ArchivesAlethia4India

7 मार्च : सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में यीशु

Alethia4India
Alethia4India
7 मार्च : सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में यीशु
Loading
/

“खोजे ने फिलिप्पुस से पूछा, ‘मैं तुझ से विनती करता हूँ, यह बता कि भविष्यद्वक्ता यह किसके विषय में कहता है, अपने या किसी दूसरे के विषय में?’ तब फिलिप्पुस ने अपना मुँह खोला, और इसी शास्त्र से आरम्भ करके उसे यीशु का सुसमाचार सुनाया।”  प्रेरितों के काम 8:34-35

बाइबल का गम्भीरता से अध्ययन करते समय हम जान जाते हैं कि यीशु किसी अप्रत्याशित रूप से अस्तित्व में नहीं आ गया। आरम्भ से लेकर अन्त तक बाइबल की पुस्तक उसी के बारे में बताती है। निस्सन्देह, पुराने नियम के भविष्यद्वक्ताओं ने भी आत्मा की प्रेरणा से यीशु के बारे में लिखा। चाहे हम पवित्रशास्त्र को कितनी भी अच्छी तरह से जानते हों, फिर भी यदि हम मसीह से अपनी आँखें हटा लेते हैं तो हम इसके केन्द्र, इसकी कुंजी और इसके नायक को देखने से चूक जाएँगे।

सुसमाचारों में यीशु लोगों का ध्यान पुराने नियम की ओर लाता है, जिससे उन्हें यह समझने में सहायता मिल सके कि वह कौन था। अपने सेवाकार्य के आरम्भ में वह एक बार आराधनालय में यशायाह की पुस्तक से पढ़ रहा था। लूका हमें बताता है कि जब उसने समाप्त किया, तो वह अपने सुनने वालों से “कहने लगा, आज ही यह लेख तुम्हारे सामने पूरा हुआ है” (लूका 4:21)। आगे, पुराने नियम में विशेष रूप से रुचि रखने वाले और उसे अच्छी रीति से जानने वाले लोगों से बात करते हुए यीशु ने उन्हें चेतावनी दी, “तुम पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उसमें अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है; और यह वही है जो मेरी गवाही देता है” (यूहन्ना 5:39)। अपनी मृत्यु और पुनरुत्थान के बाद जब इम्माऊस के मार्ग में यीशु का सामना अपने कुछ निराश अनुयायियों से हुआ, तो उसने “मूसा से और सब भविष्यद्वक्ताओं से आरम्भ करके सारे पवित्रशास्त्र में से अपने विषय में लिखी बातों का अर्थ, उन्हें समझा दिया।” (लूका 24:27)।

दूसरे शब्दों में, यीशु ने स्पष्ट रूप से यह शिक्षा दी कि पुराने नियम का प्रत्येक भाग उसी में अपना केन्द्र और पूर्णता पाता है।

जब आप पवित्रशास्त्र पढ़ते हैं तो आपकी मुलाकात यीशु से होती है, क्योंकि यह पुस्तक उसी की गवाही देती है। भले ही पुराने नियम के खण्डों का हमारा अध्ययन और समझ हमें जीवन के बारे में अच्छे और महत्त्वपूर्ण नैतिक सत्य प्रदान करते हैं, फिर भी एक बहुत बड़ा संकट यह है कि हम उस परम सत्य, अर्थात् यीशु को उसमें न देख पाएँ। आपकी बाइबल के प्रत्येक पृष्ठ का उद्देश्य यह है कि आप यीशु से भेंट कर सकें, उसे जान सकें, और उसके महान नाम की उद्‌घोषणा कर सकें और यह सब उसकी महिमा के लिए हो।

उस प्रत्येक प्रवचन में जिसे आप सुनते हैं, उस प्रत्येक पाठ में जिसका आप अध्ययन करते हैं, और परमेश्वर के वचन के उस प्रत्येक खण्ड में जिसे आप पढ़ते हैं, आप अपने आप से पूछें कि “क्या यह मुझे मसीह तक लेकर आया? क्या मैंने इसमें यीशु को पाया?” और जब तक आप “हाँ” में उत्तर न दे सकें तब तक सुनना, अध्ययन करना और पढ़ना बन्द न करें क्योंकि उद्धार, सत्य, बुद्धि और आश्वासन के खजाने उसी में पाए जाते हैं।       

भजन संहिता 119:17-32

7  March : मी पवित्र आत्म्याने स्वत:ला कसे भरू शकतो?

Alethia4India
Alethia4India
7  March : मी पवित्र आत्म्याने स्वत:ला कसे भरू शकतो?
Loading
/

“धीराच्या व शास्त्रापासून मिळणार्‍या उत्तेजनाच्या योगे आपण आशा धरावी म्हणून जे काहीं शास्त्रात पूर्वी लिहिले ते सर्व आपल्यां शिक्षणाकरिता लिहिले “ ( रोम 15:4)

आपण पवित्र आत्म्याने कसे भरले जाऊ शकतो? आपण आपल्यां मंडळीवर व स्वत:वर पवित्र आत्म्याचा वर्षाव कसा अनूभवू शकतो, कीं जेणेकरून तो आपल्यांला अदम्य अश्या आनंदाने भरून टाकींल आणि आपल्यांला स्वतंत्र करील, सामर्थ्य देईल ज्याच्या द्वारें आपण इतरांवर अश्याप्रकारे प्रीति करू शकू कीं त्यांना आपण ख्रिस्तासाठीं जिंकून घेऊं?

उत्तर : यासाठीं देवाच्या अतुलनीय, आशा देणार्‍या वचनांवर दिवस-रात्र मनन करा. जसे रोमकरास पत्र 15:4 सांगते, “धीराच्या व शास्त्रापासून मिळणार्‍या उत्तेजनाच्या योगे आपण आशा धरावी म्हणून जे काहीं शास्त्रात पूर्वी लिहिले ते सर्व आपल्यां शिक्षणाकरिता लिहिले” ह्याच्याद्वारें पौल त्याचें अंत:करण आशा, आनंद आणि प्रीतिने भरत असे.

आपल्यांला आशेची संपूर्ण खात्री देवाच्या अभिवचनांवर मनन केल्यांने येते. आणि रोम 15:13 मध्यें सांगितल्यां प्रमाणे पवित्र आत्मा आशा देऊ करतो, या वचनाबरोबर विरोधाभास होत नाहीं. याचे कारण हे कीं, पवित्र आत्मा हा शास्त्राचा दैवी लेखक आहे. त्याचें कार्य हे त्याच्या शब्दाद्वारें होते. आपल्यांला त्याच्या अभिवचनांनी भरून तो आपल्यांला आशेने भरतो ह्या त्याच्या पद्धतीमध्यें कुठेच विरोधाभास नाहीं.

आशा ही एखादी संदिग्ध भावना नाहीं, जी पोटदुखी प्रमाणे अचानक उदभवेल. आशा हा एक प्रकारचा भरवसा आहे कीं पवित्र आत्म्याने त्याच्या वचनाद्वारें आपल्यां उज्ज्वल भविष्याबद्दल जे अभिवचन दिले आहे, ते खरे होईल. तर पवित्र आत्म्याने भरण्याचा मार्ग म्हणजे त्याच्या वचनाने भरणे. आणि आत्म्याचे सामर्थ्य प्राप्त करण्याचा मार्ग म्हणजे देवाच्या अभिवचनांवर विश्वास ठेवणे.

कारण देवाचे वचनच आहे जें आपल्यांला आशेने भरते, आणि आशा आपल्यांला आनंदाने भरते, आणि आनंद आपल्यां शेजार्‍यावर प्रीति करण्याच्या सामर्थ्याने आणि स्वातंत्र्याने ओसंडून वाहतो. आणि हेंच पवित्र आत्म्याने परिपूर्ण होणे आहे.   

6 मार्च : तू कहाँ है?

Alethia4India
Alethia4India
6 मार्च : तू कहाँ है?
Loading
/

“आदम और उसकी पत्नी वाटिका के वृक्षों के बीच यहोवा परमेश्‍वर से छिप गए . . . तब यहोवा परमेश्‍वर ने पुकारकर आदम से पूछा, ‘तू कहाँ है?’”  उत्पत्ति 3:8-9

जातियों, भाषाओं और भौगोलिक सीमाओं से परे, प्रत्येक स्थान पर बच्चे लुका-छिपी खेलने का आनन्द लेते हैं। यह सारे जगत में खेला जाने वाला भोलेपन से भरा एक खेल है। किन्तु इस संसार में लुका-छिपी का पहला खेल न तो मनोरंजक था और न ही भोलेपन से भरा हुआ। वह बहुत ही चिन्ताजनक था।

बगीचे में आदम और हव्वा अपनी अनाज्ञाकारिता के बाद अंजीर के पत्तों के पीछे एक-दूसरे से और बगीचे के पेड़ों के पीछे अपने सृष्टिकर्ता से छिप गए। उन्होंने छिपे रहने का प्रयास किया, परन्तु परमेश्वर इस एक साधारण प्रश्न के साथ उन्हें खोजने आया, “तू कहाँ है?”

यह प्रश्न इस आम धारणा को उलट देता है कि मनुष्य उस परमेश्वर को ढूँढ रहा है, जो जगत में कहीं या उससे भी परे कहीं छिपा हुआ है। इसके विपरीत, हम इसके उलट पाते हैं कि हम ही छिपे हुए हैं और परमेश्वर हमें ढूँढता हुआ आता है।

परमेश्वर द्वारा इन पहले मनुष्यों से पूछा गया ये प्रश्न विचित्र लग सकता है। क्या परमेश्वर पहले से ही सब कुछ नहीं जानता? आदम और हव्वा कहाँ थे, यह प्रश्न परमेश्वर ने इसलिए नहीं पूछा था कि वह नई जानकारी प्राप्त कर सके, परन्तु इसलिए कि वह उन्हें उनकी परिस्थिति को समझने में सहायता करना चाहता था। परमेश्वर उन्हें बाहर निकालने  से अधिक उन्हें उजागर करने  के लिए आया था।

कल्पना कीजिए कि आदम और हव्वा के विद्रोह के उत्तर स्वरूप परमेश्वर कितने तरीकों से प्रतिक्रिया कर सकता था। यदि उसने न्याय करते हुए कठोरता से उत्तर दिया होता, तो वह उसी क्षण मृत्यु-दण्ड ला सकता था जिसके बारे में उसने उन्हें चेतावनी भी दी थी (उत्पत्ति 2:16-17)। किन्तु सदैव दया करना परमेश्वर के स्वभाव में है, इसलिए वह ऐसा करने के विपरीत केवल एक प्रश्न लेकर आया। मानवजाति द्वारा परमेश्वर से मुँह मोड़ने के बाद यह परमेश्वर के अनुग्रह की पहली झलक है। परमेश्वर ने उन्हें उसी समय वह नहीं दिया जिसके वे योग्य थे; परन्तु अपनी असीम दया में से उसने वह दिया जिसके वे योग्य नहीं थे, अर्थात् प्रत्युत्तर देने और लौट आने का एक अवसर।

हम में से कोई भी सहज महसूस नहीं करेगा यदि हमारे सबसे निकटतम लोग हमारे सभी गुप्त विचारों और किए गए कार्यों को देख सकते। हम एक-दूसरे से और सम्भवतः अपने आप से भी सच्चाई छिपा सकते हैं। परन्तु परमेश्वर से छिपाना व्यर्थ है। न तो छिपाने का कोई तरीका है और न ही किसी और पर दोष मढ़ने का कोई तरीका है।

हमें इस झूठ पर विश्वास नहीं करना चाहिए कि परमेश्वर उन “छोटे” पापों को नहीं देखेगा, जिन्हें हम दूसरों से छिपाते हैं। वह सब देखता है। वह तो हमारी आत्माओं के भीतर देखता है और जानता है कि हमने क्या किया है और हमारी परिस्थिति क्या है। यह बहुत बढ़िया है कि हमें यह दिखावा करने की आवश्यकता नहीं है कि हम कुछ छिपा सकते हैं। वह हम पर दया करने आता है हमारा न्याय करने नहीं, क्योंकि “परमेश्‍वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिए नहीं भेजा कि जगत पर दण्ड की आज्ञा दे, परन्तु इसलिए कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए” (यूहन्ना 3:17)। क्या आप किसी सताने वाले पाप या छिपी हुई लज्जा के कारण बोझिल हैं? क्या आप परमेश्वर से भी वह बात छिपाना चाह रहे हैं, जो आप दूसरों से छिपाते रहे हैं? परमेश्वर से छिपाना बन्द करने का सबसे अच्छा समय अब है। ज्योति में आ जाएँ। जो उसके सामने छिपा नहीं रह सकता उसे उजागर करें, ताकि वह उसे अपने लहू से ढक सके और आप जान सकें कि आप को जान लिया गया है और क्षमा कर दिया गया है। वह एक दयालु और बचाने वाला परमेश्वर है, जो हमारे साथ सम्बन्ध स्थापित करने की अभिलाषा रखता है।       1 यूहन्ना 1:8-2:2

6 March : देव दीनांकडें लक्ष्य देतो

Alethia4India
Alethia4India
6 March : देव दीनांकडें लक्ष्य देतो
Loading
/

“अनादि देव तुझा आश्रय आहे, सनातन बाहुंचा तुला आधार आहे.”  (अनुवाद 33:27)

तुम्हीं कदाचित ह्या क्षणी अश्या काहीं परिस्थितीतून जात असाल जी तुम्हांला वेदनादायक रीतीने येशूच्या व त्याच्या लोकांच्या मौल्यवान सेवेकरिता तयार करत असेल. जेव्हां एखादा व्यक्ति शून्यतेने किंवा असहाय्यपणे रसातळास जातो, तेव्हां त्याला ह्या गोष्टीची जाणीव होईल कीं तो अनादि आश्रय दुर्गाला येऊन पोचला आहे.

मला माझ्या कुटुंबासोबतच्या सकाळच्या भक्तिच्या वेळी वाचलेले स्त्रोत्र 138:6 यातील एका सुंदर वचनाची आठवण झाली, “परमेश्वर थोर आहे, तरी तो दीनांकडें लक्ष देतो.”

तुम्हीं निराशेमध्यें इतकेपण खोल बुडून जाऊ शकत नाहीं कीं देव तुम्हांला पाहत नाहीं किंवा तुमची काळजी करत नाहीं. खरं तर, तो त्या तळाशी तुम्हांला धरण्याकरिता वाट पहात असतो. जसा मोशे म्हणाला, “अनादि देव तुझा आश्रय आहे, सनातन बाहुंचा तुला आधार आहे” ( अनुवाद 33:27 ), अगदी त्या प्रमाणे.

होय, तो तुम्हांला थरथरतांना व घसरतांना पहात असतो. तुम्हीं तळाशी पोचण्यापूर्वी तो तुम्हांला पकडू शकतो ( जे तो नेहमी करतो ). पण या वेळी त्याला तुम्हांला कदाचित काहीं नवीन गोष्टी शिकवायच्या असतील.

स्त्रोत्रकर्ता स्त्रोत्र 119:71 मध्यें म्हणतो, “मी पीडित झाल्यांमुळे माझे बरे झाले; कारण त्यामुळे मी तुझे नियम शिकलो.”  तो असे म्हणत नाहीं कीं त्याला त्यात आनंद वाटला किंवा त्याला बरे वाटले. गत गोष्टींचा विचार करून तो केवळ हे म्हणतो कीं, “त्यामुळे माझे बरे झाले.”

मागील आठवडी मी जेम्स स्टुअर्ट ह्या स्कॉटलँड मधील पाळकाचे पुस्तक वाचत होतो. ते असे म्हणतात कीं, “प्रीतिच्या सेवेमध्यें, केवळ जखमी सैनिकच सेवा करू शकतात.” यासाठींच माझा असा विश्वास आहे कीं तुमच्या पैकीं काहीं जणांची कोणत्या तरी प्रीतिच्या मौल्यवान सेवेकरिता तयारी होत आहे. कारण तुम्हीं जखमी आहात.

असे समजू नका कीं तुमची जखम ही देवाच्या कृपेच्या रचने शिवाय आली आहे. ह्या वचनाचे स्मरण करा, “आता पाहा, मी, मीच तो आहे, माझ्याशिवाय कोणी देव नाहीं; प्राण हरण व प्राण दान करणारा मीच आहे.”  ( अनुवाद 32:39 )

जे तुम्हीं कोणत्या तरी ओझ्या खाली दु:ख सोसत आहात, त्यां तुम्हांला देव विशेष कृपा देऊ करो. देव तुम्हांला सौम्यतेने जी नवी प्रीति देऊ करत आहे तिचा आतुरतेने शोध करा.

5 मार्च : परमेश्वर हमारी ओर है

Alethia4India
Alethia4India
5 मार्च : परमेश्वर हमारी ओर है
Loading
/

“जब किसी की परीक्षा हो, तो वह यह न कहे कि मेरी परीक्षा परमेश्‍वर की ओर से होती है; क्योंकि न तो बुरी बातों से परमेश्‍वर की परीक्षा हो सकती है, और न वह किसी की परीक्षा आप करता है।”  याकूब 1:13

जब हम यीशु मसीह में विश्वास करते हैं और पाप के बन्धन टूट जाते हैं, तो हमारे लिए कई बातें उसी समय से सच हो जाती हैं। हम मृत्यु से जीवन में स्थानान्तरित हो जाते हैं और परमेश्वर का आत्मा हमारे भीतर वास करने लगता है। हम उसके घराने के हो जाते हैं। हम छुटकारा पाए लोग बन जाते हैं, हम में बदलाव हो जाता है और हमारा नया जन्म हो जाता है। पाप अब हमारे जीवनों में प्रभुत्व नहीं करता। किन्तु वह बना  अवश्य रहता है।

मसीह पर भरोसा करने के द्वारा हम ऐसी सहजता का जीवन व्यतीत नहीं करने लग जाते, जिससे हम दुष्ट के हमलों से या अपने हृदय की कपटी इच्छाओं से मुक्त हो जाते हैं। इसके विपरीत, हृदय परिवर्तन से लेकर मसीह को देखने और उसके जैसा बनते जाने तक प्रत्येक मसीही व्यक्ति प्रलोभन के विरुद्ध “एक निरन्तर और अपरिवर्तनीय युद्ध”[1] में उलझा रहता है।

पवित्रशास्त्र प्रलोभन के बारे में चेतावनियों से भरा हुआ है, अर्थात् पाप और बुराई के प्रति वह आकर्षण जिसका हम सभी अनुभव करते हैं। प्रलोभन केवल उन वस्तुओं की लालसा का होना ही नहीं है जो निरंकुश और अकल्पनीय हों, परन्तु परमेश्वर ने जो भली वस्तुएँ हमें दी हैं उनका उपयोग (या दुरुपयोग) इस तरह से करना जो परमेश्वर के विरुद्ध पाप है। स्क्र्यूटेप लेटर्स  में सी. एस. लुईस पाप की इस कुटिलता का उस स्थान पर उल्लेख करते हैं, जहाँ स्क्र्यूटेप अपने प्रशिक्षु दुष्टात्मा को भड़कता है कि “जिन सुखों को हमारे शत्रु [अर्थात्, परमेश्वर] ने उत्पन्न किया है, वह जाकर मनुष्यों को प्रोत्साहित करे कि वे कभी-कभार, ऐसे तरीकों से, या मात्राओं में लें जिन्हें उसने निषिद्ध किया है।”[2]

पवित्रशास्त्र स्पष्ट है कि परमेश्वर कभी भी प्रलोभन का स्रोत नहीं होता और न ही हो सकता है। जब याकूब कहता है कि “परमेश्वर . . . किसी को प्रलोभन में नहीं डालता,” तो वह अपना कथन परमेश्वर के चरित्र पर आधारित कर रहा है। परमेश्वर दूसरों को बुराई के लिए प्रलोभित करने में इसलिए असमर्थ है, क्योंकि वह स्वयं इससे प्रभावित नहीं होता। दूसरों को बुराई के लिए प्रलोभित करने के लिए बुराई में हर्षित होने की आवश्यकता पड़ेगी, और परमेश्वर बुराई से प्रसन्न नहीं होता।

जिस शब्द का अनुवाद “प्रलोभन” के रूप में किया गया है, उसका अनुवाद “परीक्षण” के रूप में भी किया जा सकता है। इस प्रकार जिसे हमारा पतित स्वभाव पाप के प्रलोभन में बदल सकता है, वह एक ऐसा परीक्षण भी है जो हमारे विश्वास को दृढ़ कर सकता है। जब हम परीक्षण के समय का सामना करते हैं, जिसकी अनुमति स्वयं परमेश्वर देता है, तो हमें याद रखना चाहिए कि उसका उद्देश्य हमारी विफलता नहीं, बल्कि हमारा लाभ है। शैतान चाहता है कि हम असफल हों, परन्तु परमेश्वर चाहता है कि हम सफल हों। परमेश्वर हमारी ओर है, और वह प्रत्येक बात को, यहाँ तक कि परीक्षण और प्रलोभन भी, हमारी भलाई के लिए कर रहा है।

आप नियमित रूप से किन प्रलोभनों से जूझ रहे हैं (या हार मान रहे हैं)? उन्हें प्रलोभन के रूप में तो देखें, किन्तु अपने चल रहे युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए ऐसे अवसरों के रूप में भी देखना सीखें जो आज्ञाकारिता चुनने, अपने पिता को प्रसन्न करने, मसीह के समान बनने के क्षण हैं। “शैतान का सामना करो, तो वह तुम्हारे पास से भाग निकलेगा” (याकूब 4:7)।       

1 पतरस 1:13-21

5 March : तुमच्या आनंदाकरिता येशूकडें पहा

Alethia4India
Alethia4India
5 March : तुमच्या आनंदाकरिता येशूकडें पहा
Loading
/

“आपली सर्व कामे लोकांनी पाहावीत म्हणून ते ती करतात….जेवणावळतील श्रेष्ठ स्थाने, सभास्थांनातील श्रेष्ठ आसने, बाजारात नमस्कार घेणे व लोकांकडून गुरुजी म्हणवून घेणे त्यांना आवडते.” ( मत्तय 23 : 57)

लोकांकडून स्वतःचे वाखाण करून घेण्याच्या लालसेला शमवण्यासाठीं केवळ स्वीकृतीचा लोभ असतो. जर आपल्यांला स्वावलंबी बनून आनंद मिळत असेल तर, इतरांनी आपल्यां स्वावलंबीपणाची प्रशंसा केल्यांशिवाय देखील आपल्यांला आनंद वाटणार नाहीं.

यासाठीं मत्तय 23:5 मध्यें येशू परुशी लोकांचे वर्णन करित असें म्हणतो, “आपली सर्व कामे लोकांनी पहावीत म्हणून ते ती करतात.”

हा चेष्टेखोरपणा आहे. आपल्यांला असे वाटत नाहीं का कीं स्वावलंबीपणा हा गर्विष्ठ व्यक्तिला इतरांच्या मतांपासून मुक्त करायला पाहिजे? यालाच “स्वत: मध्यें संतुष्ट” म्हणतात. तसे पहायाला गेले तर या आत्मसंतुष्टीमध्यें किंवा स्वावलंबीपणामध्यें एक रिक्तता आहे.

स्वत्वाची निर्मिती स्वत: मध्यें संतुष्ट होण्यात किंवा स्वत: वर अवलंबून राहण्याकरिता केलीं गेली नव्हती. स्वत्व कधीच स्वयंपूर्ण होवू शकत नाहीं. आपण परमेश्वर नाहीं. आपण परमेश्वराच्या प्रतिमेमध्यें बनवले गेलोय. आणि जी गोष्ट आपल्यांला देवाची “प्रतिमा” बनवते ती गोष्ट म्हणजे आपण स्वतःमध्यें संतुष्ट राहणे ही नाहीं. आपण सावली व प्रतिध्वनि आहोंत. त्यामुळे जो आत्मा स्वत: मध्येंच संतुष्टी शोधण्याकरिता झटत असेल,  तर त्यात एक रिक्तपणा असणारच.

इतरांकडून प्रशंसा मिळविण्याची ही भूक गर्वाचे अपयश व देवाच्या सतत मिळत असलेल्यां कृपेच्या कार्यावरील अविश्वासाचे चिन्ह आहे. येशूनें  मनुष्याचा स्व-गौरवाच्या लोभाचा अनिष्ट परिणाम पाहिला. त्यानें योहान 5:44 मध्यें ह्या गोष्टीचा उल्लेख केला आहे, “जे तुम्हीं एकमेकांकडून प्रशंसा करून घेता आणि जो एकच देव त्याचाकडून प्रशंसा करून घेण्याची खटपट करत नाहीं, त्या तुम्हांला विश्वास ठेवता येणे कसे शक्य आहे?” याचे उत्तर आहे, तुम्हीं विश्वास ठेवू शकत नाहीं. जे इतरांकडून प्रशंसेची लालसा करीत असतांत त्यांना विश्वास ठेवणे शक्य नाहीं. का?

कारण विश्वास स्वत:कडून दृष्टी हटवून देवाकडें पाहतो. कारण विश्वास म्हणजे येशूमध्यें देव जे सर्व काहीं आहे त्यात संतुष्ट असणे. आणि जर तुम्हीं तुमची लालसा इतरांच्या प्रशंसेद्वारें शमवण्याचा हट्ट करीत असाल तर, तुम्हीं येशूपासून दूर जाणार. येशू असा नाहीं. तो त्याच्या पित्याच्या गौरवा करिता जगतो. आणि आपल्यांला पण तो हेच करण्यास सांगतो.

पण जर तुम्हीं तुमच्या स्वतःमध्यें संतुष्ट राहण्यापासून वळाल (पश्चाताप कराल), आणि येशूकडें, देव जे सर्व काहीं आहे त्या सर्वाचा आनंद घेण्याकरिता येशूकडें (विश्वासाने) याल, मग त्या लालसेच्या रिक्ततेची बदल पूर्णतेने होईल- यालाच येशू “सार्वकालिक जीवनासाठीं उपळत्या पाण्याचा झरा” असे संबोधतो.   ( योहान 4:14).

4 मार्च : क्षमा किया गया व्यक्ति और क्षमाशील व्यक्ति

Alethia4India
Alethia4India
4 मार्च : क्षमा किया गया व्यक्ति और क्षमाशील व्यक्ति
Loading
/

“इसलिए जैसे मैं ने तुझ पर दया की, वैसे ही क्या तुझे भी अपने संगी दास पर दया करना नहीं चाहिए था?  मत्ती 18:33

क्षमा किए गए व्यक्ति को क्षमाशील व्यक्ति होना चाहिए, और चूंकि क्षमा करना हमारे लिए स्वाभाविक नहीं है, इसलिए हमें इस बात को बार-बार सुनने की आवश्यकता है।

दूसरे शब्दों में हम क्षमा इसलिए करते हैं, क्योंकि यीशु के द्वारा परमेश्वर हमें क्षमा करता है। बाइबल इस बात को पूरी तरह से स्पष्ट कर देती है कि क्षमा करने का भाव किसी मानवीय गुण से उत्पन्न नहीं होता और यह दूसरों के प्रति दयालु और क्षमाशील होने के हमारे अपने प्रयासों का परिणाम नहीं है, परन्तु यह परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा आता है।

इस कारण, किसी व्यक्ति द्वारा अपने पापों का वास्तव में पश्चाताप करने का एक मुख्य प्रमाण उसमें क्षमा करने की भावना का होना है। इसके विपरीत, यदि हम लगातार अपने हृदयों में शत्रुता, द्वेष और कड़वाहट रखते हैं तो हम न केवल अपने जीवनों को हानि पहुँचाते हैं और अपने सम्बन्धों को संकट में डालते हैं, अपितु सच कहें तो हम यह प्रश्न भी उठाते हैं कि क्या हमने सच में परमेश्वर की क्षमा की प्रकृति को समझा भी है।

वास्तविक रूप से क्षमा प्रदान करना तब तक असम्भव है, जब तक हमने इसका अनुभव स्वयं नहीं किया है, और यदि हमने इसका अनुभव किया है तो ऐसा न करना असम्भव बात है। यह हमारे हृदय से तभी प्रवाहित होगी, जब हम परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा बदले जा चुके होंगे और उसके विरुद्ध अपने अपराध की भयावहता पर विचार कर चुके होंगे। जब ऐसा परिवर्तन आ जाता है, तो लोगों ने जो हमारे विरुद्ध पाप किए हों उनका भार कम हो जाएगा क्योंकि, जिस प्रकार हमें क्षमा मिल चुकी है उसी प्रकार परमेश्वर हमें भी क्षमा करने में सक्षम बना देता है।

मत्ती 18 में सेवक के बारे में यीशु के दृष्टान्त के पीछे यही सिद्धान्त है। आज के समय के अनुसार देखा जाए, तो जिस सेवक का पहली सदी में आज के हिसाब से 70 हजार करोड़ रुपए का ऋण माफ कर दिया गया था, उसने 17 लाख रुपए का ऋण माफ करने से इनकार कर दिया। यीशु चाहता है कि हम उस सेवक की नासमझी को देखें जिसका इतना बड़ा ऋण माफ कर दिया गया था और फिर भी वह उस ऋण को माफ करने से इनकार कर रहा था जो उसका किसी दूसरे पर बकाया था। अपने आप में देखा जाए तो वह ऋण बहुत बड़ा था, किन्तु उस राशि की तुलना में जो उसके लिए माफ की गई थी, वह बहुत छोटा था। इसी प्रकार यह बात समझ से परे लगती है कि हम कभी भी दूसरों को क्षमा न करें, जबकि परमेश्वर के विरुद्ध हमारे अपराध के इतने बड़े ऋण को क्षमा कर दिया गया है।

 यदि हमने परमेश्वर की दया का अनुभव किया है, तो निश्चित रूप से हमें क्षमा करने को अनदेखा नहीं करनी चाहिए। दूसरों को क्षमा करने में हमें परमेश्वर की क्षमा की पूर्णता का आनन्द मिलता है। जिन पापों के अभिलेखों को थामे रहने के लिए आप प्रलोभित होते हैं, उन्हें त्याग दें। जब ऐसा करना कठिन लगे क्योंकि जिस गलती को आपको क्षमा करने के लिए कहा जा रहा है वह बड़ी है, तब उस ऋण को देखें जिसे परमेश्वर ने आपके लिए क्षमा किया है और देखें कि ऐसा करने के लिए उसने क्या त्याग किया है, तो ये बातें आपको अपनी ओर से दया दिखाने में सक्षम बना देंगी। यदि परमेश्वर ने आपको क्षमा किया है, तो वह दूसरों के साथ सद्‌भाव में चलने में आपकी सहायता करने के लिए अपनी दया और अनुग्रह अवश्य उण्डेलेगा।       
मरकुस 11:20-25

4 March : देवाला तुमचे हित करण्यात आनंद मिळतो

Alethia4India
Alethia4India
4 March : देवाला तुमचे हित करण्यात आनंद मिळतो
Loading
/

मी त्यांजशी सर्वकाळचा करार करी; तो असा कीं मी त्यांचे हित करण्यापासून माघार घेणार नाहीं …. मी त्यांचे हित करण्यांत आनंद पावीन.(यिर्मया 32 :4041 )

जेव्हां जेव्हां मी निराश होतो, तेव्हां तेव्हां मी देवाच्या ज्यां अनेक वचनांकडें पुन्हा पुन्हा परत येतों, त्यांपैकींच हें एक वचन आहे. देवाला तुमचे हित करण्यात आनंद मिळतो, यापेक्षा उत्तजेन देणा-या  कोणत्या गोष्टीचा तुम्हीं विचार करू शकता का ? देव केवळ तुमचे हित करतो म्हणून नव्हे. केवळ तुमचे हित करण्याचे आश्वासनच नव्हे – हे कितीही गौरवी असेल तरीही, तर हें कीं देवाला तुमचे हित करण्यात आनंद मिळतो,”मी त्यांचे हित करण्यांत आनंद पावीन. ” अहाहा!

रोम 8:28 यातील सर्व काहीं आपल्यां भल्यांसाठीं करण्याच्या अभिवचनाची पूर्तता तो नाखुशीनी करत नाहीं. आपले हित करण्यात त्याला आनंद मिळतो. आणि तो आनंद केवळ कधीतरीच नाहीं – तर सर्वदा! ” मी त्यांचे हित करण्यापासून माघार घेणार नाहीं.” जे त्याच्यावर विश्वास ठेवतात त्यांच्याबाबतींत तो त्याचें अभिवचन रद्द करत नाहीं किंवा त्याच्या लेकरांचे कल्यांण करण्याविषयीं आपला आनंद गमावत नाहीं.

ह्या गोष्टीने आपल्यांला आनंद व्हावयाला पाहिजे!

पण कधी कधी आनंद वाटणे अवघड होतं. आपली परिस्थिति आपल्यां सहनशीलते पलीकडें होते ज्यांमुळें आनंद पावणे शक्य होत नाहीं. माझ्या बरोबर जेव्हां असे होते तेव्हां मी अब्राहमाचे अनुकरण करतो : “आशेला जागा नसताही त्यानें आशेने विश्वास ठेवला” (रोम 4:18). दुसर्‍या शब्दांत, जेव्हां तुम्हीं तुमच्या आशाहीन परिस्थितिकडें पाहतां, तेव्हां तुम्हांला असें म्हणायचे आहे, “तू माझ्या देवाइतका सामर्थ्यशाली नाहींस! तो तर जें अशक्य ते करू शकतो. आणि जे त्याच्यावर विश्वास ठेवतात त्यांच्याकरिता तो प्रीतिने हे करतो, यासाठींच निराशेकडें अंतिम अधिकार नाहीं. मी देवावर विश्वास ठेवतो.

माझ्या मधील असलेल्यां विश्वासाच्या लहानश्या ठिणगीचे रक्षण करण्यास देव विश्वासू आहे आणि (लगेचच नाहीं) तर अखेरीस तो आनंदाच्या व विश्वासाच्या भावना चेतवतो. आणि त्याचा तो आनंद यिर्मया 32:41 मध्यें दडलेला आहे.

मी किती आनंदी आहे कीं देवाच्या अंतकरणाला तुमचे आणि माझे कल्यांण करण्यात देखील आनंद प्राप्त होतो! मी त्यांचे हित करण्यांत आनंद पावीन.

3 मार्च : आत्मा में विश्राम

Alethia4India
Alethia4India
3 मार्च : आत्मा में विश्राम
Loading
/

“इसलिए जब कि उसके विश्राम में प्रवेश करने की प्रतिज्ञा अब तक है, तो हमें डरना चाहिए ऐसा न हो कि तुम में से कोई जन उससे वंचित रह जाए। क्योंकि हमें उन्हीं की तरह सुसमाचार सुनाया गया है, पर सुने हुए वचन से उन्हें कुछ लाभ न हुआ; क्योंकि सुनने वालों के मन में विश्वास के साथ नहीं बैठा।”  इब्रानियों 4:1-2

प्रायः मसीही लोग छुट्टी मनाने में तो बहुत कुशल होते हैं, किन्तु वे विश्राम करने में उतने ही खराब होते हैं। ऐसा क्यों है? एक कारण यह हो सकता है कि पश्चिमी संस्कृति सफलता और समृद्धि के उच्चतर स्तरों को लगातार खोजते रहने को बहुत महत्त्वपूर्ण मानती है। यहाँ तक कि हमारा छुट्टी का समय भी “गतिविधियों में व्यस्त रहने” और कुछ न कुछ सुधार करने तथा सफल होने की अभिलाषा से भरा होता है। और इसके पीछे प्रत्येक संस्कृति का रोग छिपा होता है, अर्थात् उस परमेश्वर से हमारा अलगाव जिसने हमें सृजा और हमें काम करने तथा विश्राम करने के लिए बनाया है।

जब से संसार में पाप आया है, तब से विश्राम मानवजाति से लुप्त होता गया है। मानवजाति के बारे में आप चाहे कोई भी अन्य बात क्यों न कहें, फिर भी यह तथ्य निर्विवाद है कि हममें शान्ति या विश्राम दिखाई नहीं देता। यदि शान्ति के कुछ क्षण पाने के लिए आपने अथक परिश्रम किया हो या फिर आप अपने छुट्टी के समय को गतिविधियों से भर देते हैं, तो वह छुट्टी का समय विश्राम करना नहीं है। निश्चित रूप से परमेश्वर कुछ और चाहता है।

परमेश्वर एक ऐसा विश्राम प्रदान करता है, जो हमारी आत्माओं को शान्त करता है। आत्मा में विश्राम उस जीवन से प्रवाहित होता है, जो विश्वास में उसके प्रति समर्पित होता है। जब पाप के कारण आई मृत्यु की धूल मानवजाति पर जम गई, तब से हम उस गहन विश्राम का आनन्द लेने में असमर्थ हो गए जो परमेश्वर ने चाहा था। हमें आवश्यकता है एक नई उत्पत्ति की, और परमेश्वर ने ठीक वही हमें प्रदान कर दिया है! “यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है” (2 कुरिन्थियों 5:17)। सृष्टि के सृजन में परमेश्वर ने शारीरिक विश्राम के सिद्धान्त की स्थापना की और छुटकारे में उसने पूर्ण आत्मिक विश्राम की सम्भावना स्थापित की। फिर भी सभी प्रकार के लोग, जिनमें कुछ मसीही होने का दावा करने वाले लोग भी सम्मिलित हैं, परमेश्वर के प्रति अनादर के साथ अपना जीवन जीने पर अड़े रहते हैं। वे अपनी आत्माओं को विश्राम देने के उसके निमन्त्रण को ठुकरा देते हैं और इस प्रकार केवल वचन के सुनने वाले बने रहते हैं, उस पर चलने वाले नहीं (याकूब 1:22)। और फिर वे मरने पर विश्राम में अपने प्रवेश कर लेने की आशा करते हैं। बाइबल जीवन के प्रति ऐसे दृष्टिकोण को कोई आशा प्रदान नहीं करती है। जिस तरह मरुभूमि में इस्राएलियों के लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ व्यर्थ ठहरीं क्योंकि वे उन पर विश्वास करने में विफल रहे, उसी तरह यदि हम भी अपने विश्वास रहित प्रयासों में लगे रहेंगे तो इस जीवन में या आने वाले जीवन में आत्मा में विश्राम प्राप्त करने के परमेश्वर के वरदान को जानने की आशा नहीं कर सकते।

धन्यवाद है कि यीशु में सब कुछ निश्चित हो जाता है। वह खोखले धार्मिक दिखावे और निराशाजनक सांसारिक प्रयासों के मुखौटे को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़कर हमें यह अनुग्रहकारी निमन्त्रण देता है, “हे सब परिश्रम करने वालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा। मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो, और मुझसे सीखो; क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूँ : और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे” (मत्ती 11:28-29)। यह एक ऐसा विश्राम है जिसका हम काम करते हुए भी आनन्द उठाते हैं, एक ऐसा विश्राम जो वास्तव में हमें हमारे काम से विश्राम पाने में सक्षम बनाता है, और एक ऐसा विश्राम जिसका हम अन्ततः एक दिन पूरी तरह से और अनन्त काल तक उसकी उपस्थिति में आनन्द लेंगे। क्या आपकी आत्मा में आज विश्राम है? या आप इस बात को लेकर चिन्तित हैं कि कल क्या होगा या फिर आपके अनुसार जो आज आपको पा लेना चाहिए था, उसके बारे में सोचते हुए थक गए हैं? वह कार्य जो आपकी सबसे बड़ी अभिलाषा को तृप्ति प्रदान करता है और आपकी सबसे बड़ी आवश्यकता का समाधान करता है, वह उद्धार का कार्य यीशु ने कलवरी में आपकी ओर से पूरा कर दिया था। वह आपको यह जानने के लिए अपने पास आने का निमन्त्रण देता है कि उसने आपके अनन्त भविष्य का समाधान कर दिया है और वे कार्य जो उसने आज आपके लिए निर्धारित किए हैं वे सभी पूरे होकर रहेंगे, न उससे अधिक और न उससे कम। इसलिए उस पर विश्वास  करें और अपनी आत्मा को वास्तव में विश्राम करने दें.  इब्रानियों 4:1-10

3 March : चांगुलपणाच्या मनोदयाद्वारें देवाचे कार्य

Alethia4India
Alethia4India
3 March : चांगुलपणाच्या मनोदयाद्वारें देवाचे कार्य
Loading
/

ह्याकरता तर आम्हीं तुमच्यासाठीं सर्वदा अशी प्रार्थना करतो कीं, आपल्यां देवानें तुम्हांला झालेल्यां ह्या पाचारणाला योग्य असे मानावे आणि चांगुलपणाचा प्रत्येक मनोदय व विश्वासाचे कार्य सामर्थ्याने पूर्ण करावे. 2 थेस्सलनी 1:11

आपले चांगुलपणाचे मनोदय पूर्ण करण्याकरिता देवाच्या सामर्थ्याचा शोध करणे याच अर्थ असा होत नाहीं कीं आपण संकल्पच (मनोदय) करत नाहीं किंवा आपण आपल्यां इच्छाशक्तीचा वापर करत नाहीं.

देवाच्या सामर्थ्याची बाजू आपल्यां इच्छेच्या बाजूची जागा कधीच घेत नाहीं, आपल्यां पवित्रीकरणातील देवाचे सामर्थ्य आपल्यांला निष्क्रिय बनवत नाहीं! देवाच्या इच्छेचे सामर्थ्य आपल्यां इच्छेची जागा न घेता, ते आपल्यां इच्छेच्या मुळाशी किंवा मागे आणि इच्छेमध्यें राहून कार्य करते.

आपल्यांतील इच्छेचा अभाव हा देवाच्या सामर्थ्याचा पुरावा नसून, आपल्यां इच्छेचे सामर्थ्य व आपले आनंदाने इच्छा करणे याचा पुरावा आहे.

जर कोणी म्हणत असेल कीं, “माझा देवाच्या सार्वभौमतेवर विश्वास आहे आणि म्हणून मी नुसतं बसून राहणार,  काहींच करणार नाहीं, तर त्याचा देवाच्या सार्वभौमतेवर विश्वास नाहीं आहे. कारण जर कोणी देवाच्या सार्वभौमतेवर विश्वास ठेवत असेल तर तो का बरं उघडपणे देवाची आज्ञा मोडेल?

जेव्हां तुम्हीं काहींच न करण्याचा निर्णय घेता, तेव्हां तुम्हीं काहींच करत नाहीं असे होत नाहीं. तुम्हीं तुमची इच्छाशक्ती सक्रियपणे काहींच न करण्यासाठीं वापरत आहात. आणि जर तुम्हीं अशाप्रकारे तुमच्या जीवनात येणारे पाप आणि मोहाला हाताळत असाल तर ते देवाची आज्ञा मोडण्यासारखे आहे, कारण आपल्यांला आज्ञा दिली आहे कीं, सुयुद्ध कर (1 तिमथ्य 1:18), सैतानाला अडवा ( याकोब 4:7), पवित्रीकरण मिळवण्याचा झटून प्रयत्न करा ( इब्री 12:14) आणि शरीराची कर्मे ठार मारा ( रोम 8:13).

2 थेस्सलनी 1:11असे म्हणते कीं, आपले चांगुलपणाचे मनोदय आणि विश्वासाचे कार्य हें देवाच्या सामर्थ्याने पूर्ण होतात. म्हणून “चांगुलपणाचे मनोदय” आणि “कार्य” या शब्दाचे महत्व रद्द होत नाहीं. आम्हांला झालेल्यां ह्या पाचारणाला योग्य असे चालण्याकरिता, नीतीमत्वाला शोभेसे कृत्य करण्याच्या सत्संकल्पामध्यें आपल्यां इच्छेला सक्रियपणे सहभागी करणे आवश्यक असते.

जर तुमच्या जीवनात प्रदीर्घ काळापासून काहीं पाप आहे, किंवा तुम्हीं काहीं तरी चांगले कर्म करण्याकडें दुर्लक्ष करत आहात कारण तुम्हीं त्याच्याशी लढा न देताच विजय मिळवू पाहता, तर तुम्हीं तुमच्या आज्ञाभंगामध्यें वाढ करीत आहात. देव त्याच्या सामर्थ्याचा वापर तेव्हांच करतो, जेव्हां आपण आपल्यां इच्छेचा वापर करतो, व आपल्यां इच्छेद्वारें देवाचे सामर्थ्य आपल्यां चांगुलपणाच्या मनोदयातून – आपल्यां सदभावातून आणि योजना आणि उद्देश यातून कार्य करते.

यासाठींच, जे लोक देवाच्या सार्वभौमतेमध्यें विश्वास ठेवतात त्यांनी त्यांच्या इच्छांना पावित्र्यासाठीं झटण्याकरिता सहभागी करण्यास भिऊ नये. “अरुंद दरवाजाने आत जाण्याचा प्रयत्न करा, कारण मी तुम्हांला सांगतो कीं, पुष्कळ जण आत येण्याचा प्रयत्न करतील, पण त्यांना ते शक्य होणार नाहीं.” (लुक 13:24). केवळ विश्वासाने प्रयत्न करीत रहा, व आपल्यां प्रयत्नाद्वारें इच्छा करणे व कृती करणे हे तुमच्या ठायी आपल्यां सत्यसंकल्पासाठीं साधून देणारा तो देव आहे (फिलिप्पै 2:13).