8 जुलाई : दीनता से आएँ, ईमानदारी से ढूँढें

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8 जुलाई : दीनता से आएँ, ईमानदारी से ढूँढें
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“फिर फरीसी आकर उससे वाद–विवाद करने लगे, और उसे जाँचने के लिए उससे कोई स्वर्गीय चिह्न माँगा। उसने अपनी आत्मा में आह भर कर कहा, ‘इस समय के लोग क्यों चिह्न ढूँढ़ते हैं? मैं तुम से सच कहता हूँ कि इस समय के लोगों को कोई चिह्न नहीं दिया जाएगा।’” मरकुस 8:11-12

स्कूल के शिक्षक और कॉलेज के प्रोफेसर अक्सर दो प्रकार के प्रश्न पूछने वालों का सामना करते हैं: पहले वे जो विनम्रता से और वास्तविक रुचि के साथ पूछते हैं, और दूसरे वे जो चुनौती देने के इरादे से प्रश्न पूछते हैं। पहले वाले स्पष्ट रूप से समझने की कोशिश करते हैं। दूसरे वाले अपनी राय को पेश करने, अपने किसी मुद्दे को आगे बढ़ाने या बस खुद को चतुर दिखाने में रुचि रखते हैं।

जहाँ एक ओर लोगों की भीड़ ने मसीह के चमत्कारों को देखा और उन पर आश्चर्य व्यक्त किया, वहीं दूसरी ओर फरीसियों ने अक्सर यीशु की शिक्षाओं और सार्वजनिक सेवाकार्य को चुनौती दी, ताकि उसे परख सकें और उसे कमजोर कर सकें। वे वहाँ इस उद्देश्य से नहीं थे कि मसीह के अद्‌भुत कार्यों को देखें और सोचें कि क्या वह वास्तव में वही व्यक्ति है, जो उसने होने का दावा किया है। उनका उद्देश्य केवल मसीह को फँसाना और उलझाना ही था।

यीशु को अपने पीछे आ रही लोगों की भीड़ पर तरस आया। उसके पास उन लोगों के लिए दिव्य दया थी, जो अपनी आवश्यकता को पहचानकर अपने दिल में विनम्रता से उसके पास आते थे। उसने सत्य की तलाश में सच्चे दिल से उसके पास आने वाले किसी भी व्यक्ति को खाली हाथ नहीं मोड़ा। लेकिन उसने विरोधी धार्मिक नेताओं, जो अपने दावों को साबित करने और उसके दावों को चुनौती देने के लिए आए थे, का सामना न्यायपूर्ण निराशा और दिव्य अधीरता के साथ किया।

प्रश्न पूछने के दो तरीके हैं: विनम्रता से या घमण्ड से। और शिक्षक हमेशा अन्तर को पहचानता है।

ऐसे कुछ लोग, जो कहते हैं कि वे धार्मिक हैं, वे बाइबल की शिक्षा से कुछ नहीं सीखते। वे रविवार-दर-रविवार उपदेश सुनते हैं और कारण ढूँढते रहते करते हैं कि वे मसीह के द्वारा पूर्ण किए गए कार्य पर पूरी तरह से विश्वास क्यों न करें। वे प्रभु को दूर रखने के इरादे से प्रश्न पूछते हैं, और फिर सोचते हैं कि उन्हें कभी सन्तोषजनक उत्तर क्यों नहीं मिलता। यह परमेश्वर के बच्चों का तरीका नहीं है। हमें विनम्रता और जिज्ञासा के साथ अपने शिक्षक से सीखने की कोशिश करनी चाहिए, और जब हमारा दिल परेशान हो, तो हमें विनम्रता से उसके पास आकर यह प्रार्थना करनी चाहिए कि हम उत्तर को स्वीकारने के लिए खुले रहें और यह मांग न करें कि यीशु हमारे मुद्दे या अपेक्षाओं का पालन करे।

यदि आपकी समझने की क्षमता बड़ी है, तो बाइबल आपके बौद्धिक दृष्टिकोण को सन्तुष्ट कर सकती है। लेकिन यदि आपका घमण्ड सिर चढ़कर बोलने लगे, तो आप पाएँगे कि यह घमण्ड परमेश्वर के वचन की स्पष्टता और सत्य को देखने की आपकी क्षमता को विकृत कर देगा। मसीह बौद्धिक ईमानदारी की मांग को पूरा करने के लिए तैयार है, लेकिन वह घमण्ड को बिल्कुल भी बढ़ावा नहीं देगा।

हम सभी के पास इस संसार के बारे में, हमारे जीवन के बारे में और इस बारे में कि हमें किस रास्ते पर जाना चाहिए, बहुत सारे प्रश्न होते हैं, जो हम यीशु से पूछना चाहते हैं। यीशु उन्हें कभी खाली हाथ नहीं लौटाता जो उसके पास आते हैं, और वह अपने भाइयों और बहनों की प्रार्थनाओं का स्वागत करता है। लेकिन अपने प्रश्नों पर विचार करने के साथ-साथ, अपने हृदय पर भी विचार करें। अपने प्रश्न पूछें, लेकिन पहले यह सोचें कि आप ये प्रश्न कैसे पूछ रहे हैं: क्या आप विश्वास से समझ प्राप्त करने के लिए प्रेरित हैं या घमण्ड से सही प्रमाणित होने की कोशिश कर रहे हैं?

मरकुस 10:2-22

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: व्यवस्थाविवरण 32–34; प्रेरितों 7:44- 60

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