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26 अगस्त : भ्रम का सूक्ष्म प्रभाव

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26 अगस्त : भ्रम का सूक्ष्म प्रभाव
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“क्योंकि बहुत से लोग निरंकुश, बकवादी और धोखा देने वाले हैं; विशेष करके खतना वालों में से। इनका मुँह बन्द करना चाहिए। ये लोग नीच कमाई के लिए अनुचित बातें सिखाकर घर के घर बिगाड़ देते हैं।” तीतुस 1:10-11

व्यर्थ की बातें करने वालों के खतरे से सावधान रहें।

क्रेते की कलीसिया विश्वास-समुदाय के भीतर के ही कुछ ऐसे लोगों से संकट में थी, जो विद्रोह से चिह्नित थे। वे उन लोगों के समान थे जो सेना में भर्ती तो हो जाते हैं, ड्यूटी के लिए रिपोर्ट करते हैं और वर्दी पहन लेते हैं, परन्तु जैसे ही युद्ध आरम्भ होता है, वे अपने अधिकारी की आज्ञा मानने से इनकार कर देते हैं।

ऐसे निरंकुश लोगों को पौलुस “बकवादी” कहता है। वे किसी विषय में बात नहीं करते, परन्तु उसे इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं मानो वही सबसे महत्त्वपूर्ण बात है जिसे आपने अपने जीवन में कभी सुना है। वे पवित्रशास्त्र की मुख्य और स्पष्ट बातों से हटकर सबको हाशिए की बातों पर, अपनी विशेषताओं पर ध्यान लगाने के लिए प्रेरित करना चाहते हैं। और चौंकाने वाली बात यह है कि यद्यपि वे “धोखा देने वाले” हैं, फिर भी वे लोगों को अपने पीछे खींचने में सक्षम हो जाते हैं।

कुछ लोग इस प्रकार की निरर्थकता के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं। जब तक बाजार में किसी वस्तु की माँग न हो, तब तक वह वस्तु बिक नहीं सकती। यदि कोई मण्डली सत्य में अच्छी तरह शिक्षित नहीं है, और यदि उसके पास तीतुस 1:5-9 में वर्णित प्रकार के प्राचीन नहीं हैं जो झुण्ड की रक्षा करें, तो उसमें ऐसे व्यक्तियों के उठ खड़े होने का खतरा पैदा हो जाएगा जो विश्वासियों के बीच से उठकर विश्वासयोग्य लोगों को भटकाने का प्रयास करते हैं।

जरूरी नहीं है कि सबसे बड़ा खतरा आवश्यक विश्वास-समुदाय के बाहर से होने वाला खुला आक्रमण हो। अधिकतर यह भीतर से, धीरे-धीरे और सूक्ष्म रूप से आता है। इस प्रकार से धोखा देने वाले लोगों को सरलता से पहचानना सदा आसान नहीं होता। वे यह नहीं कहेंगे, “मेरे पीछे आओ, मैं सत्य से दूर जा रहा हूँ।” बल्कि वे कहते हैं, “मेरे पीछे आओ, क्योंकि मैं उन मुख्य शिक्षाओं को जानता हूँ जिन पर आपको विश्वास करना चाहिए। आपको यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आप ये काम करें और वे काम न करें।”

सुसमाचार यह अद्‌भुत गाथा है कि यीशु और उसके क्रूस के कार्य के द्वारा परमेश्वर अपनी सन्तान के जीवनों को पूरी तरह बदल देता है। हमारे हृदयों में इस परिवर्तन के साथ-साथ, वह हमें अपने वचन का अटल सत्य भी देता है—और वह सत्य कलीसिया और उसके प्राचीनों के लिए हमारी प्रार्थनाओं के योग्य है। वह हमारी पूरी शक्ति से रक्षा किए जाने के योग्य है। इसलिए पौलुस के शब्द हमें धोखा देने वाले बकवादियों से सावधान रहने और अपने ही हृदय की जाँच में सतर्क रहने की याद दिलाएँ। उन लोगों की सुनें जिनके शब्द अनुग्रह और सत्य से परिपूर्ण हैं, और यह भी सुनिश्चित करें कि आपके अपने शब्द सच्चे मसीही जीवन की इन दोनों पहचानों से भरे हों।

  तीतुस 1:5-16

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 119:89-176; 2 कुरिन्थियों 5 ◊

26 August : छाया आणि झरे

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26 August : छाया आणि झरे
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परमेश्वराचे वैभव चिरकाल राहो! परमेश्वराला आपल्या कृतींपासून आनंद होवो! तो पृथ्वीकडें पाहतो तेव्हा ती कापते; तो पर्वतांना स्पर्श करतो तेव्हा ते धुमसतांत. माझ्या जिवात जीव आहे तोपर्यंत मी परमेश्वराचे गुणगान गाईन; मी जिवंत आहे तोपर्यंत माझ्या देवाचे स्तोत्र गाईन. मी केलेंले त्याचे मनन त्याला गोड वाटो; परमेश्वराच्या ठायीं मला हर्ष होईल.. (स्तोत्र 104:31-34)

परमेश्वराला आपल्या कृतींपासून आनंद होतो कारण त्यां कृती आपल्याला त्यांच्या पलीकडें म्हणजें प्रत्यक्ष देवाकडें पाहण्याचा संकेत देतांत.

देवाची इच्छा ही आहे कीं आपण या सृष्टीत दिसून येणारी त्याची हस्तकृती पाहून थक्क व भयभीत व्हावें. पण आपण त्यां कृतींचे कौतुक करावें म्हणून नाहीं. त्याची इच्छा अशी आहे कीं आपण त्याच्या सृष्टीकडें पाहून असे म्हणावें : जर त्याचे फक्त अंगुलीकार्य (स्तोत्र 8:3) इतके शहाणपण आणि सामर्थ्य आणि भव्यता आणि वैभव आणि सौंदर्य यांनी परिपूर्ण आहे, तर हा परमेश्वर स्वतः कसा असावा!

ही अंगुलीकार्ये फक्त त्याच्या वैभवाची केवळ मागची बाजू आहेत, कीं जणू आपण ती काचातून खोल अंधकारांत पाहत आहों. मग या सर्वांचा जो निर्माणकर्ता, प्रत्यक्षात त्याचा महिमा पाहणें म्हणजें काय असेल! फक्त त्याच्या हस्तकृतीच नाहीं! अब्ज आकाशगंगा देखील मनुष्याच्या जिवाला संतुष्ट करू शकणार नाहींत. परमेश्वर आणि केवळ परमेश्वर हाच आमच्या आत्म्याची तहान तृप्त करू शकतो.

जोनाथन एडवर्ड्स यांनी ही गोष्ट पुढीलप्रमाणें अभिव्यक्त केलीं :

परमेश्वरापासून आनंद हे ते एकमेव सुख आहे जे आपल्या आत्म्यांची तहान तृप्त करू शकते. स्वर्गात जावून देवाचा पूर्ण आनंद घेणें हे येथें असलेल्यां सर्व-सुखांच्या निवासस्थानांपेक्षा अमर्यादपणें श्रेष्ठ आहे. . . . [ह्यां] फक्त छाया मात्र आहेत. पण देव हा वास्तविक रूप आहे. ह्यां गोष्टी केवळ विखुरलेला प्रकाश आहे; पण देव हा सूर्य आहे. हे फक्त झरे आहेत; पण देव हा महासागर आहे.

म्हणूनच स्तोत्र 104 ची शेवटची 31-34 ही वचनें प्रत्यक्षांत देवावर लक्ष केंद्रित करून या स्तोत्राचा समारोप करतांत. “माझ्या जिवात जीव आहे तोपर्यंत मी परमेश्वराचे गुणगान गाईन. . . परमेश्वराच्या ठायीं मला हर्ष होईल.” शेवटी ज्यां गोष्टीं आपली अंतःकरणें आश्चर्याने भरून टाकतील आणि आपल्या मुखांत सार्वकालिक स्तुती भरतील त्यां गोष्टीं हा समुद्र किंवा हे पर्वत किंवा दऱ्याखोरी किंवा पाण्याचे झरे किंवा ढग किंवा मोठमोठ्या आकाशगंगा नसतील, तर तो स्वतः देव असेल जो सर्वांमध्यें सर्वकाहीं पूर्ण करतो.

25 अगस्त : जब आपके विचार अन्धकारमय हो जाएँ, तब क्या करें

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25 अगस्त : जब आपके विचार अन्धकारमय हो जाएँ, तब क्या करें
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“तब दाऊद सोचने लगा, ‘अब मैं किसी न किसी दिन शाऊल के हाथ से नष्ट हो जाऊँगा; अब मेरे लिए उत्तम यह है कि मैं पलिश्तियों के देश में भाग जाऊँ; तब शाऊल मेरे विषय निराश होगा, और मुझे इस्राएल के देश के किसी भाग में फिर न ढूँढ़ेगा, यों मैं उसके हाथ से बच निकलूँगा।’” 1 शमूएल 27:1

कभी-कभी हमारे विचार ही हमारे सबसे बड़े शत्रु बन जाते हैं।

दाऊद के हालात चाहे जितने भी कठिन रहे हों, वह अपना भरोसा सदा परमेश्वर पर रखता आया था। वास्तव में, राजा शाऊल और दाऊद के बीच हुई अन्तिम बातचीत में दाऊद ने शाऊल से कहा कि यद्यपि वह नहीं जानता कि आगे क्या होगा, फिर भी वह यह जानता है कि परमेश्वर उसे उसकी कठिनाइयों से छुड़ाएगा (1 शमूएल 26:23-24)। दाऊद के पास इस विश्वास के लिए ठोस कारण थे: उसके जीवन में छुटकारा एक निरन्तर विषय रहा था। चाहे वह सिंह से हो, भालू से, या पलिश्ती दानव से (1 शमूएल 17:37), या बाद में शाऊल की प्राणघातक खोज से, दाऊद परमेश्वर की उद्धारक सहायता का साक्ष्य देने में तत्पर रहता था।

इसलिए यह आश्चर्य की बात है कि परमेश्वर के छुड़ाने वाले हाथ के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रकट करने के तुरन्त बाद, दाऊद ने अपने मन में यह स्वीकार कर लिया कि शाऊल अन्ततः उसे मार डालेगा। परमेश्वर की भलाई और विश्वासयोग्यता पर मनन करने के बजाय, उसने अपने विचारों को अन्धकारमय स्थानों की ओर जाने दिया। उसका विश्वास निराशा में बदल गया और उसकी आस्था भय में, और इसलिए वह शत्रु की संगति में सुरक्षा खोजने चला गया (1 शमूएल 27:2)—एक ऐसा निर्णय जो उसे छल और कठिनाइयों की उलझन में ले गया (पद 8-11)।

हमारे विचार वास्तव में बहुत महत्त्व रखते हैं; वे हमारे कार्यों को जन्म देते हैं। एक पुरानी कहावत हमें इस सिद्धान्त की याद दिलाती है: एक विचार बोओ, एक कार्य काटोगे। एक कार्य बोओ, एक आदत काटोगे। एक आदत बोओ, एक चरित्र काटोगे। एक चरित्र बोओ, एक भाग्य काटोगे।

आप अपने जीवन के उन अध्यायों की ओर पीछे मुड़कर देख सकते हैं जब, दाऊद की तरह, आपने अपने आप से निरर्थक बातें करनी आरम्भ कीं, मूर्खतापूर्ण निर्णय लिए, और अपने आप को फँसा हुआ पाया। हो सकता है आप अभी उसी स्थान पर हैं, अपने विचारों को फिसलन भरी ढलान पर रोकने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जो आपको ऐसे मार्ग पर ले जा रहे हैं जिसे आप भीतर ही भीतर जानते हैं कि वह अविवेकपूर्ण या गलत है। दाऊद को केवल अपने जीवन पर आए खतरों से ही उद्धार की आवश्यकता नहीं थी; उसे स्वयं से भी बचाए जाने की आवश्यकता थी—और आपको और मुझे भी है। परन्तु शुभ समाचार यह है कि हमारे लिए परमेश्वर की भलाई और दया कभी समाप्त नहीं हो सकती, चाहे हमारे विचार गलत दिशा में चले गए हों और चाहे हमारे कार्य हमें मार्ग से भटका ले गए हों। जैसे परमेश्वर ने दाऊद को छुड़ाया, वैसे ही उसने मसीह के क्रूस के द्वारा हमें छुड़ाया है। इसलिए जब आपके विचार अन्धकार की ओर मुड़ने लगें, तब परमेश्वर की भलाई, उसके उद्धार, और उसकी विश्वासयोग्यता को स्मरण करें, और उन्हें अपने हृदय की प्रतिक्रिया को आकार देने दें, और उन कठिनाइयों के बीच चलते समय अपने मार्ग को भी दिशा देने दें जिनका आप सामना कर रहे हैं।

  गलातियों 6:7-10

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 119:1- 88; 2 कुरिन्थियों 4

25 August : जेव्हा देवाची प्रीति सर्वात गोड असते

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25 August : जेव्हा देवाची प्रीति सर्वात गोड असते
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पतींनो, जशी ख्रिस्तानें मंडळीवर प्रीति केलीं तशी तुम्हींही आपापल्या पत्नीवर प्रीति करा; ख्रिस्तानें मंडळीवर प्रीति केलीं आणि स्वतःस तिच्यासाठीं समर्पण केलें, अशासाठीं कीं, तिला त्यानें वचनाद्वारे जलस्नानाने स्वच्छ करून पवित्र करावे. (इफिस 5:25-26)

देवानें तुमच्यावर कोणतीही अट न ठेवता प्रीति करावीं अशी जर तुम्हीं केवळ त्याच्याकडून अपेक्षा करत असाल, तर तुमची आशा मोठी तर आहे, पण खूप संकुचित मनाची.

देवाची अट-विरहित प्रीति त्याच्या प्रीतिचा एकमात्र गोड अनुभव नाहीं. सर्वात गोड अनुभव तो असतो जेव्हा त्याची प्रीति असे म्हणते, “मी तुला माझ्या पुत्राच्या प्रतिमेसारखे अशा रीतीने बनवले आहे कीं तुला पाहून व तुझ्या सहभागीतेत राहून मला आनंद होतो. तुझ्याठाई माझा आनंद आहे, कारण तू माझ्या गौरवाने इतका तेजस्वी झाला आहेस.”

हा अति गोड अनुभव आमच्यात परिवर्तन घडवून आणून आम्हांला असे लोक बनविण्याच्या दृष्टिने सशर्त आहे ज्यांच्या भावना आणि निवडी आणि कृती ह्या देवाला आनंद देतांत.

अटीविरहित प्रीति ही मनुष्यांत परिवर्तन घडवून आणणारा तो उगम आणि तो पाया आहे ज्यामुळें सशर्त प्रीतिचा गोडवा शक्य होतो. जर देवानें आपल्यावर अटीविरहित प्रीति केलीं नसती, तर त्यानें आपल्या कुरूप जीवनात प्रवेश केला नसता, आपल्याला विश्वासात आणले नसते, आपल्याला ख्रिस्ताशी जोडले नसते, आपल्याला त्याचा आत्मा देऊ केला नसता आणि आपल्याला अंशा-अंशाने येशूसारखे घडवले नसते.

पण जेव्हा देव कोणतीही अट न ठेवता आपली निवड करतो, आणि ख्रिस्तानें आपल्यासाठीं मरण सोसावे म्हणून त्याला पाठवतो, आणि आपल्याला नव्याने जन्म देतो, तेव्हा तो परिवर्तनाची एक न थांबणारी प्रक्रिया सुरु करतो जी आपल्याला अंशा-अंशाने तेजस्वी बनवत जाते. त्याला ज्या स्वरूपाचा मनुष्य आवडतो त्याशी आपल्याला समरूप करण्यासाठीं तो आपल्याला एक तेज देतो : त्याचे स्वतःचे तेज.

हे आपण इफिसकर 5:25-27 मध्यें पाहतो. “ख्रिस्तानें मंडळीवर प्रीति केलीं आणि स्वतःस तिच्यासाठीं समर्पण केलें (अटी-विरहित प्रीति), अशासाठीं कीं, तिला त्यानें…पवित्र करावे. . . आणि गौरवयुक्त मंडळी अशी ती स्वतःला सादर करावी” – म्हणजें ते स्वरूप ज्यांत त्याला आनंद होतो.

आपण अविश्वासात असलेलें पापी असताना देखील देवानें आपल्यावर त्याची अटी-विरहित कृपा केलीं हे ‘अद्भुत’ अवर्णनीय आहे. हे अद्भुत आहे याचे प्रमुख कारण म्हणजें हे कीं ही अटी-विरहित प्रीति आपल्याला त्याच्या गौरवशाली उपस्थितीच्या सार्वकालिक आनंदात घेऊन येते.

पण त्या आनंदाचा शिखर म्हणजें आपण केवळ त्याचे वैभव पाहतच नाहीं तर आपण त्या वैभवाला प्रतिबिंबित सुद्धा करतो. “प्रभू येशू ह्याच्या नावाला तुमच्या ठायीं व तुम्हांला त्याच्या ठायीं गौरव मिळावा” (2 थेस्सलनीकाकर 1:12).

24 अगस्त : आप किस बात की प्रतीक्षा कर रहे हैं?

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24 अगस्त : आप किस बात की प्रतीक्षा कर रहे हैं?
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“हमारा स्वदेश स्वर्ग पर है; और हम एक उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के वहाँ से आने की बाट जोह रहे हैं। वह अपनी शक्ति के उस प्रभाव के अनुसार जिसके द्वारा वह सब वस्तुओं को अपने वश में कर सकता है, हमारी दीन–हीन देह का रूप बदलकर, अपनी महिमा की देह के अनुकूल बना देगा।” फिलिप्पियों 3:20-21

जीवन प्रतीक्षा से भरा है। चाहे वह सप्ताहान्त की प्रतीक्षा हो, आने वाली छुट्टी की, या किसी बच्चे या पोते के जन्म की, हम सदा किसी न किसी बात की प्रतीक्षा करते रहते हैं। और मसीही जीवन स्वयं भी एक प्रतीक्षा-काल है; पौलुस कहता है कि स्वर्ग के नागरिक होने के कारण हम अब “उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के वहाँ से आने की बाट जोह रहे हैं।”

मसीहियों के लिए, यह प्रतीक्षा हमारे जीवन की परिभाषित विशेषताओं में से एक होनी चाहिए। हमारे अस्तित्व में एक पारलोकिक आयाम है—और वह महत्त्वपूर्ण है। हमें “पृथ्वी की वस्तुओं” (फिलिप्पियों 3:19) में न तो डूब जाना है, न उनके द्वारा नियन्त्रित होना है, न उनसे बँध जाना है, और न ही उन पर जकड़े रहना है, परन्तु हमें “स्वर्गीय वस्तुओं की खोज में” रहना है (कुलुस्सियों 3:1), जब हम उत्सुकता से अपने उद्धारकर्ता और उन सम्पूर्ण आशिषों की प्रतीक्षा करते हैं जिन्हें वह हम पर उण्डेल देगा। हमें प्रतीक्षा करने वाली प्रजा होना है, बस जाने वाली नहीं।

यदि आप कभी किसी प्रिय जन से लम्बे समय के लिए अलग हुए हैं, तो शायद आपने उससे मिलने की तीव्र लालसा की पीड़ा को अनुभव किया होगा। कुछ दिनों या कुछ सप्ताहों तक तो सब ठीक रहता है, परन्तु शीघ्र ही ऐसा लगने लगता है मानो आपका कोई भाग खो गया हो। आप उत्सुकता से पुनर्मिलन की प्रतीक्षा करते हैं—और जब वह दिन निकट आता है, तो आप और प्रतीक्षा सह नहीं पाते!

पौलुस चाहता है कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह की उसी प्रकार की लालसा के साथ प्रतीक्षा करें। हम ऐसा तब करेंगे जब हम यह स्मरण रखेंगे कि “समय कम किया गया है” (1 कुरिन्थियों 7:29) और यह कि “जिस समय हमने विश्‍वास किया था, उस समय के विचार से अब हमारा उद्धार निकट है” (रोमियों 13:11)। हमारी दृष्टि से प्रतीक्षा चाहे जितनी भी लम्बी या छोटी हो, यीशु उचित समय पर लौटेगा—और जब वह आएगा, तो वह हमें अपने समान सदा के लिए रूपान्तरित कर देगा।

वह पुनर्मिलन आपके विचार से भी शीघ्र हो सकता है—और निश्चित ही वह उस अनन्तता की विशालता की तुलना में “शीघ्र” होगा जो हमारी प्रतीक्षा कर रही है! परन्तु अभी के लिए, आपको और मुझे अपने राजा की वापसी की ओर देखते हुए उसकी प्रतीक्षा करनी है। इसलिए, उस दिन तक जब आप अपने उद्धारकर्ता की उपस्थिति में सदा के लिए पहुँचा दिए जाएँगे, इस संसार की पेशकशों पर सन्तुष्ट न हो जाएँ, और “अभी” को “अभी नहीं” से अधिक प्रिय न बना लें। इसके बजाय, भजनकार के साथ मिलकर कहें, “मैं यहोवा की बाट जोहता हूँ, मैं जी से उसकी बाट जोहता हूँ, और मेरी आशा उसके वचन पर है; पहरुए जितना भोर को चाहते हैं, हाँ, पहरुए जितना भोर को चाहते हैं, उससे भी अधिक मैं यहोवा को अपने प्राणों से चाहता हूँ” (भजन 130:5-6)। आज का दिन जैसा भी बीते, उसे आने वाले की प्रतीक्षा का दिन बना दें।

  रोमियों 13:11-14

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 116–118; 2 कुरिन्थियों 3 ◊

24 August : निर्मिलेल्यां पदार्थांचा संदेश

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24 August : निर्मिलेल्यां पदार्थांचा संदेश
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स्वतःला शहाणें म्हणता म्हणता ते मूर्ख बनले; आणि अविनाशी देवाच्या गौरवाची, नाशवंत मनुष्य, पक्षी, चतुष्पाद पशू व सरपटणारे प्राणी ह्यांच्या प्रतिमांच्या रूपांशी त्यांनी अदलाबदल केलीं. (रोमकरांस 1:22-23)

जर एखाद्या मनुष्य त्याच्या वधूपेक्षा त्याच्या लग्नाच्या अंगठीवर जास्त प्रेम करत असेल तर हा एक मोठा मूर्खपणा ठरेल आणि मोठी शोकांतिका किंवा अति दुर्दैवी प्रसंग ठरेल. परंतु हा शास्त्रपाठ नेमके तेच घडल्याचे सांगत आहे.

मनुष्यजातिने देवाऐवजी निर्मिलेल्यां वस्तूंमध्यें दिसून येणारे त्याचे सर्वश्रेष्ठ सनातन सामर्थ्य व देवपण याच्या प्रतीबिम्बावर प्रीति केलीं आणि खरी प्रीति आणि सामर्थ्य आणि गौरव ह्याची जी अतुलनीय व मूळ प्रतिध्वनी आहे ती ऐकण्यापासून बहिरी झाली.

निर्मिलेल्यां पदार्थांचा संदेश असा आहे :

या संपूर्ण चित्तथरारक विश्वाच्या निर्मितीमागे एक असा महान परमेश्वर आहे जो वैभव आणि सामर्थ्य आणि औदार्य ह्यानें परिपूर्ण आहे; तुम्हीं त्याचे आहांत कारण त्यानें तुम्हांला बनवले आहे. बंडखोरीने भरलेले तुमचे जीवन कायम ठेवण्यासाठीं तो तुमच्याविषयी धीर धरतो. त्याच्याकडें फिरा आणि त्याजवर तुमची आशा ठेवा आणि त्यानें निर्मिलेल्यां पदार्थांवरून दिसून येणाऱ्या त्याच्या हस्तकलेवरच केवळ नव्हे तर प्रत्यक्षात त्याजमध्यें आपला आनंद शोधा.

स्तोत्र 19:1-2 सांगते त्याप्रमाणें, दिवस त्या संदेशाचा “संवाद” जे दिवसाचे आहेंत त्यां सर्वांसाठीं करतो, आणि दिवस तो संवाद आंधळे करणारा तेजस्वी सूर्य आणि निळे आकाश व  ढग आणि ज्ञात व अज्ञात असे असंख्य ग्रह आणि रंग आणि सर्व दृश्यमान गोष्टींची सुंदर रचना यांच्या द्वारे करतो. रात्र देखील त्याच संदेशाचे “ज्ञान” जें रात्रीचे आहेंत त्या सर्वांसाठीं ओतते, रात्र हे ज्ञान अथांग खोल शून्यता आणि उन्हाळ्यातील चंद्र आणि असंख्य तारे आणि विलक्षण ध्वनी आणि थंड वारा आणि उत्तरेकडील तारे यांद्वारे प्रकट करते.

दिवस व रात्र या एकाच गोष्टीचा संदेश देत आहेत : परमेश्वर वैभवशाली आहे! परमेश्वर वैभवशाली आहे!! परमेश्वर वैभवशाली आहे! निर्मिलेल्यां पदार्थांमध्यें आपलें परम समाधान शोधण्यापासून आपलें मन फिरवा आणि ह्या वैभवशाली परमेश्वरामध्यें हर्षानंद करा.

23 अगस्त : एक आत्मा में सच्चा सामर्थ्य

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23 अगस्त : एक आत्मा में सच्चा सामर्थ्य
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“न तो बल से, और न शक्ति से, परन्तु मेरे आत्मा के द्वारा होगा, मुझ सेनाओं के यहोवा का यही वचन है।” जकर्याह 4:6

जीवन में किसी न किसी समय, जब हम कठिनाइयों का सामना करते हैं, हम सब यह पूछने के लिए प्रलोभित होते हैं, इस सब का फायदा क्या है? आगे बढ़ते रहने का प्रयत्न क्यों करें? मुझे यह सब कठिनाई या विरोध क्यों सहना पड़ता है? कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ इक्कीसवीं सदी की कलीसियाएँ और मसीही लोग मुख्यतः निराशा के भाव से ही जीते और कार्य करते हैं, न कि उस दिन में आनन्दित होकर जिसे प्रभु ने बनाया है (भजन 118:24)।

कुछ निराशा समझ में आने योग्य है। परन्तु हम निश्चय ही वहाँ सदा नहीं रहना चाहते—और न ही हमें वहाँ रहने की आवश्यकता है। हमारी निराशा हमें कभी बहकावे में न डाल दे कि परमेश्वर अब काम नहीं कर रहा। वास्तविकता यह है कि कभी-कभी परमेश्वर का कार्य सांसारिक दृष्टिकोण से उतना प्रभावशाली नहीं दिखता जितना हम चाहते हैं। परन्तु जहाँ “किसी को रथों का, और किसी को घोड़ों का भरोसा है,” वहाँ हम “अपने परमेश्‍वर यहोवा ही का नाम लेंगे” (भजन 20:7)। भीषण युद्ध के मध्य में रथों और घोड़ों जैसे युद्ध-साधन निश्चय ही भय उत्पन्न करते थे। फिर भी, चाहे ऐसा लगे कि अधिक सामर्थ्य वाला पक्ष ही सदा जीतता है, हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि परमेश्वर सदा अपने लोगों के बीच कार्य कर रहा है, और वही है जो विजय देगा—न तो बल से, न शक्ति से, परन्तु अपने आत्मा के द्वारा।

कोई भी वस्तु—न धन, न प्रभाव, न रणनीति, न क्षमता—हमारे जीवनों में और कलीसिया में आत्मा के कार्य का स्थान नहीं ले सकती। उदाहरण के लिए, नए नियम की कलीसिया के नेतृत्व को स्मरण करें। उसके अगुवे साहसी और सक्रिय पुरुष थे, कम से कम इस कारण से कि उन्होंने यीशु के साथ बहुत समय बिताया था। फिर भी, जब सुसमाचार के फैलने का समय आया, यीशु ने क्या किया? “उनसे मिलकर उन्हें आज्ञा दी, ‘यरूशलेम को न छोड़ो, परन्तु पिता की उस प्रतिज्ञा के पूरे होने की बाट जोहते रहो, जिसकी चर्चा तुम मुझ से सुन चुके हो’” (प्रेरितों 1:4)—और वह प्रतिज्ञा, निश्चय ही, पवित्र आत्मा था। पवित्र आत्मा के सामर्थ्य के बिना, प्रेरित लोग चाहे जितने भी सक्षम या दृढ़ क्यों न रहे हों, कहीं नहीं पहुँच सकते थे। पवित्र आत्मा के साथ, उन्होंने एक ऐसे आन्दोलन का आरम्भ किया जिसने संसार को बदल डाला।

आज के हमारे समय में, हमें स्मरण रखना चाहिए कि परमेश्वर के राज्य के लिए सच्चे लाभ कभी भी केवल समाज में ऊँचे पद, बड़े बैंक खाते, या बड़े अधिकार से नहीं आएँगे। इसके बजाय, हम परमेश्वर के आत्मा की प्रतीक्षा करते हैं कि वह जहाँ चाहे वहाँ चले और जैसे चाहे वैसे कार्य करे। आखिरकार, परमेश्वर के विचार हमारे विचार नहीं हैं, न ही हमारे मार्ग उसके मार्ग हैं। उसकी बुद्धि पृथ्वी से आकाश जितनी ऊँची है (यशायाह 55:8-9)। यदि भीतर-ही-भीतर आप अपने आप पर निर्भर हैं, तो यह स्मरण रखें: परमेश्वर का राज्य पवित्र आत्मा के कार्य के बिना न तो आपके अपने जीवन में, न आपकी गवाही के द्वारा और न ही आपके सेवाकार्य के द्वारा आगे बढ़ेगा। यदि भीतर-ही-भीतर आप निराश हैं, तो यह स्मरण रखें: परमेश्वर का राज्य आगे बढ़ेगा, यहाँ तक कि आपके अपने जीवन में, आपकी गवाही के द्वारा और आपके सेवाकार्य के द्वारा भी, क्योंकि पवित्र आत्मा कार्य कर रहा है। रथों पर या घोड़ों पर भरोसा न रखें, परन्तु अपने परमेश्वर यहोवा पर भरोसा रखें।

  भजन 115

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 113–115; 2 कुरिन्थियों 2

23 August : देव मूर्तिपूजक नाहीं

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23 August : देव मूर्तिपूजक नाहीं
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आपल्या पवित्र जनांच्या ठायीं गौरव मिळावा म्हणून, आणि त्या दिवशी विश्वास ठेवणार्‍या सर्वांच्या ठायीं आश्‍चर्यपात्र व्हावे म्हणून तो येईल, कारण आम्हीं दिलेंल्या साक्षीवर तुम्हीं विश्वास ठेवला आहे. (2 थेस्सलनीका 1:10)

पौल म्हणतो कीं ख्रिस्त हा मुख्यता त्याला गौरव मिळावा म्हणून आणि आश्‍चर्यपात्र व्हावे म्हणून येत आहे. तो येत आहे त्यामागचे कारण हेच.

देव स्वतःचे गौरव करू पाहतो आणि त्याच्या लोकांकडून त्याची स्तुती व्हावी या शोधांत असतो हे शिक्षण ऐकून बरेच लोक अडखळतांत कारण आपण स्वतःचे गौरव करून घेणारे होऊं नये किंवा स्वतःची स्तुती करून घावयांस पाहूं नये असे बायबल आपल्याला शिक्षण देते. उदाहरणार्थ, बायबल सांगते कीं प्रेम “स्वार्थ पाहत नाहीं” (1 करिंथ 13:5).

देव इतका प्रेमळ असूनही त्याचवेळी पूर्णपणें “स्वतःचे” गौरव (स्वार्थ) व स्तुती करू पाहणारा आणि पूर्णपणें आपलाच आनंद शोधणारा कसा असू शकतो? जर देव स्वतःमध्येंच इतका पूर्णपणें गुंतलेला असेल तर मग तो आमच्या कल्याणार्थ कसा असू शकतो?

मी याचे उत्तर पुढीलप्रमाणें मांडतो : कारण वैभव व परम-स्वयंपूर्णता यांबाबतींत देव हाच एकमेव अद्वितीय आहे, म्हणून जर तो आमचे गौरव करणार असेल तर मग त्याला स्वत:मध्यें गौरवी असणें अगत्याचे आहे. दीन व नम्रपणाचे जें नियम मानव-प्राणी म्हणून आमच्यावर लागू होतांत तें आमचा निर्माणकर्ता म्हणून देवावर लागू होऊ शकत नाहींत.

सार्वकालिक आनंदाचा उगम म्हणून जर देव स्वतःपासूनच विभक्त झाला तर तो देव नाहीं. त्यासाठीं त्याला आपल्या स्वत:च्या अमर्याद वैभवाचे मूल्य नाकारावे लागेल. असे केल्यानें तो हे सूचित करेल कीं त्याच्या स्वतःच्या बाहेर असे काहींतरी आहे जें त्याच्यापेक्षा अधिक मौल्यवान आहे. अशाने तो मूर्तिपूजक ठरेल.

हे आमच्या कोणत्याही लाभाचे नाहीं. कारण आपला देवच जर अनीतिमान झाला आहे तर आपण कोठे जायचे? जें असीम मोलवान त्यालाच जर देवानें असीम महत्त्व देणें थांबविले तर आपण या विश्वात शुद्धतेचा खडक कोठे शोधावा? देव स्वतःविषयीचे जें अमर्याद मूल्य आणि सौंदर्याचे दावे करतो तें त्यानें स्वतःच जर नाकारले तर आपण कोणाची उपासना करावीं?

नाहीं, देवानें आपलें देवपण सोडून द्यावे अशी मागणी करून आपण देवाचे स्वतःचे गौरव करणें ह्याला आपल्या प्रीत्यर्थ प्रीति म्हणूं शकत नाहीं.

उलट, देव अद्वितीय प्रीति आहे हे आपण पाहावें कारण आपल्या पवित्र जनांच्या ठायीं त्याच्या नावाला गौरव मिळावा म्हणून तो अखंडपणें शोध करीत असतो. आपल्या ठायीं त्याच्या महानतेच्या गौरवाची स्तुती व्हावी हाच आपल्या परमानंदाचा आणि त्याच्या महानतेचा शिखर आहे.

22 अगस्त : पवन के पीछे दौड़ना

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“मनुष्य जो धरती पर मन लगा लगाकर परिश्रम करता है उससे उसको क्या लाभ होता है?” सभोपदेशक 2:22

बीते कई वर्षों में मैं अनेक माता-पिताओं के साथ बैठा हूँ जो अपने बच्चों के गलत मार्गों के सम्भावित परिणामों को लेकर व्याकुल थे। इन सब माताओं और पिताओं को अपने पुत्र या पुत्री के चुनावों से निराशा हुई थी, और बातचीत के दौरान यह स्पष्ट हो गया कि उनकी निराशा इस विश्वास पर आधारित थी कि यदि उनका बच्चा बस उन्हीं की तरह होता तो सब कुछ कहीं अधिक अच्छा होता। और गहराई से पूछने पर यह सामने आया कि उनका अभिप्राय यह था कि सब कुछ तब बेहतर होता यदि उनका बच्चा अपना जीवन पूरी तरह अपने काम को ही समर्पित कर देता।

पवित्रशास्त्र का निष्कर्ष उस जीवन के विषय में स्पष्ट है जो केवल श्रम के लिए ही समर्पित हो: वह सब व्यर्थ है और पवन के पीछे दौड़ना है। इसका यह अर्थ नहीं कि काम अप्रासंगिक या अनुपयोगी है। काम परमेश्वर से आता है, इसलिए वह अच्छा है—परन्तु केवल तब, जब उसे सही रीति से किया जाए। परन्तु सुलेमान चेतावनी देता है कि जब काम ही आपके जीवन की सम्पूर्णता बन जाता है, तब आपके “सब दिन तो दुखों से भरे रहते हैं,” और “रात को भी” आपका “मन चैन नहीं पाता” (सभोपदेशक 2:23)। काम-लोलुप लोग रात में जाग उठते हैं और अपने बिस्तर पर करवटें बदलते रहते हैं। उन्हें सोने के लिए गोलियों की आवश्यकता पड़ती है, जागने के लिए गोलियाँ, और दिन भर चलने के लिए गोलियाँ खानी पड़ती हैं। और यदि “गोलियाँ” आपके लिए दूर की बात है, तो बस उसे किसी भी ऐसे उपाय से बदल दीजिए जिसे आप लोगों को अपनाते हुए देखते हैं—या स्वयं अपनाते हैं—ताकि आप अपना दिमाग बन्द कर सकें और फिर से चालू कर सकें।

जब जीवन इस प्रकार जिया जाता है, तो अन्ततः सब कुछ ढह जाता है। समय के साथ, जो लोग अपने आप को अपनी सम्पत्तियों के लिए समर्पित कर देते हैं, वे उन्हीं में और अधिक उलझते चले जाते हैं। वस्तुओं के कारण अपनी आत्मा खो देना समझदारी नहीं है। फिर भी, जैसा कि यीशु ने सिखाया, चट्टान पर अपना घर बनाने का एक तरीका है (मत्ती 7:24-27)। जीवन की यात्रा में—यहाँ तक कि काम में भी—केवल वही दृढ़ आनन्द और स्थाई धन पाए जाते हैं जो परमेश्वर में व्यक्तिगत और जीवित विश्वास से प्राप्त होते हैं।

इसलिए, “आज चुन लो कि तुम किस की सेवा करोगे” (यहोशू 24:15): धन और व्यर्थ महत्वाकांक्षा की मूर्तियों की, या स्वर्ग के परमेश्वर की। यह सुनिश्चित करें कि अपने हृदय को तैयार कर लें और अपना चुनाव उस समय से पहले कर लें जब आप अपनी मेज़ पर बैठें या कारखाने में खड़े हों, और अपने आप को पूरी तरह अपने काम को सौंप देने के लिए प्रलोभित हों। मन से प्रार्थना करें, “प्रभु यीशु, मैं अपनी आशा को अपने व्यवसाय की उपलब्धियों या धन के संचय में नहीं रखना चाहता। प्रभु यीशु, मेरा उद्धारकर्ता बन और मुझे दिखा कि आज मैं तेरे साथ कैसे जीवन जीऊँ, तू ही मेरा सान्त्वनादाता है और मेरी तृप्ति का स्रोत हो।” यही वह मार्ग है जिससे कोई अपने काम में कठोर परिश्रम तो करे, पर उसकी पूजा न करे।

  सभोपदेशक 2

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 110–112; 2 कुरिन्थियों 1 ◊

22 August : स्तुती करण्यात आनंदी

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देवा, राष्ट्रे तुझी स्तुती करोत, सर्व राष्ट्रे तुझी स्तुती करोत! (स्तोत्र 67:3, 5)

आपण देवाची स्तुती करावी अशी देव आपल्याकडून मागणी का करतो?

सी.एस. लुईस :

लोक जितक्या मोठ्या आवेशाने त्यांना किंमत असलेल्यां कोणत्याही गोष्टीची स्वाभाविकरित्या स्तुती करतांत, तितक्याच स्वाभाविक आवेशाने ते आम्हांला देखील त्यांच्या भक्तींत सहभागी होण्याचा आग्रह करतांत : “ती किती सुंदर आहे, नाहीं का? ती गोष्ट किती वैभवी होती, नाहीं का? ती गोष्ट किती विलक्षण आहे, असे तुम्हांला वाटत नाहीं का?”

जेव्हां स्तोत्रकर्ते प्रत्येकाला देवाची स्तुती करण्याचे आव्हान करतांत, तेव्हां तें देखील तेच करत आहेंत जे सर्व लोक स्वाभाविकरित्या मोठ्या आवेशाने त्यांना किंमत असलेल्यां कोणत्याही गोष्टीच्या बाबतींत बोलतांत. देवाची स्तुती करण्याच्या बाबतींत असलेली माझी संपूर्ण, अति सामान्य अडचण ही कीं ती स्तुति आपल्या दृष्टित अति मोलवान असलेल्या व्यक्तीसाठीं जी गोष्ट करण्यात आपल्याला आनंद होतो, तीच आपल्याला करू दिलीं जात नाहीं या माझ्या मूर्खपणाच्या विचारावर अवलंबून आहे, जे खरे पाहता आपण स्वत:हून करू शकत नाहीं.

माझ्या मते, आपल्याला त्याची स्तुती करण्यात आनंद होतो ज्याच्यात आपला सर्व आनंद असतो, कारण स्तुती ही केवळ आपल्याला अभिव्यक्तच करत नाहीं तर ती आपला आनंद देखील भरून काढते; हाच तिचा ठराविक शेवट. एकमेकांवर प्रेम करणारे जोडपे तू किती सुंदर आहेत अशी एकमेकांची स्तुतीसुमने करतांत हा कौतुकाच्या बाहेरचा विषय नाहीं; स्तुती जोपर्यंत व्यक्त होत नाहीं तोपर्यंत आनंद हा अपूर्णच असतो.

येथें उत्तर आहे – देव आपल्याकडून त्याची स्तुती करण्याची मागणी करतो त्यामागे आभासीपणें दिसून येणाऱ्या देवाच्या अहंकारावर उपाय! म्हणजें असें कीं, मुळांत ही आज्ञा आमच्या परम आनंदासाठीं आहे. आपण ज्याचा आनंद घेतो त्याची आपण स्तुतीही करतो कारण तो आनंद जोपर्यंत स्तुती करण्याद्वारे व्यक्त होत नाहीं तोपर्यंत तो अपूर्ण असतो. आपण ज्याला महत्त्व देतो त्याच्याविषयी जर आपल्याला बोलू दिलें नाहीं आणि आपल्याला जे आवडते त्याचा उत्सव साजरा करण्याची आपल्याला परवानगी दिली गेलीं नाहीं आणि ज्याचे आपल्याला कौतुक वाटते किंवा ज्याचा आपण सम्मान करतो त्याची जर आपल्याला स्तुती करू दिली नाहीं तर आपला आनंद पूर्ण होणार नाहीं.

म्हणून, आपला आनंद पूर्ण करण्याइतपत जर देव आपल्यावर प्रीति करत असेल, तर मग त्यानें स्वतःला भेट म्हणून आपल्याला द्यावे इतके पुरे नाहीं; त्यानें आपल्याकडून आपल्या अंतःकरणातून उसळणारी स्तुती देखील जिंकली पाहिजे – त्याला स्वतःमध्यें असलेला काहीं कमकुवतपणा दूर करायचा आहे किंवा त्याच्यात असलेला काहीं अपुरेपणा भरून काढायचा आहे म्हणून नव्हें, तर तो आपल्यावर प्रेम करतो आणि आपला आनंद पूर्ण व्हावा अशी उत्कंठा बाळगतो आणि ती उत्कंठा केवळ तेव्हांच पूर्ण होते जेव्हा आपण त्याला ओळखते व त्याची स्तुती करतो, जो सर्वांमध्यें अति महान व गौरवी आहे.

जर तो खरोखर आपला आहे, तर तो तसा स्वतःसाठींच असला पाहिजे! सर्व विश्वात केवळ हाच परमेश्वर असा आहे ज्याच्यासाठीं स्वतःची स्तुती करून घेण्यामध्यें त्याच्या सर्वोच्च प्रीतिचे कार्य प्रकट होते. त्याच्या बाबतींत, स्वतःला उंचविणें हा सर्वोच्च सद्गुण आहे. जेव्हा तो “त्याच्या गौरवाची स्तुती व्हावी म्हणून” सर्व गोष्टी करतो (इफिस 1:12, 14), तेव्हा तो या जगातील अशी एकमेव गोष्ट आपल्यासाठीं राखून ठेवतो व आपल्याला देतो जी आपली संपूर्ण तळमळ संतुष्ट करू शकते.

देव आमच्यासाठीं आहे! परंतु या प्रीतिचा पाया म्हणजें देव हा स्वतःसाठीं होता, आजही स्वतःसाठीं आहे आणि युगानुयुग स्वतःसाठीं राहील.