“तब एस्तेर ने मोर्दकै के पास यह कहला भेजा, ‘तू जाकर शूशन के सब यहूदियों को इकट्ठा कर, और तुम सब मिलकर मेरे निमित्त उपवास करो, तीन दिन रात न तो कुछ खाओ, और न कुछ पीओ। मैं भी अपनी सहेलियों सहित उसी रीति उपवास करूँगी; और ऐसी ही दशा में मैं नियम के विरुद्ध राजा के पास भीतर जाऊँगी; और यदि नष्ट हो गई तो हो गई।’” एस्तेर 4:15-16
केवल जब हम मरने से नहीं डरते, तब ही हम सचमुच जीने के लिए स्वतन्त्र होते हैं।
एस्तेर की पुस्तक में इस बिन्दु तक मोर्दकै निर्देश भेजता रहा और एस्तेर मुख्यतः उत्तर देती रही। परन्तु अब एस्तेर स्वयं निर्णय लेती है कि उसे क्या करना है। वह निष्क्रिय से सक्रिय हो जाती है—और वह यह पूर्ण, दृढ़ संकल्प के साथ करती है। वह अपने लोगों की ओर से राजा के पास जाएगी और उससे बात करेगी।
यद्यपि वह अकेली राजा के पास जाने वाली थी, फिर भी रानी का यह प्रयत्न एकाकी नहीं होने वाला था। उसका यहूदी समुदाय उसके साथ उसके लिए उपवास करने वाला था; वे सब इसमें एक साथ थे। यह उपवास शोक का नहीं, बल्कि अपनी घोर आवश्यकता को प्रकट करने का था ताकि परमेश्वर हस्तक्षेप करे। एस्तेर जान गई कि उसे कुछ करना है, परन्तु वह राजा के पास अव्यवस्थित रीति से नहीं जाना चाहती थी—केवल अपने रूप या इस आधार पर कि वह उसके लिए क्या मायने रखती है। वह राजा के पास केवल इस सामर्थ्य पर जाना चाहती थी कि परमेश्वर कौन है और वह क्या चाहता है।
परमेश्वर की इच्छा के प्रति एस्तेर की भक्ति स्पष्ट और प्रभावशाली थी: “यदि नष्ट हो गई तो हो गई।” वह राजा के पास जाने के लिए प्रतिबद्ध थी, यद्यपि यह व्यवस्था के विरुद्ध था और उसकी मौत का कारण भी हो सकता था (एस्तेर 4:10-11)। यद्यपि इसमें जोखिम था, तौभी वह समझती थी कि परमेश्वर की माँग अन्य सभी विचारों से ऊपर है। वह जानती थी कि वह परमेश्वर की प्रजा के भले के लिए जो कुछ कर सकती है, उसे करना चाहिए—और इसलिए वह अपना जीवन जोखिम में डालने को तैयार थी।
साधारण बुद्धि एस्तेर से कहती कि वह सुरक्षित रहे—चुप रहे और आशा करे कि शायद राजा स्वयं उसे अपनी उपस्थिति में बुला ले। परन्तु साधारण बुद्धि और विश्वास की बुद्धि सदा एक-दूसरे के अनुरूप नहीं होतीं। आखिरकार, साधारण बुद्धि तर्क देती है कि जीवन के साथ सबसे बुरा जो हो सकता है वह यह है कि हम उसे खो दें, जबकि विश्वास की बुद्धि मृत्यु को “लाभ” और “बहुत ही अच्छा” मानती है, क्योंकि वह मसीह के साथ रहने के लिए प्रस्थान है (फिलिप्पियों 1:21, 23)।
एस्तेर इस आवश्यक कार्य को करने के लिए मरने को भी तैयार थी। उसने ठान लिया था कि आज्ञाकारी होकर नाश होना, अवज्ञाकारी होकर जीवित रहने से उत्तम है। केवल जब हम अपनी आत्मिक यात्राओं में इस बिन्दु तक पहुँचते हैं जहाँ हम सच्चे मन से कह सकें, “यदि नष्ट हो जाऊँ तो हो जाऊँ,” तभी हम परमेश्वर के लिए जीवित रह सकते हैं। जोखिम बड़ा हो सकता है, परन्तु प्रतिफल अनन्त रूप से महान है। आज परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह आपके हृदय को ऐसी दिशा दे कि आप भजनकार के साथ मिलकर यह कह सकें, “तेरे आँगनों में का एक दिन और कहीं के हज़ार दिन से उत्तम है। दुष्टों के डेरों में वास करने से अपने परमेश्वर के भवन की डेवढ़ी पर खड़ा रहना ही मुझे अधिक भावता है” (भजन 84:10)। यदि आपका दृष्टिकोण ऐसा है, तो आप पाएँगे कि साहस और आज्ञाकारिता कहीं अधिक सरल और आनन्दपूर्ण हो जाएँगे।
एस्तेर 4:1-16
◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 13–15; यूहन्ना 5:1-24