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1 जुलाई : हमारे लिए

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1 जुलाई : हमारे लिए
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“हाय, हाय, उन लोगों ने सोने का देवता बनवाकर बड़ा ही पाप किया है। तौभी अब तू उनका पाप क्षमा कर—नहीं तो अपनी लिखी हुई पुस्तक में से मेरे नाम को काट दे।” निर्गमन 32:31-32

जब इस्राएली बन्धन से छुड़ाए गए, तो परमेश्वर ने उन्हें निर्देश दिया कि वे अपने मिस्री स्वामियों और मकान मालिकों से सोना, चांदी और वस्त्र माँगें, ताकि वे इन सब वस्तुओं को अपने साथ वाचा के देश में ले जा सकें। यही सामग्री उस तम्बू के निर्माण के लिए उपयोग में लाई जाने वाली थी, जिसमें परमेश्वर अपने लोगों के बीच वास करने वाला था।

इस्राएली लोग अभी बहुत दूर नहीं गए थे कि मूसा को परमेश्वर से मिलने सीनै पर्वत पर बुलाया गया। लेकिन जब मूसा को अपेक्षा से अधिक समय लग गया, तो लोग अधीर हो गए और उसके भाई हारून से बोले, “अब हमारे लिए देवता बना” (निर्गमन 32:1)। तब हारून ने उनसे कहा, “तुम्हारी स्त्रियों और बेटे-बेटियों के कानों में जो सोने की बालियाँ हैं उन्हें उतारो, और मेरे पास ले आओ” (निर्गमन 32:2), और उसने उस सोने से एक सोने का बछड़ा बनाया: “तब लोग कहने लगे, हे इस्राएल, तेरा परमेश्वर जो तुझे मिस्र देश से छुड़ा लाया है, वह यही है” (निर्गमन 32:2, 4)। परमेश्वर ने उन्हें वह सब दे दिया था, जो उसके कार्य के लिए अनिवार्य था, लेकिन उन्होंने अपने स्वार्थ एवं इच्छाओं को पूरा करने के लिए उसके उपहारों का दुरुपयोग किया और अपने हाथों से बनाए हुए एक झूठे देवता की उपासना करने लगे। हम शायद सोने का बछड़ा न बनाएँ, लेकिन हम भी वही गलती कर सकते हैं, जब हम परमेश्वर की दी हुई आशिषों का उपयोग अपने ही स्वार्थी उद्देश्यों के लिए करते हैं।

जब मूसा वापस आया, तो उसने जो कुछ देखा उससे बहुत दुखी हुआ। वह परमेश्वर के सामने दीन होकर झुका और इस्राएलियों के लिए प्रार्थना करते हुए कहा, तू वह परमेश्वर है जिसने अपनी प्रजा के साथ वाचा बाँधी है। कृपया अपनी वाचा को बनाए रख! यद्यपि हमने तेरी दी हुई वस्तुओं का उपयोग झूठे देवताओं की रचना के लिए किया है, फिर भी हमें अकेला मत छोड़। कृपया अपने हाथों के कार्य को मत त्याग (निर्गमन 32:11-13)।

यह आश्चर्यजनक है कि स्वयं निर्दोष होने के बावजूद मूसा ने स्वयं को प्रजा के साथ इतना अधिक जोड़ लिया। और यह तो और भी अद्‌भुत है कि वह स्वयं परमेश्वर की “पुस्तक” में से मिटाए जाने के लिए भी तैयार था, बजाय इसके कि वह लोगों को परमेश्वर द्वारा त्यागे जाते हुए देखे।

मूसा की इस प्रार्थना में हम उस सच्चाई की झलक पाते हैं, जो अन्ततः नए नियम में पूरी हुई। जब उसके बच्चों की बात आती है, तो परमेश्वर कोई काम अधूरा नहीं छोड़ता। मसीह हमारे लिए मध्यस्थी करता है, और “परमेश्वर की जितनी प्रतिज्ञाएँ हैं, वे सब उसी में ‘हाँ’ के साथ हैं” (2 कुरिन्थियों 1:20)। अर्थात, परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ—कि वह अपनी प्रजा को थामे रखेगा और उस भले काम को पूरा करेगा जो उसने आरम्भ किया है—यीशु मसीह में पूरी होती हैं।

हम “स्वभाव से ही भटकने वाले हैं” और “अपने प्रेमी परमेश्वर को छोड़ने के लिए प्रवृत्त रहते हैं।”[1] हम वही लोग हैं जो परमेश्वर की दी हुई आशिषों का उपयोग अपनी मूर्तियों के पीछे चलने में करते हैं। हमें एक मध्यस्थ की आवश्यकता है—और हमारे पास एक है! प्रभु यीशु को त्याग दिया गया, ताकि हमें हमारे पापों की क्षमा मिल सके। जब हम अपने पापों को यीशु के सामने स्वीकार कर लेते हैं, तो हम उसी के पास आते हैं जो पहले ही हमारे लिए हस्तक्षेप कर चुका है। आपके लिए उसका जो अद्‌भुत प्रेम है, वह आपके हृदय को मूर्तियों के पीछे भागने से लौटा लाए, और जो कुछ आपके पास है, उसे उस परमेश्वर की सेवा में लगाएँ जिसने आपको सब कुछ दिया है।

  याकूब 4:4-10

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: व्यवस्थाविवरण 13–15; प्रेरितों 4:1-22 ◊


[1] रॉबर्ट रॉबिंसन, “कम, दाओ फाउण्ट ऑफ एव्री ब्लेसिंग” (1758).

30 जून : बुराई को पराजित करना

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30 जून : बुराई को पराजित करना
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“बुराई से न हारो, परन्तु भलाई से बुराई को जीत लो।” रोमियों 12:21

1940 के दशक में केम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ाई करते हुए एक युवती कम्युनिस्ट पार्टी की सचिव बन गई। 1946-47 की सर्दी इतनी कठोर थी कि पानी की पाइपें आंशिक रूप से जम गईं और पानी की कमी हो गई। महिला छात्रों को सप्ताह में केवल एक ही स्नान का अवसर मिलता था, और वे लम्बी कतारों में खड़े होकर बड़बड़ाती और अपनी जगह के लिए जूझती रहती थीं—जिसमें कम्युनिस्ट पार्टी की सचिव भी शामिल थी।

जो लड़की सबसे आसानी से स्नानघर तक पहुँच सकती थी, वह एक मसीही लड़की थी। समय बीतने के साथ कम्युनिस्ट छात्रा ने देखा कि वह लड़की कभी अपनी अधिकारों का दावा नहीं करती और दूसरों के स्वार्थ के प्रति नरम प्रतिक्रिया देती थी। मसीही लड़की वह कर रही थी जो वह कम्युनिस्ट युवती मानती तो थी, लेकिन करती नहीं थी। उस अवलोकन ने एक बातचीत, एक रूपान्तरण और अन्ततः, एक नए मिशनरी को पैदा किया, जो एक पूर्वी देश में सेवाकार्य के लिए चली गई।

जब भी हम बुराई को अपनी बुरी बातों और कर्मों से हराने की कोशिश करते हैं, तो हम खुद ही उसमें जलकर नष्ट हो जाते हैं। बुराई को समान रूप से बुरी शक्ति से हराया नहीं जा सकता। बुराई समाप्त होने के बजाय दोगुनी हो जाती है। यदि हम शत्रु का सामना करते समय खुद पर काबू नहीं रख पाते, तो हम उस व्यक्ति से नहीं, बल्कि बुराई से हार जाते हैं। हम हार जाते हैं और वह अवसर खो चुके होते हैं जो परमेश्वर की दृष्टि में सही काम करने का अवसर था।

बुराई को हराना हमारे समाज में एक लोकप्रिय विचार है। हम इसे गीतों और प्रेरक नारों में सुनते हैं। अक्सर विचार यह होता है कि यदि हम बस “एकसाथ खड़े हो जाएँ,” तो हम उन बुराइयों को हराने में सफल हो जाएँगे जो हमें परेशान करती हैं। यह विचार तो अच्छा है, लेकिन इसमें आवश्यक शक्ति का अभाव है। हम अपने बल पर बुराई को हराने में सक्षम नहीं हैं; यह काम नहीं करेगा। हम “जयवन्त से भी बढ़कर” केवल उसी के माध्यम से हैं “जिसने हमसे प्रेम किया है” (रोमियों 8:37)। परमेश्वर के आत्मा और उसे वचन के द्वारा उसकी शक्ति हमें वह प्रेरणा और बल देती है, जो हमें विजय प्राप्त करने के लिए चाहिए।

यह वही मार्ग था जिसे यीशु ने अपनाया। उसने प्रतिशोध को अपने हाथों में नहीं लिया, बल्कि स्वयं को पिता के हाथों में सौंप दिया। मसीह ने क्रूस पर जाकर यह मार्ग अपनाया, जहाँ प्रेम ने बुराई पर विजय प्राप्त की। जब हम कोमल बनने, भलाई करने और क्रूस के मार्ग पर चलने का चयन करते हैं, तब हम परमेश्वर की शक्ति का अनुभव करते हैं, जो हमें उसके प्रेम की भलाई से बुराई को पराजित करने में मदद करती है।

भजनकार चार्ल्स टिण्डली ने अपने इस भजन के द्वारा हमें इस सत्य की याद दिलाई:

परमेश्वर के वचन को अपनी तलवार बनाकर,

मैं एक दिन विजय प्राप्त करूगा . . .

यदि यीशु मा अगुवा होग,

तो एक दिन मैं विजय अवश्य प्राप्त करूगा।”[1]

उसके अनुग्रह से आप एक दिन इस संसार की सभी चुनौतियों और अन्यायों को पराजित करेंगे। और जब आप गलत के सामने सही, अपमान के सामने दया और नकारात्मकता के सामने आशीर्वाद दिखाएँगे, तब आज आप उसके अनुग्रह से बुराई को भलाई से पराजित करेंगे।

  1 पतरस 3:8-14अ

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: व्यवस्थाविवरण 10–12; प्रेरितों 3


[1] चार्ल्स ऐल्बर्ट टिण्डली, “आई विल ओवरकम सम डे” (1900).

29 जून : क्रियाशील प्रेम

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29 जून : क्रियाशील प्रेम
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“हे प्रियो, बदला न लेना, परन्तु परमेश्‍वर के क्रोध को अवसर दो, क्योंकि लिखा है, ‘बदला लेना मेरा काम है, प्रभु कहता है मैं ही बदला दूँगा।’ परन्तु ‘यदि तेरा बैरी भूखा हो तो उसे खाना खिला, यदि प्यासा हो तो उसे पानी पिला; क्योंकि ऐसा करने से तू उसके सिर पर आग के अंगारों का ढेर लगाएगा।’” रोमियों 12:19-20

इन पदों में “आग के अंगारे” प्रतिशोध या पीड़ा का रूपक नहीं हैं। इसके बजाय, वे उस शर्म और पछतावे को दर्शाते हैं जो लोग तब महसूस करते हैं, जब हम उन्हें वह प्रतिशोध नहीं देते जो हमारी समझ के अनुसार उनके लायक लगता है, बल्कि हम उन्हें दया और उदारता दिखाते हैं। यह तब होता है जब मसीही लोग उन लोगों के साथ भलाई वाला व्यवहार करते हैं जिन्होंने उन्हें नुकसान पहुँचाया है, और वह व्यवहार पूरी तरह से द्वेष या बदला लेने से रहित होता है, और इस प्रकार यह मौलिक रूप से अलौकिक होता है। जब ऐसा होता है, तो जॉन कैल्विन का कहना है कि दुश्मन का मन “दो तरीकों से घायल हो सकता है। या तो हमारा दुश्मन दया के कारण नरम हो जाएगा, या . . .  उसे अपने विवेक की गवाही से कचोट और पीड़ा होगी।”[1]

इसलिए ये कोयले अन्ततः चोट नहीं बल्कि चंगाई लाने के लिए होते हैं। हमारे उदार कार्यों से मेल-मिलाप को प्रोत्साहन मिलना चाहिए, जिससे सामने वाला व्यक्ति हमारे पास आए, न कि हमसे दूर जाए। यह ठीक वैसा ही है जैसे हमें परमेश्वर से दया तब मिली जब हम अभी भी उसके दुश्मन थे (रोमियों 2:4; 5:8)।

हालाँकि, यदि हम ईमानदार हों, तो ये उस प्रकार के अंगारे नहीं हैं जो हम तब चाहते हैं जब हमारा नुकसान होता हैं और हम घायल होते हैं। हममें से कई लोग खुशी से यह जानना चाहेंगे कि असली अंगारे वास्तव में हमारे दुश्मनों के सिर पर गिरें, और उन्हें जलाकर घायल कर दें। आखिरकार, वे इसी के लायक हैं! लेकिन यह हमारे विश्वास के बजाय हमारे पतन को दर्शाता है। यह न तो यीशु जैसा दिखता है, न ही सुनाई देता है। यही कारण है कि ये पद इतने चुनौतीपूर्ण हैं।

ध्यान दें कि परमेश्वर का वचन हमें केवल बदला लेने से बचने के लिए ही नहीं कहता, बल्कि आशीर्वाद देने में सक्रिय रहने के लिए भी कहता है। जब हम प्रतिशोध लेने से मना कर देते हैं, तब हम आज्ञा का पूरा पालन नहीं करते। यीशु के शिष्य के रूप में हमें केवल यह नहीं करना है कि हम अपने दुश्मनों से बुराई न करें; बल्कि हमें वास्तव में उनके साथ भलाई करनी है। यह विश्वास करना आसान है कि अपने दुश्मनों को नजरअंदाज करने से हम अपनी समस्या को सुलझा सकते हैं या यही सबसे अधिक है जो हम वास्तविक रूप से कर सकते हैं; लेकिन यहाँ हम पाते हैं कि हमें वास्तव में उन्हें आतिथ्य दिखाना है! हमारी भूमिका यह है कि हम बुराई का उत्तर उदारता की भावना से दें, यह विश्वास करते हुए कि परमेश्वर हमेशा धार्मिकता से न्याय करेगा, और इसलिए हमें न्याय करने की आवश्यकता नहीं है, और हमें ऐसा करना भी नहीं है (1 पतरस 2:23)।

यीशु की देह के सदस्य होने के नाते, हममें से कई लोग अभी भी अपनी अवज्ञा, प्रतिशोधी क्रियाओं या विचारों को सही ठहराने की कोशिश करते हैं। फिर भी, जबकि हमारे दुश्मनों के मन हमारे तर्कों से निपट सकते हैं और उनका साहस हमारी धमकियों का सामना करने के लिए मजबूत हो सकता है, लेकिन यह क्रियाशील प्रेम ही है जो उन्हें पश्चाताप तक ला सकता है।

इन पदों से आपके हृदय को कैसे बदलने की या आपके कार्यों को कैसे प्रभावित होने की आवश्यकता है? इनकी चुनौती से बचने की कोशिश न करें। मसीह के स्वरूप में बढ़ने का एक भाग यह भी है कि आप अपने दुश्मनों के लिए भलाई करने के तरीकों की तलाश करें, और यह परमेश्वर की क्रान्तिकारी दया और उदारता के बहाव से उत्पन्न हो।

  लूका 22:47-53

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: व्यवस्थाविवरण 7–9; प्रेरितों 2:22-47 ◊


[1] दि एपिस्ट्ल ऑफ पॉल दि अपोस्ट्ल टू द रोमंस ऐण्ड टू द थिस्सोलोनियंस, कैल्विनज़ कॉमैण्ट्री, सम्पादक डेविड एफ. टोरेंस ऐण्ड थॉमस एफ. टोरेंस, अनुवादक रोस मैकेंज़ी (अर्डमंस, 1995), पृ. 279.

28 जून : शान्ति जो सम्भव है

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28 जून : शान्ति जो सम्भव है
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“जहाँ तक हो सके, तुम भरसक सब मनुष्यों के साथ मेल मिलाप रखो।” रोमियों 12:18-19

बाइबल अद्‌भुत रूप से एक व्यावहारिक पुस्तक है। इसकी बुद्धि न केवल समृद्ध है, बल्कि वास्तविक भी है, और जैसे-जैसे हम इसके अनुसार जीते हैं, यह हर परिस्थिति में गहरे अर्थ के साथ हमसे बात करती है। जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, हममें से कई लोग महसूस करते हैं कि हमारे माता-पिता की चेतावनियाँ और बुद्धिमता अक्सर सही थी; और जैसे-जैसे हम परमेश्वर के वचन की रोशनी में चलते हैं, वैसे-वैसे यह समय के साथ हर बार सही साबित होती है। पौलुस यहाँ पर इस कालातीत, वास्तविक बुद्धि का प्रदर्शन करता है। एक ओर, यह सरल लगता है: बस सभी के साथ शान्ति बनाए रखने की कोशिश करो। यह समझने में मुश्किल नहीं है। लेकिन वह केवल इतना ही नहीं कह रहा है। यह निर्देश दो योग्यताओं के साथ आता है: “यदि सम्भव हो” और “जहाँ तक हो सके।” इसका अर्थ है कि हमेशा यह सम्भव नहीं होगा!

पौलुस यहाँ बचने का कोई बहाना नहीं दे रहा है। वह हमें यह नहीं कह रहा है कि तब तक शान्ति बनाए रखो, जब तक हम अपने गुस्से या भावनाओं को नियन्त्रित कर सकते हैं, लेकिन अन्यथा हम अपने दिलों में कड़वाहट पालने के लिए स्वतन्त्र हैं। वह हमें यह सुनिश्चित करने का बुलावा दे रहा है कि हमारे जीवन में कोई भी मौजूदा संघर्ष हमारे शान्त रहने के बावजूद है तो ठीक है, लेकिन यह हमारे कारण नहीं होना चाहिए। मौजूदा दुश्मनी की जिम्मेदारी कभी भी हमारी ओर से पुनः मेल-जोल की अनिच्छा की वजह से नहीं होनी चाहिए।

लेकिन भले ही हम अपनी ओर से अपना कर्तव्य पूरा कर लें, तौभी कुछ स्थितियाँ ऐसी हैं जिनमें शान्ति सम्भव नहीं हो सकती। एक स्थिति तब होती है जब सामने वाला व्यक्ति हमारे साथ शान्ति बनाने के लिए तैयार नहीं है। हो सकता है कि हमारा सामना ऐसे किसी व्यक्ति से है जो हमें नुकसान पहुँचाने की कोशिश में है और संघर्ष को हल करने में कोई रुचि नहीं रखता। ऐसी स्थिति में, उस व्यक्ति को बदलना या उसकी क्रूरता को रोकना सम्भव नहीं हो सकता—लेकिन हमारे लिए यह सम्भव होगा कि हम पलटकर न लड़ें। जब हम यह सुनिश्चित करते हैं कि हम संघर्ष में योगदान नहीं दे रहे हैं, तो हम “जहाँ तक हो सके” शान्ति का पालन कर रहे होते हैं।

दूसरी रुकावट तब आती है जब शान्ति की शर्तें पवित्रता, सत्य और धार्मिकता के सिद्धान्तों के साथ मेल नहीं खातीं। इब्रानियों की पुस्तक के लेखक ने ऐसी स्थिति को ध्यान में रखते हुए अपने पाठकों से कहा था, “सबसे मेल मिलाप रखो, और उस पवित्रता के खोजी हो जिसके बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा” (इब्रानियों 12:14)। ये दो अलग-अलग निर्देश नहीं हैं; शान्ति और पवित्रता के लिए हमारा प्रयास हमें अलग-अलग दिशाओं में नहीं ले जाना चाहिए। शान्ति की खोज यह नहीं होनी चाहिए कि हम किसी भी कीमत पर शान्ति चाहते हैं। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि संघर्ष और टकराव से नफरत करते हुए हम शान्ति की खोज में धार्मिकता को दाव पर न लगा दे।

आप किसी के हृदय को नहीं बदल सकते; यह प्रभु का काम है। आपको अपनी ईमानदारी से समझौता नहीं करना है; यह प्रभु की प्रमुख चिन्ता है। लेकिन परमेश्वर आपको एक आदेश दे रहा है, जहाँ तक हो सके आप शान्ति का पालन करें। क्या यह आदेश आज आपको अपनी बातों को नर्म करने, अपने व्यवहार को बदलने, या किसी संघर्ष को सुधारने की दिशा में पहला कदम उठाने के लिए प्रेरित कर रहा है?

दानिय्येल 6

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: व्यवस्थाविवरण 4–6; प्रेरितों 2:1-21

27 जून: मसीह में निवास

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27 जून: मसीह में निवास
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“अभिमानी न हो, परन्तु दीनों के साथ संगति रखो।” रोमियों 12:16

घर एक अद्‌भुत स्थान हो सकता है। हममें से बहुतों के लिए घर वह स्थान है, जहाँ हम ईमानदार हो सकते हैं, जहाँ हम अपने परिवार के साथ होते हैं, और जहाँ सारी बातें—यहाँ तक कि हमारी कमियाँ भी—परिचित होती हैं। लेकिन शायद सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि असली घर वह है, जहाँ हम अपनी वास्तविकता में हो सकते हैं, वास्तविक विनम्रता में हो सकते हैं। ऐसा ही हमें परमेश्वर के लोगों की संगति में अनुभव करना चाहिए।

पौलुस द्वारा मसीहियों को दिया गया यह बुलावा कि “अभिमानी न हो, परन्तु दीनों के साथ संगति रखो,” हमें परमेश्वर के परिवार में एक-दूसरे के साथ सम्बन्ध रखने का सही तरीका सिखाता है। “दीनों के साथ संगति” रखने के आदेश का अनुवाद इस तरह से भी किया जा सकता है, “साधारण काम करने को तैयार रहो।” दोनों अनुवाद उपयोगी हैं; हमें इतना अभिमानी नहीं होना चाहिए कि हम कुछ प्रकार के लोगों से मिलना न चाहें या कुछ प्रकार के काम करना न चाहें।

गैर-धार्मिक संसार में प्रतिष्ठा का माप सामाजिक स्थिति, महत्त्व, प्रभाव, धन, बुद्धिमत्ता आदि से किया जाता है। मसीही लोगों के बीच ऐसा नहीं होना चाहिए। वास्तव में, परमेश्वर के लोगों की एक पहचान यह होनी चाहिए कि भौतिकवाद, घमण्ड और अपमान, जो सामान्यतः गैर-धार्मिक समुदाय में पाए जाते हैं, वे अब मसीही समाज में प्रचलित नहीं होते।

हम कैसे अपने आस-पास की प्रचलित संस्कृति के प्रभाव में आ सकते हैं, जब हमारे प्रभु ने अपने बारे में कहा था कि “मनुष्य के पुत्र के लिए सिर धरने की भी जगह नहीं है” और वह “नम्र और मन में दीन” है (मत्ती 8:20; 11:29)? वह उन लोगों को बचाने नहीं आया जो स्वस्थ हैं, बल्कि उन्हें जो बीमार हैं (मरकुस 2:17)। वह संसार के निर्बलों को बुलाना जारी रखता है, ताकि वह बलवानों को लज्जित करता रहे (1 कुरिन्थियों 1:27)। यहाँ तक कि प्रेरित पौलुस ने भी, जो धर्मशास्त्र का योग्य शिक्षक था, अपनी सारी उपलब्धियों को कूड़ा-कर्कट माना, ताकि मसीह को प्राप्त करे (फिलिप्पियों 3:8)।

यीशु एक कलीसिया बना रहा है, और जो कलीसिया वह बना रहा है, वह परमेश्वर का परिवार है। हमारा पिता स्वर्ग में है, हमारा बड़ा भाई शासन कर रहा है, और हमारे भाई-बहन हमारे साथ मिलकर आराधना कर रहे हैं। अगली बार जब आप अपनी कलीसिया परिवार के साथ हों, तो अपने आराम क्षेत्र से बाहर कदम रखें और परिवार के ऐसे सदस्य को जानने का प्रयास करें जिसके साथ आप सामान्यतः बातचीत नहीं करते। अगली बार जब आपको कोई ऐसा काम करने के लिए कहा जाए या कोई भूमिका निभाने के लिए कहा जाए जो स्वाभाविक रूप से आपकी रुचि नहीं है, तो खुद से यह सवाल करें कि क्या यह विनम्र बनने और घमण्डी न बनने का एक अवसर है। आखिरकार, हमारे बड़े भाई ने क्रूस पर मरने को अपनी बदनामी नहीं समझा, और वह वहाँ इसलिए मरा ताकि वह हमारे जैसे नीच पापियों को उठाए। उसके क्रूस के नीचे की ज़मीन समतल है। और इस प्रकार, उसका परिवार विनम्र प्रेम से पहचाना जाए।

मरकुस 1:40 – 2:17

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: व्यवस्थाविवरण 1–3; प्रेरितों 1 ◊

26 जून : मेलजोल से रहो

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26 जून : मेलजोल से रहो
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आपस में एक सा मन रखो।” रोमियों 12:16

शालीनतापूर्वक असहमत होने के लिए कौशल और परमेश्वर-निष्ठा की आवश्यकता होती है। जिन लोगों के साथ हमारी हर बात में सहमति होती है, उनके साथ मेलजोल से रहना आसान होता है, क्योंकि वहाँ किसी प्रकार की असहमति का कोई डर नहीं होता। लेकिन जिन लोगों से हम अलग दिखते हैं और अलग तरीके से जीते हैं—उनके साथ मेलजोल से रहना एक सच्ची मसीही परिपक्वता का चिह्न है। इसलिए प्रेरित पौलुस की अपेक्षा यह है कि मसीहियों के रूप में हम ऐसा ही करने का प्रयास करेंगे।

मेलजोल से रहने के लिए पौलुस का बुलावा एक विशेष प्रकार की समरूपता में रहने का बुलावा नहीं है, जहाँ हम सभी एक जैसा कपड़े पहनें, एक जैसा व्यवहार करें, एक जैसा मतदान करें, और एक जैसा बोलें। वास्तव में, रोम की कलीसिया निश्चित रूप से विविध लोगों का समूह था, जिनकी पृष्ठभूमि और वरदान विविध थे। पौलुस ने इस बात पर जोर दिया कि ये विविधताएँ विभाजन या शर्म का कारण नहीं बननी चाहिएँ।

पौलुस चाहता था कि रोम के कलीसिया के लोग “आपस में एक सा मन रखें।” ठीक वैसे ही जैसे उसने कुरिन्थियों की कलीसिया से यह अपील की थी, “मैं तुमसे हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम से विनती करता हूँ कि तुम सब एक ही बात कहो, और तुम में फूट न हो, परन्तु एक ही मन और एक ही मत होकर मिले रहो” (1 कुरिन्थियों 1:10)।

सुसमाचार हमारी विविधताओं या असहमति को मिटाता नहीं है। बल्कि परमेश्वर के लोगों के बीच एकता—अर्थात मसीह का सुसमाचार और उसके वचन का सत्य—हमें यह स्वीकार करने की स्वतन्त्रता देता है कि हम गौण मुद्दों पर भिन्न और असहमत हो सकते हैं। मसीही एकता अन्ततः हमारी राजनीति, हमारी सामाजिक स्थिति, या हमारे इस विचार से नहीं आती कि कालीन का रंग क्या होना चाहिए, बल्कि उस एक से आती है, जिसे हम “मार्ग, सत्य, और जीवन” मानते हैं (यूहन्ना 14:6)।

दुर्भाग्य से, कलीसिया अपनी असहमतियों से विचलित हो सकती हैं, और मसीही लोग अपनी व्यक्तिगत चिन्ताओं और प्राथमिकताओं को अत्यधिक महत्त्व दे सकते हैं। हममें से कुछ लोग हर मुद्दे को ऐसा मुद्दा बना देते हैं, जिससे विभाजन हो और इस प्रकार हम कर्मकाणडवादी बन जाते हैं, बाल की खाल उतारने में उलझ जाते हैं और तब तक सन्तुष्ट नहीं होते जब तक हम एक सदस्य वाली कलीसिया नहीं रह जाते। हममें से कुछ लोगों को कठिनाई होती है कि हम किसी मुद्दे पर खड़े हों और उस पर समझौता न करें, और इस प्रकार हम धर्मशास्त्र के सम्बन्ध में उदारवादी बन जाते हैं, और सुसमाचार के केन्द्रीय सत्य से समझौता कर बैठते हैं।

पौलुस हमें जिस सामंजस्य के लिए संघर्ष करने का बुलावा देता है, वह सुसमाचार का सामंजस्य है। हमें खुद को इस तरह से जानने की आवश्यकता है कि हम यह पहचान सकें कि क्या हम कर्मकाणडवादी हैं या उदारवादी। हमें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें अपने भाई-बहनों के प्रति मन की स्पष्टता और हृदय की दया से भरे। और फिर हमें अपने दिलों की जाँच करनी चाहिए कि क्या कोई ऐसा है जिसके साथ हम सहमत नहीं हैं और फिर हमें उस सुसमाचार के सामंजस्य को नष्ट करने के बजाय उसे बढ़ावा देने के लिए कदम उठाने चाहिएँ, जो मसीह हमारे लिए लेकर आया है।

भजन 133

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: योएल; फिलिप्पियों 4

25 जून : दूसरों के साथ आनन्द मनाना

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25 जून : दूसरों के साथ आनन्द मनाना
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“आनन्द करने वालों के साथ आनन्द करो, और रोने वालों के साथ रोओ।” रोमियों 12:15

साझी खुशी सहानुभूति का एक महान अभिव्यक्ति है। हम आमतौर पर सहानुभूति शब्द का उपयोग साझा दुख को व्यक्त करने के लिए करते हैं—लेकिन यह खुशी पर भी लागू होता है।

हम सहानुभूति को तब समझ पाते हैं जब हम इसे वाक्य में उपयोग करते हैं, लेकिन स्वयं इस शब्द को परिभाषित करना मुश्किल हो सकता है। इसके विपरीत शब्द को देखें: उदासीनता। यदि उदासीनता यह कहने के समान है, “मुझे कोई परवाह नहीं है,” तो सहानुभूति यह कहने के समान है, “मुझे बहुत परवाह है।” सहानुभूति किसी अन्य व्यक्ति के अनुभव के साथ पहचान बनाने का नाम है।

हममें से कई लोगों के लिए “रोने वालों के साथ रोना” स्वाभाविक रूप से आसान होता है। यह हमारे लिए स्वाभाविक है कि हम जिनसे प्यार करते हैं, उनके दुख और निराशा में शामिल हों और उनके दुख को देखकर या सोचकर रोएँ। यह एक अच्छी बात है, क्योंकि “एक दूसरे का भार उठाना” वास्तव में “मसीह की व्यवस्था को पूरा करना” है (गलातियों 6:2)। लेकिन दूसरों की खुशी और सफलता में शामिल होना अक्सर एक बड़ी चुनौती होता है, क्योंकि इसके लिए हमें हमारे मानव स्वभाव के पतन के खिलाफ काम करना पड़ता है, जो कि नाराजगी और कड़वाहट की ओर प्रवृत्त होता है। किसी की सफलता हमारे लिए परमेश्वर की महिमा करने और उसका धन्यवाद करने का अवसर बनने के बजाय, आसानी से ईर्ष्या का कारण बन सकती है।

हममें से अधिकांश लोग यह जानते हैं कि ईर्ष्या व्यक्त करने से कैसे बचना है। लेकिन ईर्ष्या को व्यक्त न करने और ईर्ष्या को महसूस न करने में एक बड़ा अन्तर है। हम अपना व्यवहार इस हद तक संशोधित कर सकते हैं कि इसे दिखने से रोक सकें, लेकिन इसे महसूस न करने के लिए आत्मिक परिवर्तन की आवश्यकता होती है। यह परिवर्तन मसीह की देह के सदस्य के रूप में हमारी पहचान को सही ढंग से समझने से आरम्भ होता है। पौलुस कहते हैं कि “हम जो बहुत हैं, मसीह में एक देह होकर आपस में एक दूसरे के अंग हैं” (रोमियों 12:5)। मसीह में होने का अर्थ है कि हम उसमें हैं और एक-दूसरे के अंग हैं।

दूसरे शब्दों में: यदि हम मसीह में हैं, तो हम सभी एक ही टीम हैं। जब हम इसे समझ जाते हैं, तो किसी और की खुशी में शामिल होना हमारे लिए उतना ही स्वाभाविक हो जाता है, जितना एक फुटबॉल खिलाड़ी के लिए अपने साथी के मैच को जिताने वाले गोल पर खुशी मनाना होता है, मानो वह गोल उसने खुद किया हो। परमेश्वर के लोगों के रूप में, हम एकसाथ मिलकर जीतते और हारते हैं—हम एकसाथ मिलकर आनन्दित होते हैं और शोक करते हैं।

परमेश्वर का वचन आपसे कहता है कि आपका “प्रेम निष्कपट हो” (रोमियों 12:9)—और वास्तविक, मसीह जैसा प्रेम आपकी भावनाओं को इस प्रकार से ढालता है कि ईर्ष्या खुशी में बदल जाती है और उदासीनता वास्तविक सहानुभूति में बदल जाती है। क्या कोई ऐसा है जिससे आप उसकी खुशी या गमी में किसी तरह से दूर खड़े हैं? क्या आपने सोचा है कि आज आप किसे प्रोत्साहित कर सकते हैं? लगभग निश्चित रूप से कोई ऐसा होगा जिसे आपको यह बताना चाहिए कि आप उनके साथ हैं, उनके लिए प्रार्थना कर रहे हैं और जब वे गहरे घाटी से गुजर रहे हैं, तो उनके साथ खड़े हैं। वैसे ही, कोई ऐसा होगा जिसकी खुशी आप साझा कर सकते हैं और उन्हें बता सकते हैं कि आप उनके जीवन पर परमेश्वर के अनुग्रह के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करते हैं। ऐसा व्यक्ति बनें जिसके बारे में यह कहा जा सके, “वह बहुत परवाह करता है।” आज परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह अपने आत्मा के द्वारा आप में काम करे और आपको ऐसा ही व्यक्ति बनाए।

2 कुरिन्थियों 1:2-7

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 51–52; फिलिप्पियों 3 ◊

24 जून : आत्मिक उन्माद

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24 जून : आत्मिक उन्माद
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“प्रयत्न करने में आलसी न हो; आत्मिक उन्माद में भरे रहो; प्रभु की सेवा करते रहो।” रोमियों 12:11

कल्पना कीजिए एक पुराने ब्रिटिश फार्म हाउस के रसोईघर की, जिसमें चूल्हे पर एक बर्तन रखा है, जिसमें पानी उबाल रहा है। यहाँ पर हमें आत्मिक प्रतिबद्धता के बारे में बताते हुए पौलुस इसी चित्र को प्रस्तुत करता है। वह हमें यह बताता है कि मसीह में हमें अपने आत्मिक “बर्तन” को उबलता हुआ रखना है। हमें एक पल गर्म और दूसरे पल ठण्डा नहीं होना है, अर्थात हमें एक पल उत्साही और फिर दूसरे पल उत्साह खो देना नहीं है।

एक बार जब परमेश्वर के अनुग्रह ने हमें पकड़ लिया है और मसीह ने हमें बदल दिया है और हमने विश्वास के द्वारा उसकी धार्मिकता प्राप्त कर ली है, तो यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि हम उस धार्मिकता को अपनी दैनिक जीवन में लागू करें। इसका एक हिस्सा यह है कि हम मसीह के कार्य को एक दिव्य उत्साह के साथ करें, जिससे वह हमें प्रेरित करता है।

हालाँकि, आलस्य में पड़ना और आध्यात्मिक रूप से आधे दिल से जीना बहुत आसान है। नीतिवचन में बार-बार, कभी-कभी हँसी के साथ, आलस्य के खतरों और इसके परिणामों के बारे में हमें चेतावनी दी गई है। एक नीतिवचन में एक आदमी का चित्रण किया गया है, जो इतना आलसी है कि उसने जो चम्मच कटोरी में डाला है, उसे बाहर निकालने का प्रयास भी नहीं करता (नीतिवचन 19:24; 26:15)। एक और नीतिवचन आलस्य को इस तरह से दर्शाता है जैसे एक आदमी अपने बिस्तर में खुद को छिपाकर पड़ा रहे और वहाँ से न उठे: “जैसे किवाड़ अपनी चूल पर घूमता है, वैसे ही आलसी अपनी खाट पर करवटें लेता है।” (नीतिवचन 26:14)।

इसके विपरीत, आत्मा द्वारा प्रेरित जो उत्साह है, उसका मुख्य उद्देश्य परमेश्वर की सेवा करना है। यह हमारे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है कि हम इस उद्देश्य को याद रखें! जब हम ऐसा करते हैं, तो हम महसूस करते हैं कि हमारा छोटे से छोटा काम भी—चाहे वह किसी ग्राहक से मिलना हो, घर की सफाई करना हो, बर्तन धोना हो, दूसरों को सिखाना हो, नोट्स लेना हो, टीक लगाना हो, या अपने बच्चों से बात करना हो—सब कुछ आत्मिक आराधना का हिस्सा बन सकता है। हमारे दिन का हर हिस्सा, चाहे वह कितना भी सामान्य क्यों न हो, हमारे दिव्य उत्साह को दर्शा सकता है।

इन दिनों आपके आत्मिक उत्साह को क्या प्रेरित करता है? क्या यह आराधना में मसीह की सेवा है? किसी सहकर्मी या अजनबी से अपना विश्वास साझा करना है? अपने वृद्ध माता-पिता की देखभाल करना है? विश्व भर में मसीह के काम को समर्थन देना है? यह जो भी हो, अपना उत्साह कम न होने दें। प्रत्येक दिन के प्रत्येक पल में उण्डेले जाने वाले उसके अनुग्रह के प्रत्युत्तर में प्रभु की सेवा करते हुए पानी को उबलता रहने दें। हर सुबह, परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह आपको थकने से बचाए। फिर, सब बातों में उसके नाम का प्रचार होगा और वह महिमा प्राप्त करेगा।

गलातियों  6:1-10

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 50; फिलिप्पियों 2

23 जून : भाईचारे का प्रेम

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23 जून : भाईचारे का प्रेम
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“भाईचारे के प्रेम से एक दूसरे से स्नेह रखो; परस्पर आदर करने में एक दूसरे से बढ़ चलो। रोमियों 12:10

युवा भाई-बहन अक्सर एक-दूसरे को धक्का देते हैं और एक-दूसरे की शिकायत करते हैं। यदि हम ईमानदार हों, तो कभी-कभी कलीसिया में हमारा “भाईचारे का स्नेह” इस तरह की सोच और व्यवहार से अधिक प्रभावित होता है, बजाय इसके कि यह प्रेम और आभार से भरपूर हो। जब हम एक-दूसरे की ओर देखते हैं, तो हम यह गाने के बजाय कि “हमें खुशी है कि हम परमेश्वर के परिवार का हिस्सा हैं,”[1] हम अक्सर गहरी सोच में डूबकर यह गाते हैं, “मुझे हैरानी है कि तुम परमेश्वर के परिवार का हिस्सा हो।”

पौलुस हमें एक बेहतर मार्ग की ओर बुलाता है।

इस वाक्य में प्रेम को पारिवारिक शब्दों के माध्यम से वर्णित किया गया है। फिलोस्टोर्गोई, जिसका अनुवाद यहाँ “प्रेम” किया गया है, यूनानी शब्द स्टोर्गे से आया है, जो माता-पिता के लिए अपने बच्चों के प्रति समर्पित प्रेम को दर्शाता है। फिलाडेल्फिया, जिसका अनुवाद यहाँ “भाईचारे का प्रेम” किया गया है, वह शब्द है जो भाई-बहनों के बीच के प्रेम के लिए प्रयोग होता है (जैसे फिलाडेल्फिया शहर का नाम, “भाईचारे के प्रेम का शहर”)। रोमियों 8 में पौलुस अपने पाठकों को यह याद दिला चुका है कि वे परमेश्वर के अनुग्रह से एक ही परिवार का हिस्सा हैं (रोमियों 8:12-17)। अब चूंकि वे सभी एक ही आधार पर—अर्थात यीशु में—परमेश्वर के परिवार में लाए गए हैं, इसलिए अनिवार्य है कि वे एक-दूसरे के प्रति समर्पित रहें।

इस प्रकार के प्रेम के लिए केवल वास्तविक स्नेह ही नहीं बल्कि विनम्रता भी आवश्यक है। हिन्दी की बाइबल में इस पद के दूसरे वाक्य का अनुवाद इस प्रकार किया गया है, “परस्पर आदर करने में एक दूसरे से बढ़ चलो।” यह हमें फिलिप्पियों 2 की याद दिलाता है, जहाँ पौलुस लिखता है, “दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो” (फिलिप्पियों 2:3)। पवित्रशास्त्र हमें दूसरों को पहले स्थान पर रखने का बुलावा देता है। हमें दूसरे स्थान पर खड़ा होना सीखना होगा, और वह भी बिना शिकायत किए या इस तरह से प्रशंसा पाने की उलटी कोशिश किए। कलीसिया के परिवार में केवल एक ही प्रतिस्पर्धात्मक तत्व होना चाहिए, और वह यह कि कौन सबसे अधिक दूसरों की मदद कर सकता है।

इस प्रकार के भाईचारे के प्रेम के बारे में सोचना हमें वापिस यीशु की ओर ले आता है, जो हमें अपने भाई-बहन कहकर पुकारना पसन्द करता है (इब्रानियों 2:11-15)। क्योंकि यीशु, “जिसने परमेश्‍वर के स्वरूप में होकर भी परमेश्‍वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा, वरन् अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया” (फिलिप्पियों 2:6-7)। यीशु ही दिखा सकता है कि सच्चे भाईचारे का प्रेम क्या होता है; यीशु ही अपने परिवार से इस प्रकार का प्रेम करता है, जो सम्मान दिखाने में सबसे आगे है; यीशु ही है जिसके जैसे बनने का बुलावा हमें दिया गया है, और जब भी हम मसीह के जैसा भाईचारे का प्रेम दिखाने का चुनाव करते हैं, तो हम उसके जैसा ही जी रहे होते हैं। इसलिए आज उसके जैसा प्रेम करें।

1 शमूएल 20

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 48–49; फिलिप्पियों 1 ◊


[1] ग्लोरिया गेदर ऐण्ड विलियम जे. गेदर, “द फैमिली ऑफ गॉड” (1970).

22 जून : उदासीनता के लिए कोई स्थान नहीं है

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22 जून : उदासीनता के लिए कोई स्थान नहीं है
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“बुराई से घृणा करो; भलाई में लगे रहो।” रोमियों 12:9

जिस मरीज ने हड्डियों के गुदे का ट्राँसप्लाण्ट कराया है, वह जानता है कि संक्रमण के किसी भी सम्भावित खतरे से खुद को अलग रखना कितना महत्त्वपूर्ण है। चूंकि उनका प्रतिरक्षा तन्त्र इतना कमजोर हो जाता है, इसलिए वे औसत व्यक्ति से कहीं अधिक बीमारियों के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं। यदि कोई आगंतुक खाँसते हुए आए और कहे कि यह “कोई बड़ी बात नहीं” है, तो वह मरीज के लिए और उसके डॉक्टर के लिए घृणास्पद होगा। किसी भी बीमारी की रोकथाम ऐसे की जानी चाहिए मानो यह कोई महामारी हो, क्योंकि इसके परिणाम सम्भावित रूप से जानलेवा हो सकते हैं।

मसीह प्रेम को बुराई के खिलाफ इसी प्रकार की कट्टर मानसिकता को दर्शाना चाहिए। हम यह नहीं कह सकते कि हम दूसरों से सच्चा प्रेम करते हैं, यदि हम अपने दिल में बुराई को संजोते हैं, या उसे सहन करते हैं, और अच्छाई से खुद को दूर रखते हैं। हम दुष्टता के साथ नहीं खेल सकते, और खासतौर पर कुछ पापों के प्रति लापरवाही वाला रवैया नहीं अपना सकते। “घृणा” वह शब्द है जिसे पौलुस सबसे सख्ती से इस्तेमाल करता है। शुद्धता के मामले में वह कोई समझौता नहीं करता।

इस वाक्य के आरम्भ में ही पौलुस ने अपने पाठकों को निर्देश दे दिया है कि उनका “प्रेम निष्कपट हो।” फिर, क्या यह दिलचस्प नहीं है कि पौलुस “प्रेम” के तुरन्त बाद “घृणा” जैसा कठोर शब्द इस्तेमाल करता है? हमें अक्सर लगता है कि यदि हम प्रेम करते हैं, तो हमें किसी व्यक्ति या वस्तु से घृणा नहीं करनी चाहिए—लेकिन यह सिर्फ भावुकता है। पौलुस यह स्पष्ट करता है कि प्रेम “कुकर्म से आनन्दित नहीं होता” (1 कुरिन्थियों 13:6)। यदि आप अपने जीवनसाथी से एक प्रचण्ड पवित्रता के साथ प्रेम करते हैं, तो आप उस सम्बन्ध को नुकसान पहुँचाने वाली हरेक बात से नफरत करते हैं; अन्यथा आपका प्रेम सच्चा प्रेम नहीं है। यही सिद्धान्त परमेश्वर की बातों के प्रति हमारे प्रेम पर भी लागू होता है। हम अपवित्रता से घृणा किए बिना पवित्रता से प्रेम नहीं कर सकते।

आगे बढ़ते हुए पौलुस नकारात्मक से सकारात्मक की ओर मुड़ता है, और उन्हीं शब्दों, अर्थात “लगे रहो,” का उपयोग करता है, जिनका उपयोग यीशु ने विवाह के रिश्ते को समझाने के लिए किया था (देखें मत्ती 19:5)। पौलुस इन शब्दों का उपयोग बिना उद्देश्य के नहीं करता। मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से विवाह सम्भवतः सबसे करीबी मानव संघ है। इसलिए पौलुस यहाँ कह रहा है कि मसीह प्रेम में अच्छाई के प्रति “मजबूत गोंद” जैसे प्रतिबद्धता होनी चाहिए।

हमें सावधान रहना चाहिए कि हम संसार के उस जाल में न फँसे, जिसमें “बुराई को अच्छाई और अच्छाई को बुराई” कहा जाता है, या ऐसे लोग न बनें, “जो अँधियारे को उजियाला और उजियाले को अँधियारा ठहराते” हैं (यशायाह 5:20)। परमेश्वर के लोग यह समझते हैं कि प्रेम का एक समय होता है और घृणा का एक समय होता है (सभोपदेशक 3:8)।

तो फिर आप बुराई के प्रति अपने दृष्टिकोण को कैसे वर्णित करेंगे—विशेषकर उन पापों के बारे में जो आपके लिए सबसे आकर्षक हैं या आपके आस-पास रहने वाले लोग जिनमें खुशी मनाते हैं? यदि आप उनसे घृणा करने लगेंगे, तो क्या बदलाव आएगा? आज आप परमेश्वर के आत्मा पर निर्भर रहें, ताकि आप सही ढंग से प्रेम कर सकें और उन बातों से नफरत कर सकें जिनसे परमेश्वर नफरत करता है, और जॉन बेली की प्रार्थना को अपनी प्रार्थना बना लें: “हे परमेश्वर, मुझे अच्छाई के पीछे जाने की शक्ति दे। अब जब मैं प्रार्थना करता हूँ, तो हमारे मनों में कोई गुप्त बुरी भावना न हो, जो पूरी होने के अवसर का इंतजार कर रही हो।”[1]

  मरकुस 9:42-50

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 46–47; मत्ती 28


[1] ए डायरी ऑफ प्राइवेट प्रेयर  में “सिक्स्थ डे, इवनिंग,” (फायरसाईड, 1996), पृ. 31.