20 अगस्त : दोषी विवेक के साथ क्या किया जाए

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20 अगस्त : दोषी विवेक के साथ क्या किया जाए
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“तब दाऊद ने उठकर शाऊल के बागे की छोर को छिपकर काट लिया। इसके बाद दाऊद शाऊल के बागे की छोर काटने से पछताया। वह अपने जनों से कहने लगा, ‘यहोवा न करे कि मैं अपने प्रभु से जो यहोवा का अभिषिक्त है, ऐसा काम करूँ’ . . . जब दाऊद शाऊल से ये बातें कह चुका, तब शाऊल ने कहा, ‘हे मेरे बेटे दाऊद, क्या यह तेरा बोल है?’ तब शाऊल चिल्लाकर रोने लगा। फिर उसने दाऊद से कहा, ‘तू मुझसे अधिक धर्मी है; तू ने तो मेरे साथ भलाई की है, परन्तु मैं ने तेरे साथ बुराई की।’” 1 शमूएल 24:4-6, 16-17

इन पदों में आंशिक रूप से कही गई इस कहानी को एक दृष्टि से विवेक के सन्दर्भ में देखा जा सकता है—दाऊद में पाया जाने वाला कोमल और संवेदनशील विवेक, और शाऊल में पाया जाने वाला कठोर और जल चुका विवेक।

दाऊद जानता था कि यद्यपि परमेश्वर का आत्मा शाऊल से हट गया था, फिर भी शाऊल यहोवा का अभिषिक्त राजा था, और यहोवा के अभिषिक्त को न तो शाप देना चाहिए और न ही मारना चाहिए (निर्गमन 22:28)। क्योंकि उसका विवेक परमेश्वर और उसकी व्यवस्था के प्रति संवेदनशील था, इसलिए शाऊल के बागे को काटने के कारण वह तुरन्त बोझ से दब गया—यद्यपि वह इससे कहीं अधिक बुरा कर सकता था। इसलिए दाऊद ने अपने लोगों के सामने अपने पाप से मन फिराया और उन्हें शाऊल पर आक्रमण करने से रोक दिया (1 शमूएल 24:6-7)।

जब दाऊद ने शाऊल से खुले रूप से अपने रोके हुए प्रतिशोध के विषय में बातें कीं (1 शमूएल 24:8-15), तो उसकी कृपा के कारण शाऊल रो पड़ा। परन्तु शाऊल ने पुनर्मेल के इस अवसर को नहीं अपनाया। उस क्षण उसके आँसू चाहे जितने भी सच्चे रहे हों, उसका प्रत्युत्तर अन्ततः सतही और अल्पकालिक था, जो एक कठोर और अन्धकारमय हृदय का परिणाम था। हम यह इसलिए जानते हैं, क्योंकि इस घटना के बाद भी वह दाऊद का पीछा करता रहा।

बाइबल कहती है कि विवेक हमारी मानवता की एक आधारभूत इकाई है। परमेश्वर की व्यवस्था मनुष्य के हृदय में लिखी हुई है, चाहे हमने उसकी आज्ञाओं को सुना हो या नहीं (रोमियों 2:14-15)। जब हम परमेश्वर की व्यवस्था की अनदेखी करके अपनी ही राह पर चलते हैं, तो हमें दोष और लज्जा का अनुभव होता है। उस क्षण हमारे सामने एक चुनाव होता है: क्या हम क्षमा और पुनर्मेल की खोज करेंगे? या हम अपनी स्वार्थी अभिलाषाओं के पीछे चलते हुए अपने विवेक को और कठोर होने देंगे?

दोषी विवेक एक भारी बोझ है, परन्तु वह एक वरदान भी हो सकता है। वाल्टर जे. चैण्ट्री लिखते हैं, “विवेक एक मित्र है जो आपको भंग हुई व्यवस्था और उसके श्राप से छुड़ाने वाले एकमात्र उद्धारकर्ता की बाँहों में शीघ्रता से पहुँचा देता है।”[1] यदि आप दोषी विवेक का बोझ अनुभव कर रहे हैं, तो क्षणिक दुख को सच्चे मन फिराव के साथ भ्रमित न करें। अपने पाप से मन फिराते हुए परमेश्वर की ओर मुड़ें, और उसके सामर्थ्य में होकर परिवर्तन करने का निश्चय करें। क्षमा पाने का मार्ग यही है। क्योंकि यदि दोषी विवेक वह वरदान है जो आपको परमेश्वर की ओर ले जाता है, तो शुद्ध किया हुआ विवेक वह वरदान है जो आपको उससे मिलेगा।

  भजन 25

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 105–106; गलातियों 5 ◊


[1] वाल्टर जे. चैण्ट्री, डेविड: मैन ऑफ़ प्रेयर, मैन ऑफ़ वॉर (बैनर ऑफ़ ट्रुथ, 2007), पृ. 92.

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