“एस्तेर रानी ने उत्तर दिया, ‘हे राजा! यदि तू मुझ पर प्रसन्न है, और राजा को यह स्वीकार हो, तो मेरे निवेदन से मुझे, और मेरे माँगने से मेरे लोगों को प्राणदान मिले। क्योंकि मैं और मेरी जाति के लोग बेच डाले गए हैं, और हम सब घात और नष्ट किए जाने वाले हैं। यदि हम केवल दास–दासी हो जाने के लिए बेच डाले जाते, तो मैं चुप रहती; चाहे उस दशा में वह विरोधी राजा की हानि भर न सकता।’” एस्तेर 7:3-4
हम जोखिम उठाते हैं और अपने परमेश्वर की सेवा करते हैं, क्योंकि हमारी सफलता हम पर निर्भर नहीं करती।
वह समय आ गया था जब एस्तेर को मौर्दकै की चुनौती के अनुसार कार्य करना था और परमेश्वर की प्रजा के लिए राजा से बोलना था (एस्तेर 4)। उसने जानबूझकर उस आज्ञा-पत्र के शब्दों का प्रयोग किया: “घात” और “नष्ट” (3:13)। इसके अतिरिक्त, एस्तेर ने राजा से उसकी नैतिकता के आधार पर विनती नहीं की। इसके बजाय, उसने राजा के स्वार्थ—उसकी प्रिय रानी की हत्या—के आधार पर अपील की। एस्तेर ने कुशलता से ऐसे शब्द बोले कि राजा को दोषी ठहराए बिना ध्यान हामान पर केन्द्रित हो गया। जब राजा ने पूछा, “वह कौन है, और कहाँ है, जिसने ऐसा करने का निश्चय किया है?” (7:5), तो एस्तेर न्यायसंगत रूप से उसे दर्पण दिखा सकती थी—परन्तु वह बुद्धिमानी न होती!
इन सब के माध्यम से, परमेश्वर उन घटनाओं में कार्य कर रहा था जिन पर एस्तेर का कोई नियन्त्रण नहीं था। और वह उस ढंग में भी कार्य कर रहा था जिसमें एस्तेर ने अपनी बुद्धि, कौशल, आज्ञाकारिता आदि का प्रयोग किया—उसके व्यक्तित्व के वे पक्ष जिन पर उसका नियन्त्रण था।
ऐसा नहीं था कि परमेश्वर को एस्तेर की इतनी आवश्यकता थी कि यदि वह कार्य न करती तो उसकी योजना विफल हो जाती। ऐसा सोचना मानवीय उत्तरदायित्व को अत्यधिक महत्त्व देना होता। परन्तु यह भी सत्य नहीं है कि परमेश्वर एस्तेर की सहभागिता की परवाह किए बिना जो चाहता वह कर ही लेता। ऐसी सोच उसकी सार्वभौमिक सत्ता को मानवीय सहभागिता से अलग कर देती है। यह एक महान रहस्य है! परमेश्वर मनुष्यों को साधन के रूप में उपयोग कर सकता है, परन्तु वह हमारे बिना भी कार्य कर सकता है। और जब वह हमें उपयोग करता भी है, तब भी सफलता न तो उसके सेवकों पर और न उनके कार्यों पर निर्भर करती है।
यह हमारे लिए भी सत्य है, जब हम लोगों को यीशु के विषय में बताने या परमेश्वर के वचन की शिक्षा देने का प्रयास करते हैं। परमेश्वर जैसे चाहे वैसे अपने आप को प्रकट कर सकता है और अपनी प्रजा के विश्वास को जैसे चाहे वैसे बढ़ा सकता है, परन्तु वह हमें भी एक भूमिका देता है। वह हमें सिखाने, एक-दूसरे को प्रोत्साहित करने, और सुसमाचार का प्रचार करने की आज्ञा देता है। और इसलिए हम ऐसा करते हैं। परन्तु अन्ततः, हम जानते हैं कि किसी भी हृदय और जीवन का परिवर्तन जीवते परमेश्वर के कार्य के बिना कभी नहीं होता। वही कठोर हृदयों को कोमल करता है और अन्धकार में डूबी आँखों को खोलता है। वही साधनों और परिणाम, दोनों को ठहराने में समर्थ है।
और यही कारण है कि क्योंकि परमेश्वर सम्प्रभु है, आपके पास उसकी आज्ञा मानने के लिए हर कारण है। यद्यपि सफलता आप पर निर्भर नहीं करती, फिर भी जिस परमेश्वर ने सम्पूर्ण सृष्टि की रचना की है, उसने आपको उपयोग करने का चुनाव किया है। वह अपना भला कार्य पूरा करेगा (फिलिप्पियों 1:6)। वह अपनी प्रजा को अपने लोगों तक पहुँचाने और अपने लोगों की सेवा करने के लिए उपयोग करेगा। यह समझ आपको दीन बनाए, और साथ ही आपको उन कार्यों का सामना करने के लिए उत्साह दे जिनके लिए आपको बुलाया गया है—जोखिम उठाने, और उसकी सेवा करने और आज्ञा मानने के लिए, जब वह आप में और आपके द्वारा कार्य करता है।
एस्तेर 6:12–7:10
◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: विलापगीत 3–5; यूहन्ना 6:52-71