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16 अगस्त : मधुर एबेनेज़ेर

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16 अगस्त : मधुर एबेनेज़ेर
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“इसलिए अब तू मेरे दास दाऊद से ऐसा कह, ‘सेनाओं का यहोवा यों कहता है, कि मैं ने तो तुझे भेड़शाला से, और भेड़–बकरियों के पीछे-पीछे फिरने से, इस मनसा से बुला लिया कि तू मेरी प्रजा इस्राएल का प्रधान हो जाए। और जहाँ कहीं तू आया गया, वहाँ-वहाँ मैं तेरे संग रहा, और तेरे समस्त शत्रुओं का तेरे सामने से नाश किया है; फिर मैं तेरे नाम को पृथ्वी पर के बड़े-बड़े लोगों के नामों के समान महान कर दूँगा।” 2 शमूएल 7:8-9

स्मरण दिलाने वाली बातें अत्यन्त आवश्यक हैं। बार-बार पवित्रशास्त्र में परमेश्वर की प्रजा से कहा गया वचन मूलतः व्यवस्थाविवरण 6:12 और 8:11 का यही है: “सावधान रहना, कहीं ऐसा न हो कि तू यहोवा को भूल जाए।” जब हम स्मरण करना छोड़ देते हैं, तब हमारे हृदय भटक जाते हैं।

जब राजा दाऊद और इस्राएल का राज्य विश्राम में था, तब दाऊद ने परमेश्वर के लिए एक घर बनाने का प्रस्ताव रखा—वाचा के सन्दूक के रहने के लिए एक दीन तम्बू से बढ़कर उत्तम स्थान (2 शमूएल 7:1-2)। परन्तु दाऊद की यह कल्पना परमेश्वर की योजना का भाग नहीं थी (पद 6)। इसलिए दाऊद को यह सोचने के लिए छोड़ देने के बजाय कि वह परमेश्वर के लिए क्या कर सकता है, परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ता नातान को भेजा कि वह दाऊद को स्मरण दिलाए कि परमेश्वर ने उसके लिए क्या किया है—और यह भी प्रकट करे कि परमेश्वर आगे क्या करने का अभिप्राय रखता है।

परमेश्वर ने दाऊद को एक तुच्छ चरवाहे से उठाकर एक महिमामय राजा बना दिया था। यह ऐसा काम नहीं था जिसे दाऊद ने स्वयं आरम्भ किया हो; यह परमेश्वर का कार्य था। जहाँ कहीं दाऊद गया, वहाँ परमेश्वर उसके साथ रहा। उसके शत्रु अब तितर-बितर हो चुके थे, और दाऊद विश्राम में था, क्योंकि परमेश्वर का हाथ उस पर था। सिंहासन पर बैठे हुए दाऊद को यह स्मरण कराया जा रहा था कि वह मैदान से कितनी दूर आ चुका था—और यह भी कि उसे वहाँ तक कौन लाया था। और इस स्मरण के साथ ही उसे यह आश्वासन भी दिया जा रहा था कि परमेश्वर आगे भी उसका मार्गदर्शन करता रहेगा। परमेश्वर ने इस कार्य को आरम्भ किया था—और जब परमेश्वर किसी से अपने आप को बाँधता है, तो वह उस भले काम को जिसे उसने आरम्भ किया है, पूरा भी करता है (फिलिप्पियों 1:6)।

एक अर्थ में, दाऊद को एक “एबेनेज़ेर का क्षण” दिया जा रहा था: यह स्मरण कि परमेश्वर अपनी प्रजा की सहायता करता है। कई वर्ष पहले भविष्यद्वक्ता शमूएल ने सारी प्रजा को ऐसा ही एक क्षण दिया था, जब उसने एक पत्थर खड़ा किया कि इस्राएल को परमेश्वर द्वारा दी गई विजयों का स्मरण हो। उसने “यह कहकर उसका नाम एबेनेज़ेर रखा, ‘यहाँ तक यहोवा ने हमारी सहायता की है’” (1 शमूएल 7:12)।

सावधान रहें कि आप यह न भूल जाएँ कि परमेश्वर ने आपकी कैसे सहायता की है। आज समय निकालकर उन उद्देश्यों को जिनके लिए उसने आपको बुलाया है, मार्ग में उसकी उपस्थिति को, और उन तरीकों को जिनसे उसने आपको छुड़ाया और सुरक्षित रखा, स्मरण करें और उन पर मनन करें। क्योंकि ऐसा करने से आपको यह स्मरण होगा कि जिसने यहाँ तक आपकी सहायता की है, वही परमेश्वर आज और हर दिन भी निश्चय ही आपकी सहायता करता रहेगा, जब तक कि वह अपनी भली योजनाओं को पूरा न कर ले।

बीते समय का उसका प्रेम मुझे यह सोचने नहीं देता
कि वह अन्त में मुझे दुख में छोड़ देगा;
मेरे स्मरण में आया हर मधुर एबेनेज़ेर
यह पुष्टि करता है कि वह अन्त तक मेरी सहायता करेगा।

1 शमूएल 7:3-17
पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 94–96; गलातियों 1 ◊

16 August : आपण लैंगिक पापात का पडतो

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16 August : आपण लैंगिक पापात का पडतो
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आनंदाचे व हर्षाचे शब्द माझ्या कानी पडू दे; म्हणजें तू मोडलेली माझी हाडे उल्लासतील. . . . तू केलेंल्या उद्धाराचा आनंद मला पुन्हा होऊ दे; आणि उत्सुकतेच्या आत्म्याने मला सावरून धर. (स्तोत्र 51:8, 12)

दावीद त्याला लैंगिक दुराचारी प्रवृत्तीवर शक्ती मिळावी असा धावा का करत नाहीं? लोकांनी आपल्याला जाब विचारावा अशी तो लोकांकडें जाऊन मागणी का करत नाहीं? स्त्रीकडें वासनेने पाहण्यापासून देवानें त्याच्या डोळ्यांचे रक्षण करावें व त्याला वासना-मुक्त असे विचार द्यावेंत अशी प्रार्थना तो का करत नाहीं? खरे पाहता, बेथशेबेवर जणू बलात्कारच केल्यानंतर त्यानें पापाचा अंगीकार आणि पश्चात्तापाचे हे जे स्तोत्र लिहिलें, त्यांत दाविदाने अशीच काहींतरी विनवणी करायला पाहिजे होती अशी तुम्हीं अपेक्षा करत असाल.

याचे कारण असे कीं लैंगिक पाप हे एक लक्षण आहे, रोग नाहीं, हे त्याला ठाऊक आहे.

लोक लैंगिक पापं करतांत कारण त्यांना ख्रिस्तामध्यें आनंद व हर्षाची पूर्णता प्राप्त झालेंलीं नसते. त्यांची अंत:करणें स्थिर, खंबीर, आणि घट्ट पायावर उभारलेली नाहींत. ते अडखळतांत. परीक्षा आली कीं ते लगेच पापांत पडतांत कारण त्यांच्या भावना आणि विचार यांमध्यें देवाला ते सर्वोच्च स्थान नाहीं जे त्यांनी त्याला द्यायला पाहिजे.

दावीद हे स्वतःविषयी जाणून होता. आमच्याबाबतही ते खरे आहे. म्हणून दावीद जी विषयवस्तू घेऊन प्रार्थना करतो त्याद्वारे तो आम्हांला दाखवून देत आहे कीं, जे लोग लैंगिक पापांत पडतांत त्यांना खरी गरज कशाची आहे: देवाची! देवामध्यें असलेला आनंद व हर्ष.

हे शहाणपण आपल्यासाठीं अफाट आहे.

15 अगस्त : कुड़कुड़ाहट से कृतज्ञता तक

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15 अगस्त : कुड़कुड़ाहट से कृतज्ञता तक
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“सब काम बिना कुड़कुड़ाए और बिना विवाद के किया करो, ताकि तुम निर्दोष और भोले होकर टेढ़े और हठीले लोगों के बीच परमेश्‍वर के निष्कलंक सन्तान बने रहो, जिनके बीच में तुम जीवन का वचन लिए हुए जगत में जलते दीपकों के समान दिखाई देते हो।” फिलिप्पियों 2:14-15

प्राचीन इस्राएल के इतिहास में बहुत से महिमामय क्षण आए—लाल समुद्र को पार करना, प्रतिज्ञा किए हुए देश में प्रवेश करना, राजा दाऊद का राज्य, और बहुत कुछ। परन्तु इस्राएली कभी-कभी पूरी तरह विपत्ति भी बन जाते थे। निर्गमन के तुरन्त बाद उन्होंने जो किया, उसके विषय में सोचें। उन्होंने प्रभु के अद्‌भुत काम देखे थे, मिस्र की दासता से छुड़ाए गए थे, और अत्याचार और गुलामी से मुक्त किए गए थे। वे तो सब लोगों से बढ़कर आनन्द और कृतज्ञता से पहचाने जाने चाहिए थे। परन्तु मिस्र छोड़ने के कुछ ही समय बाद, सारी मण्डली भोजन और पानी के विषय में कुड़कुड़ाने लगी और मूसा तथा हारून के नेतृत्व और उद्देश्यों के विरुद्ध शिकायत करने लगी (निर्गमन 16:1-9)। यह परमेश्वर की प्रजा के लिए अच्छी बात नहीं थी।


सदियों बाद, पौलुस ने फिलिप्पी में परमेश्वर की प्रजा को इसी प्रकार की असफलता से बचाने के लिए लिखा, और उनसे कहा कि वे “सब काम बिना कुड़कुड़ाए” करें। वह चाहता था कि उसके पाठक समझें कि जिस रीति से वे कोई काम करते हैं, वह उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि वे वास्तव में क्या कर रहे हैं। जैसा उनके लिए था, वैसा ही हमारे लिए भी है: हमारे लिए यह सम्भव है कि हम सही काम करें, परन्तु ऐसे मनोभाव से करें जो हमें आनन्द से वंचित कर दे और हमारे आस-पास के सब लोगों के लिए हानिकारक हो।


पतरस ने अपने पत्रों में इसी प्रकार की शिक्षा दी: “बिना कुड़कुड़ाए एक दूसरे का अतिथि-सत्कार करो” (1 पतरस 4:9)। वह केवल इतना कह सकता था, “एक दूसरे का अतिथि-सत्कार किया करो,” और तब उन्हें (और हमें!) इस आज्ञा को मानना अधिक सरल लगता। परन्तु वे शब्द “बिना कुड़कुड़ाए” दिखाते हैं कि पतरस मानव स्वभाव को कितनी अच्छी तरह समझता था। परमेश्वर केवल अतिथि-सत्कार या किसी भी भले काम के बाहरी निर्वाह के प्रति ही चिन्तित नहीं है, बल्कि उस मनोभाव के प्रति भी चिन्तित है जिसके साथ हम उसे करते हैं।


हम अपने जीवन में ऐसे अनेक उदाहरणों के विषय में सोच सकते हैं, है न? सम्भव है आपके घर में कोई किशोर हो जो अपने काम प्रसन्न मन से न करे। शायद आपका कोई सहकर्मी हो जो शिकायत किए बिना कोई काम पूरा ही न कर पाए। या सम्भव है कि उदाहरण आप स्वयं हों, जो परमेश्वर द्वारा दिए गए जीवन या उस सेवा के विषय में, जिसके लिए उसने आपको बुलाया है, मन ही मन कुड़कुड़ाते रहते हों। दुखद वास्तविकता यह है कि हम जितना स्वीकार करना चाहें, उससे अधिक बार इस्राएलियों के समान होते हैं। हम भी उस महान उद्धार को भूल जाते हैं जिसे परमेश्वर ने हमारे लिए पूरा किया है, और हम भी अपने जीवन की दिशा स्वयं तय करना अधिक पसन्द करते हैं, बजाय इसके कि अपने आप को परमेश्वर के हाथों सौंप दें। फिर भी पौलुस हमें बताता है कि जब हम बिना कुड़कुड़ाए काम करते हैं, तब परमेश्वर हमें “निर्दोष और भोले . . . और . . . परमेश्‍वर के निष्कलंक सन्तान” बना रहा है। हर बार जब हम कुड़कुड़ाने के अवसर का विरोध करते हैं, वह इस बात का प्रमाण है कि परमेश्वर हमें बदल रहा है।


आज उस रीति को स्मरण करें जिससे परमेश्वर ने आपको आपके पाप और दण्ड के समुद्र से छुड़ाया, और आपको पार ले जाकर मसीह में उद्धार की ठोस भूमि पर खड़ा किया। न तो आप इसके योग्य थे, और न ही आपने अपना छुटकारा इस्राएलियों से अधिक अपने प्रयास से प्राप्त किया। फिर उन तरीकों को पहचानें जिनमें आप अपने दिनों को मन में कुड़कुड़ाहट के साथ बिताते हैं, और प्रार्थना करें कि परमेश्वर आपको अपने अनुग्रह के द्वारा फिर से ऐसा चकित कर दे कि उसके विरुद्ध आपकी कुड़कुड़ाहट उसकी स्तुति करने वाली कृतज्ञता में बदल जाए।

भजन 95
◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 91–93; 1 पतरस 5

15 August : आम्हांला मुळांत कोणत्या उद्देश्याने बनविले होते

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15 August : आम्हांला मुळांत कोणत्या उद्देश्याने बनविले होते
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कारण, आपल्याला देवाकडें आणण्यास ख्रिस्तसुद्धा पापांसाठीं, नीतिमान अनीतिमान लोकांसाठीं, एकदा मरण पावला. (1 पेत्र 3:18)

सुवार्तेची- म्हणजें शुभवर्तमानाची –  सर्वात मोठ्या आनंदाची बाजू म्हणजें स्वतः देवाबरोबर सहभागीतेचा आनंद घेणें. ही सत्य येथे 1 पेत्र 3:18 मध्यें “आपल्याला देवाकडें आणण्यास” या वाक्यात अगदी स्पष्ट शब्दांत मांडलेले आहे. ख्रिस्त यासाठींच मरण पावला.

सुवार्तेत असलेली इतर सर्व दानें हा आनंद साध्य केला जावा म्हणूनच आहेत.

  • आपल्या अपराधांची क्षमा झाली आहे, कीं यापुढे आपलें अपराध आपल्याला देवापासून दूर नेणार नाहींत.
  • आपण नीतिमान ठरविलेले गेलें आहोंत, कीं यापुढे दंडाज्ञा आपल्याला देवापासून दूर करणार नाहींत.
  • ख्रिस्ताच्या प्रायश्चित्ताद्वारे देवाचा कोप दूर केला गेला, कीं यापुढे आपला पिता झालेंल्या देवाचा कोप त्याच्या आणि आपल्यामध्यें अडखळण नसावा.
  • आम्हांला आता सार्वकालिक जीवन दिलें गेले आहे, व पुनरुत्थान होईल तेव्हा नवीन शरीरे दिली जातील, कीं ज्यामुळें आपण सर्वकाळासाठीं देवाबरोबर राहण्यांस व त्याच्या सहवासाचा आनंद घ्यावयांस पूर्णपणें समर्थ व्हावें.

आपली अंत:करणें चाचपडून पाहा. तुम्हांला तुमच्या पातकांची क्षमा का हवी आहे? का तुम्हांला नीतिमान ठरविले ज्याण्याची गरज आहे? देवाचा कोप शमविला जावा म्हणून प्रायश्चित व्हावे असे तुम्हांला का वाटते? तुम्हांला सार्वकालिक जीवन का हवे आहे? “कारण मला देवाचा आत्ता आणि सर्वकाळासाठीं आनंद घ्यायचा आहे” हे याचे निर्णायक उत्तर आहे का?

देवानें ह्या शुभवर्तमानांत आम्हांला प्रीतिची जी भेट दिली ती भेट स्वतः देव आहे. मुळांत आम्हांला यासाठींच निर्माण केलें गेलें होते. पण आम्हीं आपल्या पापामुळें देवाचा हा सहवास गमाविला होता. ख्रिस्त हेच नाते व सह्भागीता पुन्हा स्थापित करण्यासाठीं आला.

“तुझ्या उपस्थितीत विपुल हर्ष आहे, तुझ्या उजव्या हातांत सुख सर्वकाळ आहेत” (स्तोत्र 16:11).

14 अगस्त : सब जातियों का प्रभु

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14 अगस्त : सब जातियों का प्रभु
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“यहोवा सिय्योन से गरजेगा, और यरूशलेम से अपना शब्द सुनाएगा . . . ‘मैं हजाएल के राजभवन में आग लगाऊँगा . . . मैं दमिश्क के बेण्डों को तोड़ डालूँगा।” आमोस 1:2, 4-5

बाइबल का परमेश्वर न्याय का परमेश्वर है। वह सब कुछ देखता है, वह सब कुछ जानता है, और वह सब बातों का लेखा चुकता करने का वचन देता है। यह परमेश्वर की प्रजा के लिए अत्यन्त शुभ समाचार है, जो यह जानकर विश्राम कर सकती है कि हमारे द्वारा सहा गया कोई भी अन्याय उसकी दृष्टि से नहीं बचता। जैसा कि भजनकार लिखता है, “परमेश्‍वर जाति-जाति पर राज्य करता है; परमेश्‍वर अपने पवित्र सिंहासन पर विराजमान है” (भजन 47:8)। सब को अपने चाल-चलन का लेखा उसे देना होगा। ये सत्य बातें भविष्यद्वक्ता आमोस के द्वारा बड़े सामर्थ्य से स्पष्ट की गई हैं, जिसके द्वारा प्रभु ने छः जातियों पर न्याय की घोषणा की।

आमोस 1:3–2:3 में परमेश्वर अपनी घोषणा सीरिया और उसकी राजधानी दमिश्क से आरम्भ करता है, जिनके विषय में वह कहता है कि उन्होंने जिन लोगों को जीता, उनके प्रति निष्ठुर क्रूरता के कारण उन्हें न्याय का सामना करना पड़ेगा। इसके बाद गाज़ा आता है, जो मानव तस्करी और गुलामों के कारोबार में संलग्न है। फिर सूर आता है, और वह भी मानव तस्करी का दोषी है। इसके बाद वह एदोम की ओर मुड़ता है, जिसकी घृणा और क्रोध उसे दोषी ठहराते हैं। फिर अम्मोन आता है, जिसकी भूमि की लालसा उन्हें बर्बर हिंसा तक ले गई। अन्त में मोआब आता है, जो निर्दयी प्रतिशोध का दोषी है।

इन पदों से हम न केवल यह सीखते हैं कि परमेश्वर इन विशेष प्राचीन जातियों और उनके दुष्ट कार्यों के विषय में क्या सोचता है; बल्कि हम यह भी निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि वह सामान्य रूप से किससे प्रेम करता है और किससे घृणा करता है। हम निश्चय जान सकते हैं कि परमेश्वर अपने स्वरूप में बनाए गए लोगों को वस्तुओं या सम्पत्ति के समान व्यवहार किए जाने से घृणा करता है। हम यह भी जान सकते हैं कि परमेश्वर निरंकुश घृणा और हिंसा को, विशेषकर निर्बलों की कीमत पर, सहन नहीं करेगा। हम यह भी जान सकते हैं कि परमेश्वर उन लोगों से लेखा लेगा जो मनुष्यों से बढ़कर लाभ को महत्त्व देते हैं या जो दिए हुए वचन को नहीं निभाते।

आमोस के द्वारा घोषित किए जाने के बाद से परमेश्वर ने इन बातों पर अपना मन नहीं बदला है। प्रभु आज भी इन पापों से घृणा करता है और हर उस जाति और हर उस व्यक्ति से लेखा लेगा जो इनके दोषी पाए जाएँगे। इसलिए, जब ये काम परमेश्वर की प्रजा के विरुद्ध किए जाते हैं, तो हम निश्चय जान सकते हैं कि न्याय होगा। कुछ जातियों और व्यक्तियों के लिए इतिहास के क्रम में न्याय आएगा; और सब के लिए अनन्तकाल में न्याय आएगा।

जब हम दुख उठाते हैं, तब यह समाचार हमें ढाढ़स देता है; परन्तु यह समाचार हमें सचेत भी करता है, क्योंकि हम पाप करते हैं। हमें अपने आप से पूछना चाहिए कि क्या इन व्यवहारों का कोई चिह्न हमारे अपने हृदयों में भी पाया जाता है। हम शायद निर्दयी हिंसा या भूमि की लालसा के दोषी न हों, परन्तु वह घृणा, क्रोध, लोभ, स्वार्थ और घमण्ड जो ऐसे कार्यों की ओर ले जाते हैं, हमारे भीतर स्थान पा सकते हैं। बुद्धिमानी सदा इसी में है कि हम प्रभु से विनती करें कि वह हमें खोजे और दयापूर्वक हमें उन क्षेत्रों को दिखाए जहाँ पाप अब भी बना हुआ है। परमेश्वर की प्रजा होने के नाते, हम यह न्याय के भय के बिना कर सकते हैं, यह जानते हुए कि हमारा न्याय हमारे लिए कलवरी पर प्रभु यीशु मसीह ने सह लिया है। परमेश्वर जातियों पर राज्य करता है, और परमेश्वर अनन्तकाल पर राज्य करता है। जब आप इस संसार के अन्याय का सामना करते हैं और अपने हृदय के अन्याय से मन फिराते हैं, तो वह आपके जीवन में भी राज्य करे।

  आमोस 2:6-8

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 89–90; 1 पतरस 4 ◊

14 August : देव कश्याप्रकारे पातकांची क्षमा करूनही नीतिमान ठरतो

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14 August : देव कश्याप्रकारे पातकांची क्षमा करूनही नीतिमान ठरतो
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दावीद नाथानाला म्हणाला, “मी परमेश्वराविरुद्ध पातक केलें आहे,” नाथान दाविदाला म्हणाला, “परमेश्वराने तुझे पातक दूर केलें आहे; तू मरणार नाहींस. तरी तू हे काम करून परमेश्वराच्या शत्रूंना उपहास करायला निमित्त दिलें आहेस, ह्यास्तव तुला जो पुत्र झाला आहे तो खात्रीने मरणार.” (2 शमुवेल 12:13-14)

जे झालें ते संतापजनक आहे. उरिया मृत झाला आहे. बथशेबेवर बलात्कार झाला आहे. ह्यातून जे बाळ जन्मास आलें तेहि खात्रीने मरणार. तरी नाथान म्हणतो, “परमेश्वराने तुझे पातक दूर केलें आहे.”

बस असेच? दावीदाने व्यभिचार केला. त्यानें हत्येचा आदेश दिला. त्यानें लबाडी केलीं. त्यानें “परमेश्वराची आज्ञा तुच्छ” मानली (2 शमुवेल 12:9). त्यानें परमेश्वराच्या शत्रूंना उपहास करायला निमित्त दिलें. तरी “परमेश्वराने [त्याचे] पातक बस असेच सहजपणें दूर केलें”?!

हा देव कोणत्या प्रकारचा नीतिमान न्यायाधीश आहे? तुम्हीं बलात्कार व खून करून व खोटे बोलून असेच निर्दोषपणें सुटून जाऊ शकत नाहीं. कोणी नीतिमान न्यायाधीश असे करणार नाहीं.

पौलासाठीं ही एक मोठी पेंचांत पाडणारी धर्मशास्त्रीय अडचण होती – आज लोक ज्या अडचणींशी झुंज देत आहेत त्यापेक्षा खूपच वेगळी : देव एकाच वेळी अपराध क्षमा करणारा व तरीही नीतिमान असावे हे कसे शक्य आहे? रोमकरांस 3:25-26 मध्यें पौलाने जे म्हटले त्यांत या प्रश्नाचे उत्तर आहे :

त्याच्या रक्ताने विश्वासाच्या द्वारे प्रायश्‍चित्त होण्यास देवानें [ख्रिस्ताला]  पुढे ठेवले. ह्यासाठीं कीं, पूर्वी झालेंल्या पापांची देवाच्या सहनशीलतेने उपेक्षा झाल्यामुळें त्यानें आपलें नीतिमत्त्व व्यक्त करावे; म्हणजें आपलें नीतिमत्त्व सांप्रतकाळी असे व्यक्त करावे कीं, आपण नीतिमान असावे आणि येशूवर विश्वास ठेवणार्‍याला नीतिमान ठरवणारे असावे

दुसऱ्या शब्दांत सांगायचे तर, देव दावीदाच्या पातकाची शुद्ध उपेक्षा करत असल्याचे जे दिसून येते त्यामुळें आपल्याला होणारा मनस्ताप योग्यच आहे जर देव दावीदाचे पाप अगदी सहजपणें गालिच्याखाली दाबून टाकून देत असेल. पण तो तसे करित नाहींये.

देव जेव्हां दावीदाने पाप केलें त्यां काळापासून पुढे भविष्यांत अनेक शतकानंतर त्याचा पुत्र येशू ख्रिस्त याच्या मृत्यूकडें पाहतो जेव्हां तो दावीदाच्या जागी मरण सोसणार होता, ज्यामुळें देवाच्या दयेवर असलेला दावीदाचा विश्वास आणि भविष्यात ख्रिस्ताद्वारे देवाचे मुक्तीचे कार्य ह्या दोन्ही गोष्टी दावीद व ख्रिस्त यांमध्यें समेट घडवून आणतांत. आणि ज्याला सर्व गोष्टींचे ज्ञान आहे तो देव आपल्या मनांत दावीदाची पापे ही ख्रिस्ताची पापे म्हणून गणतो आणि ख्रिस्ताचे नीतिमत्त्व हे त्याचे नीतिमत्त्व म्हणून गणतो आणि अशाप्रकारे देव ख्रिस्तामुळें सहनशीलतेने दावीदाच्या पापाची न्याय्यत्वाने उपेक्षा करतो.

देवाच्या पुत्राचे मरण मनस्ताप देण्यांस पुरे आहे, आणि त्याद्वारे देवाचा जो गौरव कायम राहतो तोही मर्यादेपलीकडें आहे, म्हणजें असे कीं जेव्हां देव दावीदाला त्याचे व्यभिचाराचे, खून करण्याचे व लबाड बोलण्याचे पातक क्षमा करतो त्यांत तो नीतिमान ठरतो. तसेच, आमच्याही पातकांची क्षमा करण्यांत तो नीतिमान ठरतो.

अशाप्रकारे देव त्याचे परिपूर्ण नीतिमत्व आणि न्याय दोन्हींचे रक्षण करतो आणि त्याच वेळी येशूवर विश्वास ठेवणाऱ्यांवर दया करतो, मग त्यांची पातकें कितीही असंख्य असों वा कितीही भयानक असों. अनिर्वचनीय (अकथनीय) सुवार्ता हीच आहे.

13 अगस्त : बेनाम लोग और परमेश्वर की योजना

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13 अगस्त : बेनाम लोग और परमेश्वर की योजना
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“जब वे सूफ नामक देश में आए, तब शाऊल ने अपने साथ के सेवक से कहा, ‘आ, हम लौट चलें, ऐसा न हो कि मेरा पिता गदहियों की चिन्ता छोड़कर हमारी चिन्ता करने लगे।’ उसने उससे कहा, ‘सुन, इस नगर में परमेश्‍वर का एक जन है जिसका बड़ा आदरमान होता है; और जो कुछ वह कहता है वह बिना पूरा हुए नहीं रहता। अब हम उधर चलें, सम्भव है वह हम को हमारा मार्ग बताए कि किधर जाएँ।’” 1 शमूएल 9:5-6

शाऊल, जो आगे चलकर इस्राएल का पहला राजा बनने वाला था, अपने सेवक के साथ कई दिनों से अपने पिता की खोई हुई गदहियों को ढूँढ़ रहा था, परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली थी। शाऊल “लौट चलने” को तैयार था—परन्तु उसका सेवक अभी हार मानने को तैयार नहीं था। इसके स्थान पर उसने सुझाव दिया कि वे “परमेश्वर के जन” से सलाह लें, कि वह उन्हें उनका “मार्ग बताए कि किधर जाएँ।’” शाऊल ने सहमति दी, और शीघ्र ही उनकी खोज उन्हें भविष्यद्वक्ता शमूएल से मिलने तक ले गई, जहाँ शाऊल का इस्राएल के राजा के रूप में अभिषेक किया जाना था (1 शमूएल 10:1-8)।

हम यह सोच सकते हैं कि सेवक ही थका हुआ होकर घर लौटने की सलाह देता, और भविष्य का राजा भविष्यद्वक्ता से मिलने का प्रस्ताव रखता—परन्तु वास्तविकता इसके विपरीत थी। बाइबल यह आभास देती है कि यह सेवक परमेश्वर की कार्यविधियों के प्रति संवेदनशील था और यह समझने लगा था कि गदहियों की यह खोज किसी कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण बात में बदल रही है।

यह कितना अद्‌भुत है! यह सेवक कौन था? हम उसका नाम तक नहीं जानते। फिर भी वह परमेश्वर की प्रकट होती योजना में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था।

वास्तव में, पूरी बाइबल में हम देखते हैं कि परमेश्वर उन लोगों का उपयोग करता है जिन्हें सांसारिक मानकों के अनुसार तुच्छ समझा जा सकता था, परन्तु जिनकी आत्मिक समझ के कारण महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। उदाहरण के लिए, 2 राजाओं 5:1-14 एक छोटी लड़की का वर्णन करता है, जिसे तब बन्दी बनाकर ले जाया गया जब सीरिया की सेना ने इस्राएल पर धावा बोलकर लड़कियों को दासियाँ बना लिया था। वह एक कोढ़ी सेनापति नामान के घर में दासी के रूप में रहने लगी। वहीं उसने नामान के जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जब उसने सुझाव दिया कि वह इस्राएल के भविष्यद्वक्ता एलीशा के पास जाए। अन्ततः इसके परिणामस्वरूप उसने चमत्कारिक ढंग से चंगाई प्राप्त की। सैकड़ों वर्ष बाद, परमेश्वर ने अपने पुत्र को धारण करने का सौभाग्य एक अविवाहित युवती को दिया, जो एक साधारण प्रान्तीय नगर में रहती थी; और शक्तियों और प्रभाव के केन्द्रों से दूर रहने वाले चरवाहों को यह दायित्व दिया कि वे सबसे पहले मनुष्यों में यह समाचार फैलाएँ कि मसीह का जन्म हुआ है।

जीवते परमेश्वर के सेवकों के तौर पर ऐसी कहानियाँ हमें स्मरण दिलाती हैं कि हमारे नाम या हमारी योग्यताएँ महत्त्वपूर्ण नहीं हैं; बल्कि वह कार्य महत्त्वपूर्ण है जिसके लिए परमेश्वर हमें बुलाता है, और जिसे वह अपनी महिमामय, अनन्त योजनाओं में समाहित करता है। यह कम न आँकें कि आज आपके मुख से निकला हुआ उत्साहवर्धन, उपदेश, या साक्ष्य का कोई शब्द हमारे प्रभु द्वारा उसकी योजनाओं के प्रकट होने में कैसे उपयोग किया जा सकता है।

मरकुस 12:41-44
◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 87– 88; 1 पतरस 3

13 August : चांगुलपणाचा प्रत्येक मनोदय विश्वासाने कसा पूर्ण होतो याची तीन उदाहरणें

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13 August : चांगुलपणाचा प्रत्येक मनोदय विश्वासाने कसा पूर्ण होतो याची तीन उदाहरणें
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ह्याकरता तर आम्हीं तुमच्यासाठीं सर्वदा अशी प्रार्थना करतो कीं, आपल्या देवानें तुम्हांला झालेंल्या ह्या पाचारणाला योग्य असे मानावे आणि चांगुलपणाचा प्रत्येक मनोदय व विश्वासाचे कार्य सामर्थ्याने पूर्ण करावे. (2 थेस्सलनीका 1:11)

जेव्हा पौल म्हणतो कीं देवानें…..चांगुलपणाचा प्रत्येक मनोदय व विश्वासाचे कार्य सामर्थ्याने पूर्ण करावे (तो आमच्या कर्मांना “विश्वासाची कार्ये” म्हणतो), तेव्हा त्याचा अर्थ आपण पापाचा पराभव करावा आणि आपण विश्वासाने नीतिमत्वाला योग्य अशी कर्मे करावी असा होतो, म्हणजेंच पुढील पाच मिनिटे, पाच महिने, पाच दशके आणि अनंतकाळ यां एकूणच सर्व टप्प्यांमध्यें देव ख्रिस्ताठायीं आपल्यासाठीं काय काय करेल अशी जी त्यानें आम्हांला अभिवचने दिलीं आहेंत त्यांवर आपण अवलंबून राहतो.

तुमच्या जीवनात ह्याचे परिदृश्य कसे दिसते याची तीन उदाहरणें पुढीलप्रमाणें आहेत :

1. जर तुम्हीं तुमच्या अंतःकरणांत त्याग व औदार्याने देण्याचे ठरविता, तर चांगुलपणाचा हा मनोदय पूर्ण करण्यासाठीं तुम्हांला देवाचे सामर्थ्य प्राप्त होईल कारण या संदर्भांत त्यानें भावी कृपा पुरविण्याची जी जी अभिवचनें दिलींत त्यांवर तुम्हीं विश्वास ठेवता, ती अभिवचनें अशी : “माझा देव आपल्या संपत्त्यनुरूप तुमची सर्व गरज ख्रिस्त येशूच्या ठायीं गौरवाच्या द्वारे पुरवील” (फिलिप्पै 4:19); आणि “जो उदार हाताने पेरील तो त्याच प्रमाणात कापणी करील” (2 करिंथकर 9:6); त्याचप्रमाणें, “तुमच्याजवळ सर्व गोष्टींत सदा, सर्व पुरवठा रहावा आणि प्रत्येक चांगल्या कामात तुम्हीं संपन्न व्हावे म्हणून देव तुम्हास सर्व प्रकारची कृपा पुरवण्यास समर्थ आहे ” (2 करिंथ 9:8).

2. जर तुम्हीं तुमच्या अंतःकरणांत पोर्नोग्राफीचा त्याग करण्याचे ठरविता, तर चांगुलपणाचा हा मनोदय पूर्ण करण्यासाठीं तुम्हांला देवाचे सामर्थ्य प्राप्त होईल कारण या संदर्भांत त्यानें भावी कृपा पुरविण्याची जी जी अभिवचनें दिलींत त्यांवर तुम्हीं विश्वास ठेवता, ती अभिवचनें अशी : “जे अंतःकरणाचे शुद्ध ते धन्य, कारण ते देवाला पाहतील” (मत्तय 5:8); आणि “तुझे संपूर्ण शरीर नरकात टाकले जावे यापेक्षा तुझ्या एका अवयवाचा नाश व्हावा हे तुझ्या हिताचे आहे” (मत्तय 5:29). हे किती बरे. अद्भुत कार्य. पूर्णपणें समाधान देणारे सामर्थ्याचे काम.

3. आणि जर तुम्हीं तुमच्या अंतःकरणांत असे ठरविता कीं जेव्हां जेव्हां संधी येईल, तुम्हीं ख्रिस्ताच्या साक्षीसाठीं आपलें तोंड उघडाल, तर चांगुलपणाचा हा मनोदय पूर्ण करण्यासाठीं तुम्हांला देवाचे सामर्थ्य प्राप्त होईल कारण या संदर्भांत त्यानें जी भावी कृपा पुरविण्याचे अभिवचन दिलें त्यावर तुम्हीं विश्वास ठेवता, ते अभिवचन असे, “जेव्हा तुम्हास अटक करतील तेव्हा काय बोलावे किंवा कसे बोलावे याविषयी काळजी करू नका. तेव्हा तुम्हीं काय बोलायचे ते तुम्हांला सांगितले जाईल” (मत्तय 10:19).

देवानें त्याच्या मौल्यवान अभिवचनांवर आपला दैनंदिन विश्वास वाढवावा – म्हणजें भावी कृपेविषयी असलेल्या त्याच्या अक्षय, रक्ताने विकत घेतलेल्या, व ख्रिस्ताला उंचविणाऱ्या अभिवचनांवर असलेला विश्वास.

12 अगस्त : जिस प्रकार तुम सदा से आज्ञा मानते आए हो

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12 अगस्त : जिस प्रकार तुम सदा से आज्ञा मानते आए हो
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“वैसे ही अब भी न केवल मेरे साथ रहते हुए पर विशेष करके अब मेरे दूर रहने पर भी डरते और काँपते हुए अपने-अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाओ; क्योंकि परमेश्‍वर ही है जिसने अपनी सुइच्छा निमित्त तुम्हारे मन में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डाला है।” फिलिप्पियों 2:12-13

हर विद्यालय का शिक्षक यह चाहेगा कि उसके पास अपनी कक्षा पर ऐसा अधिकार हो कि विद्यार्थी न केवल शिक्षक की उपस्थिति में, बल्कि उसके कक्षा से बाहर चले जाने और कुछ समय तक अनुपस्थित रहने पर भी सुशील बने रहें। बहुत कम शिक्षक इसे सिद्ध कर पाए हैं! परन्तु यह इच्छा समझ में आने योग्य है।

यह इच्छा उस बात के समान है जिसे प्रेरित पौलुस ने फिलिप्पी की कलीसिया को लिखते समय प्रकट किया, जब उसने उन्हें आज्ञा दी कि वे “न केवल मेरे साथ रहते हुए पर विशेष करके अब मेरे दूर रहने पर भी” आज्ञाकारिता में चलें। पौलुस की चिन्ता केवल यह नहीं थी कि ये विश्वासी उसकी बात सुनें, बल्कि यह भी थी कि उनका “चाल–चलन मसीह के सुसमाचार के योग्य हो” (फिलिप्पियों 1:27)। पौलुस के लिए सुसमाचार के योग्य जीवन वह था जो मसीह के प्रति आज्ञाकारिता से चिह्नित हो। इसी प्रकार विश्वासियों को “डरते और काँपते हुए अपने-अपने उद्धार का कार्य पूरा करते” जाना था।

पौलुस की चिन्ता का बल तब स्पष्ट होता है, जब हम फिलिप्पियों 2:12 से पहले के पदों पर विचार करते हैं। वह अभी-अभी परमेश्वर के पुत्र की दीनता और महिमा का वर्णन कर चुका है, जिसने दास का रूप धारण किया और मनुष्य की देह को ग्रहण किया। जब उसने ऐसा किया, तो यीशु ने “आप को दीन किया, और यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हाँ, क्रूस की मृत्यु भी सह ली” (पद 8)। हमारे उद्धारकर्ता को एक कार्य पूरा करना था: पापियों का उद्धार। उसने उस कार्य के प्रति पूर्ण आज्ञाकारिता दिखाई, यहाँ तक कि मृत्यु तक। इसलिए, यीशु की अद्‌भुत आज्ञाकारिता दिखाने के बाद, पौलुस अपने पाठकों से कहता है कि वे भी अपनी आज्ञाकारिता में बने रहें।

वह कहता है कि वे ऐसा “डरते और काँपते हुए” करें—अर्थात उस परमेश्वर की महिमा को समझते हुए जिसने उन्हें जीत लिया है और जो अब उनके भीतर कार्य करता है। आज्ञाकारिता, भय और काँपने की धारणाएँ मानवता को प्रिय नहीं हैं, परन्तु जो लोग मसीह के साथ पहचाने जाना चाहते हैं, उन्हें अपने-अपने क्रूस उठाकर दीनता और आज्ञाकारिता के मार्ग पर उसके पीछे चलने के लिए बुलाया गया है। यह मसीही जीवन में कोई वैकल्पिक अतिरिक्त बात नहीं है; यह उसका अभिन्न अंग है। जो अपने आप को मसीही कहता है, उसके लिए लगातार और आदतन अवज्ञा में जीवन बिताना न केवल अपरिपक्वता का चिह्न है, बल्कि एक पूर्ण निरर्थकता है। जो हमारे आज्ञाकारी उद्धारकर्ता के लोग हैं, वे आज्ञाकारिता के विषय को हल्के में कैसे ले सकते हैं?

हमें प्रतिदिन अपने आप को स्मरण कराना चाहिए कि हम सदा दृष्टिगोचर हैं। कोई भी ऐसा क्षण नहीं है जब कोई शब्द, कोई कार्य, कोई विचार, या कोई उद्देश्य परमेश्वर से छिपा हो। सभी अपेक्षाओं से परे, इस तथ्य के बावजूद कि परमेश्वर हमें पूर्ण रूप से जानता और देखता है, हम उसके प्रेम के पात्र बने रहते हैं—परन्तु यह इस वास्तविकता को कम नहीं करता कि वह हमें हमसे भी अधिक और बेहतर जानता है। इसलिए, उस भय और काँपने के साथ जो इस सत्य से उत्पन्न होना चाहिए, हमें आज्ञाकारिता को गम्भीरता से लेना है।

आपके विचारों, आपके शब्दों, या आपके कार्यों के किस भाग (या किन भागों) के विषय में पवित्र आत्मा आपसे कह रहा है कि आपको परिवर्तन करने और आज्ञा मानने की आवश्यकता है? यह न भूलें कि आपको किसने बचाया और जीत लिया, और वह कौन है जो आपको देखता है और आपके भीतर कार्य करता है।

मरकुस 9:2-7
पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 84–86; 1 पतरस 2 ◊

12 August : माझा जीव देवासाठींतान्हेला झाला आहे

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12 August : माझा जीव देवासाठींतान्हेला झाला आहे
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हरिणी जशी पाण्याच्या प्रवाहांसाठीं लुलपते तसा हे देवा, माझा जीव तुझ्यासाठीं लुलपत आहे. माझा जीव देवासाठीं, जिवंत देवासाठीं तान्हेला झाला आहे; मी केव्हा देवासमोर येऊन त्याचे दर्शन घेईन? (स्तोत्र 42:1-2)

जी गोष्ट आपल्यासाठीं हा शास्त्रपाठ इतका प्रिय आणि इतका महत्त्वाचा बनवते ती ही कीं स्तोत्रकर्त्याचा जीव येथें मुख्यतः त्याच्या जीवावर उठून आलेंल्या संकटमय परिस्थितीतून मुक्त होण्यासाठीं तान्हेला झालेंला नाहीं. आपल्याला आपल्या शत्रूंपासून सुटका मिळावी किंवा त्यांचा नाश व्हावा यासाठीं त्याचा जीव प्रामुख्याने तान्हेला झालेंला नाहीं.

सुटकेसाठीं व्याकूळ होणें, आणि त्यासाठीं प्रार्थना करणें चुकींचे नाहीं. अनेक प्रसंगी शत्रूंच्या पराभवासाठीं प्रार्थना करणें योग्यच आहे. पण त्याहीपेक्षा महत्त्वाचा व्यक्ती जर कोणी असेल, ज्याच्यासाठीं आपला जीव तान्हेला व्हावयाला पाहिजे,  तर तो देव स्वतः आहे.

आपण स्तोत्रांवर मनन करतांना जेव्हां देवाविषयी विचार करतो आणि त्याला अनुभवतो, तेव्हा त्याचा मुख्य परिणाम पुढीलप्रमाणें होतो : आपण देवावर प्रीति करू लागतो, आणि देवाच्या दर्शनासाठीं व्याकूळ होऊन जातो, व देवासोबत राहण्याची उत्कंठा बाळगू लागतो, आणि देवाची प्रशंसा करण्यात आणि त्याच्यांत आनंद करण्यात समाधानी होऊं लागतो.

वचन 2 च्या शेवटचा संभाव्य अनुवाद असा आहे, “मी कधी येऊन साक्षात देवाचे मुख पाहीन?” या प्रश्नाचे अंतिम उत्तर योहान 14:9 आणि 2 करिंथ 4:4 मध्यें दिलेंलें आहे. तिथें येशूनें म्हटलें, “ज्याने मला पाहिले आहे त्यानें पित्याला पाहिले आहे.” तसेच पौल सुद्धा म्हणतो कीं आपण ख्रिस्तामध्यें रूपांतरित होऊं तेव्हा आपण “ख्रिस्त….त्याच्या गौरवी सुवार्तेचा प्रकाश” ह्याला पाहूं.

आपण ख्रिस्ताचे मुख पाहतो तेव्हा आपण देवाचे मुख पाहतो. आणि पौल 2 करिंथ 4: 4 आणि 6 मध्यें म्हणतो त्याप्रमाणें जेव्हा आपण ख्रिस्ताचे मरण व पुनरुत्थान याविषयीची सुवार्ता ऐकतो, तेव्हां आपण ख्रिस्ताच्या मुखावरील गौरव पाहतो. तो ह्या गोष्टीला “ख्रिस्ताच्या गौरवाची सुवार्ता, जो देवाची प्रतिमा आहे” असे म्हणतो. किंवा जसे तो पुढे वचन 6 मध्यें म्हणतो : “येशू ख्रिस्ताच्या मुखावरील देवाच्या गौरवाच्या ज्ञानाचा प्रकाश.”

देव करो, तुम्हींहि देवाचे मुख पाहण्यासाठीं भुकेलें आणि तान्हेले व्हावे व ती भूक व तहान अधिकाधिक वाढत जावी. आणि आजच देवाची प्रतिमा असलेल्या ख्रिस्ताच्या गौरवाच्या सुवार्तेद्वारे तो तुमची ही व्याकुळता (लुलपतपणा) तृप्त करो.