24 मार्च : पक्षपात की मूर्खता

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24 मार्च : पक्षपात की मूर्खता
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“इस्राएल अपने सब पुत्रों से बढ़ के यूसुफ से प्रीति रखता था, क्योंकि वह उसके बुढ़ापे का पुत्र था : और उसने उसके लिए एक रंगबिरंगा अंगरखा बनवाया। परन्तु जब उसके भाइयों ने देखा कि हमारा पिता हम सब भाइयों से अधिक उसी से प्रीति रखता है, तब वे उससे बैर करने लगे और उसके साथ ठीक से बात भी नहीं करते थे।”  उत्पत्ति 37:3-4

सम्बन्धों में पक्षपाती होना मूर्खता है।

हम पुराने नियम में परमेश्वर के लोगों की सम्पूर्ण कहानी में इसे देख सकते हैं, किन्तु ऐसा लगता है कि यह यूसुफ के जीवन में सबसे अधिक दिखाई देता है, क्योंकि वह अपने पिता याकूब की विशेष रुचि का पात्र था। यूसुफ राहेल का, जिससे याकूब ने आजीवन अत्यन्त प्रीति रखी और “[याकूब के] बुढ़ापे का पुत्र” था। इसलिए याकूब, जिसका नाम परमेश्वर ने इस्राएल रखा था, इस पुत्र से दूसरों से अधिक प्रीति रखता था। पक्षपात की इस जड़ के कारण इस परिवार में बहुत बुरा फल उत्पन्न हुआ।

याकूब ने एक उपहार के द्वारा अपना पक्षपात व्यक्त किया, वह एक “रंगबिरंगा अंगरखा” था जिसे उसने स्वयं बनाया था। यह स्पष्ट रूप से पक्षपात का एक प्रतीक था, जिसे पहनना यूसुफ को बहुत पसन्द था। इस विवादास्पद अंगरखे ने यूसुफ के भाइयों में अत्यन्त शत्रुता को भड़का दिया। उनकी शत्रुता से द्वेष और हत्या की मंशा उत्पन्न हो गई। उन्होंने अन्ततः अपने भाई को गुलाम के तौर पर बेचने और फिर उसकी मृत्यु हो जाने का स्वांग तक रच डाला।

यदि उपहार में दिया गया अंगरखा ऐसी प्रतिक्रिया को भड़का सकता है, तो निश्चित रूप से समस्या उस अंगरखे से कहीं अधिक बड़ी थी। निश्चय ही गुप्त रूप से पाप कहीं भीतर दृढ़ता से स्थापित रहा होगा। और यही बात हम यूसुफ के भाइयों के साथ भी पाते हैं। उनकी प्रमुख समस्या यह नहीं थी कि वह अंगरखा बहुत मूल्यवान था, किन्तु यह थी कि वह यूसुफ को उनसे अलग श्रेणी में स्थापित कर रहा था। उसे यह उपहार देकर याकूब ने यूसुफ को उसके भाई-बहनों से ऊपर उठा दिया था और यह बात उन्हें चुभती थी। जब किसी एक को प्रिय चुना जाता है, तो यह सदैव स्वाभाविक रूप से यह संकेत करता है कि दूसरा अप्रिय है, जो प्रिय के रूप में चुने गए व्यक्ति में अहंकार और घमण्ड दोनों को जन्म देता है और जो नहीं चुने गए हैं, उनमें क्रोध और कड़वाहट को जन्म देता है। आपने अपने आस-पास या अपने जीवन में भी प्रिय होने या उस प्रतिष्ठा के लिए अनदेखा किए जाने के विनाशकारी प्रभावों को देखा होगा।

याकूब को उस समस्या के बारे में अधिक भले ढंग से समझना चाहिए था, क्योंकि उसने स्वयं अतीत में अनुचित पक्षपात का अनुभव किया था, उसकी अपनी माँ ने उसे उसके भाई एसाव से अधिक प्रिय जाना था और इसके कारण अराजकता फैल गई थी। यूसुफ के अपने भाइयों के साथ सम्बन्धों के समान एसाव के साथ उसका सम्बन्ध कई वर्षों तक बिगड़ा रहा था।

तौभी हमें याकूब या उसके पुत्रों की मानसिकता और कार्यों से अपने आप को दूर करने में शीघ्रता नहीं करनी चाहिए, जैसे कि हम कभी भी कुछ ऐसा करने के दोषी नहीं हो सकते। हम सभी को सम्बन्धों में पक्षपात करने की मूर्खता और इसके साथ प्रायः जन्म लेने वाले रोष से सावधान रहना चाहिए। पक्षपात एक सामान्य और समझने योग्य भूल है, किन्तु इसकी छाया गहरी, काली और विनाशकारी होती है।

याकूब की मूर्खता के बारे में आलोचना करने के विपरीत, आइए हम उससे सीखें। प्रत्येक सम्बन्ध परमेश्वर की ओर से एक अनूठा वरदान होता है। जिस भी मात्रा में हम अपने आस-पास के लोगों के प्रति पक्षपात दिखाते हैं, चाहे वह किसी भी कारण से हो, तो हमें जान लेना चाहिए कि यह सम्बन्धों को तोड़ देगा और नष्ट कर देगा। परन्तु यदि हम प्रत्येक मित्र, पारिवारिक सदस्य और पड़ोसी को प्रत्यक्ष प्रेम और स्नेह के साथ संजोते हैं, तो हम परमेश्वर को आदर देते हैं और उन लोगों के हृदयों को प्रोत्साहित करते हैं जिन्हें उसने हमारे आस-पास रखा है।       

उत्पत्ति 37

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