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21 अगस्त : मसीह में मित्र

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21 अगस्त : मसीह में मित्र
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“मुझे प्रभु यीशु में आशा है कि मैं तीमुथियुस को तुम्हारे पास तुरन्त भेजूँगा, ताकि तुम्हारी दशा सुनकर मुझे शान्ति मिले। क्योंकि मेरे पास ऐसे स्वभाव का कोई नहीं जो शुद्ध मन से तुम्हारी चिन्ता करे . . . पर मैंने इपफ्रुदीतुस को जो मेरा भाई और सहकर्मी और संगी योद्धा और तुम्हारा दूत, और आवश्यक बातों में मेरी सेवा टहल करने वाला है, तुम्हारे पास भेजना आवश्यक समझा।” फिलिप्पियों 2:19-20, 25

क्या आपके जीवन में कोई ऐसा है जिसे आप संकट की घड़ी में तुरन्त बुलाएँगे? कौन से गुण किसी व्यक्ति को ऐसी ज़िम्मेदारी के योग्य बनाते हैं? सम्भवतः वह व्यक्ति जिसे आप बुलाने का निर्णय लेंगे, वही होगा जिस पर आप भरोसा करते हैं, और जिसे आप जानते हैं कि वह जो कुछ भी कर रहा होगा उसे छोड़कर आपकी सहायता के लिए आ जाएगा। ऐसे स्त्री-पुरुष सच्चे मित्र होते हैं।

जब पौलुस को सहायता की आवश्यकता पड़ी, और वह रोमी कारागार में बन्द था, तब वह जानता था कि वह किन मित्रों को बुला सकता है: तीमुथियुस और इपफ्रुदीतुस को। वह फिलिप्पियों 2 में उनका नाम लेकर उल्लेख करता है और उन्हें मसीह में प्रिय सहकर्मी बताता है। फिर भी हमारे लिए सबसे उपयोगी बात यह देखना नहीं है कि पौलुस के पास ऐसे विश्वासयोग्य साथी थे, बल्कि यह है कि वे ऐसे क्यों थे।

पहले, ये कार्य करने वाले पुरुष थे। पौलुस कहता है कि उसके पास तीमुथियुस के समान “स्वभाव का कोई नहीं” था, और उसका “परखा” हुआ चरित्र सबको ज्ञात था, क्योंकि “उसने सुसमाचार के फैलाने में मेरे साथ परिश्रम किया” था (फिलिप्पियों 2:22)। इसी प्रकार, इपफ्रुदीतुस “सहकर्मी और संगी योद्धा” था—जो “मसीह के काम के लिए अपने प्राणों पर जोखिम उठाकर मृत्यु के निकट आ गया था” (पद 30)। ये पुरुष मसीही कार्य का जीवित उदाहरण थे। वे केवल सदस्यता सूची के नाम या किसी चार्ट के अंक नहीं थे। वे अपने विश्वास को काम में लगा रहे थे और अपने विश्वास के योग्य ठहर रहे थे। जब पौलुस को किसी को फिलिप्पी भेजने की आवश्यकता पड़ी, तो वह जानता था कि वे यह कार्य करेंगे।

वे उपलब्ध भी थे—इस अर्थ में नहीं कि वे केवल अपनी दिनचर्या खाली रखते थे, बल्कि इस अर्थ में कि जब और जैसा आवश्यक होता था, वे वही करने के लिए तैयार रहते थे। पौलुस उनसे जो अपेक्षा कर रहा था, वे छोटे दायित्व नहीं थे! परन्तु वह जानता था कि मसीह के प्रति उनकी भक्ति ऐसी है कि जब वह बुलाएगा, वे उपलब्ध होंगे।

क्या आपका भी ऐसा वर्णन किया जा सकता है? जब आपके आस-पास सेवाकार्य की आवश्यकताएँ होती हैं, तो क्या आपको कार्य करने और उपलब्ध रहने के लिए जाना जाता है? यह आवश्यक नहीं—और अक्सर ऐसा नहीं होता—कि यह पौलुस द्वारा अपने मित्रों को सौंपी गई किसी नाटकीय सेवा के समान दिखाई दे। मुद्दा महान कार्य करने का नहीं है। प्रभु को आपके परिश्रम की आवश्यकता नहीं है। परन्तु जब आप उसके नाम में कार्य करने और उसके उद्देश्य के लिए उपलब्ध होने का निश्चय करते हैं, तो वह अपनी प्रजा के भले के लिए आपको उपयोग करने का चयन प्रसन्नता से कर सकता है।

सरल और छोटे कार्य भी महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं। क्या होगा यदि आप यह निश्चय करें कि आप सप्ताह में दो बार कलीसिया के किसी सदस्य को फोन करके उसे प्रोत्साहित करेंगे? क्या होगा यदि आप नियमित रूप से किसी के पास जाकर उसके साथ प्रार्थना करेंगे? उस मित्र से बढ़कर कोई मित्र नहीं जो दूसरों को यीशु की ओर इंगित करे। ऐसे मित्रों से अपने आप को घेर लें, और स्वयं भी ऐसा मित्र बनने का प्रयास करें।

  नीतिवचन 27:5-9

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 107–109; गलातियों 6

20 अगस्त : दोषी विवेक के साथ क्या किया जाए

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20 अगस्त : दोषी विवेक के साथ क्या किया जाए
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“तब दाऊद ने उठकर शाऊल के बागे की छोर को छिपकर काट लिया। इसके बाद दाऊद शाऊल के बागे की छोर काटने से पछताया। वह अपने जनों से कहने लगा, ‘यहोवा न करे कि मैं अपने प्रभु से जो यहोवा का अभिषिक्त है, ऐसा काम करूँ’ . . . जब दाऊद शाऊल से ये बातें कह चुका, तब शाऊल ने कहा, ‘हे मेरे बेटे दाऊद, क्या यह तेरा बोल है?’ तब शाऊल चिल्लाकर रोने लगा। फिर उसने दाऊद से कहा, ‘तू मुझसे अधिक धर्मी है; तू ने तो मेरे साथ भलाई की है, परन्तु मैं ने तेरे साथ बुराई की।’” 1 शमूएल 24:4-6, 16-17

इन पदों में आंशिक रूप से कही गई इस कहानी को एक दृष्टि से विवेक के सन्दर्भ में देखा जा सकता है—दाऊद में पाया जाने वाला कोमल और संवेदनशील विवेक, और शाऊल में पाया जाने वाला कठोर और जल चुका विवेक।

दाऊद जानता था कि यद्यपि परमेश्वर का आत्मा शाऊल से हट गया था, फिर भी शाऊल यहोवा का अभिषिक्त राजा था, और यहोवा के अभिषिक्त को न तो शाप देना चाहिए और न ही मारना चाहिए (निर्गमन 22:28)। क्योंकि उसका विवेक परमेश्वर और उसकी व्यवस्था के प्रति संवेदनशील था, इसलिए शाऊल के बागे को काटने के कारण वह तुरन्त बोझ से दब गया—यद्यपि वह इससे कहीं अधिक बुरा कर सकता था। इसलिए दाऊद ने अपने लोगों के सामने अपने पाप से मन फिराया और उन्हें शाऊल पर आक्रमण करने से रोक दिया (1 शमूएल 24:6-7)।

जब दाऊद ने शाऊल से खुले रूप से अपने रोके हुए प्रतिशोध के विषय में बातें कीं (1 शमूएल 24:8-15), तो उसकी कृपा के कारण शाऊल रो पड़ा। परन्तु शाऊल ने पुनर्मेल के इस अवसर को नहीं अपनाया। उस क्षण उसके आँसू चाहे जितने भी सच्चे रहे हों, उसका प्रत्युत्तर अन्ततः सतही और अल्पकालिक था, जो एक कठोर और अन्धकारमय हृदय का परिणाम था। हम यह इसलिए जानते हैं, क्योंकि इस घटना के बाद भी वह दाऊद का पीछा करता रहा।

बाइबल कहती है कि विवेक हमारी मानवता की एक आधारभूत इकाई है। परमेश्वर की व्यवस्था मनुष्य के हृदय में लिखी हुई है, चाहे हमने उसकी आज्ञाओं को सुना हो या नहीं (रोमियों 2:14-15)। जब हम परमेश्वर की व्यवस्था की अनदेखी करके अपनी ही राह पर चलते हैं, तो हमें दोष और लज्जा का अनुभव होता है। उस क्षण हमारे सामने एक चुनाव होता है: क्या हम क्षमा और पुनर्मेल की खोज करेंगे? या हम अपनी स्वार्थी अभिलाषाओं के पीछे चलते हुए अपने विवेक को और कठोर होने देंगे?

दोषी विवेक एक भारी बोझ है, परन्तु वह एक वरदान भी हो सकता है। वाल्टर जे. चैण्ट्री लिखते हैं, “विवेक एक मित्र है जो आपको भंग हुई व्यवस्था और उसके श्राप से छुड़ाने वाले एकमात्र उद्धारकर्ता की बाँहों में शीघ्रता से पहुँचा देता है।”[1] यदि आप दोषी विवेक का बोझ अनुभव कर रहे हैं, तो क्षणिक दुख को सच्चे मन फिराव के साथ भ्रमित न करें। अपने पाप से मन फिराते हुए परमेश्वर की ओर मुड़ें, और उसके सामर्थ्य में होकर परिवर्तन करने का निश्चय करें। क्षमा पाने का मार्ग यही है। क्योंकि यदि दोषी विवेक वह वरदान है जो आपको परमेश्वर की ओर ले जाता है, तो शुद्ध किया हुआ विवेक वह वरदान है जो आपको उससे मिलेगा।

  भजन 25

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 105–106; गलातियों 5 ◊


[1] वाल्टर जे. चैण्ट्री, डेविड: मैन ऑफ़ प्रेयर, मैन ऑफ़ वॉर (बैनर ऑफ़ ट्रुथ, 2007), पृ. 92.

19 अगस्त : मसीह को देखना और बाँटना

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19 अगस्त : मसीह को देखना और बाँटना
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“तब उनकी आँखें खुल गईं; और उन्होंने उसे पहचान लिया, और वह उनकी आँखों से छिप गया . . . वे उसी घड़ी उठकर यरूशलेम को लौट गए, और उन ग्यारहों और उनके साथियों को इकट्ठे पाया।” लूका 24:31, 33

शुभ समाचार को बाँटा जाना चाहिए।

कभी-कभी, जब हमारे घर में ऐसे अतिथि होते हैं जिन्हें हम भली-भाँति जानते हैं, और विशेषकर यदि वे विश्वास के परिवार में हमारे भाई या बहन हों, तो हम भोजन करने से पहले उनसे प्रार्थना करने का आग्रह करते हैं। यह निवेदन हमारे मेज़ पर आए अतिथि का आदर करने के लिए होता है। लूका का सुसमाचार हमें एक ऐसा ही दृश्य देता है, यद्यपि यहाँ ऐसा प्रतीत होता है कि अतिथि ने स्वयं प्रार्थना करने का निर्णय लिया। यरूशलेम से इम्माऊस जाने वाले मार्ग पर दो चेलों से भेंट करने के बाद यीशु “उनके साथ रहने के लिए भीतर गया” (लूका 24:29), और “जब वह उनके साथ भोजन करने बैठा, तो उसने रोटी लेकर धन्यवाद किया और उसे तोड़कर उनको देने लगा” (पद 30)।

इससे पहले, यरूशलेम से उनकी लम्बी यात्रा के दौरान, जब इन दोनों की भेंट यीशु से हुई थी, तब “उनकी आँखें ऐसी बन्द कर दी गई थीं कि उसे पहिचान न सके” (लूका 24:16)। परन्तु अब, जब यीशु ने भोजन पर धन्यवाद किया, तब उन्हें देखने की सामर्थ दी गई। परमेश्वर ने इसी क्षण यह प्रकट करना चुना कि वे जी उठे हुए प्रभु यीशु मसीह की उपस्थिति में हैं।

जैसे परमेश्वर ने अपने आत्मा के द्वारा इन चेलों की आँखें खोल दीं कि वे जी उठे हुए मसीह के सत्य को देखें, वैसे ही उसने अपने वचन के द्वारा उनके हृदयों में यह जानने के लिए और अधिक तीव्र लालसा जगा दी कि यीशु कौन था और कौन है। जैसे ही उन्होंने यीशु को पहचाना, और उसके ओझल हो जाने के बाद भी, “उन्होंने आपस में कहा, ‘जब वह मार्ग में हम से बातें करता था और पवित्रशास्त्र का अर्थ हमें समझाता था, तो क्या हमारे मन में उत्तेजना न उत्पन्न हुई?’” (लूका 24:32)।

समय बहुत हो चुका था, वे लम्बी यात्रा करके आए थे, और वे अभी-अभी भोजन करने बैठे थे; तौभी वे तुरन्त उठे और यरूशलेम लौटे, ताकि ग्यारह चेलों के साथ इस अद्‌भुत समाचार को बाँटें। वह कैसी रात रही होगी!

उनका उत्साह हमें स्मरण दिलाता है कि यीशु के जीवित होने का समाचार केवल उनका ही समाचार नहीं था—और न ही केवल ग्यारहों का समाचार था। यह ऐसा समाचार है जिसे बाँटा जाना चाहिए और जिसे उन लोगों की संगति में सबसे अधिक आनन्द के साथ अनुभव किया जाता है जो इसके महिमामय अर्थ को समझते हैं। यह उन सब का है जो प्रभु के हैं। और चाहे हम कोई भी भाषा बोलें, किसी भी देश में जाएँ, या कोई भी यात्रा करें, हम उन अन्य विश्वासियों से दूर नहीं होते जिनके साथ हम यीशु मसीह के मृतकों में से पुनरुत्थान के द्वारा हमें दी गई जीवित आशा में एक साथ आनन्दित हो सकते हैं (1 पतरस 1:3-5)। फिर भी, जहाँ आप हैं वहीं, जिनके साथ आप रहते हैं और जिनके साथ आराधना करते हैं, उनसे आँख मिलाकर और मुस्कराकर यह कहकर इस आनन्द को बाँट सकते हैं, “यीशु जी उठा है।”

यह समाचार बाँटा जाना चाहिए। क्या आप मसीह को उसके वास्तविक स्वरूप में देखने और दूसरों को भी वही दिखाने की लालसा रखते हैं? क्या आप जीवन के साधारण कार्यों में यीशु को देखने और दूसरों को भी देखने में सहायता करने की इच्छा रखते हैं? यदि ऐसा है, तो परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह आपके लिए वही करे जो उसने इन चेलों के लिए किया, ताकि आप नए सिरे से यह खोज सकें और बाँट सकें कि यीशु कौन है और उसने आपके लिए क्या है।

  यूहन्ना 1:35-51

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 103–104; गलातियों 4

18 अगस्त : जलते दीपक

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18 अगस्त : जलते दीपक
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“सब काम बिना कुड़कुड़ाए और बिना विवाद के किया करो, ताकि तुम निर्दोष और भोले होकर टेढ़े और हठीले लोगों के बीच परमेश्‍वर के निष्कलंक सन्तान बने रहो, जिनके बीच में तुम जीवन का वचन लिए हुए जगत में जलते दीपकों के समान दिखाई देते हो कि मसीह के दिन मुझे घमण्ड करने का कारण हो कि न मेरा दौड़ना और न मेरा परिश्रम करना व्यर्थ हुआ।” फिलिप्पियों 2:14-16

हम सब ऐसे लोगों को जानते हैं जो किसी कमरे में प्रवेश करते ही उसे उज्ज्वल कर देते हैं—ऐसे स्त्री-पुरुष जिनमें ऐसे गुण होते हैं जो उन्हें आकर्षक और प्रभावशाली बनाते हैं। वे हमारे मन को प्रसन्न कर देते हैं। कुछ कारण ऐसे होते हैं जिन्हें हम सदा शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते, परन्तु उनके समीप रहना हमें अच्छा लगता है।

मसीहियों के रूप में, हमें भी अपने आस-पास के लोगों पर ऐसा ही प्रभाव डालने का प्रयास करना चाहिए। इसका यह अर्थ नहीं कि हमें अपने स्वभाव को बदलकर वह बन जाएँ जो हम में से अधिकांश नहीं हैं, और हर सभा की जान बनने का प्रयत्न करें! विश्वासियों के रूप में हमारा प्रयत्न व्यक्तित्व, करिश्मा, या हास्य-बोध के विषय में नहीं है। यह नैतिक पवित्रता के विषय में है। यही वह बात है जिसे यीशु ने तब कहा था जब उसने अपने चेलों से कहा कि वे “जगत की ज्योति” हैं: उन्हें ऐसा जीवन जीना था कि लोग उनके भले कामों को देखकर परमेश्वर की महिमा करें (मत्ती 5:14-16)। यही बात पौलुस के मन में भी थी जब उसने अपने फिलिप्पी के मित्रों से कहा कि वे “टेढ़े और हठीले लोगों के बीच” के बीच “जगत में जलते दीपकों के समान” चमकें। दूसरे शब्दों में, मसीही लोगों का चरित्र न केवल दिखाई देने योग्य होना चाहिए, बल्कि उज्ज्वल भी होना चाहिए।

परमेश्वर की प्रजा के रूप में हम जीवते परमेश्वर की आराधना करने, उसके वचन से शिक्षा पाने, और उसके अनुग्रह में दृढ़ होने के लिए एकत्र होते हैं—परन्तु इसलिए नहीं कि फिर हम घर जाकर चुप हो जाएँ! जब हमारी मसीहियत का प्रभाव कलीसिया की इमारत के द्वार पर ही रुक जाता है, तब वह किसी के लिए भी बहुत उपयोगी नहीं रह जाती। हम सामूहिक आराधना से निकलकर ऐसे संसार में प्रवेश करते हैं जो असंख्य प्रकार से अन्धकारमय और भ्रमित है, और इसलिए हमें यह निश्चय करके निकलना चाहिए कि हम उस संसार में उज्ज्वल, चमकती हुई विश्वासयोग्यता के साथ जीवन बिताएँगे।

प्राचीन संसार में तारों का उपयोग मार्गदर्शन के लिए किया जाता था। लोग बाहर निकलते, ऊपर देखते, और आकाश के द्वारा अपना मार्ग निर्धारित करते थे। पौलुस चाहता था कि उसके पाठक आकाश के तारों के समान उपयोगी हों और एक ऐसे संसार के लिए मार्गदर्शक बनें जिसे यह नहीं पता कि किस ओर मुड़ना है, और सब जीवन के महान ध्रुव तारे की ओर संकेत करें: उसी की ओर जिसने तारों को बनाया।

इस प्रकार जीवन बिताने के लिए, हमें जीवन के वचन को अपने मार्ग के लिए ज्योति के समान दृढ़ता से थामे रहना होगा। हमारे अपने कदम परमेश्वर के सत्य और अधिकारपूर्ण वचन के द्वारा संचालित होने चाहिएँ। हमें इस जीवन के वचन को आगे भी रखना है। यीशु का शुभ समाचार परमेश्वर के वचन में निहित है, और इसलिए हमें अपने पड़ोसियों और मित्रों को वही वचन देने के लिए तैयार रहना चाहिए, यह जानते हुए कि वह व्यर्थ लौटकर नहीं आएगा (यशायाह 55:11)। जैसे तारे प्रकाश फैलाते हैं, वैसे ही हमें सुसमाचार से भरे जीवन को आगे बढ़ाना है।

यदि हम परमेश्वर के अनुग्रह से कुड़कुड़ाहट, अशुद्धता, और स्वार्थ के प्रलोभनों का विरोध करें, और यदि हम परमेश्वर के अनुग्रह से आनन्द, सन्तोष, और आशा के साथ जीवन बिताएँ, और हर समय उसके वचन को थामे रहें, तो हम निश्चय ही अपने पड़ोसियों के भले और परमेश्वर की महिमा के लिए चमकेंगे। आपको अन्धकार में चमकने के लिए बुलाया गया है। आज ऐसा करना अवश्य सुनिश्चित करें।

  मत्ती 5:14-16

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 100–102; गलातियों 3 ◊

17 अगस्त : खुशी कहाँ खोजी जाए

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17 अगस्त : खुशी कहाँ खोजी जाए
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“क्या ही धन्य है वह पुरुष जो दुष्‍टों की युक्ति पर नहीं चलता, और न पापियों के मार्ग में खड़ा होता; और न ठट्ठा करने वालों की मण्डली में बैठता है! परन्तु वह तो यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता; और उसकी व्यवस्था पर रात दिन ध्यान करता रहता है।” भजन संहिता 1:1-2

हम यह अपेक्षा कर सकते हैं कि अब तक स्त्री-पुरुषों ने खुशी की कला में निपुणता प्राप्त कर ली होगी। अब तक यह विषय पुराना हो जाना चाहिए था, क्योंकि हर किसी को यह जान लेना चाहिए था कि खुशी क्या है और उसे कैसे पाया जाए। परन्तु वास्तव में प्रमाण इसके विपरीत संकेत करते हैं। केवल समाचारों पर थोड़ी दृष्टि डालना ही यह समझने के लिए पर्याप्त है कि सच्ची खुशी दुर्लभ है।


बाइबल हमारी सच्ची खुशी की चिन्ता करती है। भजन 1 का आरम्भ करने वाला शब्द, जिसका अनुवाद “धन्य” किया गया है, उसका अनुवाद “खुश” भी किया जा सकता है। इसी प्रकार, यीशु के पहाड़ी उपदेश में उसके मुख से निकला पहला शब्द भी खुशी से सम्बन्धित था: उसने मूलतः कहा, खुश हैं वे जो दीन हैं, जो दयावन्त हैं, और जो मेल कराने वाले हैं (मत्ती 5:3-11)।


भजन 1 के आरम्भिक पदों के अनुसार, हमारी खुशी का एक पक्ष सीधे इस बात से जुड़ा है कि हम कैसे सोचते हैं और कैसे देखते हैं। वास्तविकता के विषय में हमारा विचार हमारे जीवन को, भले या बुरे के लिए, आकार देता है। इसलिए यदि हम परमेश्वर की मुस्कान के अधीन जीवन बिताना चाहते हैं और उस धन्य खुशी का अनुभव करना चाहते हैं जो केवल वही दे सकता है, तो हमें इस संसार के अधर्मी विचारों को नहीं अपनाना चाहिए। “दुष्टों की युक्ति” से अभिप्राय अधर्मियों के उद्देश्यों से है—उनकी उक्तियों, सिद्धान्तों, और उनसे उत्पन्न आचरण की रीति से। ऐसी सांसारिक बुद्धि खुशी और आशीष का वादा तो करती है, परन्तु वास्तव में हमें मेघधनुष के छोर पर रखे सोने के घड़े के पीछे दौड़ाती रहती है; हम सदा खोजते रहते हैं, परन्तु हमारे हाथ खाली ही रहते हैं। खुशी इस बात में है कि हम उस पवन के पीछे दौड़ने से इनकार कर दें, चाहे संसार हमें ऐसा करने के लिए बुलाता रहे।


फिर भी स्थाई खुशी का मार्ग केवल छलपूर्ण युक्ति को ठुकराने तक सीमित नहीं है; इसमें सत्य की सुन्दरता को अपनाना भी सम्मिलित है। खुश मनुष्य “यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता।” परमेश्वर के वचन को पढ़ना और उस पर मनन करना हमारे सामने किसी कर्तव्य या बोझ के रूप में नहीं, बल्कि आनन्द और हर्ष के रूप में प्रस्तुत किया गया है। क्यों? क्योंकि वह हमें उसके लेखक—हमारे सृष्टिकर्ता, पालनहार, और उद्धारकर्ता—के साथ और गहरी संगति में ले जाता है। इसलिए संसार जो भी क्षणिक सुख आपके सामने रखे, उनके स्थान पर केवल परमेश्वर के वचन से चिपके रहें, क्योंकि वही आपके प्राण को बहाल कर सकता है (भजन 19:7)। इसके सिवाय कुछ भी आपके जीवन में सच्चा, निष्कपट, और स्थाई आनन्द नहीं ला सकता।


मत्ती 5:3-11
◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 97–99; गलातियों 2

16 अगस्त : मधुर एबेनेज़ेर

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16 अगस्त : मधुर एबेनेज़ेर
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“इसलिए अब तू मेरे दास दाऊद से ऐसा कह, ‘सेनाओं का यहोवा यों कहता है, कि मैं ने तो तुझे भेड़शाला से, और भेड़–बकरियों के पीछे-पीछे फिरने से, इस मनसा से बुला लिया कि तू मेरी प्रजा इस्राएल का प्रधान हो जाए। और जहाँ कहीं तू आया गया, वहाँ-वहाँ मैं तेरे संग रहा, और तेरे समस्त शत्रुओं का तेरे सामने से नाश किया है; फिर मैं तेरे नाम को पृथ्वी पर के बड़े-बड़े लोगों के नामों के समान महान कर दूँगा।” 2 शमूएल 7:8-9

स्मरण दिलाने वाली बातें अत्यन्त आवश्यक हैं। बार-बार पवित्रशास्त्र में परमेश्वर की प्रजा से कहा गया वचन मूलतः व्यवस्थाविवरण 6:12 और 8:11 का यही है: “सावधान रहना, कहीं ऐसा न हो कि तू यहोवा को भूल जाए।” जब हम स्मरण करना छोड़ देते हैं, तब हमारे हृदय भटक जाते हैं।

जब राजा दाऊद और इस्राएल का राज्य विश्राम में था, तब दाऊद ने परमेश्वर के लिए एक घर बनाने का प्रस्ताव रखा—वाचा के सन्दूक के रहने के लिए एक दीन तम्बू से बढ़कर उत्तम स्थान (2 शमूएल 7:1-2)। परन्तु दाऊद की यह कल्पना परमेश्वर की योजना का भाग नहीं थी (पद 6)। इसलिए दाऊद को यह सोचने के लिए छोड़ देने के बजाय कि वह परमेश्वर के लिए क्या कर सकता है, परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ता नातान को भेजा कि वह दाऊद को स्मरण दिलाए कि परमेश्वर ने उसके लिए क्या किया है—और यह भी प्रकट करे कि परमेश्वर आगे क्या करने का अभिप्राय रखता है।

परमेश्वर ने दाऊद को एक तुच्छ चरवाहे से उठाकर एक महिमामय राजा बना दिया था। यह ऐसा काम नहीं था जिसे दाऊद ने स्वयं आरम्भ किया हो; यह परमेश्वर का कार्य था। जहाँ कहीं दाऊद गया, वहाँ परमेश्वर उसके साथ रहा। उसके शत्रु अब तितर-बितर हो चुके थे, और दाऊद विश्राम में था, क्योंकि परमेश्वर का हाथ उस पर था। सिंहासन पर बैठे हुए दाऊद को यह स्मरण कराया जा रहा था कि वह मैदान से कितनी दूर आ चुका था—और यह भी कि उसे वहाँ तक कौन लाया था। और इस स्मरण के साथ ही उसे यह आश्वासन भी दिया जा रहा था कि परमेश्वर आगे भी उसका मार्गदर्शन करता रहेगा। परमेश्वर ने इस कार्य को आरम्भ किया था—और जब परमेश्वर किसी से अपने आप को बाँधता है, तो वह उस भले काम को जिसे उसने आरम्भ किया है, पूरा भी करता है (फिलिप्पियों 1:6)।

एक अर्थ में, दाऊद को एक “एबेनेज़ेर का क्षण” दिया जा रहा था: यह स्मरण कि परमेश्वर अपनी प्रजा की सहायता करता है। कई वर्ष पहले भविष्यद्वक्ता शमूएल ने सारी प्रजा को ऐसा ही एक क्षण दिया था, जब उसने एक पत्थर खड़ा किया कि इस्राएल को परमेश्वर द्वारा दी गई विजयों का स्मरण हो। उसने “यह कहकर उसका नाम एबेनेज़ेर रखा, ‘यहाँ तक यहोवा ने हमारी सहायता की है’” (1 शमूएल 7:12)।

सावधान रहें कि आप यह न भूल जाएँ कि परमेश्वर ने आपकी कैसे सहायता की है। आज समय निकालकर उन उद्देश्यों को जिनके लिए उसने आपको बुलाया है, मार्ग में उसकी उपस्थिति को, और उन तरीकों को जिनसे उसने आपको छुड़ाया और सुरक्षित रखा, स्मरण करें और उन पर मनन करें। क्योंकि ऐसा करने से आपको यह स्मरण होगा कि जिसने यहाँ तक आपकी सहायता की है, वही परमेश्वर आज और हर दिन भी निश्चय ही आपकी सहायता करता रहेगा, जब तक कि वह अपनी भली योजनाओं को पूरा न कर ले।

बीते समय का उसका प्रेम मुझे यह सोचने नहीं देता
कि वह अन्त में मुझे दुख में छोड़ देगा;
मेरे स्मरण में आया हर मधुर एबेनेज़ेर
यह पुष्टि करता है कि वह अन्त तक मेरी सहायता करेगा।

1 शमूएल 7:3-17
पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 94–96; गलातियों 1 ◊

15 अगस्त : कुड़कुड़ाहट से कृतज्ञता तक

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15 अगस्त : कुड़कुड़ाहट से कृतज्ञता तक
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“सब काम बिना कुड़कुड़ाए और बिना विवाद के किया करो, ताकि तुम निर्दोष और भोले होकर टेढ़े और हठीले लोगों के बीच परमेश्‍वर के निष्कलंक सन्तान बने रहो, जिनके बीच में तुम जीवन का वचन लिए हुए जगत में जलते दीपकों के समान दिखाई देते हो।” फिलिप्पियों 2:14-15

प्राचीन इस्राएल के इतिहास में बहुत से महिमामय क्षण आए—लाल समुद्र को पार करना, प्रतिज्ञा किए हुए देश में प्रवेश करना, राजा दाऊद का राज्य, और बहुत कुछ। परन्तु इस्राएली कभी-कभी पूरी तरह विपत्ति भी बन जाते थे। निर्गमन के तुरन्त बाद उन्होंने जो किया, उसके विषय में सोचें। उन्होंने प्रभु के अद्‌भुत काम देखे थे, मिस्र की दासता से छुड़ाए गए थे, और अत्याचार और गुलामी से मुक्त किए गए थे। वे तो सब लोगों से बढ़कर आनन्द और कृतज्ञता से पहचाने जाने चाहिए थे। परन्तु मिस्र छोड़ने के कुछ ही समय बाद, सारी मण्डली भोजन और पानी के विषय में कुड़कुड़ाने लगी और मूसा तथा हारून के नेतृत्व और उद्देश्यों के विरुद्ध शिकायत करने लगी (निर्गमन 16:1-9)। यह परमेश्वर की प्रजा के लिए अच्छी बात नहीं थी।


सदियों बाद, पौलुस ने फिलिप्पी में परमेश्वर की प्रजा को इसी प्रकार की असफलता से बचाने के लिए लिखा, और उनसे कहा कि वे “सब काम बिना कुड़कुड़ाए” करें। वह चाहता था कि उसके पाठक समझें कि जिस रीति से वे कोई काम करते हैं, वह उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि वे वास्तव में क्या कर रहे हैं। जैसा उनके लिए था, वैसा ही हमारे लिए भी है: हमारे लिए यह सम्भव है कि हम सही काम करें, परन्तु ऐसे मनोभाव से करें जो हमें आनन्द से वंचित कर दे और हमारे आस-पास के सब लोगों के लिए हानिकारक हो।


पतरस ने अपने पत्रों में इसी प्रकार की शिक्षा दी: “बिना कुड़कुड़ाए एक दूसरे का अतिथि-सत्कार करो” (1 पतरस 4:9)। वह केवल इतना कह सकता था, “एक दूसरे का अतिथि-सत्कार किया करो,” और तब उन्हें (और हमें!) इस आज्ञा को मानना अधिक सरल लगता। परन्तु वे शब्द “बिना कुड़कुड़ाए” दिखाते हैं कि पतरस मानव स्वभाव को कितनी अच्छी तरह समझता था। परमेश्वर केवल अतिथि-सत्कार या किसी भी भले काम के बाहरी निर्वाह के प्रति ही चिन्तित नहीं है, बल्कि उस मनोभाव के प्रति भी चिन्तित है जिसके साथ हम उसे करते हैं।


हम अपने जीवन में ऐसे अनेक उदाहरणों के विषय में सोच सकते हैं, है न? सम्भव है आपके घर में कोई किशोर हो जो अपने काम प्रसन्न मन से न करे। शायद आपका कोई सहकर्मी हो जो शिकायत किए बिना कोई काम पूरा ही न कर पाए। या सम्भव है कि उदाहरण आप स्वयं हों, जो परमेश्वर द्वारा दिए गए जीवन या उस सेवा के विषय में, जिसके लिए उसने आपको बुलाया है, मन ही मन कुड़कुड़ाते रहते हों। दुखद वास्तविकता यह है कि हम जितना स्वीकार करना चाहें, उससे अधिक बार इस्राएलियों के समान होते हैं। हम भी उस महान उद्धार को भूल जाते हैं जिसे परमेश्वर ने हमारे लिए पूरा किया है, और हम भी अपने जीवन की दिशा स्वयं तय करना अधिक पसन्द करते हैं, बजाय इसके कि अपने आप को परमेश्वर के हाथों सौंप दें। फिर भी पौलुस हमें बताता है कि जब हम बिना कुड़कुड़ाए काम करते हैं, तब परमेश्वर हमें “निर्दोष और भोले . . . और . . . परमेश्‍वर के निष्कलंक सन्तान” बना रहा है। हर बार जब हम कुड़कुड़ाने के अवसर का विरोध करते हैं, वह इस बात का प्रमाण है कि परमेश्वर हमें बदल रहा है।


आज उस रीति को स्मरण करें जिससे परमेश्वर ने आपको आपके पाप और दण्ड के समुद्र से छुड़ाया, और आपको पार ले जाकर मसीह में उद्धार की ठोस भूमि पर खड़ा किया। न तो आप इसके योग्य थे, और न ही आपने अपना छुटकारा इस्राएलियों से अधिक अपने प्रयास से प्राप्त किया। फिर उन तरीकों को पहचानें जिनमें आप अपने दिनों को मन में कुड़कुड़ाहट के साथ बिताते हैं, और प्रार्थना करें कि परमेश्वर आपको अपने अनुग्रह के द्वारा फिर से ऐसा चकित कर दे कि उसके विरुद्ध आपकी कुड़कुड़ाहट उसकी स्तुति करने वाली कृतज्ञता में बदल जाए।

भजन 95
◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 91–93; 1 पतरस 5

14 अगस्त : सब जातियों का प्रभु

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14 अगस्त : सब जातियों का प्रभु
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“यहोवा सिय्योन से गरजेगा, और यरूशलेम से अपना शब्द सुनाएगा . . . ‘मैं हजाएल के राजभवन में आग लगाऊँगा . . . मैं दमिश्क के बेण्डों को तोड़ डालूँगा।” आमोस 1:2, 4-5

बाइबल का परमेश्वर न्याय का परमेश्वर है। वह सब कुछ देखता है, वह सब कुछ जानता है, और वह सब बातों का लेखा चुकता करने का वचन देता है। यह परमेश्वर की प्रजा के लिए अत्यन्त शुभ समाचार है, जो यह जानकर विश्राम कर सकती है कि हमारे द्वारा सहा गया कोई भी अन्याय उसकी दृष्टि से नहीं बचता। जैसा कि भजनकार लिखता है, “परमेश्‍वर जाति-जाति पर राज्य करता है; परमेश्‍वर अपने पवित्र सिंहासन पर विराजमान है” (भजन 47:8)। सब को अपने चाल-चलन का लेखा उसे देना होगा। ये सत्य बातें भविष्यद्वक्ता आमोस के द्वारा बड़े सामर्थ्य से स्पष्ट की गई हैं, जिसके द्वारा प्रभु ने छः जातियों पर न्याय की घोषणा की।

आमोस 1:3–2:3 में परमेश्वर अपनी घोषणा सीरिया और उसकी राजधानी दमिश्क से आरम्भ करता है, जिनके विषय में वह कहता है कि उन्होंने जिन लोगों को जीता, उनके प्रति निष्ठुर क्रूरता के कारण उन्हें न्याय का सामना करना पड़ेगा। इसके बाद गाज़ा आता है, जो मानव तस्करी और गुलामों के कारोबार में संलग्न है। फिर सूर आता है, और वह भी मानव तस्करी का दोषी है। इसके बाद वह एदोम की ओर मुड़ता है, जिसकी घृणा और क्रोध उसे दोषी ठहराते हैं। फिर अम्मोन आता है, जिसकी भूमि की लालसा उन्हें बर्बर हिंसा तक ले गई। अन्त में मोआब आता है, जो निर्दयी प्रतिशोध का दोषी है।

इन पदों से हम न केवल यह सीखते हैं कि परमेश्वर इन विशेष प्राचीन जातियों और उनके दुष्ट कार्यों के विषय में क्या सोचता है; बल्कि हम यह भी निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि वह सामान्य रूप से किससे प्रेम करता है और किससे घृणा करता है। हम निश्चय जान सकते हैं कि परमेश्वर अपने स्वरूप में बनाए गए लोगों को वस्तुओं या सम्पत्ति के समान व्यवहार किए जाने से घृणा करता है। हम यह भी जान सकते हैं कि परमेश्वर निरंकुश घृणा और हिंसा को, विशेषकर निर्बलों की कीमत पर, सहन नहीं करेगा। हम यह भी जान सकते हैं कि परमेश्वर उन लोगों से लेखा लेगा जो मनुष्यों से बढ़कर लाभ को महत्त्व देते हैं या जो दिए हुए वचन को नहीं निभाते।

आमोस के द्वारा घोषित किए जाने के बाद से परमेश्वर ने इन बातों पर अपना मन नहीं बदला है। प्रभु आज भी इन पापों से घृणा करता है और हर उस जाति और हर उस व्यक्ति से लेखा लेगा जो इनके दोषी पाए जाएँगे। इसलिए, जब ये काम परमेश्वर की प्रजा के विरुद्ध किए जाते हैं, तो हम निश्चय जान सकते हैं कि न्याय होगा। कुछ जातियों और व्यक्तियों के लिए इतिहास के क्रम में न्याय आएगा; और सब के लिए अनन्तकाल में न्याय आएगा।

जब हम दुख उठाते हैं, तब यह समाचार हमें ढाढ़स देता है; परन्तु यह समाचार हमें सचेत भी करता है, क्योंकि हम पाप करते हैं। हमें अपने आप से पूछना चाहिए कि क्या इन व्यवहारों का कोई चिह्न हमारे अपने हृदयों में भी पाया जाता है। हम शायद निर्दयी हिंसा या भूमि की लालसा के दोषी न हों, परन्तु वह घृणा, क्रोध, लोभ, स्वार्थ और घमण्ड जो ऐसे कार्यों की ओर ले जाते हैं, हमारे भीतर स्थान पा सकते हैं। बुद्धिमानी सदा इसी में है कि हम प्रभु से विनती करें कि वह हमें खोजे और दयापूर्वक हमें उन क्षेत्रों को दिखाए जहाँ पाप अब भी बना हुआ है। परमेश्वर की प्रजा होने के नाते, हम यह न्याय के भय के बिना कर सकते हैं, यह जानते हुए कि हमारा न्याय हमारे लिए कलवरी पर प्रभु यीशु मसीह ने सह लिया है। परमेश्वर जातियों पर राज्य करता है, और परमेश्वर अनन्तकाल पर राज्य करता है। जब आप इस संसार के अन्याय का सामना करते हैं और अपने हृदय के अन्याय से मन फिराते हैं, तो वह आपके जीवन में भी राज्य करे।

  आमोस 2:6-8

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 89–90; 1 पतरस 4 ◊

13 अगस्त : बेनाम लोग और परमेश्वर की योजना

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13 अगस्त : बेनाम लोग और परमेश्वर की योजना
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“जब वे सूफ नामक देश में आए, तब शाऊल ने अपने साथ के सेवक से कहा, ‘आ, हम लौट चलें, ऐसा न हो कि मेरा पिता गदहियों की चिन्ता छोड़कर हमारी चिन्ता करने लगे।’ उसने उससे कहा, ‘सुन, इस नगर में परमेश्‍वर का एक जन है जिसका बड़ा आदरमान होता है; और जो कुछ वह कहता है वह बिना पूरा हुए नहीं रहता। अब हम उधर चलें, सम्भव है वह हम को हमारा मार्ग बताए कि किधर जाएँ।’” 1 शमूएल 9:5-6

शाऊल, जो आगे चलकर इस्राएल का पहला राजा बनने वाला था, अपने सेवक के साथ कई दिनों से अपने पिता की खोई हुई गदहियों को ढूँढ़ रहा था, परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली थी। शाऊल “लौट चलने” को तैयार था—परन्तु उसका सेवक अभी हार मानने को तैयार नहीं था। इसके स्थान पर उसने सुझाव दिया कि वे “परमेश्वर के जन” से सलाह लें, कि वह उन्हें उनका “मार्ग बताए कि किधर जाएँ।’” शाऊल ने सहमति दी, और शीघ्र ही उनकी खोज उन्हें भविष्यद्वक्ता शमूएल से मिलने तक ले गई, जहाँ शाऊल का इस्राएल के राजा के रूप में अभिषेक किया जाना था (1 शमूएल 10:1-8)।

हम यह सोच सकते हैं कि सेवक ही थका हुआ होकर घर लौटने की सलाह देता, और भविष्य का राजा भविष्यद्वक्ता से मिलने का प्रस्ताव रखता—परन्तु वास्तविकता इसके विपरीत थी। बाइबल यह आभास देती है कि यह सेवक परमेश्वर की कार्यविधियों के प्रति संवेदनशील था और यह समझने लगा था कि गदहियों की यह खोज किसी कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण बात में बदल रही है।

यह कितना अद्‌भुत है! यह सेवक कौन था? हम उसका नाम तक नहीं जानते। फिर भी वह परमेश्वर की प्रकट होती योजना में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था।

वास्तव में, पूरी बाइबल में हम देखते हैं कि परमेश्वर उन लोगों का उपयोग करता है जिन्हें सांसारिक मानकों के अनुसार तुच्छ समझा जा सकता था, परन्तु जिनकी आत्मिक समझ के कारण महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। उदाहरण के लिए, 2 राजाओं 5:1-14 एक छोटी लड़की का वर्णन करता है, जिसे तब बन्दी बनाकर ले जाया गया जब सीरिया की सेना ने इस्राएल पर धावा बोलकर लड़कियों को दासियाँ बना लिया था। वह एक कोढ़ी सेनापति नामान के घर में दासी के रूप में रहने लगी। वहीं उसने नामान के जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जब उसने सुझाव दिया कि वह इस्राएल के भविष्यद्वक्ता एलीशा के पास जाए। अन्ततः इसके परिणामस्वरूप उसने चमत्कारिक ढंग से चंगाई प्राप्त की। सैकड़ों वर्ष बाद, परमेश्वर ने अपने पुत्र को धारण करने का सौभाग्य एक अविवाहित युवती को दिया, जो एक साधारण प्रान्तीय नगर में रहती थी; और शक्तियों और प्रभाव के केन्द्रों से दूर रहने वाले चरवाहों को यह दायित्व दिया कि वे सबसे पहले मनुष्यों में यह समाचार फैलाएँ कि मसीह का जन्म हुआ है।

जीवते परमेश्वर के सेवकों के तौर पर ऐसी कहानियाँ हमें स्मरण दिलाती हैं कि हमारे नाम या हमारी योग्यताएँ महत्त्वपूर्ण नहीं हैं; बल्कि वह कार्य महत्त्वपूर्ण है जिसके लिए परमेश्वर हमें बुलाता है, और जिसे वह अपनी महिमामय, अनन्त योजनाओं में समाहित करता है। यह कम न आँकें कि आज आपके मुख से निकला हुआ उत्साहवर्धन, उपदेश, या साक्ष्य का कोई शब्द हमारे प्रभु द्वारा उसकी योजनाओं के प्रकट होने में कैसे उपयोग किया जा सकता है।

मरकुस 12:41-44
◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 87– 88; 1 पतरस 3

12 अगस्त : जिस प्रकार तुम सदा से आज्ञा मानते आए हो

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12 अगस्त : जिस प्रकार तुम सदा से आज्ञा मानते आए हो
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“वैसे ही अब भी न केवल मेरे साथ रहते हुए पर विशेष करके अब मेरे दूर रहने पर भी डरते और काँपते हुए अपने-अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाओ; क्योंकि परमेश्‍वर ही है जिसने अपनी सुइच्छा निमित्त तुम्हारे मन में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डाला है।” फिलिप्पियों 2:12-13

हर विद्यालय का शिक्षक यह चाहेगा कि उसके पास अपनी कक्षा पर ऐसा अधिकार हो कि विद्यार्थी न केवल शिक्षक की उपस्थिति में, बल्कि उसके कक्षा से बाहर चले जाने और कुछ समय तक अनुपस्थित रहने पर भी सुशील बने रहें। बहुत कम शिक्षक इसे सिद्ध कर पाए हैं! परन्तु यह इच्छा समझ में आने योग्य है।

यह इच्छा उस बात के समान है जिसे प्रेरित पौलुस ने फिलिप्पी की कलीसिया को लिखते समय प्रकट किया, जब उसने उन्हें आज्ञा दी कि वे “न केवल मेरे साथ रहते हुए पर विशेष करके अब मेरे दूर रहने पर भी” आज्ञाकारिता में चलें। पौलुस की चिन्ता केवल यह नहीं थी कि ये विश्वासी उसकी बात सुनें, बल्कि यह भी थी कि उनका “चाल–चलन मसीह के सुसमाचार के योग्य हो” (फिलिप्पियों 1:27)। पौलुस के लिए सुसमाचार के योग्य जीवन वह था जो मसीह के प्रति आज्ञाकारिता से चिह्नित हो। इसी प्रकार विश्वासियों को “डरते और काँपते हुए अपने-अपने उद्धार का कार्य पूरा करते” जाना था।

पौलुस की चिन्ता का बल तब स्पष्ट होता है, जब हम फिलिप्पियों 2:12 से पहले के पदों पर विचार करते हैं। वह अभी-अभी परमेश्वर के पुत्र की दीनता और महिमा का वर्णन कर चुका है, जिसने दास का रूप धारण किया और मनुष्य की देह को ग्रहण किया। जब उसने ऐसा किया, तो यीशु ने “आप को दीन किया, और यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हाँ, क्रूस की मृत्यु भी सह ली” (पद 8)। हमारे उद्धारकर्ता को एक कार्य पूरा करना था: पापियों का उद्धार। उसने उस कार्य के प्रति पूर्ण आज्ञाकारिता दिखाई, यहाँ तक कि मृत्यु तक। इसलिए, यीशु की अद्‌भुत आज्ञाकारिता दिखाने के बाद, पौलुस अपने पाठकों से कहता है कि वे भी अपनी आज्ञाकारिता में बने रहें।

वह कहता है कि वे ऐसा “डरते और काँपते हुए” करें—अर्थात उस परमेश्वर की महिमा को समझते हुए जिसने उन्हें जीत लिया है और जो अब उनके भीतर कार्य करता है। आज्ञाकारिता, भय और काँपने की धारणाएँ मानवता को प्रिय नहीं हैं, परन्तु जो लोग मसीह के साथ पहचाने जाना चाहते हैं, उन्हें अपने-अपने क्रूस उठाकर दीनता और आज्ञाकारिता के मार्ग पर उसके पीछे चलने के लिए बुलाया गया है। यह मसीही जीवन में कोई वैकल्पिक अतिरिक्त बात नहीं है; यह उसका अभिन्न अंग है। जो अपने आप को मसीही कहता है, उसके लिए लगातार और आदतन अवज्ञा में जीवन बिताना न केवल अपरिपक्वता का चिह्न है, बल्कि एक पूर्ण निरर्थकता है। जो हमारे आज्ञाकारी उद्धारकर्ता के लोग हैं, वे आज्ञाकारिता के विषय को हल्के में कैसे ले सकते हैं?

हमें प्रतिदिन अपने आप को स्मरण कराना चाहिए कि हम सदा दृष्टिगोचर हैं। कोई भी ऐसा क्षण नहीं है जब कोई शब्द, कोई कार्य, कोई विचार, या कोई उद्देश्य परमेश्वर से छिपा हो। सभी अपेक्षाओं से परे, इस तथ्य के बावजूद कि परमेश्वर हमें पूर्ण रूप से जानता और देखता है, हम उसके प्रेम के पात्र बने रहते हैं—परन्तु यह इस वास्तविकता को कम नहीं करता कि वह हमें हमसे भी अधिक और बेहतर जानता है। इसलिए, उस भय और काँपने के साथ जो इस सत्य से उत्पन्न होना चाहिए, हमें आज्ञाकारिता को गम्भीरता से लेना है।

आपके विचारों, आपके शब्दों, या आपके कार्यों के किस भाग (या किन भागों) के विषय में पवित्र आत्मा आपसे कह रहा है कि आपको परिवर्तन करने और आज्ञा मानने की आवश्यकता है? यह न भूलें कि आपको किसने बचाया और जीत लिया, और वह कौन है जो आपको देखता है और आपके भीतर कार्य करता है।

मरकुस 9:2-7
पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 84–86; 1 पतरस 2 ◊