4 सितम्बर : और कोई बड़ी विजय नहीं

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4 सितम्बर : और कोई बड़ी विजय नहीं
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“अतः अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं।” रोमियों 8:1

मसीहियत के विषय में एक पुरानी और बार-बार दोहराई जाने वाली गलतफहमी यह है कि परमेश्वर हम में से प्रत्येक को एक जीवित तराजू की तरह देखता है: एक ओर हमारे पाप और असफलताएँ भरती जाती हैं, दूसरी ओर हमारे भले काम और विजय डाली जाती हैं, और यदि अन्त में अच्छे कामों का पलड़ा भारी हो जाए, तो परिणाम परमेश्वर के लिए पर्याप्त होगा—क्या ऐसा नहीं है?

परन्तु वास्तविकता यह है कि यदि हम अपने पापों को गिनें और उनकी तुलना अपनी आज्ञाकारिता से करें, तो हम सदा हारते ही पाए जाते हैं। यह वास्तव में कोई प्रतियोगिता भी नहीं है। जैसे जब कोई पेशेवर टीम किसी अनाड़ी टीम के विरुद्ध खेलती है, तो परिणाम एकतरफ़ा होता है। फिर भी हम में से बहुत से लोग यह सोचकर अपने आप को धोखा देते हैं कि हमारे पास वापसी के लिए समय है—कि अन्तिम सीटी बजने से पहले हम स्वयं को थोड़ा ठीक कर लेंगे, या इतना परिश्रम कर लेंगे कि अन्त में विजयी निकल आएँ।

ऐसी सोच सुसमाचार की बराबरी कभी नहीं कर पाती। और यह अनुग्रह से पूरी तरह चूक जाती है।

परमेश्वर के सामने हमारे अपने प्रयास हमारे पलड़े को कभी भारी नहीं कर सकते। नहीं, यह काम तो मसीह का है। पौलुस इफिसियों को लिखता है कि हमारा उद्धार हमारी “ओर से नहीं, वरन् परमेश्‍वर का दान है” (इफिसियों 2:8)। वह दान हमारे स्थान पर मसीह का सिद्ध लेखा है। उसकी पूर्ण धार्मिकता से कम कुछ भी पर्याप्त नहीं।

जब आप सुसमाचार को वास्तव में समझने लगते हैं, तो वह इतना अच्छा प्रतीत होता है कि मानो सत्य ही न हो। ऐसा उदार अनुग्रह कौन पाने के योग्य है? परन्तु यही तो बात है। हमारा उद्धार पूर्णतः एक दान है, और वह पूरी तरह अयोग्य लोगों को दिया गया है। हम न तो अभी इसके योग्य हैं, और न कभी हो सकते हैं। फिर भी परमेश्वर हम पर दया करता है। वह हमें विजयी घोषित करता है—दण्ड की आज्ञा नहीं!—यीशु मसीह के कारण, और केवल उसी के कारण।

मसीही होना आपको अपने जीवन को एक तराजू की दृष्टि से देखने से स्वतः सुरक्षित नहीं कर देता। पौलुस ने गलातिया की कलीसिया को पूरा पत्र इसी कारण लिखा कि वे अनुग्रह को न छोड़ें। हमें लगातार यह स्मरण रखने के लिए संघर्ष करना पड़ता है कि हमारे प्रदर्शन से नहीं बल्कि केवल मसीह के कारण और सदा मसीह में ही हम पर “दण्ड की आज्ञा नहीं” है। क्या आपने अपने उद्धार का आनन्द खो दिया है? इसका सम्भवतः कारण यह हो सकता है कि आप यीशु की ओर कम और अपनी ओर अधिक देख रहे हैं। मसीही जीवन में न तो निराशा का स्थान है और न घमण्ड का, क्योंकि यह कभी आपके विषय में नहीं है; यह सदा उसी के विषय में है।

मसीह यीशु में परमेश्वर आपको विजय देता है। इससे बड़ा कोई दान नहीं, इससे बड़ी कोई विजय नहीं, और इससे बड़ा कोई आनन्द नहीं।

  गलातियों 4:21–5:1

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 143–145; 2 कुरिन्थियों 13

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