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7 अगस्त : हमें एक चमत्कार की आवश्यकता है

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7 अगस्त : हमें एक चमत्कार की आवश्यकता है
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“क्योंकि तुम ने नाशवान नहीं पर अविनाशी बीज से, परमेश्‍वर के जीवते और सदा ठहरने वाले वचन के द्वारा नया जन्म पाया है। क्योंकि ‘हर एक प्राणी घास के समान है, और उसकी सारी शोभा घास के फूल के समान है। घास सूख जाती है, और फूल झड़ जाता है, परन्तु प्रभु का वचन युगानुयुग स्थिर रहता है।’” 1 पतरस 1:23-25

सुसमाचार केवल अच्छे इरादों वाले लोगों को अपने जीवन में थोड़ा सा धर्म जोड़ने के लिए प्रेरणा देने वाली बात नहीं है। परमेश्वर का वचन विद्रोही हृदय का सामना करता है और उसे आज्ञाकारिता का आदेश देता है। यह ऐसा सन्देश है जो मरे हुए को जीवित कर देता है।

यह परिवर्तन कैसे होता है? केवल परमेश्वर के आत्मा के द्वारा। परमेश्वर का आत्मा ही वह काम करता है, जो किसी और तरीके से या किसी और साधन से नहीं हो सकता: यह नया जीवन लाने का कार्य है।

स्वभाव से हम सभी परमेश्वर के खिलाफ विद्रोही हैं। कोई भी उसकी खोज नहीं करता (रोमियों 3:11)। भले ही मैं खुद को एक अनीश्वरवादी, एक खोजी या खुले विचारों वाला कहूँ, तो वास्तव में मैं विद्रोही ही हूँ। और परमेश्वर “अब हर जगह सब मनुष्यों को मन फिराने की आज्ञा देता है” (प्रेरितों 17:30)। परमेश्वर हम सभी को पूरी तरह से मुड़ जाने के लिए बुलाता है—पाप और विद्रोह से निर्णायक रूप से मुँह मोड़ने और उसके राज्य के अधीन आने के लिए बुलाता है।

यदि कोई चमत्कार न हो तो हम ऐसा नहीं कर सकते। यदि हमें खुद छोड़ दिया जाए, तो हम मरे हुए हैं और हमारे पास शाश्वत जीवन की कोई आशा नहीं है। शुक्र है कि परमेश्वर के आत्मा का कार्य ही यह है—हमारे लिए वह चमत्कार करना। नया जीवन कुछ ऐसा है जो परमेश्वर अपने द्वारा ही उत्पन्न करता है, न कि कुछ ऐसा जो हम खुद उत्पन्न करें। पवित्र आत्मा हमें पाप के प्रति दोषी ठहराता है और यह यकीन दिलाता है कि यीशु अपने क्रूस पर मृत्यु के द्वारा इससे निपट चुका है।

पवित्रशास्त्र इस बारे में बिल्कुल स्पष्ट है: जब हम पापों में मरे हुए थे, तब हमें मसीह में जीवित किया गया (इफिसियों 2:1-5)। आत्मा हमें समझाता है कि हम अकेले इसका सामना करने के लिए तैयार नहीं हैं—अर्थात, हमारे पास एक गहरी और अन्तर्निहित समस्या है, जिसे हम ठीक नहीं कर सकते। हमें एक चमत्कार की आवश्यकता है। और परमेश्वर यही करता है। वह नया जीवन लाता है। वह हमें अपनी कृपा से बचाता है।

हमारे बारे में जो कुछ भी है वह धुंधला हो जाता है; जैसे पतरस हमें याद दिलाता है, हम सभी एक दिन घास के समान मुरझा जाएँगे। लेकिन एक बीज है जो अमरता उत्पन्न करता है, जो पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे भीतर बोया जाता है और जो अनन्त काल तक खिलता और फलता रहेगा: वह जीवन जो सुसमाचार के द्वारा नया जन्म लेता है। परमेश्वर का वचन हमेशा के लिए बना रहता है, और वह व्यक्ति भी जो उसमें कार्य करने वाले आत्मा के द्वारा नया जीवन प्राप्त करता है।

एक बार जब यह हमारे साथ होता है, तो हम बाइबल को केवल एक इतिहास की किताब या प्रेरणादायक कहानी के रूप में नहीं देखते। आत्मा के कार्य से यह एक प्रकाश बन जाता है, जो सच्चे जीवन को प्रकाशित करता है और हमारी आँखें यह समझने के लिए खुल जाती हैं कि परमेश्वर कौन है। यही कारण है कि हम बाइबल का अध्ययन करते हैं: ताकि हम उस परमेश्वर को बेहतर तरीके से देख सकें और जान सकें, जिसने हमें बचाया और जिसके साथ हम अनन्तकाल तक रहेंगे।

सो, यीशु का प्रेम आपको उसकी ओर आकर्षित करे। यीशु का आनन्द आपको उसकी सेवा करने की शक्ति दे। जो शान्ति और सन्तोष यीशु को जानने में आता है, वह आपको स्थिरता और स्पष्टता प्रदान करे जब आप यह विचार करते हैं कि आप कहाँ थे, कहाँ हैं, और कहाँ जा रहे हैं। आपका भौतिक शरीर अमर नहीं है; लेकिन आप अमर हैं।

भजन 119:65-80

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 72–73; प्रेरितों 26

6 अगस्त : महान विभाजन

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6 अगस्त : महान विभाजन
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“क्या तुम समझते हो कि मैं पृथ्वी पर मिलाप कराने आया हूँ? मैं तुम से कहता हूँ; नहीं, वरन् अलग कराने आया हूँ।” लूका 12:51

क्या यीशु पृथ्वी पर शान्ति लाने आया था, जैसा कि स्वर्गदूतों ने पहले क्रिसमस पर गाया था (लूका 2:14)? या फिर वह विभाजन लाने आया था, जैसा कि वह स्वयं यहाँ घोषित करता है?

हाँ।

सबसे पहले, हमें इस स्पष्ट विरोधाभास को स्वीकार करना चाहिए। यीशु अपने ही प्रश्न का उत्तर देते हुए कहता है, “क्या तुम समझते हो कि मैं पृथ्वी पर मिलाप कराने आया हूँ? मैं तुम से कहता हूँ; नहीं . . .” यह कथन न केवल स्वर्गदूतों की घोषणा से असंगत लगता है, बल्कि उसके अपने शिष्यों को शान्तिदूत बनने की दी गई शिक्षा (मत्ती 5:9) से भी टकराता प्रतीत होता है। ऐसा लगता है कि यीशु अपने पूरे सांसारिक सेवाकाल के बल देने वाले उद्देश्य का खण्डन कर रहा है, क्योंकि वह स्वयं को विभाजन और असहमति से जोड़ता है। तो फिर, हम यीशु के इन दोनों दावों—कि वे शान्ति भी लाएगा और विभाजन भी—को कैसे समझें?

जब यीशु ने कहा कि वह विभाजन लाने आया है, तो इसका सीधा सम्बन्ध उस कार्य से है जो उसने शान्ति स्थापित करने के लिए किया। दूसरे शब्दों में, जब हम इस शुभ सन्देश को समझते हैं कि “[परमेश्वर] ने उसे, जो पाप से अज्ञात था, हमारे लिए पाप ठहराया, कि हम उसमें होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ” (2 कुरिन्थियों 5:21), तो हम फिर कभी पहले जैसे नहीं रह सकते। यह इतना महान कार्य है कि यह उदासीनता का कारण नहीं बन सकता।

जब हमारे हृदय का नवीनीकरण होता है, तो हमारे बारे में सब कुछ बदल जाता है—हमारे मूल्य, हमारा ध्यान, हमारा उद्देश्य, हमारे सपने सब बदल जाते हैं। अब हम अपने सृष्टिकर्ता के साथ मेल में हैं, और हम अपने आप से भी शान्ति में रह सकते हैं। लेकिन एक न एक दिन यह रूपान्तरण विभाजनकारी साबित होगा। जब हम परमेश्वर के साथ अपनी शान्ति के इस अद्‌भुत कार्य को साझा करते हैं, इसके बारे में बोलते हैं, और इसे अपने जीवन में जीते हैं, तो हमें उपेक्षा, विरोध, और न्याय का सामना करना पड़ेगा—कभी-कभी अपने ही घर के लोगों से, जैसा कि यीशु ने चेतावनी दी थी (लूका 12:52-53)।

यीशु का पृथ्वी पर शान्ति लाना वास्तव में उस गहरे विभाजन और संघर्ष को उजागर करता है, जो आदम और हव्वा के विद्रोह के बाद से सृष्टिकर्ता और उसके स्वरूपधारी प्राणियों के बीच मौजूद रहा है। आपके वचन और कार्य, जो इस संसार के तरीकों से नहीं बल्कि स्वर्गिक आज्ञाओं से निर्देशित होते हैं, उसी विभाजन को प्रकट करेंगे। हममें से कई लोगों के लिए मसीह में विश्वास करने के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ यह विभाजन जीवन का एक कठिन और पीड़ादायक सत्य है।

फिर भी, हम सबके लिए एक महान आशा है: यीशु का अन्तिम उद्देश्य विभाजन नहीं बल्कि शान्ति है। बाइबल पूरी तरह स्पष्ट करती है कि “शान्ति का राजकुमार” (यशायाह 9:6) एक दिन अनन्त काल में राज्य करेगा। इस बीच किसी भ्रम में न रहें: यीशु का अनुसरण करने की एक कीमत है—एक ऐसी कीमत जिसे आप उसके आत्मा की शक्ति से आनन्दपूर्वक चुका सकते हैं, जब आप विभाजन का जोखिम उठाते हुए परमेश्वर की शान्ति के इस दिव्य प्रस्ताव को दूसरों तक पहुँचाते हैं।

प्रेरितों 17:1-15

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 70–71; प्रेरितों 25 ◊

5 अगस्त : नष्ट और पुनः स्थापित

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5 अगस्त : नष्ट और पुनः स्थापित
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“तू ने यह क्या किया है?” उत्पत्ति 3:13

स्कॉटलैंड के हाइलैण्ड्स में कई ऐसे किले हैं, जो अब निर्जन और खण्डहर हो चुके हैं। शाम की सुनहरी रोशनी में यह पहचानना कठिन नहीं है कि कभी ये स्थान कितने भव्य महल रहे होंगे। भले ही अब उनमें न खिड़कियाँ बची हैं, न भव्य गलीचे, और न ही उनमें रहने वाले लोग, फिर भी इन प्राचीन संरचनाओं की भव्यता उनके पूर्व वैभव की गवाही देती है, भले ही अब वे नष्ट हो चुके हों।

यह संसार भी ऐसे ही नष्ट हुए वैभव से भरा है, क्योंकि यह संसार मनुष्यों से भरा है। आदम और हव्वा परमेश्वर की रचनात्मक कलाकृति की पराकाष्ठा थे, और परमेश्वर उनके साथ पूरी तरह सन्तुष्ट था। वे भलाई करने की प्रवृत्ति के साथ बनाए गए थे। लेकिन जब उन्होंने उस सिंहासन की लालसा की, जिस पर वे कभी बैठ ही नहीं सकते थे—परमेश्वर का सिंहासन—तो वे अपने स्थान और उन विशेषाधिकारों को खो बैठे जिनका आनन्द लेने के लिए वे सृजे गए थे।

सर्प ने हव्वा को बहकाने के लिए सबसे पहले परमेश्वर के वचन पर सन्देह उत्पन्न किया, बड़ी ही चतुराई से उसकी सत्यता को चुनौती दी—और वह फँस गई। उसने उस झूठ पर विश्वास कर लिया कि परमेश्वर भलाई करने के लिए भरोसेमन्द नहीं है। जब सन्देह का बीज बो दिया गया, तो सर्प ने उसे महत्वाकांक्षा से सींचा। एक बार जब हव्वा के मन में अनिश्चितता का सन्देह उत्पन्न हुआ, तो गर्व का आकर्षण उसके लिए असहनीय हो गया।

फल खाना केवल इस कारण गलत था, क्योंकि परमेश्वर ने उसे खाने से मना किया था। फिर भी, तत्काल सन्तुष्टि के अवसर ने आदम और हव्वा को ऐसा अंधा कर दिया कि वे अपने भविष्य के कार्यों के दर्दनाक परिणामों और उनके परिचित वैभव की बर्बादी को देख न सके। और, जैसे कि उनकी अवज्ञा ही पर्याप्त न थी, उन्होंने धोखे और अवज्ञा के बीच अपनी जिम्मेदारी को भी अस्वीकार कर दिया।

आदम और हव्वा की तरह हम भी यह मानने के लिए प्रवृत्त होते हैं कि अन्तिम सत्य का निर्णय करने वाले हम स्वयं हैं, न कि परमेश्वर। जब हम अपने सृष्टिकर्ता परमेश्वर को रास्ते से हटाने का निर्णय कर लेते हैं, जो एक सच्चा और अधिकारपूर्ण वचन बोलता है, तो हम उसे हमारी आज्ञाकारिता की माँग करने के अधिकार से वंचित कर देते हैं। लेकिन जब हम परमेश्वर के शासन को अस्वीकार कर देते हैं, तो हम अपने स्वयं के स्वामी नहीं बन जाते; बल्कि हम धोखे, अंधकार, निराशा और मृत्यु जैसे कई छोटे स्वामियों के अधीन हो जाते हैं।

“तू ने यह क्या किया?” (उत्पत्ति 3:13) हम सभी ने इस झूठ पर विश्वास किया है कि हमारी राह परमेश्वर की राह से बेहतर है। लेकिन परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजने की हद तक जाकर यह दिखाया कि हमारी कठोर विद्रोही प्रकृति उसकी उस करुणा से अभिभूत हो सकती है, जो “जीवन से भी उत्तम” है (भजन 63:3)। उसने अपने वचन का प्रकाश हमारे हृदयों में प्रकट किया है, जिससे हम उसकी महिमा को अब और अनन्त काल तक देख सकें और पुनः उसकी छवि में ढाले जाएँ तथा उस वैभव में पुनः स्थापित किए जाएँ, जिसे परमेश्वर ने सदा अपने स्वरूपधारी प्राणियों के लिए चाहा था। उसकी भलाई को देखना और उसके शासन के अधीन आना ही हमें धोखे, अंधकार, निराशा और यहाँ तक कि मृत्यु से भी स्वतन्त्र करता है।

उत्पत्ति 3

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 68– 69; प्रेरितों 24

4 अगस्त : कोई आदर्श स्थान नहीं

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4 अगस्त : कोई आदर्श स्थान नहीं
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“मैं मकिदुनिया होकर तुम्हारे पास आऊँगा, क्योंकि मुझे मकिदुनिया होकर जाना ही है। परन्तु सम्भव है कि तुम्हारे यहाँ ही ठहर जाऊँ और शरद ऋतु तुम्हारे यहाँ काटूँ, तब जिस ओर मेरा जाना हो उस ओर तुम मुझे पहुँचा देना . . . परन्तु मैं पिन्तेकुस्त तक इफिसुस में रहूँगा, क्योंकि मेरे लिए वहाँ एक बड़ा और उपयोगी द्वार खुला है, और विरोधी बहुत से हैं।” 1 कुरिन्थियों 16:5-6, 8-9

प्रेरित पौलुस की प्रशंसा करने के कई कारण हैं, लेकिन यहाँ एक ऐसा कारण है जिसे कम ही उल्लेख किया जाता है: वह हमेशा आगे की योजना बनाता था। वह किसी भी क्षेत्र में निष्क्रिय नहीं रहता था। वह एक सेनापति की तरह था, जो युद्ध मुख्यालय में मानचित्र का अध्ययन करते हुए कहता, “अब हम आगे कहाँ बढ़ सकते हैं? अगली टुकड़ी को कहाँ भेजा जा सकता है? शत्रु को कहाँ खोजा जा सकता है?” अपने धर्मी उद्देश्य के कारण वह कहीं भी अधिक समय तक आराम से नहीं रहा।

पौलुस से हम यह सीख सकते हैं कि परमेश्वर की सेवा के लिए कोई आदर्श स्थान नहीं है, लेकिन हम जहाँ भी हों, वहीं उसकी सेवा कर सकते हैं। उसने अपने पत्रों में इफिसुस, मकिदुनिया और कुरिन्थुस जैसे विभिन्न स्थानों में सेवा करने का उल्लेख किया है—लेकिन उसकी भौगोलिक स्थिति चाहे जो भी रही हो, उसने यह समझ लिया था कि उसे बस अविश्वासियों को सुसमाचार सुनाना था और विश्वासियों को प्रोत्साहित करना था। वह अपने बुलावे को जानता था कि जब एक स्थान पर उसकी सेवा पूरी हो जाती, तो उसे अगले स्थान पर आगे बढ़ जाना था।

पौलुस आराम या सुविधा की चिन्ता नहीं करता था। उसने कभी नहीं चाहा की कि व एड्रियाटिक सागर के किनारे एक छोटे से कुटीर में शान्तिपूर्वक सेवानिवृत्त हो जाए। यहाँ तक कि जब वह कह सकता था कि “मेरे लिए वहाँ एक बड़ा और उपयोगी द्वार खुला है,” तब भी उसने स्वीकार किया कि उसके “विरोधी बहुत से हैं।” उसने चुनौतियों को स्वीकार किया और विरोध को एक बाधा के बजाय एक महान विशेषाधिकार माना।

हम में से बहुत से लोग यह मानने के लिए प्रेरित किए गए हैं कि यदि हम परमेश्वर के साथ संगति में हैं और यदि हम वास्तव में वहीं हैं जहाँ हमें होना चाहिए, तो जीवन सुचारू रूप से चलेगा। यह विचार भले ही लोकप्रिय हो, लेकिन बाइबल के अनुसार यह सही नहीं है। क्या हम वास्तव में सोचते हैं कि हम शैतान का सामना कर पाएँगे और उसके जलते हुए तीर हम तक नहीं पहुँचेंगे? क्या हम सोचते हैं कि हम शत्रु के क्षेत्र में प्रवेश करेंगे और हमारा कोई विरोध नहीं होगा? हमें ऐसे लोग बनने के लिए नहीं बुलाया गया है, जो आरामदायक और सुविधाजनक मसीही समुदायों में सन्तोषपूर्वक रहते हैं, जहाँ कोई विरोध न हो। यह सम्भव है कि हमारी गवाही इतनी कमजोर हो जाए कि हम मसीह के लिए प्रभावहीन हो जाएँ, लेकिन ऐसा होना आवश्यक नहीं है, और न ही ऐसा होना चाहिए।

आज भी हमारे चारों ओर वही परिस्थितियाँ हैं, जिनका सामना पौलुस ने किया था: मूर्तिपूजा, यौन अनैतिकता, नस्लवाद, धार्मिक कट्टरता, और अन्य अनेक बुराइयाँ। परमेश्वर ने चाहे आपको जहाँ भी रखा हो, वहीं आपके पास उसके राज्य की सेवा करने का अवसर है, भले ही आपको विरोध का सामना क्यों न करना पड़े। मेरे प्रिय मित्र एरिक अलेक्ज़ेण्डर ने एक बार मुझसे कहा था, “परमेश्वर की सेवा करने के लिए कोई आदर्श स्थान नहीं है—सिवाय वहाँ के जहाँ उसने तुम्हें रखा है!”

रोमियों 15:17-33

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 66– 67; प्रेरितों 23:16-35 ◊

3 अगस्त : सर्वसिद्ध राज्य

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3 अगस्त : सर्वसिद्ध राज्य
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“जो सिंहासन पर बैठा था, उसने कहा, ‘देख, मैं सब कुछ नया कर देता हूँ!’” प्रकाशितवाक्य 21:5

हर कोई हमेशा जानना चाहता है कि कहानी का अन्त कैसे होता है। प्रकाशितवाक्य की पुस्तक हमें अन्तिम पृष्ठ पर झाँकने का अवसर देती है, ताकि हम इतिहास के अन्त की ओर अधिक विश्वास, आत्मविश्वास और आनन्द के साथ बढ़ सकें।

पवित्रशास्त्र बहुत स्पष्ट रूप से दिखाता है कि पूरा मानव इतिहास एक अन्तिम लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। यह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात है; परमेश्वर ने मनुष्य को यह जानने के लिए बनाया है कि मृत्यु के बाद भी कुछ अस्तित्व में है। वास्तव में, उसने हमारे मन में अनादि-अनन्त काल का ज्ञान उत्पन्न किया है (सभोपदेशक 3:11)।

हर धर्म और विचारधारा इतिहास को समझने का प्रयास करती है। उदाहरण के लिए, हिन्दू धर्म सिखाता है कि हम जिस वास्तविकता में हैं, वह किसी गन्तव्य की ओर नहीं बढ़ रही है, बल्कि वास्तव में चक्रों में घूम रही है—अर्थात इतिहास चक्रीय है। नास्तिक प्रकृतिवाद तर्क देता है कि इतिहास की कोई पद्धति नहीं है, कोई उद्देश्य या अन्तिम लक्ष्य नहीं है; इतिहास केवल परमाणुओं के पुनः संयोजन की कहानी है (और हम भी उसी का हिस्सा हैं)। लेकिन मसीही लोग मानते हैं कि बाइबल इतिहास को रैखिक रूप में प्रस्तुत करती है: इसका एक प्रारम्भिक बिन्दु था, इसका एक समापन बिन्दु होगा, और यह एक उद्देश्य की दिशा में आगे बढ़ रहा है। मसीह का जीवन, मृत्यु, पुनरुत्थान और वापसी पूरे मानव इतिहास की केन्द्रीय विषयवस्तु है। इसलिए पूरी मानवजाति की कहानी को इसी ढांचे के भीतर देखा जाना चाहिए। यीशु वापिस आएगा; वह परमेश्वर की अनन्त उद्धार योजना को पूरा करेगा और उसके सिद्ध राज्य को स्थापित करेगा। वह सब कुछ नया और सिद्ध बना देगा।

यीशु जो सिद्ध राज्य लेकर आएगा, वह क्या है? यह एक ऐसा राज्य है, जिसका केन्द्र उसका क्रूस है। यह एक ऐसा राज्य है, जो हृदयों और जीवनों को बदलता है, और इसके नागरिक यीशु को राजा मानकर उसे दण्डवत करते हैं। यह प्रेम और न्याय, करुणा और शान्ति का राज्य है। यह राज्य बढ़ रहा है और पृथ्वी के छोर तक फैल रहा है—और निर्धारित समय पर, जो हमारे लिए अज्ञात है, परमेश्वर पिता अपने पुत्र को राष्ट्रों को उसकी विरासत के रूप में देगा (भजन 2:8)।

यहाँ तक कि अभी भी, परमेश्वर अपनी सम्प्रभु योजना और अपनी इच्छा के रहस्य को पूरा कर रहा है। जब यूहन्ना अन्त समय के बारे में लिखता है, तो वह हमें याद दिलाता है कि “उद्धार के लिए हमारे परमेश्वर का . . . जय–जयकार हो” (प्रकाशितवाक्य 7:10)। यदि उद्धार किसी और के हाथ में होता या इसे भाग्य पर छोड़ दिया जाता, तो परमेश्वर की योजना पूरी नहीं हो सकती थी। लेकिन वह इतिहास का रचयिता और भविष्य का शासक है। उसने अपनी प्रजा को बचाने का निश्चय किया है, और वह इसे पूरा करेगा। एक दिन हम उसे यह कहते हुए सुनेंगे, “ये बातें पूरी हो गई हैं” (प्रकाशितवाक्य 21:6)।

परमेश्वर ने यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान के द्वारा हमारे उद्धार का कार्य प्रारम्भ कर दिया है, और एक दिन वह सभी चीज़ों को एक ही प्रधान—यीशु—के अधीन कर देगा। इसलिए यदि हम मसीह के साथ जुड़े हुए हैं, तो हम “जयवन्त से भी बढ़कर हैं” (रोमियों 8:37) और पुत्र के साथ अनन्तकाल तक राज्य करने के लिए सक्षम हैं। हमारी प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए? विश्वास, आत्मविश्वास और आनन्द! क्योंकि भले ही हम नहीं जानते कि हमारे जीवन में आगे क्या होगा, लेकिन हम यह अवश्य जानते हैं कि कहानी का अन्त कैसा होगा—और हमारी अनन्तता कैसे प्रारम्भ होगी। इसलिए हम उत्सुकता से यह प्रार्थना करते हैं, “हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है . . . तेरा राज्य आए” (मत्ती 6:9-10)।

यशायाह 60

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 63– 65; प्रेरितों 23:1-15

2 अगस्त : आत्मा की भरपूरी में जाना

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2 अगस्त : आत्मा की भरपूरी में जाना
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“दाखरस से मतवाले न बनो, क्योंकि इससे लुचपन होता है, पर आत्मा से परिपूर्ण होते जाओ, और आपस में भजन और स्तुतिगान और आत्मिक गीत गाया करो, और अपने–अपने मन में प्रभु के सामने गाते और कीर्तन करते रहो।” इफिसियों 5:18-19

जीवन के कुछ क्षण ऐसे होते हैं जब सब कुछ एक साथ होता हुआ प्रतीत होता है, जैसे किसी बच्चे का जन्म या किसी नए देश में स्थानान्तरण। मसीह में नया जीवन प्रारम्भ करना शायद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जब हम यीशु पर विश्वास करते हैं, तो एक साथ कई परिवर्तन होते हैं: हम विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराए जाते हैं, हम परमेश्वर के परिवार में गोद लिए जाते हैं, हमें उसके पुत्र और पुत्रियों के रूप में एक नई पहचान दी जाती है, और—जैसा कि इस वचन में दर्शाया गया है—हमारे भीतर पवित्र आत्मा का वास होता है।

जब कोई यीशु पर विश्वास करता है, तो पवित्र आत्मा उसमें वास करने लगता है, उसे वह इच्छा और सामर्थ्य प्रदान करता है जो परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए आवश्यक है। आत्मा की यह परिपूर्णता मसीही अनुभव का मूलभूत सत्य है। यह हर उस व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, जो मसीह पर विश्वास करता है। फिर भी, सच्चाई यह है कि विश्वासियों के रूप में हम हमेशा परमेश्वर के आत्मा की परिपूर्णता में नहीं जीते। यह सम्भव है कि हमारी अवज्ञा के कारण हम हमारे भीतर रहने वाले आत्मा को दुखी कर देते हैं (इफिसियों 4:30)। यह भी सम्भव है कि हम उससे अधिक किसी अन्य चीज़ के प्रभाव में अधिक आ जाएँ—यही कारण है कि पौलुस यहाँ यह स्पष्ट करता है कि हम एक साथ शराब और आत्मा दोनों के प्रभाव में नहीं रह सकते।

हमें यह समझना होगा कि यदि हम परमेश्वर की सन्तान हैं, तो हम कभी भी उसके पितृत्व से बाहर नहीं आ सकते; लेकिन अवज्ञा में जीने से हम उसके पितृ-संरक्षण, उपस्थिति और आनन्द से वंचित हो सकते हैं। जो बच्चा अपने माता-पिता की पूरी तरह अवहेलना करता है, वह भले ही नाश्ते की मेज़ पर बैठा हो, तब भी वह जानता है कि वे अभी भी उसके माता-पिता हैं और वह अभी भी उनका बेटा है, लेकिन ऐसा होने पर भी उसके इस रिश्ते का आनन्द कम हो जाएगा। हमारे साथ भी यही होता है: हम अवज्ञा में नहीं जी सकते—ऐसा नहीं हो सकता कि एक ओर तो हम अपने जीवन में किसी अन्य प्राथमिकता, विचार या पदार्थ को अपना मार्गदर्शक बना लें और दूसरी ओर हम आत्मा की परिपूर्णता में भी जीएँ।

यह कोई ऐसी समस्या नहीं है, जिसे हम स्वयं हल कर सकते हैं। हम खुद को पवित्र आत्मा से नहीं भर सकते। हम केवल परमेश्वर से पवित्र आत्मा की परिपूर्णता को ही प्राप्त नहीं करते, बल्कि उसका आनन्द भी उसी के द्वारा सम्भव होता है। हम स्वयं को नहीं भर सकते, लेकिन हमें स्वयं को भरे जाने के लिए तैयार और खुले अवश्य रखना चाहिए। हर मसीही जीवन की अपेक्षा यही है कि यह आत्मा से भरे होने का प्रमाण—जिसे पौलुस “आत्मा का फल” (गलातियों 5:22) कहता है—धीरे-धीरे अधिक स्पष्ट रूप से प्रकट हो।

आपके जीवन की और हर एकत्रित कलीसिया की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि हम सब आत्मा से भरे जाएँ—कि हम किसी और चीज़ के बजाय उसके द्वारा निर्देशित हों। यही सच्चे रूपान्तरण, आनन्द, शान्ति और प्रेम को लाता है। यही हमें प्रेरित करता है कि हम न केवल अपने ओठों से, बल्कि अपने हृदय में भी मसीह की स्तुति के गीत गाएँ। इसलिए प्रार्थना करें कि वह आपको नए सिरे से भर दे:

हे पवित्र आत्मा, मेरे हृदय पर उतर,

इसे संसार से अलग कर, इसकी हर धड़कन में प्रवाहित हो;

मेरी निर्बलता के बावजूद, तू शक्तिशाली है,

मुझे वैसा प्रेम करना सिखा, जैसा मुझे करना चाहिए।[1]

  यहेजकेल 11:14-20

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 60– 62; प्रेरितों 22 ◊


[1] जॉर्ज क्रोली, “स्पिरिट ऑफ गॉड, डिसेण्ड अपोन माई हार्ट” (1854).

1 अगस्त : सच्चा धन

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1 अगस्त : सच्चा धन
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“परमेश्‍वर के राज्य में धनवान के प्रवेश करने से ऊँट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है!” मरकुस 10:25

धनवानों का जीवन अक्सर आसान होता है। पैसा कई दरवाजे खोलता है। शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, यात्रा और मनोरंजन जैसे क्षेत्रों में हमें अक्सर यह देखने को मिलता है कि अधिक धन होने से चीज़ें अधिक सुगम हो जाती हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि धन को अक्सर “सार्वभौमिक पासपोर्ट” कहा जाता है!

लेकिन एक महत्त्वपूर्ण दरवाजा ऐसा भी है, जिसे धन अपने आप नहीं खोल सकता। धनवान युवा अगुवे ने पाया कि अनन्त जीवन की खोज में उसके धन ने कोई सहायता नहीं की बल्कि वह उसके लिए एक बाधा बन गया। अपनी सम्पत्ति को छोड़ने और यीशु का अनुसरण करने की अनिच्छा ने उद्धार के लिए उसके मार्ग को बन्द कर दिया, और इसलिए वह उदास हो गया तथा मसीह के साथ अपनी बातचीत को रोककर चला गया—उसके पास अब भी उसका धन था, लेकिन उसकी आत्मा खतरे में थी (मरकुस 10:22)।

इस युवक की उदासी से अधिक गहरी उदासी यीशु की थी। वह जानता था कि सांसारिक सम्पत्ति पर भरोसा करना कितना आसान है और वास्तव में महत्त्वपूर्ण चीजों से दृष्टि खो देना कितना खतरनाक है। और जिस दृष्टिकोण से यीशु ने धनवान युवा अगुवे को देखा, वह सुसमाचार में उसके अन्य उपदेशों के अनुरूप था। उदाहरण के लिए, एक बार उसने एक किसान की कहानी सुनाई जिसने अपने खलिहान तोड़कर और बड़े खलिहान बनाए (लूका 12:13-21)।

यह एक वैध निर्णय था, लेकिन वह मूर्ख था क्योंकि उसने अपने धन को अपनी आत्मा की सुरक्षा का मापदण्ड मान लिया। उसने अपने आप से कहा, “प्राण, तेरे पास बहुत वर्षों के लिए बहुत सम्पत्ति रखी है; चैन कर, खा, पी, सुख से रह” (वचन 19)। लेकिन यीशु ने उसे मूर्ख कहा, क्योंकि वह मृत्यु के लिए तैयार नहीं था, और धन उसे मृत्यु से नहीं बचा सकता था (वचन 20)। आखिरकार, “यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे, और अपने प्राण की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा?” (मत्ती 16:26)।

अक्सर हम भी सांसारिक सम्पत्ति में अपनी सुरक्षा खोजने की गलती करते हैं। हम या तो अधिक सम्पत्ति इकट्ठा करके या दूसरों को दान देकर अपने नाम और प्रतिष्ठा के लिए ऐसा करते हैं। लेकिन अन्ततः, यदि हम गलत चीजों को अधिक मूल्यवान समझते हैं और वास्तविक रूप से अनमोल चीजों को नज़रअंदाज़ करते हैं, तो हम उसी मूर्खता में पड़ जाते हैं (“मिस्टर बिजनेसमैन” शीर्षक वाले गीत के शब्दों में)।[1]

हमारे पास जो कुछ भी है या हम जो कुछ भी करते हैं, वह हमें मृत्यु से बचाने और अनन्त जीवन में ले जाने के लिए हमारा मार्ग प्रशस्त नहीं कर सकता। जब वह धनी युवक दुखी होकर चला गया, तब यीशु ने अपने शिष्यों से कहा, “मनुष्यों से यह नहीं हो सकता, परन्तु परमेश्वर से हो सकता है; क्योंकि परमेश्वर से सब कुछ हो सकता है” (मरकुस 10:27)। धन का सबसे बड़ा खतरा यह है कि यह हमें गर्व और आत्मनिर्भरता में डाल सकता है, जिससे हम भूल सकते हैं कि केवल परमेश्वर ही हमारा उद्धारकर्ता है।

यदि यीशु आपसे कहे कि उसके सेवाकार्य के लिए आप अपने धन को छोड़ दें, तो क्या आप ऐसा करने के लिए तैयार होंगे? या फिर आप उदास होकर चले जाएँगे क्योंकि यह मांग आपके लिए बहुत बड़ी होगी और कीमत बहुत अधिक होगी? यदि आप अपने धन या संसाधनों पर भरोसा कर रहे हैं, तो उस सोच से पश्चाताप करें और परमेश्वर की दया से मिलने वाले उद्धार में आनन्दित हों। परमेश्वर जो कर सकता है, वह किसी रहस्य के समान छिपा नहीं है। जो कोई भी उसके पास आता है, उसे वह कभी अस्वीकार नहीं करेगा।

  लूका 12:13-21

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 57–59; प्रेरितों 21:18-40


[1] रेय स्टीवंस, “मिस्टर बिजनेसमैन” (1968).

19 जून : हम एक देह हैं

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19 जून : हम एक देह हैं
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“क्योंकि जैसे हमारी एक देह में बहुत से अंग हैं, और सब अंगों का एक ही सा काम नहीं; वैसा ही हम जो बहुत हैं, मसीह में एक देह होकर आपस में एक दूसरे के अंग हैं।” रोमियों 12:4-5

आपने कभी-कभी लोगों को आपसे यह पूछते सुना होगा, “क्या आप यहाँ के सदस्य हैं?” यह सवाल आमतौर पर किसी कंट्री क्लब, जिम, या इसी तरह के किसी स्थान से सम्बन्धित होता है। वे जानना चाहते हैं, “क्या आप इस स्थान की सदस्य-सूची में शामिल हैं? क्या यहाँ के लोग आपको जानते हैं और स्वीकार करते हैं, और क्या वे आपको तब याद करेंगे जब आप मौजूद नहीं होंगे?”

कलीसिया का वर्णन करने के लिए पौलुस अक्सर शरीर के उदाहरण का उपयोग करता है। इसके अर्थ को समझने के लिए हमें अपनी कल्पना का विस्तार करने की आवश्यकता नहीं है। हम सभी के पास एक शरीर है, जो विभिन्न हिस्सों से बना हुआ है, और प्रत्येक भाग का एक विशेष कार्य होता है। सभी भाग दिखाई नहीं देते, लेकिन सभी महत्त्वपूर्ण हैं। यदि कोई भाग काम नहीं कर रहा या मौजूद नहीं है, तो इसका असर बाकी सब पर पड़ता है। किसी के पूरे शरीर की प्रभावशीलता इस पर निर्भर करती है कि यह सिर द्वारा नियन्त्रित हो रहा है या नहीं। यह सत्य मसीह की देह अर्थात स्थानीय कलीसिया पर भी लागू होता है: आत्मिक शरीर तभी सही तरीके से काम करता है, जब वह यीशु के नेतृत्व में एकजुट होकर काम करता है। जब ऐसा होता है, तो हम . . .

एकता के साथ काम करते हैं, क्योंकि हम एक-दूसरे से अलग-थलग नहीं रहते।

बहुलता के साथ काम करते हैं, क्योंकि हम विभिन्न प्रकार के हिस्सों से बने हैं।

विविधता के साथ काम करते हैं, क्योंकि शरीर के कार्य स्वाभाविक रूप से विविध होते हैं।

सुगमता के साथ काम करते हैं, जिसे हम तब महसूस करते हैं जब सब कुछ एकजुट होकर काम करता है।

पहचान के साथ काम करते हैं, यह दर्शाते हुए कि हममें से प्रत्येक जन अकेला रहकर स्वयं को पूर्ण रूप से नहीं जान सकता।

दूसरे शब्दों में, जब आप एक व्यक्ति के रूप में मसीह की देह की प्रकृति को समझते हैं, तो आप बेहतर तरीके से समझ पाते हैं कि आप कौन हैं और आप कहाँ फिट बैठते हैं। मसीह की देह के एक सदस्य के रूप में आप कहीं न कहीं अवश्य शामिल हैं। जब परमेश्वर के अनुग्रह ने हमें बदल दिया है, तो हमें यह एहसास होना चाहिए कि हमारे लिए यह ध्यान रखना अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि हमें एक-दूसरे के साथ सम्बन्ध में बुलाया गया है—एक समुदाय में बुलाया गया है। हम उन वरदानों में विविध हैं जो हमें दिए गए हैं; हममें से कोई भी अकेले रहकर शरीर नहीं बना सकता, बल्कि हम एकसाथ जुटकर ही शरीर बनते हैं। हममें से प्रत्येक एक-दूसरे के लिए हैं। इसलिए हम कलीसिया में इस उद्देश्य से एकत्रित होते हैं कि हम अपने आप को एक-दूसरे के लिए और अन्ततः हमारे प्रभु के लिए अर्पित कर सकें। हम मसीह की देह में हमारे उपस्थित रहने, हमारे गीतों, हमारे प्रार्थनाओं और हमारी संगति के माध्यम से योगदान देते हैं। जैसा कि आइसक वॉट्स ने लिखा:

मेरी जीभ अपनी प्रतिज्ञाएँ दोहराती है,

इस पवित्र घर को शान्ति मिले!”

क्योंकि यहाँ मेरे मित्र और परिवारजन रहते हैं। [1]

कलीसिया सिर्फ एक ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ आप आकर बैठ जाते हैं। यह एक देह है। यह आपका परिवार है। आपको अपनी कलीसिया की आवश्यकता है; और आपकी कलीसिया को आपकी आवश्यकता है। जितना अधिक आप अपनी कलीसिया के प्रति प्रतिबद्ध होंगे, उतना ही अधिक आप इससे आशीषित होंगे; क्योंकि हमारे जीवन में इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता कि परमेश्वर अपने लोगों को एक साथ लाता है, क्योंकि एकजुटता ही वह स्थान है जहाँ हम सबको होना चाहिए।

  1 कुरिन्थियों 12:12-27

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 37–39; मत्ती 27:1-26 ◊


[1] आइसक वॉट्स, “हाओ प्लीज़्ड ऐण्ड ब्लेस्ट वाज़ आई” (1719).

11 मई : यह प्रभु का काम है

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11 मई : यह प्रभु का काम है
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“तब वह [नाओमी] मोआब के देश में यह सुनकर कि यहोवा ने अपनी प्रजा के लोगों की सुधि ले के उन्हें भोजन वस्तु दी है, उस देश से अपनी दोनों बहुओं समेत लौट जाने को चली।” रूत 1:6

बैतलहम बाइबल के इतिहास में एक प्रमुख नगर है। राजगद्दी सम्भालने से पहले दाऊद ने इसी नगर में अपनी भेड़ें चराईं थीं। एक हज़ार साल बाद, जब विभिन्न चरवाहे अपनी भेड़ों के झुण्डों की देखभाल कर रहे थे, तो इसी नगर में स्वर्गदूतों के एक दल ने यीशु मसीह के जन्म की घोषणा की।

हालाँकि इन दोनों महत्त्वपूर्ण घटनाओं से पहले न्यायाधीशों का काल था, जो हिंसा, सामाजिक और राजनीतिक अराजकता, और धार्मिक उथल-पुथल से भरा हुआ था। इस उथल-पुथल के दौरान, बैतलहम में अकाल पड़ा, जिससे यह नगर, जिसका नाम इब्रानी भाषा में “रोटी का घर” है, भूख और निराशा का एक घर बन गया।

इन निराशाजनक परिस्थितियों में, एलीमेलेक नाम का एक व्यक्ति भोजन की तलाश में अपनी पत्नी नाओमी और अपने दो बेटों को मोआब देश में ले गया। जबकि एलीमेलेक नाम का अर्थ “मेरा परमेश्वर राजा है” है, लेकिन इस्राएल के शत्रुओं के देश मोआब में जाने का उसका निर्णय यह सवाल उठाता है कि क्या वह वास्तव में परमेश्वर के प्रावधान पर विश्वास कर भी रहा था या नहीं, या उसकी आज्ञा का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध था भी या नहीं।

मोआब भोजन की भूमि नहीं, बल्कि शोक का स्थान साबित हुआ। एलीमेलेक और उसके बेटों की मृत्यु हो गई, और नाओमी विधवा हो गई। हालाँकि, कुछ वर्षों बाद, नाओमी के दर्द के अंधकार में एक छोटी सी उम्मीद की किरण जागी; उसे यह समाचार मिला कि बैतलहम में भोजन लौट आया था। परमेश्वर ने अपने देश में अपनी प्रजा के लिए प्रावधान किया था।

हज़ारों साल बाद, हम इस सत्य को जल्दी से नजरअंदाज करने के लिए प्रलोभित हो सकते हैं: कि परमेश्वर अपनी प्रजा को वही प्रदान करता है, जिसकी उन्हें आवश्यकता होती है। शायद आप अपने उद्धार के बारे में यह तथ्य जानते हैं—लेकिन यह कितना आसान है कि हम उसके दैनिक प्रावधान के बारे में भूल जाएँ! क्या हमारे पास उन चीजों को देखने की दृष्टि है जो परमेश्वर हमारे दैनिक जीवन में हमें दे रहा है और हमारे लिए कर रहा है? क्या हर दिन के अन्त में उन कामों के लिए हमारे दिलों में धन्यवाद भरा हुआ होता है, जो उसने हमारे लिए किए हैं?

परमेश्वर के निरन्तर प्रावधान का एक व्यावहारिक उदाहरण वह भोजन है, जो हमें प्रतिदिन मिलता है। किराने की दुकान में यदि किसी को सबसे अधिक आभार और आश्चर्य के साथ देखना चाहिए, तो वह मसीही लोग हैं! आखिरकार, परमेश्वर ही तो है जो हमारी दुकानों और भण्डारगृहों को भोजन से भरता है। हम दुकान से अण्डे और दूध खरीदते हुए यह कह सकते हैं, “यह तो यहोवा की ओर से हुआ है, यह हमारी दृष्‍टि में अद्‌भुत है” (भजन 118:23)।

चाहे जीवन की घटनाएँ कितनी भी अंधकारमय और नाटकीय क्यों न दिखें, परमेश्वर अब भी अपनी प्रजा की चिन्ता करता है और अपनी योजनाओं को पूरा करता है, और वह अक्सर इसे अप्रत्याशित व्यक्तियों के माध्यम से और शान्त तरीकों से करता है। उसने नाओमी और उसके परिवार के माध्यम से महान कार्य करने का उद्देश्य रखा था—और यह बैतलहम में रोटी से शुरू हुआ। हमें भी अपनी आँखें खोलनी चाहिए ताकि हम देख सकें कि परमेश्वर द्वारा भोजन प्रदान करना हमारी सबसे बड़ी स्थाई आवश्यकता—हमारे उद्धारकर्ता, यीशु मसीह—के प्रावधान की ओर तथा हमारे उच्चतम बुलावे की ओर इशारा करता है: अर्थात हम उसकी महिमा के लिए “उन भले कामों के लिए सृजे गए जिन्हें परमेश्‍वर ने पहले से हमारे करने के लिये तैयार किया” (इफिसियों 2:10)।

प्रेरितों 17:24-31

10 मई : नियम एवं शर्तें

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10 मई : नियम एवं शर्तें
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“उसने भीड़ को अपने चेलों समेत पास बुलाकर उनसे कहा, “जो कोई मेरे पीछे आना चाहे, वह अपने आपे से इनकार करे और अपना क्रूस उठाकर, मेरे पीछे हो ले। क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे वह उसे खोएगा, पर जो कोई मेरे और सुसमाचार के लिए अपना प्राण खोएगा, वह उसे बचाएगा।” मरकुस 8:34-35

ऑनलाइन कुछ भी करने से पहले हमें अक्सर उपयोग की शर्तों और नीतियों को सहमति देनी होती है। और जब हम “मैं सहमत हूँ” बॉक्स पर टिक करते हैं, तो क्रेडिट कार्ड कम्पनियाँ, सोशल मीडिया प्लेटफार्म और वेबसाइटें समय-समय पर हमें सूचित करती हैं कि उनकी कानूनी नीतियाँ बदल गई हैं—और यह कि सेवा का उपयोग जारी रखने के लिए हमें नई नीतियों को स्वीकार करना होगा।

ऐसी बदलती नीतियाँ अक्सर बार-बार होती हैं और सूक्ष्म होती हैं। इन्हें पहचानना या इन पर नज़र रखना लगभग असम्भव होता है। फिर भी, यह सौभाग्य की बात है कि मसीह के अनुयायी बनने की “शर्तें और नीतियाँ” कभी नहीं बदलतीं, और कभी नहीं बदलेंगी। उन्हें न तो हटाया जा सकता है और न ही हमारी पसन्द के अनुसार बदला जा सकता है, क्योंकि उन्हें परमेश्वर ने स्थापित किया है। इन पदों में, परमेश्वर के पुत्र ने अपने लोग बनने और अनन्त जीवन पाने के लिए “शर्तें और नीतियाँ” निर्धारित की हैं।

हम कभी-कभी ऐसा व्यवहार करते हैं मानो हमें प्रभु की आज्ञा का पालन करने के लिए खुद को मजबूर करना होगा। लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है! बाइबल कहती है कि जैसे हम यीशु की पहल और अनुग्रह के उत्तर स्वरूप उस पर विश्वास करते हैं (इफिसियों 2:8), वैसे ही वही अनुग्रह हमें बनाए रखता है और हमें उसके पीछे चलने में सक्षम बनाता है (फिलिप्पियों 1:6)। वह हमारे विचारों, हमारी नैतिकता, हमारे व्यवहार और हमारे संसाधनों को आकार देता है, ताकि हम उसके नियन्त्रण के अधीन आ सकें, जिसे हमने अपनी महिमा माना है।

मसीह का अनुसरण करने की एक “शर्त” यह है कि अब हमारे जीवन का केन्द्र हम स्वयं नहीं हैं। हमारी व्यक्तिगत पहचान और लक्ष्य प्राथमिकता नहीं हैं। इसके बजाय, हमारा रूपान्तरण हो जाता है, ताकि मसीह के साथ हमारी एकता के माध्यम से बाहर के संसार के सामने हम दृश्य रूप में फल ला सकें। वह हमें आत्म-उपासना का पूर्ण रूप से खण्डन करने का बुलावा देता है।

स्वयं को नकारने के द्वारा हम अपने क्रूस को उठाते हैं और मसीह का अनुसरण करते हैं। दुर्भाग्य से, “अपना क्रूस उठाने” का रूपक अक्सर हल्का कर दिया जाता है; हमें याद रखना चाहिए कि क्रूस की मृत्यु वास्तव में मानवता द्वारा आविष्कार की गई सबसे क्रूर और भयंकर मृत्यु की विधियों में से एक थी। क्रूस उठाने के इस रूपक का उपयोग करके यीशु यह स्पष्ट कर रहा है कि शिष्यता का एक बड़ा मूल्य है।

लेकिन मसीह हमें ऐसा कुछ करने के लिए नहीं कह रहा है, जो उसने पहले न किया हो। वही क्रूस था, जिस पर उसने हमें एक मूल्य चुकाकर खरीदा (1 कुरिन्थियों 6:20)। इसलिए उसकी शिष्यता में चलना हमारे पुराने मनुष्यत्व की मृत्यु की ओर तथा अनन्त जीवन की ओर ले जाने वाला एक अभियान है। यह एक सैर नहीं है, बल्कि एक जीवित बलिदान है, क्योंकि हम अपने नहीं हैं। लेकिन आशा रखें, क्योंकि इस अभियान में भी एक सुन्दरता है। एक दिन, मानव-पुत्र शक्ति और महिमा में वापस आएगा, और हरेक टूटे हुए को अपने राज्य में पुनः स्थापित करेगा। तब तक, परमेश्वर के राज्य के लिए अपने जीवन को खोना एक अच्छा निवेश है, चाहे मूल्य कुछ भी हो।

1 पतरस 3:13 – 4:11