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21 अगस्त : मसीह में मित्र

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21 अगस्त : मसीह में मित्र
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“मुझे प्रभु यीशु में आशा है कि मैं तीमुथियुस को तुम्हारे पास तुरन्त भेजूँगा, ताकि तुम्हारी दशा सुनकर मुझे शान्ति मिले। क्योंकि मेरे पास ऐसे स्वभाव का कोई नहीं जो शुद्ध मन से तुम्हारी चिन्ता करे . . . पर मैंने इपफ्रुदीतुस को जो मेरा भाई और सहकर्मी और संगी योद्धा और तुम्हारा दूत, और आवश्यक बातों में मेरी सेवा टहल करने वाला है, तुम्हारे पास भेजना आवश्यक समझा।” फिलिप्पियों 2:19-20, 25

क्या आपके जीवन में कोई ऐसा है जिसे आप संकट की घड़ी में तुरन्त बुलाएँगे? कौन से गुण किसी व्यक्ति को ऐसी ज़िम्मेदारी के योग्य बनाते हैं? सम्भवतः वह व्यक्ति जिसे आप बुलाने का निर्णय लेंगे, वही होगा जिस पर आप भरोसा करते हैं, और जिसे आप जानते हैं कि वह जो कुछ भी कर रहा होगा उसे छोड़कर आपकी सहायता के लिए आ जाएगा। ऐसे स्त्री-पुरुष सच्चे मित्र होते हैं।

जब पौलुस को सहायता की आवश्यकता पड़ी, और वह रोमी कारागार में बन्द था, तब वह जानता था कि वह किन मित्रों को बुला सकता है: तीमुथियुस और इपफ्रुदीतुस को। वह फिलिप्पियों 2 में उनका नाम लेकर उल्लेख करता है और उन्हें मसीह में प्रिय सहकर्मी बताता है। फिर भी हमारे लिए सबसे उपयोगी बात यह देखना नहीं है कि पौलुस के पास ऐसे विश्वासयोग्य साथी थे, बल्कि यह है कि वे ऐसे क्यों थे।

पहले, ये कार्य करने वाले पुरुष थे। पौलुस कहता है कि उसके पास तीमुथियुस के समान “स्वभाव का कोई नहीं” था, और उसका “परखा” हुआ चरित्र सबको ज्ञात था, क्योंकि “उसने सुसमाचार के फैलाने में मेरे साथ परिश्रम किया” था (फिलिप्पियों 2:22)। इसी प्रकार, इपफ्रुदीतुस “सहकर्मी और संगी योद्धा” था—जो “मसीह के काम के लिए अपने प्राणों पर जोखिम उठाकर मृत्यु के निकट आ गया था” (पद 30)। ये पुरुष मसीही कार्य का जीवित उदाहरण थे। वे केवल सदस्यता सूची के नाम या किसी चार्ट के अंक नहीं थे। वे अपने विश्वास को काम में लगा रहे थे और अपने विश्वास के योग्य ठहर रहे थे। जब पौलुस को किसी को फिलिप्पी भेजने की आवश्यकता पड़ी, तो वह जानता था कि वे यह कार्य करेंगे।

वे उपलब्ध भी थे—इस अर्थ में नहीं कि वे केवल अपनी दिनचर्या खाली रखते थे, बल्कि इस अर्थ में कि जब और जैसा आवश्यक होता था, वे वही करने के लिए तैयार रहते थे। पौलुस उनसे जो अपेक्षा कर रहा था, वे छोटे दायित्व नहीं थे! परन्तु वह जानता था कि मसीह के प्रति उनकी भक्ति ऐसी है कि जब वह बुलाएगा, वे उपलब्ध होंगे।

क्या आपका भी ऐसा वर्णन किया जा सकता है? जब आपके आस-पास सेवाकार्य की आवश्यकताएँ होती हैं, तो क्या आपको कार्य करने और उपलब्ध रहने के लिए जाना जाता है? यह आवश्यक नहीं—और अक्सर ऐसा नहीं होता—कि यह पौलुस द्वारा अपने मित्रों को सौंपी गई किसी नाटकीय सेवा के समान दिखाई दे। मुद्दा महान कार्य करने का नहीं है। प्रभु को आपके परिश्रम की आवश्यकता नहीं है। परन्तु जब आप उसके नाम में कार्य करने और उसके उद्देश्य के लिए उपलब्ध होने का निश्चय करते हैं, तो वह अपनी प्रजा के भले के लिए आपको उपयोग करने का चयन प्रसन्नता से कर सकता है।

सरल और छोटे कार्य भी महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं। क्या होगा यदि आप यह निश्चय करें कि आप सप्ताह में दो बार कलीसिया के किसी सदस्य को फोन करके उसे प्रोत्साहित करेंगे? क्या होगा यदि आप नियमित रूप से किसी के पास जाकर उसके साथ प्रार्थना करेंगे? उस मित्र से बढ़कर कोई मित्र नहीं जो दूसरों को यीशु की ओर इंगित करे। ऐसे मित्रों से अपने आप को घेर लें, और स्वयं भी ऐसा मित्र बनने का प्रयास करें।

  नीतिवचन 27:5-9

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 107–109; गलातियों 6

21 August : अखंड आनंदी देव

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21 August : अखंड आनंदी देव
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“माझा आनंद तुमच्यामध्यें असावा व तुमचा आनंद परिपूर्ण व्हावा म्हणून मी तुम्हांला ह्या गोष्टी सांगितल्या आहेत.” (योहान 15:11)

परमेश्वर हा निखालस सार्वभौम आहे.

“आमचा देव स्वर्गात आहे; त्याला योग्य दिसते ते सर्व तो करतो” (स्तोत्र 115:3).

त्यामुळें तो कधीही निराश होऊ शकत नाहीं. त्यानें मोशेच्या द्वारे इस्रायलाला ज्या पराक्रमाने सोडविले त्याविषयीच्या विविध रंगांवर तो विचार करतो, तेव्हां त्याला आपल्या कृतींपासून आनंद होतो. त्याच्या आनंदाला खंड पडत नाहीं.

त्याचा आनंद हा मुळांत त्याला स्वतःमध्यें असलेली आत्मसंतुष्टी आहे. सृष्टीची उत्पत्ती करण्यापूर्वी, तो त्याच्या पुत्राच्या व्यक्तीत्वात असलेल्या त्याच्या गौरवाच्या प्रतिमेपासून आंनदी होता– म्हणजें त्याच्या प्रिय पुत्रामध्यें ज्याच्याविषयी तो संतुष्ट होता (मत्तय 3:17). नंतर देवाचा हा आनंद त्यानें सृष्टीची उत्पत्ती केलीं व तारणाचे गौरवी कार्य केलें त्यावेळी सर्व “जगासमोर उघड झाला”.

ह्या कृतींपासून देवाच्या मनाला आनंद होतो कारण ती त्याच्या वैभवाचे प्रतिबिंब आहेंत. आकाश देवाचा महिमा वर्णिते; अंतरिक्ष त्याची हस्तकृती दर्शवते (स्तोत्र 19:1). “परमेश्वराचे वैभव चिरकाल राहो! परमेश्वराला आपल्या कृतींपासून आनंद होवो!” (स्तोत्र 104:31). तो जें काहीं करतो ते सर्व तो आपलें हे वैभव टिकवून ठेवण्यासाठीं व ते जगासमोर उघड करण्यासाठीं करतो, कारण यापासूनच त्याच्या जिवाला आनंद होतो.

देवाच्या सर्व कृतींचा कळस तारण पावलेलें त्याचे लोक त्याची थोरवी वर्णितांत त्यांत आहे. “त्याच्या पराक्रमाच्या कृत्यांबद्दल त्याचे स्तवन करा; त्याच्या थोरवीच्या वैपुल्यानुसार त्याचे स्तवन करा!” (स्तोत्र 150:2). त्याच्या आनंदाचा कळस म्हणजें जेव्हा तो पवित्र केलेंल्या आपल्या सर्व लोकांच्या स्तवनाची ललकारपूर्ण प्रतिध्वनी ऐकतो त्यापासून त्याला होणारा आनंद घेतो. “तो घोड्याच्या बलाने आनंदित होत नाहीं, मनुष्याच्या पायांनी संतोष पावत नाहीं. जे परमेश्वराचे भय धरतांत, जे त्याच्या दयेची प्रतीक्षा करतांत त्यांच्यावर तो संतुष्ट होतो” (स्तोत्र 147:10-11).

परंतु त्याच्या थोरवीचा प्रतिध्वनी म्हणून जेव्हा देव आपली स्तवने ऐकतो तेव्हां त्यापासून केवळ त्यालाच आनंद होत नाहीं; त्याच्या थोरवीचे हे स्तवन आपल्या आनंदाचा देखील कळस आहे. स्तवन म्हणजें जेव्हां आपण देवाची थोरवी पाहतो व तिचा आस्वाद घेतो तेव्हां त्यांत आपल्याला जो आनंद मिळतो त्यात आपल्याला मिळणारी संतुष्टी

म्हणून, आपल्याकडून त्याचे स्तवन व्हावे हा देवाचा शोधाशोध आणि त्यांत आनंद मिळवण्याचा आपला शोधाशोध हा शोधाशोध आहे. ख्रिस्तात प्रकट झालेंल्या देवाच्या कृपेच्या गौरवाच्या सुवार्तेचा हा अग्रगण्य परिणाम आहे!

20 अगस्त : दोषी विवेक के साथ क्या किया जाए

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20 अगस्त : दोषी विवेक के साथ क्या किया जाए
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“तब दाऊद ने उठकर शाऊल के बागे की छोर को छिपकर काट लिया। इसके बाद दाऊद शाऊल के बागे की छोर काटने से पछताया। वह अपने जनों से कहने लगा, ‘यहोवा न करे कि मैं अपने प्रभु से जो यहोवा का अभिषिक्त है, ऐसा काम करूँ’ . . . जब दाऊद शाऊल से ये बातें कह चुका, तब शाऊल ने कहा, ‘हे मेरे बेटे दाऊद, क्या यह तेरा बोल है?’ तब शाऊल चिल्लाकर रोने लगा। फिर उसने दाऊद से कहा, ‘तू मुझसे अधिक धर्मी है; तू ने तो मेरे साथ भलाई की है, परन्तु मैं ने तेरे साथ बुराई की।’” 1 शमूएल 24:4-6, 16-17

इन पदों में आंशिक रूप से कही गई इस कहानी को एक दृष्टि से विवेक के सन्दर्भ में देखा जा सकता है—दाऊद में पाया जाने वाला कोमल और संवेदनशील विवेक, और शाऊल में पाया जाने वाला कठोर और जल चुका विवेक।

दाऊद जानता था कि यद्यपि परमेश्वर का आत्मा शाऊल से हट गया था, फिर भी शाऊल यहोवा का अभिषिक्त राजा था, और यहोवा के अभिषिक्त को न तो शाप देना चाहिए और न ही मारना चाहिए (निर्गमन 22:28)। क्योंकि उसका विवेक परमेश्वर और उसकी व्यवस्था के प्रति संवेदनशील था, इसलिए शाऊल के बागे को काटने के कारण वह तुरन्त बोझ से दब गया—यद्यपि वह इससे कहीं अधिक बुरा कर सकता था। इसलिए दाऊद ने अपने लोगों के सामने अपने पाप से मन फिराया और उन्हें शाऊल पर आक्रमण करने से रोक दिया (1 शमूएल 24:6-7)।

जब दाऊद ने शाऊल से खुले रूप से अपने रोके हुए प्रतिशोध के विषय में बातें कीं (1 शमूएल 24:8-15), तो उसकी कृपा के कारण शाऊल रो पड़ा। परन्तु शाऊल ने पुनर्मेल के इस अवसर को नहीं अपनाया। उस क्षण उसके आँसू चाहे जितने भी सच्चे रहे हों, उसका प्रत्युत्तर अन्ततः सतही और अल्पकालिक था, जो एक कठोर और अन्धकारमय हृदय का परिणाम था। हम यह इसलिए जानते हैं, क्योंकि इस घटना के बाद भी वह दाऊद का पीछा करता रहा।

बाइबल कहती है कि विवेक हमारी मानवता की एक आधारभूत इकाई है। परमेश्वर की व्यवस्था मनुष्य के हृदय में लिखी हुई है, चाहे हमने उसकी आज्ञाओं को सुना हो या नहीं (रोमियों 2:14-15)। जब हम परमेश्वर की व्यवस्था की अनदेखी करके अपनी ही राह पर चलते हैं, तो हमें दोष और लज्जा का अनुभव होता है। उस क्षण हमारे सामने एक चुनाव होता है: क्या हम क्षमा और पुनर्मेल की खोज करेंगे? या हम अपनी स्वार्थी अभिलाषाओं के पीछे चलते हुए अपने विवेक को और कठोर होने देंगे?

दोषी विवेक एक भारी बोझ है, परन्तु वह एक वरदान भी हो सकता है। वाल्टर जे. चैण्ट्री लिखते हैं, “विवेक एक मित्र है जो आपको भंग हुई व्यवस्था और उसके श्राप से छुड़ाने वाले एकमात्र उद्धारकर्ता की बाँहों में शीघ्रता से पहुँचा देता है।”[1] यदि आप दोषी विवेक का बोझ अनुभव कर रहे हैं, तो क्षणिक दुख को सच्चे मन फिराव के साथ भ्रमित न करें। अपने पाप से मन फिराते हुए परमेश्वर की ओर मुड़ें, और उसके सामर्थ्य में होकर परिवर्तन करने का निश्चय करें। क्षमा पाने का मार्ग यही है। क्योंकि यदि दोषी विवेक वह वरदान है जो आपको परमेश्वर की ओर ले जाता है, तो शुद्ध किया हुआ विवेक वह वरदान है जो आपको उससे मिलेगा।

  भजन 25

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 105–106; गलातियों 5 ◊


[1] वाल्टर जे. चैण्ट्री, डेविड: मैन ऑफ़ प्रेयर, मैन ऑफ़ वॉर (बैनर ऑफ़ ट्रुथ, 2007), पृ. 92.

20 August : तुम्हीं ज्या पराक्रमी मनुष्याला शोधत आहात तो येशू आहे

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20 August : तुम्हीं ज्या पराक्रमी मनुष्याला शोधत आहात तो येशू आहे
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“स्वर्गात आणि पृथ्वीवर सर्व अधिकार मला दिलेंला आहे. तेव्हा तुम्हीं जाऊन सर्व राष्ट्रांतील लोकांना शिष्य करा; त्यांना पित्याच्या, पुत्राच्या व पवित्र आत्म्याच्या नावाने बाप्तिस्मा द्या; जे काहीं मी तुम्हांला आज्ञापिले ते सर्व त्यांना पाळण्यास शिकवा; आणि पाहा, युगाच्या समाप्तीपर्यंत मी सर्व दिवस तुमच्याबरोबर आहे.” (मत्तय 28:18-20)

मत्तयाचा शेवटचा अध्याय ही ती खिडकीं आहे जी मरणांतून उठलेला ख्रिस्त ह्याच्या गौरवी सूर्योदयाच्या दिशेने उघडते. त्या खिडकींतून तुम्हीं ख्रिस्ताच्या चारित्र्याच्या पर्वतरांगेत अणकुचीदार असलेले किमान तीन असे भव्य शिखरे पाहू शकता : त्याच्या सामर्थ्याचा शिखर; त्याच्या दयेचा शिखर; आणि त्याचा संकल्प-सिद्धीचा शिखर.

सर्व अधिकार त्याला दिलेंला आहे – त्याची इच्छा पूर्ण करण्याचा सर्व अधिकार व सामर्थ्य. आणि या सामर्थ्याचा उपयोग तो सर्व राष्ट्रांतील लोकांना शिष्य बनवण्याचा आपला खंबीर उद्देश साध्य करून घेण्यासाठीं करतो. हे करत असतांना, तो आपल्या प्रत्येकावर वैयक्तिकरित्या दया करतो, ती अशी कीं, युगाच्या समाप्तीपर्यंत तो सर्व दिवस आमच्याबरोबर आहे असे तो आपल्याला अभिवचन देतो.

आपण सर्वांना आपल्या अंतःकरणात हे ठाऊक आहे कीं मरणांतून उठलेला ख्रिस्त हा आपण त्याच्या पराक्रमाचे कौतुक करावें  ही आमची अभिलाषा जर पूर्ण करणार असेल तर ह्या सर्व गोष्टीं अशाच असणें अगत्याचे आहे. सामर्थ्याने पराक्रमी. दयाळूपणामघ्ये पराक्रमी. आपला संकल्प सिद्धींस नेण्यांत पराक्रमी.

जे लोक त्यांचे संकल्प पूर्ण करण्याच्या बाबतींत अत्यंत दुर्बळ असतांत, ते पराक्रमाचे कौतुक करण्याची आमची अभिलाषा पूर्ण करू शकत नाहींत. ज्यांच्या जीवनात कोणतेही उद्दिष्ट नाहीं अशा लोकांचे कौतुक आपण कदाचितच करतो. आणि ज्यांचे संकल्प केवळ स्वार्थी आणि निर्दयी आहेत त्यांचे कौतुक करणें तर अशक्यच.

आपल्याला एखाद्या अशा पुरुषाला पाहण्याची आणि जाणून घेण्याची अभिलाषा असते ज्याचे सामर्थ्य अमर्याद, ज्याची दया सौम्य आणि ज्याचा संकल्प शुद्ध आणि निश्चयी असा आहे.

कादंबरीकार आणि कवी व चित्रपट निर्माते आणि विविध विषयाचे लेखक अधूनमधून अशा पराक्रमी व्यक्तीचे चित्र आपल्यापुढे रेखाटत असतांत. परंतु अशा मनुष्याची उपासना करण्याइतपत माझी जी तळमळ आहे ती ते भरून काढू शकत नाहींत.

आपल्याला काहींतरी असे आवश्यक असते जें वास्तविक आहे. आपल्याला सर्व सामर्थ्य आणि दया आणि संकल्प साध्य करण्याचे अस्सल मूळ पाहण्याची तळमळ असते. यास्तव आपण मरणातून उठलेला ख्रिस्त ह्याच्याकडें पहावें आणि त्याची उपासना करावीं.

19 अगस्त : मसीह को देखना और बाँटना

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19 अगस्त : मसीह को देखना और बाँटना
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“तब उनकी आँखें खुल गईं; और उन्होंने उसे पहचान लिया, और वह उनकी आँखों से छिप गया . . . वे उसी घड़ी उठकर यरूशलेम को लौट गए, और उन ग्यारहों और उनके साथियों को इकट्ठे पाया।” लूका 24:31, 33

शुभ समाचार को बाँटा जाना चाहिए।

कभी-कभी, जब हमारे घर में ऐसे अतिथि होते हैं जिन्हें हम भली-भाँति जानते हैं, और विशेषकर यदि वे विश्वास के परिवार में हमारे भाई या बहन हों, तो हम भोजन करने से पहले उनसे प्रार्थना करने का आग्रह करते हैं। यह निवेदन हमारे मेज़ पर आए अतिथि का आदर करने के लिए होता है। लूका का सुसमाचार हमें एक ऐसा ही दृश्य देता है, यद्यपि यहाँ ऐसा प्रतीत होता है कि अतिथि ने स्वयं प्रार्थना करने का निर्णय लिया। यरूशलेम से इम्माऊस जाने वाले मार्ग पर दो चेलों से भेंट करने के बाद यीशु “उनके साथ रहने के लिए भीतर गया” (लूका 24:29), और “जब वह उनके साथ भोजन करने बैठा, तो उसने रोटी लेकर धन्यवाद किया और उसे तोड़कर उनको देने लगा” (पद 30)।

इससे पहले, यरूशलेम से उनकी लम्बी यात्रा के दौरान, जब इन दोनों की भेंट यीशु से हुई थी, तब “उनकी आँखें ऐसी बन्द कर दी गई थीं कि उसे पहिचान न सके” (लूका 24:16)। परन्तु अब, जब यीशु ने भोजन पर धन्यवाद किया, तब उन्हें देखने की सामर्थ दी गई। परमेश्वर ने इसी क्षण यह प्रकट करना चुना कि वे जी उठे हुए प्रभु यीशु मसीह की उपस्थिति में हैं।

जैसे परमेश्वर ने अपने आत्मा के द्वारा इन चेलों की आँखें खोल दीं कि वे जी उठे हुए मसीह के सत्य को देखें, वैसे ही उसने अपने वचन के द्वारा उनके हृदयों में यह जानने के लिए और अधिक तीव्र लालसा जगा दी कि यीशु कौन था और कौन है। जैसे ही उन्होंने यीशु को पहचाना, और उसके ओझल हो जाने के बाद भी, “उन्होंने आपस में कहा, ‘जब वह मार्ग में हम से बातें करता था और पवित्रशास्त्र का अर्थ हमें समझाता था, तो क्या हमारे मन में उत्तेजना न उत्पन्न हुई?’” (लूका 24:32)।

समय बहुत हो चुका था, वे लम्बी यात्रा करके आए थे, और वे अभी-अभी भोजन करने बैठे थे; तौभी वे तुरन्त उठे और यरूशलेम लौटे, ताकि ग्यारह चेलों के साथ इस अद्‌भुत समाचार को बाँटें। वह कैसी रात रही होगी!

उनका उत्साह हमें स्मरण दिलाता है कि यीशु के जीवित होने का समाचार केवल उनका ही समाचार नहीं था—और न ही केवल ग्यारहों का समाचार था। यह ऐसा समाचार है जिसे बाँटा जाना चाहिए और जिसे उन लोगों की संगति में सबसे अधिक आनन्द के साथ अनुभव किया जाता है जो इसके महिमामय अर्थ को समझते हैं। यह उन सब का है जो प्रभु के हैं। और चाहे हम कोई भी भाषा बोलें, किसी भी देश में जाएँ, या कोई भी यात्रा करें, हम उन अन्य विश्वासियों से दूर नहीं होते जिनके साथ हम यीशु मसीह के मृतकों में से पुनरुत्थान के द्वारा हमें दी गई जीवित आशा में एक साथ आनन्दित हो सकते हैं (1 पतरस 1:3-5)। फिर भी, जहाँ आप हैं वहीं, जिनके साथ आप रहते हैं और जिनके साथ आराधना करते हैं, उनसे आँख मिलाकर और मुस्कराकर यह कहकर इस आनन्द को बाँट सकते हैं, “यीशु जी उठा है।”

यह समाचार बाँटा जाना चाहिए। क्या आप मसीह को उसके वास्तविक स्वरूप में देखने और दूसरों को भी वही दिखाने की लालसा रखते हैं? क्या आप जीवन के साधारण कार्यों में यीशु को देखने और दूसरों को भी देखने में सहायता करने की इच्छा रखते हैं? यदि ऐसा है, तो परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह आपके लिए वही करे जो उसने इन चेलों के लिए किया, ताकि आप नए सिरे से यह खोज सकें और बाँट सकें कि यीशु कौन है और उसने आपके लिए क्या है।

  यूहन्ना 1:35-51

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 103–104; गलातियों 4

19August : आमच्या बाबतींत पुनरुत्थान म्हणजें काय

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19August : आमच्या बाबतींत पुनरुत्थान म्हणजें काय
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कीं, येशू प्रभू आहे असे जर ‘तू आपल्या मुखाने’ कबूल करशील आणि देवानें त्याला मेलेल्यांतून उठवले असा ‘आपल्या अंत:करणात’ विश्वास ठेवशील तर तुझे तारण होईल. (रोमकरांस 10:9)

“देवानें त्याला मेलेल्यांतून उठवले असा ‘आपल्या अंत:करणात’ विश्वास ठेवशील” म्हणजें काय? देवानें येशूला मेलेल्यांतून उठवले असा विश्वास सैतान देखील ठेवतो. त्यानें ते घडताना पाहिले आहे. या प्रश्नाच्या उत्तरासाठीं, आपल्याला देवाच्या लोकांच्या बाबतींत पुनरुत्थानाचा अर्थ काय आहे यावर विचार करावा लागेल.

पुनरुत्थान म्हणजें देव आपल्या पक्षाचा झाला आहे. स्वतःला आमच्या जवळ आणावे हांच त्याचा मुख्य हेतू. आपल्या सर्व परित्यक्तपणाच्या आणि परकेपणाच्या भावनांवर मात करणें हे त्याचे ध्येय आहे.

येशूचे पुनरुत्थान हे इस्रायलापुढे आणि जगापुढे देवानें केलेंलीं अशी घोषणा आहे कीं आपण आपल्या कर्मांनी गौरवांत प्रवेश करू शकत नाहीं, म्हणून जिथें जाणें आपल्यासाठीं अशक्य आहे तिथें आपल्याला पोहोचवण्यासाठीं आवश्यक असलेली अशक्य गोष्ट त्यानें स्वतःच करावी असा त्याचा संकल्प आहे.

पुनरुत्थान हे देवानें याविषयी दिलेंले अभिवचन आहे कीं जें येशूवर विश्वास ठेवतांत त्यां सर्वांना देवाचे सामर्थ्य दिलें जाईल जेणेंकरून त्यांनी नीतिमत्वाच्या मार्गावर चालण्यास आणि मृत्यूच्या दरीतूनहि सुरक्षित निघण्यांस समर्थ व्हावें.

म्हणून, देवानें येशूला मेलेल्यांतून उठवले असा ‘आपल्या अंत:करणात’ विश्वास ठेवणें ही गोष्ट केवळ घडलेल्या वस्तुस्थितीला मान्य करण्यापर्यंत मर्यादित नाहीं. याचा अर्थ असा विश्वास ठेवणें आहे कीं देव तुमच्या बाजूने आहे, कीं त्याचे तुमच्यासोबत घनिष्ठ नाते जुळले आहे, कीं तो तुमच्या जीवनांत बदल घडवून आणत आहे आणि शेवटी तो तुम्हांला सार्वकालिक जीवनाचा आनंद मिळावा म्हणून तुम्हांला तारेल.

पुनरुत्थानावर विश्वास ठेवणें म्हणजें त्यानें जीवन, आणि आशा आणि नीतिमत्व यांविषयी जी जी अभिवचने दिलींत त्यांवर जशाचा तसा विश्वास ठेवणें.

याचा अर्थ देवाच्या सामर्थ्यावर आणि त्यानें आपल्यावर केलेंल्या प्रीतिवर इतका विश्वास ठेवणें कीं ऐहिक लाभाचा मोह असो वा ऐहिक नुकसानाची भीती, यांपैकीं कोणतीही गोष्ट आपल्याला त्याच्या इच्छेविरुद्ध बंड करण्यांस प्रवृत्त करणार नाहीं.

सैतानाचा विश्वास आणि पवित्र जनांचा विश्वास यांत हाच फरक आहे. हे देवा, आम्हीं तुझ्यावर प्रीति करावी आणि तुझा पुत्र ख्रिस्त येशू ह्याच्या पुनरुत्थानात विश्रांती घ्यावी म्हणून तू आमच्या अंतःकरणाची सुंता कर (अनुवाद 30:6).

18 अगस्त : जलते दीपक

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18 अगस्त : जलते दीपक
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“सब काम बिना कुड़कुड़ाए और बिना विवाद के किया करो, ताकि तुम निर्दोष और भोले होकर टेढ़े और हठीले लोगों के बीच परमेश्‍वर के निष्कलंक सन्तान बने रहो, जिनके बीच में तुम जीवन का वचन लिए हुए जगत में जलते दीपकों के समान दिखाई देते हो कि मसीह के दिन मुझे घमण्ड करने का कारण हो कि न मेरा दौड़ना और न मेरा परिश्रम करना व्यर्थ हुआ।” फिलिप्पियों 2:14-16

हम सब ऐसे लोगों को जानते हैं जो किसी कमरे में प्रवेश करते ही उसे उज्ज्वल कर देते हैं—ऐसे स्त्री-पुरुष जिनमें ऐसे गुण होते हैं जो उन्हें आकर्षक और प्रभावशाली बनाते हैं। वे हमारे मन को प्रसन्न कर देते हैं। कुछ कारण ऐसे होते हैं जिन्हें हम सदा शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते, परन्तु उनके समीप रहना हमें अच्छा लगता है।

मसीहियों के रूप में, हमें भी अपने आस-पास के लोगों पर ऐसा ही प्रभाव डालने का प्रयास करना चाहिए। इसका यह अर्थ नहीं कि हमें अपने स्वभाव को बदलकर वह बन जाएँ जो हम में से अधिकांश नहीं हैं, और हर सभा की जान बनने का प्रयत्न करें! विश्वासियों के रूप में हमारा प्रयत्न व्यक्तित्व, करिश्मा, या हास्य-बोध के विषय में नहीं है। यह नैतिक पवित्रता के विषय में है। यही वह बात है जिसे यीशु ने तब कहा था जब उसने अपने चेलों से कहा कि वे “जगत की ज्योति” हैं: उन्हें ऐसा जीवन जीना था कि लोग उनके भले कामों को देखकर परमेश्वर की महिमा करें (मत्ती 5:14-16)। यही बात पौलुस के मन में भी थी जब उसने अपने फिलिप्पी के मित्रों से कहा कि वे “टेढ़े और हठीले लोगों के बीच” के बीच “जगत में जलते दीपकों के समान” चमकें। दूसरे शब्दों में, मसीही लोगों का चरित्र न केवल दिखाई देने योग्य होना चाहिए, बल्कि उज्ज्वल भी होना चाहिए।

परमेश्वर की प्रजा के रूप में हम जीवते परमेश्वर की आराधना करने, उसके वचन से शिक्षा पाने, और उसके अनुग्रह में दृढ़ होने के लिए एकत्र होते हैं—परन्तु इसलिए नहीं कि फिर हम घर जाकर चुप हो जाएँ! जब हमारी मसीहियत का प्रभाव कलीसिया की इमारत के द्वार पर ही रुक जाता है, तब वह किसी के लिए भी बहुत उपयोगी नहीं रह जाती। हम सामूहिक आराधना से निकलकर ऐसे संसार में प्रवेश करते हैं जो असंख्य प्रकार से अन्धकारमय और भ्रमित है, और इसलिए हमें यह निश्चय करके निकलना चाहिए कि हम उस संसार में उज्ज्वल, चमकती हुई विश्वासयोग्यता के साथ जीवन बिताएँगे।

प्राचीन संसार में तारों का उपयोग मार्गदर्शन के लिए किया जाता था। लोग बाहर निकलते, ऊपर देखते, और आकाश के द्वारा अपना मार्ग निर्धारित करते थे। पौलुस चाहता था कि उसके पाठक आकाश के तारों के समान उपयोगी हों और एक ऐसे संसार के लिए मार्गदर्शक बनें जिसे यह नहीं पता कि किस ओर मुड़ना है, और सब जीवन के महान ध्रुव तारे की ओर संकेत करें: उसी की ओर जिसने तारों को बनाया।

इस प्रकार जीवन बिताने के लिए, हमें जीवन के वचन को अपने मार्ग के लिए ज्योति के समान दृढ़ता से थामे रहना होगा। हमारे अपने कदम परमेश्वर के सत्य और अधिकारपूर्ण वचन के द्वारा संचालित होने चाहिएँ। हमें इस जीवन के वचन को आगे भी रखना है। यीशु का शुभ समाचार परमेश्वर के वचन में निहित है, और इसलिए हमें अपने पड़ोसियों और मित्रों को वही वचन देने के लिए तैयार रहना चाहिए, यह जानते हुए कि वह व्यर्थ लौटकर नहीं आएगा (यशायाह 55:11)। जैसे तारे प्रकाश फैलाते हैं, वैसे ही हमें सुसमाचार से भरे जीवन को आगे बढ़ाना है।

यदि हम परमेश्वर के अनुग्रह से कुड़कुड़ाहट, अशुद्धता, और स्वार्थ के प्रलोभनों का विरोध करें, और यदि हम परमेश्वर के अनुग्रह से आनन्द, सन्तोष, और आशा के साथ जीवन बिताएँ, और हर समय उसके वचन को थामे रहें, तो हम निश्चय ही अपने पड़ोसियों के भले और परमेश्वर की महिमा के लिए चमकेंगे। आपको अन्धकार में चमकने के लिए बुलाया गया है। आज ऐसा करना अवश्य सुनिश्चित करें।

  मत्ती 5:14-16

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 100–102; गलातियों 3 ◊

18 August : कठीण आज्ञां पाळण्याची आशा धरा

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18 August : कठीण आज्ञां पाळण्याची आशा धरा
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“जीविताची आवड धरून, चांगले दिवस पाहावे, अशी ज्याची इच्छा असेल. . . त्यानें वाइटाकडें पाठ फिरवून बरे ते करावे.” (1 पेत्र 3:10-11)

आपण येशूच्या आज्ञा का पाळत नाहीं याचे एकच मूळ कारण आहे : ते म्हणजें हे कीं आज्ञा न मानण्यापेक्षा आज्ञा पाळल्याने आम्हांला अधिक आशीर्वाद प्राप्त होईल यावर आपला मनापासून विश्वास नसतो. आपण देवाच्या अभिवचनावर पूर्ण आशा ठेवीत जगत नाहीं.

पेत्र येथें कोणते अभिवचन नमूद करतो? येशूनें जे शिक्षण दिलें, पेत्र ते पुढीलप्रमाणें आपल्याला सोपवितो :

वाइटाबद्दल वाईट, निंदेबद्दल निंदा असे करू नका; तर उलट आशीर्वाद द्या; कारण आशीर्वाद हे वतन मिळण्यासाठीं तुम्हांला पाचारण करण्यात आलें आहे. कारण,“जीविताची आवड धरून, चांगले दिवस पाहावे, अशी ज्याची इच्छा असेल….त्यानें वाइटाकडें पाठ फिरवून बरे ते करावे. त्यानें शांतीच्या प्राप्तीसाठीं झटावे व तिचा मार्ग धरावा.” (1 पेत्र 3:9-11)

पेत्र, जो येशूचे अनुकरण करत होता, त्यानें आम्हांला कठीण आज्ञां पाळण्यास — जसे कीं वाइटाबद्दल वाईट असे करू नका —प्रवृत्त करण्यास कसलीही लाज धरली नाहीं, आणि त्याबरोबर त्यानें एका मोठ्या हर्षाचे अभिवचनही दिलें. “निंदेबद्दल निंदा असे करू नका, जेणेंकरून तुम्हांला आशीर्वाद प्राप्त व्हावा!” तुम्हांला येणार्‍या युगात सार्वकालिक जीवनाचा आनंद घ्यायचा आहे का? तर वाइटाकडें पाठ फिरवून बरे ते करा! तुमच्यासाठीं युगानुयुगाचा आनंद राखून ठेविलेला आहे! तर मग आता सूड घेण्यांत जो आनंद मिळतो त्यापेक्षा ते प्रतिफळ जर आपण सूड घेणें टाळते तर, अधिक मोठे नाहीं का?

येशूची आज्ञा मोडण्याऐवजी जर तुम्हीं त्याची आज्ञा पाळता तर तुमचे नेहमी कल्याणच होईल, मग त्या आज्ञापालनामुळें तुम्हांला तुमचा जीवहि गमवावा लागला तरी योग्यच. येशूनें म्हटलें,

मी तुम्हांला खचीत सांगतो, ज्याने ज्याने माझ्याकरता व सुवार्तेकरता घर-दार, बहीण-भाऊ, आई-बाप, मुले-बाळे किंवा शेती-वाडी सोडली आहे, अशा प्रत्येकाला सांप्रतकाळी छळणुकींबरोबर शंभरपटीने….येणार्‍या युगात सार्वकालिक जीवन मिळाल्याशिवाय राहणार नाहीं. (मार्क 10:29-30)

प्रीतिचे मौल्यवान अर्पण देऊन ख्रिस्ताचे अनुकरण करण्यासाठीं लागणारे सामर्थ्य मिळवण्याचा एकमेव मार्ग म्हणजें आपण दृढ विश्वासाने ही आशा बाळगावी कीं, जर आपण त्याचे आज्ञापालन करतांना आपला जीवही गमावला, तरी आपण तो पुन्हा मिळवू आणि सर्वकाळासाठीं गौरवाच्या प्रतिफळाची कापणी करूं.

17 अगस्त : खुशी कहाँ खोजी जाए

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17 अगस्त : खुशी कहाँ खोजी जाए
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“क्या ही धन्य है वह पुरुष जो दुष्‍टों की युक्ति पर नहीं चलता, और न पापियों के मार्ग में खड़ा होता; और न ठट्ठा करने वालों की मण्डली में बैठता है! परन्तु वह तो यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता; और उसकी व्यवस्था पर रात दिन ध्यान करता रहता है।” भजन संहिता 1:1-2

हम यह अपेक्षा कर सकते हैं कि अब तक स्त्री-पुरुषों ने खुशी की कला में निपुणता प्राप्त कर ली होगी। अब तक यह विषय पुराना हो जाना चाहिए था, क्योंकि हर किसी को यह जान लेना चाहिए था कि खुशी क्या है और उसे कैसे पाया जाए। परन्तु वास्तव में प्रमाण इसके विपरीत संकेत करते हैं। केवल समाचारों पर थोड़ी दृष्टि डालना ही यह समझने के लिए पर्याप्त है कि सच्ची खुशी दुर्लभ है।


बाइबल हमारी सच्ची खुशी की चिन्ता करती है। भजन 1 का आरम्भ करने वाला शब्द, जिसका अनुवाद “धन्य” किया गया है, उसका अनुवाद “खुश” भी किया जा सकता है। इसी प्रकार, यीशु के पहाड़ी उपदेश में उसके मुख से निकला पहला शब्द भी खुशी से सम्बन्धित था: उसने मूलतः कहा, खुश हैं वे जो दीन हैं, जो दयावन्त हैं, और जो मेल कराने वाले हैं (मत्ती 5:3-11)।


भजन 1 के आरम्भिक पदों के अनुसार, हमारी खुशी का एक पक्ष सीधे इस बात से जुड़ा है कि हम कैसे सोचते हैं और कैसे देखते हैं। वास्तविकता के विषय में हमारा विचार हमारे जीवन को, भले या बुरे के लिए, आकार देता है। इसलिए यदि हम परमेश्वर की मुस्कान के अधीन जीवन बिताना चाहते हैं और उस धन्य खुशी का अनुभव करना चाहते हैं जो केवल वही दे सकता है, तो हमें इस संसार के अधर्मी विचारों को नहीं अपनाना चाहिए। “दुष्टों की युक्ति” से अभिप्राय अधर्मियों के उद्देश्यों से है—उनकी उक्तियों, सिद्धान्तों, और उनसे उत्पन्न आचरण की रीति से। ऐसी सांसारिक बुद्धि खुशी और आशीष का वादा तो करती है, परन्तु वास्तव में हमें मेघधनुष के छोर पर रखे सोने के घड़े के पीछे दौड़ाती रहती है; हम सदा खोजते रहते हैं, परन्तु हमारे हाथ खाली ही रहते हैं। खुशी इस बात में है कि हम उस पवन के पीछे दौड़ने से इनकार कर दें, चाहे संसार हमें ऐसा करने के लिए बुलाता रहे।


फिर भी स्थाई खुशी का मार्ग केवल छलपूर्ण युक्ति को ठुकराने तक सीमित नहीं है; इसमें सत्य की सुन्दरता को अपनाना भी सम्मिलित है। खुश मनुष्य “यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता।” परमेश्वर के वचन को पढ़ना और उस पर मनन करना हमारे सामने किसी कर्तव्य या बोझ के रूप में नहीं, बल्कि आनन्द और हर्ष के रूप में प्रस्तुत किया गया है। क्यों? क्योंकि वह हमें उसके लेखक—हमारे सृष्टिकर्ता, पालनहार, और उद्धारकर्ता—के साथ और गहरी संगति में ले जाता है। इसलिए संसार जो भी क्षणिक सुख आपके सामने रखे, उनके स्थान पर केवल परमेश्वर के वचन से चिपके रहें, क्योंकि वही आपके प्राण को बहाल कर सकता है (भजन 19:7)। इसके सिवाय कुछ भी आपके जीवन में सच्चा, निष्कपट, और स्थाई आनन्द नहीं ला सकता।


मत्ती 5:3-11
◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 97–99; गलातियों 2

17 August : परमेश्वराचा धन्यवाद करणें म्हणजें काय

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17 August : परमेश्वराचा धन्यवाद करणें म्हणजें काय
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माझ्या जिवा, परमेश्वराचा धन्यवाद कर; हे माझ्या सर्व अंतर्यामा, त्याच्या पवित्र नावाचा धन्यवाद कर. (स्तोत्र 103:1)

या स्तोत्राच्या सुरुवातीला आणि शेवटी स्तोत्रकर्ता त्याच्या जिवाला आव्हानात्मक उपदेश देऊन परमेश्वराचा धन्यवाद करण्यास सांगतो— “हे माझ्या जिवा, परमेश्वराचा धन्यवाद कर” — शिवाय, तो देवदूतांना आणि स्वर्गातील सैन्यांना आणि देवाच्या सर्व हस्तकृतींना देखील तेच करण्याचे आव्हान करतो.

अहो परमेश्वराच्या दूतांनो, जे तुम्हीं बलसंपन्न आहात,

आणि त्याचा शब्द ऐकून त्याप्रमाणें चालता

ते तुम्हीं त्याचा धन्यवाद करा.

अहो परमेश्वराच्या सर्व सैन्यांनो,

जे तुम्हीं त्याची सेवा करून त्याचा मनोदय सिद्धीस नेता,

ती तुम्हीं त्याचा धन्यवाद करा.

परमेश्वराच्या सर्व कृत्यांनो,

त्याच्या साम्राज्यातील सर्व ठिकाणी त्याचा धन्यवाद करा;

हे माझ्या जिवा, परमेश्वराचा धन्यवाद कर! (स्तोत्र 103:20-22)

या स्तोत्राचा मुख्य विषय परमेश्वराचा धन्यवाद करण्यावर केंद्रित आहे. परमेश्वराचा धन्यवाद करणें म्हणजें काय?

याचा अर्थ त्याची महानता व चांगुलपण यांविषयी प्रशंसनीय शब्द बोलणें – आणि खरं तर त्याचा अर्थ म्हणजें ती प्रशंसा आपल्या जीवाने व अंतर्यामाने करणें.

दावीद या स्तोत्राच्या पहिल्या आणि शेवटच्या वचनांमध्यें जेव्हां असें म्हणतो, “हे माझ्या जिवा, परमेश्वराचा धन्यवाद कर,” तेव्हां तो असे म्हणत आहे कीं देवाचे चांगुलपण आणि त्याची महानता यांविषयी प्रामाणिकपणाचे शब्द हें आत्म्याच्या खोलीतून आलें पाहिजे.

जीव व अंतर्याम यांवाचून मुखाने परमेश्वराचा धन्यवाद करणें हे ढोंगीपणाचे ठरेल. येशूनें म्हटलें, “हे लोक, ओठांनी माझा सन्मान करतांत. पण त्यांचे अंतःकरण माझ्यापासून दूर आहे.” (मत्तय 15:8). ही गोष्ट किती भयप्रद आहे याची दाविदाला जाणीव आहे, म्हणून तो स्वतःलाच आव्हानात्मक उपदेश करतो. तो आपल्या जिवाला सांगत आहे कीं त्यानें असले ढोंग करू नये.

“हे माझ्या जिवा, ये आणि देवाचे वैभव व त्याचे चांगुलपण पाहा. माझ्या मुखाबरोबर स्वर-सांगड घाल म्हणजें आपण आपल्या संपूर्ण व्यक्तित्वाने परमेश्वराचा धन्यवाद करूं. हे माझ्या जिवा, आपण ढोंगीपणा करणार नाहीं!”