21 मार्च : ये देरी क्यों?

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21 मार्च : ये देरी क्यों?
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“पूर्व युग में परमेश्‍वर ने बापदादों से थोड़ा-थोड़ा करके और भाँति–भाँति से भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बातें कर, इन अन्तिम दिनों में हमसे पुत्र के द्वारा बातें कीं, जिसे उसने सारी वस्तुओं का वारिस ठहराया और उसी के द्वारा उसने सारी सृष्टि की रचना की है।”  इब्रानियों 1:1-2

जिस समय में हम जी रहे हैं उसका वर्णन करने के कई तरीके हैं, जैसे कि 21वीं सदी, या आधुनिकता के बाद का समय, या वैश्वीकरण का युग, या फिर प्रौद्योगिकी युग। परन्तु मूल रूप से और बुनियादी रीति से हम “अन्तिम दिनों” में जी रहे हैं। इसके बारे में जानकारी के आधार पर यह वाक्यांश बहुत अनोखा या रोमांचक लग सकता है। सचमुच “अन्तिम दिनों” के विचार के बारे में बहुत भ्रान्ति हो सकती है।

नया नियम इस वाक्यांश का उपयोग केवल यीशु के प्रथम और द्वितीय आगमन के बीच के समय का वर्णन करने के लिए करता है। यीशु आ चुका है,  और यीशु आने वाला है,  और हम उद्धार के इतिहास में उन दो महान पड़ावों के मध्य में जी रहे हैं। उसका पहला आगमन उसके राज्य को पृथ्वी पर लाया और उसने “अन्तिम दिनों” को वर्तमान वास्तविकता के रूप में प्रारम्भ किया। उसका जीवन, मृत्यु, पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण सभी परमेश्वर के आत्मा के कार्य करने को दिखाते हैं और यदि परमेश्वर का आत्मा कार्य कर रहा है, तो यीशु यह सिखाता है, “परमेश्वर का राज्य तुम्हारे पास आ पहुँचा है” (मत्ती 12:28)। इसलिए जब यीशु एक भीड़ को “परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने” (मरकुस 10:15; लूका 18:17) के लिए निमन्त्रण देता है, तो वह भविष्य के किसी राज्य में प्रवेश करने की बात नहीं कर रहा है बल्कि एक वर्तमान वास्तविकता की बात कर रहा है, अर्थात् यीशु के वर्तमान शासन और राज्य की बात कर रहा है।

तो राज्य अभी इसी समय में  है। परन्तु राज्य उस आने वाले समय में  भी है, कुछ ऐसा जिसे हम भविष्य में पूर्ण रूप से देखेंगे, जब प्रभु यीशु का आगमन होगा। अपने द्वितीय आगमन पर यीशु अपने राज्य को पूरी तरह से स्थापित करेगा। उस समय वह अपने विश्वासियों को प्रसन्नता से ग्रहण करते हुए उनसे कहेगा, “उस राज्य के अधिकारी हो जाओ, जो जगत के आदि से तुम्हारे लिए तैयार किया गया है” (मत्ती 25:34) और “पृथ्वी यहोवा के ज्ञान से ऐसी भर जाएगी जैसा जल समुद्र में भरा रहता है” (यशायाह 11:9)। वह राज्य जो पहले अपने राजा के साथ आया था, वह भविष्य में अपनी सम्पूर्णता और महिमा में पूरी तरह से आ जाएगा।

अतः हम मसीही लोग इस बीच के समय में जी रहे हैं, जिसे “अन्तिम दिन” कहा जाता है। जो लोग मसीह में हैं वे अब नई सृष्टि हैं, किन्तु उन्हें अभी तक उस नई सृष्टि के सभी लाभ और आशिषें प्राप्त नहीं हुई हैं। तब तक के लिए विश्वासी लोग पाप से भरे इस पतित संसार में इस वर्तमान युग में रहते हैं और उस आने वाले युग की आकांक्षा करते हैं।

फिर क्यों ऐसा है कि मसीह के प्रथम और द्वितीय आगमन के बीच का समय इतना लम्बा लगता है? ये देरी क्यों? इसका कारण यह है कि परमेश्वर ने सोच-समझकर यीशु के आगमन को विलम्बित कर रखा है, जिससे कि अधिक से अधिक लोगों को उसके द्वारा बोले गए वचनों को सुनने, मन फिराने और विश्वास करने का अवसर मिले (2 पतरस 3:9)। अन्तिम दिन वे दिन हैं जब राज्य में प्रवेश करने का अवसर उपलब्ध है, इससे पहले कि द्वार बन्द कर दिया जाएगा।

चूंकि हम यह जानते हैं कि हम किस युग में रह रहे हैं और किसके आगमन से इसका समापन हो जाएगा, तो फिर “[हमें] कैसे मनुष्य होना चाहिए?” (2 पतरस 3:11)। पवित्रशास्त्र हमें बताता है, “यत्न करो कि तुम शान्ति से उसके सामने निष्कलंक और निर्दोष ठहरो, और हमारे प्रभु के धीरज को उद्धार समझो” (2 पतरस 3:14-15)। दूसरे शब्दों में, यदि “अन्तिम दिन” आज समाप्त हो जाएँ और प्रभु यीशु अपनी महिमा में लौट आए, तो यह सुनिश्चित करें कि आप ऐसा जीवन जी रहे हों जो उसे प्रसन्न करता हो और ऐसे शब्दों को बोलने के तरीके खोज रहे हों जो उसकी उद्‌घोषणा करते हों।       लूका 17:20-37

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