मिट्टी का था, वैसे ही वे भी हैं जो मिट्टी के हैं; और जैसा वह स्वर्गीय है, वैसे ही वे भी हैं जो स्वर्गीय हैं। और जैसे हम ने उसका रूप धारण किया जो मिट्टी का था वैसे ही उस स्वर्गीय का रूप भी धारण करेंगे।” 1 कुरिन्थियों 15:48-49

चाहे हम अपनी सारी कल्पना-शक्ति को एकत्र कर लें, फिर भी उस संसार की पूरी कल्पना करना हमारे लिए असम्भव है जैसा उसे होना चाहिए—और वास्तव में जैसा वह होगा। क्या आप ऐसे संसार की कल्पना कर सकते हो जहाँ भूकम्प, आँधियाँ, और बवण्डर अब विनाश और तबाही न मचाए? ऐसा संसार जहाँ कैंसर शब्द किसी के हृदय में भय न उत्पन्न करे? ऐसा शरीर जिसमें न दुर्बलता हो, न संक्रमण, न रोग, न शोक, और न मृत्यु?

सच तो यह है कि हम में से कोई भी उस संसार की पूरी कल्पना नहीं कर सकता। परन्तु हमारे पास अपने प्रभु यीशु मसीह में पुनरुत्थान के जीवन की आशा की एक प्रतिमा अवश्य है। मरे हुओं में से जी उठकर, वह उन सब के लिए पहला फल ठहरा है जो उस पर विश्वास करते हैं। जो हम उसमें देखते हैं, वही हम एक दिन बनेंगे।

स्वभाव से हम सब “आदम में” हैं और मृत्यु के लिए ठहराए गए हैं; परन्तु जो कोई मसीह में है, उसके लिए परमेश्वर नई आशा की प्रतिज्ञा करता है (1 कुरिन्थियों 15:22)। मृत्यु पर जय पाकर, मसीह ने, जो “अन्तिम आदम” है (पद 45), हमें स्वर्ग में अविनाशी जीवन के मार्ग पर स्थापित किया है। एक समय हम “मिट्टी” के मनुष्य के मार्ग पर चलते थे, परन्तु अब जो कोई मसीह में है, वह “उस स्वर्गीय का रूप भी धारण” करता है।

जब वह स्वर्गीय मनुष्य पृथ्वी पर लौटेगा और स्वर्ग को अपने साथ लाएगा, तब जीवन कैसा होगा? पवित्रशास्त्र सभी विवरण प्रकट नहीं करता। परन्तु हम यह जानते हैं कि नाशमान होने के स्थान पर हमारे शरीर अविनाशी होंगे। अभी हमारा जीवन सीमित अवधि का है, परन्तु हमें ऐसे अनन्त जीवन की प्रतिज्ञा और आशा दी गई है जिसका कोई अन्त नहीं। हम सदा जीवित रहेंगे (1 कुरिन्थियों 15:42), और उस अनन्तता का प्रत्येक दिन महिमामय होगा, क्योंकि वहाँ कुछ भी नाश न होगा, न बिगड़ेगा, और न मुरझाएगा (1 पतरस 1:4)। हम यह भी जानते हैं कि परमेश्वर हमें अपमान और दुर्बलता की दशा से बदलकर सामर्थ्य और महिमा की नई अवस्था में रूपान्तरित करेगा (1 कुरिन्थियों 15:43)।

न तो आप और न ही मैं ऐसे पुनरुत्थान के जीवन को पूरी तरह समझने की क्षमता रखते हैं। आप जो कुछ भी कल्पना कर सकें, वास्तविकता उससे कहीं उत्तम होगी! परन्तु इस बात के विषय में निश्चिन्त रहें: वह जीवन अवश्य आपकी प्रतीक्षा कर रहा है, क्योंकि आपके जी उठे हुए प्रभु यीशु मसीह ने एक बार सदा के लिए मृत्यु को पैरों तले रौंद दिया है। उसकी अपरिवर्तनीय विजय ने मृत्यु को निगल लिया है (1 कुरिन्थियों 15:54)।

आज भी आप अपने चारों ओर—यहाँ तक कि अपने भीतर भी—मृत्यु की शक्तियों को कार्य करते हुए देखेंगे। सम्भव है कि इन शब्दों को पढ़ते समय आप किसी न किसी रीति से इसका अनुभव कर रहे हैं। परन्तु यह निश्चय जानें कि ज्योति का राज्य अन्धकार के अधिकार पर पहले ही जय पा चुका है। वास्तव में, आपकी नागरिकता पहले से ही पुनरुत्थान के जीवन के राज्य की है। कभी-कभी आप अभी भी क्षय और मिट्टी का अनुभव करेंगे, परन्तु आप इस आशा में स्थिर रह सकते हैं कि वह स्वर्गीय मनुष्य एक दिन आपकी “दीन–हीन देह का रूप बदलकर, अपनी महिमा की देह के अनुकूल बना देगा” (फिलिप्पियों 3:21)—और वह भी सदा के लिए!

         1 थिस्सलुनीकियों 5:1-11

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 9–10; यूहन्ना 4:1-30

9 सितम्बर : गलत दिशा में सहानुभूति का खतरा

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9 सितम्बर : गलत दिशा में सहानुभूति का खतरा
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“लोगों की बड़ी भीड़ उसके पीछे हो ली और उसमें बहुत सी स्त्रियाँ भी थीं जो उसके लिए छाती–पीटती और विलाप करती थीं। यीशु ने उनकी ओर मुड़कर कहा, ‘हे यरूशलेम की पुत्रियो, मेरे लिए मत रोओ; परन्तु अपने और अपने बालकों के लिए रोओ।’” लूका 23:27-28

भीड़ से उठने वाली “क्रूस पर चढ़ाओ!” की चिल्लाहटें थम चुकी थीं। उनका उद्देश्य पूरा हो चुका था: पिलातुस ने यीशु को मृत्यु के लिए सौंप दिया था। अब मृत्यु की माँग करने वाली आवाज़ों के स्थान पर एक नई ध्वनि उठी—उन स्त्रियों के रोने की ध्वनि “जो उसके लिए छाती–पीटती और विलाप करती थीं।”

यदि थका हुआ यीशु अपनी क्रूस-यात्रा के मार्ग पर लड़खड़ाते हुए उन स्त्रियों की ओर, “जो उसके लिए छाती–पीटती और विलाप करती थीं,” केवल दृष्टि डाल देता, उनकी सहानुभूति को देख लेता या स्वीकार कर लेता, तो इसमें कोई आश्चर्य न होता। परन्तु उसने इससे कहीं अधिक किया। वह वास्तव में रुका, उनकी ओर मुड़ा, और उनसे कहा, “मेरे लिए मत रोओ; परन्तु अपने और अपने बालकों के लिए रोओ।” अर्थात्, उसने उन्हें बताया कि उनकी सहानुभूति गलत दिशा में थी—कि उसके लिए बुरा महसूस करने के बजाय उन्हें अपनी ही संकटपूर्ण अवस्था पर विचार करना चाहिए।

यीशु के शब्द कोई कठोर डाँट नहीं थे, मानो इन स्त्रियों का विलाप करना गलत था। बल्कि वह चाहता था कि वे यह देखें कि एक ऐसी बात भी है जिसके लिए उन्हें कहीं अधिक गहरी चिन्ता के साथ रोना चाहिए—अर्थात् वह न्याय जो यरूशलेम की प्रतीक्षा कर रहा था यदि उसके निवासी अपने अविश्वास में बने रहते और उसे अस्वीकार करते रहते।

एक सप्ताह से भी कम पहले यीशु ने यरूशलेम के विनाश के विषय में कहा था: “[इस्राएल के शत्रु]  तुझे और तेरे बालकों को जो तुझ में हैं, मिट्टी में मिलाएँगे, और तुझ में पत्थर पर पत्थर भी न छोड़ेंगे; क्योंकि तूने उस अवसर को जब तुझ पर कृपा दृष्‍टि की गई न पहिचाना” (लूका 19:44)। इन स्त्रियों ने इतना तो पहचाना कि वे यीशु के घायल और टूटे हुए शरीर के प्रति सहानुभूति प्रकट करें। उन्होंने पहचाना कि यह दृश्य दुखद था, न्याय का अपमान और विकृति था। परन्तु उन्होंने अब तक परमेश्वर के उनके पास आने के समय को नहीं पहचाना था। और जो यह नहीं पहचानते कि यीशु में परमेश्वर अपने वचनों को पूरा करने और अपने न्याय से उद्धार देने आया है, उन्हें उसी न्याय का सामना करना पड़ेगा। यरूशलेम के लिए, उस अन्तिम न्याय की एक झलक ईस्वी सन् 70 में आई, जब नगर पर रोमी सेना ने अधिकार किया, उसके नागरिक मारे गए, और उसका मन्दिर ढा दिया गया।

तब की भाँति आज भी, यीशु हमें केवल सहानुभूति के लिए नहीं बुला रहा। उसे इसकी आवश्यकता नहीं है! आज यीशु क्रूस पर नहीं है; वह ऊँचे पर पिता की दाहिनी ओर विराजमान है। तब उन स्त्रियों से कहे गए यीशु के शब्द—और आज हमसे कहे गए उसके शब्द—उन लोगों के लिए चेतावनी हैं जो उसे अन्याय का शिकार मानकर उस पर तरस तो खाते हैं, परन्तु इस सच्चाई का सामना नहीं करते कि मानवजाति योग्य और भयानक न्याय का सामना कर रही है। हमें मानवता की अवस्था पर विलाप करना चाहिए और पश्चाताप तथा विश्वास के साथ उसके पास आना चाहिए, क्योंकि उस अन्तिम न्याय के दिन उससे कोई शरण नहीं होगी। शरण केवल उसी में है।

  लूका 19:41-46

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 7– 8; यूहन्ना 3:16-36 ◊

8 सितम्बर : आत्मा के लिए पोषण

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8 सितम्बर : आत्मा के लिए पोषण
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“वह तो यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता; और उसकी व्यवस्था पर रात दिन ध्यान करता रहता है।” भजन संहिता 1:2

परमेश्वर का सत्य अपने सब विरोधियों से भारी है और उनसे अधिक स्थाई है। जैसा कि भविष्यद्वक्ता यशायाह घोषणा करता है, “घास तो सूख जाती, और फूल मुर्झा जाता है; परन्तु हमारे परमेश्‍वर का वचन सदैव अटल रहेगा” (यशायाह 40:8)।

जब भजन-संग्रह का आरम्भ होता है, तो हम पाते हैं कि धन्य पुरुष—सचमुच आनन्दित व्यक्ति—परमेश्वर के वचन के स्थाई सत्य में आनन्द लेता है। प्रभु के वचन उसके लिए बहुमूल्य हैं; प्रत्येक वचन मधु से भी अधिक मीठा लगता है (भजन 19:10)। फिर भी ऐसा व्यक्ति केवल यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न ही नहीं होता, वह उस पर ध्यान भी करता है।

ध्यान करना या मनन करना पाचन की प्रक्रिया के समान है। शारीरिक रूप से, भोजन को केवल मुँह में रख लेना और उसके साथ कुछ न करना सम्भव है, परन्तु उससे शरीर को कोई पोषण नहीं मिलता। हम तब भी यही जोखिम उठाते हैं, जब हम रविवार-दर-रविवार और दिन-प्रतिदिन परमेश्वर के वचन के पास आते हैं, परन्तु सोच-समझकर उस पर मनन नहीं करते।

अक्सर हमें ऐसा लगता है कि हमारा जीवन सौ मील प्रति घण्टे की गति से भाग रहा है। परमेश्वर के वचन में प्रतिदिन का समय केवल एक दैनिक कार्य बन जाता है जिसे पूरा करना है, बस यह कहने के लिए कि हमने कर लिया। इसके बजाय, हमें परमेश्वर के वचन को अपने हृदय में संचित करने के मार्ग खोजने चाहिएँ (भजन 119:11)। हमें सचेत रूप से समय निकालना चाहिए कि उसे चबाएँ, और दिन भर यह पूछते रहें, “इस पद का वास्तव में क्या अर्थ है? इस परिस्थिति में यह मेरे विचारों और कार्यों को कैसे आकार देगा? यह मुझे परमेश्वर की महिमा के विषय में क्या दिखा रहा है? परमेश्वर इसे कैसे उपयोग कर सकता है कि मुझे मसीह की समानता में ढाले?”

हमें पवित्रशास्त्र पर केवल नाश्ता करने के लिए नहीं, परन्तु उन्हें भोज की भाँति ग्रहण करने के लिए बुलाया गया है। क्योंकि परमेश्वर की महिमा का कोई अन्त नहीं है, इसलिए उसके वचन की सम्पदा का भी कोई अन्त नहीं है। आपके लिए उसपर मनन करने का क्या अर्थ होगा? प्रार्थना के द्वारा परमेश्वर के आत्मा से सहायता माँगें कि वह आपके हृदय और मन को अपने वचन के साथ बाँध दे। ध्यानपूर्वक विचार करें कि बाइबल क्या कहती है। उस पर मनन करें। उसे परखें। दिन भर उसे चबाते रहें ताकि आत्मा को पोषण देने वाले अधिक से अधिक तत्त्व निकल सकें। और जब आप अपने प्रभु की व्यवस्था पर मनन करते हैं, तो परमेश्वर से यह भी माँगें कि वह न केवल उसके ज्ञान में आपकी वृद्धि करे, परन्तु आपको भीतर से बदल दे कि आप उसके पुत्र के समान बनें। जैसे-जैसे आप उसके वचन को अपने हृदय, मन, और जीवन में कार्य करते हुए देखेंगे, वैसे-वैसे आप उसे पढ़ने और उसके अनुसार जीने में अधिक से अधिक आनन्द पाएँगे।

  यशायाह 40:6-9

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 4–6; यूहन्ना 3:1-15

7 सितम्बर : आपकी अनुग्रह, आपकी दया, और आपकी शान्ति

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7 सितम्बर : आपकी अनुग्रह, आपकी दया, और आपकी शान्ति
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“परमेश्‍वर पिता, और पिता के पुत्र यीशु मसीह की ओर से अनुग्रह और दया और शान्ति, सत्य और प्रेम सहित हमारे साथ रहेंगे।” 2 यूहन्ना 3

मसीही विश्वास की सबसे मूलभूत और सबसे अद्‌भुत सच्चाइयों में से एक यह है कि परमेश्वर हमें वह देता है जिसके हम योग्य नहीं हैं। पापी होने के कारण—अन्तिम पुरुष, स्त्री, और बालक तक—हम मृत्यु के योग्य हैं। और इसके स्थान पर परमेश्वर हमें क्या देता है? “परमेश्‍वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन है” (रोमियों 6:23)।

यह उलटफेर—कि परमेश्वर हमें वह देता है जिसके हम योग्य नहीं हैं और उस बात को रोक लेता है जिसके हम योग्य हैं—इतना मूल्यवान है कि इसके लिए हमारे पास एक विशेष शब्द है: अनुग्रह। अपने अनुग्रह के द्वारा परमेश्वर सबसे अयोग्य पात्र को जीवन का सबसे सुन्दर वरदान देता है।

और हमें पाप और दोष से मुक्त करके और यीशु मसीह में हर आशीष देकर वह यह अनुग्रह हम पर कैसे कर सकता है? अपनी दया के कारण। यह परमेश्वर की महान दया ही है जो उसे हमें वह देने को प्रेरित करती है जिसके हम योग्य नहीं हैं—और उसी दया के द्वारा वह हम पर अनुग्रह की वर्षा करता है।

ऐसे अनुग्रह और दया से शान्ति की प्रचुरता बह निकलती है। शान्ति उनका अनुभव है जो परमेश्वर से मेल कर लिए गए हैं, जो अब उससे अलग नहीं रहे, परन्तु उसके साथ संगति में और उसके अनुग्रह के सहभागी लोगों के समुदाय में रहते हैं। यह शान्ति परमेश्वर के अनुग्रह और दया का ऐसा पारलौकिक अनुभव है कि वह “समझ से परे है” (फिलिप्पियों 4:7)।

ऐसे संसार में जो निराशा और खतरे से भरा हुआ प्रतीत होता है, और कभी-कभी अर्थ और उद्देश्य से रिक्त लगता है, ऐसे अलौकिक अनुग्रह, दया, और शान्ति से बढ़कर हम और क्या चाह सकते हैं? वे स्थिर हैं। वे टिकाऊ हैं। वे स्थाई हैं। और परमेश्वर पिता सदा प्रसन्न होता है कि अपने बहुमूल्य पुत्र यीशु मसीह के द्वारा अपने पास आने वालों को इन्हें उदारता से प्रदान करे। यदि आप मसीह पर भरोसा रखते हैं, तो अनुग्रह, दया, और शान्ति आपके साथ रहेंगी। इसलिए आगे बढ़ने से पहले ठहरें और इन तीन शब्दों के अर्थ और महिमा को अपने मन में उतर जाने दें। परमेश्वर का अनुग्रह आपका है, परमेश्वर की दया आपकी है, परमेश्वर की शान्ति आपकी है—सब कुछ यीशु के द्वारा, जो आपका उद्धारकर्ता है।

  2 यूहन्ना

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 1–3; यूहन्ना 2 ◊

6 सितम्बर : आनन्दित हृदय

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6 सितम्बर : आनन्दित हृदय
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“तब हन्ना ने प्रार्थना करके कहा, ‘मेरा मन यहोवा के कारण मगन है; मेरा सींग यहोवा के कारण ऊँचा हुआ है। मेरा मुँह मेरे शत्रुओं के विरुद्ध खुल गया, क्योंकि मैं तेरे किए हुए उद्धार से आनन्दित हूँ।’” 1 शमूएल 2:1

परमेश्वर की जितनी स्तुति की जाए उतनी कम है और उसके लोगों के प्रति उसके प्रेम को देखकर अपने हृदयों में जितना आनन्दित हुआ जाए उतना कम है। जब हम अपने जीवनों में परमेश्वर का कार्य देखते हैं, तो हमें तुरन्त उसकी स्तुति करनी चाहिए; परन्तु साथ ही हमें उस आशीष को उसके लोगों के प्रति सामूहिक भलाई के सन्दर्भ में भी देखना चाहिए। हम यह बात पवित्रशास्त्र में बार-बार देखते हैं। उदाहरण के लिए, 1 शमूएल में, जब हन्ना ने सहायता के लिए यहोवा से विनती की, तो उसने ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जो केवल उसकी व्यक्तिगत परिस्थिति से नहीं, बल्कि परमेश्वर के लोगों से जुड़े थे: “हे सेनाओं के यहोवा . . .” (1 शमूएल 1:11)। उसकी विनती यह थी कि परमेश्वर उस पर वैसी ही दृष्टि करे जैसी उसने अतीत में अपने लोगों पर की थी।

जब परमेश्वर ने उसे वह पुत्र दिया जिसकी वह लालसा करती थी, तो उसका धन्यवाद इस्राएल की महान छुड़ौती के अवसरों की भाषा में गूँज उठा। जब परमेश्वर के सामर्थ्य से उसके लोग मिस्र की दासता से छुड़ाए गए थे, तब मूसा ने गीत गाया था, और मरियम ने अपनी डफली के साथ नृत्य में अगुवाई की थी (निर्गमन 15)। हन्ना के पास भी गाने के लिए एक गीत था—या कहें, तो धन्यवाद की एक प्रार्थना थी। और उसकी प्रार्थना उसकी व्यक्तिगत परिस्थितियों की सीमाओं को पार कर गई। वह इस बात से आनन्दित हुई कि जो कुछ परमेश्वर ने उसके लिए व्यक्तिगत रूप से किया था, उसका सम्बन्ध उस कार्य से था जो वह अपने लोगों के लिए सामूहिक रूप से कर रहा था।

ऐसा करते हुए उसका मन मगन हो उठा। जब बाइबल में “मन” शब्द का प्रयोग होता है, तो वह हमारे अस्तित्व के केन्द्र की बात करता है, जिसमें हमारा हृदय, हमारी इच्छा और हमारी भावनाएँ सम्मिलित हैं। इसलिए जब हन्ना ने कहा, “मेरा मन यहोवा के कारण मगन है,” तो वह यह व्यक्त कर रही थी कि उसके अस्तित्व का केन्द्र परमेश्वर की महानता में डूब गया था। उसके हृदय की परिपूर्णता से उसका मुँह बोला।

जैसे हन्ना ने सम्भवतः मरियम के उदाहरण में आनन्द पाया होगा, वैसे ही हन्ना की प्रार्थना के लगभग एक हज़ार वर्ष बाद एक और स्त्री ने इसी प्रकार परमेश्वर के लिए गीत गाया। यीशु का माता मरियम निश्चय ही हन्ना की प्रार्थना को जानती थी और सम्भव है कि उसने उसमें से कुछ शब्द भी लिए होंगे, और इस प्रकार उस परम्परा को आगे बढ़ाया जिसे हम “मैग्निफ़िकैट” के नाम से जानते हैं (लूका 1:46-55)।

और हम क्या करते हैं? जब परमेश्वर हमारे जीवनों में व्यक्तिगत रूप से और अपने लोगों में सामूहिक रूप से कार्य करता है, तो क्या हम भी ऐसे ही उल्लास से प्रत्युत्तर देते हैं? या कहीं ऐसा तो नहीं कि हमें हन्ना की स्तुति कुछ अधिक लगती है? यदि कोई “मरियम” उठकर डफली बजाने लगे, तो हम कैसी प्रतिक्रिया देंगे? कभी-कभी हम अपनी स्तुति में बहुत मापे-तौले हुए, या केवल औपचारिक हो जाते हैं। हम कलीसिया में प्रभु की सामर्थ्य, शक्ति, भलाई और करुणा के विषय में गीत गाते हैं, और फिर भी हम अपने मुँह ठीक से खोलकर गाते या मुस्कराते तक नहीं। हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि हम किसी दार्शनिक विचार, किसी अवधारणा, या अपने भीतर पाई जाने वाली किसी बात से व्यवहार नहीं कर रहे। नहीं, हम जीवित परमेश्वर के विषय में गा रहे हैं और उससे प्रार्थना कर रहे हैं, जो अपने लोगों की ओर से और उनके लिए कार्य करता है!

इसलिए, मरियम, हन्ना और यीशु की माता मरियम की तरह, अपने जीवन में परमेश्वर की योजनाओं और कार्यों को अपनाएँ। प्रार्थना में तत्पर रहें, स्तुति में तत्पर रहें, और दोनों में हृदय से जुड़े रहें। आज समय निकालें कि आपका हृदय यहोवा में मगन हो जाए!

  1 शमूएल 2:1-10

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 148–150; यूहन्ना 1:29-51

5 सितम्बर : भेजे हुए और भेजने वाला

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5 सितम्बर : भेजे हुए और भेजने वाला
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“यीशु ने फिर उनसे कहा, ‘तुम्हें शान्ति मिले; जैसे पिता ने मुझे भेजा है, वैसे ही मैं भी तुम्हें भेजता हूँ।’ यह कहकर उसने उन पर फूँका और उनसे कहा, ‘पवित्र आत्मा लो।’” यूहन्ना 20:21-22

यीशु पृथ्वी पर एक उद्देश्य के साथ आया था, और पृथ्वी छोड़ते समय उसने अपने लोगों को उसी उद्देश्य के लिए बुलाया।

यीशु ने आरम्भ से ही स्पष्ट कर दिया था कि वह सुसमाचार सुनाने आया है: “समय पूरा हुआ है, और परमेश्‍वर का राज्य निकट आ गया है; मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्‍वास करो” (मरकुस 1:15)। यह आज भी उतना ही सत्य है, और इसलिए यह पूर्णतः उचित है कि जब उसकी पृथ्वी की यात्रा समाप्त होने को थी, तब प्रभु ने अपने चेलों को उस मिशन को आगे बढ़ाने के लिए भेजा। पहले पुनरुत्थान के दिन की सन्ध्या को अपने मित्रों के सामने प्रकट होकर उसने उन्हें क्षमा के मार्ग का प्रचार करने की आज्ञा देने में कोई विलम्ब नहीं किया, और साथ ही यह भी स्मरण दिलाया कि उसकी अनुपस्थिति में पवित्र आत्मा उनकी सहायता करेगा।

चेलों के लिए पिछले कुछ दिन अत्यन्त भारी रहे थे। केवल बहत्तर घण्टों में, उन्होंने पहली बार एक साथ प्रभु-भोज में भाग लिया था, अपने उद्धारकर्ता और मित्र को अन्यायपूर्वक मुकदमे में और क्रूस पर चढ़ते देखा था, और शोक की ऐसी अवस्था में प्रवेश किया था जिसने उन्हें पूरी तरह घेर लिया था। परन्तु यीशु के पुनरुत्थान के बाद लौट आने से उनका शोक उलट गया। अब जीवन का अर्थ था वही करना जो उसने कहा था: इस अद्‌भुत कहानी का—सुसमाचार, क्षमा, और परमेश्वर के प्रेम का— प्रचार करना। यही उनके जीवन का उद्देश्य बन गया—और अधिकांश मामलों में, वे इसी के लिए मर भी गए।

केवल कुछ सप्ताह बाद, हम पतरस को एक उपदेश देते हुए पाते हैं। उसने कहा:

“हे इस्राएलियो, ये बातें सुनो : यीशु नासरी एक मनुष्य था जिसका परमेश्‍वर की ओर से होने का प्रमाण उन सामर्थ्य के कामों और आश्चर्य के कामों और चिह्नों से प्रगट है, जो परमेश्‍वर ने तुम्हारे बीच उसके द्वारा कर दिखाए जिसे तुम आप ही जानते हो। उसी यीशु को, जो परमेश्‍वर की ठहराई हुई योजना और पूर्व ज्ञान के अनुसार पकड़वाया गया, तुम ने अधर्मियों के हाथ से क्रूस पर चढ़वाकर मार डाला। परन्तु उसी को परमेश्‍वर ने मृत्यु के बन्धनों से छुड़ाकर जिलाया; क्योंकि यह अनहोना था कि वह उसके वश में रहता” (प्रेरितों 2:22-24)।

पतरस ने सीधे उस स्थिति को सम्बोधित किया जिसमें उसके सुनने वाले खड़े थे: वे ऐसे विद्रोही थे जो परमेश्वर की भलाई के योग्य नहीं थे, और उन्होंने उस राजा को ठुकरा दिया था जिसे परमेश्वर ने उनके बीच रहने और स्वयं को प्रकट करने के उद्देश्य से भेजा था। फिर भी, अब वही परमेश्वर पापियों के स्थान पर अपने एकलौते पुत्र को दण्ड देकर यीशु के अनुयायियों को मुख से उनके लिए क्षमा का प्रस्ताव कर रहा था।

मसीह का यह बुलावा, कि हम अपने भीतर की आशा का कारण बताएँ (1 पतरस 3:15), आज हमारे लिए भी उतना ही प्रासंगिक है जितना तब उसके चेलों के लिए था। हम मृत्यु, निराशा, रिक्तता, पछतावे और भय से घिरे हुए हैं। हम निरन्तर एक अज्ञात भविष्य की ओर देखते रहते हैं। हमारे प्रभाव-क्षेत्र में रहने वालों को यह जानने की आवश्यकता है कि क्षमा और शान्ति उन्हें केवल यीशु में ही मिलती है। परमेश्वर का धन्यवाद हो कि उसका आत्मा हमारे आगे-आगे चलता है। यदि आपको यह ज्ञात हो कि आप ईश्वरीय नियुक्ति से, ईश्वरीय मिशन का भाग होकर भेजे गए हैं, तो दूसरों से कहे जाने वाले आपके शब्दों में क्या परिवर्तन आएगा? यीशु कहता है “जैसे पिता ने मुझे भेजा है, वैसे ही मैं भी तुम्हें भेजता हूँ।”

  यूहन्ना 20:19-21

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 146–147; यूहन्ना 1:1-28 ◊

4 सितम्बर : और कोई बड़ी विजय नहीं

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4 सितम्बर : और कोई बड़ी विजय नहीं
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“अतः अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं।” रोमियों 8:1

मसीहियत के विषय में एक पुरानी और बार-बार दोहराई जाने वाली गलतफहमी यह है कि परमेश्वर हम में से प्रत्येक को एक जीवित तराजू की तरह देखता है: एक ओर हमारे पाप और असफलताएँ भरती जाती हैं, दूसरी ओर हमारे भले काम और विजय डाली जाती हैं, और यदि अन्त में अच्छे कामों का पलड़ा भारी हो जाए, तो परिणाम परमेश्वर के लिए पर्याप्त होगा—क्या ऐसा नहीं है?

परन्तु वास्तविकता यह है कि यदि हम अपने पापों को गिनें और उनकी तुलना अपनी आज्ञाकारिता से करें, तो हम सदा हारते ही पाए जाते हैं। यह वास्तव में कोई प्रतियोगिता भी नहीं है। जैसे जब कोई पेशेवर टीम किसी अनाड़ी टीम के विरुद्ध खेलती है, तो परिणाम एकतरफ़ा होता है। फिर भी हम में से बहुत से लोग यह सोचकर अपने आप को धोखा देते हैं कि हमारे पास वापसी के लिए समय है—कि अन्तिम सीटी बजने से पहले हम स्वयं को थोड़ा ठीक कर लेंगे, या इतना परिश्रम कर लेंगे कि अन्त में विजयी निकल आएँ।

ऐसी सोच सुसमाचार की बराबरी कभी नहीं कर पाती। और यह अनुग्रह से पूरी तरह चूक जाती है।

परमेश्वर के सामने हमारे अपने प्रयास हमारे पलड़े को कभी भारी नहीं कर सकते। नहीं, यह काम तो मसीह का है। पौलुस इफिसियों को लिखता है कि हमारा उद्धार हमारी “ओर से नहीं, वरन् परमेश्‍वर का दान है” (इफिसियों 2:8)। वह दान हमारे स्थान पर मसीह का सिद्ध लेखा है। उसकी पूर्ण धार्मिकता से कम कुछ भी पर्याप्त नहीं।

जब आप सुसमाचार को वास्तव में समझने लगते हैं, तो वह इतना अच्छा प्रतीत होता है कि मानो सत्य ही न हो। ऐसा उदार अनुग्रह कौन पाने के योग्य है? परन्तु यही तो बात है। हमारा उद्धार पूर्णतः एक दान है, और वह पूरी तरह अयोग्य लोगों को दिया गया है। हम न तो अभी इसके योग्य हैं, और न कभी हो सकते हैं। फिर भी परमेश्वर हम पर दया करता है। वह हमें विजयी घोषित करता है—दण्ड की आज्ञा नहीं!—यीशु मसीह के कारण, और केवल उसी के कारण।

मसीही होना आपको अपने जीवन को एक तराजू की दृष्टि से देखने से स्वतः सुरक्षित नहीं कर देता। पौलुस ने गलातिया की कलीसिया को पूरा पत्र इसी कारण लिखा कि वे अनुग्रह को न छोड़ें। हमें लगातार यह स्मरण रखने के लिए संघर्ष करना पड़ता है कि हमारे प्रदर्शन से नहीं बल्कि केवल मसीह के कारण और सदा मसीह में ही हम पर “दण्ड की आज्ञा नहीं” है। क्या आपने अपने उद्धार का आनन्द खो दिया है? इसका सम्भवतः कारण यह हो सकता है कि आप यीशु की ओर कम और अपनी ओर अधिक देख रहे हैं। मसीही जीवन में न तो निराशा का स्थान है और न घमण्ड का, क्योंकि यह कभी आपके विषय में नहीं है; यह सदा उसी के विषय में है।

मसीह यीशु में परमेश्वर आपको विजय देता है। इससे बड़ा कोई दान नहीं, इससे बड़ी कोई विजय नहीं, और इससे बड़ा कोई आनन्द नहीं।

  गलातियों 4:21–5:1

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 143–145; 2 कुरिन्थियों 13

3 सितम्बर : स्वर्ग का एक स्वाद

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3 सितम्बर : स्वर्ग का एक स्वाद
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“अतः अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं।” रोमियों 8:1

हमारे युग की बड़ी और घातक विधर्मताओं में से एक “समृद्धि का सुसमाचार” है। इस झूठी शिक्षा के समर्थक पुरुषों और स्त्रियों को यह विश्वास दिलाने का प्रयास करते हैं कि यदि उनके पास पर्याप्त विश्वास हो या वे उन्हें थोड़ा और धन दे दें, तो उनके लिए स्वास्थ्य, धन और सामान्य समृद्धि जैसी बड़ी भौतिक आशिषें निश्चित हैं। परन्तु परमेश्वर ने ऐसी कोई प्रतिज्ञा कभी नहीं की। ऐसी समृद्धि की प्रतिज्ञाएँ हमारे लिए, जरूरी नहीं है कि अभी के लिए हैं, बल्कि अनन्तकाल में रखी गई हैं। अनेक विश्वासियों के जीवन झूठे शिक्षकों द्वारा नष्ट कर दिए गए हैं, जिन्होंने अभी वह देने का वादा किया जो परमेश्वर केवल अनन्तकाल में देने का वचन देता है।

परन्तु समृद्धि के सुसमाचार से सावधान रहते हुए, हमें इस महिमामय सत्य को नहीं भूलना चाहिए कि मसीह में स्वर्ग की कुछ आशिषें हमारे सांसारिक जीवन में अभी भी प्रवेश करती हैं। वास्तव में, परमेश्वर की दया की सबसे प्रचुर वर्षा में से एक अभी हमारी है: “अतः अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं।” निश्चय ही, अपने सृष्टिकर्ता के साथ अभी मेल में लाया जाना—और वह भी अनन्तकाल के लिए—इससे अधिक आकर्षक प्रस्ताव शायद ही कोई हो।

“दण्ड की आज्ञा नहीं” की यह अवस्था केवल वह नहीं है जिसकी हम आकांक्षा करते हैं और जिसे हम अन्ततः प्राप्त करेंगे। पौलुस कहता है कि यह धन्य स्थिति अभी हमारे लिए है। यदि हम “मसीह यीशु में” हैं, अर्थात विश्वास के द्वारा उससे एक किए गए हैं, तो हम पहले ही परमेश्वर के साथ मेल में प्रवेश कर चुके हैं। हम पहले ही अनुग्रह में खड़े हैं, दण्ड में नहीं।

अनुग्रह में खड़े होने और दण्ड में खड़े होने के बीच कोई मध्य भूमि नहीं है। यदि हम धर्मी नहीं ठहराए गए—यदि हम मसीह के बल पर धर्मी घोषित नहीं किए गए—तो हम दण्ड के अधीन हैं। यीशु इसे हमारे लिए स्पष्ट शब्दों में कहता है: “जो उस पर विश्‍वास करता है, उस पर दण्ड की आज्ञा नहीं होती, परन्तु जो उस पर विश्‍वास नहीं करता, वह दोषी ठहर चुका; इसलिए कि उसने परमेश्‍वर के एकलौते पुत्र के नाम पर विश्‍वास नहीं किया” (यूहन्ना 3:18)। खड़े होने के लिए और कोई मध्य भूमि नहीं है।

परन्तु किसी मध्य भूमि में खड़े होने का प्रयास करने की कोई आवश्यकता भी नहीं है। जो पापी मन फिराव और विश्वास के साथ यीशु की ओर मुड़ता है, उसकी वर्तमान वास्तविकता जीवित आशा में बदल जाती है; परमेश्वर उसे मृत्यु से जीवन में ले आता है। वह उसे अपने अनुग्रह की मिट्टी में रोपता है, जहाँ वह उसे स्थिर आशा से पोषित करता है। वे उसकी दया की अनन्त मुस्कान के नीचे दृढ़ता से जड़ पकड़ लेते हैं। इससे बढ़कर और कौन-सी समृद्धि हो सकती है?

हम में से अधिकांश के लिए यह देखना आसान है कि हमारे पास क्या नहीं है। शायद आज आपके पास यह इच्छा करने का कारण हो कि परमेश्वर आपको अभी अधिक स्वास्थ्य या धन, या अधिक समय, या भिन्न सम्बन्ध दे। परन्तु एक क्षण के लिए ठहरें और देखें कि आपके पास क्या है जिसे आप खो नहीं सकते। आप परमेश्वर की मुस्कान का आनन्द लेते हैं। आप कभी भी उसके दण्ड का सामना नहीं करेंगे। यही उसकी प्रतिज्ञा है, और संसार जो कुछ भी दे सकता है, यह उससे कहीं अधिक मूल्यवान है—और जो कुछ वह प्रतिज्ञा करता है, उसे वह पूरा भी करता है।

  यूहन्ना 3:10-21

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 140–142; 2 कुरिन्थियों 12 ◊

2 सितम्बर : सुसमाचार का विरोधाभास

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“अतः अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं।” रोमियों 8:1

क्या आप कभी अपने आप से निराश होते हैं? शायद आपको लगता है कि पवित्रता की ओर आपकी यात्रा अत्यन्त धीमी और कष्टदायक है। सम्भव है कि न्यूटन के तीसरे नियम का कोई रूप आपके मसीही जीवन पर लागू होता हुआ प्रतीत हो: हर एक विजय के बदले एक समान और विपरीत विफलता।

आप अकेले नहीं हैं। महान प्रेरित पौलुस ने भी पाप के साथ अपने निरन्तर संघर्ष में गहरी निराशा प्रकट की: “मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ! मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?” (रोमियों 7:24)। पौलुस की हताशा की गहराई को पढ़ते हुए यह विचार करना उचित है कि शायद हम पर्याप्त रूप से निराश ही नहीं होते। आखिरकार, अपनी कलीसिया में बाइबल-अध्ययन के दौरान अपनी ही दुष्टता पर विलाप करते हुए चिल्ला उठना तो सामान्य व्यवहार नहीं है!

फिर भी, अपनी निराशा की अवस्था में भी पौलुस जानता था कि पाप, चाहे कितना ही गम्भीर क्यों न हो, अन्तिम निर्णय नहीं देगा—और न दे सकता है। अगले ही पद में आशा प्रकट होती है: “हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्‍वर का धन्यवाद हो!” (रोमियों 7:25)। फिर, अगले वाक्य में समस्या दोहराई जाती है, और हम सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र की सबसे ऊँची चोटियों में से एक पर पहुँचते हैं: रोमियों 8, जो आज के शीर्षक पद की महिमामय प्रतिज्ञा से आरम्भ होता है।

पौलुस अपनी असफलताओं के उत्तर में क्यों कहता है, “परमेश्वर का धन्यवाद हो”? क्योंकि “अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं।” अब भी नहीं, और कभी भी नहीं! यहाँ हमारे सामने सुसमाचार का एक अत्यन्त अद्‌भुत विरोधाभास है: मैं निर्बल हूँ, असफल हूँ, और दोषी हूँ; परन्तु उसी समय, मसीह में मैं सुरक्षित हूँ, दृढ़ हूँ, और प्रेम किया गया हूँ।

यह कैसे हो सकता है? इसका उत्तर पाने के लिए हम रोमियों की पुस्तक में एक और महान “अतः” की ओर देख सकते हैं: “अतः जब हम विश्‍वास से धर्मी ठहरे, तो अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्‍वर के साथ मेल रखें” (रोमियों 5:1)। हम ऐसे अनुग्रह के योग्य नहीं हैं। परमेश्वर न्यायपूर्वक हमें हमारे अभागेपन में डूबने दे सकता था। परन्तु इसके स्थान पर, यीशु के द्वारा वह हमें मेल प्रदान करता है और हमें आशा देता है। हम धर्मी ठहराए गए हैं; यीशु ने हमारा दण्ड अपने ऊपर ले लिया है, ताकि अब, जब उसका पिता हमें देखता है, तो वह यीशु और उसकी सम्पूर्ण सिद्धता को देखता है।

आप और मैं पापी हैं—हाँ, अत्यन्त पापी हैं, और हम अब भी वैसे ही हैं। परन्तु हम सर्वोच्च रीति से प्रेम किए गए हैं, पूर्ण रूप से क्षमा किए गए हैं, और दण्ड के किसी भी खतरे में कभी नहीं हैं। अपनी निरन्तर कमियों और असफलताओं पर होने वाली निराशा को न तो कभी दबाएँ और न ही अनदेखा करें। बल्कि यह आपको कृतज्ञता और विश्राम के साथ यीशु की ओर लौट आने के लिए प्रेरित करे। जितना अधिक हम अपने पाप के प्रति सचेत होंगे, उतना ही अधिक हमें यह सत्य अद्‌भुत प्रतीत होगा कि मसीह यीशु में रहने वालों के लिए दिव्य दण्ड का कोई अंश नहीं है—और न कभी होगा।

  भजन संहिता 103

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 137–139; 2 कुरिन्थियों 11:16-33

1 सितम्बर : जीवन के लिए धर्मशास्त्र

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1 सितम्बर : जीवन के लिए धर्मशास्त्र
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“परमेश्‍वर से मेरी प्रार्थना है कि क्या थोड़े में क्या बहुत में, केवल तू ही नहीं परन्तु जितने लोग आज मेरी सुनते हैं, इन बन्धनों को छोड़ वे मेरे समान हो जाएँ।” प्रेरितों 26:29


पौलुस का विश्वास जीवन की भट्ठी में तपाया गया था। जब उसके पैरों के नीचे से मानो भूमि खींच ली गई, तब उसने और भी अधिक यह सीखा कि परमेश्वर ही सब बातों पर नियन्त्रण रखता है।

रोम में पौलुस की दो वर्षों की कैद के समय ही उसने इफिसियों, फिलिप्पियों और कुलुस्सियों की कलीसियाओं को, और अपने मित्र फिलेमोन को पत्र लिखे। इसी दुख के काल में परमेश्वर ने उसे यीशु के विषय में यह लिखने के लिए प्रेरित किया, “सब वस्तुएँ उसी में स्थिर रहती हैं” (कुलुस्सियों 1:17)। जब उसने इफिसियों को लिखा, तो उसने उन्हें यह देखने के लिए उत्साहित किया कि जो परमेश्वर सब पर प्रभुता रखता है, उसने सब कुछ यीशु के पैरों तले कर दिया है (इफिसियों 1:22)। ये सत्य केवल कागजी नहीं थे। पौलुस ने अपने जीवन के सबसे कठिन समयों में इन्हीं पर भरोसा रखा।

पौलुस के अनुभवों ने निस्सन्देह उसे यह और गहराई से समझने में सहायता की कि उसे सुसमाचार की आवश्यकता केवल उद्धार के लिए ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जीवन के लिए है। हमें भी प्रतिदिन सुसमाचार की आवश्यकता है—यह शुभ समाचार कि यीशु पापियों के स्थान पर मरा, कि वह हमारे धर्मी ठहराए जाने के लिए जीवित किया गया, और कि उसने हमें पवित्र करने और हमें भर देने के लिए पवित्र आत्मा को भेजा।

सुसमाचार हमारे भीतर यीशु की वापसी की एक आश्वस्त प्रत्याशा उत्पन्न करता है। वह हमें संसार को स्वर्गिक दृष्टिकोण से देखने योग्य बनाता है।
जॉन स्टॉट ने, जिनकी विशाल सामग्री को समेटने और संक्षेप में प्रस्तुत करने की क्षमता अद्वितीय थी, पौलुस की कैद का उसके धर्मशास्त्र पर प्रभाव इस प्रकार संक्षेप में प्रस्तुत किया: “पौलुस का दृष्टिकोण समायोजित हुआ, उसका क्षितिज विस्तृत हुआ, उसकी दृष्टि स्पष्ट हुई और उसकी गवाही समृद्ध हुई।” उसकी जंजीरें निराशा या पश्चात्ताप का कारण नहीं बनीं। बल्कि उसकी परीक्षाएँ, जिन्होंने उसे निर्बलता और परमेश्वर पर निर्भरता की स्थिति में रखा, उसके दृष्टिकोण को बदलने वाला और क्षितिज को प्रकाशित करने वाला माध्यम सिद्ध हुईं। वह एक रोमी राज्यपाल, एक राजा और एक रानी के सामने खड़ा होकर कह सका, जो आपके पास है, उसे आप रख नहीं सकते। जो मेरे पास है, उसे मैं खो नहीं सकता। काश कि आप भी मेरे समान हो जाते—अनुग्रह से बचाए गए पापी, अनन्त जीवन के वारिस। मैं नहीं चाहता कि आप मेरी जंजीरों में मेरे सहभागी बनें, परन्तु मैं चाहता हूँ कि आप मेरे विश्वास में मेरे सहभागी अवश्य बनें।

पौलुस ने उसी सत्य का अनुभव किया जिसे उसने वर्षों पहले रोमियों को लिखा था: “हम जानते हैं कि जो लोग परमेश्‍वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिए सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन्हीं के लिए जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं” (रोमियों 8:28)। यह केवल पौलुस के लिए ही नहीं, बल्कि उन सब के लिए सत्य है जिन्होंने यीशु मसीह में विश्वास रखा है। क्या आप किसी निराशाजनक परीक्षा का सामना कर रहे हैं? साहस रखें! आपके पास वह सब है जिसकी आपको वास्तव में आवश्यकता है, और आप उसे खो नहीं सकते। संसार जो भी धन और सान्त्वना दे सकता है, वह उस धन के सामने कुछ भी नहीं जो आपके पास सुसमाचार में है—“मसीह जो महिमा की आशा है तुम में रहता है” (कुलुस्सियों 1:27)। मसीही धर्मशास्त्र राजमहलों के लिए नहीं, बल्कि कारागार की कोठरी के लिए है, परीक्षाओं के लिए है। सुसमाचार के सत्यों को अपने प्राण को दृढ़ करने और अपने दृष्टिकोण को आकार देने दें, जब आप उस आशा को थामे रहते हैं जिसे मसीह ने आपके लिए मोल लिया है।

प्रेरितों के काम 26:1-29

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 135–136; 2 कुरिन्थियों 11:1-15 ◊