1 सितम्बर : जीवन के लिए धर्मशास्त्र

Alethia4India
Alethia4India
1 सितम्बर : जीवन के लिए धर्मशास्त्र
Loading
/

“परमेश्‍वर से मेरी प्रार्थना है कि क्या थोड़े में क्या बहुत में, केवल तू ही नहीं परन्तु जितने लोग आज मेरी सुनते हैं, इन बन्धनों को छोड़ वे मेरे समान हो जाएँ।” प्रेरितों 26:29


पौलुस का विश्वास जीवन की भट्ठी में तपाया गया था। जब उसके पैरों के नीचे से मानो भूमि खींच ली गई, तब उसने और भी अधिक यह सीखा कि परमेश्वर ही सब बातों पर नियन्त्रण रखता है।

रोम में पौलुस की दो वर्षों की कैद के समय ही उसने इफिसियों, फिलिप्पियों और कुलुस्सियों की कलीसियाओं को, और अपने मित्र फिलेमोन को पत्र लिखे। इसी दुख के काल में परमेश्वर ने उसे यीशु के विषय में यह लिखने के लिए प्रेरित किया, “सब वस्तुएँ उसी में स्थिर रहती हैं” (कुलुस्सियों 1:17)। जब उसने इफिसियों को लिखा, तो उसने उन्हें यह देखने के लिए उत्साहित किया कि जो परमेश्वर सब पर प्रभुता रखता है, उसने सब कुछ यीशु के पैरों तले कर दिया है (इफिसियों 1:22)। ये सत्य केवल कागजी नहीं थे। पौलुस ने अपने जीवन के सबसे कठिन समयों में इन्हीं पर भरोसा रखा।

पौलुस के अनुभवों ने निस्सन्देह उसे यह और गहराई से समझने में सहायता की कि उसे सुसमाचार की आवश्यकता केवल उद्धार के लिए ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जीवन के लिए है। हमें भी प्रतिदिन सुसमाचार की आवश्यकता है—यह शुभ समाचार कि यीशु पापियों के स्थान पर मरा, कि वह हमारे धर्मी ठहराए जाने के लिए जीवित किया गया, और कि उसने हमें पवित्र करने और हमें भर देने के लिए पवित्र आत्मा को भेजा।

सुसमाचार हमारे भीतर यीशु की वापसी की एक आश्वस्त प्रत्याशा उत्पन्न करता है। वह हमें संसार को स्वर्गिक दृष्टिकोण से देखने योग्य बनाता है।
जॉन स्टॉट ने, जिनकी विशाल सामग्री को समेटने और संक्षेप में प्रस्तुत करने की क्षमता अद्वितीय थी, पौलुस की कैद का उसके धर्मशास्त्र पर प्रभाव इस प्रकार संक्षेप में प्रस्तुत किया: “पौलुस का दृष्टिकोण समायोजित हुआ, उसका क्षितिज विस्तृत हुआ, उसकी दृष्टि स्पष्ट हुई और उसकी गवाही समृद्ध हुई।” उसकी जंजीरें निराशा या पश्चात्ताप का कारण नहीं बनीं। बल्कि उसकी परीक्षाएँ, जिन्होंने उसे निर्बलता और परमेश्वर पर निर्भरता की स्थिति में रखा, उसके दृष्टिकोण को बदलने वाला और क्षितिज को प्रकाशित करने वाला माध्यम सिद्ध हुईं। वह एक रोमी राज्यपाल, एक राजा और एक रानी के सामने खड़ा होकर कह सका, जो आपके पास है, उसे आप रख नहीं सकते। जो मेरे पास है, उसे मैं खो नहीं सकता। काश कि आप भी मेरे समान हो जाते—अनुग्रह से बचाए गए पापी, अनन्त जीवन के वारिस। मैं नहीं चाहता कि आप मेरी जंजीरों में मेरे सहभागी बनें, परन्तु मैं चाहता हूँ कि आप मेरे विश्वास में मेरे सहभागी अवश्य बनें।

पौलुस ने उसी सत्य का अनुभव किया जिसे उसने वर्षों पहले रोमियों को लिखा था: “हम जानते हैं कि जो लोग परमेश्‍वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिए सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन्हीं के लिए जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं” (रोमियों 8:28)। यह केवल पौलुस के लिए ही नहीं, बल्कि उन सब के लिए सत्य है जिन्होंने यीशु मसीह में विश्वास रखा है। क्या आप किसी निराशाजनक परीक्षा का सामना कर रहे हैं? साहस रखें! आपके पास वह सब है जिसकी आपको वास्तव में आवश्यकता है, और आप उसे खो नहीं सकते। संसार जो भी धन और सान्त्वना दे सकता है, वह उस धन के सामने कुछ भी नहीं जो आपके पास सुसमाचार में है—“मसीह जो महिमा की आशा है तुम में रहता है” (कुलुस्सियों 1:27)। मसीही धर्मशास्त्र राजमहलों के लिए नहीं, बल्कि कारागार की कोठरी के लिए है, परीक्षाओं के लिए है। सुसमाचार के सत्यों को अपने प्राण को दृढ़ करने और अपने दृष्टिकोण को आकार देने दें, जब आप उस आशा को थामे रहते हैं जिसे मसीह ने आपके लिए मोल लिया है।

प्रेरितों के काम 26:1-29

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 135–136; 2 कुरिन्थियों 11:1-15 ◊

Leave A Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *