“हे प्रियो, बदला न लेना, परन्तु परमेश्वर के क्रोध को अवसर दो, क्योंकि लिखा है, ‘बदला लेना मेरा काम है, प्रभु कहता है मैं ही बदला दूँगा।’ परन्तु ‘यदि तेरा बैरी भूखा हो तो उसे खाना खिला, यदि प्यासा हो तो उसे पानी पिला; क्योंकि ऐसा करने से तू उसके सिर पर आग के अंगारों का ढेर लगाएगा।’” रोमियों 12:19-20
इन पदों में “आग के अंगारे” प्रतिशोध या पीड़ा का रूपक नहीं हैं। इसके बजाय, वे उस शर्म और पछतावे को दर्शाते हैं जो लोग तब महसूस करते हैं, जब हम उन्हें वह प्रतिशोध नहीं देते जो हमारी समझ के अनुसार उनके लायक लगता है, बल्कि हम उन्हें दया और उदारता दिखाते हैं। यह तब होता है जब मसीही लोग उन लोगों के साथ भलाई वाला व्यवहार करते हैं जिन्होंने उन्हें नुकसान पहुँचाया है, और वह व्यवहार पूरी तरह से द्वेष या बदला लेने से रहित होता है, और इस प्रकार यह मौलिक रूप से अलौकिक होता है। जब ऐसा होता है, तो जॉन कैल्विन का कहना है कि दुश्मन का मन “दो तरीकों से घायल हो सकता है। या तो हमारा दुश्मन दया के कारण नरम हो जाएगा, या . . . उसे अपने विवेक की गवाही से कचोट और पीड़ा होगी।”[1]
इसलिए ये कोयले अन्ततः चोट नहीं बल्कि चंगाई लाने के लिए होते हैं। हमारे उदार कार्यों से मेल-मिलाप को प्रोत्साहन मिलना चाहिए, जिससे सामने वाला व्यक्ति हमारे पास आए, न कि हमसे दूर जाए। यह ठीक वैसा ही है जैसे हमें परमेश्वर से दया तब मिली जब हम अभी भी उसके दुश्मन थे (रोमियों 2:4; 5:8)।
हालाँकि, यदि हम ईमानदार हों, तो ये उस प्रकार के अंगारे नहीं हैं जो हम तब चाहते हैं जब हमारा नुकसान होता हैं और हम घायल होते हैं। हममें से कई लोग खुशी से यह जानना चाहेंगे कि असली अंगारे वास्तव में हमारे दुश्मनों के सिर पर गिरें, और उन्हें जलाकर घायल कर दें। आखिरकार, वे इसी के लायक हैं! लेकिन यह हमारे विश्वास के बजाय हमारे पतन को दर्शाता है। यह न तो यीशु जैसा दिखता है, न ही सुनाई देता है। यही कारण है कि ये पद इतने चुनौतीपूर्ण हैं।
ध्यान दें कि परमेश्वर का वचन हमें केवल बदला लेने से बचने के लिए ही नहीं कहता, बल्कि आशीर्वाद देने में सक्रिय रहने के लिए भी कहता है। जब हम प्रतिशोध लेने से मना कर देते हैं, तब हम आज्ञा का पूरा पालन नहीं करते। यीशु के शिष्य के रूप में हमें केवल यह नहीं करना है कि हम अपने दुश्मनों से बुराई न करें; बल्कि हमें वास्तव में उनके साथ भलाई करनी है। यह विश्वास करना आसान है कि अपने दुश्मनों को नजरअंदाज करने से हम अपनी समस्या को सुलझा सकते हैं या यही सबसे अधिक है जो हम वास्तविक रूप से कर सकते हैं; लेकिन यहाँ हम पाते हैं कि हमें वास्तव में उन्हें आतिथ्य दिखाना है! हमारी भूमिका यह है कि हम बुराई का उत्तर उदारता की भावना से दें, यह विश्वास करते हुए कि परमेश्वर हमेशा धार्मिकता से न्याय करेगा, और इसलिए हमें न्याय करने की आवश्यकता नहीं है, और हमें ऐसा करना भी नहीं है (1 पतरस 2:23)।
यीशु की देह के सदस्य होने के नाते, हममें से कई लोग अभी भी अपनी अवज्ञा, प्रतिशोधी क्रियाओं या विचारों को सही ठहराने की कोशिश करते हैं। फिर भी, जबकि हमारे दुश्मनों के मन हमारे तर्कों से निपट सकते हैं और उनका साहस हमारी धमकियों का सामना करने के लिए मजबूत हो सकता है, लेकिन यह क्रियाशील प्रेम ही है जो उन्हें पश्चाताप तक ला सकता है।
इन पदों से आपके हृदय को कैसे बदलने की या आपके कार्यों को कैसे प्रभावित होने की आवश्यकता है? इनकी चुनौती से बचने की कोशिश न करें। मसीह के स्वरूप में बढ़ने का एक भाग यह भी है कि आप अपने दुश्मनों के लिए भलाई करने के तरीकों की तलाश करें, और यह परमेश्वर की क्रान्तिकारी दया और उदारता के बहाव से उत्पन्न हो।
लूका 22:47-53
पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: व्यवस्थाविवरण 7–9; प्रेरितों 2:22-47 ◊
[1] दि एपिस्ट्ल ऑफ पॉल दि अपोस्ट्ल टू द रोमंस ऐण्ड टू द थिस्सोलोनियंस, कैल्विनज़ कॉमैण्ट्री, सम्पादक डेविड एफ. टोरेंस ऐण्ड थॉमस एफ. टोरेंस, अनुवादक रोस मैकेंज़ी (अर्डमंस, 1995), पृ. 279.