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20 मार्च : कृपापूर्वक आभार

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20 मार्च : कृपापूर्वक आभार
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“उसकी महिमा की शक्ति के अनुसार सब प्रकार की सामर्थ्य से बलवन्त होते जाओ, यहाँ तक कि आनन्द के साथ हर प्रकार से धीरज और सहनशीलता दिखा सको, और पिता का धन्यवाद करते रहो, जिसने हमें इस योग्य बनाया कि ज्योति में पवित्र लोगों के साथ मीरास में सहभागी हों।”  कुलुस्सियों 1:11-12

लगभग हर व्यक्ति एक अच्छा उपहार पसन्द करता है। परिवार, आज़ादी, छुट्टी, एक गर्म बिछौना और एक ताजगी से भरा पेय, ये सभी हृदय में आभार उत्पन्न कर देते हैं और हम सभी स्वाभाविक रूप से उनके लिए कम से कम कुछ मात्रा में आभार व्यक्त करने में सक्षम होते हैं। “धन्यवाद” ऐसा शब्द है, जिसे हम बचपन में ही सीख जाते हैं।

अमेरिका के प्रसिद्ध जागृति-प्रचारक जॉनथन एडवर्ड्स ने “स्वाभाविक आभार” और “कृपापूर्वक आभार” के बीच अन्तर स्पष्ट करने में सहायक रीति से काम किया।[1] जो वस्तुएँ हमको दी जाती हैं और उनके साथ जो लाभ मिलते हैं, उनके द्वारा स्वाभाविक आभार का आरम्भ होता है। स्वाभाविक आभार कोई भी व्यक्ति व्यक्त कर सकता है। परन्तु कृपापूर्वक आभार बहुत अलग होता है, और केवल परमेश्वर की सन्तानें ही इसका अनुभव कर सकती हैं और इसे व्यक्त कर सकती हैं। कृपापूर्वक आभार परमेश्वर के द्वारा दिए गए किसी भी उपहार या सुख पर ध्यान दिए बिना उसके चरित्र, भलाई, प्रेम, सामर्थ्य और उत्कृष्टता को पहचानता है। वह जानता है कि हमारे पास परमेश्वर के प्रति आभारी होने का कारण है, फिर चाहे हमारा दिन अच्छा हो या बुरा, चाहे हमारे पास काम हो या न हो, चाहे दैनिक समाचार उत्साहजनक हों या पूरी तरह से निराशाजनक, चाहे हम पूरी तरह स्वस्थ हों या किसी घातक बीमारी का सामना कर रहे हों। ऐसा आभार केवल अनुग्रह से ही पाया जाता है, और यह किसी व्यक्ति के जीवन में पवित्र आत्मा का सच्चा चिह्न होता है। कृपापूर्वक आभार हमें इस जागरूकता के साथ सभी बातों का सामना करने में सक्षम बनाता है कि परमेश्वर हमारे जीवन और परिस्थितियों में गहन रूप से जुड़ा हुआ है, क्योंकि उसने हमें अपने प्रेम के विशेष पात्र बनाया है।

जब चेचक के टीके के कारण जॉनथन एडवर्ड्स की मृत्यु हो गई, तो उनकी पत्नी साराह ने अपनी बेटी को लिखा, “मैं क्या कहूँ? एक पवित्र और भले परमेश्वर ने हमें एक काले बादल से ढक दिया है।” इसमें जो सच्चाई है, उसको देखिए। इसमें खुशी या सन्तुष्टि का कोई ऊपरी अप्रिय दिखावा नहीं है। उनके पति की मृत्यु संयोगवश नहीं हुई थी, बल्कि यह उनके परिवार के विरुद्ध निर्णय लेने की परमेश्वर की सम्प्रभुता थी, जिसने जॉनथन को उसके अनन्त पुरस्कार के लिए घर लाने का सही समय निर्धारित किया था। और इसलिए साराह ने आगे लिखा, “किन्तु मेरा परमेश्वर जीवित है; और मेरा हृदय उसके पास है . . . हम सभी परमेश्वर को सौंप दिए गए हैं: और मैं वहीं हूँ, और वहीं रहना पसन्द करती हूँ।”[2]

दुख के समय में हम कभी भी स्वाभाविक आभार के द्वारा ऐसे शब्द नहीं बोल पाएँगे, जो हमें किसी को खो देने के समय सहायता नहीं कर सकते। ऐसी सोच केवल कृपापूर्वक आभार से ही प्रवाहित हो सकती है। हो सकता है कि आप इस समय कठिन या दिल तोड़ देने वाली परिस्थितियों का सामना कर रहे हों; और यदि आप अभी ऐसी परिस्थिति में नहीं हैं, तो कभी न कभी वह दिन अवश्य आएगा क्योंकि हम एक पतित संसार में जी रहे हैं। किन्तु उन क्षणों में आप परमेश्वर के प्रेम से लिपटे रह सकते हैं और परमेश्वर की भलाई पर भरोसा करने को चुन सकते हैं, जो सबसे स्पष्ट रीति से क्रूस पर व्यक्त हुई है। तब सबसे बुरे समय में भी आप उसकी उपस्थिति के आनन्द को जान पाएँगे और आपके पास सदैव उसे धन्यवाद देने का कारण होगा। यह कह सकने में बल, गरिमा और आराधना है, “यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है” (अय्यूब 1:21)।       

रोमियों 11:33-36

19 मार्च : एक सच्ची नबूवती आवाज

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19 मार्च : एक सच्ची नबूवती आवाज
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“उन्होंने, ‘शान्ति है, शान्ति’ ऐसा कह कहकर मेरी प्रजा के घाव को ऊपर ही ऊपर चंगा किया, परन्तु शान्ति कुछ भी नहीं है।”  यिर्मयाह 8:11

जब हमारा सामना किसी गम्भीर रोग होता है, तो हममें से कोई भी नौसिखिए डॉक्टर से इलाज नहीं कराना चाहता। कल्पना करें कि आप ऐसे डॉक्टर के पास जाते हैं, जो माँस के सड़ जाने का इलाज केवल एक अच्छी सी पट्टी बाँधकर कर देता है, आपको आपकी परेशानी के बदले में कुछ अच्छे शब्द लिखकर देता है और आपको एक सुखद शाम की शुभकामनाएँ देता है। इससे आपको पहले से अच्छा महसूस हो सकता है, किन्तु इससे समस्या का समाधान नहीं होगा और जल्द ही आपकी हालत पहले से भी खराब हो जाएगी!

पुराने नियम के समय में, भविष्यद्वाक्ताओं का कार्य परमेश्वर के वचन को बोलना और परमेश्वर के लोगों को उसकी वाचा का पालन करने के लिए प्रेरित करना होता था। परमेश्वर अपना वचन भविष्यद्वक्ताओं के मुँह में डालता था, और वे वही घोषणा करते थे जो परमेश्वर कहता था, न कि जो उनके अपने मन में आता था। और प्रायः उनका सन्देश होता था, सावधान हो जाओ! न्याय आने वाला है।  यह बिल्कुल भी सुखद घोषणा नहीं थी!

क्योंकि परमेश्वर का सन्देश इतना चुनौतीपूर्ण था, इस कारण झूठे भविष्यद्वक्ता बहुत हो गए थे और एक तरह से जो कुछ वे चाहते थे, वह सब उनको प्राप्त हो जाता था। उन्हें भविष्यद्वक्ता के रूप में जाना जाता था और वे बड़ी-बड़ी बातें बोल सकते थे और साथ ही वे लोगों को वे बातें भी कह सकते थे, जो वे सुनना चाहते थे। झूठा भविष्यद्वक्ता उस नौसिखिए डॉक्टर के समान होता था, जो लोगों से कहता था कि सब कुछ ठीक हो जाएगा, जबकि वास्तव में स्थिति निराशाजनक होती थी। यह सुनना अच्छा लगता है कि सब कुछ ठीक है और आपके देश में शान्ति का वास है, जब तक कि शत्रु दरवाज़े पर न दिखाई दे। तब यह आवश्यक हो जाता है कि आप तैयार रहें।

जबकि सच्चे भविष्यद्वक्ता परमेश्वर के आने वाले न्याय के बारे में बात करते थे, तौभी उनका सन्देश लोगों को अपने आप में सन्तुष्ट रहने के विरुद्ध चेतावनी भी देता था और उन्हें निराशा के विरुद्ध प्रोत्साहित भी करता था। परमेश्वर ने सर्वदा अपने लोगों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का आश्वासन दिया है, उनके लिए एक अति-उत्तम भविष्य की प्रतिज्ञा की है। न्याय से सामना होने पर उनकी एकमात्र आशा परमेश्वर से अलग  शरण मिलने में नहीं, बल्कि परमेश्वर में  शरण मिलने में होती थी।

हमारे समय में भी झूठे भविष्यद्वक्ता भरे पड़े हैं। उनके शब्द किसी समारोह के सामान्य प्रारम्भिक वक्ता की झूठी प्रशंसा में सुनाई दे जाते हैं, जैसे कि “आप इस समाज के अब तक के सबसे बढ़िया युवा लोग हैं। भविष्य आपके हाथों में है। आप उड़ान भरने के लिए तैयार हैं!” परन्तु इसी तरह की उथली बातें बहुत सी कलीसियाओं में भी बोली जाती हैं, जिनकी शिक्षा में अस्पष्ट सामान्य बातें और श्रोताओं के लिए कथित रूप से प्रेरणादायक आधे-अधूरे सत्य शामिल होते हैं; और आधा-सत्य, आधा-झूठ भी होता है।

हमें अपने समय में भी सच्ची भविष्यद्वाणी की आवाज की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी यिर्मयाह के समय में परमेश्वर के लोगों को थी। हमारी कलीसियाओं, हमारे राष्ट्र और पूरे संसार को ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो सच बोलने का साहस रखते हैं, भले ही इससे उपहास और अस्वीकृति मिले, जैसे कि पाप के बारे में बोलना, इस बात पर जोर देना कि परमेश्वर के कुछ नैतिक मानक हैं, न्याय की चेतावनी देना, यीशु के भविष्य में पुनः आगमन की घोषणा करना और इस प्रकार केवल उसकी ओर संकेत करने में सक्षम होना, जो बचा सकता है।

परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह ऐसे व्यक्तियों को खड़ा करे जो परमेश्वर के वचन से और परमेश्वर के आत्मा की अधीनता में अपने श्रोताओं को चुनौती देने के लिए तैयार हों। प्रार्थना करें कि जब आप ऐसी आवाज के माध्यम से परमेश्वर के वचन का सच में प्रचार होते हुए सुनें, तो आप आत्म-सन्तुष्टि से अपने आप को बचा सकें, सुनने के लिए तैयार हों, और परमेश्वर में अर्थात् अपनी एकमात्र आशा में शरण लेने के लिए तैयार रहें। और प्रार्थना करें कि आपके आस-पड़ोस में और आपके कार्यस्थल में आप वही आवाज बन सकें।       

1 थिस्सलुनीकियों 5:1-11

18 मार्च : विजयी सिंह

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18 मार्च : विजयी सिंह
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“तब मैं फूट फूटकर रोने लगा, क्योंकि उस पुस्तक के खोलने या उस पर दृष्टि डालने के योग्य कोई न मिला। इस पर उन प्राचीनों में से एक ने मुझ से कहा, ‘मत रो; देख, यहूदा के गोत्र का वह सिंह जो दाऊद का मूल है, उस पुस्तक को खोलने और उसकी सातों मुहरें तोड़ने के लिए जयवन्त हुआ है।’ तब मैं ने उस सिंहासन और चारों प्राणियों और उन प्राचीनों के बीच में, मानो एक वध किया हुआ मेमना खड़ा देखा।”  प्रकाशितवाक्य 5:4-6

हममें से कई लोगों ने बचपन में अपने माता-पिता से यह सुना होगा, “क्या तुम्हें . . . याद रहा?” इसका एक उदाहरण इस प्रकार है; जब भी मैं किसी के घर से लौटता था, तो मुझे प्रायः यह सुनने को मिलता था, “क्या तुम्हें धन्यवाद कहना याद रहा?” मुझे कोई नई बात बताए जाने की आवश्यकता नहीं होती थी; मुझे केवल याद रखना होता था। जब यीशु द्वारा उस स्वर्गिक वास्तविकता का दर्शन प्रेरित यूहन्ना ने देखा, तो वह आँसुओं में डूब गया क्योंकि वह डर गया कि कोई भी ऐसा नहीं है जो संसार के रहस्यों को देख सके और उसके पहली सदी के अनुभव की परेशानियों का अर्थ बता सके। किन्तु यूहन्ना को कोई नई जानकारी दिए जाने की आवश्यकता नहीं थी। उसे केवल वह याद दिलाए जाने की आवश्यकता थी, जो वह पहले से जानता था। उसने मूलभूत बातों को भूलकर गलती की थी।

यूहन्ना से कहा गया कि वह रोए नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की ओर देखे जो पुस्तक को खोल सकता है। जब वह मुड़ा तो उसने “मानो एक वध किया हुआ मेमना खड़ा देखा।” मेमने के घाव मसीह की मृत्यु की याद दिलाते थे, जिनके द्वारा उसने उद्धार को जीता था। किन्तु यह मेमना खड़ा था, जो उसके पुनरुत्थान की विजय का प्रतीक था। यहाँ इस दर्शन में हम यीशु को देखते हैं, जो परम-दयालु और सर्वशक्तिमान है। वह मेमना है, और वह सिंह है। वह पूरे संसार की आराधना और आज्ञाकारिता के योग्य है और उसकी मांग करता है और उसे वह अवश्य मिलेगी।

यूहन्ना के आँसुओं का समाधान यीशु था, ठीक वैसे ही जैसे हमारे अपने भय के आँसुओं का समाधान भी वही है, विशेषकर तब जब हम महसूस करते हैं कि सारा संसार हमारे विरुद्ध हो गया है, हम थक चुके हैं, छोटे, निर्बल और अधिकारहीन हैं, और जब यह मान लेने का प्रलोभन हमारे सामने आता हैं कि यह संसार किसी के नियन्त्रण में नहीं है और इसमें केवल अराजकता का बोलबाला है।

हममें से कोई नहीं जानता कि कोई दिन क्या लेकर आएगा या किसी रात में क्या घटित हो जाएगा। ये रहस्य केवल परमेश्वर के अधिकार में हैं। परन्तु हम कितने महान अनुग्रह का अनुभव करते हैं, जब परमेश्वर हमारे कन्धे पर थपथपाकर हमें हमारी बाइबल की ओर मोड़ते हुए कहता है कि क्या तुम भूल रहे हो कि यहूदा के गोत्र का सिंह वास्तव में विजय प्राप्त कर चुका है, कि नियन्त्रण उसके हाथ में है, कि भविष्य उसके अधिकार में है, कि वह राजा है?  यीशु ने पहले ही यूहन्ना से कह दिया था, “मत डर; मैं प्रथम और अन्तिम और जीवता हूँ; मैं मर गया था, और अब देख मैं युगानुयुग जीवता हूँ; और मृत्यु और अधोलोक की कुंजियाँ मेरे ही पास हैं” (प्रकाशितवाक्य 1:17-18)।

इसलिए जब आप वर्तमान या भविष्य से निराश या पराजित या परेशान महसूस करें, तो माँग केवल यही है कि जो आप पहले से जानते हैं उसे याद रखें। यहूदा के सिंह की ओर देखें, जो हमारे लिए वध किया गया मेमना है। वह योग्य है और सक्षम है कि वह पुस्तकों को खोल सके और इस संसार के इतिहास को उसके अन्त की ओर, अर्थात् उसके पुनः आगमन और महिमा में हमारे प्रवेश की ओर ले जा सके।       

प्रकाशितवाक्य 5

17 मार्च : प्रार्थना के द्वारा छुटकारा

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17 मार्च : प्रार्थना के द्वारा छुटकारा
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“मैं जानता हूँ कि तुम्हारी विनती के द्वारा, और यीशु मसीह की आत्मा के दान के द्वारा, इसका प्रतिफल मेरा उद्धार होगा।”  फिलिप्पियों 1:19

क्या आपके जीवन में ऐसे लोग हैं, जिनके लिए आप इसलिए प्रार्थना नहीं करते क्योंकि आपको लगता है कि उन्हें इसकी आवश्यकता नहीं है? हमारे सीमित मानवीय दृष्टिकोण में यह सहज बात हो सकती है कि हम उन लोगों को अनदेखा कर दें, जो बाहर से पूरी तरह व्यवस्थित दिखते हैं। किन्तु सच्चाई यह है कि हम सभी को दूसरों की प्रार्थनाओं की आवश्यकता होती है और हमें उन प्रार्थनाओं से लाभ भी होता है।

जब प्रेरित पौलुस जेल में था, तो उसने फिलिप्पियों की कलीसिया को लिखा और कहा कि वह जानता है कि उसका छुटकारा न केवल पवित्र आत्मा की सहायता से होगा, परन्तु परमेश्वर के लोगों की प्रार्थनाओं के द्वारा भी होगा। चाहे उसका तात्पर्य अपनी तात्कालिक कठिनाइयों से छुटकारा हो या उसे मसीह की उपस्थिति में ले जाने वाला अन्तिम उद्धार, पौलुस चाहता था कि फिलिप्पी में उसके मसीही मित्र यह जानें कि सेवाकार्य में बने रहने के लिए वह दूसरों की प्रार्थनाओं पर निर्भर था।

ऐसा उसने केवल इस मण्डली को ही नहीं कहा था। जब पौलुस ने रोम के मसीहियों को लिखा तब भी उसने यही बात कही थी, “हे भाइयो, हमारे प्रभु यीशु मसीह के और पवित्र आत्मा के प्रेम का स्मरण दिला कर मैं तुम से विनती करता हूँ कि मेरे लिए परमेश्‍वर से प्रार्थना करने में मेरे साथ मिलकर लौलीन रहो कि मैं . . . बचा रहूँ” (रोमियों 15:30-31)। वह चाहता था कि वे साथ मिलकर संघर्ष करें और ताजगी से भरे रहें। वह चाहता था कि उसकी सेवा संतों के लिए सहायक हो। वह चाहता था कि उसे उद्धार मिले। और उसने उनसे कहा कि यह सब उनकी प्रार्थनाओं के माध्यम से ही पूरा किया जा सकता है! जैसा कि प्रसिद्ध अंग्रेज प्रचारक सी.एच. स्पर्जन ने कहा था कि प्रार्थना वह रस्सी है जो परमेश्वर की उपस्थिति में लगी घंटियाँ बजाती है।[1] परमेश्वर के प्रावधान में यह उसकी पद्धति, उसकी योजना और उसकी शक्ति को खोल देती है।

परमेश्वर को पुकारो, यही वह बात है जो पौलुस हमें करने के लिए प्रेरित कर रहा है। यदि हम परमेश्वर के आत्मा को एक ऐसे तरीके से कार्य करते देखना चाहते हैं जिसे केवल अलौकिक कहा जा सकता है, तो हमें पहले गम्भीरता से, दीनता से और निरन्तर प्रार्थना करने के लिए तैयार होना होगा। पौलुस के शब्द हमें बताते हैं कि जब हम अन्य संतों के साथ मिलकर काम करते हैं, तो हम उनकी निर्बलताओं में उनकी सहायता कर सकते हैं। हम उनको साहस प्रदान किए जाने की प्रार्थना कर सकते हैं। हम उनके उद्धार में एक भूमिका निभा सकते हैं।

आप किसे जानते हैं, जिसे आपकी प्रार्थनाओं की आवश्यकता है? क्या आप लगन के साथ, साहसिक रूप से और हठ के साथ उनके लिए प्रार्थना करेंगे? और आप किसे जानते हैं जो बाहर से ऐसा नहीं दिखता कि उसे आपकी प्रार्थनाओं की आवश्यकता है? वास्तविकता यह है कि उन्हें भी इसकी आवश्यकता है! क्या आप उनके लिए भी इसी प्रकार प्रार्थना करेंगे?      

 फिलिप्पियों 1:3-11

16 मार्च : व्याकुल मन के लिए शान्ति

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16 मार्च : व्याकुल मन के लिए शान्ति
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“जिनकी [तुम्हारी] रक्षा परमेश्‍वर की सामर्थ्य से विश्वास के द्वारा उस उद्धार के लिए, जो आने वाले समय में प्रगट होने वाली है, की जाती है। इस कारण तुम मगन होते हो, यद्यपि अवश्य है कि अभी कुछ दिन के लिए नाना प्रकार की परीक्षाओं के कारण दुख में हो।”  1 पतरस 1:5-6

दुख के बारे में हमें दो बातें स्वीकार करने की आवश्यकता है, पहली कि दुख वास्तव में होता है,  और दूसरी कि यह कष्ट देता है।  कष्ट हर किसी के जीवन की वह वास्तविकता है, जो कभी न कभी अवश्य ही आता है। ऐसा कष्ट कई रूपों में आता है, जिसमें मानसिक कष्ट सबसे बड़ा है।

संगी विश्वासियों को दुख के बारे में लिखते समय पतरस ने कहा कि दुख अनेक और विभिन्न तरीके से आ सकता है। पतरस के पहले पाठकों को जो विशिष्ट दुख था, वह मानसिक पीड़ा थी जो कठिनाइयों को सहते रहने से आती है, किन्तु पतरस भली-भाँति जानता था कि ऐसी कई प्रकार की परीक्षाएँ होती हैं, जो हमारे मनों को परेशान करती हैं और हमारी आत्माओं को कुचल देती हैं।

सुसमाचार के कारण पतरस अपने लेख का समापन निराशा और हताशा की स्थिति में नहीं करता। इसके विपरीत, वह हमें ऐसी प्रतिज्ञाएँ देता है, जिन पर हम विश्वास कर सकते हैं।

सबसे पहले, पतरस हमें याद दिलाता है कि हमारी परीक्षाएँ केवल “कुछ दिन” के लिए हैं। अब, “कुछ दिन” को अनन्त काल के प्रकाश में समझने की आवश्यकता है। यहाँ तक कि जीवन भर का समय भी सदा काल की तुलना में “कुछ दिन” ही है! इस प्रकार, इस जीवन में कष्ट का एक लम्बा समय भी परमेश्वर की व्यवस्था में और उसकी सन्तानों के लिए उसकी योजना और उद्देश्य के सन्दर्भ में “कुछ दिन” है। इसका अर्थ यह नहीं है कि इस तरह के कष्ट का समय थोड़ा महसूस होगा,  विशेषकर जब हम कष्ट के मध्य में हों। कई लोगों के लिए कष्ट का अर्थ यह होता है कि एक मिनट भी एक दिन जैसा लगता है, एक दिन एक साल जैसा लगता है, और एक साल कभी न समाप्त होने वाला समय लगता है। किन्तु हम इस प्रतिज्ञा से लिपटे रह सकते हैं और हमें रहना भी चाहिए कि हमारी वर्तमान विपत्ति अनन्त काल के लिए हमारा अन्त नहीं है। हो सकता है कि आज आपका जीवन दुख से भरा हो, परन्तु एक दिन, “उस अन्तिम समय में,” आप उद्धार से भर जाएँगे।

दूसरी बात, हम हियाव के साथ कह सकते हैं कि दुख के प्रत्येक क्षण में परमेश्वर उपस्थित होता है। तरसुस के शाऊल के हृदय परिवर्तन के वृतान्त में हम पाते हैं कि यीशु अपने लोगों के दुख के साथ घनिष्ठता से जुड़ा हुआ है। वह कहता है, “हे शाऊल, हे शाऊल, तू मुझे  क्यों सताता है?” (प्रेरितों 9:4, अतिरिक्त महत्त्व जोड़ा गया)। जब यीशु स्वर्ग में था तो वह “मुझे” कैसे कह सकता था? इसका कारण यह था कि आत्मा के माध्यम से मसीह अपने लोगों के साथ उपस्थित था। वह उनके साथ पूर्ण एकता में खड़ा था। जब वे घाटियों से होते हुए अपने अन्तिम उद्धार के दिन की ओर बढ़ रहे थे, उस समय उसका आत्मा उनकी रक्षा करते हुए उनके साथ था। वह हमारे लिए भी ऐसा ही करता है।

आपके पास प्रभु यीशु के रूप में एक महान महायाजक है, जो आपकी निर्बलताओं में आपके साथ दुखी होने में पूरी तरह सक्षम है (इब्रानियों 4:15)। जब इस झूठ पर विश्वास करने का प्रलोभन आपके सामने आए कि परमेश्वर ने आपको छोड़ दिया है या फिर यह कि कोई नहीं समझ सकता कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं या आप क्या झेल रहे हैं, तो आप इस बात में हियाव रख सकते हैं कि “हमारे दिल की कोई धड़कन या कोई पीड़ा ऐसी नहीं है, जिसे वह ऊपर बैठा महसूस नहीं कर सकता।”[1] और आप इस बात में भी हियाव रख सकते हैं कि एक दिन सारा दुख पीछे रह जाएगा और आगे केवल महिमा होगी। यह एक ऐसी सच्चाई है, जिसमें आप आज आनन्दित हो सकते हैं, चाहे आज कुछ भी हो।       

1 पतरस 1:3-9

15 मार्च : परमेश्वर की अनन्त योजना

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15 मार्च : परमेश्वर की अनन्त योजना
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“हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्‍वर और पिता का धन्यवाद हो कि उसने हमें मसीह में स्वर्गीय स्थानों में सब प्रकार की आत्मिक आशीष दी है। जैसा उसने हमें जगत की उत्पत्ति से पहले उसमें चुन लिया कि हम उसके निकट प्रेम में पवित्र और निर्दोष हों।”  इफिसियों 1:3-4

बाइबल इस बात का कोई सीधा उत्तर नहीं देती कि परमेश्वर ने अदन की वाटिका में पतन क्यों होने दिया। वह केवल इतना बताती है कि परमेश्वर सब कुछ पर नियन्त्रण रखता है, यहाँ तक कि उस घटना पर भी।

तथापि इफिसियों को लिखे पौलुस के पत्र में हमें परमेश्वर की अनन्त योजना की एक झलक दी गई है। हम देखते हैं कि परमेश्वर हमारे संसार के अस्तित्व में आने से पहले ही काम कर रहा था और पतन की घटना ने उसे चौंका नहीं दिया था। जब आदम और हव्वा के विद्रोह के परिणामस्वरूप राज्य भ्रष्ट हो गया, तो परमेश्वर पहले से जानता था कि ऐसा होगा। आदम और हव्वा के बनाए जाने से पहले, उनकी अनाज्ञाकारिता से पहले, परमेश्वर उद्धार की योजना बना चुका था।

जब हम परमेश्वर के उद्धार के कार्य के बारे में सोचते हैं जो अन्ततः क्रूस पर पूर्ण हुआ, तो हमें इसे केवल एक संकट के समय में प्रदान किए गए समाधान के रूप में नहीं देखना चाहिए। इसके विपरीत, हमें क्रूस को परमेश्वर की अनन्त मंशा से जुड़ा हुआ देखना चाहिए, जिसने अनन्त काल से निश्चय किया हुआ था कि वह यीशु के माध्यम से अपने लिए एक प्रजा को बुलावा देगा और पतन के कारण जो कुछ भ्रष्ट हो चुका है उसे पुनः स्थापित करेगा।

इस योजना में परमेश्वर का उद्देश्य “उसकी इच्छा के भले अभिप्राय के अनुसार” था और है तथा यह “उसके अनुग्रह की महिमा की स्तुति” के लिए है (इफिसियों 1:5-6)। परमेश्वर की अनन्त योजना में प्रेरणा केवल मनुष्यों को प्रसन्न करने की इच्छा नहीं थी—यद्यपि मनुष्य इस कारण से अन्ततः प्रसन्न हो जाते हैं—परन्तु यह प्रेरणा उसके नाम के लिए उसकी चिन्ता थी। उसने निश्चय किया था कि सब कुछ उसके पुत्र प्रभु यीशु के चरणों के अधीन और नियन्त्रण में लाया जाए, जैसा कि होना भी चाहिए। इस प्रकार, छुटकारे की परमेश्वर की अनन्त योजना हमारे बारे में नहीं परन्तु उसके बारे में है। यह हमें प्रभावित अवश्य करती है। यह हमें बदल अवश्य देती है। किन्तु यह सब परमेश्वर के बारे में है। जब तक सुसमाचार हमें उसकी स्तुति करने और उसके लिए जीने के लिए प्रेरित नहीं करता, तब तक हमने इसे ठीक से नहीं समझा है।

परमेश्वर इस संसार का केन्द्र है। पतन के बाद से मनुष्यों ने परमेश्वर के अधिकार को स्वीकार करने से इनकार किया है और साथ ही उसे उसके उपयुक्त स्थान से हटाने का भरसक प्रयास किया है, जिसके परिणाम विनाशकारी हुए हैं। इस वर्तमान जीवन का कोई भी भाग ऐसा नहीं है जो मृत्यु की धूल से ढका न हो, क्योंकि मनुष्य ने यह निर्धारित कर लिया है कि वह इस तथ्य को पसन्द नहीं करता कि परमेश्वर केन्द्र में है।

क्या आप अपने जीवन को पुनः व्यवस्थित करेंगे और इसके प्रत्येक पहलू की देखरेख करने के परमेश्वर के अधिकार को मान्यता देंगे? क्या आप अपनी बढ़ाई के लिए नहीं, परन्तु उसकी स्तुति के लिए और अपने उद्देश्यों के लिए नहीं, परन्तु उसके उद्देश्य के लिए जीने का चुनाव करेंगे? विरोधाभास यह है कि जब आप अपनी नहीं परन्तु उसकी महिमा खोजेंगे, तब आप उस आनन्द का अनुभव करेंगे जो उसके पुत्र को अपने जीवन का केन्द्र मानकर जीने से आता है, जिसकी योजना परमेश्वर ने आपके लिए और समस्त सृष्टि के लिए अनन्त काल से बनाई थी।      

इफिसियों 1:3-14

14 मार्च : आदर्श प्रतिबद्धता

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14 मार्च : आदर्श प्रतिबद्धता
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“नून का पुत्र यहोशू और यपुन्ने का पुत्र कालेब, जो देश के भेद लेने वालों में से थे, अपने-अपने वस्त्र फाड़कर, इस्राएलियों की सारी मण्डली से कहने लगे, “जिस देश का भेद लेने को हम इधर-उधर घूम कर आए हैं, वह अत्यन्त उत्तम देश है। यदि यहोवा हम से प्रसन्न हो, तो हम को उस देश में, जिसमें दूध और मधु की धाराएँ बहती हैं, पहुँचाकर उसे हमें दे देगा।”  गिनती 14:6-8

3 मई 1953 को सिंगापुर से लन्दन जा रहा एक विमान भारत के कोलकाता से 22 मील उत्तर-पश्चिम में दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें कोई भी जीवित नहीं बचा। फ्रेड मिशेल, जो दस साल पहले चाइना इनलैंड मिशन के निदेशक बने थे, उस विमान में यात्रा कर रहे थे। उनकी जीवनी में फ्रेड को “एक साधारण व्यक्ति के रूप में वर्णित किया गया था, जो एक गाँव से थे और उनके माता-पिता श्रमिक वर्ग के थे। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन प्रान्तों में रहते हुए एक रसायनज्ञ के रूप में बिताया और वे परमेश्वर के साथ चलते थे।”[1]

जब तक यपुन्ने का पुत्र कालेब एक भेदी न बना था, जिसे मूसा ने उस देश का भेद लेने के लिए नियुक्त किया था, जिसे देने की प्रतिज्ञा परमेश्वर ने अपने लोगों से की थी, तब तक ऐसा कुछ भी नहीं था जो यह संकेत दे कि वह विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण या प्रतिष्ठित था। परन्तु ऐसा लगता है कि निश्चित रूप से उन साधारण अनुभवों में उसकी नीरस जीवन-यात्रा में परमेश्वर ने उस चरित्र को गढ़ा और विकसित किया जो गिनती 14 में प्रकट होता है।

संकट हमारे चरित्र को उजागर कर देता है। जब इस्राएली भेदिए कनान देश का भेद लेकर वापस आए तो उन्होंने वर्णन करते हुए कहा कि उसके नगर गढ़ वाले हैं, और “उन लोगों पर चढ़ने की शक्ति हममें नहीं है; क्योंकि वे हमसे बलवान हैं . . . हम अपनी दृष्टि में उनके सामने टिड्डे के समान दिखाई पड़ते थे” (गिनती 13:31, 33)। और लोग परमेश्वर पर आरोप लगाने लगे कि उसने उन्हें ऐसे देश में भेजा है, जहाँ वे मर जाएँगे (गिनती 14:3)।

कालेब की परमेश्वर के लिए प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई पड़ती है। वह इतने लोगों की सामान्य राय के विरुद्ध खड़ा होने के लिए तैयार था। जब अन्य भेदियों ने प्रतिज्ञा के देश में प्रवेश न करने का सुझाव दिया तो उसने उनका विरोध किया। जब सभी लोग परमेश्वर के प्रति विद्रोह कर रहे थे तो उसने उनका साथ नहीं दिया। वह और उसका विश्वासयोग्य मित्र यहोशू ही थे, जिन्होंने परमेश्वर के प्रति साहसी आज्ञाकारिता का सुझाव दिया।

कालेब को निश्चय था कि परमेश्वर के सामर्थ्य से सब कुछ सम्भव है। उसने दूसरे भेदियों की कही गई बातों की सच्चाई को नकारा नहीं, परन्तु उसने केवल इसे एक अलग दृष्टिकोण से देखा। वह न तो अपनी क्षमता पर और न ही इस्राएलियों की क्षमता पर, किन्तु परमेश्वर के सामर्थ्य और उसके चरित्र की विश्वसनीयता पर भरोसा कर रहा था। वह एक ऐसा व्यक्ति था, जो भय के मध्य में भी विश्वास कर रहा था। वह जानता था कि जिस टिड्डे को परमेश्वर से सहायता प्राप्त हो, वह टिड्डा भी बड़े काम कर सकता है।

यद्यपि हमें लग सकता है कि हमारा जीवन नीरस है, फिर भी हम नीरसता में भी सदैव परमेश्वर को खोज सकते हैं। दैनिक जीवन के साधारण क्षणों में वह हमारे चरित्र को गढ़ेगा कि हम भी प्रत्येक परिस्थिति में साहसी व्यक्ति बन सकें। परमेश्वर अपनी योजनाओं को पूरी करने के लिए बहुत महान लोगों को नहीं ढूँढ रहा है। वह ऐसे साधारण लोगों को ढूँढ रहा है जो उस पर भरोसा करें, विश्वास में आगे कदम बढ़ाएँ और साहसपूर्वक आज्ञा मानने के लिए तैयार हों। आज आपको वैसा व्यक्ति बनने से कोई नहीं सकता।       

गिनती 13:25 – 14:25

13 मार्च : सब प्रकार के धीरज सहित

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13 मार्च : सब प्रकार के धीरज सहित
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“प्रेरित के लक्षण भी तुम्हारे बीच सब प्रकार के धीरज सहित चिह्नों, और अद्‌भुत कामों, और सामर्थ्य के कामों से दिखाए गए।”  2 कुरिन्थियों 12:12

जब हम मसीह के पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण के तुरन्त बाद के समय के बारे में सोचते हैं, उस समय के बारे में जब प्रेरितों ने सेवाकार्य में उन्नति की और कलीसिया का जन्म हुआ, तो वे “चिह्न, अद्‌भुत काम, और सामर्थ्य के काम” जो किए गए थे, उनकी कल्पना करके यह आशा करना एक सामान्य बात है कि काश हम उन्हें देखने के लिए वहाँ होते तो हमारा विश्वास दृढ़ होता और उनके द्वारा हमारे सेवाकार्य में बढ़ोत्तरी होती।

निस्सन्देह, उस समय की अलौकिक घटनाओं की गुणवत्ता और मात्रा दोनों ही विशेष और अद्वितीय थीं। प्रेरितों को उस रीति से अलौकिक वरदान दिया गया था, जो आज के समय के मसीही लोगों को नहीं दिया गया है। यह ध्यान रखना महत्त्वपूर्ण है कि तब भी आरम्भिक कलीसिया ने इन अनुभवों को अपने विश्वास का मापदण्ड नहीं बनाया। हम केवल उन चमत्कारों पर ध्यान केन्द्रित करके उनके सन्दर्भ को नहीं भूल सकते कि वे लोग जो परमेश्वर के आत्मा से भरे गए थे तुरन्त परमेश्वर के वचन को समझने और उद्‌घोषित करने में लौलीन हो गए थे, जिससे वे अपने पूरे जीवन भर “सब प्रकार का धीरज,” जिसे “बड़ा धीरज” भी कहा जा सकता है, रखने के लिए सशक्त बनाए गए थे। कलीसिया के निर्माण का श्रेय प्रेरितों के चमत्कारों का उतना नहीं दिया जाना चाहिए, जितना उन प्रेरितों की विश्वासयोग्य, साहसिक सहनशीलता को दिया जाना चाहिए।

पौलुस चाहता था कि उसके सेवाकार्य का केन्द्र-बिन्दु न तो उन अनेक चमत्कारों पर हो, जो उसके द्वारा हुए थे और न ही उन बड़ी परीक्षाओं पर हो जो, जिनका उसने सामना किया था। बल्कि वह तो यह चाहता था कि उसके सेवाकार्य का केन्द्र-बिन्दु उस दृढ़ विश्वास पर हो, जो परमेश्वर ने उसे दिया था और उस सत्य पर हो, जिसका उसने प्रचार किया था। पौलुस के सेवाकार्य को देखकर, उसके बोझ को देखकर और उसके हृदय की पुकार को सुनकर हमारे लिए यह देखना सरल हो जाता है कि परमेश्वर ने उसके माध्यम से जो चिह्न और चमत्कार किए थे, वे मसीही दिखावे के दिखावटी प्रदर्शन नहीं थे। अपितु वे पीड़ा और विपत्ति से उत्पन्न हुए थे, वे एक ऐसे जीवन में किए गए जो सहे जाने से परे था और उन्होंने उस सन्देश की सच्चाई को रेखांकित कर दिया जिसका प्रचार किया जा रहा था।

इस सन्दर्भ को जानने के बाद पौलुस के अनुयायियों ने यह नहीं पूछा होगा कि उसने ऐसे चमत्कार कैसे किए थे, बल्कि यह कि वह इतना दृढ़ विश्वास कैसे प्रदर्शित कर सका। वह कष्ट सहते हुए “सब प्रकार के धीरज” के साथ आगे कैसे बढ़ सका? केवल यीशु मसीह में उसके विश्वास और परमेश्वर के वचन के उसके ज्ञान से वह ऐसा करने में सक्षम हो सका था।

हमें मसीही जीवन में धैर्य-युक्त सहनशीलता के साथ परीक्षाओं का सामना करने और चुनौतियों का सामना करने में कौन सी बात सक्षम बनाती है? क्या वे चमत्कार हैं? चिह्न हैं? अद्‌भुत काम हैं? कदापि नहीं। यद्यपि परमेश्वर की विशेष कृपा किसी विशिष्ट क्षण पर हमारी सहायता कर सकती है, तौभी मूल मसीही सैद्धान्तिक शिक्षा की एक ठोस, अनुभवात्मक समझ ही वह बात है जो निस्सन्देह हमारे मार्ग के लिए उस समय पर उजियाला ठहरेगी जब बाकी सब अन्धकारमय लग रहा होगा (भजन संहिता 119:105)। वही समझ हमारे विश्वास की गहरी जड़ है और हमारी आत्माओं के लिए लंगर भी वही है (इब्रानियों 6:19)। जब परमेश्वर की सच्चाई हमारे हृदय और मन में बस जाती है, तब ही हम विश्वास के साथ कह सकते हैं, “हे प्रभु के संतो, उसके उत्तम वचन में तुम्हारे विश्वास की नींव कितनी दृढ़ है!”[1] क्या है वह जो आपको बनाए रखेगा? ऊपरी अनुभव ऐसा नहीं कर सकेंगे, परन्तु केवल आन्तरिक विश्वास ही यह कर सकेगा। आपके भीतर होने वाला आत्मा का काम सर्वदा परमेश्वर द्वारा आपके आस-पास किए जाने वाले किसी भी काम से बड़ा चमत्कार होगा। प्रभु करे कि जब लोग आपकी ओर देखें, तो वे केवल उन अद्‌भुत कामों को ही न देखें जो वह आपके में जीवन करता है, बल्कि परीक्षाओं के मध्य आपके सब प्रकार के धीरज को और उसके वचन के सत्य के प्रति आपके आज्ञापालन को भी देखने पाएँ।       

याकूब 5:7-11

12 मार्च : परिवर्तनकारी पछतावा

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“जब उसके पकड़वाने वाले यहूदा ने देखा कि वह दोषी ठहराया गया है तो वह पछताया और वे तीस चाँदी के सिक्के प्रधान याजकों और पुरनियों के पास फेर लाया और कहा, ‘मैं ने निर्दोष को घात के लिए पकड़वाकर पाप किया है!’ उन्होंने कहा, ‘हमें क्या? तू ही जान।’ तब वह उन सिक्कों को मन्दिर में फेंककर चला गया, और जाकर अपने आप को फाँसी दी।”  मत्ती 27:3-5

यीशु को पकड़वाने के बाद यहूदा का क्या हुआ? “उसने अपना मन बदल लिया।” इस वाक्यांश का अनुवाद भी कितनी सहायक रीति से किया गया है, “वह पछताया।” ऐसा लगता है कि उसी क्षण यहूदा का हृदय परिवर्तित हो गया, और इसके साथ ही उसका दृष्टिकोण भी बदल गया।

हम जिस यहूदा को गतसमनी के बगीचे में देखते हैं, जो हथियार लिए लोगों की एक बड़ी भीड़ का नेतृत्व करते हुए यीशु को धृष्टता और निर्लज्ज कटुता के साथ गिरफ्तार कराता है, वह यहूदा नहीं है जिसे हम यहाँ घण्टों बाद प्रधान याजकों और पुरनियों के सामने देखते हैं। उसके कठोर हृदय का स्थान अब पश्चाताप की भावना ने ले लिया है, जिसने उसकी आत्मा को जकड़ लिया है।

एक क्षण के लिए यहूदा के अनुभव के बारे में सोच कर देखें और इसे एक चेतावनी बन जाने दें कि पाप सर्वदा झूठी आशा प्रदान करता है। पाप करने से पहले के क्षण प्रायः उसके बाद के क्षणों से बिल्कुल अलग महसूस होते हैं। यह वही बड़ा बदलाव है, जो आदम और हव्वा ने अपनी अनाज्ञाकारिता के बाद अदन के बगीचे में महसूस किया था। उन्हें उस क्षण में, जब उन्होंने फल खाने का निर्णय लिया, जो कुछ भी पता था और जो कुछ भी उन्होंने उस विद्रोह के कार्य में आशा की थी, वह सब उनके मुँह में धूल बनकर रह गया। (उत्पत्ति 3:6-8)। इसी प्रकार, यीशु को उसके शत्रुओं के हाथों पकड़वाने में जो कुछ भी यहूदा को आकर्षक लग रहा था, वह जल्दी ही उसके लिए कुछ भी नहीं रह गया था।

जब हम पाप करते हैं तो वे सभी मोहक, मादक प्रभाव, जो हमें विद्रोह करने के लिए आकर्षित करते हैं, एक क्षण में ही खत्म हो जाते हैं। जो सोने के समान चमक रहा था वह व्यर्थ वस्तु बन जाती है। केवल यह स्पष्ट तथ्य रह जाता है कि मैंने एक पवित्र, प्रेमपूर्ण परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया है।

इस तरह का परिवर्तनकारी पछतावा होने पर हमारे पास विकल्प यह होता है कि हम पश्चाताप करें और परमेश्वर से मेल कर लें या निराश होकर अपने आप को दोषी ठहराएँ। दुखद रूप से, यहूदा ने बाद वाला विकल्प चुना। उसका अपराध इतना बड़ा था कि निश्चय ही हर चेहरा उसे दोषी ठहरा रहा था, वह जो भी आवाज सुन रहा था वह उसे चुभ रही थी, उसकी आत्मा की हर प्रतिध्वनि उसे दोषी ठहरा रही थी। जो धन उसे दिया गया था, वह उसने प्रधान याजकों को लौटाकर अपने अपराध को कम करने का प्रयास किया, तौभी सिक्कों की थैली का भार अपने ऊपर से हटाकर वह अपने हृदय पर पड़े बोझ नहीं हटा पाया। अपने को अलगाव की इस स्थिति में और किसी प्रकार के सुधार की आशा से परे महसूस करते हुए वह एक भयानक मौत मारा गया। हो सकता है कि आज आप भी अपने पाप के बोझ तले दबा हुआ महसूस कर रहे हों। हो सकता है कि आपने अपने आप सब ठीक करने का प्रयास किया तो हो, किन्तु बोझ अभी भी बना हुआ है। यदि ऐसा है तो यह जान लें कि यहूदा की कहानी को आपकी बनने की आवश्यकता नहीं है। आप मसीह की ओर फिर सकते हैं। वह स्वतन्त्रता और क्षमा प्रदान करता है, एक ऐसा जूआ देता है जो सहज है और एक ऐसा बोझ देता है जो हल्का है (मत्ती 11:28-30)। इसी कारण मसीह मरा कि यहूदा जैसे पापी विश्वासघातियों को छुटकारा दे सके।

अगली बार जब पाप हमें अपनी ओर आने का संकेत करे तो यहूदा का उदाहरण हमारे लिए चेतावनी के रूप में मौजूद है। इस समय कौन से पाप आपको विशेष रूप से लुभा रहे हैं? याद रखें कि वे जैसे पहले दिखाई देते हैं, वे बाद में वैसे नहीं लगेंगे। प्रलोभन के क्षणों के लिए सहायता और अपराध-बोध के क्षणों के लिए आशा उपलब्ध है। परमेश्वर की क्षमा हमारे पछतावे और पश्चाताप की प्रतीक्षा कर रही है। आपको केवल इतना करना है कि उसकी ओर मुड़ें।       

भजन संहिता 51

11 मार्च : उसकी युक्ति के अनुसार

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“तेरे पास क्या है जो तू ने (दूसरे से) नहीं पाया? और जब कि तू ने (दूसरे से) पाया है, तो ऐसा घमण्ड क्यों करता है कि मानो नहीं पाया?”  1 कुरिन्थियों 4:7

हम इसे कई तरीकों से छिपाते हुए अलग-अलग नाम देते हैं, किन्तु ईर्ष्या ऐसे इवेंजेलिकल पापों में से एक है जो प्रायः “सहनीय” माना जाता है। इसकी सम्भावना बहुत कम है कि यह आपको उन “दस सबसे अधिक किए जाने वाले” पापों की सूची में मिले जिसके विरुद्ध कोई पास्टर अपनी कलीसिया को चेतावनी देता हो या एक-दूसरे के साथ अपने संघर्षों के बारे में बात करते समय विश्वासी इसका उल्लेख प्रायः करते हों। तो भी, यह परमेश्वर की सूची में है और प्रायः पवित्रशास्त्र में इसका उल्लेख किया गया है। वास्तविकता यह है कि ईर्ष्या कुछ सबसे घिनौने पापपूर्ण व्यवहारों की सूची के बीच पाई जाती है, जिनका नए नियम की पत्रियों में उल्लेख किया गया है क्योंकि इसे बहुत गम्भीरता से लिया जाना चाहिए (उदाहरण के लिए, रोमियों 13:13 देखें)।

जब पौलुस ने कुरिन्थियों को पत्र लिखा था, उस समय से आज तक कुछ विशेष बदलाव नहीं आया है। सामान्य स्थानीय कलीसिया अभी भी ईर्ष्या के कारण बहुत अधिक अराजकता तथा विभाजन के कारण जूझ रही है और ईर्ष्या द्वारा उत्पन्न संकटों में से एक सम्भावना यह है कि हम सन्देह करने लगें कि क्या परमेश्वर जानता भी है कि वह वरदानों का वितरण किस प्रकार कर रहा है।

पौलुस कलीसिया के इन घमण्डी, विभाजित, ईर्ष्यालु सदस्यों से कहता है कि तुम्हारे पास जो कुछ भी है वह तुमने किसी दूसरे से पाया है  और वरदानों का देने वाला वह जगत का सृष्टिकर्ता, गलतियाँ नहीं करता। तो फिर वे, और हम भी, इस प्रकार अहंकार पूर्वक कैसे रह सकते हैं, मानो सृष्टि का नियन्त्रण हम अधिक अच्छे ढंग से कर सकते हैं? अपनी ऊँचाई, परिधि, गति या अपनी किसी भी योग्यता को क्या हमने निर्धारित किया है? हमें किसने विशिष्ट बनाया है? परमेश्वर ने! हमारा डी.एन.ए. परमेश्वर की ओर से नियोजित है। हमारी परिस्थितियाँ ठीक वैसी ही हैं जैसी परमेश्वर ने युक्ति की है, और वह गलतियाँ नहीं करता। डाह एक पाप इसलिए है, क्योंकि यह एक ऐसा रवैया है जो कहता है कि परमेश्वर भला नहीं है या वह नहीं जानता कि हमारे लिए क्या भला है। डाह मूर्तिपूजा जैसी लगती है।

एक संगीत मण्डल के रूप में जीवन के मंच जब हम बाँसुरी जैसा एक यन्त्र बजा रहे हों और अपने से कुछ ही दूरी पर एक बड़ी तुरही को ऊँचे और शक्तिशाली स्वरों के साथ बजती हुई देखें, तब हो सकता है कि हम अपने आप से यह कहना चाहें, “कोई भी मुझे नहीं सुन पा रहा। मेरा स्वर पर्याप्त रूप से ऊँचा नहीं है।” वहीं से अपनी स्थिति के बारे में कड़वाहट की भावना और तुरही वादक के प्रति ईर्ष्या की भावना उत्पन्न होती है। परन्तु हमारी बाँसुरी जैसे वाद्य यन्त्र की ध्वनि का भी एक कारण है। यह वह वाद्य यन्त्र है जिसे हमें ही बजाना है। इसलिए इसे आनन्द से और उत्कृष्टता के साथ बजाएँ!

परमेश्वर द्वारा दिए गए वरदानों का उपयोग करने के हमारे प्रयासों में हम एक-दूसरे से ईर्ष्या क्यों करते हैं? हम अपने उस आनन्द को असन्तोष के हाथों क्यों छिन जाने देते हैं, जो उसने हमें मुक्त रूप से प्रदान किया है? उसने किसी और के लिए जो किया है, उसके कारण हम क्यों उसके प्रति अन्धे हो जाते हैं कि उसने हमारे लिए क्या किया है, विशेषकर अपनी उपस्थिति में हमें अनन्त धरोहर देने में? इस एक सत्य को हम सभी को अभ्यास करने की आवश्यकता है, “परमेश्वर ने मुझे वही दिया है जो मुझे चाहिए, मैं बिल्कुल वैसा ही रचा गया हूँ जैसी उसकी इच्छा थी, और जो कुछ उसने मुझे दिया है और जो कुछ नहीं दिया है, वह मेरे भले और उसकी महिमा के लिए है।”

ईर्ष्या को अपने ऊपर हावी न होने दें। इसके विपरीत, जिस भूमिका के लिए आपको बनाया गया है, उसे आनन्द के साथ जीएँ। क्योंकि आप उसके बनाए हुए हैं, और मसीह यीशु में उन भले कामों के लिए सृजे गए हैं, जिन्हें परमेश्‍वर ने पहले से हमारे करने के लिए तैयार किया है और आपको वरदान में दिया है (इफिसियों 2:10)। उसको ही आज अपने लिए पर्याप्त होने दें।       1 तीमुथियुस 6:6-12