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11 जुलाई : मसीही परिपक्वता

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11 जुलाई : मसीही परिपक्वता
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“यह मतलब नहीं कि मैं पा चुका हूँ, या सिद्ध हो चुका हूँ; पर उस पदार्थ को पकड़ने के लिए दौड़ा चला जाता हूँ, जिसके लिए मसीह यीशु ने मुझे पकड़ा था। . . . निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूँ, ताकि वह इनाम पाऊँ जिसके लिए परमेश्‍वर ने मुझे मसीह यीशु में ऊपर बुलाया है। हम में से जितने सिद्ध हैं, यही विचार रखें, और यदि किसी बात में तुम्हारा और ही विचार हो तो परमेश्‍वर उसे भी तुम पर प्रगट कर देगा।” फिलिप्पियों 3:12, 14-15

छोटे बच्चों की कुछ बातें इतनी प्यारी होती हैं, जब वे बड़ी-बड़ी कल्पनाओं में खो जाते हैं और अवास्तविक दावे करते हैं। ये दावे उनके माता-पिता के बारे में हो सकते हैं—“मेरे पापा ये कर सकते हैं” या “मेरी मम्मी इसमें बहुत अच्छी हैं”—या फिर ये दावे उनके खुद के बारे में हो सकते हैं। लेकिन ये दावे तब उतने प्यारे नहीं लगते जब ये किसी 25 या 50 साल की उम्र के व्यक्ति की ओर से आते हैं! उस समय किसी को यह कहने की जरूरत होती है, “खुदा का वास्ता है, अपनी उम्र के हिसाब से चलो!”

जैसा कि हम उम्मीद करते हैं कि उम्र के बीतने के साथ-साथ लोगों में परिपक्वता आनी चाहिए और जैसा कि हम जानते हैं कि शारीरिक, भावनात्मक, और मानसिक क्षेत्रों में परिपक्वता के कुछ चिह्न होते हैं, वैसे ही हमें आध्यात्मिक जीवन के क्षेत्र में भी परिपक्वता की उम्मीद करनी चाहिए। और यदि हम वास्तव में परिपक्वता में बढ़ रहे हैं, तो पौलुस के अनुसार हमारे जीवन में और हमारे परमेश्वर के साथ चलने में कुछ विशेष गुण दिखाई देंगे।

हमारे समाज का अधिकांश हिस्सा हमें यह जानने के लिए लगातार प्रेरित करता है कि हम क्या हैं, हमने क्या हासिल किया है, या हम कितनी दूर आ गए हैं। इसके विपरीत, मसीही परिपक्वता का आरम्भ इस बात से होती है कि हम क्या नहीं हैं। जहाँ अपरिपक्वता हमें खुद को अपनी योग्यता से अधिक ऊँचा समझने की ओर ले जाती है (रोमियों 12:3 देखें), वहीं परिपक्वता आवश्यकता से अधिक ऊँचे दावों को अस्वीकार करती है। बल्कि यह हमारी आध्यात्मिक प्रगति का एक वास्तविक अनुमान लगाती है। यह ऊँचे-ऊँचे शब्दों से नहीं, बल्कि एक विनम्र और स्थिर निरन्तरता वाले जीवन से प्रकट होती है।

“कछुए और खरगोश” की पुरानी कहानी में, खरगोश दौड़ की आरम्भ में तेज़ी से भागता है, जबकि कछुआ धीरे-धीरे चलता है। खरगोश इस आत्म-विश्वास से इतना अधिक भरा होता है कि वह दौड़ जीत चुका है कि वह रुकने, विश्राम करने और सोने का निर्णय लेता है। और जैसे ही वह खरगोश, जो इतना नाटकीय रूप से दौड़ आरम्भ करता है, सो जाता है, वह छोटा कछुआ उसी गति से—धीरे, धीरे, धीरे—आता है, और अन्त में वह विजेता बनता है और खरगोश कहीं दिखाई भी नहीं देता।

आध्यात्मिक खरगोशों से घिरे रहना एक बड़ी चुनौती हो सकती है, जो हमेशा कूदते-फांदते रहते हैं, अपनी बड़ी आकांक्षाओं की घोषणा करते हैं और यह बताते हैं कि वे कहाँ जा रहे हैं, क्या कर रहे हैं, और क्या हासिल कर रहे हैं। मुझे यह बहुत निराशाजनक लगता है कि मैं तो बस मसीही जीवन में बने रहने की कोशिश करता रहता हूँ!

एक बुद्धिमान पादरी के रूप में, पौलुस खरगोश बनने की कोशिश नहीं करता। इसके बजाय, वह हमें प्रेरित करते हुए कहता है, मैं चाहता हूँ कि आप जानें कि मैं एक यात्री हूँ। मैं चाहता हूँ कि आप जानें कि मैं अभी भी प्रक्रिया में हूँ, अभी भी यात्रा में हूँ—कि मुझे अभी बहुत दूर जाना है। पौलुस समापन रेखा की ओर बढ़ रहा है, और वह हमें भी यही करने के लिए प्रेरित कर रहा है। एक चमकदार आरम्भ या प्रभावशाली गति के बारे में घमण्ड करने के बजाय, उसके शब्द हमें बुनियादी बातों में दृढ़ होने और अपने संकल्प को याद रखने का बुलावा देते हैं।

विनम्रता और निरन्तरता: ये दोनों मसीही जीवन की परिपक्वता के लक्षण हैं, जो जानते हैं कि वे अनुग्रह के द्वारा ही यहाँ तक पहुँचे हैं, और अनुग्रह के द्वारा ही वे घर तक पहुँचने के लिए आगे बढ़ेंगे। ये परिपक्वता के लक्षण आपके जीवन में कैसे बढ़ेंगे?

1 पतरस 1:22 – 2:6

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 1–3; प्रेरितों 9:1-22 ◊

10 जुलाई : मृत्यु का डंक निकाल दिया गया है

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10 जुलाई : मृत्यु का डंक निकाल दिया गया है
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“‘हे मृत्यु, तेरी जय कहाँ रही? हे मृत्यु, तेरा डंक कहाँ रहा?’ मृत्यु का डंक पाप है, और पाप का बल व्यवस्था है। परन्तु परमेश्‍वर का धन्यवाद हो, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमें जयवन्त करता है।” 1 कुरिन्थियों 15:55-57

हाल की पीढ़ियाँ मृत्यु की वास्तविकता का सामना करने से व्यापक रूप से इनकार कर रही हैं, और शायद हमारे समय की पीढ़ी ने इसे अधिक नकारा है। लोग इसे लगातार छिपाने या इसकी मौजूदगी को नकारने की कोशिश करते हैं, यह उम्मीद करते हुए कि शायद यह नहीं आएगी। लेकिन मसीहियों को अन्य लोगों से अधिक तैयार रहना चाहिए कि वे मृत्यु का सामना पूरे साहस से करें और यह स्वीकार करें कि इसे नकारा नहीं जा सकता और इससे बचने का कोई तरीका नहीं है—लेकिन यह भी स्वीकार करें कि अब इसे डरने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि इसे पराजित कर दिया गया है।

वास्तव में, मसीहत प्रत्येक क्षेत्र में हमारे दृष्टिकोण को बदल देती है। बाइबल हमें यह वास्तविकता दिखाती है कि जीवन संक्षिप्त है, मृत्यु निश्चित है, और न्याय आ रहा है। लेकिन हमें पवित्रशास्त्र में स्पष्ट, अद्‌भुत, और मार्गदर्शन करने वाली बातें भी मिलती हैं, जो यह बताती हैं कि मृत्यु के प्रति विश्वासियों का दृष्टिकोण कैसा होना चाहिए।

मसीहियों के लिए, मृत्यु का डंक निकाल दिया गया है। इसे इस तरह से समझें: यदि आप कभी अपने छोटे बच्चे के साथ बाहर गए हों और एक गुस्सैल ततैया उसके पास आ जाए, तो आप जानबूझकर बच्चे और ततैया के बीच आकर डंक को खुद पर “निकाल” लेंगे। ऐसा होने के बाद बच्चे को अब डरने की कोई जरूरत नहीं है। ठीक इसी तरह, यीशु ने क्रूस पर अपनी मृत्यु के कार्य के माध्यम से हमारे पाप की सजा का सामना किया है। उसने हमारे जीवन में पाप की शक्ति को बन्धन को तोड़ दिया है। उसने पाप और मृत्यु के डंक को निकाल दिया है। मसीह की विजय हमारी विजय है; मृत्यु को पराजित कर दिया गया है। हम अभी भी मृत्यु का सामना करेंगे, लेकिन हम इससे पार हो जाएँगे। यह हमें अपना शिकार नहीं बना पाएगी।

पवित्रशास्त्र में मसीहियों की मृत्यु की तुलना नींद से की गई है, क्योंकि नींद एक अस्थाई स्थिति है, स्थाई नहीं। और इसका वर्णन हमारे शरीरों के सम्बन्ध में किया गया है, हमारी आत्माओं के सम्बन्ध में नहीं। थिस्सलुनीकियों को लिखी अपनी एक पत्री में पौलुस कहता है, “यदि हम विश्‍वास करते हैं कि यीशु मरा और जी भी उठा, तो वैसे ही परमेश्‍वर उन्हें भी जो यीशु में सो गए हैं, उसी के साथ ले आएगा” (1 थिस्सलुनीकियों 4:14)। दूसरे शब्दों में, हम यीशु से वही कह सकते हैं जो छोटे बच्चे सोने से पहले अक्सर अपने माता-पिता से कहते हैं: “क्या आप मेरे साथ रहेंगे जब मैं सो जाऊँगा?” और यीशु कहता है, हाँ, मैं रहूँगा। लेकिन उससे भी बेहतर, मैं उस नींद में भी तुम्हारे साथ रहूँगा। यीशु में सोने का—अर्थात विश्वासियों की मृत्यु होने का—मतलब है कि हमें तुरन्त ही उसकी उपस्थिति में, प्रभु की महिमा के आनन्द में प्रवेश मिल जाता है।

यीशु जीवित है, और हर नया दिन हमें उसके पुनरुत्थान की याद दिला सकता है। हर सुबह, हम एक नए सूर्योदय के लिए जागते हैं, जो उस महान दिन की याद दिलाता है जब तुरही बजेगी, मसीह में मरे हुए पहले जी उठेंगे, और जो लोग जीवित रहेंगे और पृथ्वी पर होंगे, वे उनके साथ एकत्रित हो जाएँगे। विश्वासियों के रूप में हमें नया जन्म मिला है, एक जीवित आशा के साथ कि क्योंकि यीशु मसीह कब्र पर विजय प्राप्त कर चुका है, इसलिए हम भी हमेशा के लिए उसके साथ होंगे। मृत्यु के प्रति हमारा दृष्टिकोण यही होना चाहिए: हम इसके पार  देखते हैं। और जब हम डर के बिना मरने में सक्षम हो जाते हैं, तो हम डर के बिना जीने में भी सक्षम हो जाते हैं।

प्रकाशितवाक्य 3:7-13

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: रूत; प्रेरितों 8:26-40

9 जुलाई : पिताओं के लिए एक वचन

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9 जुलाई : पिताओं के लिए एक वचन
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“हे बच्चे वालो, अपने बच्चों को रिस न दिलाओ, परन्तु प्रभु की शिक्षा और चेतावनी देते हुए उनका पालन–पोषण करो।” इफिसियों 6:4

रोमन समाज में एक पिता का अधिकार सर्वोपरि होता था। जैसा कि विलियम बार्कले ने लिखा, “एक रोमन पिता को अपने परिवार पर पूर्ण अधिकार प्राप्त होता था . . . वह अपने बेटे को बांध सकता था या पीट सकता था; वह उसे गुलाम के तौर पर बेच सकता था; और उसके पास उसे मृत्युदण्ड देने का अधिकार भी था . . . यदि कभी किसी ने पारिवारिक अनुशासन का अर्थ समझा है, तो वह रोम के लोगों ने किया।”[1]

इसलिए ध्यान दें कि यहाँ पौलुस केवल माता-पिता के अधिकार का प्रयोग करने का बुलावा नहीं दे रहा है। बल्कि वह इसकी वैधता को स्वीकार कर रहा है और इसे सन्तुलित भी कर रहा है। उसका पहला निर्देश नकारात्मक है: “अपने बच्चों को रिस न दिलाओ।” वह पिताओं से आग्रह करता है कि वे अपने बच्चों को अनुशासित करते समय संयम का प्रयोग करें, ताकि वे उन्हें हताश, निराश, या क्रोधित करके ज्यादा नुकसान न कर बैठें।

हम अपने बच्चों को किस प्रकार रिस दिला सकते हैं अर्थात क्रोधित कर सकते हैं? स्वार्थ, कठोरता, असंगति, अनुपयुक्तता, पक्षपात, चिढ़ाने, दोषारोपण करने, प्रगति की सराहना न करने के द्वारा . . . फिर भी ऐसी लम्बी सूची से हमें हतोत्साहित नहीं हो जाना चाहिए; इसके बजाय, हमें यह याद रखना चाहिए कि यह जिम्मेदारी केवल परमेश्वर के अनुग्रह से ही पूरी की जा सकती है।

और फिर भी पौलुस के निर्देश केवल नकारात्मक नहीं बल्कि सकारात्मक भी हैं। “उनका पालन–पोषण करो,” क्रिया का अर्थ कुछ-कुछ बागवानी जैसा है—यह हमें याद दिलाता है कि हमें अपने बच्चों को कोमलता से पालना है, और यह भी कि यह कोई तात्कालिक कार्य नहीं है; बल्कि यह कई वर्षों का एक सफर है। साथ ही, इस पालन-पोषण “अनुशासन” शामिल है—विशेष रूप से पवित्रशास्त्र का अनुशासन, जिसके द्वारा पिता स्वयं मसीह के स्वरूप में ढलता है—और “शिक्षा” शामिल है, जिसमें हम अपने बच्चों के मन पर परमेश्वर के वचनों की धीरे-धीरे छाप डालते हैं, ताकि उनका चरित्र सच में परिवर्तित हो जाए।

यदि आप माता-पिता हैं, तो आप इस कार्य को कैसे पूरा कर सकते हैं? इसके लिए अनुग्रह की आवश्यकता है। इसके साथ ही, इसके लिए धैर्य भी चाहिए। स्टॉक मार्केट की भाषा में, माता-पिता होना एक दिन भर में किया जाने वाला व्यापार नहीं है; यह दीर्घकालिक निवेश है। यह अद्‌भुत है कि एक चार साल का बच्चा, जिसे लगातार परमेश्वर के प्रेम और अनुशासन से सम्भाला जाता है, किशोरावस्था के अन्त तक एक विचारशील और प्रेमपूर्ण युवा वयस्क बन सकता है। यदि आप माता-पिता नहीं हैं, तो उन लोगों के लिए प्रार्थना करें, जो हैं। उन्हें इसकी आवश्यकता है! और यदि आप माता-पिता हैं, तो अपनी स्वयं की पद्धति पर विचार करें।

आप अपने घर में माता-पिता के अधिकार को कैसे स्थापित कर रहे हैं? आप इसे करते समय किस तरह से अपने बच्चों को क्रोधित करने के सबसे अधिक खतरे में हैं? आप अपने बच्चों को परमेश्वर के वचन में कैसे शिक्षा देंगे, और आप माता-पिता होने के अनुभव से अपने चरित्र को मसीह के समान बनाने में किस तरह से देख सकते हैं? इस सब में, याद रखें कि माता-पिता होना एक अनुग्रह का कार्य है। हमें अपनी जिम्मेदारियाँ विश्वासयोग्यता से निभानी हैं। लेकिन यदि आप यह नहीं याद रखते कि हर एक गलती को माफ करने के लिए अनुग्रह पर्याप्त है, तो आप हताश हो जाएँगे—यह एक ऐसा सत्य है जो आपको सशक्त करेगा और आपको घुटनों पर बनाए रखेगा!

  व्यवस्थाविवरण 6:1-15

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: ओबद्याह; प्रेरितों 8:1-25 ◊


[1] द लैटर टू द हिब्रूज़, द न्यू डेली स्टडी बाइबल (वैस्टमिंस्टर जॉन नॉक्स, 2002), पृ. 208.

8 जुलाई : दीनता से आएँ, ईमानदारी से ढूँढें

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8 जुलाई : दीनता से आएँ, ईमानदारी से ढूँढें
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“फिर फरीसी आकर उससे वाद–विवाद करने लगे, और उसे जाँचने के लिए उससे कोई स्वर्गीय चिह्न माँगा। उसने अपनी आत्मा में आह भर कर कहा, ‘इस समय के लोग क्यों चिह्न ढूँढ़ते हैं? मैं तुम से सच कहता हूँ कि इस समय के लोगों को कोई चिह्न नहीं दिया जाएगा।’” मरकुस 8:11-12

स्कूल के शिक्षक और कॉलेज के प्रोफेसर अक्सर दो प्रकार के प्रश्न पूछने वालों का सामना करते हैं: पहले वे जो विनम्रता से और वास्तविक रुचि के साथ पूछते हैं, और दूसरे वे जो चुनौती देने के इरादे से प्रश्न पूछते हैं। पहले वाले स्पष्ट रूप से समझने की कोशिश करते हैं। दूसरे वाले अपनी राय को पेश करने, अपने किसी मुद्दे को आगे बढ़ाने या बस खुद को चतुर दिखाने में रुचि रखते हैं।

जहाँ एक ओर लोगों की भीड़ ने मसीह के चमत्कारों को देखा और उन पर आश्चर्य व्यक्त किया, वहीं दूसरी ओर फरीसियों ने अक्सर यीशु की शिक्षाओं और सार्वजनिक सेवाकार्य को चुनौती दी, ताकि उसे परख सकें और उसे कमजोर कर सकें। वे वहाँ इस उद्देश्य से नहीं थे कि मसीह के अद्‌भुत कार्यों को देखें और सोचें कि क्या वह वास्तव में वही व्यक्ति है, जो उसने होने का दावा किया है। उनका उद्देश्य केवल मसीह को फँसाना और उलझाना ही था।

यीशु को अपने पीछे आ रही लोगों की भीड़ पर तरस आया। उसके पास उन लोगों के लिए दिव्य दया थी, जो अपनी आवश्यकता को पहचानकर अपने दिल में विनम्रता से उसके पास आते थे। उसने सत्य की तलाश में सच्चे दिल से उसके पास आने वाले किसी भी व्यक्ति को खाली हाथ नहीं मोड़ा। लेकिन उसने विरोधी धार्मिक नेताओं, जो अपने दावों को साबित करने और उसके दावों को चुनौती देने के लिए आए थे, का सामना न्यायपूर्ण निराशा और दिव्य अधीरता के साथ किया।

प्रश्न पूछने के दो तरीके हैं: विनम्रता से या घमण्ड से। और शिक्षक हमेशा अन्तर को पहचानता है।

ऐसे कुछ लोग, जो कहते हैं कि वे धार्मिक हैं, वे बाइबल की शिक्षा से कुछ नहीं सीखते। वे रविवार-दर-रविवार उपदेश सुनते हैं और कारण ढूँढते रहते करते हैं कि वे मसीह के द्वारा पूर्ण किए गए कार्य पर पूरी तरह से विश्वास क्यों न करें। वे प्रभु को दूर रखने के इरादे से प्रश्न पूछते हैं, और फिर सोचते हैं कि उन्हें कभी सन्तोषजनक उत्तर क्यों नहीं मिलता। यह परमेश्वर के बच्चों का तरीका नहीं है। हमें विनम्रता और जिज्ञासा के साथ अपने शिक्षक से सीखने की कोशिश करनी चाहिए, और जब हमारा दिल परेशान हो, तो हमें विनम्रता से उसके पास आकर यह प्रार्थना करनी चाहिए कि हम उत्तर को स्वीकारने के लिए खुले रहें और यह मांग न करें कि यीशु हमारे मुद्दे या अपेक्षाओं का पालन करे।

यदि आपकी समझने की क्षमता बड़ी है, तो बाइबल आपके बौद्धिक दृष्टिकोण को सन्तुष्ट कर सकती है। लेकिन यदि आपका घमण्ड सिर चढ़कर बोलने लगे, तो आप पाएँगे कि यह घमण्ड परमेश्वर के वचन की स्पष्टता और सत्य को देखने की आपकी क्षमता को विकृत कर देगा। मसीह बौद्धिक ईमानदारी की मांग को पूरा करने के लिए तैयार है, लेकिन वह घमण्ड को बिल्कुल भी बढ़ावा नहीं देगा।

हम सभी के पास इस संसार के बारे में, हमारे जीवन के बारे में और इस बारे में कि हमें किस रास्ते पर जाना चाहिए, बहुत सारे प्रश्न होते हैं, जो हम यीशु से पूछना चाहते हैं। यीशु उन्हें कभी खाली हाथ नहीं लौटाता जो उसके पास आते हैं, और वह अपने भाइयों और बहनों की प्रार्थनाओं का स्वागत करता है। लेकिन अपने प्रश्नों पर विचार करने के साथ-साथ, अपने हृदय पर भी विचार करें। अपने प्रश्न पूछें, लेकिन पहले यह सोचें कि आप ये प्रश्न कैसे पूछ रहे हैं: क्या आप विश्वास से समझ प्राप्त करने के लिए प्रेरित हैं या घमण्ड से सही प्रमाणित होने की कोशिश कर रहे हैं?

मरकुस 10:2-22

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: व्यवस्थाविवरण 32–34; प्रेरितों 7:44- 60

7 जुलाई : यूसुफ का प्रलोभन

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7 जुलाई : यूसुफ का प्रलोभन
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“यूसुफ सुन्दर और रूपवान था। इन बातों के पश्चात ऐसा हुआ कि उसके स्वामी की पत्नी ने यूसुफ की ओर आँख लगाई और कहा, ‘मेरे साथ सो।’ पर उसने अस्वीकार कर दिया।” उत्पत्ति 39:6-8

प्रलोभन बुराई या पाप की ओर आकर्षित करने वाला आमन्त्रण होता है। हर व्यक्ति ने इसका सामना किया है—यहाँ तक कि स्वयं प्रभु यीशु ने भी। इसलिए, प्रलोभन अपने आप में पाप नहीं है; उसके प्रति हमारी प्रतिक्रिया निर्धारित करती है कि हम धार्मिकता के मार्ग में आगे बढ़ेंगे या फिर अवज्ञा के दलदल में डूब जाएँगे।

पोतीपर की पत्नी के कार्य यह दर्शाते हैं कि प्रलोभन स्वयं को किस प्रकार प्रकट करता है। आरम्भ में, उसका दृष्टिकोण सूक्ष्म था। उसने अपने मन में यूसुफ को देखने का तरीका बदल दिया। हमारी आँखें हमारे मन की खिड़की हैं और अनेक प्रलोभनों का प्रवेशद्वार भी हैं। वासना से भरा हृदय अक्सर टकटकी लगाकर देखने से आरम्भ होता है।

उसकी आँखों ने जब उसके मन को जकड़ लिया, तो उसने अपनी लज्जा को खो दिया। वह व्यभिचार के लिए इतने खुले रूप से आमन्त्रण देने तक कैसे पहुँच गई? इसका उत्तर यह है कि वह स्पष्ट रूप से अपने कल्पना-लोक में वासना को बढ़ावा दे रही थी। जब हम किसी पापपूर्ण विचार को लगातार मन में स्थान देते हैं, तो उसके वास्तविक जीवन में प्रकट होने की सम्भावना बहुत अधिक हो जाती है। पाप हमेशा अंधी, उग्र और लगभग अनियन्त्रित (हालाँकि कभी भी पूरी तरह से नहीं) इच्छाओं से प्रेरित होकर एक पल में फूट पड़ने के लिए तैयार रहता है। जब हम अपने विचारों में बहुत दूर तक आगे बढ़ जाते हैं, तो बस अवसर की आवश्यकता होती है—और जब अवसर आता है, तो बाहरी पाप भी प्रकट हो जाता है।

आप और मैं पोतीपर की पत्नी की गलतियों से सीख सकते हैं। निश्चित करें कि हम अपनी आँखों को क्या देखने देते हैं और अपने मन में किन बातों पर विचार करते हैं, क्योंकि कभी न कभी यह हमारे कार्यों को अवश्य प्रभावित करेगा। प्रलोभन और उससे उत्पन्न होने वाली इच्छाएँ या तो पोषित की जाएँगी या फिर उनका विरोध किया जाएगा। क्या हम “हर एक भावना को कैद करके मसीह का आज्ञाकारी बना” (2 कुरिन्थियों 10:5) देने के लिए तैयार हैं, या हम वासना और अन्य पापों को बढ़ावा देते रहेंगे? क्या हम “काना होकर परमेश्‍वर के राज्य में प्रवेश” करने के लिए तैयार हैं (मरकुस 9:47), या हमें अनन्त जीवन इतना मूल्यवान नहीं लगता कि इसके लिए हम यह त्याग करें?

आज आपकी आँखें और आपका मन किस प्रकार के प्रलोभनों का सामना कर रहे हैं? जहाँ हर प्रलोभन पाप की ओर खींचने वाला एक खतरनाक आमन्त्रण है, वहीं यह धार्मिकता के मार्ग में आज्ञापालन चुनने का अवसर भी प्रदान करता है। प्रार्थना करें कि आपको उन क्षणों को पहचानने की बुद्धि और हिम्मत मिले और उन प्रलोभनों का सामना इस तरह करें जो आपको धार्मिकता के मार्ग में आगे बढ़ाए।

उत्पत्ति 4:1-16

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: व्यवस्थाविवरण 30–31; प्रेरितों 7:22-43 ◊

6 जुलाई : अनुशासन के साथ प्रशिक्षण

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6 जुलाई : अनुशासन के साथ प्रशिक्षण
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“हर एक पहलवान सब प्रकार का संयम करता है; वे तो एक मुरझाने वाले मुकुट को पाने के लिए यह सब करते हैं, परन्तु हम तो उस मुकुट के लिए करते हैं जो मुरझाने का नहीं। इसलिए मैं तो इसी रीति से दौड़ता हूँ, परन्तु लक्ष्यहीन नहीं; मैं भी इसी रीति से मुक्कों से लड़ता हूँ, परन्तु उस के समान नहीं जो हवा पीटता हुआ लड़ता है। परन्तु मैं अपनी देह को मारता कूटता और वश में लाता हूँ।” 1 कुरिन्थियों 9:25-27

कुरिन्थुस में इस्त्मियाई खेलों का आयोजन किया जाता था, जो आकार और महत्त्व में ओलम्पिक खेलों के बाद दूसरे स्थान पर थे। खेल-कूद उस संस्कृति का एक प्रमुख हिस्सा था। कुरिन्थुस के निवासी जानते थे कि किसी दौड़ में लगाया गया प्रयास केवल उसी क्षण का नहीं होता, बल्कि उसके लिए जीवनभर कठोर परिश्रम आवश्यक होता है। इसी कारण जब पौलुस ने कुरिन्थुस की कलीसिया को पत्र लिखा, तो उसने केवल दौड़ने और प्रतिस्पर्धा करने की ही नहीं, बल्कि प्रशिक्षण की भी बात की।

कुरिन्थुस में बच्चों को सात वर्ष की आयु से ही कठोर व्यायाम में लगा दिया जाता था ताकि वे प्रतियोगिताओं के लिए तैयार हो सकें। प्रतियोगियों से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे यह प्रमाणित करें कि उन्होंने कठोर प्रशिक्षण लिया है। कोई भी प्रतियोगी महीनों की तैयारी के बिना प्रतियोगिता में दौड़ नहीं पाता था। इसी प्रकार, मसीही जीवन में भी ऐसा अनुशासन दिखना चाहिए जो परमेश्वर की दौड़ को दौड़ने की हमारी शाश्वत प्रतिबद्धता को दर्शाए। हमारे शब्दों का प्रमाण हमारे कार्यों में दिखना चाहिए। यदि हम केवल मसीही जीवन जीने का संकल्प व्यक्त करें, लेकिन उसके अनुसार अनुशासित जीवन न बिताएँ, तो यह व्यर्थ है। यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति सुबह जल्दी उठने या वजन घटाने का निश्चय करे, लेकिन न तो घड़ी में अलार्म लगाए, न व्यायाम करे और न ही सही आहार अपनाए। उपयुक्त कार्यों के बिना संकल्प का कोई मूल्य नहीं रहता।

जिस अनुशासन की पौलुस चर्चा करता है, वह केवल एक भावना या विचार नहीं है, बल्कि यह एक सचेत, ठोस निर्णय है कि हम अपने समय का उपयोग कैसे करेंगे, किन बातों पर अपना मन लगाएँगे, और अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को कैसे जीएँगे। उन्नीसवीं सदी के अंग्रेज बिशप जे. सी. राइल ने कहा था, “सच्ची पवित्रता . . . केवल आन्तरिक संवेदनाओं और प्रभावों का नाम नहीं है . . . यह ‘मसीह के स्वरूप’ का एक हिस्सा है, जिसे लोग हमारे निजी जीवन, आदतों, स्वभाव, और कार्यों में देख और पहचान सकते हैं।”[1]

प्राचीन काल में, जब कोई विजयी खिलाड़ी अपने नगर लौटता था, तो वह उसी द्वार से प्रवेश नहीं करता था जिससे वह गया था। उसके सम्मान में नगर की दीवार का एक भाग तोड़कर एक नया द्वार बनाया जाता था। वह इस नए द्वार में से प्रवेश करता था और पूरा नगर इकट्ठा होकर उसे सम्मान और जय-जयकार के साथ स्वागत करता था। मसीही जीवन में प्रशिक्षण हमें उद्धार नहीं दिलाता। उद्धार केवल मसीह के द्वारा ही सम्भव है। लेकिन यह हमें स्वर्ग में एक शानदार प्रवेश अवश्य दिला सकता है। जब हम परमेश्वर के राज्य में पहुँचेंगे और प्रभु से सुनेंगे, “धन्य, हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास” (मत्ती 25:21), तो वह सम्मान और आनन्द किसी भी नए बने द्वार से कहीं अधिक महान होगा!

यही वह स्वर्ग में प्रवेश की तस्वीर है, जिसे परमेश्वर का वचन हमारे सामने प्रस्तुत करता है—उन लोगों के लिए जो दौड़ पूरी करते हैं, जो प्रशिक्षण सहते हैं, और जो जीतने के लिए दौड़ते हैं। तो स्वयं से यह प्रश्न पूछें: मैं कहाँ केवल संकल्प व्यक्त कर रहा हूँ, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठा रहा? मसीही विकास के किस क्षेत्र में मुझे अनुशासन को अपनाने की आवश्यकता है ताकि मैं अपने प्रभु के और अधिक समान बन सकूँ? और फिर, उस महान क्षण की ओर देखें जब आप अपनी दौड़ पूरी करेंगे और महिमा में प्रवेश करेंगे, क्योंकि वही वह प्रेरणा होगी जो आपको आवश्यक प्रशिक्षण लेने के लिए प्रोत्साहित करेगी।

  रोमियों 13:8-14

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: व्यवस्थाविवरण 28–29; प्रेरितों 7:1-21


[1] होलीनेस (रिफोमर्ड चर्च पबलिकेशंस, 2009), पृ. 8.

5 जुलाई : भिन्न होने का बुलावा

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5 जुलाई : भिन्न होने का बुलावा
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“हे प्रियो, मैं तुम से विनती करता हूँ कि तुम अपने आप को परदेशी और यात्री जानकर उन सांसारिक अभिलाषाओं से जो आत्मा से युद्ध करती हैं, बचे रहो। अन्यजातियों में तुम्हारा चालचलन भला हो; ताकि जिन–जिन बातों में वे तुम्हें कुकर्मी जानकर बदनाम करते हैं, वे तुम्हारे भले कामों को देखकर उन्हीं के कारण कृपा–दृष्‍टि के दिन परमेश्‍वर की महिमा करें।” 1 पतरस 2:11-12

यीशु के अनुयायियों को किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए? यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। इसका उत्तर सरल भी है और चुनौतीपूर्ण भी: हमें भिन्न होने के लिए बुलाया गया है—उन लोगों से भिन्न जो यीशु का अनुसरण नहीं करते।

सम्पूर्ण अनन्तकाल से परमेश्वर ने अपनी एक विशेष प्रजा रखने की योजना बनाई है। परमेश्वर की प्रजा को एक पवित्र प्रजा होने के लिए बुलाया गया है, जो पाप से अलग और परमेश्वर के लिए समर्पित हो, क्योंकि परमेश्वर स्वयं “पवित्र, पवित्र, पवित्र” है (यशायाह 6:3; प्रकाशितवाक्य 4:8)। हमें सम्पूर्ण बाइबल में यह सिद्धान्त देखने को मिलता है कि परमेश्वर ने अपनी प्रजा को अन्य लोगों से अलग रखा है। उदाहरण के लिए, लैव्यव्यवस्था की पुस्तक में यहोवा इस्राएलियों को आज्ञा देता है कि वे मिस्रियों और कनानियों की मूर्तिपूजक प्रथाओं का अनुसरण न करें। इसके बजाय, उन्हें परमेश्वर की व्यवस्थाओं और विधियों का पालन करना है (लैव्यव्यवस्था 18:1-5)।

लेकिन परमेश्वर ने अपना व्यवस्था-विधान केवल इसलिए नहीं दिया था कि उसकी प्रजा बाहरी रूप से आज्ञाकारी दिखाई दे। नहीं, परमेश्वर की आज्ञाओं का सच्चा पालन एक परिवर्तित हृदय की अभिव्यक्ति है—एक ऐसा हृदय जो पवित्रता में आनन्दित होता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर कहता है, तुम मेरी प्रजा हो। तुम मेरे हो। इसलिए मैं चाहता हूँ कि तुम इस तरह अलग किए जाने के बुलावे में आनन्दित हो। हमारे बाहरी कार्य केवल तभी टिक सकते हैं और परमेश्वर को केवल तभी प्रसन्न कर सकते हैं, जब पहले हमारे भीतर आन्तरिक रूप से परिवर्तन हो चुका हो।

इसीलिए नए नियम में पतरस विश्वासियों को याद दिलाता है कि वे “एक चुना हुआ वंश, और राज–पदधारी याजकों का समाज, और पवित्र लोग, और (परमेश्‍वर की) निज प्रजा हैं” (1 पतरस 2:9)। आज हम भी परमेश्वर की प्रजा के रूप में अलग जीने के लिए बुलाए गए हैं: हमें अपने व्यवहार को सम्मानजनक बनाए रखना है और अपने मनोरंजन, धन, सम्बन्धों—अर्थात् अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में—ऐसे निर्णय लेने हैं, जो परमेश्वर की इस आज्ञा के अनुरूप हों कि “पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ” (1 पतरस 1:16)।

विश्वासियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हम संसार की आवश्यकता में तो साझी हों, लेकिन उसके पापों में सहभागी न हों। हमारे संसार के लोगों को हमें यह महसूस कराने की आवश्यकता नहीं है कि उनका अनैतिक आचरण और अपने सृष्टिकर्ता को ठुकराना सही है। इसके बजाय, जैसा कि पतरस समझाता है, हमें ऐसा जीवन जीना चाहिए कि “जिसने तुम्हें अन्धकार में से अपनी अद्‌भुत ज्योति में बुलाया है, उसके गुण प्रगट करो,” ताकि लोग हमारे अच्छे कामों को देखकर परमेश्वर को महिमा दें (1 पतरस 2:9)। इसलिए पतरस के ये वचन हमें यह आत्म-जांच करने के लिए प्रेरित करें: क्या मैं सच में अलग होने की अपेक्षा रखता हूँ? क्या मैं इतना साहसी हूँ कि दूसरों की आलोचना सहकर भी परमेश्वर के अनुसार जी सकूँ? क्या मैं इस संसार से इतना प्रेम करता हूँ कि मैं इस संसार के जैसा न बनूँ, ताकि मैं इस संसार के लोगों को एक उत्तम संसार की ओर इंगित कर सकूँ?

व्यवस्थाविवरण 4:1-8

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: व्यवस्थाविवरण 25–27; प्रेरितों 6 ◊

4 जुलाई : स्वतन्त्रता का जूआ

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4 जुलाई : स्वतन्त्रता का जूआ
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“मेरे पास आओ . . . क्योंकि मेरा जूआ सहज और मेरा बोझ हल्का है।” मत्ती 11:28, 30

जुआ एक लकड़ी का ढाँचा होता है, जो बैलों या अन्य बलशाली जानवरों की पीठ पर रखा जाता है, जिससे उन्हें एक साथ जोड़ा जा सके ताकि वे भारी बोझ खींच सकें। जुए का उद्देश्य वजन को दोनों ओर समान रूप से वितरित करना होता है, जिससे जानवर इसे उठाते हुए आसानी से चल सकें।

यीशु इस उदाहरण का उपयोग उन लोगों को अभूतपूर्व स्वतन्त्रता देने के लिए करता है, जो उसके पीछे चलने के लिए तैयार हैं। अपने “सरल” और “हल्के” जुए को लेने के निमन्त्रण के माध्यम से यीशु स्वयं को खोखले धर्म से अलग करता है, जिसमें नियमों और व्यवस्थाओं का भारी बोझ होता है। यीशु के समय के फरीसी सही कार्य करने में इतने उलझे हुए थे कि वे न केवल परमेश्वर की व्यवस्था का पालन करने का प्रयास कर रहे थे, बल्कि उन्होंने अपने ढेरों नियम भी उसमें जोड़ लिए थे। ऐसे मनुष्यों द्वारा बनाए गए दायित्व और अपेक्षाएँ बहुत भारी बोझ बन जाती हैं। वे बार-बार कहते रहते हैं, “चलो, और अधिक प्रयास करो; यह करो, वह करो,” जो किसी को भी मानसिक और आत्मिक रूप से थका सकता है।

परन्तु यीशु का जुआ भिन्न है।

यीशु के जुए—अथवा उसके अधिकार—के अधीन होना कोई बोझ नहीं है, बल्कि यह आनन्द की बात है। यह कैसे सम्भव है? मसीह में जो स्वतन्त्रता पाई जाती है, वह अपनी इच्छा के अनुसार काम करने की स्वतन्त्रता नहीं है, बल्कि वह करने की स्वतन्त्रता है जो हमें करना चाहिए। चूंकि स्वभाव से हम वह नहीं कर सकते जो हमें करना चाहिए, इसलिए हम अपनी इच्छाओं के अधीन जकड़े हुए हैं। यह मार्ग बहुत कुछ देने का वायदा तो करता है, परन्तु बहुत कम प्रदान करता है। हमें किसी की आवश्यकता है—यीशु की—जो हमें पाप के बन्धन से छुड़ाए, ताकि हम परमेश्वर की इच्छा में स्वतन्त्र होकर जी सकें और वही बन सकें जिसके लिए हमें बनाया गया है। यही कारण है कि मसीह की आज्ञाएँ “स्वतन्त्रता की सिद्ध व्यवस्था” हैं और यही कारण है कि जो उन्हें मानते हैं “वे अपने काम में आशीष पाएँगे” (याकूब 1:25)।

इसीलिए हम आनन्द के साथ घोषणा करते हैं, “यीशु मेरा प्रभु है।” यही उसकी पहचान है—और उसके प्रभुत्व के कारण, जब हम उसके निमन्त्रण का उत्तर देकर उसके जुए को अपने कंधों पर लेते हैं, तो हम उसकी सिद्ध इच्छानुसार स्वतन्त्र रूप से जीने की एक नई जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं। नैतिकता, लैंगिकता, व्यवसाय, परिवार—ये सभी और अन्य बातें प्रभु यीशु मसीह के जुए के अधीन आ जाती हैं।

जो लोग अब भी असहनीय बोझ के नीचे दबे हुए महसूस कर रहे हैं, चाहे वे असम्भव नियम हों या पापी इच्छाएँ, यीशु उन्हें आमन्त्रित करता है कि वे आएँ और उन्हें अपने बोझ से मुक्त करने दें। आपको आज यह सुनने की आवश्यकता है। आप किस पाप से संघर्ष कर रहे हैं? क्या आप प्रभु की आज्ञाओं को एक भारी बोझ के रूप में देख रहे हैं? किस प्रकार से आप उसकी योजनाओं के विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं? उसे फिर से सुनें: मेरे पास आओ। मैं दीन हूँ। मैं नम्र हूँ। तुम्हारा बोझ इतना भारी है कि मुझे तुम्हारे लिए क्रूस पर मरना पड़ा—और मैंने स्वेच्छा से ऐसा किया। आओ और मेरे साथ जुए में बँध जाओ। मेरा बोझ हल्का है।

रोमियों 6:15-23

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: व्यवस्थाविवरण 22–24; प्रेरितों 5:21-42

3 जुलाई : प्रोत्साहन का पुत्र

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3 जुलाई : प्रोत्साहन का पुत्र
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“यरूशलेम में पहुँचकर उसने (पौलुस ने) चेलों के साथ मिल जाने का प्रयत्न किया; परन्तु सब उससे डरते थे, क्योंकि उनको विश्‍वास न होता था, कि वह भी चेला है। परन्तु बरनबास ने उसे अपने साथ प्रेरितों के पास ले जाकर उनको बताया कि इसने किस रीति से मार्ग में प्रभु को देखा, और उसने इससे बातें कीं; फिर दमिश्क में इसने कैसे हियाव से यीशु के नाम से प्रचार किया।” प्रेरितों 9:26-27

1960 के दशक की एक सन्ध्या, एक असंयमित हिप्पी सैन फ्रांसिस्को के तट के पास स्थित एक बहुत बड़े और प्रतिष्ठित चर्च में आया। जब वह अन्दर आया, तो किसी भी परिचारक ने उसका स्वागत नहीं किया। चर्च पूरी तरह भरा हुआ था, और जब उसने सीट खोजने के लिए पंक्तियों को देखा, तो कोई भी अपनी जगह से नहीं हिला—इसलिए वह आगे बढ़ता गया। अन्ततः, जब उसे कोई सीट नहीं मिली, तो वह पूरे चर्च के आगे तक चलते हुए गलियारे के ठीक बीच में पालती मार कर बैठ गया। उसी समय, चर्च के सबसे वरिष्ठ डीकन—जो एक छोटे कद के व्यक्ति थे, तीन-पीस सूट पहने हुए और टाई में पिन लगाए हुए—पीछे से उसकी ओर बढ़ने लगे। वह सीधा उस युवक के पास पहुँचे—और उसके बगल में जमीन पर बैठ गए!

वह डीकन एक “बरनबास” था। 500 लोगों के समूह में से केवल एक बरनबास ने एक नए विश्वासी के जीवन में सब कुछ बदल दिया।

जब पौलुस मसीह में नया विश्वासी बना, तो उसके पास भी कोई जगह नहीं थी जहाँ वह जा सके। यरूशलेम के विश्वासी उससे डरते थे और सन्देह करते थे कि क्या वह सचमुच बदल गया है। इस महत्त्वपूर्ण समय में पौलुस को किसी की ज़रूरत थी जो उसे प्रोत्साहित करे, उसका मार्गदर्शन करे, और उसे कलीसिया से परिचित कराए। इस कार्य के लिए परमेश्वर ने एक साधारण व्यक्ति को चुना, जिसे वह पहले से तैयार करता आ रहा था। यह व्यक्ति साइप्रस का रहने वाला था, जिसकी धार्मिक पृष्ठभूमि बहुत समृद्ध थी और जिसे उसके जानने वालों ने एक नया नाम दिया था: बरनबास, जिसका अर्थ है “प्रोत्साहन का पुत्र” (प्रेरितों 4:36)।

बरनबास का यही गुण—उसका प्रोत्साहित करने वाला स्वभाव—पौलुस के जीवन में प्रभावशाली बना। पवित्रशास्त्र हमें यह नहीं बताता कि बरनबास ने पौलुस को किसी स्थान की ओर निर्देशित किया, उसे कोई नक्शा दिया, या किसी और से मिलने का सुझाव दिया। नहीं, बल्कि यह हमें इन अद्‌भुत शब्दों में बताता है: “परन्तु बरनबास ने उसे अपने साथ प्रेरितों के पास ले जाकर उनको बताया” (प्रेरितों 9:27)। जब आप किसी को वहाँ ले जाते हैं जहाँ उसे जाना चाहिए, तो इसके लिए समय, परिश्रम और आपकी योजनाओं में बदलाव की आवश्यकता पड़ती है। जहाँ कई लोग परवाह नहीं करते, वहाँ बरनबास ने कदम बढ़ाया।

बरनबास पौलुस की पहली मिशनरी यात्रा में उसका साथी बना (प्रेरितों 13:1-3)। न केवल पौलुस के मसीही जीवन की आरम्भ बल्कि अन्यजातियों के बीच उसकी गवाही का आरम्भ भी इस गुमनाम नायक के योगदान से ही सम्भव हुआ। केवल स्वर्ग में ही यह पूरी तरह स्पष्ट होगा कि पौलुस की सेवकाई की कितनी सफलताएँ परमेश्वर द्वारा उसके जीवन में बरनबास को लाने के कारण आईं।

हमारी कलीसियाओं को बरनबास जैसे लोगों की आवश्यकता है—ऐसे लोग जो इस प्रकार की करुणा को दर्शाते हैं, जो समय और प्रयास लगाते हैं और अपनी योजनाओं को पुनः व्यवस्थित करते हैं, ताकि नए या संघर्ष कर रहे लोगों तक पहुँच सकें और उनका स्वागत कर सकें। हाँ, यह सच है कि कई मण्डलियों में ऐसे लोग मौजूद हैं; कलीसिया हर सप्ताह ऐसे पुरुषों और महिलाओं के कारण आगे बढ़ती रहती है, जो यह समझते हैं कि उनके दिनों में कोई भी क्षण महत्त्वहीन नहीं है। कोई भी मुलाकात संयोग से नहीं होती। कोई भी व्यक्ति अप्रासंगिक नहीं होता। कोई भी कार्य तुच्छ नहीं होता।

हर कलीसिया को ऐसे लोगों की ज़रूरत होती है, जो आवश्यक कार्य करने के लिए तैयार हों—जो किसी को वैसे ही “अपने साथ लेकर जाएँ” जैसे बरनबास पौलुस को लेकर गया। क्या आप वह व्यक्ति होंगे?

प्रेरितों 4:32-37

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: व्यवस्थाविवरण 19–21; प्रेरितों 5:1-21a ◊

2 जुलाई : विश्वास की विरासत

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2 जुलाई : विश्वास की विरासत
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“अब विश्‍वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है। क्योंकि इसी के विषय में प्राचीनों की अच्छी गवाही दी गई।” इब्रानियों 11:1-2

विश्वास कैसा दिखता है? इब्रानियों का लेखक अपनी पत्री के ग्यारहवें अध्याय में इस प्रश्न को सम्बोधित करते हुए हमें पुराने समय के संतों की एक सूची प्रस्तुत करता है—जो ऐसे पुरुष और महिलाएँ थे, जिन्हें उनके विश्वास के कारण सराहा गया। बाइबल में दर्ज प्रशंसा का यह विवरण इन व्यक्तियों को किसी महाशक्तिशाली स्तर पर उठाने के लिए नहीं है। इसके विपरीत, हमें नूह, मूसा और अन्य लोगों को सामान्य मनुष्यों के रूप में देखना चाहिए, जिनसे हम यह प्रेरणा और बल प्राप्त कर सकते हैं कि परमेश्वर ने उनकी सहायता कैसे की और उनके विश्वास का सम्मान कैसे किया।

यदि हम उनके जीवन्त और क्रियाशील विश्वास का अनुसरण करना चाहते हैं, तो सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि उनका विश्वास क्या नहीं था। यह कोई भावनात्मक या परिस्थितियों से उत्पन्न होने वाली गर्मजोशी भरी भावना नहीं थी, और न ही यह एक अस्पष्ट धारणा थी कि अन्त में सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा। नहीं, इन पुरुषों और महिलाओं के लिए विश्वास का अर्थ था—परमेश्वर ने जो कहा है, उस पर विश्वास करना, उसके वचन को स्वीकार करना और फिर अपने जीवन को उसी के अनुसार संचालित करना। दूसरे शब्दों में, जैसा कि इन वचनों में लिखा है, उनका विश्वास यह सुनिश्चित करने वाली दृढ़ निष्ठा थी कि परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ निश्चित रूप से पूरी होंगी।

इसके अतिरिक्त, पुराने समय के इन संतों ने अपने भविष्य की वास्तविकता को ऐसे देखा, मानो वह वर्तमान में ही घट रही हो, और जो अदृश्य था उसे उन्होंने ऐसे देखा, मानो वह सब अपनी आँखों से देख रहे हों। भले ही उन्होंने अपने जीवनकाल में परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को पूरा होते न देखा हो, फिर भी उन्होंने अनन्तकाल के दृष्टिकोण से उसके वचन की विश्वासयोग्यता पर भरोसा किया। उनका विश्वास उनकी वर्तमान परिस्थितियों पर आधारित नहीं था, बल्कि उस पर आधारित था जिसने उनके भविष्य के लिए प्रतिज्ञाएँ दी थीं।

अपने विश्वास को इतने स्पष्ट रूप से जीकर, इन संतों ने अपने समय में एक क्रान्तिकारी प्रभाव डाला—और हम भी अपने समय में ऐसा ही कर सकते हैं। जब कोई व्यक्ति, दम्पत्ति, परिवार, या कलीसिया परमेश्वर के वचन पर विश्वास करके उसके अनुसार कार्य करने के लिए तैयार होता है, तो जीवन बदल जाते हैं। यदि हम ऐसा करेंगे, तो हम परमेश्वर को और अधिक स्पष्ट रूप से समझ पाएँगे, उसके कार्यों को पहचानेंगे और इस संसार में तथा अनन्तकाल के लिए प्रभाव डालने के लिए बेहतर रूप से तैयार होंगे।

इब्रानियों 11 में प्रस्तुत सभी संतों के जीवन की एक विशेष समानता थी, एक ऐसा गुण जो उन्हें इन विशिष्ट लोगों की सूची में ले आया, वह जीवित परमेश्वर पर उनका विश्वास था—ऐसा आश्वासन कि परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ उनकी आशाओं के बोझ को उठा सकती थीं और ऐसी कायलता कि परमेश्वर ने जो कहा था, वह इतना वास्तविक था कि मानो वे उसे अपनी आँखों से देख सकते थे। क्या आपका विश्वास भी ऐसा ही है? मसीह में परमेश्वर की उन सभी प्रतिज्ञाओं पर ध्यान करें जो आपकी हैं। इतिहास में परमेश्वर द्वारा पूरी की गई सभी प्रतिज्ञाओं पर मनन करें, विशेष रूप से उसके पुत्र की मृत्यु और पुनरुत्थान पर मनन करें। तब आप आनन्द और दृढ़ संकल्प के साथ अपने जीवन की प्राथमिकताएँ निर्धारित कर सकेंगे और अपने निर्णय अपनी परिस्थितियों के आधार पर लेने के बजाय उसकी प्रतिज्ञाओं के आधार पर लेंगे।

इब्रानियों 11

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: व्यवस्थाविवरण 16–18; प्रेरितों 4:23-37