17 अगस्त : खुशी कहाँ खोजी जाए

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17 अगस्त : खुशी कहाँ खोजी जाए
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“क्या ही धन्य है वह पुरुष जो दुष्‍टों की युक्ति पर नहीं चलता, और न पापियों के मार्ग में खड़ा होता; और न ठट्ठा करने वालों की मण्डली में बैठता है! परन्तु वह तो यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता; और उसकी व्यवस्था पर रात दिन ध्यान करता रहता है।” भजन संहिता 1:1-2

हम यह अपेक्षा कर सकते हैं कि अब तक स्त्री-पुरुषों ने खुशी की कला में निपुणता प्राप्त कर ली होगी। अब तक यह विषय पुराना हो जाना चाहिए था, क्योंकि हर किसी को यह जान लेना चाहिए था कि खुशी क्या है और उसे कैसे पाया जाए। परन्तु वास्तव में प्रमाण इसके विपरीत संकेत करते हैं। केवल समाचारों पर थोड़ी दृष्टि डालना ही यह समझने के लिए पर्याप्त है कि सच्ची खुशी दुर्लभ है।


बाइबल हमारी सच्ची खुशी की चिन्ता करती है। भजन 1 का आरम्भ करने वाला शब्द, जिसका अनुवाद “धन्य” किया गया है, उसका अनुवाद “खुश” भी किया जा सकता है। इसी प्रकार, यीशु के पहाड़ी उपदेश में उसके मुख से निकला पहला शब्द भी खुशी से सम्बन्धित था: उसने मूलतः कहा, खुश हैं वे जो दीन हैं, जो दयावन्त हैं, और जो मेल कराने वाले हैं (मत्ती 5:3-11)।


भजन 1 के आरम्भिक पदों के अनुसार, हमारी खुशी का एक पक्ष सीधे इस बात से जुड़ा है कि हम कैसे सोचते हैं और कैसे देखते हैं। वास्तविकता के विषय में हमारा विचार हमारे जीवन को, भले या बुरे के लिए, आकार देता है। इसलिए यदि हम परमेश्वर की मुस्कान के अधीन जीवन बिताना चाहते हैं और उस धन्य खुशी का अनुभव करना चाहते हैं जो केवल वही दे सकता है, तो हमें इस संसार के अधर्मी विचारों को नहीं अपनाना चाहिए। “दुष्टों की युक्ति” से अभिप्राय अधर्मियों के उद्देश्यों से है—उनकी उक्तियों, सिद्धान्तों, और उनसे उत्पन्न आचरण की रीति से। ऐसी सांसारिक बुद्धि खुशी और आशीष का वादा तो करती है, परन्तु वास्तव में हमें मेघधनुष के छोर पर रखे सोने के घड़े के पीछे दौड़ाती रहती है; हम सदा खोजते रहते हैं, परन्तु हमारे हाथ खाली ही रहते हैं। खुशी इस बात में है कि हम उस पवन के पीछे दौड़ने से इनकार कर दें, चाहे संसार हमें ऐसा करने के लिए बुलाता रहे।


फिर भी स्थाई खुशी का मार्ग केवल छलपूर्ण युक्ति को ठुकराने तक सीमित नहीं है; इसमें सत्य की सुन्दरता को अपनाना भी सम्मिलित है। खुश मनुष्य “यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता।” परमेश्वर के वचन को पढ़ना और उस पर मनन करना हमारे सामने किसी कर्तव्य या बोझ के रूप में नहीं, बल्कि आनन्द और हर्ष के रूप में प्रस्तुत किया गया है। क्यों? क्योंकि वह हमें उसके लेखक—हमारे सृष्टिकर्ता, पालनहार, और उद्धारकर्ता—के साथ और गहरी संगति में ले जाता है। इसलिए संसार जो भी क्षणिक सुख आपके सामने रखे, उनके स्थान पर केवल परमेश्वर के वचन से चिपके रहें, क्योंकि वही आपके प्राण को बहाल कर सकता है (भजन 19:7)। इसके सिवाय कुछ भी आपके जीवन में सच्चा, निष्कपट, और स्थाई आनन्द नहीं ला सकता।


मत्ती 5:3-11
◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 97–99; गलातियों 2

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