10 मार्च : अकेले पड़ जाने का झूठ

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“हे परमेश्‍वर, कब तक! क्या तू सदैव मुझे भूला रहेगा? तू कब तक अपना मुखड़ा मुझसे छिपाए रहेगा?”  भजन संहिता 13:1

लोग कहते हैं कि जब आप मौज-मस्ती कर रहे होते हैं, तो समय बहुत तेज़ी से बीतता हुआ प्रतीत होता है। किन्तु जब परिस्थितियाँ कम उत्साही हो जाती हैं, तो जीवन धीमी गति से चलता हुआ प्रतीत होता है। हम अपने आप को यह सोचते हुए पाते हैं, “मुझे नहीं पता कि मैं कभी इन परिस्थितियों से बाहर निकल पाऊँगा या नहीं। और मुझे नहीं पता कि मैं इन्हें कैसे सहन कर पाऊँगा।”

भजन संहिता 13 में बार-बार पूछा जाने वाला एक प्रश्न यह है, “कब तक? कब तक?” यहाँ पर दाऊद की परिस्थितियों का तो वर्णन नहीं किया गया है, किन्तु वह स्पष्ट रूप से भुला दिया गया और त्यागा हुआ महसूस कर रहा है, जो एक ऐसी भावना है जिसे हम सभी समझ सकते हैं। यह वैसा ही है, जैसा हम किसी प्रियजन को खो देने पर महसूस करते हैं या जब हमें लगता है कि हमें अकेले ही किसी परीक्षा की घाटी से होकर जाना होगा।

अकेला पड़ जाना निस्सन्देह कुचल देने वाला अनुभव होता है। परन्तु यहाँ दाऊद ने जो लिखा है, वह और भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। वह महसूस कर रहा है कि स्वयं परमेश्वर ने ही उसे अकेला छोड़ दिया है।

यही भावना सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में परमेश्वर के कई अन्य लोगों में भी दिखाई देती है। यशायाह की पुस्तक में निर्वासन में गए हुए परमेश्वर के लोग चिल्लाते हैं, “यहोवा ने मुझे त्याग दिया है, मेरा प्रभु मुझे भूल गया है” (यशायाह 49:14)। मसीही पथ पर चलने वाले यात्रियों का, अर्थात् यीशु के सच्चे अनुयायियों और सेवकों का भी कभी-कभी यह कहने का मन करता है, “मुझे लगता है कि प्रभु ने सच में हमें भुला दिया है। यदि उसने सच में हमें भुला न दिया होता, यदि वह अब भी हमारे साथ होता तो हम इस स्थिति में कैसे होते? यदि वह सच में हमारी रक्षा कर रहा होता तो निश्चित रूप से हमें इन परीक्षाओं को नहीं झेलना पड़ता।”

फिर भी दाऊद की इस उभरती हुई निराशा में हम पाते हैं कि उसका अनुभव (जैसा कि प्रायः हमारे साथ भी होता है) वास्तविकता को प्रतिबिम्बित नहीं कर रहा है। और दाऊद में इस बात को स्वीकारने की आत्मिक परिपक्वता और दीनता है कि जो उसे सच लग रहा है , वह उससे मेल नहीं खा रहा जो वह जानता है  कि वास्तव में सच है। इसलिए वह स्वयं को परमेश्वर की महाकरुणा, उसके उद्धार और उसकी उदारता की याद दिलाता है, और संघर्ष और पीड़ा में होते हुए भी उन बातों में आनन्दित रहने का संकल्प लेता है (भजन संहिता 13:5-6)।

मसीही जीवन का आशा से भरा तनाव यही है। हम पूछ रहे होते हैं, “हे प्रभु, कब तक? हे परमेश्वर, आप कहाँ हैं?” जबकि हम अपने हृदयों को याद दिला रहे होते हैं कि परमेश्वर ने हमसे प्रेम करना, हमें छुड़ाना या हमारे भीतर काम करना समाप्त नहीं किया है।

त्याग दिए जाने के झूठ पर विश्वास न करें, जिसे आपकी भावनाएँ आपके सामने परोसती रहती हैं। अपने भुलक्कड़ लोगों के प्रति परमेश्वर की शान्ति प्रदान करने वाले इस प्रत्युत्तर में विश्राम प्राप्त करें, “क्या यह हो सकता है कि कोई माता अपने दूध पीते बच्चे को भूल जाए और अपने जन्माए हुए लड़के पर दया न करे? हाँ, वह तो भूल सकती है, परन्तु मैं तुझे नहीं भूल सकता। देख, मैं ने तेरा चित्र अपनी हथेलियों पर खोदकर बनाया है; तेरी शहरपनाह सदैव मेरी दृष्टि के सामने बनी रहती है” (यशायाह 49:15-16)। अपने बच्चों के लिए परमेश्वर का संरक्षण सूर्य के समान है, वह स्थाई है। यहाँ तक कि जब बादल इसे अवरुद्ध कर देते हैं, तब भी वह वहाँ होता है। यह सर्वदा वहाँ होता है।

क्या आप आज परमेश्वर की स्थिरता पर भरोसा करेंगे? जब आप अगली बार त्यागा हुआ महसूस करें तो यह जान लें कि परमेश्वर अपने हाथों को देखता है, जिन पर उसकी प्रत्येक सन्तान का नाम खुदा हुआ है और वह कहता है कि तुम यहीं हो। मैं तुम्हें नहीं भूला हूँ।       

भजन संहिता 13

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