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31 अगस्त : सही सोच का सामर्थ्य

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31 अगस्त : सही सोच का सामर्थ्य
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“इसलिए हे भाइयो, जो जो बातें सत्य हैं, और जो जो बातें आदरणीय हैं, और जो जो बातें उचित हैं, और जो जो बातें पवित्र हैं, और जो जो बातें सुहावनी हैं, और जो जो बातें मनभावनी हैं, अर्थात् जो भी सद्‌गुण और प्रशंसा की बातें हैं उन पर ध्यान लगाया करो।” फिलिप्पियों 4:8

हम में से बहुत से लोग दिन का आरम्भ चिन्तित विचारों के साथ करते हैं। “परमेश्‍वर की शान्ति, जो सारी समझ से परे है” (फिलिप्पियों 4:7), मानो रात के मध्य में या जब हम भोर को आँखें खोलते हैं, हम तक पहुँच ही नहीं पाती। इसके बजाय, जैसे ही भोर होती है, हम अपने आप से कहते हैं, “सोचने को कितना कुछ है। मेरे मन में कितनी बातें घूम रही हैं। मेरे सामने कितनी चुनौतियाँ हैं।” ऐसे विचार बहुत आसानी से चिन्ता उत्पन्न करते हैं और प्रार्थना के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को शिथिल कर देते हैं।

पौलुस इन थका देने वाली, यहाँ तक कि पंगु बना देने वाली भावनाओं पर विजय पाने में हमारी सहायता करता है, जब वह हमारी दृष्टि उन गुणों की ओर मोड़ता है जो हमारी सोच को स्वतन्त्र कर देंगे। जिस मन में फिलिप्पियों 4:8 में वर्णित विषय भरे होंगे, उसमें चिन्ता उत्पन्न करने वाले, शान्ति भंग करने वाले और आनन्द नष्ट करने वाले विचारों के लिए बहुत कम स्थान रह जाता है।

जिस बात को पौलुस अपने पाठकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा था, वह सोचने की एक विशिष्ट मसीही रीति है। मसीही मन, जैसा कि उसने सिखाया, वह नहीं है जो केवल “मसीही विषयों” के बारे में ही सोचने के लिए प्रशिक्षित हो, बल्कि वह है जिसने हर बात को मसीही दृष्टिकोण से सोचना सीख लिया हो। अन्ततः, हम वही हैं जिसके विषय में हम सोचते हैं। हमारे मन में ही हमारी भावनाएँ जागृत होती हैं, और हमारे मन के द्वारा ही हमारी इच्छाएँ दिशा पाती हैं। मन में ही हम हर कार्य की कल्पना करते हैं और उसे उत्पन्न करते हैं। इसलिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि हम सही और भक्तिपूर्ण बातों के विषय में सोचना सीखें।

बाइबल केवल मानसिक चिन्तन को उसके अपने लिए महत्त्व नहीं देती। मसीही लोगों को इसलिए नहीं बुलाया गया कि वे किसी ऊँची पहाड़ी पर बैठकर, दैनिक जीवन की दिनचर्या से अलग होकर, अमूर्त रूप में धन्य विचार सोचते रहें। इसके विपरीत, पौलुस हमें एक ऐसी सूची देता है जो हमारे उद्देश्यों, हमारे आचरण और हमारे नैतिक जीवन को दृढ़ करेगी। हम में से प्रत्येक को ऐसा जीवन जीने के लिए बुलाया गया है जो वास्तविक है कृत्रिम नहीं; गम्भीर है तुच्छ नहीं; सही है सुविधाजनक नहीं; शुद्ध है अशुद्ध नहीं; प्रेमपूर्ण है कलहपूर्ण नहीं; और सहायक है आलोचनात्मक नहीं। संक्षेप में, हमें यीशु के समान सोचने के लिए बुलाया गया है।

फिर भी, पौलुस आपको केवल अपने बल पर खड़े होने के लिए नहीं बुला रहा है। यह इस सूची को निभाने के लिए बस अपनी पूरी कोशिश करने का कोई नारा नहीं है। आत्म-प्रयास के द्वारा पवित्रीकरण परमेश्वर की योजना नहीं है। जिस बहुआयामी सद्‌गुण की बात पौलुस करता है, वह उद्धार के वृक्ष पर उगने वाला फल है। यह फल उन लोगों में प्रकट होता है जिनकी जड़ें अनुग्रह में गहराई से जमी हुई हैं। इसलिए अपने हृदय को परमेश्वर के अनुग्रह से जकड़ने दें, और अपने मन को उस पर ध्यान लगाने का अभ्यास कराएँ जो वास्तव में प्रशंसा के योग्य है। जब ये प्रभाव एक साथ मिलते हैं, तो आपका जीवन ऐसा होगा जो परमेश्वर की महिमा करेगा। यह लक्ष्य रखें कि कल जब आप जागें, तो सबसे पहले उसके अनुग्रह और इस फल के विषय में ही सोचें।

  लूका 6:43-49

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 132–134; 2 कुरिन्थियों 10

31 August : सिंह आणि कोकरा

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31 August : सिंह आणि कोकरा
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“पाहा, हा माझा सेवक, ह्याला मी निवडले आहे; तो मला परमप्रिय आहे; त्याच्याविषयी माझा जीव संतुष्ट आहे; त्याच्यावर मी आपला आत्मा घालीन, तो परराष्ट्रीयांना न्याय कळवील. तो भांडणार नाहीं व ओरडणार नाहीं, व रस्त्यांवर त्याची वाणी कोणाला ऐकू येणार नाहीं. चेपलेला बोरू तो मोडणार नाहीं, व मिणमिणती वात तो विझवणार नाहीं; तो न्यायाला विजय देईल तोपर्यंत असे होईल, आणि परराष्ट्रीय त्याच्या नावाची आशा धरतील.” (मत्तय 12:18-21, यशया 42 मधून अवतरण)

आपल्या पुत्राची सेवक-सदृश्य नम्रता आणि करुणा पाहून पित्याचा जीव आनंदाने उल्लासतो.

जेव्हा बोरू चेपलेला असतो व तो मोडणार तोच हा सेवक तो बरा होईपर्यंत त्याला आपल्या करुणेंने सरळ धरून ठेवतो. जेव्हा एखादी वात मिणमिणती असते आणि विझणारच असते तेव्हां हा सेवक ती वात बाहेर उपटून काढत नाहीं, तर आपला हात तिच्या सभोताल ठेवतो व जोवर ती पुन्हा जळू लागत नाहीं तोवर तिजवर हळूवारपणें फुंकर मारतो.

त्यामुळें पिता घोषणा करतो, “पाहा, हा माझा सेवक, त्याच्याविषयी माझा जीव संतुष्ट आहे!” पुत्राची ही योग्यता आणि त्याचे हे तेज केवळ त्याच्या वैभवीपणातून किंवा केवळ त्याच्या सौम्यतेतून येत नाहीं, तर ह्या दोन्ही गुणविशेषांच्या सिद्ध एकात्मतेतून उफळून येतांत.

प्रकटीकरण 5:2 मध्यें एक देवदूत, “गुंडाळीवरचे शिक्के फोडून ती उघडण्यास कोण योग्य आहे?” असे मोठ्याने पुकारतो, तेव्हां उत्तर आलें, “रडू नकोस; पाहा, ‘यहूदा’ वंशाचा ‘सिंह’, दाविदाचा ‘अंकुर’ ह्याने जय मिळवला; म्हणून तो तिचे सात शिक्के फोडून ती उघडण्यास योग्य ठरला आहे” (प्रकटीकरण 5:5).

‘यहूदा’ वंशाचा ‘सिंह’ याच्या सामर्थ्यात देव उल्लासतो. म्हणूनच तो इतिहासाच्या गुंडाळीवरचे शिक्के फोडून शेवटच्या दिवसाचा उलगडा करण्यासाठीं देवाच्या दृष्टित पात्र आहे.

पण हे चित्र पूर्ण नाहीं. या सिंहाने जय कसा मिळवला? पुढील वचन त्याच्या स्वरूपाचे वर्णन करते: “तेव्हा राजासन व चार प्राणी ह्यांच्यामध्यें व वडीलमंडळ ह्यांच्यामध्यें, ज्याचा जणू काय ‘वध करण्यात’ आला होता, असा ‘कोकरा’ उभा राहिलेला मी पाहिला” (प्रकटीकरण 5:6). येशू केवळ ‘यहूदा’ वंशाचा ‘सिंह’ म्हणूनच नव्हे तर ‘वध करण्यात’ आला होता, असा ‘कोकरा’ म्हणूनही पित्याच्या आनंदास पात्र ठरला आहे.

देवाचा देहधारी झालेंला पुत्र येशू ख्रिस्ता याच्या गौरवाचे हेच वैशिष्ट आहे – वैभव आणि सौम्यता या अद्भुत मिश्रणातून उद्भवलेली एकात्मता.

30 अगस्त : परमेश्वर का रक्षक वचन

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30 अगस्त : परमेश्वर का रक्षक वचन
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“मैं यह विनती नहीं करता कि तू उन्हें जगत से उठा ले; परन्तु यह कि तू उन्हें उस दुष्‍ट से बचाए रख।” यूहन्ना 17:15

जब यीशु ने अपने चेलों के लिए ये शब्द प्रार्थना में कहे, तो ये उसने उन्हें ऊँचे स्वर में कहे। इस प्रकार यह प्रार्थना उनके लिए इस बात की शिक्षा भी थी कि उन्हें अपने चारों ओर के संसार के साथ कैसे सम्बन्ध रखना है। जो जीवन यीशु यहाँ प्रस्तुत करता है, वह न तो संसार से सुखद रूप से अविभेद्य है और न ही उससे सुखद रूप से अलग।

यही यीशु का अपने लोगों के लिए दर्शन है: संसार में रहना, परन्तु उससे भिन्न होना। वास्तव में, यही वह बुलावा है जिसमें परमेश्वर के लोग सदा से बुलाए गए हैं—“याजकों का राज्य और पवित्र जाति” होने के लिए (निर्गमन 19:6; 1 पतरस 2:9-10)। भजन स्पष्ट रूप से बताते हैं कि बुराई एक वर्तमान खतरा है। लोगों को “शत्रु” और “हत्यारे” कहा गया है (भजन 59:1-2), “अनर्थकारी” हमारे चारों ओर हैं (94:4), और कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके मार्गों को केवल “टेढ़े” ही कहा जा सकता है (125:5)। इसलिए बड़ी चुनौती यह है कि हम मसीह के वचनों का आदर कैसे करें—उस बुराई के प्रभाव से कैसे बचे रहें जो हमें चारों ओर से घेरे हुए है।

हमारी सबसे बड़ी रक्षा पिता से यीशु की इस विनती में दिखाई देती है: “उन्हें उस दुष्ट से बचाए रख।” जो लोग अपने आप को परमेश्वर को सौंप देते हैं, उनके लिए सुरक्षा उपलब्ध है। यह सत्य भजनों में भी व्यक्त किया गया है, जहाँ हम पढ़ते हैं कि परमेश्वर की रक्षा दीनों के उपलब्ध लिए है। प्रभु कहता है, “दीन लोगों के लुट जाने, और दरिद्रों के कराहने के कारण, परमेश्‍वर कहता है, ‘अब मैं उठूँगा’” (भजन 12:5)। अर्थात्, वह घमण्डी और डींग मारने वालों की नहीं, बल्कि उन लोगों की रक्षा करता है जो उस पर अपनी निर्भरता को पहचानते हैं। प्रभु उन्हीं के कराहने को सुनता है। और दीनों के लिए प्रभु की यह रक्षा उस दुष्ट के विरुद्ध भी उपलब्ध है। दाऊद स्वीकार करता है कि परमेश्वर हमें “इस काल के लोगों से सर्वदा के लिए बचाए रखेगा” (भजन 12:7)। दुष्ट लोग परमेश्वर के लोगों को चोट पहुँचा सकते हैं, परन्तु वे स्थाई रूप से ऐसा नहीं कर सकते, क्योंकि अन्ततः वे हमारी आत्माओं को हानि नहीं पहुँचा सकते। परमेश्वर हमें अनन्त विनाश से बचाए रखेगा।

परमेश्वर की यह रक्षा दीनों के लिए और दुष्टों के विरुद्ध है, परन्तु यह हमारे पास कैसे पहुँचती है? परमेश्वर के वचन के द्वारा, जो हमारे पाँव के लिए दीपक और हमारे मार्ग के लिए उजियाला है (भजन 119:105)। उसका हर एक वचन सत्य सिद्ध होता है, और सब शत्रुओं के विरुद्ध ढाल प्रदान करता है (भजन 18:30)। यदि हम संसार में विश्वासयोग्य जीवन जीना चाहते हैं, तो हमें पवित्रशास्त्र के प्रति अपने आप को समर्पित करना होगा। इसलिए अपने चारों ओर की बुराई के विषय में सही सोच रखने के लिए परमेश्वर का वचन आपके हृदय में, आपके मन में, और आपकी जीभ पर होना चाहिए। परमेश्वर ने इसे आपको आपकी रक्षा के लिए दिया है।

क्या आप अपने लिए वही प्रार्थना करते हैं जो यीशु ने अपनी मृत्यु से एक रात पहले अपने अनुयायियों के लिए की थी? इस पर विचार करें कि क्या आपको संसार के समान हो जाने का अधिक खतरा है या उससे पूरी तरह अलग हो जाने का। प्रभु से उस प्रेम, बुद्धि, और साहस की याचना करें जो उस प्रकार का जीवन जीने के लिए आवश्यक है जैसा उसने जिया: संसार में, और फिर भी उससे महिमामय रूप से भिन्न।

  यूहन्ना 17:9-19

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 129–131; 2 कुरिन्थियों 9 ◊

30 August : मंडळीची वाढ ही देवाच्या पद्धतीने होते

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30 August : मंडळीची वाढ ही देवाच्या पद्धतीने होते
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म्हणजें देहाद्वारे झालेंली मुले देवाची मुले आहेत असे नाहीं तर अभिवचनानुसार जन्मलेली मुलेच संतान अशी गणण्यात येतांत. (रोम 9:8)

कल्पना करा कीं जुन्या करारातील अब्राहाम एक पाळक आहे. परमेश्वर म्हणतो, “मी तुला आशीर्वाद देईन आणि तुझ्या सेवेची भरभराट करीन.” पण मंडळी मात्र मुलबाळ नसलेली अशा वांझ अवस्थेतआहे.

अब्राहाम काय करतो? तो स्वर्गाच्या अलौकिक हस्तक्षेपाचा बेत हाणून पाडण्याचा प्रयत्न करू लागतो. तो म्हातारा होत आहे. त्याची पत्नी अजूनही वांझ आहे. म्हणून तो स्वर्गाच्या अलौकिक हस्तक्षेपावाचूनच देवाच्या अभिवचनानुसार असलेल्या पुत्राला जन्मास घालण्याचे ठरवतो. तो त्याच्या बायकोची दासी हागार हिच्याशी लैंगिक संबंध स्थापित करतो (उत्पत्ति 16:4). परंतु परिणामी “अभिवचनानुसार असलेल्या मुलाऐवजी” “देहाद्वारे झालेंले मुल” म्हणजें इश्माएल ह्याचा जन्म होतो.

देव अब्राहामाला आश्चर्याचा धक्का देत असे म्हणतो, “[तुझी पत्नी सारा] तिच्या पोटी तुला एक मुलगा देईन” (उत्पत्ति 17:16). हे ऐकून अब्राहाम देवाचा धावा करून म्हणतो, “इश्माएल तुझ्यासमोर जगला म्हणजें झालें!” (उत्पत्ति 17:18). त्याच्या स्वतःच्या नैसर्गिक, मानवी प्रयत्नांद्वारे असलेले काम ह्याद्वारे देवाचे अभिवचन पूर्णत्वास यावें अशी त्याची इच्छा आहे. पण देव म्हणतो, “नाहीं, नाहीं, तुझी बायको सारा हिच्याच पोटी तुला मुलगा होईल” (उत्पत्ति 17:19).

पण सारा 90 वर्षांची झाली आहे. तिचे आतापर्यंतचे आयुष्य वांझ अवस्थेंतच आहे, शिवाय ती आधीच रजोनिवृत्तीतून गेलेली आहे (उत्पत्ति 18:11). अब्राहाम 100 वर्षांचा झाला आहे. अभिवचनानुसार मुलासाठीं एकमात्र आशा जर असेल तर ती म्हणजें अद्भुत, अलौकिक हस्तक्षेपच.

“अभिवचनानुसार मूल” होण्याचा अर्थ असा आहे – त्याचा “जन्म रक्त, अथवा देहाची इच्छा, अथवा मनुष्याची इच्छा ह्यांपासून” होत नाहीं; तर देवापासून” होतो (योहान 1:13). या जगात देवाची मुलें तिच गणली जातांत जीं अलौकिकरित्या अभिवचनानुसार जन्मलेलीं आहेत. गलतीकरांस 4:28 मध्यें पौल म्हणतो, “बंधुजनहो, इसहाकाप्रमाणें तुम्हीं [ख्रिस्ती लोक], अभिवचनाची संतती आहात.” तुमचा जन्म “देहस्वभावानुसार” नाहीं, तर “आत्म्यानुसार” झाला आहे (गलती 4:29).

परत एकदा कल्पना करा कीं अब्राहाम एक पाळक आहे. त्याला जसे वाटते कीं मंडळीची वाढ ही देवानें दिलेंल्या अभिवचनानुसार व्हावीं त्याप्रमाणें ती वाढत नाहींये. तो अलौकिक हस्तक्षेपाची वाट पाहत थकला आहे. म्हणून तो केवळ मानवी माध्यम असलेल्या “हागारे” कडें वळतो आणि पवित्र आत्म्याच्या अलौकिक कार्यावाचून आपण “लोकांना आकर्षित” करू शकतो असे ठरवतो.

तथापि, ही इसहाकीं मंडळी नसून इश्माएली मंडळी असेल- म्हणजें देहाद्वारे झालेंली मुले, देवाची मुले नाहीं. देव आम्हांला अशा घातक यशापासून वाचवो. सर्व प्रकारे कष्ट करा. परंतु निर्णायक, अलौकिक कार्यासाठीं नेहमी परमेश्वराकडें पहा. “लढाईच्या दिवसासाठीं घोडा सज्ज करतांत, पण यश देणें परमेश्वराकडें असते” (नीतिसूत्रे 21:31).

29 अगस्त : अपने सृजनहार को स्मरण रखो

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29 अगस्त : अपने सृजनहार को स्मरण रखो
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“अपनी जवानी के दिनों में अपने सृजनहार को स्मरण रख।” सभोपदेशक 12:1

सब लोग एक ही गति से या एक ही प्रकार से बूढ़े नहीं होते। कुछ लोग अपने सन्ध्या-काल के वर्षों तक भी जीवन्त रहते हैं, जबकि कुछ लोग अपने समय से बहुत पहले मुरझा जाते हैं। परन्तु हम सब—चाहे हम कितने ही युवा या वृद्ध क्यों न हों, चाहे हम कैसा भी अनुभव करें या कितने ही दुर्बल क्यों न हों—प्रतिदिन एक-एक कदम करके उस दिन की ओर बढ़ रहे हैं जब अन्ततः दीप बुझ जाएँगे।

उसी अन्त को ध्यान में रखते हुए सभोपदेशक का लेखक हमें उत्साहित करता है कि जब तक समय है, हम अपने सृजनहार को स्मरण रखें। परन्तु जब वह कहता है “स्मरण रख,” तो वह हमें किसी यान्त्रिक अभ्यास के लिए नहीं बुला रहा, जैसे अनियमित अंग्रेज़ी क्रियाओं या गुणा-पहाड़ों को याद करना हो। स्मरण करने की यह पुकार हमें हर प्रकार की आत्मनिर्भरता को त्याग देने और बिना किसी शर्त के अपने आप को परमेश्वर पर, अपने सृजनहार और पालनहार के रूप में, सौंप देने के लिए प्रेरित करती है। “अपने सृजनहार को स्मरण” रखने का अर्थ है उसे जानना, उससे प्रेम करना, और अपनी सर्वोच्च प्रसन्नता के रूप में उसकी सेवा करना।

जिस समय-सीमा में इस उपदेश का पालन किया जाना है, वह भी महत्त्वपूर्ण है: लेखक विशेष रूप से अपने पाठकों से आग्रह करता है कि वे परमेश्वर को “अपनी जवानी के दिनों में” स्मरण रखें। यदि आप अब युवा नहीं रहे, तो चिन्ता मत करें—यह आपके लिए भी आपकी सोच से कहीं अधिक लागू हो सकता है! बाइबल जवानी के विषय में हमसे कहीं अधिक लचीली है। फिर भी, इसमें कोई सन्देह नहीं कि विशेषकर युवाओं को इन निर्देशों पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

हमें सावधान रहना चाहिए कि हम अपने आप से यह न कहने लग जाएँ, “जब गम्भीर समय आएगा, तब मैं गम्भीर बातों पर ध्यान दूँगा।” गम्भीर समय अभी है! वे दिन शीघ्र आएँगे जब आप वैसे देख नहीं पाएँगे जैसे पहले देखते थे, वैसे सुन नहीं पाएँगे जैसे पहले सुनते थे, या वैसे चल नहीं पाएँगे जैसे पहले चलते थे। चाहे तेज़ी से हो या धीरे-धीरे, आपके जीवन का डेरा क्षीण हो रहा है। कितना दुखद होगा यदि कोई यह मान ले कि वह अपने सृजनहार को कल, और कल, और कल स्मरण करेगा, परन्तु आज कभी नहीं, और फिर यह पाए कि अब कोई कल शेष ही नहीं रहा। सावधान रहें कि अपने जीवन के सर्वोत्तम वर्ष उन बातों में न बीतने दें जो अन्ततः व्यर्थ सिद्ध होंगी। जब तक अवसर है, अपने सृजनहार को स्मरण रखें। और यदि आपको लगता है कि आपके सर्वोत्तम वर्ष पीछे छूट चुके हैं, तो यह भी स्मरण रखें कि “जिन वर्षों की उपज . . . टिड्डियों ने, अर्थात् . . . बड़े दल ने . . . खा ली थी,” उसकी हानि की भरपाई करने में परमेश्वर समर्थ है (योएल 2:25)। अभी स्मरण रखना, अनन्तकाल को पछतावे के साथ बिताने से कहीं उत्तम है।

  लूका 9:57-62

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 126–128; 2 कुरिन्थियों 8

29 August : ख्रिस्त येशूमध्यें असणें म्हणजें सहा गोष्टीं

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29 August : ख्रिस्त येशूमध्यें असणें म्हणजें सहा गोष्टीं
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[देवानें] आमच्या कृत्यांप्रमाणें नव्हे तर स्वत:च्या संकल्पाप्रमाणें व कृपेप्रमाणें आम्हांला तारले व पवित्र पाचारणाने पाचारले आहे; ही कृपा युगांच्या काळापूर्वी ख्रिस्त येशूच्या ठायीं आपल्यावर करण्यात आली होती. (2 तीमथ्य 1:9)

“ख्रिस्त येशूमध्यें” असणें हे एक अद्भुत सत्य आहे. ख्रिस्ताशी एकरूप होणें चित्तथरारक आहे. ख्रिस्ताशी बांधलेलें.

जर तुम्हीं “ख्रिस्तात” आहांत तर तुमच्या बाबतींत ते काय आहे हे ऐका:

1. जगाच्या स्थापनेपूर्वी ख्रिस्त येशूच्या ठायीं तुम्हांवर कृपा करण्यात आली होती. दुसरा तीमथ्य 1:9, “ही कृपा युगांच्या काळापूर्वी ख्रिस्त येशूच्या ठायीं आपल्यावर करण्यात आली होती.”

2. देवानें जगाच्या स्थापनेपूर्वी तुम्हांला ख्रिस्ताच्या ठायीं निवडून घेतले. इफिस 1:4, “[देवानें] जगाच्या स्थापनेपूर्वी आपल्याला ख्रिस्ताच्या ठायीं निवडून घेतले.”

3. ख्रिस्त येशूमध्यें देवानें तुमच्यावर अशी प्रीति केलीं जिच्यापासून तुम्हांला कोणतीही गोष्ट विभक्त करू शकणार नाहीं. रोमकरांस 8:38-39, “कारण माझी खातरी आहे कीं, मरण, जीवन, देवदूत, अधिपती, वर्तमानकाळच्या गोष्टी, भविष्यकाळच्या गोष्टी, बले, उंची, खोली, किंवा दुसरी कोणतीही सृष्ट वस्तू, ख्रिस्त येशू आपला प्रभू ह्याच्यामध्यें देवाची आपल्यावरील जी प्रीति आहे तिच्यापासून आपल्याला विभक्त करायला समर्थ होणार नाहीं.”

4. ख्रिस्त येशूमध्यें तुम्हांला मुक्ती आणि तुमच्या सर्व अपराधांची क्षमा मिळाली आहे. इफिस 1:7, “[ख्रिस्तात] त्याच्या रक्ताच्या द्वारे खंडणी भरून मिळवलेली मुक्ती, म्हणजें आपल्या अपराधांची क्षमा, आपल्याला मिळाली आहे.”

5. ख्रिस्त येशूमध्यें तुम्हीं देवासमोर नीतिमान ठरला आहांत आणि ख्रिस्ताच्या ठायीं देवाचे नीतिमत्व हे तुमचे नीतिमत्त्व गणण्यात आलें आहे. दुसरे करिंथ 5:21, “[ख्रिस्ताला] पाप ठाऊक नव्हते त्याला [देवानें]  तुमच्या-आमच्याकरता पाप असे केलें; ह्यासाठीं कीं, आपण त्याच्या ठायीं देवाचे नीतिमत्त्व असे व्हावे.”

6. ख्रिस्त येशूमध्यें तुम्हीं नवी उत्पत्ती आणि देवाचे पुत्र झाला आहांत. दुसरे करिंथ 5:17, “म्हणून जर कोणी ख्रिस्ताच्या ठायीं असेल तर तो नवी उत्पत्ती आहे; जुने ते होऊन गेले; पाहा, ते नवे झालें आहे.” गलती 3:26, “तुम्हीं सर्व ख्रिस्त येशूवरील विश्वासाच्या द्वारे देवाचे पुत्र आहात.”

माझी तुमच्यासाठीं अशी प्रार्थना आहे कीं “ख्रिस्त येशूमध्यें” असण्याचा जो अतुल्य विशेषाधिकार तुम्हांला प्राप्त झाला आहे त्यावर चिंतन करण्यापासून आणि त्याचा आनंद घेण्यापासून तुम्हीं कधीही खचून जाऊ नये.

28 अगस्त : आनन्द की ओर जाने वाला मार्ग

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28 अगस्त : आनन्द की ओर जाने वाला मार्ग
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“प्रभु में सदा आनन्दित रहो; मैं फिर कहता हूँ, आनन्दित रहो।” फिलिप्पियों 4:4

खुशी को नल की तरह घुमाकर चालू नहीं किया जा सकता। आनन्द किसी स्विच को पलटने से नहीं आ जाता। हम मसीही लोगों को जीवन में भी अन्य लोगों की तरह ही उतार-चढ़ाव आते हैं। कभी हम बहुत अच्छा अनुभव करते हैं; कभी-कभी हम फँसे हुए से महसूस करते हैं। तो फिर हम उस आज्ञा का क्या करें जो हमें निरन्तर आनन्दित रहने के लिए कहती है—या, जैसा कि पाठ कहता है, “सदा आनन्दित रहो”?

कुछ लोग आनन्द को ऐसी वस्तु समझते हैं जो हमारी परिस्थितियों के अनुसार घटता-बढ़ता रहता है। यदि ऐसा होता, तो आनन्द का मार्ग यह होता कि हम यह सुनिश्चित करें कि हमारी परिस्थितियों में जितनी सम्भव हो उतनी अच्छी बातें हों, और जो कुछ भी—या जो कोई भी—हमें नीचे गिराता है, उसे हटा दें। परन्तु प्रेरित पौलुस हमें एक भिन्न दृष्टिकोण देता है। जिस मसीही आनन्द का वह वर्णन करता है, वह स्थिर और अडिग होने के लिए अभिप्रेत है। पौलुस यहाँ हमें इस आनन्द के स्रोत की ओर संकेत करता है: “प्रभु में सदा आनन्दित रहो; मैं फिर कहता हूँ, आनन्दित रहो।” इसकी कुंजी “सदा आनन्दित रहो” से पहले दिया गया वाक्यांश “प्रभु में” है। ये दो छोटे शब्द संसार में सारा अन्तर उत्पन्न कर देते हैं! यदि हम अपने आनन्द को अपनी परिस्थितियों के साथ घटने-बढ़ने दें, तो अवश्य ही हम संकट में पड़ेंगे। देर-सबेर कठिन समय अवश्य आएँगे। परन्तु यदि हम उस प्रभु में आनन्दित हों, जो “कल और आज और युगानुयुग एक–सा है” (इब्रानियों 13:8), तो हमारा आनन्द किसी अचल पर टिक जाता है, और इसीलिए वह मुरझाएगा नहीं।

मसीही आनन्द ऐसा आनन्द है जो गहरे दुख के साथ भी सह-अस्तित्व रख सकता है। आपकी परिस्थितियाँ आपको शोक तो दे सकती हैं, परन्तु यदि आप अपना आनन्द “प्रभु में”—अर्थात वह कौन है, वह आपसे कैसे प्रेम करता है, और उसने आपके लिए क्या प्रतिज्ञा की है—पाते हैं, तो वे आपके आनन्द को बुझा नहीं सकतीं। अपनी आशा उसी में रखें और उसके अचल स्वभाव को स्मरण करते रहें, और आप सदा आनन्दित रहने के मार्ग पर होंगे, यहाँ तक कि कठिनाइयों में भी। आज, आपकी परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों, आप इस महिमामय सत्य में शान्ति, विश्राम, और—हाँ—यहाँ तक कि आनन्द भी पा सकते हैं कि परमेश्वर सब बातों में आपके साथ है और एक दिन सब कुछ ठीक कर देगा।

  भजन संहिता 147

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 123–125; 2 कुरिन्थियों 7 ◊

28 August : येशूच्या नावामुळेंमाझ्या दुष्टाईची क्षमा झालीं

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28 August : येशूच्या नावामुळेंमाझ्या दुष्टाईची क्षमा झालीं
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हे परमेश्वरा, तू आपल्या नावासाठीं माझ्या दुष्टाईची क्षमा कर; कारण ती फार झाली आहे. (स्तोत्र 25:11)

न्याय्य काय आहे हे जाणून घेण्यासाठीं, देव स्वतःहून ऊंच अशा कोणत्याही अधिकाराशी मसलत करत नाहीं. त्याचा आपला अधिकारच या विश्वातील अंतिम अधिकार आहे. म्हणून, देवासाठीं जे योग्य आहे ते करणें म्हणजें त्याच्या या अंतिम अधिकाराशी जे सुसंगत आहे तेच करणें.

देवाला ज्यांविषयी अमर्याद आवेश आहे आणि जी त्याला परम आनंद आणि प्रसन्नता देणारी आहे ती एक अति मोलवान गोष्ट म्हणजें त्याचे स्वतःचे नीतिमत्व, जो त्याची स्वतःची परिपूर्णता व त्याचा सन्मान आहे. आणि आपल्या परिपूर्णतेसाठीं त्याला असलेल्या या अमर्याद  आवेशाच्या विरुद्ध जर तो कधी गेला तर तो अनीतिमान ठरेल – तो एक मूर्तिपूजक ठरेल.  

असा नीतिमान देव आपल्यासारख्या देव-निंदक अशा पापी लोकांवर कशी प्रीति करू शकतो? परंतु सुवार्तेच्या बाबतींत थक्क करून टाकणारी गोष्ट म्हणजें हीच आहे कीं जे तारण तो आम्हांला देऊ करतो त्याचा पाया त्याचे स्वतःचे दिव्य नीतिमत्त्व आहे.

पित्याला आपल्या प्रिय पुत्राबद्दल असलेला अमर्याद आदर तोच माझ्यासारख्या एका दुष्ट पाप्यावर त्यां पुत्रामध्यें अशी प्रीति करणें व माझा स्वीकार करणें हे त्याच्यासाठीं शक्य करतो, कारण त्यानें आपल्या मरणाने आपल्या पित्याचा अधिकार आणि गौरव प्रमाणित केला आहे.

ख्रिस्तानें जें केलें त्यामुळें, आपण स्तोत्रकर्त्याच्या प्रार्थनेला नाविन्याने समजून तीच प्रार्थना करू शकतो, “हे परमेश्वरा, तू आपल्या नावासाठीं माझ्या दुष्टाईची क्षमा कर; कारण ती फार झाली आहे” (स्तोत्र 25:11). या प्रार्थनेविषयी नवी समज ही आहे कीं, आपण फक्त अशी प्रार्थना करण्याऐवजी कीं “तू आपल्या नावासाठीं माझ्या दुष्टाईची क्षमा कर,” आपण ख्रिस्तामुळें आता अशी प्रार्थना करतो, “हे परमेश्वरा, तू येशूच्या नावासाठीं माझ्या दुष्टाईची क्षमा कर.”

पहिले योहान 2:12 येशूला उद्देशून म्हणते, “मुलांनो, मी तुम्हांला लिहितो, कारण त्याच्या नावामुळें तुमच्या पापांची तुम्हांला क्षमा झाली आहे,”. येशूनें आता पापाचे प्रायश्चित्त केलें आहे आणि पित्याचे गौरव प्रमाणित केलें आहे जेणेंकरून “त्याच्या नावामुळें” आपल्या “दुष्टाईची क्षमा” केलीं जावीं.

देव नीतिमान आहे. तो पापाला दंड दिल्यावाचून ते असेच झाकत नाहीं. जर कोण्या पापी मनुष्याला दोषमुक्त करण्यांत आलें तर, कोणी असा आहे जो देवानें त्या पापी व्यक्तीला असेच क्षमा केलें हा डाग त्याजवर लागू नये म्हून देवाच्या गौरवाचे असीम मूल्य प्रमाणित करण्यासाठीं मरण पावतो. ख्रिस्तानें तेच केलें. म्हणून, “हे परमेश्वरा, तू आपल्या नावासाठीं” आणि “येशूच्या नावामुळें” ही दोन्ही संबोधणें एकच आहेत. आणि म्हणूनच आम्हीं पापांच्या क्षमेसाठीं मोठ्या खात्रीने प्रार्थना करतो.

27 अगस्त : तेरे पवित्र पर्वत पर कौन बसने पाएगा?

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27 अगस्त : तेरे पवित्र पर्वत पर कौन बसने पाएगा?
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“हे परमेश्‍वर तेरे तम्बू में कौन रहेगा? तेरे पवित्र पर्वत पर कौन बसने पाएगा? वह जो खराई से चलता और धर्म के काम करता है, और हृदय से सच बोलता है।” भजन संहिता 15:1-2

“तेरे पवित्र पर्वत पर कौन बसने पाएगा?” दाऊद द्वारा इस भजन के पहले पद में पूछा गया प्रश्न अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। हमें ऐसा प्रतीत हो सकता है कि यह केवल प्राचीन इस्राएल की आराधना से जुड़ा प्रश्न है, परन्तु वास्तव में यह हमें स्वर्ग के द्वार तक ले जाता है और पूछता है, इन फाटकों में कौन प्रवेश करने पाएगा?

यद्यपि इसका उत्तर भजन 15 के शेष भाग में समझाया गया है, इसका सामान्य आशय हमें पूरे पवित्रशास्त्र में मिलता है। इब्रानियों का लेखक अपने पाठकों को यह सलाह देता है कि वे “उस पवित्रता के खोजी हो जिसके बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा” (इब्रानियों 12:14)। इसी प्रकार प्रभु यीशु ने सिखाया कि “सकेत है वह फाटक और कठिन है वह मार्ग जो जीवन को पहुँचाता है; और थोड़े हैं जो उसे पाते हैं” (मत्ती 7:14)। अतः जो लोग प्रभु के पवित्र पर्वत पर खड़े होंगे और अनन्तकाल तक उसकी उपस्थिति का आनन्द लेंगे, वे वही हैं जो सकेत मार्ग से होकर वहाँ पहुँचते हैं और पवित्रता का यत्न करते हैं।

दुखद सत्य यह है कि बहुत से लोग यह मान लेते हैं कि वे परमेश्वर के पवित्र पर्वत पर इसलिए बसेंगे क्योंकि उन्होंने कभी एक प्रार्थना की थी, किसी सभा में आगे आए थे, या किसी कलीसिया के सदस्य हैं। यह सोचना एक घोर भूल है कि ये कार्य अपने आप में अनन्त जीवन के योग्य बना देंगे, यदि उनके साथ ऐसा जीवन न हो जो मसीह को प्रभु के रूप में जानने का कोई प्रमाण न दे। चार्ल्स स्पर्जन ने एक बार प्रचार करते हुए कहा, “यदि कोई मनुष्य मन-परिवर्तन से पहले के जीवन से भिन्न जीवन नहीं जी रहा . . . तो उसके मन फिराव को फिर से मन फिराव की आवश्यकता है, और उसका मन-परिवर्तन केवल एक कल्पना है।”[1]

तो फिर, यहोवा के पर्वत पर कौन बसने पाएगा? वही जो “खराई से चलता है,” ऐसे ढंग से जो किसी अविश्वासी के जीवन जैसा न हो, और जिसका जीवन यह वास्तविकता प्रकट करता है कि परमेश्वर ने उसे बचाया है। वही जिसकी बातचीत निन्दा से चिह्नित नहीं, परन्तु जो “हृदय से सच बोलता है।” यह ऐसा व्यक्ति है जो केवल सही बात ही नहीं कहता, बल्कि सच्ची बात कहता है, और जो वह कहता है और जो वह जीता है, उसके बीच कोई अन्तर नहीं होता।

भजन 15 को पढ़ने और अपने आप को ईमानदारी से देखने का संयोजन सम्भवतः हमें बहुत हतोत्साहित कर दे। केवल प्रभु यीशु ही इस भजन में वर्णित पवित्रता को पूर्णता में धारण करता है; केवल वही अपने पिता के पवित्र पर्वत पर बसने के योग्य है, और केवल इस कारण से कि उसने अपने लोगों के पापों के लिए मरने को चुना और उन्हें अपनी सिद्धता से ढाँप दिया, हमें उसके साथ वहाँ रहने के लिए आमन्त्रित किया गया है। फिर भी यह अच्छा और उचित है कि हम परमेश्वर के वचन के प्रकाश को अपने हृदयों पर चमकने दें और वहाँ जो कुछ है उसे प्रकट होने दें, क्योंकि इससे हम मन फिराव और अपने उद्धारकर्ता के प्रति कृतज्ञता की ओर बढ़ेंगे। और जो जानते हैं कि वे उसके कारण वहाँ खड़े होंगे, वे उसके समान बनने का प्रयत्न करेंगे। अपने चाल-चलन और अपने शब्दों पर विचार करें, और प्रार्थना करें कि आप निरन्तर मसीह की प्रतिमा के अनुरूप बनते जाएँ, जब तक कि आप उसके साथ परमेश्वर के पवित्र पर्वत पर बस न जाएँ।

  भजन संहिता 15

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 120–122; 2 कुरिन्थियों 6


[1] “व्हाट इज़ इट टू विन अ सोल?,” द स्वॉर्ड एण्ड द ट्रॉवेल (दिसम्बर 1879), पृ. 561.

27 August : येशू आपल्या सर्व शत्रूंना तुडवील

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27 August : येशू आपल्या सर्व शत्रूंना तुडवील
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नंतर शेवट होईल, तेव्हा सर्व आधिपत्य, सर्व अधिकार व सामर्थ्य ही नष्ट केल्यावर तो देवपित्याला राज्य सोपवून देईल. (1 करिंथ 15:24)

ख्रिस्ताच्या राज्याची व्याप्ती किती आहे?

पुढील वचन, 1 करिंथ 15:25 सांगते, “कारण आपल्या ‘पायांखाली सर्व शत्रू ठेवीपर्यंत’ त्याला राज्य केलें पाहिजे.” येथें प्रयुक्त केलेंला शब्द “सर्व” त्याच्या राज्याची व्याप्ती सूचित करतो.

त्याचप्रमाणें वचन 24 मध्यें प्रयुक्त केलेंला शब्द “सर्व” देखील तेंच सूचित करतो : “नंतर शेवट होईल, तेव्हा सर्व आधिपत्य, सर्व अधिकार व सामर्थ्य ही नष्ट केल्यावर तो देवपित्याला राज्य सोपवून देईल.”

असा कोणताही रोग नाहीं, व्यसन नाहीं, महाकाय नाहीं, वाईट सवय नाहीं, दोष नाहीं, दुर्गुण नाहीं, दुर्बलता नाहीं, स्वभाव नाहीं, मन:स्थिती नाहीं, गर्व नाहीं, आत्म-दया नाहीं, कलह नाहीं, मत्सर नाहीं, विकृती नाहीं, लोभ नाहीं, आळशीपणा नाहीं कीं ज्यांवर ख्रिस्त आपल्या प्रतिष्ठेचा शत्रू म्हणून विजय मिळविणार नाहीं.

आणि या अभिवचनांत असलेले उत्तेजन असें कीं जेव्हा तुम्हीं तुमच्या विश्वासाच्या आणि तुमच्या पवित्रतेच्या शत्रूंशी युद्ध करण्यासाठीं सज्ज होता तेव्हा युद्ध लढणारे तुम्हीं एकटे नाहीं.

येशू ख्रिस्त हा वर्तमान समयी, या युगातच, त्याच्या सर्व शत्रूंना आपल्या पायाखाली ठेवत आहे. सर्व आधिपत्य, सर्व अधिकार व सामर्थ्य यांवर विजय मिळविला जाईल.

म्हणून, लक्षात ठेवा कीं ख्रिस्ताच्या राज्याचा प्रसार हा तुमच्या जीवनात आणि या विश्वात असलेल्या त्याच्या गौरवाच्या सर्वात लहान आणि सर्वात मोठ्या शत्रूपर्यंत पोहोचतो. सर्व शत्रूंचा पराभव केला जाईल.