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24 मार्च : पक्षपात की मूर्खता

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24 मार्च : पक्षपात की मूर्खता
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“इस्राएल अपने सब पुत्रों से बढ़ के यूसुफ से प्रीति रखता था, क्योंकि वह उसके बुढ़ापे का पुत्र था : और उसने उसके लिए एक रंगबिरंगा अंगरखा बनवाया। परन्तु जब उसके भाइयों ने देखा कि हमारा पिता हम सब भाइयों से अधिक उसी से प्रीति रखता है, तब वे उससे बैर करने लगे और उसके साथ ठीक से बात भी नहीं करते थे।”  उत्पत्ति 37:3-4

सम्बन्धों में पक्षपाती होना मूर्खता है।

हम पुराने नियम में परमेश्वर के लोगों की सम्पूर्ण कहानी में इसे देख सकते हैं, किन्तु ऐसा लगता है कि यह यूसुफ के जीवन में सबसे अधिक दिखाई देता है, क्योंकि वह अपने पिता याकूब की विशेष रुचि का पात्र था। यूसुफ राहेल का, जिससे याकूब ने आजीवन अत्यन्त प्रीति रखी और “[याकूब के] बुढ़ापे का पुत्र” था। इसलिए याकूब, जिसका नाम परमेश्वर ने इस्राएल रखा था, इस पुत्र से दूसरों से अधिक प्रीति रखता था। पक्षपात की इस जड़ के कारण इस परिवार में बहुत बुरा फल उत्पन्न हुआ।

याकूब ने एक उपहार के द्वारा अपना पक्षपात व्यक्त किया, वह एक “रंगबिरंगा अंगरखा” था जिसे उसने स्वयं बनाया था। यह स्पष्ट रूप से पक्षपात का एक प्रतीक था, जिसे पहनना यूसुफ को बहुत पसन्द था। इस विवादास्पद अंगरखे ने यूसुफ के भाइयों में अत्यन्त शत्रुता को भड़का दिया। उनकी शत्रुता से द्वेष और हत्या की मंशा उत्पन्न हो गई। उन्होंने अन्ततः अपने भाई को गुलाम के तौर पर बेचने और फिर उसकी मृत्यु हो जाने का स्वांग तक रच डाला।

यदि उपहार में दिया गया अंगरखा ऐसी प्रतिक्रिया को भड़का सकता है, तो निश्चित रूप से समस्या उस अंगरखे से कहीं अधिक बड़ी थी। निश्चय ही गुप्त रूप से पाप कहीं भीतर दृढ़ता से स्थापित रहा होगा। और यही बात हम यूसुफ के भाइयों के साथ भी पाते हैं। उनकी प्रमुख समस्या यह नहीं थी कि वह अंगरखा बहुत मूल्यवान था, किन्तु यह थी कि वह यूसुफ को उनसे अलग श्रेणी में स्थापित कर रहा था। उसे यह उपहार देकर याकूब ने यूसुफ को उसके भाई-बहनों से ऊपर उठा दिया था और यह बात उन्हें चुभती थी। जब किसी एक को प्रिय चुना जाता है, तो यह सदैव स्वाभाविक रूप से यह संकेत करता है कि दूसरा अप्रिय है, जो प्रिय के रूप में चुने गए व्यक्ति में अहंकार और घमण्ड दोनों को जन्म देता है और जो नहीं चुने गए हैं, उनमें क्रोध और कड़वाहट को जन्म देता है। आपने अपने आस-पास या अपने जीवन में भी प्रिय होने या उस प्रतिष्ठा के लिए अनदेखा किए जाने के विनाशकारी प्रभावों को देखा होगा।

याकूब को उस समस्या के बारे में अधिक भले ढंग से समझना चाहिए था, क्योंकि उसने स्वयं अतीत में अनुचित पक्षपात का अनुभव किया था, उसकी अपनी माँ ने उसे उसके भाई एसाव से अधिक प्रिय जाना था और इसके कारण अराजकता फैल गई थी। यूसुफ के अपने भाइयों के साथ सम्बन्धों के समान एसाव के साथ उसका सम्बन्ध कई वर्षों तक बिगड़ा रहा था।

तौभी हमें याकूब या उसके पुत्रों की मानसिकता और कार्यों से अपने आप को दूर करने में शीघ्रता नहीं करनी चाहिए, जैसे कि हम कभी भी कुछ ऐसा करने के दोषी नहीं हो सकते। हम सभी को सम्बन्धों में पक्षपात करने की मूर्खता और इसके साथ प्रायः जन्म लेने वाले रोष से सावधान रहना चाहिए। पक्षपात एक सामान्य और समझने योग्य भूल है, किन्तु इसकी छाया गहरी, काली और विनाशकारी होती है।

याकूब की मूर्खता के बारे में आलोचना करने के विपरीत, आइए हम उससे सीखें। प्रत्येक सम्बन्ध परमेश्वर की ओर से एक अनूठा वरदान होता है। जिस भी मात्रा में हम अपने आस-पास के लोगों के प्रति पक्षपात दिखाते हैं, चाहे वह किसी भी कारण से हो, तो हमें जान लेना चाहिए कि यह सम्बन्धों को तोड़ देगा और नष्ट कर देगा। परन्तु यदि हम प्रत्येक मित्र, पारिवारिक सदस्य और पड़ोसी को प्रत्यक्ष प्रेम और स्नेह के साथ संजोते हैं, तो हम परमेश्वर को आदर देते हैं और उन लोगों के हृदयों को प्रोत्साहित करते हैं जिन्हें उसने हमारे आस-पास रखा है।       

उत्पत्ति 37

23 मार्च : हर एक अच्छा और उत्तम वरदान

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23 मार्च : हर एक अच्छा और उत्तम वरदान
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“क्योंकि हर एक अच्छा वरदान और हर एक उत्तम दान ऊपर ही से है, और ज्योतियों के पिता की ओर से मिलता है, जिसमें न तो कोई परिवर्तन हो सकता है, और न अदल बदल के कारण उस पर छाया पड़ती है।”  याकूब 1:17

क्या आप कभी उपहार खरीदने गए हैं और आपको पता ही नहीं था कि उस व्यक्ति को किस वस्तु की आवश्यकता है या उसे क्या चाहिए? आपको नहीं पता था कि कौन से नाप का या रंग का स्वेटर खरीदना है या बच्चे का खिलौना उसकी आयु के अनुसार उपयुक्त है या नहीं, इसलिए अन्ततः आपने हार मान ली हो और कहा, “मैं कुछ तो खरीद ही लेता हूँ! वे इसे वैसे भी वापस ले लेंगे। कौन इतनी चिन्ता करे?”

उपहार देना सदैव उतना सरल या आनन्ददायक नहीं होता जितना होना चाहिए। सच तो यह है कि हममें से सबसे उत्तम लोग भी हर बार उत्तम उपहार नहीं दे सकते क्योंकि हममें कमियाँ हैं। हमारे पास उचित उपहार देने के लिए ज्ञान और समझ की कमी होती है, और कभी-कभी संसाधनों या इच्छा-शक्ति की भी कमी होती है। इस बात में हम परमेश्वर से पूरी तरह से अलग हैं, क्योंकि परमेश्वर उत्तम वरदान देने वाला है, और केवल  उत्तम वरदान ही देता है। वह स्वभाव से ही भला है और उदारता से भरपूर है। वह बदले में कुछ भी उम्मीद किए बिना देता है और वह प्राप्त करने वाले व्यक्तियों की योग्यता के आधार पर अपनी भलाई को सीमित नहीं करता। और उसके द्वारा दिए गए किसी भी वरदान को कभी भी वापस करने की आवश्यकता नहीं होती।

न केवल परमेश्वर उत्तम रीति से उदार है, अपितु उस उदारता में कभी बदलाव नहीं आता। यहाँ तक ​​कि संसार के सबसे भले माता-पिताओं के पास भी सही समय पर और सही तरीके से जाना पड़ता है, क्योंकि वे सदैव एक समान नहीं होते। बच्चे सीखते हैं कि वे अपने समय को कैसे चुनें। जब मेरे पिता बिजली कम्पनी के साथ बात करने के लिए फोन पर प्रतीक्षा कर रहे होते थे, तब एक किशोर के रूप में मुझे उनके हाव-भाव समझना सरल लगता था और सोचा करता था, “मुझे नहीं लगता कि मेरी कार के लिए दो नए टायर माँगने का अभी सही समय है।”

यद्यपि हमारे स्वर्गिक पिता के साथ हमें यह सोचने की आवश्यकता नहीं है कि उसके पास जाना ठीक है या नहीं। वह न तो अस्थिर स्वभाव का है और न ही जल्दी क्रोध करने वाला। हम हियाव रख सकते हैं कि वह सर्वदा उचित रीति से कार्य करेगा। हम उसे किसी भी बात में अनजान, असमर्थ, अनुपलब्ध या अनिच्छुक नहीं पाएँगे। मसीह के द्वारा वह हमारे हृदय की प्रार्थनाओं और हमारी प्रतिदिन की चिन्ताओं के लिए उपलब्ध और प्रतिक्रियाशील है।

हम परमेश्वर के बच्चे हैं, और हमारे लिए अपने प्रेम को व्यक्त करने के तरीकों में से एक है हमारे लिए उसके उत्तम वरदान। इसलिए उसके प्रत्येक बच्चे में पाया जाने वाला एक गुण कृतज्ञता होना चाहिए। यदि हम अपने पिता के चरित्र को जानते हैं तो हम आभारी होने के अतिरिक्त और क्या हो सकते हैं, तब भी जब उसके वरदान वे न हों जिन्हें हमने स्वयं चुना हो? इसलिए ध्यान से अपनी आशिषों को प्रतिदिन गिना करें। याद रखें कि सभी भली वस्तुएँ उसी की देन हैं। और उससे यह कहा करें:

महान है तेरी विश्वासयोग्यता, हे परमेश्वर मेरे पिता,

न किसी परिवर्तन के कारण तुझ पर छाया पड़ती है…

जो कुछ भी मुझे चाहिए था, तेरे हाथ ने दिया—

महान है तेरी विश्वासयोग्यता, प्रभु, मेरे लिए!  [1]       

भजन संहिता 103

22 मार्च : ऐश्वर्य-पूर्ण आत्मसमर्पण

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22 मार्च : ऐश्वर्य-पूर्ण आत्मसमर्पण
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“तब यहूदा सैनिकों के एक दल को और प्रधान याजकों और फरीसियों की ओर से प्यादों को लेकर, दीपकों और मशालों और हथियारों को लिए हुए वहाँ आया। तब यीशु, उन सब बातों को जो उस पर आने वाली थीं जानकर, निकला और उनसे कहा, ‘किसे ढूँढ़ते हो?’ उन्होंने उसको उत्तर दिया, ‘यीशु नासरी को।’ यीशु ने उनसे कहा, ‘मैं हूँ।’ उसका पकड़वाने वाला यहूदा भी उनके साथ खड़ा था। उसके यह कहते ही, ‘मैं हूँ,’ वे पीछे हटकर भूमि पर गिर पड़े।”  यूहन्ना 18:3-6

सुसमाचार के सभी लेखकों ने यीशु के जीवन की समान घटनाओं को वर्णित किया है, परन्तु उनमें से प्रत्येक घटनाक्रम यीशु की पहचान के विशेष विवरण और पहलुओं पर प्रकाश डालता है। यूहन्ना का एक उद्देश्य यह था कि वह यीशु की श्रेष्ठता को और उन सभी परिस्थितियों पर उसकी विजय प्राप्ति को स्थापित करे जो उसका अनादर करने और उसे अपमानित करने के लिए निर्धारित की गई थीं। गतसमनी के बगीचे में यीशु को बन्दी बना लिए जाने पर विचार करें। उसने अपनी इच्छा से किन्तु अधिकारपूर्वक आत्मसमर्पण किया और संसार के उद्धारकर्ता के रूप में अपनी महिमा को प्रकट किया। एक समय ऐसा था जब लोग यीशु पर एक राजा का मुकुट थोपना चाहते थे, परन्तु वह पीछे हट गया था क्योंकि वह जानता था कि सांसारिक राजपद उसके लिए नहीं था (यूहन्ना 6:15)। यहाँ जब सैनिक उस पर एक क्रूस थोपने आए, तो वह जानता था कि आगे क्या-क्या आने वाला था। वे निश्चित रूप से यह उम्मीद कर रहे थे कि इस कुख्यात गलीली बढ़ई को ढूँढने के लिए दूर-दूर तक जाना पड़ेगा। इसके विपरीत, यहाँ वह स्वेच्छा से आत्मसमर्पण कर रहा था, उसकी वाणी में ऐश्वर्य था, उसकी आँखों में एक भाव था और जिस प्रकार उसने अपने आप को प्रस्तुत किया था, उस उपस्थिति ने उस क्षण की गम्भीरता को बढ़ा दिया था। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि वे “पीछे हटकर भूमि पर गिर पड़े।”

जब यीशु ने उन लोगों के सामने आत्मसमर्पण किया जो उसे ईश-निन्दक और अपराधी मानते थे, तो उसने अपनी पहचान का इनकार नहीं किया। सच यह है कि उसने ऐसी भाषा का उपयोग किया जो उसकी दिव्य पहचान और अधिकार को व्यक्त करती थी। यीशु ने “मैं हूँ” वाक्यांश का प्रयोग न केवल सैनिकों को यह बताने के लिए किया कि वही नासरत का यीशु था, अपितु इस वाक्यांश से उसने अपनी पहचान उस परमेश्वर के रूप में भी दिखाई जो मूसा के सामने जलती झाड़ी में प्रकट हुआ था (निर्गमन 3:14)। यह वही वाक्यांश था जिसके कारण कुछ महीनों पहले उसको लगभग पथराव किए जाने की स्थिति पर पहुँचा दिया था (यूहन्ना 8:58-59), क्योंकि यह एक स्पष्ट दावा था कि वह स्वयं सर्व-विद्यमान, जीवित परमेश्वर था।

अब यहाँ यह परमेश्वर है, जो आगे बढ़कर अपने मित्रों को विरोध करने से रोक रहा है और अपने शत्रुओं को अपनी हत्या कर देने की अनुमति दे रहा है। क्यों? जब मसीह बगीचे में सामने आया तो वह न केवल अपने चेलों की रक्षा कर रहा था अपितु अपने लोगों के लिए प्रावधान भी कर रहा था। वह पापी मनुष्यों के बदले में सामने आया, उस सब की पूर्ति के रूप में जिसकी लम्बे समय से आशा की जा रही थी। वह जानता था कि वह किस ओर कदम बढ़ा रहा था, और वह यह था, “मसीह ने भी, अर्थात् अधर्मियों के लिए धर्मी ने, पापों के कारण एक बार दुख उठाया, ताकि हमें परमेश्‍वर के पास पहुँचाए” (1 पतरस 3:18)।

अपने आत्मसमर्पण और दिव्य अधिकार के संयोजन में मसीह ने क्रूस की ओर अगला कदम बढ़ाया, जहाँ उसके बलिदान ने हमारे उद्धार को जीत लिया। वह क्रूस से भागा नहीं, बल्कि दृढ़ता से उसकी ओर बढ़ा। और उसने यह आपके लिए किया।

यह बहुत ही अद्भुत बात है,

लगभग इतनी अद्भुत कि यह हो भी सके,

कि परमेश्वर का अपना पुत्र स्वर्ग से आए,

और मेरे जैसे बच्चे को बचाने के लिए मर जाए। [1]    
यूहन्ना 18:1-14

21 मार्च : ये देरी क्यों?

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21 मार्च : ये देरी क्यों?
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“पूर्व युग में परमेश्‍वर ने बापदादों से थोड़ा-थोड़ा करके और भाँति–भाँति से भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बातें कर, इन अन्तिम दिनों में हमसे पुत्र के द्वारा बातें कीं, जिसे उसने सारी वस्तुओं का वारिस ठहराया और उसी के द्वारा उसने सारी सृष्टि की रचना की है।”  इब्रानियों 1:1-2

जिस समय में हम जी रहे हैं उसका वर्णन करने के कई तरीके हैं, जैसे कि 21वीं सदी, या आधुनिकता के बाद का समय, या वैश्वीकरण का युग, या फिर प्रौद्योगिकी युग। परन्तु मूल रूप से और बुनियादी रीति से हम “अन्तिम दिनों” में जी रहे हैं। इसके बारे में जानकारी के आधार पर यह वाक्यांश बहुत अनोखा या रोमांचक लग सकता है। सचमुच “अन्तिम दिनों” के विचार के बारे में बहुत भ्रान्ति हो सकती है।

नया नियम इस वाक्यांश का उपयोग केवल यीशु के प्रथम और द्वितीय आगमन के बीच के समय का वर्णन करने के लिए करता है। यीशु आ चुका है,  और यीशु आने वाला है,  और हम उद्धार के इतिहास में उन दो महान पड़ावों के मध्य में जी रहे हैं। उसका पहला आगमन उसके राज्य को पृथ्वी पर लाया और उसने “अन्तिम दिनों” को वर्तमान वास्तविकता के रूप में प्रारम्भ किया। उसका जीवन, मृत्यु, पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण सभी परमेश्वर के आत्मा के कार्य करने को दिखाते हैं और यदि परमेश्वर का आत्मा कार्य कर रहा है, तो यीशु यह सिखाता है, “परमेश्वर का राज्य तुम्हारे पास आ पहुँचा है” (मत्ती 12:28)। इसलिए जब यीशु एक भीड़ को “परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने” (मरकुस 10:15; लूका 18:17) के लिए निमन्त्रण देता है, तो वह भविष्य के किसी राज्य में प्रवेश करने की बात नहीं कर रहा है बल्कि एक वर्तमान वास्तविकता की बात कर रहा है, अर्थात् यीशु के वर्तमान शासन और राज्य की बात कर रहा है।

तो राज्य अभी इसी समय में  है। परन्तु राज्य उस आने वाले समय में  भी है, कुछ ऐसा जिसे हम भविष्य में पूर्ण रूप से देखेंगे, जब प्रभु यीशु का आगमन होगा। अपने द्वितीय आगमन पर यीशु अपने राज्य को पूरी तरह से स्थापित करेगा। उस समय वह अपने विश्वासियों को प्रसन्नता से ग्रहण करते हुए उनसे कहेगा, “उस राज्य के अधिकारी हो जाओ, जो जगत के आदि से तुम्हारे लिए तैयार किया गया है” (मत्ती 25:34) और “पृथ्वी यहोवा के ज्ञान से ऐसी भर जाएगी जैसा जल समुद्र में भरा रहता है” (यशायाह 11:9)। वह राज्य जो पहले अपने राजा के साथ आया था, वह भविष्य में अपनी सम्पूर्णता और महिमा में पूरी तरह से आ जाएगा।

अतः हम मसीही लोग इस बीच के समय में जी रहे हैं, जिसे “अन्तिम दिन” कहा जाता है। जो लोग मसीह में हैं वे अब नई सृष्टि हैं, किन्तु उन्हें अभी तक उस नई सृष्टि के सभी लाभ और आशिषें प्राप्त नहीं हुई हैं। तब तक के लिए विश्वासी लोग पाप से भरे इस पतित संसार में इस वर्तमान युग में रहते हैं और उस आने वाले युग की आकांक्षा करते हैं।

फिर क्यों ऐसा है कि मसीह के प्रथम और द्वितीय आगमन के बीच का समय इतना लम्बा लगता है? ये देरी क्यों? इसका कारण यह है कि परमेश्वर ने सोच-समझकर यीशु के आगमन को विलम्बित कर रखा है, जिससे कि अधिक से अधिक लोगों को उसके द्वारा बोले गए वचनों को सुनने, मन फिराने और विश्वास करने का अवसर मिले (2 पतरस 3:9)। अन्तिम दिन वे दिन हैं जब राज्य में प्रवेश करने का अवसर उपलब्ध है, इससे पहले कि द्वार बन्द कर दिया जाएगा।

चूंकि हम यह जानते हैं कि हम किस युग में रह रहे हैं और किसके आगमन से इसका समापन हो जाएगा, तो फिर “[हमें] कैसे मनुष्य होना चाहिए?” (2 पतरस 3:11)। पवित्रशास्त्र हमें बताता है, “यत्न करो कि तुम शान्ति से उसके सामने निष्कलंक और निर्दोष ठहरो, और हमारे प्रभु के धीरज को उद्धार समझो” (2 पतरस 3:14-15)। दूसरे शब्दों में, यदि “अन्तिम दिन” आज समाप्त हो जाएँ और प्रभु यीशु अपनी महिमा में लौट आए, तो यह सुनिश्चित करें कि आप ऐसा जीवन जी रहे हों जो उसे प्रसन्न करता हो और ऐसे शब्दों को बोलने के तरीके खोज रहे हों जो उसकी उद्‌घोषणा करते हों।       लूका 17:20-37

20 मार्च : कृपापूर्वक आभार

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20 मार्च : कृपापूर्वक आभार
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“उसकी महिमा की शक्ति के अनुसार सब प्रकार की सामर्थ्य से बलवन्त होते जाओ, यहाँ तक कि आनन्द के साथ हर प्रकार से धीरज और सहनशीलता दिखा सको, और पिता का धन्यवाद करते रहो, जिसने हमें इस योग्य बनाया कि ज्योति में पवित्र लोगों के साथ मीरास में सहभागी हों।”  कुलुस्सियों 1:11-12

लगभग हर व्यक्ति एक अच्छा उपहार पसन्द करता है। परिवार, आज़ादी, छुट्टी, एक गर्म बिछौना और एक ताजगी से भरा पेय, ये सभी हृदय में आभार उत्पन्न कर देते हैं और हम सभी स्वाभाविक रूप से उनके लिए कम से कम कुछ मात्रा में आभार व्यक्त करने में सक्षम होते हैं। “धन्यवाद” ऐसा शब्द है, जिसे हम बचपन में ही सीख जाते हैं।

अमेरिका के प्रसिद्ध जागृति-प्रचारक जॉनथन एडवर्ड्स ने “स्वाभाविक आभार” और “कृपापूर्वक आभार” के बीच अन्तर स्पष्ट करने में सहायक रीति से काम किया।[1] जो वस्तुएँ हमको दी जाती हैं और उनके साथ जो लाभ मिलते हैं, उनके द्वारा स्वाभाविक आभार का आरम्भ होता है। स्वाभाविक आभार कोई भी व्यक्ति व्यक्त कर सकता है। परन्तु कृपापूर्वक आभार बहुत अलग होता है, और केवल परमेश्वर की सन्तानें ही इसका अनुभव कर सकती हैं और इसे व्यक्त कर सकती हैं। कृपापूर्वक आभार परमेश्वर के द्वारा दिए गए किसी भी उपहार या सुख पर ध्यान दिए बिना उसके चरित्र, भलाई, प्रेम, सामर्थ्य और उत्कृष्टता को पहचानता है। वह जानता है कि हमारे पास परमेश्वर के प्रति आभारी होने का कारण है, फिर चाहे हमारा दिन अच्छा हो या बुरा, चाहे हमारे पास काम हो या न हो, चाहे दैनिक समाचार उत्साहजनक हों या पूरी तरह से निराशाजनक, चाहे हम पूरी तरह स्वस्थ हों या किसी घातक बीमारी का सामना कर रहे हों। ऐसा आभार केवल अनुग्रह से ही पाया जाता है, और यह किसी व्यक्ति के जीवन में पवित्र आत्मा का सच्चा चिह्न होता है। कृपापूर्वक आभार हमें इस जागरूकता के साथ सभी बातों का सामना करने में सक्षम बनाता है कि परमेश्वर हमारे जीवन और परिस्थितियों में गहन रूप से जुड़ा हुआ है, क्योंकि उसने हमें अपने प्रेम के विशेष पात्र बनाया है।

जब चेचक के टीके के कारण जॉनथन एडवर्ड्स की मृत्यु हो गई, तो उनकी पत्नी साराह ने अपनी बेटी को लिखा, “मैं क्या कहूँ? एक पवित्र और भले परमेश्वर ने हमें एक काले बादल से ढक दिया है।” इसमें जो सच्चाई है, उसको देखिए। इसमें खुशी या सन्तुष्टि का कोई ऊपरी अप्रिय दिखावा नहीं है। उनके पति की मृत्यु संयोगवश नहीं हुई थी, बल्कि यह उनके परिवार के विरुद्ध निर्णय लेने की परमेश्वर की सम्प्रभुता थी, जिसने जॉनथन को उसके अनन्त पुरस्कार के लिए घर लाने का सही समय निर्धारित किया था। और इसलिए साराह ने आगे लिखा, “किन्तु मेरा परमेश्वर जीवित है; और मेरा हृदय उसके पास है . . . हम सभी परमेश्वर को सौंप दिए गए हैं: और मैं वहीं हूँ, और वहीं रहना पसन्द करती हूँ।”[2]

दुख के समय में हम कभी भी स्वाभाविक आभार के द्वारा ऐसे शब्द नहीं बोल पाएँगे, जो हमें किसी को खो देने के समय सहायता नहीं कर सकते। ऐसी सोच केवल कृपापूर्वक आभार से ही प्रवाहित हो सकती है। हो सकता है कि आप इस समय कठिन या दिल तोड़ देने वाली परिस्थितियों का सामना कर रहे हों; और यदि आप अभी ऐसी परिस्थिति में नहीं हैं, तो कभी न कभी वह दिन अवश्य आएगा क्योंकि हम एक पतित संसार में जी रहे हैं। किन्तु उन क्षणों में आप परमेश्वर के प्रेम से लिपटे रह सकते हैं और परमेश्वर की भलाई पर भरोसा करने को चुन सकते हैं, जो सबसे स्पष्ट रीति से क्रूस पर व्यक्त हुई है। तब सबसे बुरे समय में भी आप उसकी उपस्थिति के आनन्द को जान पाएँगे और आपके पास सदैव उसे धन्यवाद देने का कारण होगा। यह कह सकने में बल, गरिमा और आराधना है, “यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है” (अय्यूब 1:21)।       

रोमियों 11:33-36

19 मार्च : एक सच्ची नबूवती आवाज

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19 मार्च : एक सच्ची नबूवती आवाज
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“उन्होंने, ‘शान्ति है, शान्ति’ ऐसा कह कहकर मेरी प्रजा के घाव को ऊपर ही ऊपर चंगा किया, परन्तु शान्ति कुछ भी नहीं है।”  यिर्मयाह 8:11

जब हमारा सामना किसी गम्भीर रोग होता है, तो हममें से कोई भी नौसिखिए डॉक्टर से इलाज नहीं कराना चाहता। कल्पना करें कि आप ऐसे डॉक्टर के पास जाते हैं, जो माँस के सड़ जाने का इलाज केवल एक अच्छी सी पट्टी बाँधकर कर देता है, आपको आपकी परेशानी के बदले में कुछ अच्छे शब्द लिखकर देता है और आपको एक सुखद शाम की शुभकामनाएँ देता है। इससे आपको पहले से अच्छा महसूस हो सकता है, किन्तु इससे समस्या का समाधान नहीं होगा और जल्द ही आपकी हालत पहले से भी खराब हो जाएगी!

पुराने नियम के समय में, भविष्यद्वाक्ताओं का कार्य परमेश्वर के वचन को बोलना और परमेश्वर के लोगों को उसकी वाचा का पालन करने के लिए प्रेरित करना होता था। परमेश्वर अपना वचन भविष्यद्वक्ताओं के मुँह में डालता था, और वे वही घोषणा करते थे जो परमेश्वर कहता था, न कि जो उनके अपने मन में आता था। और प्रायः उनका सन्देश होता था, सावधान हो जाओ! न्याय आने वाला है।  यह बिल्कुल भी सुखद घोषणा नहीं थी!

क्योंकि परमेश्वर का सन्देश इतना चुनौतीपूर्ण था, इस कारण झूठे भविष्यद्वक्ता बहुत हो गए थे और एक तरह से जो कुछ वे चाहते थे, वह सब उनको प्राप्त हो जाता था। उन्हें भविष्यद्वक्ता के रूप में जाना जाता था और वे बड़ी-बड़ी बातें बोल सकते थे और साथ ही वे लोगों को वे बातें भी कह सकते थे, जो वे सुनना चाहते थे। झूठा भविष्यद्वक्ता उस नौसिखिए डॉक्टर के समान होता था, जो लोगों से कहता था कि सब कुछ ठीक हो जाएगा, जबकि वास्तव में स्थिति निराशाजनक होती थी। यह सुनना अच्छा लगता है कि सब कुछ ठीक है और आपके देश में शान्ति का वास है, जब तक कि शत्रु दरवाज़े पर न दिखाई दे। तब यह आवश्यक हो जाता है कि आप तैयार रहें।

जबकि सच्चे भविष्यद्वक्ता परमेश्वर के आने वाले न्याय के बारे में बात करते थे, तौभी उनका सन्देश लोगों को अपने आप में सन्तुष्ट रहने के विरुद्ध चेतावनी भी देता था और उन्हें निराशा के विरुद्ध प्रोत्साहित भी करता था। परमेश्वर ने सर्वदा अपने लोगों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का आश्वासन दिया है, उनके लिए एक अति-उत्तम भविष्य की प्रतिज्ञा की है। न्याय से सामना होने पर उनकी एकमात्र आशा परमेश्वर से अलग  शरण मिलने में नहीं, बल्कि परमेश्वर में  शरण मिलने में होती थी।

हमारे समय में भी झूठे भविष्यद्वक्ता भरे पड़े हैं। उनके शब्द किसी समारोह के सामान्य प्रारम्भिक वक्ता की झूठी प्रशंसा में सुनाई दे जाते हैं, जैसे कि “आप इस समाज के अब तक के सबसे बढ़िया युवा लोग हैं। भविष्य आपके हाथों में है। आप उड़ान भरने के लिए तैयार हैं!” परन्तु इसी तरह की उथली बातें बहुत सी कलीसियाओं में भी बोली जाती हैं, जिनकी शिक्षा में अस्पष्ट सामान्य बातें और श्रोताओं के लिए कथित रूप से प्रेरणादायक आधे-अधूरे सत्य शामिल होते हैं; और आधा-सत्य, आधा-झूठ भी होता है।

हमें अपने समय में भी सच्ची भविष्यद्वाणी की आवाज की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी यिर्मयाह के समय में परमेश्वर के लोगों को थी। हमारी कलीसियाओं, हमारे राष्ट्र और पूरे संसार को ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो सच बोलने का साहस रखते हैं, भले ही इससे उपहास और अस्वीकृति मिले, जैसे कि पाप के बारे में बोलना, इस बात पर जोर देना कि परमेश्वर के कुछ नैतिक मानक हैं, न्याय की चेतावनी देना, यीशु के भविष्य में पुनः आगमन की घोषणा करना और इस प्रकार केवल उसकी ओर संकेत करने में सक्षम होना, जो बचा सकता है।

परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह ऐसे व्यक्तियों को खड़ा करे जो परमेश्वर के वचन से और परमेश्वर के आत्मा की अधीनता में अपने श्रोताओं को चुनौती देने के लिए तैयार हों। प्रार्थना करें कि जब आप ऐसी आवाज के माध्यम से परमेश्वर के वचन का सच में प्रचार होते हुए सुनें, तो आप आत्म-सन्तुष्टि से अपने आप को बचा सकें, सुनने के लिए तैयार हों, और परमेश्वर में अर्थात् अपनी एकमात्र आशा में शरण लेने के लिए तैयार रहें। और प्रार्थना करें कि आपके आस-पड़ोस में और आपके कार्यस्थल में आप वही आवाज बन सकें।       

1 थिस्सलुनीकियों 5:1-11

18 मार्च : विजयी सिंह

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18 मार्च : विजयी सिंह
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“तब मैं फूट फूटकर रोने लगा, क्योंकि उस पुस्तक के खोलने या उस पर दृष्टि डालने के योग्य कोई न मिला। इस पर उन प्राचीनों में से एक ने मुझ से कहा, ‘मत रो; देख, यहूदा के गोत्र का वह सिंह जो दाऊद का मूल है, उस पुस्तक को खोलने और उसकी सातों मुहरें तोड़ने के लिए जयवन्त हुआ है।’ तब मैं ने उस सिंहासन और चारों प्राणियों और उन प्राचीनों के बीच में, मानो एक वध किया हुआ मेमना खड़ा देखा।”  प्रकाशितवाक्य 5:4-6

हममें से कई लोगों ने बचपन में अपने माता-पिता से यह सुना होगा, “क्या तुम्हें . . . याद रहा?” इसका एक उदाहरण इस प्रकार है; जब भी मैं किसी के घर से लौटता था, तो मुझे प्रायः यह सुनने को मिलता था, “क्या तुम्हें धन्यवाद कहना याद रहा?” मुझे कोई नई बात बताए जाने की आवश्यकता नहीं होती थी; मुझे केवल याद रखना होता था। जब यीशु द्वारा उस स्वर्गिक वास्तविकता का दर्शन प्रेरित यूहन्ना ने देखा, तो वह आँसुओं में डूब गया क्योंकि वह डर गया कि कोई भी ऐसा नहीं है जो संसार के रहस्यों को देख सके और उसके पहली सदी के अनुभव की परेशानियों का अर्थ बता सके। किन्तु यूहन्ना को कोई नई जानकारी दिए जाने की आवश्यकता नहीं थी। उसे केवल वह याद दिलाए जाने की आवश्यकता थी, जो वह पहले से जानता था। उसने मूलभूत बातों को भूलकर गलती की थी।

यूहन्ना से कहा गया कि वह रोए नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की ओर देखे जो पुस्तक को खोल सकता है। जब वह मुड़ा तो उसने “मानो एक वध किया हुआ मेमना खड़ा देखा।” मेमने के घाव मसीह की मृत्यु की याद दिलाते थे, जिनके द्वारा उसने उद्धार को जीता था। किन्तु यह मेमना खड़ा था, जो उसके पुनरुत्थान की विजय का प्रतीक था। यहाँ इस दर्शन में हम यीशु को देखते हैं, जो परम-दयालु और सर्वशक्तिमान है। वह मेमना है, और वह सिंह है। वह पूरे संसार की आराधना और आज्ञाकारिता के योग्य है और उसकी मांग करता है और उसे वह अवश्य मिलेगी।

यूहन्ना के आँसुओं का समाधान यीशु था, ठीक वैसे ही जैसे हमारे अपने भय के आँसुओं का समाधान भी वही है, विशेषकर तब जब हम महसूस करते हैं कि सारा संसार हमारे विरुद्ध हो गया है, हम थक चुके हैं, छोटे, निर्बल और अधिकारहीन हैं, और जब यह मान लेने का प्रलोभन हमारे सामने आता हैं कि यह संसार किसी के नियन्त्रण में नहीं है और इसमें केवल अराजकता का बोलबाला है।

हममें से कोई नहीं जानता कि कोई दिन क्या लेकर आएगा या किसी रात में क्या घटित हो जाएगा। ये रहस्य केवल परमेश्वर के अधिकार में हैं। परन्तु हम कितने महान अनुग्रह का अनुभव करते हैं, जब परमेश्वर हमारे कन्धे पर थपथपाकर हमें हमारी बाइबल की ओर मोड़ते हुए कहता है कि क्या तुम भूल रहे हो कि यहूदा के गोत्र का सिंह वास्तव में विजय प्राप्त कर चुका है, कि नियन्त्रण उसके हाथ में है, कि भविष्य उसके अधिकार में है, कि वह राजा है?  यीशु ने पहले ही यूहन्ना से कह दिया था, “मत डर; मैं प्रथम और अन्तिम और जीवता हूँ; मैं मर गया था, और अब देख मैं युगानुयुग जीवता हूँ; और मृत्यु और अधोलोक की कुंजियाँ मेरे ही पास हैं” (प्रकाशितवाक्य 1:17-18)।

इसलिए जब आप वर्तमान या भविष्य से निराश या पराजित या परेशान महसूस करें, तो माँग केवल यही है कि जो आप पहले से जानते हैं उसे याद रखें। यहूदा के सिंह की ओर देखें, जो हमारे लिए वध किया गया मेमना है। वह योग्य है और सक्षम है कि वह पुस्तकों को खोल सके और इस संसार के इतिहास को उसके अन्त की ओर, अर्थात् उसके पुनः आगमन और महिमा में हमारे प्रवेश की ओर ले जा सके।       

प्रकाशितवाक्य 5

1 मार्च : हमारी आत्माओं के लिए एक गढ़

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1 मार्च : हमारी आत्माओं के लिए एक गढ़
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“हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्‍वर और पिता का धन्यवाद हो कि उसने हमें मसीह में स्वर्गीय स्थानों में सब प्रकार की आत्मिक आशीष दी है। जैसा उसने हमें जगत की उत्पत्ति से पहले उसमें चुन लिया कि हम उसके निकट प्रेम में पवित्र और निर्दोष हों। और अपनी इच्छा के भले अभिप्राय के अनुसार हमें अपने लिए पहले से ठहराया कि यीशु मसीह के द्वारा हम उसके लेपालक पुत्र हों।”  इफिसियों 1:3-5

परमेश्वर ने आपको बहुत पहले से प्रेम किया है।

इफिसियों को लिखे अपने पत्र के आरम्भ में पौलुस द्वारा स्तुति का इस प्रकार उण्डेला जाना, हमें उन सभी कार्यों की महिमा के बारे में बताता है, जो परमेश्वर ने मसीह में हमारे लिए किए हैं। इस काम को इतना प्रभावशाली बनाने वाली एक विशेषता यह है कि इसका आरम्भ परमेश्वर से होता है, जो हमें याद दिलाता है कि हमारे अस्तित्व में आने से पहले ही उसने लोगों को अपने पास लाने की पहल की। हमारे सामने यह प्रलोभन आ सकते हैं कि हमें मानवीय प्रयासों के द्वारा परमेश्वर की खोज करने की आवश्यकता है; और निस्सन्देह, संसार के कई धर्म यही बात सिखाते भी हैं। परन्तु अपने आरम्भ से ही बाइबल यह सिखाती है कि वास्तव में परमेश्वर स्वयं हम तक पहुँचता है।

मसीह में हमारा चुनाव सृष्टि की रचना के बाद किसी समय में किया गया कोई विचार नहीं है; यह सृष्टि की रचना से पूर्व अनन्त काल का विचार है। यह बात सच है कि हम स्वयं मसीह के पीछे चलने का निर्णय लेते हैं, किन्तु यह जानना कितनी दीनता लाता है कि यदि परमेश्वर ने हमें जगत की उत्पत्ति से पहले नहीं चुना होता तो हम कभी भी परमेश्वर को नहीं चुन सकते थे। यदि उसने पहले आपको अपनी सन्तान बना लेने का निर्णय नहीं लिया होता, तो आप उसके पीछे चलने का निर्णय लेने में सक्षम नहीं होते।

परमेश्वर की सम्प्रभुता के साथ मनुष्य के उत्तरदायित्व का सामंजस्य स्थापित करने में एक नाजुक तनाव व्याप्त होता है। बहुत से लोग मानते हैं कि उन्हें इन दोनों में से किसी एक को चुनना होगा, जबकि वास्तव में दोनों ही विचार बाइबल आधारित हैं और आपस में जुड़े हुए हैं। ये दो ऐसे सत्य हैं, जो एक दूसरे से जुड़े हुए और एक ही ओर उन्मुख हैं। ये हमारे सीमित मानवीय मनों को परस्पर-विरोधी लगते हैं, परन्तु फिर भी दोनों पूरी तरह से सत्य हैं। हमें इनको वास्तविकता से परे सिद्धान्तों के रूप में लेते हुए उनके बारे में बहुत अधिक चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। इसके विपरीत, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की हमारे पक्ष में हुई दया से चकित होते हुए हम आदर के साथ प्रत्युत्तर दे सकते हैं।

चुनाव की सैद्धान्तिक शिक्षा कोई ऐसा ध्वज नहीं है जिसके तले हम चलते हैं, अपितु यह हमारी आत्माओं के लिए एक गढ़ है।[1] यह बात हमारी सुरक्षा और हमारे आनन्द को महत्त्व प्रदान करती है। जैसे ही आप दीनता के साथ यह जान जाते हैं कि समय के आरम्भ से पहले ही मसीह में आपकी पहचान उस क्षण स्थापित हो गई थी, जब उसने पहली बार आप पर अपना स्नेह सुनिश्चित किया था, तभी से आप स्वतन्त्र हो जाते हैं और आप में हियाव आ जाता है। आपको अपने आप में कोई ऐसा कारण खोजने की आवश्यकता नहीं है, जिसके द्वारा आप यह समझ सकें कि आपको उसका अद्‌भुत अनुग्रह क्यों मिला है; आप केवल यह जानकर आनन्दित हो सकते हैं कि उसने आपको इसलिए चुना क्योंकि वह आपसे प्रेम करता है। क्योंकि आपको लगता है कि आप अपने मसीही जीवन में बहुत कम प्रगति कर रहे हैं, इस कारण आपको अपने पापों के कारण बोझिल रहने या कुचले रहने की आवश्यकता नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उसका प्रेम कभी भी आपके कार्यों या भले कार्य कर पाने की आपकी प्रतिज्ञा पर आधारित नहीं था। आप इस जीवन के उतार-चढ़ावों में से इस आश्वासन के साथ होकर जा सकते हैं कि जो आपको प्रेम करता है उसी ने सभी वस्तुओं को बनाया है तथा सभी वस्तुओं उसी के चलाए चलती हैं और यह भी कि क्योंकि आपको कभी भी उसका प्रेम प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं पड़ी, इसलिए आप इसे कभी खो भी नहीं सकते हैं।       
यूहन्ना 6:35-51

28 फरवरी : समर्पित और अटल

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“मैं ने अपने परमेश्‍वर यहोवा की पूरी रीति से बात मानी। तब उस दिन मूसा ने शपथ खाकर मुझसे कहा, ‘तू ने पूरी रीति से मेरे परमेश्‍वर यहोवा की बातों का अनुकरण किया है, इस कारण निस्सन्देह जिस भूमि पर तू अपने पाँव धर आया है वह सदा के लिए तेरा और तेरे वंश का भाग होगी।’”  यहोशू 14:8-9

बहुत से लोग जीवन में आरम्भ तो बहुत अच्छा करते हैं, परन्तु बाद में वे वह सब खो देते हैं जिसने उन्हें सफल बनाया था। हो सकता है कि युवावस्था में वे विख्यात रहे हों। 40 वर्ष की आयु में उनके जीवन में प्रसिद्धि, प्रभाव और प्रतिष्ठा थी। कलीसिया में, हम ऐसे व्यक्तियों को परमेश्वर के लिए अत्यन्त उपयोगी व्यक्तियों के रूप में देख सकते हैं, निस्सन्देह हम अपने आप को  भी उसी प्रकार देख सकते हैं। परन्तु प्रायः हम बीते हुए कल के विजेता बन कर रह जाने के प्रलोभन में फँस जाते हैं, उन “अच्छे वर्षों” को पीछे मुड़कर देखते रहते हैं और जिस तरह से सारी बातें आज के समय में हो रही हैं, उसके बारे में कुड़कुड़ाते रहते हैं।

यद्यपि यह बात बहुत से लोगों के लिए सच होती है, परन्तु कालेब के लिए यह बात बिल्कुल भी सच नहीं थी, जो इस सम्भावित उदासीनता से दूर रहा और विश्वास में बना रहा। उसने अपनी वृद्धावस्था से पहले के वर्ष अधिक चाहने योग्य परिवेश में नहीं बिताए थे। 40 वर्ष की आयु से वह चार दशकों तक मरुभूमि में भटकता रहा, क्योंकि उसके आस-पास के लोग परमेश्वर में विश्वास करने में विफल रहे थे। फिर भी निराशा और भटकते रहने के इस समय में कालेब कड़वाहट और असन्तोष से मुक्त रहा।

वास्तव में, अन्त में बातें इतनी बिगड़ गईं कि लोगों ने एक ऐसे अगुवे को खोजना आरम्भ कर दिया जो उन्हें पुराने अच्छे दिनों में वापस ले जा सके (गिनती 14:4)। अब, किसी को पीछे जाने के लिए सच में किसी अगुवे की आवश्यकता नहीं होती; आप स्वयं ही पीछे जा सकते हैं! हमें आगे बढ़ाने के लिए अगुवों की आवश्यकता होती है। आगे एक आने वाला कल है। आगे आने वाली कई पीढ़ियाँ हैं। हमारे संसार के लिए परमेश्वर की योजना में अभी भी ऐसे उद्देश्य हैं जिनका हमारे सामने उजागर होना अभी शेष है।

कालेब इसी भावना को प्रकट करता है। उसके आरम्भिक जीवन के स्पष्ट समर्पण का उसके मध्य वर्षों में उसकी निरन्तरता के साथ मिलन हो गया। वह न केवल 40, बल्कि 50, 60 और 70 की आयु में भी समर्पित और अटल रहा। उन सारे दशकों में उसने “पूरी रीति से प्रभु की बातों का अनुसरण किया।”

कई लोगों के लिए विवाह, घर, गृहस्थी, व्यावसायिक चिन्ताएँ, स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ, इत्यादि के क्षेत्र में प्रायः आत्मिक उत्साह और प्रभावशीलता में कमी आ जाती है। ऐसे लोग भी होते हैं जो बहुत सारे संसाधन, ऊर्जा और ज्ञान प्रदान कर सकते हैं, परन्तु ऐसा करने के विपरीत वे सेवाकार्य के काम को अगली पीढ़ी के लिए छोड़कर आराम करने का निर्णय ले लेते हैं। उन इस्राएलियों के समान जो मरुभूमि में थे, वे भी उदासीनता, आलोचना और निराशावाद में ही उलझे रह जाते हैं और अपने आत्मिक जीवन में होने वाली गिरावट को नहीं देख पाते।

आपके समर्पण, आपकी बातचीत और आपकी आत्मिक बढ़त का स्तर आज क्या है? क्या वे पहले जैसी ही हैं? इस्राएल की मरुभूमि वाली पीढ़ी की तरह आज की कलीसिया को भी विश्वास रखने वाले अनुभवी पुरुषों और स्त्रियों की बहुत आवश्यकता है, जो अच्छे और बुरे समय में, प्रत्येक मौसम में और प्रत्येक परिस्थिति में निरन्तर समर्पण के साथ जीवन जीते हों और वर्षों से वे उस मीरास की ओर बढ़ते जा रहे हैं जिसकी प्रतिज्ञा प्रभु ने अपने विश्वासयोग्य अनुयायियों से की है। आपके लिए आज उस मीरास की ओर चलना कैसा है और दस साल के बाद यह कैसा होगा?      न्यायियों 1:1-20

27 फरवरी : सहायता करने वाले शब्द

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27 फरवरी : सहायता करने वाले शब्द
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“एक ही मुँह से धन्यवाद और शाप दोनों निकलते हैं। हे मेरे भाइयो, ऐसा नहीं होना चाहिए। क्या सोते के एक ही मुँह से मीठा और खारा जल दोनों निकलता है? क्या अंजीर के पेड़ में जैतून, या दाख की लता में अंजीर लग सकते हैं? वैसे ही खारे सोते से मीठा पानी नहीं निकल सकता।”  याकूब 3:10-12

हमारे जीवन में हम अन्याय, निर्दयता, अप्रिय परिस्थितियों और प्रायः अप्रिय लोगों का सामना करते हैं। इन परिस्थितियों में मौखिक रूप से प्रतिक्रिया देने से पहले हमें अपने प्रभु से सीखी गई इस सच्चाई को स्मरण करना चाहिए कि हमारे शब्द हमारे हृदयों को दर्शाते हैं (मत्ती 12:34)। यदि हमारे शब्द मसीह के समान नहीं हैं, तो हमें सबसे पहले अपने मुँह को नहीं परन्तु अपने हृदयों को देखना चाहिए। इसी प्रकार, जब हम संघर्ष और चुनौती का उत्तर ऐसे शब्दों से देते हैं जो हानि पहुँचाने के स्थान पर सहायता करते हैं, तो यह हमारे भीतर हमारे प्रभु के कार्य का संकेत देता है।

हमारी जीभ में अपार शक्ति होती है, और हम उनका उपयोग सहायता करने, प्रोत्साहित करने, पुष्टि करने, समृद्ध करने, मेल-मिलाप करने, क्षमा करने, एक करने, शान्त करने और आशीष देने के लिए कर सकते हैं। यह मात्र एक संयोग नहीं है कि पुराने नियम के बहुत सारे नीतिवचनों के पद हमारे द्वारा बोले गए शब्दों को सम्बोधित करते हैं। सुलैमान के अनुसार “धर्मी का मुँह तो जीवन का सोता है” (नीतिवचन 10:11)। वह शब्दों के इस प्रयोग की तुलना उन सुन्दर बालियों से करता है, जो उसे पहनने वाली की सुन्दरता को निखारती हैं और उन सुन्दर आभूषणों से करता है जो घर की सुन्दरता को बढ़ाते हैं (नीतिवचन 25:12)। सम्भवतः वाणी की शक्ति के बारे में उसका सबसे उत्कृष्ट कथन उसका यह अवलोकन है, “जैसे चाँदी की टोकरियों में सोने के सेब हों, वैसा ही ठीक समय पर कहा हुआ वचन होता है” (वचन 11)।

वह क्या है, जिससे ऐसी जीवनदायक भाषा प्राप्त होती है? हमारे मुँह कैसे दूसरों के लिए आशीष ला सकते हैं? आशीष के शब्द “प्रेम में सच्चाई से चलते हुए” सच्चरित्रता से भरे होते हैं (इफिसियों 4:15)। वे विचारशील होते हैं, जो उस व्यक्ति द्वारा बोले जाते हैं जो “मन में सोचता है कि क्या उत्तर दूँ” (नीतिवचन 15:28)। वे प्रायः कम होते हैं और तर्कों से भरे होते हैं: “जो सम्भलकर बोलता है, वह ज्ञानी ठहरता है, और जिसकी आत्मा शान्त रहती है, वही समझ वाला पुरुष ठहरता है” (नीतिवचन 17:27)। और, निस्सन्देह, सहायक शब्द कोमल शब्द होते हैं। यद्यपि कठिन परिस्थितियों में इसे स्मरण रखना कठिन हो सकता है, तौभी यह सच है कि “कोमल उत्तर सुनने से गुस्सा ठण्डा हो जाता है” (नीतिवचन 15:1)। निस्सन्देह, नैतिक क्षमता से कोमल प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है; निरंकुश धुन और क्रोध को स्थान देने की तुलना में कोमलता के साथ उत्तर देने के लिए कहीं अधिक आत्म-संयम की आवश्यकता होती है।

आपके शब्दों की पहचान क्या होगी? क्या आप अपनी जीभ का उपयोग, जो आपके शरीर का एक छोटा-सा किन्तु अति-शक्तिशाली अंग है, शाप देने के बदले आशीष देने के लिए, जीवन नष्ट करने के बदले जीवन देने के लिए और हानि पहुँचाने के बदले सहायता करने के लिए समर्पित करेंगे?

आज ही संकल्प लें कि अपने हृदय में मसीह का आदर करते हुए और अपनी वाणी में उसकी मीठी सुगन्ध को भरते हुए आप अपने शब्दों का उपयोग उन लोगों की भलाई के लिए करेंगे जिनके साथ आप बातचीत करते हैं। फिर दीनतापूर्वक स्वीकार करें कि आप स्वयं ऐसा नहीं कर सकते (याकूब 3:8) और उससे कहें कि वह आपको अपने आत्मा से भरे, उस आत्मा से जो आपके हृदय और आपकी वाणी दोनों में शान्ति, कोमलता और संयम को विकसित करता है (गलातियों 5:22-23)।      
गलातियों 5:16-25