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10 मार्च : अकेले पड़ जाने का झूठ

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10 मार्च : अकेले पड़ जाने का झूठ
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“हे परमेश्‍वर, कब तक! क्या तू सदैव मुझे भूला रहेगा? तू कब तक अपना मुखड़ा मुझसे छिपाए रहेगा?”  भजन संहिता 13:1

लोग कहते हैं कि जब आप मौज-मस्ती कर रहे होते हैं, तो समय बहुत तेज़ी से बीतता हुआ प्रतीत होता है। किन्तु जब परिस्थितियाँ कम उत्साही हो जाती हैं, तो जीवन धीमी गति से चलता हुआ प्रतीत होता है। हम अपने आप को यह सोचते हुए पाते हैं, “मुझे नहीं पता कि मैं कभी इन परिस्थितियों से बाहर निकल पाऊँगा या नहीं। और मुझे नहीं पता कि मैं इन्हें कैसे सहन कर पाऊँगा।”

भजन संहिता 13 में बार-बार पूछा जाने वाला एक प्रश्न यह है, “कब तक? कब तक?” यहाँ पर दाऊद की परिस्थितियों का तो वर्णन नहीं किया गया है, किन्तु वह स्पष्ट रूप से भुला दिया गया और त्यागा हुआ महसूस कर रहा है, जो एक ऐसी भावना है जिसे हम सभी समझ सकते हैं। यह वैसा ही है, जैसा हम किसी प्रियजन को खो देने पर महसूस करते हैं या जब हमें लगता है कि हमें अकेले ही किसी परीक्षा की घाटी से होकर जाना होगा।

अकेला पड़ जाना निस्सन्देह कुचल देने वाला अनुभव होता है। परन्तु यहाँ दाऊद ने जो लिखा है, वह और भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। वह महसूस कर रहा है कि स्वयं परमेश्वर ने ही उसे अकेला छोड़ दिया है।

यही भावना सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में परमेश्वर के कई अन्य लोगों में भी दिखाई देती है। यशायाह की पुस्तक में निर्वासन में गए हुए परमेश्वर के लोग चिल्लाते हैं, “यहोवा ने मुझे त्याग दिया है, मेरा प्रभु मुझे भूल गया है” (यशायाह 49:14)। मसीही पथ पर चलने वाले यात्रियों का, अर्थात् यीशु के सच्चे अनुयायियों और सेवकों का भी कभी-कभी यह कहने का मन करता है, “मुझे लगता है कि प्रभु ने सच में हमें भुला दिया है। यदि उसने सच में हमें भुला न दिया होता, यदि वह अब भी हमारे साथ होता तो हम इस स्थिति में कैसे होते? यदि वह सच में हमारी रक्षा कर रहा होता तो निश्चित रूप से हमें इन परीक्षाओं को नहीं झेलना पड़ता।”

फिर भी दाऊद की इस उभरती हुई निराशा में हम पाते हैं कि उसका अनुभव (जैसा कि प्रायः हमारे साथ भी होता है) वास्तविकता को प्रतिबिम्बित नहीं कर रहा है। और दाऊद में इस बात को स्वीकारने की आत्मिक परिपक्वता और दीनता है कि जो उसे सच लग रहा है , वह उससे मेल नहीं खा रहा जो वह जानता है  कि वास्तव में सच है। इसलिए वह स्वयं को परमेश्वर की महाकरुणा, उसके उद्धार और उसकी उदारता की याद दिलाता है, और संघर्ष और पीड़ा में होते हुए भी उन बातों में आनन्दित रहने का संकल्प लेता है (भजन संहिता 13:5-6)।

मसीही जीवन का आशा से भरा तनाव यही है। हम पूछ रहे होते हैं, “हे प्रभु, कब तक? हे परमेश्वर, आप कहाँ हैं?” जबकि हम अपने हृदयों को याद दिला रहे होते हैं कि परमेश्वर ने हमसे प्रेम करना, हमें छुड़ाना या हमारे भीतर काम करना समाप्त नहीं किया है।

त्याग दिए जाने के झूठ पर विश्वास न करें, जिसे आपकी भावनाएँ आपके सामने परोसती रहती हैं। अपने भुलक्कड़ लोगों के प्रति परमेश्वर की शान्ति प्रदान करने वाले इस प्रत्युत्तर में विश्राम प्राप्त करें, “क्या यह हो सकता है कि कोई माता अपने दूध पीते बच्चे को भूल जाए और अपने जन्माए हुए लड़के पर दया न करे? हाँ, वह तो भूल सकती है, परन्तु मैं तुझे नहीं भूल सकता। देख, मैं ने तेरा चित्र अपनी हथेलियों पर खोदकर बनाया है; तेरी शहरपनाह सदैव मेरी दृष्टि के सामने बनी रहती है” (यशायाह 49:15-16)। अपने बच्चों के लिए परमेश्वर का संरक्षण सूर्य के समान है, वह स्थाई है। यहाँ तक कि जब बादल इसे अवरुद्ध कर देते हैं, तब भी वह वहाँ होता है। यह सर्वदा वहाँ होता है।

क्या आप आज परमेश्वर की स्थिरता पर भरोसा करेंगे? जब आप अगली बार त्यागा हुआ महसूस करें तो यह जान लें कि परमेश्वर अपने हाथों को देखता है, जिन पर उसकी प्रत्येक सन्तान का नाम खुदा हुआ है और वह कहता है कि तुम यहीं हो। मैं तुम्हें नहीं भूला हूँ।       

भजन संहिता 13

9 मार्च : सीखने के लिए एक अवसर

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9 मार्च : सीखने के लिए एक अवसर
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“मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो, और मुझ से सीखो।”  मत्ती 11:29

जब बच्चे स्कूल से घर पहुँचते हैं, तो उनके माता-पिता उनसे क्या पूछते हैं?

कुछ लोग पूछते होंगे कि “क्या तुमने आज कुछ सीखा?” किन्तु कई लोग कुछ ऐसा कहते होंगे कि “क्या तुमने आज मज़ा किया?”

स्कूली शिक्षा के सम्बन्ध में यह महत्त्व नहीं रखता कि कौन सा प्रश्न पूछा जाता है और उसके परिणामस्वरूप कौन सी प्राथमिकता उजागर होती है। किन्तु कलीसिया के बारे में भी प्रायः यही प्रश्न पूछा जाता है कि क्या हमने आज कलीसिया में मज़ा  किया? क्या हमने कलीसिया का आनन्द  लिया?

इसके विपरीत, हमें जो पूछना चाहिए वह यह है, “हम यीशु के बारे में और यीशु से क्या सीख  रहे हैं?”

यीशु हमें उससे सीखने का अवसर देने का महान विशेषाधिकार प्रदान करता है। चारों सुसमाचारों में उसकी शिक्षा जीवन के बड़े प्रश्नों को सम्बोधित करती है, अर्थात् मैं कौन हूँ? मैं कहाँ से आया हूँ? मैं यहाँ क्यों हूँ? मैं कहाँ जा रहा हूँ? क्या जीवन का कोई महत्त्व है भी?

यीशु मसीह को व्यक्तिगत प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में जानना इन बड़े विषयों के बारे में लोगों के सोचने के तरीके को बदल देता है। यह समय के बारे में, संसाधनों के बारे में, आजीविका के बारे में, या फिर वे किस तरह के व्यक्ति से विवाह करना चाहेंगे या वे किस तरह का जीवनसाथी बनना चाहते हैं, इस बारे में उनके दृष्टिकोण को बदल देता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि यीशु को सच में जानने का अर्थ है उसे अपने जीवन पर अधिकारी बनने के लिए आमन्त्रित करना। जैसे-जैसे हम उससे सीखते हैं, सब कुछ बदल जाता है।

यीशु के पास आना इस बात को सीखने और उसके प्रति प्रत्युत्तर देने से आरम्भ होता है कि मसीह, अर्थात् अधर्मियों (जो कि हम हैं) के लिए धर्मी (जो कि वह है) ने पापों के कारण एक बार दुख उठाया ताकि हमें परमेश्वर के पास पहुँचाए (1 पतरस 3:18)। केवल मस्तिष्क में इस बात की जानकारी का होना इस बात पर विश्वास करने, इस पर भरोसा करने और जिसने हमें यह सब दिया है उसका जूआ प्रसन्नता के साथ अपने ऊपर उठा लेने के बराबर नहीं है।

हम सभी ऐसे लोगों को जानते हैं जो अपने जीवन की पहेली को सुलझाने के प्रयास में लगे हैं और पहेली के टुकड़ों को जितना हो सके उतना एक साथ जोड़ने का यत्न कर रहे हैं, और हम सब भी कभी न कभी ऐसी परिस्थिति में रह चुके हैं। किन्तु जब तक हम परमेश्वर से सीखने के लिए तैयार नहीं होंगे तब तक वे टुकड़े एक साथ नहीं जुड़ सकेंगे। परन्तु अब हम वास्तव में परमेश्वर को जान सकते हैं, हमारी बौद्धिक क्षमता के कारण नहीं अपितु इसलिए क्योंकि परमेश्वर अपने वचन की सच्चाई के द्वारा यह चुनता है कि हम उसको जानें।

क्या आप अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में यीशु से सीखने के लिए तैयार हैं? क्या आप उसकी शिक्षाओं का पालन करने और अपने आप को उसके अधिकार के अधीन रखने के काम को एक विशेषाधिकार के रूप में देखते हैं, न कि एक बोझ के रूप में? सुनिश्चित करें कि आप सुसमाचार के सत्य को सीखने के प्रत्येक अवसर का लाभ उठाएँगे, जो आपके हृदय की तृष्णा को तृप्त करेगा और दिन-प्रतिदिन आपके जीवन को परिवर्तित करता जाएगा।

      इफिसियों 4:17 – 5:2

8 मार्च : अब्राहम की आशा

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8 मार्च : अब्राहम की आशा
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“न अविश्वासी होकर परमेश्‍वर की प्रतिज्ञा पर संदेह किया, पर विश्वास में दृढ़ होकर परमेश्‍वर की महिमा की।”  रोमियों 4:20

अब्राहम के सन्तान पैदा होने से पहले ही परमेश्वर ने उससे प्रतिज्ञा की थी कि उसके वंशज संख्या में वृद्धि करके एक विशाल जनसमूह बन जाएँगे। समय बीतता गया और ऐसा लगने लगा कि अब्राहम और उसकी पत्नी सारा को कभी कोई सन्तान नहीं होगी। ऐसा लग रहा था कि प्रतिज्ञा पूरी न हो सकेगी, इसलिए अब्राहम और सारा ने प्रतीक्षा न करते हुए स्वयं ही इस विषय में कुछ करने का निर्णय लिया। सारा ने अपनी दासी हाजिरा को अब्राहम के लिए एक सन्तान उत्पन्न करने का प्रस्ताव दिया और हाजिरा ने एक बच्चे को जन्म दिया, जिसका नाम इश्माएल रखा गया। फिर भी परमेश्वर ने यह स्पष्ट कर दिया कि उसने जो वंशज देने की प्रतिज्ञा की थी, वे इश्माएल की वंशावली से नहीं आने वाले थे। परमेश्वर अब्राहम और सारा को दिखा रहा था कि यदि उसकी प्रतिज्ञा को पूरा होना है, तो केवल वही इसे पूरा कर सकता है। अब्राहम को एक काम दिया गया और वह था परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर भरोसा करना, एक ऐसी प्रतिज्ञा पर जिसके पूर्ण होने में भारी कठिनाइयाँ थीं और इसलिए उसे पूर्ण करने के लिए एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर की आवश्यकता थी।

वर्ष बीतते गए और सारा अभी भी गर्भवती न हुई। परमेश्वर फिर से अब्राहम के पास आया और उसे आश्वस्त किया कि इतनी आयु हो जाने के बाद भी सारा एक बेटे को जन्म देगी। अन्ततः, नब्बे साल की आयु में उसने एक पुत्र को जन्म दिया और उसका नाम इसहाक रखा गया, जिसका अर्थ है “वह हँसता है।” अब्राहम, जो एक बार इसहाक के जन्म की सम्भावना पर सन्देह करते हुए हँसा था (उत्पत्ति 17:17), वह अब निश्चित रूप से विस्मय से अभिभूत था।

परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करता है। नब्बे साल की स्त्री के लिए सन्तान को जन्म देना असम्भव बात है, परन्तु परमेश्वर ऐसा करने में सक्षम है। इस वृद्ध दम्पति को दी गई एक वारिस की प्रतिज्ञा को पूरा होने के लिए अन्य किसी भी बात से बढ़कर जीवन के अलौकिक वरदान की आवश्यकता थी। परमेश्वर के दिव्य हस्तक्षेप के बिना कोई सन्तान नहीं हो सकती थी, अर्थात् कोई जन्म हो ही नहीं सकता था। इसी प्रकार, परमेश्वर के हस्तक्षेप के बिना कोई आत्मिक जीवन नहीं हो सकता। किन्तु उसके सामर्थ्य से एक नया जीवन मिल सकता है, एक सच्चा जीवन! आदि से ही परमेश्वर अपने लोगों को सिखा रहा था कि किसी भी जीवन में सुसमाचार को जड़ पकड़ने के लिए आश्चर्यकर्म की आवश्यकता पड़ती है।

परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाएँ पूरी करता है। और अपने लोगों से की गई उसकी प्रतिज्ञाएँ बहुत सारी हैं, वे सभी शोभायमान हैं और वे सब मसीह में “हाँ” के साथ हैं (2 कुरिन्थियों 1:20)। हमारा काम बसी यही है कि हम वही करें जो अब्राहम ने करना सीखा था, अर्थात् परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर भरोसा करना, भले ही उनका पूरा होना बहुत दूर की बात या असम्भव क्यों न लगता हो। और फिर, एक ऐसी प्रतिज्ञा जिसके पूरे होने में भारी कठिनाइयाँ हों, उसे पूरा करने के लिए एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर की आवश्यकता होती है, और वही तो वह परमेश्वर है, जिसे आप और मैं पिता कहकर पुकारते हैं।

क्या आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जिसे यह याद दिलाने की आवश्यकता है कि परमेश्वर आज भी अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करता है? यदि सच कहें तो हम सभी को यह बात याद दिलाए जाने की आवश्यकता है। अब्राहम के समान केवल परमेश्वर पर ही अपनी आशा रखें। वह अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने में सक्षम है और केवल उसके सामर्थ्य से ही वे पूरी हो सकेंगी। किन्तु आप तो जानते हैं कि परमेश्वर आश्चर्यकर्म करता है, केवल इतना करें कि आईने में देखें और याद करें कि सितारों को उनके स्थान पर रखने और संसार को बनाए रखने में जिस दिव्य सामर्थ्य की आवश्यकता है, उसी सामर्थ्य ने आपके हृदय को जागृत किया है, आप में विश्वास पैदा किया है और आपको अनन्त जीवन दिया है।       उत्पत्ति 15:1-21

7 मार्च : सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में यीशु

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7 मार्च : सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में यीशु
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“खोजे ने फिलिप्पुस से पूछा, ‘मैं तुझ से विनती करता हूँ, यह बता कि भविष्यद्वक्ता यह किसके विषय में कहता है, अपने या किसी दूसरे के विषय में?’ तब फिलिप्पुस ने अपना मुँह खोला, और इसी शास्त्र से आरम्भ करके उसे यीशु का सुसमाचार सुनाया।”  प्रेरितों के काम 8:34-35

बाइबल का गम्भीरता से अध्ययन करते समय हम जान जाते हैं कि यीशु किसी अप्रत्याशित रूप से अस्तित्व में नहीं आ गया। आरम्भ से लेकर अन्त तक बाइबल की पुस्तक उसी के बारे में बताती है। निस्सन्देह, पुराने नियम के भविष्यद्वक्ताओं ने भी आत्मा की प्रेरणा से यीशु के बारे में लिखा। चाहे हम पवित्रशास्त्र को कितनी भी अच्छी तरह से जानते हों, फिर भी यदि हम मसीह से अपनी आँखें हटा लेते हैं तो हम इसके केन्द्र, इसकी कुंजी और इसके नायक को देखने से चूक जाएँगे।

सुसमाचारों में यीशु लोगों का ध्यान पुराने नियम की ओर लाता है, जिससे उन्हें यह समझने में सहायता मिल सके कि वह कौन था। अपने सेवाकार्य के आरम्भ में वह एक बार आराधनालय में यशायाह की पुस्तक से पढ़ रहा था। लूका हमें बताता है कि जब उसने समाप्त किया, तो वह अपने सुनने वालों से “कहने लगा, आज ही यह लेख तुम्हारे सामने पूरा हुआ है” (लूका 4:21)। आगे, पुराने नियम में विशेष रूप से रुचि रखने वाले और उसे अच्छी रीति से जानने वाले लोगों से बात करते हुए यीशु ने उन्हें चेतावनी दी, “तुम पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उसमें अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है; और यह वही है जो मेरी गवाही देता है” (यूहन्ना 5:39)। अपनी मृत्यु और पुनरुत्थान के बाद जब इम्माऊस के मार्ग में यीशु का सामना अपने कुछ निराश अनुयायियों से हुआ, तो उसने “मूसा से और सब भविष्यद्वक्ताओं से आरम्भ करके सारे पवित्रशास्त्र में से अपने विषय में लिखी बातों का अर्थ, उन्हें समझा दिया।” (लूका 24:27)।

दूसरे शब्दों में, यीशु ने स्पष्ट रूप से यह शिक्षा दी कि पुराने नियम का प्रत्येक भाग उसी में अपना केन्द्र और पूर्णता पाता है।

जब आप पवित्रशास्त्र पढ़ते हैं तो आपकी मुलाकात यीशु से होती है, क्योंकि यह पुस्तक उसी की गवाही देती है। भले ही पुराने नियम के खण्डों का हमारा अध्ययन और समझ हमें जीवन के बारे में अच्छे और महत्त्वपूर्ण नैतिक सत्य प्रदान करते हैं, फिर भी एक बहुत बड़ा संकट यह है कि हम उस परम सत्य, अर्थात् यीशु को उसमें न देख पाएँ। आपकी बाइबल के प्रत्येक पृष्ठ का उद्देश्य यह है कि आप यीशु से भेंट कर सकें, उसे जान सकें, और उसके महान नाम की उद्‌घोषणा कर सकें और यह सब उसकी महिमा के लिए हो।

उस प्रत्येक प्रवचन में जिसे आप सुनते हैं, उस प्रत्येक पाठ में जिसका आप अध्ययन करते हैं, और परमेश्वर के वचन के उस प्रत्येक खण्ड में जिसे आप पढ़ते हैं, आप अपने आप से पूछें कि “क्या यह मुझे मसीह तक लेकर आया? क्या मैंने इसमें यीशु को पाया?” और जब तक आप “हाँ” में उत्तर न दे सकें तब तक सुनना, अध्ययन करना और पढ़ना बन्द न करें क्योंकि उद्धार, सत्य, बुद्धि और आश्वासन के खजाने उसी में पाए जाते हैं।       

भजन संहिता 119:17-32

6 मार्च : तू कहाँ है?

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6 मार्च : तू कहाँ है?
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“आदम और उसकी पत्नी वाटिका के वृक्षों के बीच यहोवा परमेश्‍वर से छिप गए . . . तब यहोवा परमेश्‍वर ने पुकारकर आदम से पूछा, ‘तू कहाँ है?’”  उत्पत्ति 3:8-9

जातियों, भाषाओं और भौगोलिक सीमाओं से परे, प्रत्येक स्थान पर बच्चे लुका-छिपी खेलने का आनन्द लेते हैं। यह सारे जगत में खेला जाने वाला भोलेपन से भरा एक खेल है। किन्तु इस संसार में लुका-छिपी का पहला खेल न तो मनोरंजक था और न ही भोलेपन से भरा हुआ। वह बहुत ही चिन्ताजनक था।

बगीचे में आदम और हव्वा अपनी अनाज्ञाकारिता के बाद अंजीर के पत्तों के पीछे एक-दूसरे से और बगीचे के पेड़ों के पीछे अपने सृष्टिकर्ता से छिप गए। उन्होंने छिपे रहने का प्रयास किया, परन्तु परमेश्वर इस एक साधारण प्रश्न के साथ उन्हें खोजने आया, “तू कहाँ है?”

यह प्रश्न इस आम धारणा को उलट देता है कि मनुष्य उस परमेश्वर को ढूँढ रहा है, जो जगत में कहीं या उससे भी परे कहीं छिपा हुआ है। इसके विपरीत, हम इसके उलट पाते हैं कि हम ही छिपे हुए हैं और परमेश्वर हमें ढूँढता हुआ आता है।

परमेश्वर द्वारा इन पहले मनुष्यों से पूछा गया ये प्रश्न विचित्र लग सकता है। क्या परमेश्वर पहले से ही सब कुछ नहीं जानता? आदम और हव्वा कहाँ थे, यह प्रश्न परमेश्वर ने इसलिए नहीं पूछा था कि वह नई जानकारी प्राप्त कर सके, परन्तु इसलिए कि वह उन्हें उनकी परिस्थिति को समझने में सहायता करना चाहता था। परमेश्वर उन्हें बाहर निकालने  से अधिक उन्हें उजागर करने  के लिए आया था।

कल्पना कीजिए कि आदम और हव्वा के विद्रोह के उत्तर स्वरूप परमेश्वर कितने तरीकों से प्रतिक्रिया कर सकता था। यदि उसने न्याय करते हुए कठोरता से उत्तर दिया होता, तो वह उसी क्षण मृत्यु-दण्ड ला सकता था जिसके बारे में उसने उन्हें चेतावनी भी दी थी (उत्पत्ति 2:16-17)। किन्तु सदैव दया करना परमेश्वर के स्वभाव में है, इसलिए वह ऐसा करने के विपरीत केवल एक प्रश्न लेकर आया। मानवजाति द्वारा परमेश्वर से मुँह मोड़ने के बाद यह परमेश्वर के अनुग्रह की पहली झलक है। परमेश्वर ने उन्हें उसी समय वह नहीं दिया जिसके वे योग्य थे; परन्तु अपनी असीम दया में से उसने वह दिया जिसके वे योग्य नहीं थे, अर्थात् प्रत्युत्तर देने और लौट आने का एक अवसर।

हम में से कोई भी सहज महसूस नहीं करेगा यदि हमारे सबसे निकटतम लोग हमारे सभी गुप्त विचारों और किए गए कार्यों को देख सकते। हम एक-दूसरे से और सम्भवतः अपने आप से भी सच्चाई छिपा सकते हैं। परन्तु परमेश्वर से छिपाना व्यर्थ है। न तो छिपाने का कोई तरीका है और न ही किसी और पर दोष मढ़ने का कोई तरीका है।

हमें इस झूठ पर विश्वास नहीं करना चाहिए कि परमेश्वर उन “छोटे” पापों को नहीं देखेगा, जिन्हें हम दूसरों से छिपाते हैं। वह सब देखता है। वह तो हमारी आत्माओं के भीतर देखता है और जानता है कि हमने क्या किया है और हमारी परिस्थिति क्या है। यह बहुत बढ़िया है कि हमें यह दिखावा करने की आवश्यकता नहीं है कि हम कुछ छिपा सकते हैं। वह हम पर दया करने आता है हमारा न्याय करने नहीं, क्योंकि “परमेश्‍वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिए नहीं भेजा कि जगत पर दण्ड की आज्ञा दे, परन्तु इसलिए कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए” (यूहन्ना 3:17)। क्या आप किसी सताने वाले पाप या छिपी हुई लज्जा के कारण बोझिल हैं? क्या आप परमेश्वर से भी वह बात छिपाना चाह रहे हैं, जो आप दूसरों से छिपाते रहे हैं? परमेश्वर से छिपाना बन्द करने का सबसे अच्छा समय अब है। ज्योति में आ जाएँ। जो उसके सामने छिपा नहीं रह सकता उसे उजागर करें, ताकि वह उसे अपने लहू से ढक सके और आप जान सकें कि आप को जान लिया गया है और क्षमा कर दिया गया है। वह एक दयालु और बचाने वाला परमेश्वर है, जो हमारे साथ सम्बन्ध स्थापित करने की अभिलाषा रखता है।       1 यूहन्ना 1:8-2:2

5 मार्च : परमेश्वर हमारी ओर है

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“जब किसी की परीक्षा हो, तो वह यह न कहे कि मेरी परीक्षा परमेश्‍वर की ओर से होती है; क्योंकि न तो बुरी बातों से परमेश्‍वर की परीक्षा हो सकती है, और न वह किसी की परीक्षा आप करता है।”  याकूब 1:13

जब हम यीशु मसीह में विश्वास करते हैं और पाप के बन्धन टूट जाते हैं, तो हमारे लिए कई बातें उसी समय से सच हो जाती हैं। हम मृत्यु से जीवन में स्थानान्तरित हो जाते हैं और परमेश्वर का आत्मा हमारे भीतर वास करने लगता है। हम उसके घराने के हो जाते हैं। हम छुटकारा पाए लोग बन जाते हैं, हम में बदलाव हो जाता है और हमारा नया जन्म हो जाता है। पाप अब हमारे जीवनों में प्रभुत्व नहीं करता। किन्तु वह बना  अवश्य रहता है।

मसीह पर भरोसा करने के द्वारा हम ऐसी सहजता का जीवन व्यतीत नहीं करने लग जाते, जिससे हम दुष्ट के हमलों से या अपने हृदय की कपटी इच्छाओं से मुक्त हो जाते हैं। इसके विपरीत, हृदय परिवर्तन से लेकर मसीह को देखने और उसके जैसा बनते जाने तक प्रत्येक मसीही व्यक्ति प्रलोभन के विरुद्ध “एक निरन्तर और अपरिवर्तनीय युद्ध”[1] में उलझा रहता है।

पवित्रशास्त्र प्रलोभन के बारे में चेतावनियों से भरा हुआ है, अर्थात् पाप और बुराई के प्रति वह आकर्षण जिसका हम सभी अनुभव करते हैं। प्रलोभन केवल उन वस्तुओं की लालसा का होना ही नहीं है जो निरंकुश और अकल्पनीय हों, परन्तु परमेश्वर ने जो भली वस्तुएँ हमें दी हैं उनका उपयोग (या दुरुपयोग) इस तरह से करना जो परमेश्वर के विरुद्ध पाप है। स्क्र्यूटेप लेटर्स  में सी. एस. लुईस पाप की इस कुटिलता का उस स्थान पर उल्लेख करते हैं, जहाँ स्क्र्यूटेप अपने प्रशिक्षु दुष्टात्मा को भड़कता है कि “जिन सुखों को हमारे शत्रु [अर्थात्, परमेश्वर] ने उत्पन्न किया है, वह जाकर मनुष्यों को प्रोत्साहित करे कि वे कभी-कभार, ऐसे तरीकों से, या मात्राओं में लें जिन्हें उसने निषिद्ध किया है।”[2]

पवित्रशास्त्र स्पष्ट है कि परमेश्वर कभी भी प्रलोभन का स्रोत नहीं होता और न ही हो सकता है। जब याकूब कहता है कि “परमेश्वर . . . किसी को प्रलोभन में नहीं डालता,” तो वह अपना कथन परमेश्वर के चरित्र पर आधारित कर रहा है। परमेश्वर दूसरों को बुराई के लिए प्रलोभित करने में इसलिए असमर्थ है, क्योंकि वह स्वयं इससे प्रभावित नहीं होता। दूसरों को बुराई के लिए प्रलोभित करने के लिए बुराई में हर्षित होने की आवश्यकता पड़ेगी, और परमेश्वर बुराई से प्रसन्न नहीं होता।

जिस शब्द का अनुवाद “प्रलोभन” के रूप में किया गया है, उसका अनुवाद “परीक्षण” के रूप में भी किया जा सकता है। इस प्रकार जिसे हमारा पतित स्वभाव पाप के प्रलोभन में बदल सकता है, वह एक ऐसा परीक्षण भी है जो हमारे विश्वास को दृढ़ कर सकता है। जब हम परीक्षण के समय का सामना करते हैं, जिसकी अनुमति स्वयं परमेश्वर देता है, तो हमें याद रखना चाहिए कि उसका उद्देश्य हमारी विफलता नहीं, बल्कि हमारा लाभ है। शैतान चाहता है कि हम असफल हों, परन्तु परमेश्वर चाहता है कि हम सफल हों। परमेश्वर हमारी ओर है, और वह प्रत्येक बात को, यहाँ तक कि परीक्षण और प्रलोभन भी, हमारी भलाई के लिए कर रहा है।

आप नियमित रूप से किन प्रलोभनों से जूझ रहे हैं (या हार मान रहे हैं)? उन्हें प्रलोभन के रूप में तो देखें, किन्तु अपने चल रहे युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए ऐसे अवसरों के रूप में भी देखना सीखें जो आज्ञाकारिता चुनने, अपने पिता को प्रसन्न करने, मसीह के समान बनने के क्षण हैं। “शैतान का सामना करो, तो वह तुम्हारे पास से भाग निकलेगा” (याकूब 4:7)।       

1 पतरस 1:13-21

4 मार्च : क्षमा किया गया व्यक्ति और क्षमाशील व्यक्ति

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4 मार्च : क्षमा किया गया व्यक्ति और क्षमाशील व्यक्ति
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“इसलिए जैसे मैं ने तुझ पर दया की, वैसे ही क्या तुझे भी अपने संगी दास पर दया करना नहीं चाहिए था?  मत्ती 18:33

क्षमा किए गए व्यक्ति को क्षमाशील व्यक्ति होना चाहिए, और चूंकि क्षमा करना हमारे लिए स्वाभाविक नहीं है, इसलिए हमें इस बात को बार-बार सुनने की आवश्यकता है।

दूसरे शब्दों में हम क्षमा इसलिए करते हैं, क्योंकि यीशु के द्वारा परमेश्वर हमें क्षमा करता है। बाइबल इस बात को पूरी तरह से स्पष्ट कर देती है कि क्षमा करने का भाव किसी मानवीय गुण से उत्पन्न नहीं होता और यह दूसरों के प्रति दयालु और क्षमाशील होने के हमारे अपने प्रयासों का परिणाम नहीं है, परन्तु यह परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा आता है।

इस कारण, किसी व्यक्ति द्वारा अपने पापों का वास्तव में पश्चाताप करने का एक मुख्य प्रमाण उसमें क्षमा करने की भावना का होना है। इसके विपरीत, यदि हम लगातार अपने हृदयों में शत्रुता, द्वेष और कड़वाहट रखते हैं तो हम न केवल अपने जीवनों को हानि पहुँचाते हैं और अपने सम्बन्धों को संकट में डालते हैं, अपितु सच कहें तो हम यह प्रश्न भी उठाते हैं कि क्या हमने सच में परमेश्वर की क्षमा की प्रकृति को समझा भी है।

वास्तविक रूप से क्षमा प्रदान करना तब तक असम्भव है, जब तक हमने इसका अनुभव स्वयं नहीं किया है, और यदि हमने इसका अनुभव किया है तो ऐसा न करना असम्भव बात है। यह हमारे हृदय से तभी प्रवाहित होगी, जब हम परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा बदले जा चुके होंगे और उसके विरुद्ध अपने अपराध की भयावहता पर विचार कर चुके होंगे। जब ऐसा परिवर्तन आ जाता है, तो लोगों ने जो हमारे विरुद्ध पाप किए हों उनका भार कम हो जाएगा क्योंकि, जिस प्रकार हमें क्षमा मिल चुकी है उसी प्रकार परमेश्वर हमें भी क्षमा करने में सक्षम बना देता है।

मत्ती 18 में सेवक के बारे में यीशु के दृष्टान्त के पीछे यही सिद्धान्त है। आज के समय के अनुसार देखा जाए, तो जिस सेवक का पहली सदी में आज के हिसाब से 70 हजार करोड़ रुपए का ऋण माफ कर दिया गया था, उसने 17 लाख रुपए का ऋण माफ करने से इनकार कर दिया। यीशु चाहता है कि हम उस सेवक की नासमझी को देखें जिसका इतना बड़ा ऋण माफ कर दिया गया था और फिर भी वह उस ऋण को माफ करने से इनकार कर रहा था जो उसका किसी दूसरे पर बकाया था। अपने आप में देखा जाए तो वह ऋण बहुत बड़ा था, किन्तु उस राशि की तुलना में जो उसके लिए माफ की गई थी, वह बहुत छोटा था। इसी प्रकार यह बात समझ से परे लगती है कि हम कभी भी दूसरों को क्षमा न करें, जबकि परमेश्वर के विरुद्ध हमारे अपराध के इतने बड़े ऋण को क्षमा कर दिया गया है।

 यदि हमने परमेश्वर की दया का अनुभव किया है, तो निश्चित रूप से हमें क्षमा करने को अनदेखा नहीं करनी चाहिए। दूसरों को क्षमा करने में हमें परमेश्वर की क्षमा की पूर्णता का आनन्द मिलता है। जिन पापों के अभिलेखों को थामे रहने के लिए आप प्रलोभित होते हैं, उन्हें त्याग दें। जब ऐसा करना कठिन लगे क्योंकि जिस गलती को आपको क्षमा करने के लिए कहा जा रहा है वह बड़ी है, तब उस ऋण को देखें जिसे परमेश्वर ने आपके लिए क्षमा किया है और देखें कि ऐसा करने के लिए उसने क्या त्याग किया है, तो ये बातें आपको अपनी ओर से दया दिखाने में सक्षम बना देंगी। यदि परमेश्वर ने आपको क्षमा किया है, तो वह दूसरों के साथ सद्‌भाव में चलने में आपकी सहायता करने के लिए अपनी दया और अनुग्रह अवश्य उण्डेलेगा।       
मरकुस 11:20-25

3 मार्च : आत्मा में विश्राम

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3 मार्च : आत्मा में विश्राम
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“इसलिए जब कि उसके विश्राम में प्रवेश करने की प्रतिज्ञा अब तक है, तो हमें डरना चाहिए ऐसा न हो कि तुम में से कोई जन उससे वंचित रह जाए। क्योंकि हमें उन्हीं की तरह सुसमाचार सुनाया गया है, पर सुने हुए वचन से उन्हें कुछ लाभ न हुआ; क्योंकि सुनने वालों के मन में विश्वास के साथ नहीं बैठा।”  इब्रानियों 4:1-2

प्रायः मसीही लोग छुट्टी मनाने में तो बहुत कुशल होते हैं, किन्तु वे विश्राम करने में उतने ही खराब होते हैं। ऐसा क्यों है? एक कारण यह हो सकता है कि पश्चिमी संस्कृति सफलता और समृद्धि के उच्चतर स्तरों को लगातार खोजते रहने को बहुत महत्त्वपूर्ण मानती है। यहाँ तक कि हमारा छुट्टी का समय भी “गतिविधियों में व्यस्त रहने” और कुछ न कुछ सुधार करने तथा सफल होने की अभिलाषा से भरा होता है। और इसके पीछे प्रत्येक संस्कृति का रोग छिपा होता है, अर्थात् उस परमेश्वर से हमारा अलगाव जिसने हमें सृजा और हमें काम करने तथा विश्राम करने के लिए बनाया है।

जब से संसार में पाप आया है, तब से विश्राम मानवजाति से लुप्त होता गया है। मानवजाति के बारे में आप चाहे कोई भी अन्य बात क्यों न कहें, फिर भी यह तथ्य निर्विवाद है कि हममें शान्ति या विश्राम दिखाई नहीं देता। यदि शान्ति के कुछ क्षण पाने के लिए आपने अथक परिश्रम किया हो या फिर आप अपने छुट्टी के समय को गतिविधियों से भर देते हैं, तो वह छुट्टी का समय विश्राम करना नहीं है। निश्चित रूप से परमेश्वर कुछ और चाहता है।

परमेश्वर एक ऐसा विश्राम प्रदान करता है, जो हमारी आत्माओं को शान्त करता है। आत्मा में विश्राम उस जीवन से प्रवाहित होता है, जो विश्वास में उसके प्रति समर्पित होता है। जब पाप के कारण आई मृत्यु की धूल मानवजाति पर जम गई, तब से हम उस गहन विश्राम का आनन्द लेने में असमर्थ हो गए जो परमेश्वर ने चाहा था। हमें आवश्यकता है एक नई उत्पत्ति की, और परमेश्वर ने ठीक वही हमें प्रदान कर दिया है! “यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है” (2 कुरिन्थियों 5:17)। सृष्टि के सृजन में परमेश्वर ने शारीरिक विश्राम के सिद्धान्त की स्थापना की और छुटकारे में उसने पूर्ण आत्मिक विश्राम की सम्भावना स्थापित की। फिर भी सभी प्रकार के लोग, जिनमें कुछ मसीही होने का दावा करने वाले लोग भी सम्मिलित हैं, परमेश्वर के प्रति अनादर के साथ अपना जीवन जीने पर अड़े रहते हैं। वे अपनी आत्माओं को विश्राम देने के उसके निमन्त्रण को ठुकरा देते हैं और इस प्रकार केवल वचन के सुनने वाले बने रहते हैं, उस पर चलने वाले नहीं (याकूब 1:22)। और फिर वे मरने पर विश्राम में अपने प्रवेश कर लेने की आशा करते हैं। बाइबल जीवन के प्रति ऐसे दृष्टिकोण को कोई आशा प्रदान नहीं करती है। जिस तरह मरुभूमि में इस्राएलियों के लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ व्यर्थ ठहरीं क्योंकि वे उन पर विश्वास करने में विफल रहे, उसी तरह यदि हम भी अपने विश्वास रहित प्रयासों में लगे रहेंगे तो इस जीवन में या आने वाले जीवन में आत्मा में विश्राम प्राप्त करने के परमेश्वर के वरदान को जानने की आशा नहीं कर सकते।

धन्यवाद है कि यीशु में सब कुछ निश्चित हो जाता है। वह खोखले धार्मिक दिखावे और निराशाजनक सांसारिक प्रयासों के मुखौटे को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़कर हमें यह अनुग्रहकारी निमन्त्रण देता है, “हे सब परिश्रम करने वालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा। मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो, और मुझसे सीखो; क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूँ : और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे” (मत्ती 11:28-29)। यह एक ऐसा विश्राम है जिसका हम काम करते हुए भी आनन्द उठाते हैं, एक ऐसा विश्राम जो वास्तव में हमें हमारे काम से विश्राम पाने में सक्षम बनाता है, और एक ऐसा विश्राम जिसका हम अन्ततः एक दिन पूरी तरह से और अनन्त काल तक उसकी उपस्थिति में आनन्द लेंगे। क्या आपकी आत्मा में आज विश्राम है? या आप इस बात को लेकर चिन्तित हैं कि कल क्या होगा या फिर आपके अनुसार जो आज आपको पा लेना चाहिए था, उसके बारे में सोचते हुए थक गए हैं? वह कार्य जो आपकी सबसे बड़ी अभिलाषा को तृप्ति प्रदान करता है और आपकी सबसे बड़ी आवश्यकता का समाधान करता है, वह उद्धार का कार्य यीशु ने कलवरी में आपकी ओर से पूरा कर दिया था। वह आपको यह जानने के लिए अपने पास आने का निमन्त्रण देता है कि उसने आपके अनन्त भविष्य का समाधान कर दिया है और वे कार्य जो उसने आज आपके लिए निर्धारित किए हैं वे सभी पूरे होकर रहेंगे, न उससे अधिक और न उससे कम। इसलिए उस पर विश्वास  करें और अपनी आत्मा को वास्तव में विश्राम करने दें.  इब्रानियों 4:1-10

2 मार्च : मेरे हाथ में कुछ भी नहीं

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2 मार्च : मेरे हाथ में कुछ भी नहीं
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“मसीह ने जो हमारे लिए शापित बना, हमें मोल लेकर व्यवस्था के शाप से छुड़ाया, क्योंकि लिखा है, ‘जो कोई काठ पर लटकाया जाता है वह शापित है।’ यह इसलिए हुआ कि अब्राहम की आशीष मसीह यीशु में अन्यजातियों तक पहुँचे, और हम विश्वास के द्वारा उस आत्मा को प्राप्त करें जिसकी प्रतिज्ञा हुई है।”  गलातियों 3:13-14

यीशु में विश्वास करने वाले लोगों के रूप में हमें पाप के बड़े अभिशाप से छुटकारा मिल चुका है। इस छुटकारे का आश्चर्य हमें उसी क्षण मोह लेता है जब हम इस बात को समझ जाते हैं कि यह अभिशाप, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर के समक्ष हम दोषी हैं और मृत्यु के योग्य हैं, मसीह के द्वारा हमसे हटा लिया गया है।

बचाए जाने के बाद भी इस आश्चर्य का खत्म हो जाना और इस बात की मनोहरता का कम हो जाना एक सरल बात है। हम इतनी सरलता से सुखद और आरामदायक जीवन जीना आरम्भ कर सकते हैं कि हम पर जो पाप की पकड़ है, उसे देखना कठिन हो जाता है। इतनी सरलता से हम यह मानने लग जाते हैं कि यदि हम अपने वैवाहिक सम्बन्धों, अपनी नौकरी, अपने सम्बन्धों में और अपनी सफलता पर थोड़ा और प्रयास करें तो हम भले लोग बन सकते हैं तथा आशीष के पात्र बन सकते हैं। हम विश्वासी लोग नहीं बनना चाहते, बल्कि सफल व्यक्ति बनना चाहते हैं। निरन्तर हम अपने स्वयं के प्रयासों पर आधारित झूठे धर्म की ओर प्रलोभित होते रहते हैं।

गलातियों की कलीसिया के सामने भी यही प्रलोभन था। इसीलिए पौलुस ने उन्हें लिखा और अनिवार्य रूप से कहा कि मसीही सन्देश यह है ही नहीं।  वास्तविकता तो यह है कि यह इसके पूरी तरह उलट है! यदि सुसमाचार यह है कि यीशु केवल हमारे जीवन में व्याप्त किसी कमी को पूरा करने के लिए आया था, तो फिर या तो व्यवस्था का अभिशाप कोई चिन्ता की बात नहीं है या फिर उपचार हो सकने से परे है। किन्तु अभिशाप तो वास्तविक है और इसका समाधान होना भी आवश्यक है। जब तक हम पहले यह नहीं समझ लेते कि हम उस अभिशाप के पात्र हैं, जिसे उसने अपने ऊपर ले लिया तब तक हम किसी ऐसे व्यक्ति में क्यों रुचि लेंगे जो हमारे स्थान पर मर गया?

इस अभिशाप का प्रभाव देखने के लिए हमें केवल मूसा की व्यवस्था को देखने की आवश्यकता है (उदाहरण के लिए, निर्गमन 20:1-17 देखें)। व्यवस्था बताती है कि किस तरह से हमने अपने सम्पूर्ण हृदय से परमेश्वर से प्रेम नहीं किया है। हमने उसकी आज्ञा नहीं मानी है। हमने दूसरों से अपने जैसा प्रेम नहीं किया है। हमने हर बात में सच नहीं बोला है। हम लालच करने के दोषी हैं। यह सूची बहुत लम्बी है। यद्यपि जब परमेश्वर का आत्मा हमें दोषी ठहराता है और हम अपनी कमियों को देखने लगते हैं, तो हम इस भजन के लिखने वाले के साथ गाने लग जाते हैं कि “मेरे हाथों के काम तेरी व्यवस्था की मांगों को पूरा नहीं कर सकते।”[1] हम उस अभिशाप के बोझ को देखते हैं, जो कभी हम पर था और अभी भी हम पर होना चाहिए था, और तब हम मसीह को अपने उद्धारकर्ता के रूप में उसकी सारी महिमा में देखते हैं, जो उस बोझ को ले लेने के लिए आया था।

यह हमारे विश्वास का मूल है। जब हम क्रूस पर दृष्टि करते हैं और देखते हैं कि किस प्रकार से यीशु वहाँ लटका हुआ था, तब हम देख पाते हैं कि उसने जो किया वह आवश्यक था और उसकी अपनी इच्छा से किया गया कार्य था। उसने वह स्थान ले लिया, जहाँ हमें होना चाहिए था। यही अनुग्रह है।

यदि हम अपने प्रयासों से परमेश्वर के साथ अपने आप को सही स्थिति में रखने में सक्षम होते, तो न ही छुटकारे में कोई आश्चर्य होता और न ही लेपालक पुत्र/पुत्रियाँ बनाए जाने के भरोसे में कोई सुन्दरता होती। जब हम अपने आप को और अपने कार्यों को देखने के लिए प्रलोभित होते हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि मसीह ने उस अभिशाप को तोड़ दिया है। और उस आश्चर्य में होकर हम महिमा कर सकते हैं। भले ही आपको अनुग्रह की पहली झलक मिले कितना ही समय क्यों न बीत गया हो, आप अभी भी अपने लिए नए सिरे से गा सकते हैं:

मेरे हाथ में कुछ भी नहीं जो मैं लेकर आता हूँ, मैं केवल तेरे क्रूस से लिपटा हुआ हूँ।  गलातियों 2:15-3:9

31 जनवरी : लज्जित न हो

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31 जनवरी : लज्जित न हो
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“हमारे प्रभु की गवाही से, और मुझसे जो उसका कैदी हूँ, लज्जित न हो, पर उस परमेश्‍वर की सामर्थ्य के अनुसार सुसमाचार के लिए मेरे साथ दुख उठा जिसने हमारा उद्धार किया और पवित्र बुलाहट से बुलाया, और यह हमारे कामों के अनुसार नहीं; पर उसके उद्देश्य और उस अनुग्रह के अनुसार है जो मसीह यीशु में सनातन से हम पर हुआ है।”  2 तीमुथियुस 1:8-9

स्वामी के कारण, स्वामी के सेवकों के कारण और स्वामी के सन्देश के कारण लज्जित होना एक बहुत ही सहज बात है। इसलिए यह सुनना एक बड़ी चुनौती है कि पौलुस कैसे तीमुथियुस को और हमें “लज्जित न होने” के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।

पश्चिमी संस्कृति में धर्म, परमेश्वर और आत्मिकता के बारे में अस्पष्ट बातचीत व्यापक रूप से सहनीय मानी जाती है; हम कई बार कई तरह के अस्पष्ट कथनों को सुनते या पढ़ते हैं, जो सुसमाचार के साथ शिथिल रूप से जुड़े हुए प्रतीत होते हैं। तथापि समाज के मानकों के अनुसार यह पूर्ण रूप से अस्वीकार्य है कि यीशु मसीह के अतिरिक्त किसी और के द्वारा उद्धार नहीं है। यदि हम पतरस के साथ यह दावा करने के लिए तैयार हैं कि “स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें” (प्रेरितों के काम 4:12), तो यहाँ पौलुस के तीमुथियुस को लिखे शब्द हमारे लिए भी उपयुक्त होंगे कि “सुसमाचार के लिए मेरे साथ दुख उठा।”

सुसमाचार के लिए दुख उठाने के विशेषाधिकार में सम्मिलित होने के लिए पौलुस का निमन्त्रण, एक अर्थ में, हमें परेशान करने वाला है। यह हमारे समय के मसीही जयवन्तवाद के बिल्कुल विपरीत है, जो सदैव मसीही जीवन को भव्य तरीके से प्रस्तुत करना चाहता है। इस कारण बहुत से लोग केवल चंगा करने, चमत्कार करने और अपने लोगों को जीत की ओर ले जाने वाले परमेश्वर के सामर्थ्य की पुष्टि करना और स्वीकार करना चाहते हैं। तथापि, बाइबल और मानवीय अनुभव हमें बताते हैं कि—मृत्यु को परम चंगाई के रूप में अलग करके—जिन लोगों के लिए हमने प्रार्थना की है, उनमें से अधिकांश लोग पीड़ा में बने रहेंगे और कठिन दिनों में जीवन बिताएँगे। हमें सच बताना चाहिए। जॉन न्यूटन के शब्दों में, मसीही व्यक्ति को “बहुत सी विपत्तियों, कठिन कार्यों और प्रलोभन के फन्दों से होकर जाना होगा”[1] निकट भविष्य में हमारे लिए और भी परीक्षाएँ प्रतीक्षा कर रही हैं, विशेषकर यदि हमें पृथ्वी के अन्त तक सुसमाचार प्रचार करने के बुलावे के प्रति विश्वासयोग्य रहना है (प्रेरितों के काम 1:8)।

तो फिर हम सुसमाचार के लिए पीड़ा में कैसे स्थिर बने रहें? परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा मिलने वाला परमेश्वर का सामर्थ्य ही हमें अन्त तक स्थिर बनाए रखता है। न्यूटन के गीत के बोल इस वास्तविकता को बतलाते हैं, “अनुग्रह ही है जो मुझे अब तक सुरक्षित लाया है, और अनुग्रह ही मुझे घर ले जाएगा।” यह एक अद्‌भुत सत्य है!

परमेश्वर ने आपको बचाया है और वही आपको पीड़ा के समय में दृढ़ता से थामे रख सकता है। परमेश्वर ने आपको नियुक्त किया है और जब आपको उसके बारे में सच्चाई की साक्षी देने के लिए बुलाया जाए, तो वही आपको हियाव दे सकता है। उसके सम्भालने वाले सामर्थ्य की सच्चाई आपके हृदय में हलचल उत्पन्न कर सकती है और आपके जीवन को बदल सकती है। कठिन और सन्देह से भरे दिनों में आप अपनी आत्मा के लिए एक गढ़ के रूप में इस वास्तविकता को थामे रह सकते हैं। और जब आप उस स्वामी, उसके सेवकों या उसके सन्देश के लिए खड़े होने से पीछे हटने के लिए प्रलोभित हो रहे हों, तो जैसे ही आप बोलने के लिए अपना मुँह खोलें, आप उसके सामर्थ्य की ओर देखते हुए अपनी साक्षी के प्रभावी होने के लिए एक मौन प्रार्थना कर सकते हैं। “लज्जित न हों।”

रोमियों 1:8-17