ArchivesTruth For Life

11 अगस्त : सदाकाल का एक सिंहासन

Alethia4India
Alethia4India
11 अगस्त : सदाकाल का एक सिंहासन
Loading
/


“वरन् तेरा घराना और तेरा राज्य मेरे सामने सदा अटल बना रहेगा; तेरी गद्दी सदैव बनी रहेगी।” 2 शमूएल 7:16

परमेश्वर ने दाऊद के साथ वाचा बाँधी, यह प्रतिज्ञा करते हुए कि उसका राज्य सदा बना रहेगा। और फिर भी दाऊद के पुत्र सुलैमान के राज्य के बाद उसका राज्य विभाजित हो गया, और कुछ सौ वर्षों बाद ही उत्तरी राज्य और दक्षिणी राज्य दोनों नष्ट हो गए (2 राजाओं 17 और 25)।

जो लोग उसके बाद आई बन्धुवाई की पीढ़ियों में रहते थे, उनके लिए दाऊद से की गई परमेश्वर की प्रतिज्ञा एक परीकथा सी प्रतीत होती होगी। उनके अनुभव में किसी महान इस्राएली राज्य या राजा के उदय का कोई प्रमाण नहीं था। भजन 89, जो इसी समय में लिखा गया था, परमेश्वर की विश्वासयोग्यता से आरम्भ होता है परन्तु लोगों की विपत्तियों पर समाप्त होता है: “हे प्रभु, तेरी प्राचीनकाल की करुणा कहाँ रही, जिसके विषय में तू ने अपनी सच्चाई की शपथ दाऊद से खाई थी? हे प्रभु, अपने दासों की नामधराई की सुधि ले; मैं तो सब सामर्थी जातियों का बोझ लिए रहता हूँ” (भजन 89:49-50)। उस दुख और निराशा के सन्दर्भ में भविष्यद्वक्ताओं ने लोगों को स्मरण दिलाते हुए कहा, ठहरो! यद्यपि ऐसा प्रतीत नहीं होता कि परमेश्वर की प्रतिज्ञा अब भी प्रभाव में है, फिर भी आप निश्चय जानो कि वह है, क्योंकि उसकी वाचा की प्रेममय करुणा चिरस्थाई है। आगे और भी बहुत कुछ होना बाकी है। उन्होंने भविष्य के विषय में कहा:

क्योंकि हमारे लिए एक बालक उत्पन्न हुआ,
हमें एक पुत्र दिया गया है;
और प्रभुता उसके काँधे पर होगी,
और उसका नाम
अद्‌भुत युक्ति करने वाला पराक्रमी परमेश्‍वर,
अनन्तकाल का पिता, और शान्ति का राजकुमार रखा जाएगा।
उसकी प्रभुता सर्वदा बढ़ती रहेगी,
और उसकी शान्ति का अन्त न होगा,
इसलिए वह उसको दाऊद की राजगद्दी पर
इस समय से लेकर सर्वदा के लिए
न्याय और धर्म के द्वारा
स्थिर किए और सम्भाले रहेगा।
सेनाओं के यहोवा की धुन के द्वारा यह हो जाएगा। (यशायाह 9:6-7)

भविष्यद्वक्ताओं ने कहा, अभी भी एक और स्थान, एक और नाम, एक और विश्राम, एक और राज्य, और एक और सिंहासन आने वाला है। परमेश्वर की प्रजा की असफलताओं का यह अर्थ नहीं था कि परमेश्वर ने अपनी प्रतिज्ञा को भुला दिया है। यह सब यीशु में पूरा होना था।

इतिहास अपने आप को दोहराता है। चाहे बीमारी, उत्पीड़न, राजनीति या शोक के कारण हो, हम कभी-कभी अपने आप को उसी भ्रम की स्थिति में पाएँगे जिसकी वाणी भजन 89 देता है। ऐसे समय में (जो वास्तव में यीशु के लौटने से पहले का सारा समय है), हमें भविष्यद्वाणी की आवाज़ों की आवश्यकता होती है जो हमें परमेश्वर की वाचा की विश्वासयोग्यता स्मरण दिलाएँ—कि हमारा प्रभु अभी भी और सदा के लिए अपने सिंहासन पर राज्य करता है। इसलिए आज हियाव रखें। आपकी असफलताओं का अर्थ यह नहीं है कि परमेश्वर ने अपनी प्रतिज्ञा को भुला दिया है। आगे और भी बहुत कुछ होना बाकी है।

भजन 89
◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 81– 83; 1 पतरस 1

10 अगस्त : परिवार में सब

Alethia4India
Alethia4India
10 अगस्त : परिवार में सब
Loading
/


“लुदिया नामक थुआथीरा नगर की बैंजनी कपड़े बेचने वाली एक भक्त स्त्री सुन रही थी। प्रभु ने उसका मन खोला कि वह पौलुस की बातों पर चित्त लगाए। जब उसने अपने घराने समेत बपतिस्मा लिया, तो उसने हम से विनती की, ‘यदि तुम मुझे प्रभु की विश्वासिनी समझते हो, तो चलकर मेरे घर में रहो,’ और वह हमें मनाकर ले गई।” प्रेरितों 16:14-15

जब परमेश्वर किसी को छुड़ाता है, तो वह उसे न केवल अपने साथ सम्बन्ध में लाता है, परन्तु उन सब के साथ भी जो प्रभु का नाम लेते हैं। वह यह कैसे करता है? प्रेरितों के काम 16 हमें लुदिया के रूप में इसका एक उदाहरण देता है।

लुदिया एक सम्मानित स्त्री प्रतीत होती है। “एक भक्त स्त्री” होने के कारण उसमें कुछ धार्मिक रुचि थी, और “बैंजनी कपड़े बेचने वाली” होने के कारण वह निश्चय ही एक चतुर व्यवसायी थी। उसका जीवन शायद जैसा था वैसा ही ठीक लगता था। और फिर भी जब उसने सुसमाचार सुना, तो वह केवल धार्मिक रुचि से आगे बढ़कर यीशु मसीह के साथ एक सच्चे सम्बन्ध में आ गई, जिसके परिणामस्वरूप उसने अपने नए आत्मिक परिवार के लिए प्रेमपूर्वक अपने साधनों का उपयोग किया।

उसका जीवन बदल देने वाला क्षण यह था: “प्रभु ने उसका मन खोला कि वह पौलुस की बातों पर चित्त लगाए।” बस यही! यही पूरी प्रक्रिया है: प्रभु ने उसका मन विश्वास करने के लिए खोला, और उसने विश्वास किया। उसी क्षण लुदिया परमेश्वर के परिवार में सम्मिलित हो गई। और इससे भी बढ़कर, उसने तुरन्त ही मसीह में अपने भाइयों और बहनों की सेवा के लिए अपने घर को खोल दिया।

लुदिया की कहानी हमें स्मरण दिलाती है कि जो बात एक व्यक्ति के मन फिराव के बुलावे से आरम्भ होती है, उसे सदा परमेश्वर के परिवार में सहभागिता की ओर बढ़ना चाहिए। रोमियों 8:15-16 बताता है कि हम में से प्रत्येक को विश्वास के द्वारा उसके पास आने पर परमेश्वर द्वारा गोद लिया जाता है, परन्तु यह भी कहता है कि साथ मिलकर “हम परमेश्वर की सन्तान हैं।” आपस में हमारा सम्बन्ध इस तथ्य पर आधारित है कि हमारा यीशु के साथ सम्बन्ध है, और यीशु के साथ हमारा सम्बन्ध हमें एक-दूसरे के साथ सम्बन्ध में स्थापित करता है।

जैसे एक भौतिक परिवार में होता है, वैसे ही हम अपने आत्मिक बहनों या भाइयों को चुन नहीं सकते। (यदि हम ईमानदार हों, तो शायद हम में से कुछ को वापस करके फिर से प्रयास करना चाहेंगे—हालाँकि, निस्सन्देह, वे भी हमारे विषय में यही कह सकते हैं!) आपकी कलीसिया के अन्य सदस्य परमेश्वर की सम्प्रभु इच्छा के अनुसार वैसे ही हैं जैसे वे हैं। हमारे भेदों पर ध्यान देना आसान है, परन्तु परमेश्वर के परिवार का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष वह नहीं है जो हमें एक-दूसरे से अलग करता है, बल्कि वह है जो हम साझा करते हैं: कि परमेश्वर ने हमारे हृदयों को सुसमाचार ग्रहण करने के लिए खोला है और अब हमें एक साथ उसकी आराधना करने और उसका अनुसरण करने के लिए बुलाता है।

यदि प्रभु ने आपका हृदय खोला है, तो आप एक नए परिवार के सदस्य हैं। यह किसी भी प्रकार से पूर्ण परिवार नहीं है, और झगड़े तथा असहमतियाँ हो सकती हैं। परन्तु यीशु फिर भी आपको आपके भाइयों और बहनों से प्रेम करने के लिए बुलाता है, चाहे आपकी असहमतियाँ कितनी ही क्यों न हों। आखिरकार, वह उनसे इतना प्रेम करता है कि उनके लिए मरा। इसलिए वह आपको बुलाता है कि जो आप हैं और जो आपके पास है, उसे इस परिवार की सेवा में लगा दें। आप अपना समय, अपना घर, और अपने साधनों का उपयोग इस प्रकार कैसे करेंगे कि आपसी प्रेम आपकी कलीसिया में दिन-प्रतिदिन अधिक स्पष्ट पारिवारिक पहचान बनता जाए?

1 यूहन्ना 3:11-18
पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 79– 80; प्रेरितों 28 ◊

9 अगस्त : अपने उद्धार को सिद्ध करो

Alethia4India
Alethia4India
9 अगस्त : अपने उद्धार को सिद्ध करो
Loading
/


“इसलिए हे मेरे प्रियो, जिस प्रकार तुम सदा से आज्ञा मानते आए हो, वैसे ही अब भी न केवल मेरे साथ रहते हुए पर विशेष करके अब मेरे दूर रहने पर भी डरते और काँपते हुए अपने-अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाओ।” फिलिप्पियों 2:12

हर माता-पिता जानता है कि जब एक बच्चे को कोई उपहार दिया जाता है जिसमें विस्तृत निर्देश होते हैं, तब क्या होता है। बच्चा वहाँ बैठकर पन्नों को घूरता है, यह समझने की कोशिश करता है कि इसे कैसे जोड़ा जाए। उस समय उपहार उसे प्राप्त हो गया है; अब उसे यह पता लगाना है कि इसका क्या करना है।

जब हम यीशु मसीह में विश्वास पाते हैं, तब हम उद्धार को एक उपहार के रूप में प्राप्त करते हैं—और फिर हम अपना शेष जीवन परमेश्वर के वचन द्वारा यह सीखने में बिताते हैं कि इसे कैसे उपयोग करना है: नई सृष्टि के रूप में कैसे जीना है। कभी-कभी हम चाहते हैं कि यह एक त्वरित परिवर्तन हो, जिसमें सब कुछ तुरन्त स्पष्ट हो जाए। परन्तु परमेश्वर ने इसे इस प्रकार नहीं रचा है। बल्कि, मसीही जीवन एक आनन्दपूर्ण—और कभी-कभी दुखद—खोज की यात्रा है।

और इसलिए पौलुस हमें आदेश देता है कि हम अपने उद्धार “का कार्य पूरा करते” जाएँ। वह यह नहीं कह रहा कि हमें अपने उद्धार के लिए कार्य करना है। वह उन अच्छे कर्मों के विषय में नहीं सोच रहा जिन्हें हमें उद्धार को प्राप्त करने या बनाए रखने के लिए करना है, बल्कि यह है कि हम उस उद्धार के प्रति कैसे उत्तर दें जो मसीह में पहले से ही हमारा हो चुका है। वह यह नहीं बता रहा कि उद्धार कैसे प्राप्त करें, बल्कि यह कि उद्धार प्राप्त व्यक्ति के रूप में कैसा जीवन जीएँ। एक बार जब हम इसे समझ लेते हैं, तब हम पौलुस की आज्ञा पर कार्य करने की स्थिति में हो जाते हैं।

अपने उद्धार को सिद्ध करने का आह्वान, सततता का आह्वान है। जिस प्रकार हमने अपने मसीही जीवन के आरम्भ में प्रभु के नाम को उद्धार के लिए पुकारा था, उसी प्रकार हमें निरन्तर उसके नाम को पुकारते रहना है। यह हमारे जीवन में बहुत ही सामान्य, व्यवहारिक रूपों में प्रकट होता है। हम प्रार्थना में परमेश्वर के सम्मुख आते रहते हैं। हम उपासना के लिए साथी विश्वासियों के साथ इकट्ठा होते रहते हैं। हम उसके वचन से सुनते रहते हैं। हम उसके अनुग्रह में चलने का प्रयास करते रहते हैं, पाप को मारते रहते हैं और आत्मिक फल में बढ़ते रहते हैं। हम मसीही जीवन में परिश्रम करते रहते हैं, क्योंकि हम जानते हैं कि कोई भी विश्वासपूर्ण व्यक्ति आकस्मिक रूप से परिपक्व नहीं होता।

यह सामान्य है कि अपने आप को मसीही कहने वाले कई लोग छः दिन अपने मन अनुसार जीवन जीते हैं और रविवार को कलीसिया जाकर स्वयं को बेहतर महसूस करते हैं; या अधिकतर क्षेत्रों में आज्ञाकारी जीवन जीते हैं, परन्तु एक या दो क्षेत्र अपने लिए रखते हैं और उन्हें यीशु के आधिपत्य में नहीं डालते। यह मसीही जीवन नहीं है। परमेश्वर का अनुग्रह हमें यह करने की स्वतन्त्रता देने के लिए नहीं है कि हम जैसा चाहें वैसे जीएँ, बल्कि यह ईश्वर सद्‌गुणपूर्ण सतत जीवन को प्रोत्साहित करता है। अनुग्रह हमें आज्ञाकारिता से मुक्त नहीं करता; बल्कि यह हमारी आज्ञाकारिता को सम्भव बनाता है। और इसलिए, इसी अनुग्रह के द्वारा, और मसीह में परमेश्वर द्वारा दिए गए उद्धार के उपहार के उत्तर में, हम अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाते हैं—हमारे अनन्त आनन्द और उसकी शाश्वत महिमा के लिए। आज, आपको अपने उद्धार के लिए कार्य करने की आवश्यकता नहीं है—मसीह का पूर्ण कार्य पहले ही इसे आपके लिए सुनिश्चित कर चुका है। परन्तु आज, आपसे यह आह्वान है कि आप अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाएँ, ताकि यह आपको अधिकाधिक आकार दे।

कुलुस्सियों 2:6-7
◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 77–78; प्रेरितों 27:27-44

8 अगस्त : सच्ची उपासना का स्रोत

Alethia4India
Alethia4India
8 अगस्त : सच्ची उपासना का स्रोत
Loading
/


“उसने कहा, ‘हे प्रभु, मैं विश्‍वास करता हूँ।’ और उसे दण्डवत् किया।” यूहन्ना 9:38

जब यीशु ने उसे पहली बार पाया, तब यूहन्ना अध्याय नौ का वह अन्धा भिखारी असहाय और निराश था। फिर वह परमेश्वर के अलौकिक हस्तक्षेप का विषय बना, और उसकी दृष्टि लौटा दी गई। परिणामस्वरूप, उसका जीवन एक ओर सुधर गया, और दूसरी ओर कठिन भी हो गया; क्योंकि अपनी दृष्टि लौटाए जाने के कारण ही उसे अपने माता-पिता का सहारा न मिला, फरीसियों द्वारा प्रश्नों की आग में झोंका गया, अपने विश्वास के लिए अपमानित किया गया, और अन्ततः आराधनालय से बाहर निकाल दिया गया। परन्तु जब यीशु ने उसे खोजकर उससे बातें कीं, तब जो कुछ उसने खोया था, वह सब उसके सामने तुच्छ हो गया, क्योंकि उसने उस जन को प्राप्त कर लिया था जो सब योग्यताओं से बढ़कर है; और इसलिए वह अपने उद्धारकर्ता के चरणों में गिरकर भक्ति से उसकी उपासना करने लगा।

यूहन्ना अध्याय नौ का प्रारम्भ एक ऐसे मनुष्य से होता है जो निराशा और असहायता में खोया हुआ है; परन्तु इस अध्याय का अन्त उस मनुष्य पर होता है जो अब और सदा-सर्वदा के लिए वैसा ही रहेगा: मसीह, उद्धारकर्ता, और राजाओं के राजा का उपासक।

वास्तव में यह मनुष्य उस कथन की पूर्ति है जो इससे पहले यीशु ने कुएँ के पास उस सामरी स्त्री से कहा था। यीशु ने उससे कहा था, “वह समय आता है, वरन् अब भी है, जिसमें सच्चे भक्त पिता की आराधना आत्मा और सच्चाई से करेंगे, क्योंकि पिता अपने लिए ऐसे ही आराधकों को ढूँढ़ता है” (यूहन्ना 4:23)। वह अन्धा भिखारी यीशु द्वारा खोजा गया, उसकी दृष्टि बहाल हुई, उसका मन सिखाया गया, और उसका जीवन रूपान्तरित किया गया। और जो कुछ उसे दिया गया, उसके साथ वह क्या बना? एक उपासक!

उपासना का अभाव, विश्वास के अभाव का परिणाम होता है। उस अन्धे भिखारी ने कहा, “हे प्रभु, मैं विश्वास करता हूँ,” और फिर उसने उपासना की। यदि आप उपासक नहीं हैं, तो आप कठिन प्रयास करके स्वयं को उपासक नहीं बना सकते। बल्कि जाँच करें कि आप वास्तव में विश्वास करते हैं या नहीं! यदि आप इस बात पर विश्वास में आ चुके हैं कि पिता ने मसीह के दुख-भोग को उन सब के लिए प्रायश्चित्त-बलिदान के रूप में स्वीकार किया है जो उस पर भरोसा रखते हैं, तब आप समझ जाएँगे कि यह मनुष्य क्यों यीशु के सम्मुख गिर पड़ा। यहाँ हम उपासना की किसी शैली या गीत गाने की गुणवत्ता की बात नहीं कर रहे; यदि आप मसीह में हैं, तो उपासना एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है, और स्तुति आपके जीवन के हर पक्ष में एक वास्तविकता बन जाती है।

जो पुरुष और स्त्रियाँ स्वयं को मसीह के चरणों में डाल देते हैं, वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि यीशु कौन है, वह क्यों आया, और उसने उनके लिए क्या किया है। मसीह की महिमामय स्तुति हमारे विषय में और उन गीतों के विषय में नहीं है, जिन्हें हम गाना चाहते हैं; यह परमेश्वर के विषय में है, और उसके नाम को महिमा देने के विषय में है।

क्या परमेश्वर के प्रति आपका प्रेम ठण्डा पड़ गया है? क्या स्तुति और उपासना आपके लिए आनन्द की अपेक्षा एक बोझ बन गई है? जब ऐसे भाव उत्पन्न हों, तो एकमात्र उपाय है—अपनी दृष्टि को फिर से मसीह पर स्थिर करें। उसके क्रूस पर किए गए पूर्ण कार्य को अपने मन में ताज़ा स्मरण करें; तब उस अन्धे भिखारी की भाँति आप भी मसीह की उपासना में उमड़ पड़ेंगे।

मरकुस 10:46-52
पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 74–76; प्रेरितों 27:1-26 ◊

7 अगस्त : महिमा का भार

Alethia4India
Alethia4India
7 अगस्त : महिमा का भार
Loading
/


“ज्योंही उसने परमेश्‍वर के सन्दूक का नाम लिया त्योंही एली फाटक के पास कुर्सी पर से पछाड़ खाकर गिर पड़ा; और बूढ़ा और भारी होने के कारण उसकी गर्दन टूट गई, और वह मर गया। उसने तो इस्राएलियों का न्याय चालीस वर्ष तक किया था।” 1 शमूएल 4:18

बाइबल में बहुत अधिक स्थान ऐसे नहीं हैं जहाँ किसी के भार का उल्लेख किया गया हो! अतः यह वचन हमें उसके महत्त्व पर ठहरकर विचार करने को बाध्य करता है। ऐसा प्रतीत हो सकता है कि एली के भारी होने का उल्लेख केवल उसकी मृत्यु की भौतिक परिस्थिति को समझाने के लिए है; परन्तु यह उससे अधिक गहरा है।

इससे पहले, 1 शमूएल 2:12-17 में, लेखक बताता है कि एली के पुत्रों की एक प्रथा थी कि वे बलिदान के लिए प्रस्तुत माँस में अपना तीन नोक वाला काँटा डालकर, उस माँस में से अपने और अपने परिवार के लिए भाग निकाल लेते थे—उस माँस में से जो केवल परमेश्वर का था। वे उस तम्बू का—जिसे परमेश्वर ने अपनी प्रजा के बीच अपने वास के लिए ठहराया था—तिरस्कार करते थे, और यह ठहराते थे कि उनके अपने सांसारिक आकर्षण और स्वार्थपूर्ण अभिलाषाएँ परमेश्वर की महिमा से बढ़कर हैं। एक प्रकार से कहा जाए, तो परमेश्वर की महिमा को लूटकर एली के पेट के चारों ओर बाँध दिया गया था (पद 29)। उसका मोटापा शीलो में याजकों द्वारा किए जा रहे और बढ़ाए जा रहे उस पाप का बाहरी चित्र था।

यह बात मूल इब्रानी भाषा में और भी स्पष्ट है, जहाँ “भारी” के लिए प्रयुक्त शब्द काबेद है। यही शब्द काबोद का क्रियात्मक रूप है, जिसका अर्थ “महिमा” है। लेखक यहाँ शब्द-खेल का प्रयोग करता है, यह दिखाने के लिए कि जब मनुष्य—अपने आप से और अपने महत्त्व से चिपटे हुए—परमेश्वर की महिमा को हड़पने का प्रयास करते हैं, तब वे व्यवहार में यह मान लेते हैं कि परमेश्वर हल्का है और उसे वे अपनी इच्छा के अनुसार चला सकते हैं। और इस प्रकार स्वयं को भारी समझते हुए वे हर बात में प्रधानता पाना चाहते हैं।

किन्तु अन्ततः एली के जीवन का सूर्य अस्त हुआ—या कहें कि घटनाएँ एली पर टूट पड़ीं—और वह एक दुखदायी मौत मर गया। वह अब बाइबल में उन कई व्यक्तियों में से एक है, विशेषकर याजकीय या पासबानीय कार्यक्षेत्र में, जो पौलुस के इन वचनों में निहित चेतावनी का प्रत्यक्ष उदाहरण हैं: “इसलिए जो समझता है, ‘मैं स्थिर हूँ,’ वह चौकस रहे कि कहीं गिर न पड़े” (1 कुरिन्थियों 10:12)।

यह बुद्धि केवल उन व्यक्तियों के लिए नहीं है जो स्वयं को अजेय समझते हैं—यद्यपि यह उनके लिए निश्चित ही है। यह परमेश्वर की समस्त सभा के लिए भी एक प्रखर चेतावनी है। आइए हम इस विचार से भी घृणा करें कि कहीं हमारी कलीसियाओं में हम परमेश्वर की योग्य महिमा में से कुछ लेकर अपनी सेवा करवाने, अपने को सुख देने, या अपने को बढ़ाने में न लगा दें। इस रविवार जब आप अपनी कलीसिया की ओर जाएँ, तो स्मरण रखें कि आप वहाँ सर्वप्रथम और सर्वोपरि अपने महान, पारलौकिक, महिमामय प्रभु की महिमा करने और उसकी प्रजा को उत्साहित करने के लिए जा रहे हैं—न कि अपने लिए।

1 इतिहास 16:8-34
◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 72–73; प्रेरितों 26

6 अगस्त : वह मनोभाव जो एकता उत्पन्न करता है

Alethia4India
Alethia4India
6 अगस्त : वह मनोभाव जो एकता उत्पन्न करता है
Loading
/

“जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो; जिसने परमेश्‍वर के स्वरूप में होकर भी परमेश्‍वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा। वरन् अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया। और मनुष्य के रूप में प्रगट होकर अपने आप को दीन किया, और यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हाँ, क्रूस की मृत्यु भी सह ली।” फिलिप्पियों 2:5-8

कलीसिया विभिन्न पृष्ठभूमि, व्यक्तित्वों और अनुभवों वाले लोगों का एक समूह है—या कम से कम होना चाहिए। परन्तु फिर भी, हम “सब मसीह यीशु में एक” हैं (गलातियों 3:28)। यदि यह सत्य केवल एक नारा न होकर अनुभव का पक्ष बने, तो यह अत्यन्त आवश्यक है कि बाइबल इस विषय में जो कहती है उस पर हम ध्यान दें, कि कौन-सा मनोभाव एकता उत्पन्न करता है। मूल रूप से, पौलुस दिखाता है कि एकता उस समय उत्पन्न होती है, जब हम अपना ध्यान परमेश्वर के पुत्र की दीनता पर केन्द्रित करते हैं।

पौलुस हमें उस थियोलॉजिकल नींव की ओर ले जाता है जो दीनता उत्पन्न करती है, यह बताकर कि यीशु ने अपने आप को कैसे दीन किया: “जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो; जिसने परमेश्‍वर के स्वरूप में होकर भी . . .।” यीशु अनन्तकाल से पूर्ण परमेश्वर है। कभी ऐसा समय नहीं हुआ जब वह परमेश्वर नहीं था। यहाँ से आरम्भ करके, पौलुस मसीह की दीनता का विस्तार स्पष्ट करता है। यद्यपि यीशु पूर्ण परमेश्वर है, तौभी उसने “परमेश्‍वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा।” “स्वर्ग का सर्वोच्च स्थान उसका सार्वभौम अधिकार है,” परन्तु अपनी चिरस्थाई महिमा के ऊपर उसने एक और प्राथमिकता रखी—अपनी स्वेच्छा से और जानबूझकर उन विशेषाधिकारों को त्याग देना जो परमेश्वर के तुल्य होने के कारण उसके थे। केवल इतना ही नहीं, यीशु ने और अधिक दीन होकर अपने आप को “शून्य” बनाया। उसने यह अपने ईश्वरत्व को घटाकर नहीं, वरन् मानवता को जोड़कर किया—उसने “दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया।” वह पृथ्वी पर उतना ही दास बन गया जितना वह स्वर्ग में अधिपति था।

परन्तु तब भी उसकी दीनता पूर्ण नहीं हुई थी। उसने अपने आप को इतना दीन किया और “यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हाँ, क्रूस की मृत्यु भी सह ली।” उसने शिशु के रूप में जन्म लेने, मनुष्य के रूप में जीवन बिताने, तिरस्कृत होकर दुख उठाने, और अपराधी के समान मरने का चयन किया। उसने स्वर्गदूतों की आराधना को त्याग कर मनुष्यों की घृणा को स्वीकार किया। क्या आप देख सकते हैं कि सम्पूर्ण विश्व के धर्मों में यह कितना अद्वितीय है? ऐसा कहीं और नहीं है!

पहली दृष्टि में ये बातें केवल दूरस्थ सिद्धान्त प्रतीत हो सकती हैं, परन्तु वास्तव में यह दीनता हमारी कलीसिया के भीतर के दैनिक व्यवहार और मनोभावों को रूपान्तरित करती है। जब हम यह अद्‌भुत और अगम्य सत्य देखते हैं कि समस्त सृष्टि का सृष्टिकर्ता इस संसार में उतरा, हमारे समान मानवता को ग्रहण किया, हमारे साथ चला, हमारे धूल भरे मार्ग को छूआ—और उसने यह सब हमारे लिए किया—तब हम समझ पाते हैं कि हमें अपने सहविश्वासियों को कैसे देखना चाहिए। परमेश्वर का वचन हमें आदेश देता है, “जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो।” आप दूसरों की आवश्यकताओं पर कैसे ध्यान देंगे? आप उन्हें अपने से अधिक कैसे मानेंगे? यह मनोभाव आपकी प्रार्थनाओं और आपके दिन के व्यवहार को कैसे दिशा देगा?

याकूब 2:1-5
पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 70–71; प्रेरितों 25 ◊

5 अगस्त :सर्वशक्तिमान की सेवा

Alethia4India
Alethia4India
5 अगस्त :सर्वशक्तिमान की सेवा
Loading
/

“तुम परमेश्‍वर को किसके समान बताओगे और उसकी उपमा किस से दोगे? . . . यह वह है जो पृथ्वी के घेरे के ऊपर आकाशमण्डल पर विराजमान है, और पृथ्वी के रहने वाले टिड्डी के तुल्य हैं; जो आकाश को मलमल के समान फैलाता और ऐसा तान देता है जैसा रहने के लिए तम्बू ताना जाता है; जो बड़े-बड़े हाकिमों को तुच्छ कर देता है, और पृथ्वी के अधिकारियों को शून्य के समान कर देता है।” यशायाह 40:18, 22-23

एक मसीही का अधिकार से क्या सम्बन्ध होना चाहिए?

एक ओर, हमें मानवीय अधिकार का तिरस्कार नहीं करना चाहिए क्योंकि हम यह जानते हैं कि उसकी स्थापना के पीछे परमेश्वर है। यदि हम यह कहें कि बाइबल शासकों को गिराने की कोई क्रान्तिकारी पुस्तक है, तो हमें पवित्रशास्त्र के बहुत से भागों को निकाल देना पड़ेगा। परन्तु दूसरी ओर, हम यह भी समझते हैं कि कोई भी मानवीय अधिकार अन्तिम या स्थाई नहीं है। परमेश्वर नेताओं के उठाए जाने और उनके गिराए जाने दोनों का विधान करता है। चाहे वे किसी क्षण, किसी काल, या एक जीवनकाल तक कितने ही शक्तिशाली क्यों न प्रतीत हों, थोड़े समय बाद उनकी शक्ति नष्ट हो जाती है और प्रायः संसार उन्हें स्मरण भी नहीं करता।

हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि हम अन्ततः किसकी सेवा करते हैं—उस सर्वसत्ताधारी परमेश्वर की, जिसके सामने सब शासक “टिड्डियों” के समान हैं। इसलिए जब मनुष्य का अधिकार परमेश्वर के अधिकार का विरोध करता है, तो हमें प्रेरितों के साथ मिलकर यह पूछना चाहिए, “क्या यह परमेश्‍वर के निकट भला है कि हम परमेश्‍वर की बात से बढ़कर तुम्हारी बात मानें” (प्रेरितों 4:19)—और उत्तर भी वही देना चाहिए, जो उन्होंने दिया था।

प्रेरितों के काम अध्याय 4 में, एक लँगड़े मनुष्य को चंगा करने के कारण प्रेरित एक रात कारागार में रहते हैं। वहाँ से रिहा होने पर वे अन्य विश्वासियों के साथ इकट्ठे होकर सही दृष्टिकोण पुनः प्राप्त करते हैं, यह स्मरण करके कि वे उस प्रभु की सेवा करते हैं जो पृथ्वी, समुद्र, और जो कुछ उनमें है, सबका सृष्टिकर्ता है (प्रेरितों 4:24-26)। इस सत्य को लागू करते हुए वे पहचानते हैं कि चाहे वे रोमी शासनाधिकार के अधीन हों और यहूदी धर्म-नेताओं के उत्पीड़न का सामना कर रहे हों, तो भी ये नेता वही कर रहे हैं जिसे “पहले से तेरी सामर्थ्य और मति से ठहरा था” (पद 28); और वे स्वयं उस उद्धार के सुसमाचार को पृथ्वी की छोर तक प्रचार करने के लिए स्वयं राजा यीशु द्वारा नियुक्त किए गए हैं। इस दृष्टिकोण के साथ, वे निर्भीकता से सुसमाचार को साझा करते रहते हैं।

क्या यही बात हमारे समय में हमारे विषय में कही जा सकती है? क्या हम परमेश्वर की आज्ञा मानकर मसीह को बाँटेंगे, भले ही पृथ्वी के शासक हमें मौन रहने या समझौता करने को कहें?

वह क्या है जो हमें मौन करता है? एक उत्तर यह है कि हम कितनी शीघ्रता से भूल जाते हैं कि परमेश्वर सर्वसत्ताधारी है, और राष्ट्र और शासक उसके अधीन हैं। जब यह स्मरण लुप्त हो जाता है, तो हम उस राजनीतिक शिष्टाचार में फँस जाते हैं जो हमें बढ़ते हुए भय से भर देता है और यह प्रचार करने से रोकता है कि यीशु मसीह ही एकमात्र उद्धारकर्ता है। तो क्या आपने यीशु के राजकीय शासन की दृष्टि खो दी है? क्या वे शासक जो आपके प्रभु की दृष्टि में टिड्डियों के समान हैं, आपके लिए अत्यधिक बड़े दिखाई देते हैं, जिससे आप यह ठहराने लगते हैं कि किसकी सुनें और कैसे जीवन जीएँ? तब प्रारम्भिक विश्वासियों के साथ जुड़कर यह स्मरण करें, यह पहचानें, और यह घोषित करें कि परमेश्वर सबका अद्वितीय सृष्टिकर्ता है, और अन्तिम अधिकार उसी का है।

  दानिय्येल 6:1-28

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 68– 69; प्रेरितों 24

4 अगस्त: सच्चा सेवा-भाव

Alethia4India
Alethia4India
4 अगस्त: सच्चा सेवा-भाव
Loading
/


“जिसकी दुलहिन है, वही दूल्हा है; परन्तु दूल्हे का मित्र जो खड़ा हुआ उसकी सुनता है, दूल्हे के शब्द से बहुत हर्षित होता है : अब मेरा यह हर्ष पूरा हुआ है। अवश्य है कि वह बढ़े और मैं घटूँ।” यूहन्ना 3:29-30

कुछ लोग यह दावा करते हैं कि वे शारीरिक हाव-भाव पढ़ने के विशेषज्ञ हैं। वे दूसरों के शरीर और हाथों की अवस्थाओं तथा उनके मुख के भावों से यह पता लगा लेते हैं कि वे क्या सन्देश देना चाह रहे हैं। यह कौशल उपयोगी हो सकता है, विशेषकर यह जानने—या कम से कम जानने के निकट पहुँचने—के लिए कि कोई व्यक्ति सच्चा है या झूठा।

परन्तु ऐसे भी कई प्रकार हैं जिनमें मसीही लोग अपने आप को ऐसे झूठे आचरण में ला सकते हैं जिसे शारीरिक हाव-भाव पढ़ने वाले विशेषज्ञ भी नहीं समझ सकते। यह एक दुखद सत्य है कि भिन्न-भिन्न प्रेरणाएँ लोगों को मसीह के नाम में सेवा करने को प्रेरित करती हैं। कुछ लोग दूसरों की भलाई के लिए सच्चे मन से नहीं, वरन् स्वार्थ की प्रेरणा से सेवा करते हैं। वे चाहे ध्यान आकर्षित करना चाहते हों, या पीठ थपथपाए जाने की लालसा रखते हों, या एक अच्छी प्रतिष्ठा बनाना चाहते हों। ऐसी प्रेरणा से भले ही कुछ अच्छे कार्य हो जाएँ, परन्तु यह सच्ची सेवा को उत्पन्न नहीं करती। दूसरे शब्दों में, मसीही सेवा झूठी भी हो सकती है। दूर से वह वास्तविक प्रतीत होती है, परन्तु निकट आने पर उसमें अभाव मिलता है।
तो फिर हम कैसे जानें कि क्या वास्तविक है? वास्तविक सेवा-भाव के दो चिह्न हैं जिन पर हमें अपने भीतर भी ध्यान देना है और दूसरों में भी।
पहला है गोपनीयता में सेवा करने की इच्छा। यह वह सेवा है जो ध्यान पाए बिना अच्छा करने में आनन्दित होती है। स्वयं प्रभु यीशु ने कहा, “जो स्त्रियों से जन्मे हैं, उनमें से यूहन्ना से बड़ा कोई नहीं” (लूका 7:28)—फिर भी बपतिस्मा देने वाले यूहन्ना ने स्वयं को घटाकर मसीह की महिमा देखनी चाही। और यह वही भावना है जिसे उसने इन स्मरणीय शब्दों में कहा, “अवश्य है कि वह बढ़े और मैं घटूँ।”

दूसरा है सच्चाई का होना। प्रेरित पौलुस ने कहा कि उसका सहकर्मी तीमुथियुस फिलिप्पियों की भलाई के लिए “शुद्ध मन से तुम्हारी चिन्ता” करता था, उन लोगों के विपरीत जो “अपने स्वार्थ की खोज में रहते हैं” (फिलिप्पियों 2:20-21)। इसी प्रकार इपफ्रुदीतुस भी कलीसिया की भलाई के लिए “व्याकुल” रहता था (पद 26)। ऐसी व्याकुलता नकली नहीं हो सकती; वह सच्चे प्रेम से उत्पन्न होती है।

बहुत वर्ष पूर्व एक प्रचारक ने कहा था कि वह “परमेश्वर का दौड़-दौड़कर काम करने वाला दास” बनने में सन्तुष्ट है। क्या आप भी यह बात सत्यनिष्ठा से कह सकते हैं? क्या आप घटने में आनन्दित हो सकते हैं यदि उससे मसीह की महिमा बढ़ती है? क्या आपको दूसरों की भलाई के लिए वास्तविक चिन्ता—यहाँ तक कि व्याकुलता—है? हमारे आस-पास के लोग शायद न जान सकें कि हमें क्या प्रेरित करता है, परन्तु हमारा उद्धारकर्ता, जिसकी सेवा का हम दावा करते हैं, अवश्य जानता है।

यह सम्भवतः एक अच्छा अवसर है कि हम प्रार्थना में पौलुस के उदाहरण पर विचार करें, जिसने कहा, “मैं अपने प्राण को कुछ नहीं समझता कि उसे प्रिय जानूँ, वरन् यह कि मैं अपनी दौड़ को और उस सेवा को पूरी करूँ, जो मैंने परमेश्‍वर के अनुग्रह के सुसमाचार पर गवाही देने के लिए प्रभु यीशु से पाई है” (प्रेरितों 20:24)। परमेश्वर से यह अनुग्रह माँगें कि हम इन वचनों को सच्चाई से दोहरा सकें। कौन जानता है कि वह एक ऐसे जीवन के साथ क्या कर सकता है जो आपने पूर्ण रीति से उसे समर्पित कर दिया है?

1 कुरिन्थियों 3:5-15
पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 66– 67; प्रेरितों 23:16-35 ◊

3 अगस्त : मसीह जैसा स्वभाव

Alethia4India
Alethia4India
3 अगस्त : मसीह जैसा स्वभाव
Loading
/


“विरोध या झूठी बड़ाई के लिए कुछ न करो, पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो। हर एक अपने ही हित की नहीं, वरन् दूसरों के हित की भी चिन्ता करे। जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो।” फिलिप्पियों 2:3-5

किसी अनुचित शब्द या एक कठोर दृष्टि में भी विभाजन उत्पन्न करने का बड़ा सामर्थ्य होता है। हम सब जानते हैं कि कितनी सरलता से मित्रता जैसी मूल्यवान वस्तु सिर्फ एक छोटे-से अपराध से भी टूट सकती है। और यदि हम ऐसे टूटेपन की जड़ तक जाएँ, तो हमें प्रत्येक स्थान पर एक ही कारण दिखाई देगा: अहंकार और स्वयं को ऊपर उठाने की प्रवृत्ति। हम कितनी सहजता से कह देते हैं, “यदि वह सोचती है कि मैं क्षमा माँगने जा रहा हूँ, तो यह उसकी गलतफहमी है!” या “यदि वह चाहता है कि पहले मैं माफी माँगूँ, तो वह पहले कुछ करे! झगड़ा मैंने शुरू नहीं किया था, इसलिए मुझे उसे खत्म करने की जरूरत भी नहीं।”

जब प्रेरित पौलुस ने फिलिप्पी की कलीसिया को लिखा, तो उसका सबसे गहरा चिन्तन उनके स्वभाव पर था। वह चाहता था कि विश्वासियों के मध्य कोमलता, सामंजस्य और एकता बनी रहे। एक कलीसियाई परिवार के रूप में उनमें हृदय, मन, और उद्देश्य की एकता अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थी, विशेषकर तब जब बाहर की संस्कृति का दबाव उन्हें मसीह का इनकार करने या उसकी आज्ञाओं से समझौता करने की ओर धकेल रहा था।
एकता का भाव उत्पन्न करने के लिए पौलुस ने उन्हें किसी “सात सिद्धान्तों की सूची” नहीं दी। बल्कि उसने उन्हें उस आधार की ओर संकेत किया जिस पर हर सच्चा सामंजस्य टिका है: दीनता। और दीनता को दिखाने का सर्वोत्तम तरीका क्या है?—उनकी दृष्टि मसीह पर ले जाना! पौलुस जानता था कि यदि वे केवल यीशु को देखते, तो उन्हें उस दीनता का प्रतिरूप दिखाई देता जो उनके सोचने, बोलने और चलने की रीति को परिवर्तित कर सकता था।

कलीसिया में हमारी भी यही प्रार्थना होनी चाहिए कि लोग हमारे सम्बन्धों को देखकर कहें: “ये लोग कितने एक मन हैं! इनमें कितनी मसीही कोमलता है। ये सब एक-दूसरे के लिए, और सबसे बढ़कर मसीह के लिए जीते प्रतीत होते हैं। उनका स्वभाव एकदम मसीह जैसा है। मुझे हैरानी है कि ये लोग ऐसे कैसे बन पाए हैं?”

हम अपने ही सामर्थ्य से दीनता उत्पन्न नहीं करते; बल्कि हम पवित्र आत्मा पर निर्भर रहते हैं कि वह हमें दीन बनने में समर्थ करे, क्योंकि वही हमें मसीह के स्वरूप के अनुसार रूपान्तरित करता है। पौलुस के फिलिप्पियों को लिखे हुए वचनों को पढ़ें और उन्हें अपने हृदय में बसा लें, और अपनी दृष्टि अपने उद्धारकर्ता पर स्थिर करें। प्रभु यीशु मसीह के निःस्वार्थ देहधारण और आज्ञाकारी मृत्यु पर मनन करें, और तब आपका सारा स्वार्थ और घमण्ड अत्यन्त ही घिनौना प्रतीत होने लगेगा। आप यीशु के विषय में विचार करते हुए एक साथ अपने आत्म-केन्द्रित स्वभाव को सही नहीं ठहरा सकते। इसलिए, मसीह की ओर दृष्टि करें! वहीं आपकी सारी स्वार्थी अभिलाषाएँ मर जाती हैं।

फिलिप्पियों 2:1-6

2 अगस्त : परमेश्वर के सिवा भलाई कहीं नहीं

Alethia4India
Alethia4India
2 अगस्त : परमेश्वर के सिवा भलाई कहीं नहीं
Loading
/

“हे ईश्वर मेरी रक्षा कर, क्योंकि मैं तेरा ही शरणागत हूँ। मैंने परमेश्‍वर से कहा, ‘तू ही मेरा प्रभु है; तेरे सिवा मेरी भलाई कहीं नहीं।’” भजन 16:1-2

इस जीवन में आप किस वस्तु को अनमोल समझते हैं? हम सबके पास कुछ न कुछ ऐसा होता है जो हमें बहुत आनन्द देता है, या कोई ऐसा स्थान जो हमें विश्रामदायक और ठीक प्रतीत होता है। परन्तु कभी-कभी हमें सांसारिक सुखों के बिना जीवन की एक झलक मिल जाती है। शायद बीमारी के द्वारा, या यहाँ तक कि किसी प्रिय के निधन के द्वारा, बातें हमारे लिए स्पष्ट हो जाती हैं। जब आपको यह पता चलता है कि आपके किसी प्रिय को घातक कैंसर का निदान हुआ है, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि अस्पताल से बाहर निकलते समय आप कौन-सी गाड़ी चला रहे होते हैं—क्या उससे कोई फर्क पड़ता है? आपके वस्त्र, आपके आभूषण, आपके उपकरण, आपका घर—अचानक वे सब उतने महत्त्वपूर्ण नहीं रह जाते जितने पहले प्रतीत होते थे।

परमेश्वर द्वारा अनुग्रह से दी गई वस्तुओं का हम आनन्द ले सकते हैं और हमें लेना भी चाहिए। वह “हमारे सुख के लिए सब कुछ बहुतायत से देता है” (1 तीमुथियुस 6:17)। ऐसा नहीं है कि पृथ्वी की अच्छी वस्तुएँ बुरी हैं। परन्तु जो हमें परमेश्वर में प्राप्त होता है, वह इतना मधुर, इतना समृद्ध है कि उसे जान लेना उस छिपे हुए खजाने को पाने के समान है जो किसी खेत में छिपा हो। वह खजाना हमें ऐसा मग्न कर देता है कि अपने आनन्द में हम वह खेत और उसमें निहित सब कुछ प्राप्त करने के लिए जो कुछ आवश्यक हो, कर डालते हैं (मत्ती 13:44)।

परमेश्वर में जो खजाना हमें प्राप्त है उसके बिना, जैसा कि भजन 16 हमें बताता है, अन्ततः हमारे पास कोई और भलाई नहीं रहती। जब हम रोटी या दलिया या जो भी हमारा नाश्ता हो, उसे लेकर बैठते हैं, तो हमें अपने मन में कहना चाहिए, हे प्रभु, तेरे सिवा मेरी भलाई कहीं नहीं। तू ही है जिसने अन्न को उगने दिया। तू ही है जो मुझे भोजन देता है। जब हम उठते हैं और द्वार से बाहर निकलते हैं, और हमारे पास ऐसा करने के लिए स्वास्थ्य और सामर्थ्य होता है, तो वह किसके द्वारा सम्भव होता है? जब हम रात को अपने बिस्तर पर लेटते हैं और सन्ध्या के विश्राम में प्रवेश करते हैं, तो यह किसके कारण सम्भव होता है?

परमेश्वर के समर्थ करने वाले अनुग्रह के बिना, आपके पास इन अक्षरों को देखने, इस पुस्तक को पकड़ने, या जो आप पढ़ रहे हैं उसे समझने का भी कोई सामर्थ्य नहीं है। केवल वही हमें सुरक्षित रख सकता है और सम्भाल सकता है। केवल परमेश्वर ही हमें “जीवन और श्वास और सब कुछ” देता है (प्रेरितों 17:25)। अन्त में, उससे अलग हमारे पास कोई भलाई नहीं—परन्तु उसमें इतनी भलाई है जो सबके लिए पर्याप्त है। वही हमारे सब खजानों का स्रोत है—और वही स्वयं हमारा सबसे बड़ा खजाना है। जब आप उसे वैसा ही देखते हैं जैसा वह वास्तव में है, तो आपकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया यही होगी कि आप उसे अपने जीवन का केन्द्र बना लें, जिसके चारों ओर आपके विचार, निर्णय, भावनाएँ और कार्य घूमते रहें। अर्थात्, आप उससे यह कहेंगे, “तू ही मेरा प्रभु है,” क्योंकि उसकी उपस्थिति में “आनन्द की भरपूरी है,” और उसके दाहिने हाथ में “सुख सर्वदा बना रहता है” (भजन 16:11)। फिर आप और कहाँ शरण लेना चाहेंगे, और उससे बढ़कर किसे अनमोल ठहराएँगे?

मत्ती 13:44-46
पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 60– 62; प्रेरितों 22 ◊