4 अगस्त: सच्चा सेवा-भाव

Alethia4India
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4 अगस्त: सच्चा सेवा-भाव
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“जिसकी दुलहिन है, वही दूल्हा है; परन्तु दूल्हे का मित्र जो खड़ा हुआ उसकी सुनता है, दूल्हे के शब्द से बहुत हर्षित होता है : अब मेरा यह हर्ष पूरा हुआ है। अवश्य है कि वह बढ़े और मैं घटूँ।” यूहन्ना 3:29-30

कुछ लोग यह दावा करते हैं कि वे शारीरिक हाव-भाव पढ़ने के विशेषज्ञ हैं। वे दूसरों के शरीर और हाथों की अवस्थाओं तथा उनके मुख के भावों से यह पता लगा लेते हैं कि वे क्या सन्देश देना चाह रहे हैं। यह कौशल उपयोगी हो सकता है, विशेषकर यह जानने—या कम से कम जानने के निकट पहुँचने—के लिए कि कोई व्यक्ति सच्चा है या झूठा।

परन्तु ऐसे भी कई प्रकार हैं जिनमें मसीही लोग अपने आप को ऐसे झूठे आचरण में ला सकते हैं जिसे शारीरिक हाव-भाव पढ़ने वाले विशेषज्ञ भी नहीं समझ सकते। यह एक दुखद सत्य है कि भिन्न-भिन्न प्रेरणाएँ लोगों को मसीह के नाम में सेवा करने को प्रेरित करती हैं। कुछ लोग दूसरों की भलाई के लिए सच्चे मन से नहीं, वरन् स्वार्थ की प्रेरणा से सेवा करते हैं। वे चाहे ध्यान आकर्षित करना चाहते हों, या पीठ थपथपाए जाने की लालसा रखते हों, या एक अच्छी प्रतिष्ठा बनाना चाहते हों। ऐसी प्रेरणा से भले ही कुछ अच्छे कार्य हो जाएँ, परन्तु यह सच्ची सेवा को उत्पन्न नहीं करती। दूसरे शब्दों में, मसीही सेवा झूठी भी हो सकती है। दूर से वह वास्तविक प्रतीत होती है, परन्तु निकट आने पर उसमें अभाव मिलता है।
तो फिर हम कैसे जानें कि क्या वास्तविक है? वास्तविक सेवा-भाव के दो चिह्न हैं जिन पर हमें अपने भीतर भी ध्यान देना है और दूसरों में भी।
पहला है गोपनीयता में सेवा करने की इच्छा। यह वह सेवा है जो ध्यान पाए बिना अच्छा करने में आनन्दित होती है। स्वयं प्रभु यीशु ने कहा, “जो स्त्रियों से जन्मे हैं, उनमें से यूहन्ना से बड़ा कोई नहीं” (लूका 7:28)—फिर भी बपतिस्मा देने वाले यूहन्ना ने स्वयं को घटाकर मसीह की महिमा देखनी चाही। और यह वही भावना है जिसे उसने इन स्मरणीय शब्दों में कहा, “अवश्य है कि वह बढ़े और मैं घटूँ।”

दूसरा है सच्चाई का होना। प्रेरित पौलुस ने कहा कि उसका सहकर्मी तीमुथियुस फिलिप्पियों की भलाई के लिए “शुद्ध मन से तुम्हारी चिन्ता” करता था, उन लोगों के विपरीत जो “अपने स्वार्थ की खोज में रहते हैं” (फिलिप्पियों 2:20-21)। इसी प्रकार इपफ्रुदीतुस भी कलीसिया की भलाई के लिए “व्याकुल” रहता था (पद 26)। ऐसी व्याकुलता नकली नहीं हो सकती; वह सच्चे प्रेम से उत्पन्न होती है।

बहुत वर्ष पूर्व एक प्रचारक ने कहा था कि वह “परमेश्वर का दौड़-दौड़कर काम करने वाला दास” बनने में सन्तुष्ट है। क्या आप भी यह बात सत्यनिष्ठा से कह सकते हैं? क्या आप घटने में आनन्दित हो सकते हैं यदि उससे मसीह की महिमा बढ़ती है? क्या आपको दूसरों की भलाई के लिए वास्तविक चिन्ता—यहाँ तक कि व्याकुलता—है? हमारे आस-पास के लोग शायद न जान सकें कि हमें क्या प्रेरित करता है, परन्तु हमारा उद्धारकर्ता, जिसकी सेवा का हम दावा करते हैं, अवश्य जानता है।

यह सम्भवतः एक अच्छा अवसर है कि हम प्रार्थना में पौलुस के उदाहरण पर विचार करें, जिसने कहा, “मैं अपने प्राण को कुछ नहीं समझता कि उसे प्रिय जानूँ, वरन् यह कि मैं अपनी दौड़ को और उस सेवा को पूरी करूँ, जो मैंने परमेश्‍वर के अनुग्रह के सुसमाचार पर गवाही देने के लिए प्रभु यीशु से पाई है” (प्रेरितों 20:24)। परमेश्वर से यह अनुग्रह माँगें कि हम इन वचनों को सच्चाई से दोहरा सकें। कौन जानता है कि वह एक ऐसे जीवन के साथ क्या कर सकता है जो आपने पूर्ण रीति से उसे समर्पित कर दिया है?

1 कुरिन्थियों 3:5-15
पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 66– 67; प्रेरितों 23:16-35 ◊

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