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30 जनवरी : उसकी उपस्थिति के द्वारा सुरक्षित

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30 जनवरी : उसकी उपस्थिति के द्वारा सुरक्षित
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“यहोवा उस [यूसुफ] के संग था इसलिए वह भाग्यवान् पुरुष हो गया”  उत्पत्ति 39:2

परमेश्वर की सेवा करने के लिए उस स्थान से अच्छा कोई और स्थान नहीं है, जहाँ वह आपको रखता है।

कोई भी नौकरी दोषरहित नहीं होती, कोई भी परिवार दोषरहित नहीं होता, कोई भी परिस्थितियाँ परेशानियों से मुक्त नहीं होतीं। हममें से जो लोग लगातार आदर्श जीवन की खोज करते रहते हैं, जो यह भूल जाते हैं कि सिद्धता को स्वर्ग के लिए सुरक्षित रखा गया है, वे अपने आप को एक ऐसी यात्रा पर ले जाते हैं, जिसमें बार-बार निराशा ही हाथ लगती है।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यूसुफ ने जिन परिस्थितियों का अनुभव किया, वे बिल्कुल भी आदर्श परिस्थितियाँ नहीं थीं। अपने पिता से विशेष प्रेम पाने वाले व्यक्ति के रूप में अपना जीवन आरम्भ करने के बाद उसने अपने आप को गुलामों के व्यापारियों के व्यापार की वस्तु के रूप में पाया। उसके परिवार के घर की सुरक्षा का स्थान दासत्व की बेड़ियों ने ले लिया।

यूसुफ के समान हम सभी समय के साथ अपनी परिस्थितियों को बदलते हुए देखते हैं। हो सकता है कि हम लम्बे समय तक जिस घर में रहे हैं, उससे हमें दूर जाना पड़े, या हमारे प्रियजनों को कष्टों का सामना करना पड़े, या वित्तीय कठिनाइयाँ या स्वास्थ्य से सम्बन्धित समस्याएँ अप्रत्याशित रूप से आ जाएँ। तथापि, हममें से बहुत कम लोगों ने यूसुफ की तरह इस प्रकार के त्वरित विनाश का अनुभव किया होगा। (और यदि आपने ऐसा किया है, तो यह जानना कितना उत्साहजनक है कि पवित्रशास्त्र में आपके जैसे लोगों के जीवन में परमेश्वर के हस्तक्षेप की कहानियाँ सम्मिलित हैं!) हम सोच सकते हैं कि यूसुफ के पास कहीं भाग जाने, छिप जाने, हार मान लेने, या प्रतिरोधी बन जाने के सभी कारण मौजूद थे। और फिर भी परमेश्वर की उपस्थिति ने उसे प्रत्येक तराई के स्थान से बाहर निकाला।

यूसुफ को उसकी परिस्थितियों से  सुरक्षा नहीं दी गई; उसे अपनी परिस्थितियों में  सुरक्षित रखा गया। वह परमेश्वर की उपस्थिति के द्वारा सुरक्षित किया गया था। इसमें हमारे लिए एक सीख है। किसी विश्वासी की कठिनाइयों का सामना करने की क्षमता, ज्ञान या बुद्धि वह वस्तु नहीं है, जो उसकी रक्षा करती है। परन्तु परमेश्वर का सेवक परमेश्वर की उपस्थिति के द्वारा ही सुरक्षित किया जाता है। यह स्वाभाविक बात है कि हम परमेश्वर से अपनी परिस्थितियों को बदलने, बड़ी कठिनाइयों को दूर कर देने या हमें परीक्षाओं से दूर कर देने के लिए कहते हों। हो सकता है कि हम अपने आस-पास देखें और सोचें कि “मैंने कभी इसकी अपेक्षा तो नहीं की थी!” हम इस झूठ पर विश्वास करना आरम्भ कर देते हैं कि यदि हम केवल बच कर भाग निकलें या यदि हमारी समस्याएँ दूर हो जाएँ, तो सब कुछ ठीक हो जाएगा। किन्तु वास्तविक सच्चाई यह है कि हम चाहे कहीं भी चले जाएँ, समस्याएँ आएँगी और स्वर्ग के इस ओर सिद्धता हाथ नहीं आएगी। जैसा कि भजनकार कहता है कि मेरा भरोसा परमेश्वर पर है (भजन संहिता 11:1)।

परमेश्वर यूसुफ के जीवन को अलग तरीके से व्यवस्थित कर सकता था। इसके विपरीत उसने घटनाओं को वैसे ही घटित होने दिया जिस प्रकार वे घटित हुईं। उसकी योजना थी कि वह अपने सेवक को “बहुत सी विपत्तियों, कठिन कार्यों और प्रलोभन के फन्दों”[1] से होकर निकालेगा। ऐसा नहीं है कि जब वह दासों की पंक्ति में चल रहा था और दासों के बाजार में बैठा था, तब परमेश्वर उसके संग नहीं था और जब वह अपने स्वामी के घराने में सम्मान और प्रमुखता के पद तक ऊपर उठ गया, तब परमेश्वर उसके संग था। प्रभु की उपस्थिति हमारे साथ भी होती है। निस्सन्देह, उसने हमसे प्रतिज्ञा की है कि चाहे तुम तराइयों में हो या पर्वतों के शिखरों पर, “मैं जगत के अन्त तक सदा तुम्हारे संग हूँ” (मत्ती 28:20)। आज परमेश्वर ने आपको किस परिस्थिति में रखा है? और यह जानना कि वह आपके साथ उस परिस्थिति में है और उसी परिस्थिति में उसके पास आपके करने के लिए एक भला काम है, किस प्रकार से उन परिस्थितियों के बारे में आपके दृष्टिकोण को बदलेगा, जिन्हें आप चुन सकते थे और जिन्हें आप नहीं चुनते?

फिलिप्पियों 4:4-13

29 जनवरी : न्याय की तृप्ति हो चुकी

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29 जनवरी : न्याय की तृप्ति हो चुकी
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“क्योंकि बैरी होने की दशा में उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा मेल परमेश्वर के साथ हुआ, तो फिर मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम उद्धार क्यों न पाएँगे?”  रोमियों 5:10

परमेश्वर कोई दयालु दादा जी या जगत के सांता क्लॉज़ नहीं है, जो केवल उपहार देता है और जिसे किसी अन्य बात से कोई लेना-देना नहीं है। कदापि नहीं, वह पवित्र है और वह धर्मी है। इसलिए मनुष्य अपने पाप के कारण परमेश्वर की उपस्थिति से निकाले हुए लोग हैं। मानवता और हमारे सृष्टिकर्ता के बीच शत्रुता व्याप्त है। यह ऐसा सन्देश नहीं है, जिसे आप आमतौर पर सुनते हों और यह निश्चित रूप से बहुत सुहावना सन्देश भी नहीं है। किन्तु परमेश्वर उस शत्रुता को अनदेखा नहीं करता। न उसने कभी ऐसा किया है, और न ही वह कभी ऐसा करेगा। पाप के प्रति परमेश्वर के दृष्टिकोण के बारे में पवित्रशास्त्र बहुत स्पष्ट है। निस्सन्देह यह स्पष्ट करते हुए कि पाप हमें परमेश्वर से अलग कर देता है, पौलुस मनुष्यों को परमेश्वर के शत्रुओं के रूप में वर्णित करता है। पौलुस की भाषा भी भजनकार के शब्दों को प्रतिध्वनित करती है, जो परमेश्वर के बारे में कहता है कि “तुझे सब अनर्थकारियों से घृणा है” (भजन 5:5)। यह एक ऐसा सन्देश है, जो न तो पढ़ने में सुखद है और न ही पहली बार देखने पर समझने में सरल है।

तो फिर हमारी आशा कहाँ रही? हम परमेश्वर से मेल-मिलाप कैसे कर सकेंगे? ऐसा कैसे हो सकता है कि परमेश्वर पाप को तो उसके योग्य दण्ड दे और फिर भी पापियों को क्षमा कर दे?

हे हमारे परमेश्वर की प्रेमपूर्ण बुद्धि! जब सब कुछ पाप और शर्म से भरा था,

तब दूसरा आदम लड़ने और बचाने के लिए आ गया। [1]

यीशु ने क्रूस पर अपनी मृत्यु के द्वारा परमेश्वर के न्याय की तृप्ति कर दी है। पहले उसने परमेश्वर की व्यवस्था का पूरी तरह से पालन करने के हमारे दायित्व को और फिर इसमें विफल होने पर हमारे ऊपर पड़ने वाले बोझ को स्वयं अपने ऊपर धारण करने का निर्णय लिया। फिर उसने अपने पापरहित जीवन के द्वारा हमारे दायित्व को पूरा किया और क्रूस पर अपनी बलिदानी मृत्यु के द्वारा हमारे बोझ को निरस्त कर दिया। हमारे पापी अस्तित्व के प्रति परमेश्वर की घृणा के कारण जब परमेश्वर से हमारा अलगाव हुआ, तो उसने हमें त्यागा नहीं। इसके विपरीत, परमेश्वर आया और अपने पुत्र के माध्यम से हमारे साथ मेल-मिलाप किया। यदि यह सबसे अविश्वसनीय समाचार की तरह नहीं लगता है, तो हमने अपने पाप की गम्भीरता, या उसके न्याय की वास्तविकता, या हमारे उद्धार की परिमाण में से किसी एक बात को ठीक से नहीं समझा है।

हममें से वे लोग, जिन्हें मसीही बने हुए कुछ समय बीत चुका है, इसे अच्छी तरह जाने लेने के बाद चाहे इसका तिरस्कार न करें, तौभी आत्म-सन्तुष्टि के शिकार अवश्य हो सकते हैं। परन्तु मसीह की मृत्यु हमारे विश्वास का केवल प्रवेश बिन्दु ही नहीं है; यही हमारा विश्वास है। इसलिए आज उस दूसरे आदम, अर्थात सिद्ध मनुष्य को देखने के लिए ठहरें, जो वहाँ सफल हुआ जहाँ पहला आदम असफल हुआ था और जिसने शैतान को हराकर पतन के प्रभावों को उलट दिया है। यही सुसमाचार है। आपके पापों को क्षमा कर दिया गया है। आपको बचा लिया गया है। जहाँ आप पहले शत्रु थे, अब वहीं आप एक मित्र हैं। मसीह अब आपका भरोसा, आपकी शान्ति और आपका जीवन है।

मसीह में होने की वास्तविकता कोई सहज बात नहीं है; यह एक अद्‌भुत आश्वस्ति है। जब हम पाप के सामने शक्तिहीन थे, तब मसीह के सामर्थ्य ने हमें स्वतन्त्र किया। जब हम इतना बड़ा ऋण नहीं चुका सके, तब वह आप ही उसे लिए हुए क्रूस पर चढ़ गया (1 पतरस 2:24)। अब आप स्वर्गीय स्थानों में उसके साथ बैठे हैं। आज आपकी सबसे बड़ी सफलता भी आपको उससे ऊपर नहीं उठा सकेगी, जितना उसने आपको पहले ही उठा दिया है; न ही आपका सबसे बड़ा संघर्ष या असफलता आपको वहाँ से नीचे गिरा सकती है।

 कुलुस्सियों 1:15-23

28 जनवरी : एक नाम से कहीं अधिक

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28 जनवरी : एक नाम से कहीं अधिक
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“परमेश्वर ने मूसा से कहा, ‘मैं जो हूँ सो हूँ।’ फिर उसने कहा, ‘तू इस्राएलियों से यह कहना, “जिसका नाम मैं हूँ है उसी ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है।”’”  निर्गमन 3:14

कुछ संस्कृतियों में नामों के पीछे के अर्थ बहुत मायने नहीं रखते। कोई नाम हम इसलिए चुन लेते हैं, क्योंकि हमें उसका उच्चारण अच्छा लगता है, या क्योंकि वह हमारे परिवार के लिए अनमोल होता है। तथापि अन्य संस्कृतियों में नाम अपने आप में बहुत महत्त्व रखता है। उस नाम का अर्थ उस व्यक्ति के बारे में, जिसे वह नाम दिया गया है या उसे वह नाम देने वाले लोगों की आशा के बारे में कुछ स्थापित कर सकता है।

जब मूसा का जलती हुई झाड़ी में परमेश्वर से सामना हुआ, तो उसने पूछा, “जब मैं इस्राएलियों के पास जाकर उनसे कहूँ, ‘तुम्हारे पितरों के परमेश्वर ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है,’ तब यदि वे मुझ से पूछें, ‘उसका क्या नाम है?’ तब मैं उनको क्या बताऊँ?”” (निर्गमन 3:13)। तब परमेश्वर ने मूसा को जो नाम बताया, वह है यहोवा (जिसका अनुवाद है “मैं जो हूँ सो हूँ”)। इसमें चार अक्षर हैं जो व्यंजन हैं और इसमें कोई स्वर नहीं है। यदि हम इसका सही उच्चारण करने का प्रयास करें, तो हम पाएँगे कि यह लगभग असम्भव है। यदि आप चाहें तो यह कह सकते हैं कि यह एक अवर्णनीय नाम है।

इस तरह उत्तर देने के द्वारा परमेश्वर क्या कर रहा था? मूसा इस्राएल के लोगों को और फिरौन को एक अधिकार वाला नाम देने का अनुरोध कर रहा था और परमेश्वर ने उसे वह नाम दिया जिसका उच्चारण ही नहीं किया जा सकता। ऐसा लगता है कि मानो परमेश्वर कह रहा था कि ऐसा कोई नाम नहीं है जो मेरे अस्तित्व को पूरी तरह से व्यक्त कर सके। इसलिए उनसे कहो कि मैं जो हूँ सो हूँने तुम्हें भेजा है। फिरौन से कहो कि वह देखे कि मैं अपने लोगों के लिए क्या करता हूँ। तब वह जान जाएगा कि मैं कौन हूँ।

बाइबल न केवल परमेश्वर के उद्धार के कार्य की कहानी है, परन्तु इससे बढ़कर वह परमेश्वर के चरित्र के अनावरण की भी कहानी है। हममें से बहुत से लोग अपनी बाइबल पढ़ने के बाद प्रयुक्ति से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण प्रश्न पूछने में निपुण हो चुके हैं, जैसे “यह कैसे सम्बन्धित है और कैसे लागू होता है? मेरे लिए इसका क्या अर्थ है?” ये बातें व्यर्थ या गलत नहीं हैं, किन्तु ये वे प्रमुख प्रश्न नहीं हैं जो पूछे जाने चाहिए। परमेश्वर कहानी का नायक और पुस्तक का प्रसंग है, और इसलिए प्रत्येक खण्ड से हमारा पहला प्रश्न यह होना चाहिए, “यह मुझे परमेश्वर के बारे में क्या बताता है?” बाइबल परमेश्वर के व्यवहार, चरित्र और महिमा को स्थापित करने के लिए लिखी गई थी।

हममें से बहुत से लोग ऐसा मानते हैं कि हमें प्रत्येक रविवार को कलीसिया से जो कुछ चाहिए वह है आमदनी, सम्बन्धों तथा किसी भी अन्य समस्याओं को हल करने के लिए कुछ किस्से या प्रेरणादायक सूचियाँ। मसीहियत के इतिहास में आज का युग ऐसा समय है, जिसमें विश्वासियों के लिए “कैसे करें” शीर्षक वाली इतनी अधिक पुस्तकें लिखी गई हैं। फिर भी, क्या हम वास्तव में अच्छा जीवन जी पा रहे हैं? ऐसा लगता है जैसे हम सब कुछ करना जानते हैं, परन्तु हम यह नहीं जानते कि परमेश्वर कौन है!

परमेश्वर ने मूसा को जो करने का बुलावा दिया था, उसे पूरा करने के लिए मूसा को यह समझना आवश्यक था कि परमेश्वर कौन था (और है)। उसे हमारे समान यह जानने की आवश्यकता थी कि परमेश्वर केवल एक नाम से कहीं अधिक है।

जब हम बाइबल को पढ़ते हैं और पूछते हैं कि “मैं परमेश्वर के बारे में क्या जान सकता हूँ?” तब हमारा जीवन बदल जाता है। जैसे-जैसे हम यह देखते जाते हैं कि परमेश्वर ने क्या किया है और अधिकता से समझने लगते हैं कि वह कौन है, तो हम उसके प्रति भय-युक्त प्रेम में और उसके लिए प्रेम में बढ़ने लगते हैं। और तभी हम अपने जीवन में उसके बुलावे को पूरा करते हुए उसकी इच्छा के अनुसार जीने में सक्षम होने पाएँगे। हम अपने अवर्णनीय रूप से विस्मयकारी परमेश्वर की महिमा की गहराई को पूर्ण रूप से कभी नहीं समझ पाएँगे, परन्तु हम अवश्य  अनन्त काल तक उसे अधिकाधिक देखते जाएँगे। और जबकि हम उसका वचन पढ़ ही रहे हैं, तो उसका आरम्भ आज से ही हो सकता है।

निर्गमन 3:1-22

27 जनवरी : वह कुचले हुए नरकटों के लिए आया था

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27 जनवरी : वह कुचले हुए नरकटों के लिए आया था
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“कुचले हुए नरकट को वह न तोड़ेगा और न टिमटिमाती बत्ती को बुझाएगा; वह सच्चाई से न्याय चुकाएगा।”  यशायाह 42:3

प्राचीन काल के बड़े राजनेता शासन करने के लिए अपनी शक्ति पर आश्रित रहते थे। (बहुत से लोग आज भी लोग ऐसा करते हैं।) फारस के राजा कुस्रू महान को इस प्रकार वर्णित किया जाता था जैसे कुम्हार गीली मिट्टी को लताड़ता है, वैसे ही वह हाकिमों को कीच के समान लताड़ देगा (यशायाह 41:25 देखें)। फिर भी उसी समय में यशायाह ने उस आने वाले सेवक के बारे में भविष्यद्वाणी की, जो उस समय के हाकिमों के बिल्कुल विपरीत होगा।

वह सेवक, अर्थात यीशु भला, संवेदनशील और दयालु है। जिन लोगों को दूसरे लोग त्याग देना चाहते हैं और ठुकरा देना चाहते हैं, वह उन्हें अपनाने के लिए इच्छुक और सक्षम है। यह कितना अधिक आशा-दायक वचन है!

कुचले हुए नरकट के चित्रण में हम यीशु की हमारे प्रति संवेदनशीलता के महत्त्व को देख सकते हैं। आप कुचले हुए नरकट के सहारे टिक नहीं सकते, और न ही आप उससे संगीत बजा सकते हैं। फिर भी यीशु उन लोगों को उठाता है, जिन्हें अन्य लोग एक ओर कर देते हैं और उनके जीवन में और उनके जीवनों के द्वारा एक मधुर धुन बजाता है। हो सकता है कि आज आप अपने आप को बुरी तरह से दबा हुआ, दूसरों के व्यवहार से टूटा हुआ या अतीत में की गई गलतियों से आहत महसूस कर रहे हों। हो सकता है कि आप लगभग यह विश्वास करने लगे हों कि आप टूटे हुए और बेकार हैं। परन्तु आपके लिए एक महिमामय समाचार यह है कि वह सेवक कुचले हुए नरकटों को उठाता है, और वह ऐसा बड़े ध्यान से करता है।

यीशु सुलगती हुई बत्तियों को भी अपनाता है। वह उन्हें बुझाता नहीं है; परन्तु इसके विपरीत वह टिमटिमाते हुए टुकड़े को लेता है और उसे चमकती हुई ज्योति में बदल देता है। हो सकता है कि आपको यह विश्वास दिला दिया गया हो कि आपके अच्छे दिन अब बीत चुके हैं; कि आप एक बुझती हुई पुरानी मोमबत्ती हैं, केवल एक टिमटिमाती और बुझती हुई लौ हैं। आप अपने आप से यह कहने लगते हैं कि यदि तुम अभी तक इसका हल नहीं निकाल सके हो, तो शायद तुम्हारे लिए कोई आशा नहीं है। परन्तु एक बार फिर शुभ समाचार यह है कि सुलगती हुई बत्तियाँ इस सेवक में आशा पाती हैं, जो हमें फिर से प्रज्ज्वलित करने आया है।

यीशु उन लोगों में असाधारण रुचि रखता है जिनका कहीं कोई नाम नहीं, अर्थात उन कुचले हुए नरकटों और सुलगती हुई बत्तियों में। वह उन्हें छुटकारा देता है और संसार में प्रकाश लाने और अपने नाम की स्तुति के लिए उनका उपयोग करता है। वास्तविकता तो यह है कि किसी न किसी तरह से हम सभी कुचले हुए नरकट और टिमटिमाती बत्तियाँ ही हैं। क्या हम अपनी दीन-हीन स्थिति को पहचानने के लिए तैयार हैं ताकि हम उस सेवक की भलाई और दयालुता को जान सकें? अन्ततः . . .

वह कभी भी धुआँ देते हुए रेशे को नहीं बुझाता, परन्तु उसे आग की लपटों में बदल देता है;

वह कुचले हुए नरकट को कभी नहीं तोड़ता, न ही सबसे निकृष्ट नाम का तिरस्कार करता है। [1]
लूका 7:11-17

31 दिसम्बर : जीवन की संक्षिप्तता

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31 दिसम्बर : जीवन की संक्षिप्तता
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“मनुष्य की आयु घास के समान होती है,वह मैदान के फूल के समान फूलता है,जो पवन लगते ही ठहर नहीं सकता,और न वह अपने स्थान में फिर मिलता है। परन्तु यहोवा की करुणा उसके डरवैयों पर युग-युग,और उसका धर्म उनके नाती–पोतों पर भी प्रगट होता रहता है।” भजन 103:15-17

जीवन हमारी कल्पना से कहीं अधिक शीघ्रता से बीत जाता है। मुझे अपने पहले पुत्र का जन्म आज भी जीवन्त रूप से स्मरण है—और फिर ऐसा प्रतीत हुआ मानो कुछ ही सप्ताह में वह किशोरावस्था में पहुँच गया हो। जब हम बच्चे थे, तब 1 दिसम्बर से लेकर 25 दिसम्बर तक का समय मानो कई वर्षों लम्बा लगता था; अब तो वर्ष स्वयं पंख लगाकर उड़ जाते हैं। अचानक हम नींद से जागते हैं और पाते हैं कि हम वृद्ध हो गए हैं, या किसी ऐसे जन की मृत्यु का समाचार सुनते हैं जो हमारी ही आयु का था—और हमें इस सत्य का बोध होता है कि जीवन वास्तव में अत्यन्त क्षणिक है। हम कुछ समय के लिए फलते-फूलते हैं, परन्तु सदा के लिए नहीं।

जैसे-जैसे हम वृद्ध होते हैं, हमारी शारीरिक और मानसिक शक्तियाँ क्षीण होती जाती हैं, पुराने मित्र विदा हो जाते हैं, जिन रीति-रिवाज़ों को हमने जीवनभर अपनाया था, वे धीरे-धीरे लुप्त हो जाते हैं, और हमारे दीर्घकालिक लक्ष्य या तो असम्भव हो जाते हैं, या आकर्षणहीन हो जाते हैं। किन्तु ये सत्य हमें निराशा में न धकेलें, बल्कि उत्साह में प्रेरित करें। हम घास के समान हैं—हमारे दिन गिने हुए हैं—परन्तु हर दिन में अवसर उपलब्ध है! बाइबल-विज्ञानी डेरेक किडनर ने ठीक ही लिखा है: “मृत्यु ने अभी हमें छूआ नहीं है: तो उसकी जंजीरों की खनखनाहट हमें जगा दे, और हमें कर्म की ओर प्रेरित करे।”[1]

हमारा जो समय शेष बचा है, उसमें हम अपनी दृष्टि उठाएँ और उन “खेतों” की ओर देखें—उन लोगों की ओर जो हमारे चारों ओर रहते और काम करते हैं, परन्तु जिन्होंने अब तक यीशु को अपने उद्धारकर्ता और प्रभु के रूप में नहीं जाना है, और जो यहोवा की स्थायी और अनन्त प्रेमभरी करुणा में सहभागी नहीं हुए हैं। जैसा कि यीशु ने कहा कि वे खेत अब “कटनी के लिए पक चुके हैं।” (यूहन्ना 4:35)

बाइबल हमें यह नहीं कहती कि पहले हम स्नातक हो जाएँ, या विवाह कर लें, या स्थिर हो जाएँ, या अपना जीवन “ठीक कर लें”, या सेवानिवृत्त हों—फिर मसीह की सेवा में लगें। नहीं! यह हमें आज ही बुलाती है। बुद्धिमान व्यक्ति जानता है कि समय सीमित है और इसका सर्वोत्तम उपयोग यही है कि स्वयं को प्रभु के कार्यों में लगाया जाए।

तो चाहे आप जीवन के प्रारम्भ में हों, या जीवन के सर्वोत्तम काल में, या जीवन में पीछे मुड़ कर देख रहे हों—इससे पहले कि आपके हाथों की शक्ति क्षीण हो जाए, और आपके दाँत, नेत्र, और कान दुर्बल हो जाएँ—क्या आप मसीह यीशु के लिए पूर्णतः समर्पित जीवन जीने को चुनेंगे? यदि आप आने वाले कल तक प्रतीक्षा करेंगे, तो सम्भव है कि कल बहुत देर हो जाए। जैसा कि सी.टी. स्टड ने कहा:

केवल एक ही जीवन,

यह शीघ्र बीत जाएगा।

केवल वही सदा के लिए रहेगा,

जो मसीह के लिए किया गया है।

इसलिए अपने जीवन के दिनों को “घास” के समान देखें, और उन्हें उस परमेश्वर के भय और प्रेम में बिताएँ, जो अनन्तकाल तक आपसे प्रेम करेगा। अपने दिनों को रेत के किले बनाने में मत बिताएँ, परन्तु उस राज्य की सेवा में लगाएँ जो अनन्तकाल तक स्थिर रहेगा। और प्रार्थना करें कि जब आप ऐसा करें, तो यहोवा स्वयं आपके “हाथों के काम को दृढ़ करे” (भजन 90:17)—आज भी, और उस आने वाले वर्ष में भी जो आने वाला कल लेकर आएगा।

  भजन 90

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: मलाकी; लूका 24:36-53


[1] द मैसेज ऑफ एक्लेज़िआस्टेस, द बाइबल स्पीक्स टूडे (आई.वी.पी. यू.के., 1976), पृ. 104.

30 दिसम्बर : सब कुछ नया किया जाएगा

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30 दिसम्बर : सब कुछ नया किया जाएगा
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“परमेश्‍वर आप उनके साथ रहेगा और उनका परमेश्‍वर होगा। वह उनकी आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा; और इसके बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहली बातें जाती रहीं।” प्रकाशितवाक्य 21:3-4

नए आकाश और नई पृथ्वी के विचार को समझना हमारे लिए कठिन हो सकता है, परन्तु हम सम्पूर्ण निश्चय के साथ यह कह सकते हैं कि परमेश्वर वर्तमान को रूपान्तरित करेगा, और उसने ठाना है कि कोई भी और कुछ भी उसके सिद्ध राज्य को नष्ट न कर सके। हम यह इसलिए विश्वासपूर्वक कह सकते हैं, क्योंकि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने में सामर्थी है, जिसका सबसे महिमामयी प्रमाण वह काठ का क्रूस और वह खाली कब्र हैं। वर्तमान में, इतिहास के परदे के पीछे, परमेश्वर अपने राज्य को सम्पूर्णता में लाने की तैयारी कर रहा है—और यह वह कार्य है जिसकी योजना उसने अनादि काल से बनाई है।

जब मसीह लौटेगा, वह इस नए राज्य को लेकर आएगा—एक नया आकाश और नई पृथ्वी, जिसमें धार्मिकता का वास होगा।

जब परमेश्वर का सिद्ध राज्य स्थापित होगा, पाप दण्डित हो चुका होगा, न्याय पूर्ण हो चुका होगा, और बुराई का अन्त हो चुका होगा। फिर न कोई मृत्यु रहेगी, न शोक, न रोना, और न ही पीड़ा। ये सब “पहली बातें” होंगी, जो “बीत चुकी” होंगी। जब परमेश्वर अपने राज्य को लाएगा, जब उसकी सिद्ध योजना प्रकट होगी, तो न कोई व्यक्ति और न ही कोई शक्ति उसे बिगाड़ नहीं सकेंगे।

“नया” शब्द, जैसा कि प्रकाशितवाक्य में “नए आकाश और नई पृथ्वी” के लिए प्रयुक्त हुआ है, समय या उत्पत्ति का नहीं, बल्कि प्रकार और गुण का वर्णन करता है। अर्थात, परमेश्वर सृष्टि को इस प्रकार रूपान्तरित करेगा कि वह उस महिमा और भव्यता को प्रतिबिम्बित करे, जिसे उसने प्रारम्भ में इसके लिए ठहराया था। शैतान को वह तृप्ति नहीं मिलेगी कि वह परमेश्वर को अपनी सृष्टि को नष्ट करते देखे। वरन्, परमेश्वर अग्नि से इसे शुद्ध करेगा, जैसे उसने नूह के दिनों में जल का उपयोग किया (2 पतरस 3:5–7)।

इसलिए नई पृथ्वी अब भी पृथ्वी ही होगी—एक भौतिक स्थान, जिसमें भौतिक जन वास करेंगे, परन्तु अब यह ऐसी होगी, अर्थात “पृथ्वी यहोवा के ज्ञान से ऐसी भर जाएगी जैसा जल समुद्र में भरा रहता है” (यशायाह 11:9)। इसमें आश्चर्य नहीं कि सम्पूर्ण सृष्टि अब अधीरता से बाट जोह रही है कि वह पाप और क्षय की दासता से मुक्त की जाए (रोमियों 8:19–22)!

यह नई सृष्टि प्रतीक्षा के योग्य है। यह जीने के योग्य है, और यदि हो, तो मरने के योग्य भी। परमेश्वर सब वस्तुओं को नया करेगा—हमारी आत्माओं को, हमारे मनों को, हमारे शरीरों को, और यहाँ तक कि उस वातावरण को भी जिसमें हम रहते हैं। वे सब बातें जो आज पृथ्वी पर जीवन को कलुषित करती हैं, वहाँ नहीं होंगी—और जिन बातों की हमें आशा है, और जिन बातों की हमें प्रत्याशा है, वे सब पूरी की जाएँगी।

इसलिए हम “बाट जोहते हैं” (रोमियों 8:23)। हमें निराश होने की आवश्यकता नहीं है, चाहे जीवन कितना ही अन्धकारमय क्यों न हो—क्योंकि वह दिन निकट है जब परमेश्वर तुम्हारे आँसू पोंछ देगा। और हम “धीरज से उसकी बाट जोहते भी हैं” (पद 25)। अब ही सब कुछ पाने की लालसा रखने की कोई आवश्यकता नहीं है, चाहे वह कितना ही आकर्षक क्यों न प्रतीत हो—क्योंकि वह दिन भी निकट है जब परमेश्वर आपको वह सम्पूर्ण आनन्द और तृप्ति देगा, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। इसलिए आज आपका ध्येय उत्सुकता और धैर्य हो।

रोमियों 8:18-25

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: जकर्याह 13–14; लूका 24:1-35 ◊

29 दिसम्बर : प्रतीक्षा का समय

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29 दिसम्बर : प्रतीक्षा का समय
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“[परमेश्वर] ने उसको बाहर ले जा के कहा, ‘आकाश की ओर दृष्‍टि करके तारागण को गिन, क्या तू उनको गिन सकता है?’फिर उसने उससे कहा, ‘तेरा वंश ऐसा ही होगा।’ उसने यहोवा पर विश्‍वास किया; और यहोवा ने इस बात को उसके लेखे में धर्म गिना। उत्पत्ति 15:5-6

यदि हमारे विश्वास की नींव दीर्घ प्रतीक्षा के समयों में भी अटल रहनी है, तो हमें इन दो सत्यों में दृढ़ विश्वास रखना होगा: पहला, कि परमेश्वर में सामर्थ्य है कि जो कुछ उसने प्रतिज्ञा किया है, वह उसे पूरा करे; और दूसरा, कि परमेश्वर स्वयं हमारे हर काल में हमारी प्रत्येक आवश्यकता के लिए पर्याप्त है।

अब्राहम का विश्वास उसके जीवन के प्रतीक्षा कक्ष में परखा गया। वह कई वर्षों तक एक परदेशी भूमि में रहा और परमेश्वर की प्रतिज्ञा के पूर्ण होने की बाट जोहता रहा कि उसका “निज पुत्र” संसार में आएगा (उत्पत्ति 15:4)। और यह उसकी प्रतीक्षा के बीच परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास ही था, जिसे परमेश्वर ने “उसके लेखे में धर्म गिना।”

प्रेरित पौलुस जब अब्राहम के इस विश्वास का वर्णन करता है, तो वह लिखता है: “न अविश्वासी होकर परमेश्‍वर की प्रतिज्ञा पर सन्देह किया, पर विश्‍वास में दृढ़ होकर परमेश्‍वर की महिमा की; और निश्चय जाना कि जिस बात की उसने प्रतिज्ञा की है, वह उसे पूरा करने में भी समर्थ है” (रोमियों 4:20–21)। दूसरे शब्दों में, अब्राहम ने यह विश्वास किया कि कोई भी वस्तु, कोई भी शक्ति, परमेश्वर के वचन की पूर्ति में बाधा नहीं डाल सकती—यहाँ तक कि जब उसे यह भी दिखाई नहीं दे रहा था कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा को किस प्रकार पूरी करेगा। उसका विश्वास अन्धकार में एक अन्धी छलांग नहीं था; वरन् यह विश्वास परमेश्वर के चरित्र पर आधारित था।

आज के युग में, हम भी एक महान प्रतिज्ञा को थामे हुए हैं—कि प्रभु यीशु ने हमसे यह वादा किया है कि वह हमारे लिए एक स्थान तैयार कर रहा है और वह हमें अपने पास ले जाने के लिए लौटेगा (यूहन्ना 14:3)। इसलिए जब हम उसके वचन को थामते हैं, तो हमें स्वर्ग की आशा मिलती है। हमें यह पूर्ण निश्चय है कि यीशु व्यक्तिगत रूप से लौटेगा, वह दृश्य रूप से प्रकट होगा और वह अपने लोगों के लिए आएगा। ये प्रतिज्ञाएँ उतनी ही अटल और निश्चित हैं जितनी कि वह प्रतिज्ञा जो परमेश्वर ने अब्राहम को दी थी, जिसके पूर्ण होने के लिए उसे 25 वर्षों तक प्रतीक्षा करनी पड़ी।

इसके अतिरिक्त हम अब्राहम के अनुभव से यह भी सीखते हैं कि केवल परमेश्वर ही पर्याप्त है कि वह हमें प्रतीक्षा के समयों से निकाल कर अपने समय में अपने उद्देश्य की ओर ले चले। उत्पत्ति 17 में, परमेश्वर ने फिर से अब्राहम पर प्रगट होकर उसके विश्वास को दृढ़ किया। कैसे? अपने आपको प्रकट करके कि वह वास्तव में कौन है: “जब अब्राम निन्यानवे वर्ष का हो गया, तब यहोवा ने उसको दर्शन देकर कहा, ‘मैं सर्वशक्तिमान [एल-शद्दाई] परमेश्वर हूँ; मेरी उपस्थिति में चल और सिद्ध होता जा’” (उत्पत्ति 17:1)। इब्रानी शब्द “एल-शद्दाई” का अर्थ है: “परमेश्वर जो पर्याप्त है।” अर्थात, परमेश्वर ने अब्राहम को अपनी प्रतिज्ञाओं का आश्वासन अपने ही चरित्र के आधार पर दिया।

मसीही जीवन प्रतीक्षा का जीवन है। और परमेश्वर के प्रत्येक “अभी नहीं” और “थोड़ा ठहरो,” उसके उद्देश्य का भाग हैं। प्रतीक्षा का हर समय एक अवसर है कि आप परमेश्वर के वचन पर विश्वास करें। और जब आप प्रतीक्षा में हों, तब निश्चयपूर्वक यह जान लें कि वही परमेश्वर आपकी हर आवश्यकता को पूरा करने में सक्षम है। इसी में विश्राम पाएँ: जिस परमेश्वर पर आपने विश्वास किया है, वह अपनी प्रत्येक प्रतिज्ञा को पूरा करने में सक्षम है।

उत्पत्ति 17:1-8

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: जकर्याह 9–12; लूका 23:26-56

28 दिसम्बर : अहंकार का उपाय

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28 दिसम्बर : अहंकार का उपाय
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“देखो, फरीसियों के खमीर और हेरोदेस के खमीर से चौकस रहो।मरकुस 8:15

यह विचार अत्यन्त गम्भीर और मन को झकझोरने वाला है कि कितने ही लोगों ने प्रभु यीशु को देखा, उसका वचन सुना, उसके अद्‌भुत कार्यों को अपनी आँखों से देखा—और फिर भी विश्वास नहीं किया।

जिस दिन उन्होंने देखा कि उसने कुछ रोटियों और मछलियों से चार हज़ार लोगों को तृप्त किया—और इस प्रकार अपने को वह परमेश्वर प्रगट किया जो मरुभूमि में अपनी प्रजा की आवश्यकताओं को पूरा करता है (मरकुस 8:1–10; निर्गमन 16 देखें)—उसी दिन फरीसी उससे “स्वर्गीय चिह्न” माँगने लगे (मरकुस 8:11)। इसके उत्तर में यीशु ने अपने चेलों को यह चेतावनी दी, “फरीसियों के खमीर और हेरोदेस के खमीर से चौकस रहो।”

फरीसियों की पहचान थी कपट और हेरोदेस की पहचान थी शत्रुता। फरीसी अपने धार्मिक घमण्ड को पकड़ कर रखना चाहते थे कि उन्होंने परमेश्वर की आशीष पाने का अधिकार कमा लिया है, इसलिए उन्हें उद्धारकर्ता की कोई आवश्यकता नहीं थी। हेरोदेस अपनी प्रजा पर अपनी सत्ता और प्रभाव को बनाए रखना चाहता था, इसलिए उसके जीवन में उस राजा के लिए कोई स्थान न था जो वास्तव में राज्य करने आया था। इस कारण वे सत्य के प्रति अन्धेपन में प्रतिबद्ध हो गए थे। उन्होंने यह विश्वास करने या समझने से जानबूझकर इनकार कर दिया कि यीशु कौन है। उनके हृदय की यह दशा थी: मैं जानना ही नहीं चाहता कि यीशु का क्या अर्थ है, और मैं निश्चित रूप से उसे अपना उद्धारकर्ता या राजा स्वीकार नहीं करूँगा। यीशु ने हमें उस मनोवृत्ति के विरुद्ध सावधान किया, क्योंकि अविश्वास का थोड़ा-सा खमीर भी सम्पूर्ण जीवन को प्रभावित कर सकता है।

जब घमण्ड अपना भद्दा सिर उठाता है, तब वह हमें इस दिशा में ले जाता है कि हम परमेश्वर के वचन से सीखने के बजाय उसमें खोट ढूँढने का प्रयास करने लगते हैं। और जब हम परमेश्वर के वचन में खोट ढूँढने की भूमिका में खड़े हो जाते हैं, तब जो बात हमें मामूली और तुच्छ लगती है, अर्थात सत्य में किया गया छोटा सा परिवर्तन, तो वह खमीर बनकर हमारे सम्पूर्ण विश्वास को प्रभावित करने लगता है।

यीशु हमें यह चुनौती देता है कि हम उसे उस रूप में स्वीकार करें जैसा वह है—हमारे पापों से हमें बचाने वाला उद्धारकर्ता और हमारे सम्पूर्ण जीवन पर राज्य करने वाला राजा। वह बार-बार धैर्यपूर्वक हमें स्मरण दिलाता है कि वह कौन है। उसकी यह चुनौती भविष्यदर्शी और पितृत्व पूर्ण होने के साथ-साथ स्पष्ट और प्रेममय भी है।

हमें मसीह के कार्य की आवश्यकता है, जिससे हम घमण्ड के खमीर से मुक्त हो सकें। यह परमेश्वर के आत्मा का कार्य है जो हमें यीशु को पहचानने और समझने में सहायता करता है। यही कारण है कि बहुत से लोग बाइबल को पढ़ते हैं और फिर भी कुछ नहीं देख पाते; सुसमाचार को सुनते हैं और फिर भी कुछ नहीं समझ पाते। जब तक हमारी समझ की आँखें नहीं खुलतीं और आत्मा के कान नहीं खुलते, तब तक हम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। परन्तु हर वह दिन जब परमेश्वर का आत्मा हमें यीशु की महिमा को दिखाता है, और हमें इस कटु सत्य की याद दिलाता है कि उसके बिना हम खोए हुए हैं, तब हमारा मन और हृदय एक नया गा सकते हैं:

मुझे नहीं पता कि आत्मा कैसे मनुष्यों को पाप का बोध कराता है,

वचन के द्वारा यीशु को प्रकट करता है, और उसमें विश्वास उत्पन्न करता है।

परन्तु मैं जानता हूँ कि मैंने किस पर विश्वास किया है और मुझे पूरा विश्वास है कि वह सामर्थी है।[1]

फरीसियों और हेरोदेस के खमीर का प्रतिरोधक आत्मा का कार्य ही है। इसलिए अपने आप को इतना घमण्डी न समझें कि आपको उसकी आवश्यकता नहीं है। प्रार्थना करें कि आज वह आपको अपने वचन में से यीशु को पुनः प्रकट करे, ताकि आप अपने उद्धारकर्ता और राजा की आराधना अपने सम्पूर्ण जीवन से कर सकें।

  लूका 18:9-14

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: जकर्याह 5–8; लूका 23:1-25 ◊


[1] डैनियल वैबस्टर व्हिटल, “आई नो हूम आई हैव बिलीव्ड” (1883).

27 दिसम्बर : जीवन की नश्वरता

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27 दिसम्बर : जीवन की नश्वरता
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“तुम जो यह कहते हो, ‘आज या कल हम किसी और नगर में जाकर वहाँ एक वर्ष बिताएँगे, और व्यापार करके लाभ कमाएँगे।’ और यह नहीं जानते कि कल क्या होगा। सुन तो लो, तुम्हारा जीवन है ही क्या? तुम तो भाप के समान हो, जो थोड़ी देर दिखाई देती है फिर लोप हो जाती है। इसके विपरीत तुम्हें यह कहना चाहिए, ‘यदि प्रभु चाहे तो हम जीवित रहेंगे, और यह या वह काम भी करेंगे।’” याकूब 4:13-15

बाइबल व्यापारिक बुद्धिमत्ता या भविष्य की योजना बनाने को गलत नहीं ठहराती। परन्तु बाइबल जिसे गलत ठहराती है, वह एक घमण्डी और आत्म-केन्द्रित मनोवृत्ति है—ऐसी विचारधारा जो जान-बूझकर या अनजाने में परमेश्वर को हमारे निर्णयों और योजनाओं से बाहर रखती है। यह ऐसा दृष्टिकोण है जो उन बातों को निश्चित मानता है, जिनकी हमें कोई प्रतिज्ञा नहीं की गई है।

याकूब हमें बिना किसी झिझक के हमारे सीमित ज्ञान और समझ की सच्चाई से सामना कराता है। वह हमें स्मरण कराता है कि हमें उन बातों को स्वीकार करना चाहिए जो हम नहीं जानते। क्या हम आने वाले सप्ताहों और महीनों की योजनाएँ बनाने में सक्षम होना चाहते हैं? निश्चय ही! परन्तु याकूब यह स्पष्ट करता है कि हम तो यह भी नहीं जानते कि कल क्या होगा। यह तो घमण्ड ही है जो हमें यह मानने को प्रेरित करता है कि हमारा अगला श्वास भी निश्चित है।

इसके बाद वह हमें हमारी नश्वरता की भी याद दिलाता है। हमारा जीवन तो “भाप के समान है, जो थोड़ी देर दिखाई देती है, फिर लोप हो जाती है।” जैसे प्रातःकालीन कुहासा घास पर मँडराता है और सूर्य की पहली किरण पड़ते ही गायब हो जाता है, वैसे ही हमारा जीवन भी क्षणभंगुर है, जो अन्ततः लुप्त हो जाता है, और भविष्य की पीढ़ियों के लिए कोई चिह्न भी नहीं छोड़ता।

हमारी इस नश्वरता और सीमाओं के प्रकाश में, हमें भविष्य के विषय में किस रीति से विचार करना चाहिए? याकूब केवल हमारी घमण्डी योजनाओं को ही उजागर नहीं करता, वरन् इसका उपाय भी प्रस्तुत करता है। वह कहता है कि हमें नम्रता में योजना बनाना सीखना है, यह मानते हुए कि हम पूर्णतः परमेश्वर के संरक्षणकारी प्रावधान पर निर्भर हैं। सम्पूर्ण सृष्टि में कुछ भी—यहाँ तक कि हम भी—परमेश्वर के बिना एक क्षण के लिए भी अस्तित्व में नहीं रह सकते। जैसा कि एलेक मोट्यर ने लिखा है: “हम अपने जीवन में एक और दिन किसी प्राकृतिक आवश्यकता के कारण, या किसी यान्त्रिक नियम के कारण, या हमारे अधिकार के कारण, या फिर प्रकृति की कृपा के कारण प्राप्त नहीं करते, बल्कि परमेश्वर की प्रतिज्ञात करुणा के कारण प्राप्त करते हैं।”[1]

आने वाले कल की प्रतिज्ञा किसी को भी सुनिश्चित तौर पर नहीं दी गई है। हम उसकी योजना बना सकते हैं, परन्तु उसे नियन्त्रित नहीं कर सकते। यह केवल परमेश्वर की दया है, जो हमें प्रत्येक नए दिन में जगाती है। जब हम यह समझते हैं कि हमारा सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर की निरन्तर बनी रहने वाली अनुकम्पा में स्थिर है, तब अहंकारपूर्ण योजना बनाना एक मूर्खता ठहरती है। हम अपनी सीमाओं और जीवन की क्षणभंगुरता को अनदेखा नहीं कर सकते; परन्तु हम इन सच्चाइयों को अपनाकर अपने विचारों, अपने निर्णयों और अपने भविष्य की योजनाओं को उसकी महिमा के लिए रूपान्तरित कर सकते हैं।

इसलिए आज के दिन की, आने वाले कल की, अगले वर्ष की, और अपने जीवन के आगे के वर्षों की अपनी योजनाओं पर विचार करें। क्या आपने उनके लिए प्रार्थना की है? क्या आपने यह स्वीकार किया है कि उसकी योजनाएँ सर्वोपरि हैं, और आपकी सभी योजनाएँ केवल उसकी इच्छा पर निर्भर हैं? अब अपने सारे विचार और योजनाएँ उसके चरणों में रख दीजिए। आप भविष्य को नियन्त्रित नहीं कर सकते—परन्तु आपको इसकी आवश्यकता भी नहीं है, क्योंकि आप उसे जानते हैं जो उस पर नियन्त्रण रखता है।

  मत्ती 6:25-34

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: जकर्याह 1–4; लूका 22:47-71


[1] द मैसेज ऑफ जेम्स, द बाइबल स्पीक्स टूडे (आई.वी.पी. अकैडेमिक, 1985), पृ. 162.

26 दिसम्बर : मसीह के दृष्टिकोण से क्रिसमस

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26 दिसम्बर : मसीह के दृष्टिकोण से क्रिसमस
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“इसी कारण वह जगत में आते समय कहता है,‘बलिदान और भेंट तू ने न चाही,पर मेरे लिए एक देह तैयार की। होमबलियों और पापबलियों से तू प्रसन्न नहीं हुआ।’” इब्रानियों 10:5-6

मत्ती और लूका के सुसमाचार हमें क्रिसमस के उन पात्रों का परिचय देते हैं, जिनसे हम काफी परिचित हो चुके हैं: यूसुफ, मरियम, चरवाहे, ज्योतिषी और अन्य कई पात्र। कभी-कभी हम उन लोगों पर भी ध्यान करते हैं जो कुछ कम प्रसिद्ध हैं, जैसे जकर्याह, इलीशिबा, हन्ना और शमौन। प्रत्येक वर्ष जब क्रिसमस का पर्व आता है, तब इन पात्रों के दृष्टिकोण से कई उपदेश और शिक्षाएँ प्रस्तुत की जाती हैं। परन्तु एक बात ध्यान देने योग्य है: बहुत कम लोग हैं जिन्होंने यीशु के दृष्टिकोण से क्रिसमस पर मनन किया है।

इब्रानियों को लिखे पत्र में लेखक यह प्रकट करता है कि जब प्रभु यीशु इतिहास के मंच पर प्रकट हुआ, तब उसने भजन संहिता 40 के वचन अपने होंठों पर लिए। जैसे कि सिंडरेला की कांच की जूती केवल उसी के पैर में ही सही बैठी, वैसे ही ये वचन केवल यीशु पर ही लागू होते हैं।

परमेश्वर ने पुराने नियम के युगों में ही पहले क्रिसमस की तैयारी आरम्भ कर दी थी, क्योंकि पुराने नियम की बलि-व्यवस्था केवल उस सच्चाई की छाया थी जिसकी पूर्ति मसीह में हुई। उन बलिदानों में ऐसे पशुओं की बलि दी जाती थी, जिन्हें हाँक कर वेदी तक ले जाया जाता था, वे स्वेच्छा से वहाँ नहीं जाते थे—उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध ही चढ़ाया जाता था। परन्तु यीशु मसीह ने देह धारण करने से पूर्व ही यह जान लिया था कि उसकी भूमिका—उसका बलिदान—भिन्न होगा। उसने स्वेच्छा से सहमति दी। दीनता की अवस्था में और एक अत्यन्त अनापेक्षित स्थान में परमेश्वर का पुत्र एक ऐसे शरीर में प्रकट हुआ जो उसके लिए रचा गया था और “बहुतों की छुड़ौती के लिए” तैयार किया गया था (मत्ती 20:28)। उसने इस टूटे हुए और पापमय संसार को देखा, और अपने पिता से कहा, हाँ, मैं वहाँ जाऊँगा। मैं उनके समान बनूँगा और उनके लिए प्राण दूँगा।

प्रेरित पतरस मसीह के बलिदान की गम्भीरता को व्यक्त करते हुए लिखता है, “वह आप ही हमारे पापों को अपनी देह पर लिए हुए क्रूस पर चढ़ गया, जिससे हम पापों के लिए मरकर धार्मिकता के लिए जीवन बिताएँ: उसी के मार खाने से तुम चंगे हुए” (1 पतरस 2:24)। यीशु, जो पूर्णतः परमेश्वर और पूर्णतः मनुष्य था, इस जगत में इसलिए आया कि वह अपने शरीर में वह कार्य करे जो किसी बलिदान का कोई पशु नहीं कर सकता था: उसने हमारे दण्ड को सहा, हमारे विवेक को शुद्ध किया, और हमें परमेश्वर की करुणा प्रदान की। उसने वह सब कुछ सिद्ध रीति से पूरा किया जो पापी पुरुषों और स्त्रियों के लिए परमेश्वर के साथ संगति में आने हेतु आवश्यक था।

यह खोखले धर्म के वायदे से बहुत भिन्न है, जहाँ नियमों और प्रयासों के द्वारा स्वर्ग तक पहुँचने का प्रयत्न व्यर्थ सिद्ध होता है। इसके विपरीत, चरनी का सन्देश मुक्ति देने वाली करुणा का सन्देश है। परमेश्वर ने अद्‌भुत रीति से पहल की और यीशु के द्वारा हमें बचाने के लिए स्वयं आ गया। हमें परमेश्वर की खोज में कोई लम्बी यात्रा करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मसीह, जो नवजात राजा है, अपने उद्देश्य को भली-भाँति जानता था। तो उचित प्रत्युत्तर क्या है? केवल यह कि हम दीनता से उसके चरणों में झुकें, सम्पूर्ण मन से उसकी स्तुति करें, और अपने जीवन भर उसकी बाट जोहते रहें।

भजन 40

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: मीका 6–7; लूका 22:21-46 ◊