5 मार्च : परमेश्वर हमारी ओर है

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5 मार्च : परमेश्वर हमारी ओर है
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“जब किसी की परीक्षा हो, तो वह यह न कहे कि मेरी परीक्षा परमेश्‍वर की ओर से होती है; क्योंकि न तो बुरी बातों से परमेश्‍वर की परीक्षा हो सकती है, और न वह किसी की परीक्षा आप करता है।”  याकूब 1:13

जब हम यीशु मसीह में विश्वास करते हैं और पाप के बन्धन टूट जाते हैं, तो हमारे लिए कई बातें उसी समय से सच हो जाती हैं। हम मृत्यु से जीवन में स्थानान्तरित हो जाते हैं और परमेश्वर का आत्मा हमारे भीतर वास करने लगता है। हम उसके घराने के हो जाते हैं। हम छुटकारा पाए लोग बन जाते हैं, हम में बदलाव हो जाता है और हमारा नया जन्म हो जाता है। पाप अब हमारे जीवनों में प्रभुत्व नहीं करता। किन्तु वह बना  अवश्य रहता है।

मसीह पर भरोसा करने के द्वारा हम ऐसी सहजता का जीवन व्यतीत नहीं करने लग जाते, जिससे हम दुष्ट के हमलों से या अपने हृदय की कपटी इच्छाओं से मुक्त हो जाते हैं। इसके विपरीत, हृदय परिवर्तन से लेकर मसीह को देखने और उसके जैसा बनते जाने तक प्रत्येक मसीही व्यक्ति प्रलोभन के विरुद्ध “एक निरन्तर और अपरिवर्तनीय युद्ध”[1] में उलझा रहता है।

पवित्रशास्त्र प्रलोभन के बारे में चेतावनियों से भरा हुआ है, अर्थात् पाप और बुराई के प्रति वह आकर्षण जिसका हम सभी अनुभव करते हैं। प्रलोभन केवल उन वस्तुओं की लालसा का होना ही नहीं है जो निरंकुश और अकल्पनीय हों, परन्तु परमेश्वर ने जो भली वस्तुएँ हमें दी हैं उनका उपयोग (या दुरुपयोग) इस तरह से करना जो परमेश्वर के विरुद्ध पाप है। स्क्र्यूटेप लेटर्स  में सी. एस. लुईस पाप की इस कुटिलता का उस स्थान पर उल्लेख करते हैं, जहाँ स्क्र्यूटेप अपने प्रशिक्षु दुष्टात्मा को भड़कता है कि “जिन सुखों को हमारे शत्रु [अर्थात्, परमेश्वर] ने उत्पन्न किया है, वह जाकर मनुष्यों को प्रोत्साहित करे कि वे कभी-कभार, ऐसे तरीकों से, या मात्राओं में लें जिन्हें उसने निषिद्ध किया है।”[2]

पवित्रशास्त्र स्पष्ट है कि परमेश्वर कभी भी प्रलोभन का स्रोत नहीं होता और न ही हो सकता है। जब याकूब कहता है कि “परमेश्वर . . . किसी को प्रलोभन में नहीं डालता,” तो वह अपना कथन परमेश्वर के चरित्र पर आधारित कर रहा है। परमेश्वर दूसरों को बुराई के लिए प्रलोभित करने में इसलिए असमर्थ है, क्योंकि वह स्वयं इससे प्रभावित नहीं होता। दूसरों को बुराई के लिए प्रलोभित करने के लिए बुराई में हर्षित होने की आवश्यकता पड़ेगी, और परमेश्वर बुराई से प्रसन्न नहीं होता।

जिस शब्द का अनुवाद “प्रलोभन” के रूप में किया गया है, उसका अनुवाद “परीक्षण” के रूप में भी किया जा सकता है। इस प्रकार जिसे हमारा पतित स्वभाव पाप के प्रलोभन में बदल सकता है, वह एक ऐसा परीक्षण भी है जो हमारे विश्वास को दृढ़ कर सकता है। जब हम परीक्षण के समय का सामना करते हैं, जिसकी अनुमति स्वयं परमेश्वर देता है, तो हमें याद रखना चाहिए कि उसका उद्देश्य हमारी विफलता नहीं, बल्कि हमारा लाभ है। शैतान चाहता है कि हम असफल हों, परन्तु परमेश्वर चाहता है कि हम सफल हों। परमेश्वर हमारी ओर है, और वह प्रत्येक बात को, यहाँ तक कि परीक्षण और प्रलोभन भी, हमारी भलाई के लिए कर रहा है।

आप नियमित रूप से किन प्रलोभनों से जूझ रहे हैं (या हार मान रहे हैं)? उन्हें प्रलोभन के रूप में तो देखें, किन्तु अपने चल रहे युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए ऐसे अवसरों के रूप में भी देखना सीखें जो आज्ञाकारिता चुनने, अपने पिता को प्रसन्न करने, मसीह के समान बनने के क्षण हैं। “शैतान का सामना करो, तो वह तुम्हारे पास से भाग निकलेगा” (याकूब 4:7)।       

1 पतरस 1:13-21

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