“इसलिए जैसे मैं ने तुझ पर दया की, वैसे ही क्या तुझे भी अपने संगी दास पर दया करना नहीं चाहिए था?” मत्ती 18:33
क्षमा किए गए व्यक्ति को क्षमाशील व्यक्ति होना चाहिए, और चूंकि क्षमा करना हमारे लिए स्वाभाविक नहीं है, इसलिए हमें इस बात को बार-बार सुनने की आवश्यकता है।
दूसरे शब्दों में हम क्षमा इसलिए करते हैं, क्योंकि यीशु के द्वारा परमेश्वर हमें क्षमा करता है। बाइबल इस बात को पूरी तरह से स्पष्ट कर देती है कि क्षमा करने का भाव किसी मानवीय गुण से उत्पन्न नहीं होता और यह दूसरों के प्रति दयालु और क्षमाशील होने के हमारे अपने प्रयासों का परिणाम नहीं है, परन्तु यह परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा आता है।
इस कारण, किसी व्यक्ति द्वारा अपने पापों का वास्तव में पश्चाताप करने का एक मुख्य प्रमाण उसमें क्षमा करने की भावना का होना है। इसके विपरीत, यदि हम लगातार अपने हृदयों में शत्रुता, द्वेष और कड़वाहट रखते हैं तो हम न केवल अपने जीवनों को हानि पहुँचाते हैं और अपने सम्बन्धों को संकट में डालते हैं, अपितु सच कहें तो हम यह प्रश्न भी उठाते हैं कि क्या हमने सच में परमेश्वर की क्षमा की प्रकृति को समझा भी है।
वास्तविक रूप से क्षमा प्रदान करना तब तक असम्भव है, जब तक हमने इसका अनुभव स्वयं नहीं किया है, और यदि हमने इसका अनुभव किया है तो ऐसा न करना असम्भव बात है। यह हमारे हृदय से तभी प्रवाहित होगी, जब हम परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा बदले जा चुके होंगे और उसके विरुद्ध अपने अपराध की भयावहता पर विचार कर चुके होंगे। जब ऐसा परिवर्तन आ जाता है, तो लोगों ने जो हमारे विरुद्ध पाप किए हों उनका भार कम हो जाएगा क्योंकि, जिस प्रकार हमें क्षमा मिल चुकी है उसी प्रकार परमेश्वर हमें भी क्षमा करने में सक्षम बना देता है।
मत्ती 18 में सेवक के बारे में यीशु के दृष्टान्त के पीछे यही सिद्धान्त है। आज के समय के अनुसार देखा जाए, तो जिस सेवक का पहली सदी में आज के हिसाब से 70 हजार करोड़ रुपए का ऋण माफ कर दिया गया था, उसने 17 लाख रुपए का ऋण माफ करने से इनकार कर दिया। यीशु चाहता है कि हम उस सेवक की नासमझी को देखें जिसका इतना बड़ा ऋण माफ कर दिया गया था और फिर भी वह उस ऋण को माफ करने से इनकार कर रहा था जो उसका किसी दूसरे पर बकाया था। अपने आप में देखा जाए तो वह ऋण बहुत बड़ा था, किन्तु उस राशि की तुलना में जो उसके लिए माफ की गई थी, वह बहुत छोटा था। इसी प्रकार यह बात समझ से परे लगती है कि हम कभी भी दूसरों को क्षमा न करें, जबकि परमेश्वर के विरुद्ध हमारे अपराध के इतने बड़े ऋण को क्षमा कर दिया गया है।
यदि हमने परमेश्वर की दया का अनुभव किया है, तो निश्चित रूप से हमें क्षमा करने को अनदेखा नहीं करनी चाहिए। दूसरों को क्षमा करने में हमें परमेश्वर की क्षमा की पूर्णता का आनन्द मिलता है। जिन पापों के अभिलेखों को थामे रहने के लिए आप प्रलोभित होते हैं, उन्हें त्याग दें। जब ऐसा करना कठिन लगे क्योंकि जिस गलती को आपको क्षमा करने के लिए कहा जा रहा है वह बड़ी है, तब उस ऋण को देखें जिसे परमेश्वर ने आपके लिए क्षमा किया है और देखें कि ऐसा करने के लिए उसने क्या त्याग किया है, तो ये बातें आपको अपनी ओर से दया दिखाने में सक्षम बना देंगी। यदि परमेश्वर ने आपको क्षमा किया है, तो वह दूसरों के साथ सद्भाव में चलने में आपकी सहायता करने के लिए अपनी दया और अनुग्रह अवश्य उण्डेलेगा।
मरकुस 11:20-25