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3 मार्च : आत्मा में विश्राम

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3 मार्च : आत्मा में विश्राम
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“इसलिए जब कि उसके विश्राम में प्रवेश करने की प्रतिज्ञा अब तक है, तो हमें डरना चाहिए ऐसा न हो कि तुम में से कोई जन उससे वंचित रह जाए। क्योंकि हमें उन्हीं की तरह सुसमाचार सुनाया गया है, पर सुने हुए वचन से उन्हें कुछ लाभ न हुआ; क्योंकि सुनने वालों के मन में विश्वास के साथ नहीं बैठा।”  इब्रानियों 4:1-2

प्रायः मसीही लोग छुट्टी मनाने में तो बहुत कुशल होते हैं, किन्तु वे विश्राम करने में उतने ही खराब होते हैं। ऐसा क्यों है? एक कारण यह हो सकता है कि पश्चिमी संस्कृति सफलता और समृद्धि के उच्चतर स्तरों को लगातार खोजते रहने को बहुत महत्त्वपूर्ण मानती है। यहाँ तक कि हमारा छुट्टी का समय भी “गतिविधियों में व्यस्त रहने” और कुछ न कुछ सुधार करने तथा सफल होने की अभिलाषा से भरा होता है। और इसके पीछे प्रत्येक संस्कृति का रोग छिपा होता है, अर्थात् उस परमेश्वर से हमारा अलगाव जिसने हमें सृजा और हमें काम करने तथा विश्राम करने के लिए बनाया है।

जब से संसार में पाप आया है, तब से विश्राम मानवजाति से लुप्त होता गया है। मानवजाति के बारे में आप चाहे कोई भी अन्य बात क्यों न कहें, फिर भी यह तथ्य निर्विवाद है कि हममें शान्ति या विश्राम दिखाई नहीं देता। यदि शान्ति के कुछ क्षण पाने के लिए आपने अथक परिश्रम किया हो या फिर आप अपने छुट्टी के समय को गतिविधियों से भर देते हैं, तो वह छुट्टी का समय विश्राम करना नहीं है। निश्चित रूप से परमेश्वर कुछ और चाहता है।

परमेश्वर एक ऐसा विश्राम प्रदान करता है, जो हमारी आत्माओं को शान्त करता है। आत्मा में विश्राम उस जीवन से प्रवाहित होता है, जो विश्वास में उसके प्रति समर्पित होता है। जब पाप के कारण आई मृत्यु की धूल मानवजाति पर जम गई, तब से हम उस गहन विश्राम का आनन्द लेने में असमर्थ हो गए जो परमेश्वर ने चाहा था। हमें आवश्यकता है एक नई उत्पत्ति की, और परमेश्वर ने ठीक वही हमें प्रदान कर दिया है! “यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है” (2 कुरिन्थियों 5:17)। सृष्टि के सृजन में परमेश्वर ने शारीरिक विश्राम के सिद्धान्त की स्थापना की और छुटकारे में उसने पूर्ण आत्मिक विश्राम की सम्भावना स्थापित की। फिर भी सभी प्रकार के लोग, जिनमें कुछ मसीही होने का दावा करने वाले लोग भी सम्मिलित हैं, परमेश्वर के प्रति अनादर के साथ अपना जीवन जीने पर अड़े रहते हैं। वे अपनी आत्माओं को विश्राम देने के उसके निमन्त्रण को ठुकरा देते हैं और इस प्रकार केवल वचन के सुनने वाले बने रहते हैं, उस पर चलने वाले नहीं (याकूब 1:22)। और फिर वे मरने पर विश्राम में अपने प्रवेश कर लेने की आशा करते हैं। बाइबल जीवन के प्रति ऐसे दृष्टिकोण को कोई आशा प्रदान नहीं करती है। जिस तरह मरुभूमि में इस्राएलियों के लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ व्यर्थ ठहरीं क्योंकि वे उन पर विश्वास करने में विफल रहे, उसी तरह यदि हम भी अपने विश्वास रहित प्रयासों में लगे रहेंगे तो इस जीवन में या आने वाले जीवन में आत्मा में विश्राम प्राप्त करने के परमेश्वर के वरदान को जानने की आशा नहीं कर सकते।

धन्यवाद है कि यीशु में सब कुछ निश्चित हो जाता है। वह खोखले धार्मिक दिखावे और निराशाजनक सांसारिक प्रयासों के मुखौटे को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़कर हमें यह अनुग्रहकारी निमन्त्रण देता है, “हे सब परिश्रम करने वालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा। मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो, और मुझसे सीखो; क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूँ : और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे” (मत्ती 11:28-29)। यह एक ऐसा विश्राम है जिसका हम काम करते हुए भी आनन्द उठाते हैं, एक ऐसा विश्राम जो वास्तव में हमें हमारे काम से विश्राम पाने में सक्षम बनाता है, और एक ऐसा विश्राम जिसका हम अन्ततः एक दिन पूरी तरह से और अनन्त काल तक उसकी उपस्थिति में आनन्द लेंगे। क्या आपकी आत्मा में आज विश्राम है? या आप इस बात को लेकर चिन्तित हैं कि कल क्या होगा या फिर आपके अनुसार जो आज आपको पा लेना चाहिए था, उसके बारे में सोचते हुए थक गए हैं? वह कार्य जो आपकी सबसे बड़ी अभिलाषा को तृप्ति प्रदान करता है और आपकी सबसे बड़ी आवश्यकता का समाधान करता है, वह उद्धार का कार्य यीशु ने कलवरी में आपकी ओर से पूरा कर दिया था। वह आपको यह जानने के लिए अपने पास आने का निमन्त्रण देता है कि उसने आपके अनन्त भविष्य का समाधान कर दिया है और वे कार्य जो उसने आज आपके लिए निर्धारित किए हैं वे सभी पूरे होकर रहेंगे, न उससे अधिक और न उससे कम। इसलिए उस पर विश्वास  करें और अपनी आत्मा को वास्तव में विश्राम करने दें.  इब्रानियों 4:1-10

2 मार्च : मेरे हाथ में कुछ भी नहीं

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2 मार्च : मेरे हाथ में कुछ भी नहीं
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“मसीह ने जो हमारे लिए शापित बना, हमें मोल लेकर व्यवस्था के शाप से छुड़ाया, क्योंकि लिखा है, ‘जो कोई काठ पर लटकाया जाता है वह शापित है।’ यह इसलिए हुआ कि अब्राहम की आशीष मसीह यीशु में अन्यजातियों तक पहुँचे, और हम विश्वास के द्वारा उस आत्मा को प्राप्त करें जिसकी प्रतिज्ञा हुई है।”  गलातियों 3:13-14

यीशु में विश्वास करने वाले लोगों के रूप में हमें पाप के बड़े अभिशाप से छुटकारा मिल चुका है। इस छुटकारे का आश्चर्य हमें उसी क्षण मोह लेता है जब हम इस बात को समझ जाते हैं कि यह अभिशाप, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर के समक्ष हम दोषी हैं और मृत्यु के योग्य हैं, मसीह के द्वारा हमसे हटा लिया गया है।

बचाए जाने के बाद भी इस आश्चर्य का खत्म हो जाना और इस बात की मनोहरता का कम हो जाना एक सरल बात है। हम इतनी सरलता से सुखद और आरामदायक जीवन जीना आरम्भ कर सकते हैं कि हम पर जो पाप की पकड़ है, उसे देखना कठिन हो जाता है। इतनी सरलता से हम यह मानने लग जाते हैं कि यदि हम अपने वैवाहिक सम्बन्धों, अपनी नौकरी, अपने सम्बन्धों में और अपनी सफलता पर थोड़ा और प्रयास करें तो हम भले लोग बन सकते हैं तथा आशीष के पात्र बन सकते हैं। हम विश्वासी लोग नहीं बनना चाहते, बल्कि सफल व्यक्ति बनना चाहते हैं। निरन्तर हम अपने स्वयं के प्रयासों पर आधारित झूठे धर्म की ओर प्रलोभित होते रहते हैं।

गलातियों की कलीसिया के सामने भी यही प्रलोभन था। इसीलिए पौलुस ने उन्हें लिखा और अनिवार्य रूप से कहा कि मसीही सन्देश यह है ही नहीं।  वास्तविकता तो यह है कि यह इसके पूरी तरह उलट है! यदि सुसमाचार यह है कि यीशु केवल हमारे जीवन में व्याप्त किसी कमी को पूरा करने के लिए आया था, तो फिर या तो व्यवस्था का अभिशाप कोई चिन्ता की बात नहीं है या फिर उपचार हो सकने से परे है। किन्तु अभिशाप तो वास्तविक है और इसका समाधान होना भी आवश्यक है। जब तक हम पहले यह नहीं समझ लेते कि हम उस अभिशाप के पात्र हैं, जिसे उसने अपने ऊपर ले लिया तब तक हम किसी ऐसे व्यक्ति में क्यों रुचि लेंगे जो हमारे स्थान पर मर गया?

इस अभिशाप का प्रभाव देखने के लिए हमें केवल मूसा की व्यवस्था को देखने की आवश्यकता है (उदाहरण के लिए, निर्गमन 20:1-17 देखें)। व्यवस्था बताती है कि किस तरह से हमने अपने सम्पूर्ण हृदय से परमेश्वर से प्रेम नहीं किया है। हमने उसकी आज्ञा नहीं मानी है। हमने दूसरों से अपने जैसा प्रेम नहीं किया है। हमने हर बात में सच नहीं बोला है। हम लालच करने के दोषी हैं। यह सूची बहुत लम्बी है। यद्यपि जब परमेश्वर का आत्मा हमें दोषी ठहराता है और हम अपनी कमियों को देखने लगते हैं, तो हम इस भजन के लिखने वाले के साथ गाने लग जाते हैं कि “मेरे हाथों के काम तेरी व्यवस्था की मांगों को पूरा नहीं कर सकते।”[1] हम उस अभिशाप के बोझ को देखते हैं, जो कभी हम पर था और अभी भी हम पर होना चाहिए था, और तब हम मसीह को अपने उद्धारकर्ता के रूप में उसकी सारी महिमा में देखते हैं, जो उस बोझ को ले लेने के लिए आया था।

यह हमारे विश्वास का मूल है। जब हम क्रूस पर दृष्टि करते हैं और देखते हैं कि किस प्रकार से यीशु वहाँ लटका हुआ था, तब हम देख पाते हैं कि उसने जो किया वह आवश्यक था और उसकी अपनी इच्छा से किया गया कार्य था। उसने वह स्थान ले लिया, जहाँ हमें होना चाहिए था। यही अनुग्रह है।

यदि हम अपने प्रयासों से परमेश्वर के साथ अपने आप को सही स्थिति में रखने में सक्षम होते, तो न ही छुटकारे में कोई आश्चर्य होता और न ही लेपालक पुत्र/पुत्रियाँ बनाए जाने के भरोसे में कोई सुन्दरता होती। जब हम अपने आप को और अपने कार्यों को देखने के लिए प्रलोभित होते हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि मसीह ने उस अभिशाप को तोड़ दिया है। और उस आश्चर्य में होकर हम महिमा कर सकते हैं। भले ही आपको अनुग्रह की पहली झलक मिले कितना ही समय क्यों न बीत गया हो, आप अभी भी अपने लिए नए सिरे से गा सकते हैं:

मेरे हाथ में कुछ भी नहीं जो मैं लेकर आता हूँ, मैं केवल तेरे क्रूस से लिपटा हुआ हूँ।  गलातियों 2:15-3:9

31 जनवरी : लज्जित न हो

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31 जनवरी : लज्जित न हो
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“हमारे प्रभु की गवाही से, और मुझसे जो उसका कैदी हूँ, लज्जित न हो, पर उस परमेश्‍वर की सामर्थ्य के अनुसार सुसमाचार के लिए मेरे साथ दुख उठा जिसने हमारा उद्धार किया और पवित्र बुलाहट से बुलाया, और यह हमारे कामों के अनुसार नहीं; पर उसके उद्देश्य और उस अनुग्रह के अनुसार है जो मसीह यीशु में सनातन से हम पर हुआ है।”  2 तीमुथियुस 1:8-9

स्वामी के कारण, स्वामी के सेवकों के कारण और स्वामी के सन्देश के कारण लज्जित होना एक बहुत ही सहज बात है। इसलिए यह सुनना एक बड़ी चुनौती है कि पौलुस कैसे तीमुथियुस को और हमें “लज्जित न होने” के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।

पश्चिमी संस्कृति में धर्म, परमेश्वर और आत्मिकता के बारे में अस्पष्ट बातचीत व्यापक रूप से सहनीय मानी जाती है; हम कई बार कई तरह के अस्पष्ट कथनों को सुनते या पढ़ते हैं, जो सुसमाचार के साथ शिथिल रूप से जुड़े हुए प्रतीत होते हैं। तथापि समाज के मानकों के अनुसार यह पूर्ण रूप से अस्वीकार्य है कि यीशु मसीह के अतिरिक्त किसी और के द्वारा उद्धार नहीं है। यदि हम पतरस के साथ यह दावा करने के लिए तैयार हैं कि “स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें” (प्रेरितों के काम 4:12), तो यहाँ पौलुस के तीमुथियुस को लिखे शब्द हमारे लिए भी उपयुक्त होंगे कि “सुसमाचार के लिए मेरे साथ दुख उठा।”

सुसमाचार के लिए दुख उठाने के विशेषाधिकार में सम्मिलित होने के लिए पौलुस का निमन्त्रण, एक अर्थ में, हमें परेशान करने वाला है। यह हमारे समय के मसीही जयवन्तवाद के बिल्कुल विपरीत है, जो सदैव मसीही जीवन को भव्य तरीके से प्रस्तुत करना चाहता है। इस कारण बहुत से लोग केवल चंगा करने, चमत्कार करने और अपने लोगों को जीत की ओर ले जाने वाले परमेश्वर के सामर्थ्य की पुष्टि करना और स्वीकार करना चाहते हैं। तथापि, बाइबल और मानवीय अनुभव हमें बताते हैं कि—मृत्यु को परम चंगाई के रूप में अलग करके—जिन लोगों के लिए हमने प्रार्थना की है, उनमें से अधिकांश लोग पीड़ा में बने रहेंगे और कठिन दिनों में जीवन बिताएँगे। हमें सच बताना चाहिए। जॉन न्यूटन के शब्दों में, मसीही व्यक्ति को “बहुत सी विपत्तियों, कठिन कार्यों और प्रलोभन के फन्दों से होकर जाना होगा”[1] निकट भविष्य में हमारे लिए और भी परीक्षाएँ प्रतीक्षा कर रही हैं, विशेषकर यदि हमें पृथ्वी के अन्त तक सुसमाचार प्रचार करने के बुलावे के प्रति विश्वासयोग्य रहना है (प्रेरितों के काम 1:8)।

तो फिर हम सुसमाचार के लिए पीड़ा में कैसे स्थिर बने रहें? परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा मिलने वाला परमेश्वर का सामर्थ्य ही हमें अन्त तक स्थिर बनाए रखता है। न्यूटन के गीत के बोल इस वास्तविकता को बतलाते हैं, “अनुग्रह ही है जो मुझे अब तक सुरक्षित लाया है, और अनुग्रह ही मुझे घर ले जाएगा।” यह एक अद्‌भुत सत्य है!

परमेश्वर ने आपको बचाया है और वही आपको पीड़ा के समय में दृढ़ता से थामे रख सकता है। परमेश्वर ने आपको नियुक्त किया है और जब आपको उसके बारे में सच्चाई की साक्षी देने के लिए बुलाया जाए, तो वही आपको हियाव दे सकता है। उसके सम्भालने वाले सामर्थ्य की सच्चाई आपके हृदय में हलचल उत्पन्न कर सकती है और आपके जीवन को बदल सकती है। कठिन और सन्देह से भरे दिनों में आप अपनी आत्मा के लिए एक गढ़ के रूप में इस वास्तविकता को थामे रह सकते हैं। और जब आप उस स्वामी, उसके सेवकों या उसके सन्देश के लिए खड़े होने से पीछे हटने के लिए प्रलोभित हो रहे हों, तो जैसे ही आप बोलने के लिए अपना मुँह खोलें, आप उसके सामर्थ्य की ओर देखते हुए अपनी साक्षी के प्रभावी होने के लिए एक मौन प्रार्थना कर सकते हैं। “लज्जित न हों।”

रोमियों 1:8-17

30 जनवरी : उसकी उपस्थिति के द्वारा सुरक्षित

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30 जनवरी : उसकी उपस्थिति के द्वारा सुरक्षित
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“यहोवा उस [यूसुफ] के संग था इसलिए वह भाग्यवान् पुरुष हो गया”  उत्पत्ति 39:2

परमेश्वर की सेवा करने के लिए उस स्थान से अच्छा कोई और स्थान नहीं है, जहाँ वह आपको रखता है।

कोई भी नौकरी दोषरहित नहीं होती, कोई भी परिवार दोषरहित नहीं होता, कोई भी परिस्थितियाँ परेशानियों से मुक्त नहीं होतीं। हममें से जो लोग लगातार आदर्श जीवन की खोज करते रहते हैं, जो यह भूल जाते हैं कि सिद्धता को स्वर्ग के लिए सुरक्षित रखा गया है, वे अपने आप को एक ऐसी यात्रा पर ले जाते हैं, जिसमें बार-बार निराशा ही हाथ लगती है।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यूसुफ ने जिन परिस्थितियों का अनुभव किया, वे बिल्कुल भी आदर्श परिस्थितियाँ नहीं थीं। अपने पिता से विशेष प्रेम पाने वाले व्यक्ति के रूप में अपना जीवन आरम्भ करने के बाद उसने अपने आप को गुलामों के व्यापारियों के व्यापार की वस्तु के रूप में पाया। उसके परिवार के घर की सुरक्षा का स्थान दासत्व की बेड़ियों ने ले लिया।

यूसुफ के समान हम सभी समय के साथ अपनी परिस्थितियों को बदलते हुए देखते हैं। हो सकता है कि हम लम्बे समय तक जिस घर में रहे हैं, उससे हमें दूर जाना पड़े, या हमारे प्रियजनों को कष्टों का सामना करना पड़े, या वित्तीय कठिनाइयाँ या स्वास्थ्य से सम्बन्धित समस्याएँ अप्रत्याशित रूप से आ जाएँ। तथापि, हममें से बहुत कम लोगों ने यूसुफ की तरह इस प्रकार के त्वरित विनाश का अनुभव किया होगा। (और यदि आपने ऐसा किया है, तो यह जानना कितना उत्साहजनक है कि पवित्रशास्त्र में आपके जैसे लोगों के जीवन में परमेश्वर के हस्तक्षेप की कहानियाँ सम्मिलित हैं!) हम सोच सकते हैं कि यूसुफ के पास कहीं भाग जाने, छिप जाने, हार मान लेने, या प्रतिरोधी बन जाने के सभी कारण मौजूद थे। और फिर भी परमेश्वर की उपस्थिति ने उसे प्रत्येक तराई के स्थान से बाहर निकाला।

यूसुफ को उसकी परिस्थितियों से  सुरक्षा नहीं दी गई; उसे अपनी परिस्थितियों में  सुरक्षित रखा गया। वह परमेश्वर की उपस्थिति के द्वारा सुरक्षित किया गया था। इसमें हमारे लिए एक सीख है। किसी विश्वासी की कठिनाइयों का सामना करने की क्षमता, ज्ञान या बुद्धि वह वस्तु नहीं है, जो उसकी रक्षा करती है। परन्तु परमेश्वर का सेवक परमेश्वर की उपस्थिति के द्वारा ही सुरक्षित किया जाता है। यह स्वाभाविक बात है कि हम परमेश्वर से अपनी परिस्थितियों को बदलने, बड़ी कठिनाइयों को दूर कर देने या हमें परीक्षाओं से दूर कर देने के लिए कहते हों। हो सकता है कि हम अपने आस-पास देखें और सोचें कि “मैंने कभी इसकी अपेक्षा तो नहीं की थी!” हम इस झूठ पर विश्वास करना आरम्भ कर देते हैं कि यदि हम केवल बच कर भाग निकलें या यदि हमारी समस्याएँ दूर हो जाएँ, तो सब कुछ ठीक हो जाएगा। किन्तु वास्तविक सच्चाई यह है कि हम चाहे कहीं भी चले जाएँ, समस्याएँ आएँगी और स्वर्ग के इस ओर सिद्धता हाथ नहीं आएगी। जैसा कि भजनकार कहता है कि मेरा भरोसा परमेश्वर पर है (भजन संहिता 11:1)।

परमेश्वर यूसुफ के जीवन को अलग तरीके से व्यवस्थित कर सकता था। इसके विपरीत उसने घटनाओं को वैसे ही घटित होने दिया जिस प्रकार वे घटित हुईं। उसकी योजना थी कि वह अपने सेवक को “बहुत सी विपत्तियों, कठिन कार्यों और प्रलोभन के फन्दों”[1] से होकर निकालेगा। ऐसा नहीं है कि जब वह दासों की पंक्ति में चल रहा था और दासों के बाजार में बैठा था, तब परमेश्वर उसके संग नहीं था और जब वह अपने स्वामी के घराने में सम्मान और प्रमुखता के पद तक ऊपर उठ गया, तब परमेश्वर उसके संग था। प्रभु की उपस्थिति हमारे साथ भी होती है। निस्सन्देह, उसने हमसे प्रतिज्ञा की है कि चाहे तुम तराइयों में हो या पर्वतों के शिखरों पर, “मैं जगत के अन्त तक सदा तुम्हारे संग हूँ” (मत्ती 28:20)। आज परमेश्वर ने आपको किस परिस्थिति में रखा है? और यह जानना कि वह आपके साथ उस परिस्थिति में है और उसी परिस्थिति में उसके पास आपके करने के लिए एक भला काम है, किस प्रकार से उन परिस्थितियों के बारे में आपके दृष्टिकोण को बदलेगा, जिन्हें आप चुन सकते थे और जिन्हें आप नहीं चुनते?

फिलिप्पियों 4:4-13

29 जनवरी : न्याय की तृप्ति हो चुकी

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29 जनवरी : न्याय की तृप्ति हो चुकी
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“क्योंकि बैरी होने की दशा में उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा मेल परमेश्वर के साथ हुआ, तो फिर मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम उद्धार क्यों न पाएँगे?”  रोमियों 5:10

परमेश्वर कोई दयालु दादा जी या जगत के सांता क्लॉज़ नहीं है, जो केवल उपहार देता है और जिसे किसी अन्य बात से कोई लेना-देना नहीं है। कदापि नहीं, वह पवित्र है और वह धर्मी है। इसलिए मनुष्य अपने पाप के कारण परमेश्वर की उपस्थिति से निकाले हुए लोग हैं। मानवता और हमारे सृष्टिकर्ता के बीच शत्रुता व्याप्त है। यह ऐसा सन्देश नहीं है, जिसे आप आमतौर पर सुनते हों और यह निश्चित रूप से बहुत सुहावना सन्देश भी नहीं है। किन्तु परमेश्वर उस शत्रुता को अनदेखा नहीं करता। न उसने कभी ऐसा किया है, और न ही वह कभी ऐसा करेगा। पाप के प्रति परमेश्वर के दृष्टिकोण के बारे में पवित्रशास्त्र बहुत स्पष्ट है। निस्सन्देह यह स्पष्ट करते हुए कि पाप हमें परमेश्वर से अलग कर देता है, पौलुस मनुष्यों को परमेश्वर के शत्रुओं के रूप में वर्णित करता है। पौलुस की भाषा भी भजनकार के शब्दों को प्रतिध्वनित करती है, जो परमेश्वर के बारे में कहता है कि “तुझे सब अनर्थकारियों से घृणा है” (भजन 5:5)। यह एक ऐसा सन्देश है, जो न तो पढ़ने में सुखद है और न ही पहली बार देखने पर समझने में सरल है।

तो फिर हमारी आशा कहाँ रही? हम परमेश्वर से मेल-मिलाप कैसे कर सकेंगे? ऐसा कैसे हो सकता है कि परमेश्वर पाप को तो उसके योग्य दण्ड दे और फिर भी पापियों को क्षमा कर दे?

हे हमारे परमेश्वर की प्रेमपूर्ण बुद्धि! जब सब कुछ पाप और शर्म से भरा था,

तब दूसरा आदम लड़ने और बचाने के लिए आ गया। [1]

यीशु ने क्रूस पर अपनी मृत्यु के द्वारा परमेश्वर के न्याय की तृप्ति कर दी है। पहले उसने परमेश्वर की व्यवस्था का पूरी तरह से पालन करने के हमारे दायित्व को और फिर इसमें विफल होने पर हमारे ऊपर पड़ने वाले बोझ को स्वयं अपने ऊपर धारण करने का निर्णय लिया। फिर उसने अपने पापरहित जीवन के द्वारा हमारे दायित्व को पूरा किया और क्रूस पर अपनी बलिदानी मृत्यु के द्वारा हमारे बोझ को निरस्त कर दिया। हमारे पापी अस्तित्व के प्रति परमेश्वर की घृणा के कारण जब परमेश्वर से हमारा अलगाव हुआ, तो उसने हमें त्यागा नहीं। इसके विपरीत, परमेश्वर आया और अपने पुत्र के माध्यम से हमारे साथ मेल-मिलाप किया। यदि यह सबसे अविश्वसनीय समाचार की तरह नहीं लगता है, तो हमने अपने पाप की गम्भीरता, या उसके न्याय की वास्तविकता, या हमारे उद्धार की परिमाण में से किसी एक बात को ठीक से नहीं समझा है।

हममें से वे लोग, जिन्हें मसीही बने हुए कुछ समय बीत चुका है, इसे अच्छी तरह जाने लेने के बाद चाहे इसका तिरस्कार न करें, तौभी आत्म-सन्तुष्टि के शिकार अवश्य हो सकते हैं। परन्तु मसीह की मृत्यु हमारे विश्वास का केवल प्रवेश बिन्दु ही नहीं है; यही हमारा विश्वास है। इसलिए आज उस दूसरे आदम, अर्थात सिद्ध मनुष्य को देखने के लिए ठहरें, जो वहाँ सफल हुआ जहाँ पहला आदम असफल हुआ था और जिसने शैतान को हराकर पतन के प्रभावों को उलट दिया है। यही सुसमाचार है। आपके पापों को क्षमा कर दिया गया है। आपको बचा लिया गया है। जहाँ आप पहले शत्रु थे, अब वहीं आप एक मित्र हैं। मसीह अब आपका भरोसा, आपकी शान्ति और आपका जीवन है।

मसीह में होने की वास्तविकता कोई सहज बात नहीं है; यह एक अद्‌भुत आश्वस्ति है। जब हम पाप के सामने शक्तिहीन थे, तब मसीह के सामर्थ्य ने हमें स्वतन्त्र किया। जब हम इतना बड़ा ऋण नहीं चुका सके, तब वह आप ही उसे लिए हुए क्रूस पर चढ़ गया (1 पतरस 2:24)। अब आप स्वर्गीय स्थानों में उसके साथ बैठे हैं। आज आपकी सबसे बड़ी सफलता भी आपको उससे ऊपर नहीं उठा सकेगी, जितना उसने आपको पहले ही उठा दिया है; न ही आपका सबसे बड़ा संघर्ष या असफलता आपको वहाँ से नीचे गिरा सकती है।

 कुलुस्सियों 1:15-23

28 जनवरी : एक नाम से कहीं अधिक

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28 जनवरी : एक नाम से कहीं अधिक
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“परमेश्वर ने मूसा से कहा, ‘मैं जो हूँ सो हूँ।’ फिर उसने कहा, ‘तू इस्राएलियों से यह कहना, “जिसका नाम मैं हूँ है उसी ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है।”’”  निर्गमन 3:14

कुछ संस्कृतियों में नामों के पीछे के अर्थ बहुत मायने नहीं रखते। कोई नाम हम इसलिए चुन लेते हैं, क्योंकि हमें उसका उच्चारण अच्छा लगता है, या क्योंकि वह हमारे परिवार के लिए अनमोल होता है। तथापि अन्य संस्कृतियों में नाम अपने आप में बहुत महत्त्व रखता है। उस नाम का अर्थ उस व्यक्ति के बारे में, जिसे वह नाम दिया गया है या उसे वह नाम देने वाले लोगों की आशा के बारे में कुछ स्थापित कर सकता है।

जब मूसा का जलती हुई झाड़ी में परमेश्वर से सामना हुआ, तो उसने पूछा, “जब मैं इस्राएलियों के पास जाकर उनसे कहूँ, ‘तुम्हारे पितरों के परमेश्वर ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है,’ तब यदि वे मुझ से पूछें, ‘उसका क्या नाम है?’ तब मैं उनको क्या बताऊँ?”” (निर्गमन 3:13)। तब परमेश्वर ने मूसा को जो नाम बताया, वह है यहोवा (जिसका अनुवाद है “मैं जो हूँ सो हूँ”)। इसमें चार अक्षर हैं जो व्यंजन हैं और इसमें कोई स्वर नहीं है। यदि हम इसका सही उच्चारण करने का प्रयास करें, तो हम पाएँगे कि यह लगभग असम्भव है। यदि आप चाहें तो यह कह सकते हैं कि यह एक अवर्णनीय नाम है।

इस तरह उत्तर देने के द्वारा परमेश्वर क्या कर रहा था? मूसा इस्राएल के लोगों को और फिरौन को एक अधिकार वाला नाम देने का अनुरोध कर रहा था और परमेश्वर ने उसे वह नाम दिया जिसका उच्चारण ही नहीं किया जा सकता। ऐसा लगता है कि मानो परमेश्वर कह रहा था कि ऐसा कोई नाम नहीं है जो मेरे अस्तित्व को पूरी तरह से व्यक्त कर सके। इसलिए उनसे कहो कि “मैं जो हूँ सो हूँ” ने तुम्हें भेजा है। फिरौन से कहो कि वह देखे कि मैं अपने लोगों के लिए क्या करता हूँ। तब वह जान जाएगा कि मैं कौन हूँ।

बाइबल न केवल परमेश्वर के उद्धार के कार्य की कहानी है, परन्तु इससे बढ़कर वह परमेश्वर के चरित्र के अनावरण की भी कहानी है। हममें से बहुत से लोग अपनी बाइबल पढ़ने के बाद प्रयुक्ति से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण प्रश्न पूछने में निपुण हो चुके हैं, जैसे “यह कैसे सम्बन्धित है और कैसे लागू होता है? मेरे लिए इसका क्या अर्थ है?” ये बातें व्यर्थ या गलत नहीं हैं, किन्तु ये वे प्रमुख प्रश्न नहीं हैं जो पूछे जाने चाहिए। परमेश्वर कहानी का नायक और पुस्तक का प्रसंग है, और इसलिए प्रत्येक खण्ड से हमारा पहला प्रश्न यह होना चाहिए, “यह मुझे परमेश्वर के बारे में क्या बताता है?” बाइबल परमेश्वर के व्यवहार, चरित्र और महिमा को स्थापित करने के लिए लिखी गई थी।

हममें से बहुत से लोग ऐसा मानते हैं कि हमें प्रत्येक रविवार को कलीसिया से जो कुछ चाहिए वह है आमदनी, सम्बन्धों तथा किसी भी अन्य समस्याओं को हल करने के लिए कुछ किस्से या प्रेरणादायक सूचियाँ। मसीहियत के इतिहास में आज का युग ऐसा समय है, जिसमें विश्वासियों के लिए “कैसे करें” शीर्षक वाली इतनी अधिक पुस्तकें लिखी गई हैं। फिर भी, क्या हम वास्तव में अच्छा जीवन जी पा रहे हैं? ऐसा लगता है जैसे हम सब कुछ करना जानते हैं, परन्तु हम यह नहीं जानते कि परमेश्वर कौन है!

परमेश्वर ने मूसा को जो करने का बुलावा दिया था, उसे पूरा करने के लिए मूसा को यह समझना आवश्यक था कि परमेश्वर कौन था (और है)। उसे हमारे समान यह जानने की आवश्यकता थी कि परमेश्वर केवल एक नाम से कहीं अधिक है।

जब हम बाइबल को पढ़ते हैं और पूछते हैं कि “मैं परमेश्वर के बारे में क्या जान सकता हूँ?” तब हमारा जीवन बदल जाता है। जैसे-जैसे हम यह देखते जाते हैं कि परमेश्वर ने क्या किया है और अधिकता से समझने लगते हैं कि वह कौन है, तो हम उसके प्रति भय-युक्त प्रेम में और उसके लिए प्रेम में बढ़ने लगते हैं। और तभी हम अपने जीवन में उसके बुलावे को पूरा करते हुए उसकी इच्छा के अनुसार जीने में सक्षम होने पाएँगे। हम अपने अवर्णनीय रूप से विस्मयकारी परमेश्वर की महिमा की गहराई को पूर्ण रूप से कभी नहीं समझ पाएँगे, परन्तु हम अवश्य  अनन्त काल तक उसे अधिकाधिक देखते जाएँगे। और जबकि हम उसका वचन पढ़ ही रहे हैं, तो उसका आरम्भ आज से ही हो सकता है।

निर्गमन 3:1-22

27 जनवरी : वह कुचले हुए नरकटों के लिए आया था

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27 जनवरी : वह कुचले हुए नरकटों के लिए आया था
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“कुचले हुए नरकट को वह न तोड़ेगा और न टिमटिमाती बत्ती को बुझाएगा; वह सच्चाई से न्याय चुकाएगा।”  यशायाह 42:3

प्राचीन काल के बड़े राजनेता शासन करने के लिए अपनी शक्ति पर आश्रित रहते थे। (बहुत से लोग आज भी लोग ऐसा करते हैं।) फारस के राजा कुस्रू महान को इस प्रकार वर्णित किया जाता था जैसे कुम्हार गीली मिट्टी को लताड़ता है, वैसे ही वह हाकिमों को कीच के समान लताड़ देगा (यशायाह 41:25 देखें)। फिर भी उसी समय में यशायाह ने उस आने वाले सेवक के बारे में भविष्यद्वाणी की, जो उस समय के हाकिमों के बिल्कुल विपरीत होगा।

वह सेवक, अर्थात यीशु भला, संवेदनशील और दयालु है। जिन लोगों को दूसरे लोग त्याग देना चाहते हैं और ठुकरा देना चाहते हैं, वह उन्हें अपनाने के लिए इच्छुक और सक्षम है। यह कितना अधिक आशा-दायक वचन है!

कुचले हुए नरकट के चित्रण में हम यीशु की हमारे प्रति संवेदनशीलता के महत्त्व को देख सकते हैं। आप कुचले हुए नरकट के सहारे टिक नहीं सकते, और न ही आप उससे संगीत बजा सकते हैं। फिर भी यीशु उन लोगों को उठाता है, जिन्हें अन्य लोग एक ओर कर देते हैं और उनके जीवन में और उनके जीवनों के द्वारा एक मधुर धुन बजाता है। हो सकता है कि आज आप अपने आप को बुरी तरह से दबा हुआ, दूसरों के व्यवहार से टूटा हुआ या अतीत में की गई गलतियों से आहत महसूस कर रहे हों। हो सकता है कि आप लगभग यह विश्वास करने लगे हों कि आप टूटे हुए और बेकार हैं। परन्तु आपके लिए एक महिमामय समाचार यह है कि वह सेवक कुचले हुए नरकटों को उठाता है, और वह ऐसा बड़े ध्यान से करता है।

यीशु सुलगती हुई बत्तियों को भी अपनाता है। वह उन्हें बुझाता नहीं है; परन्तु इसके विपरीत वह टिमटिमाते हुए टुकड़े को लेता है और उसे चमकती हुई ज्योति में बदल देता है। हो सकता है कि आपको यह विश्वास दिला दिया गया हो कि आपके अच्छे दिन अब बीत चुके हैं; कि आप एक बुझती हुई पुरानी मोमबत्ती हैं, केवल एक टिमटिमाती और बुझती हुई लौ हैं। आप अपने आप से यह कहने लगते हैं कि यदि तुम अभी तक इसका हल नहीं निकाल सके हो, तो शायद तुम्हारे लिए कोई आशा नहीं है। परन्तु एक बार फिर शुभ समाचार यह है कि सुलगती हुई बत्तियाँ इस सेवक में आशा पाती हैं, जो हमें फिर से प्रज्ज्वलित करने आया है।

यीशु उन लोगों में असाधारण रुचि रखता है जिनका कहीं कोई नाम नहीं, अर्थात उन कुचले हुए नरकटों और सुलगती हुई बत्तियों में। वह उन्हें छुटकारा देता है और संसार में प्रकाश लाने और अपने नाम की स्तुति के लिए उनका उपयोग करता है। वास्तविकता तो यह है कि किसी न किसी तरह से हम सभी कुचले हुए नरकट और टिमटिमाती बत्तियाँ ही हैं। क्या हम अपनी दीन-हीन स्थिति को पहचानने के लिए तैयार हैं ताकि हम उस सेवक की भलाई और दयालुता को जान सकें? अन्ततः . . .

वह कभी भी धुआँ देते हुए रेशे को नहीं बुझाता, परन्तु उसे आग की लपटों में बदल देता है;

वह कुचले हुए नरकट को कभी नहीं तोड़ता, न ही सबसे निकृष्ट नाम का तिरस्कार करता है। [1]
लूका 7:11-17

31 दिसम्बर : जीवन की संक्षिप्तता

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“मनुष्य की आयु घास के समान होती है,वह मैदान के फूल के समान फूलता है,जो पवन लगते ही ठहर नहीं सकता,और न वह अपने स्थान में फिर मिलता है। परन्तु यहोवा की करुणा उसके डरवैयों पर युग-युग,और उसका धर्म उनके नाती–पोतों पर भी प्रगट होता रहता है।” भजन 103:15-17

जीवन हमारी कल्पना से कहीं अधिक शीघ्रता से बीत जाता है। मुझे अपने पहले पुत्र का जन्म आज भी जीवन्त रूप से स्मरण है—और फिर ऐसा प्रतीत हुआ मानो कुछ ही सप्ताह में वह किशोरावस्था में पहुँच गया हो। जब हम बच्चे थे, तब 1 दिसम्बर से लेकर 25 दिसम्बर तक का समय मानो कई वर्षों लम्बा लगता था; अब तो वर्ष स्वयं पंख लगाकर उड़ जाते हैं। अचानक हम नींद से जागते हैं और पाते हैं कि हम वृद्ध हो गए हैं, या किसी ऐसे जन की मृत्यु का समाचार सुनते हैं जो हमारी ही आयु का था—और हमें इस सत्य का बोध होता है कि जीवन वास्तव में अत्यन्त क्षणिक है। हम कुछ समय के लिए फलते-फूलते हैं, परन्तु सदा के लिए नहीं।

जैसे-जैसे हम वृद्ध होते हैं, हमारी शारीरिक और मानसिक शक्तियाँ क्षीण होती जाती हैं, पुराने मित्र विदा हो जाते हैं, जिन रीति-रिवाज़ों को हमने जीवनभर अपनाया था, वे धीरे-धीरे लुप्त हो जाते हैं, और हमारे दीर्घकालिक लक्ष्य या तो असम्भव हो जाते हैं, या आकर्षणहीन हो जाते हैं। किन्तु ये सत्य हमें निराशा में न धकेलें, बल्कि उत्साह में प्रेरित करें। हम घास के समान हैं—हमारे दिन गिने हुए हैं—परन्तु हर दिन में अवसर उपलब्ध है! बाइबल-विज्ञानी डेरेक किडनर ने ठीक ही लिखा है: “मृत्यु ने अभी हमें छूआ नहीं है: तो उसकी जंजीरों की खनखनाहट हमें जगा दे, और हमें कर्म की ओर प्रेरित करे।”[1]

हमारा जो समय शेष बचा है, उसमें हम अपनी दृष्टि उठाएँ और उन “खेतों” की ओर देखें—उन लोगों की ओर जो हमारे चारों ओर रहते और काम करते हैं, परन्तु जिन्होंने अब तक यीशु को अपने उद्धारकर्ता और प्रभु के रूप में नहीं जाना है, और जो यहोवा की स्थायी और अनन्त प्रेमभरी करुणा में सहभागी नहीं हुए हैं। जैसा कि यीशु ने कहा कि वे खेत अब “कटनी के लिए पक चुके हैं।” (यूहन्ना 4:35)

बाइबल हमें यह नहीं कहती कि पहले हम स्नातक हो जाएँ, या विवाह कर लें, या स्थिर हो जाएँ, या अपना जीवन “ठीक कर लें”, या सेवानिवृत्त हों—फिर मसीह की सेवा में लगें। नहीं! यह हमें आज ही बुलाती है। बुद्धिमान व्यक्ति जानता है कि समय सीमित है और इसका सर्वोत्तम उपयोग यही है कि स्वयं को प्रभु के कार्यों में लगाया जाए।

तो चाहे आप जीवन के प्रारम्भ में हों, या जीवन के सर्वोत्तम काल में, या जीवन में पीछे मुड़ कर देख रहे हों—इससे पहले कि आपके हाथों की शक्ति क्षीण हो जाए, और आपके दाँत, नेत्र, और कान दुर्बल हो जाएँ—क्या आप मसीह यीशु के लिए पूर्णतः समर्पित जीवन जीने को चुनेंगे? यदि आप आने वाले कल तक प्रतीक्षा करेंगे, तो सम्भव है कि कल बहुत देर हो जाए। जैसा कि सी.टी. स्टड ने कहा:

केवल एक ही जीवन,

यह शीघ्र बीत जाएगा।

केवल वही सदा के लिए रहेगा,

जो मसीह के लिए किया गया है।

इसलिए अपने जीवन के दिनों को “घास” के समान देखें, और उन्हें उस परमेश्वर के भय और प्रेम में बिताएँ, जो अनन्तकाल तक आपसे प्रेम करेगा। अपने दिनों को रेत के किले बनाने में मत बिताएँ, परन्तु उस राज्य की सेवा में लगाएँ जो अनन्तकाल तक स्थिर रहेगा। और प्रार्थना करें कि जब आप ऐसा करें, तो यहोवा स्वयं आपके “हाथों के काम को दृढ़ करे” (भजन 90:17)—आज भी, और उस आने वाले वर्ष में भी जो आने वाला कल लेकर आएगा।

  भजन 90

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: मलाकी; लूका 24:36-53


[1] द मैसेज ऑफ एक्लेज़िआस्टेस, द बाइबल स्पीक्स टूडे (आई.वी.पी. यू.के., 1976), पृ. 104.

30 दिसम्बर : सब कुछ नया किया जाएगा

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“परमेश्‍वर आप उनके साथ रहेगा और उनका परमेश्‍वर होगा। वह उनकी आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा; और इसके बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहली बातें जाती रहीं।” प्रकाशितवाक्य 21:3-4

नए आकाश और नई पृथ्वी के विचार को समझना हमारे लिए कठिन हो सकता है, परन्तु हम सम्पूर्ण निश्चय के साथ यह कह सकते हैं कि परमेश्वर वर्तमान को रूपान्तरित करेगा, और उसने ठाना है कि कोई भी और कुछ भी उसके सिद्ध राज्य को नष्ट न कर सके। हम यह इसलिए विश्वासपूर्वक कह सकते हैं, क्योंकि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने में सामर्थी है, जिसका सबसे महिमामयी प्रमाण वह काठ का क्रूस और वह खाली कब्र हैं। वर्तमान में, इतिहास के परदे के पीछे, परमेश्वर अपने राज्य को सम्पूर्णता में लाने की तैयारी कर रहा है—और यह वह कार्य है जिसकी योजना उसने अनादि काल से बनाई है।

जब मसीह लौटेगा, वह इस नए राज्य को लेकर आएगा—एक नया आकाश और नई पृथ्वी, जिसमें धार्मिकता का वास होगा।

जब परमेश्वर का सिद्ध राज्य स्थापित होगा, पाप दण्डित हो चुका होगा, न्याय पूर्ण हो चुका होगा, और बुराई का अन्त हो चुका होगा। फिर न कोई मृत्यु रहेगी, न शोक, न रोना, और न ही पीड़ा। ये सब “पहली बातें” होंगी, जो “बीत चुकी” होंगी। जब परमेश्वर अपने राज्य को लाएगा, जब उसकी सिद्ध योजना प्रकट होगी, तो न कोई व्यक्ति और न ही कोई शक्ति उसे बिगाड़ नहीं सकेंगे।

“नया” शब्द, जैसा कि प्रकाशितवाक्य में “नए आकाश और नई पृथ्वी” के लिए प्रयुक्त हुआ है, समय या उत्पत्ति का नहीं, बल्कि प्रकार और गुण का वर्णन करता है। अर्थात, परमेश्वर सृष्टि को इस प्रकार रूपान्तरित करेगा कि वह उस महिमा और भव्यता को प्रतिबिम्बित करे, जिसे उसने प्रारम्भ में इसके लिए ठहराया था। शैतान को वह तृप्ति नहीं मिलेगी कि वह परमेश्वर को अपनी सृष्टि को नष्ट करते देखे। वरन्, परमेश्वर अग्नि से इसे शुद्ध करेगा, जैसे उसने नूह के दिनों में जल का उपयोग किया (2 पतरस 3:5–7)।

इसलिए नई पृथ्वी अब भी पृथ्वी ही होगी—एक भौतिक स्थान, जिसमें भौतिक जन वास करेंगे, परन्तु अब यह ऐसी होगी, अर्थात “पृथ्वी यहोवा के ज्ञान से ऐसी भर जाएगी जैसा जल समुद्र में भरा रहता है” (यशायाह 11:9)। इसमें आश्चर्य नहीं कि सम्पूर्ण सृष्टि अब अधीरता से बाट जोह रही है कि वह पाप और क्षय की दासता से मुक्त की जाए (रोमियों 8:19–22)!

यह नई सृष्टि प्रतीक्षा के योग्य है। यह जीने के योग्य है, और यदि हो, तो मरने के योग्य भी। परमेश्वर सब वस्तुओं को नया करेगा—हमारी आत्माओं को, हमारे मनों को, हमारे शरीरों को, और यहाँ तक कि उस वातावरण को भी जिसमें हम रहते हैं। वे सब बातें जो आज पृथ्वी पर जीवन को कलुषित करती हैं, वहाँ नहीं होंगी—और जिन बातों की हमें आशा है, और जिन बातों की हमें प्रत्याशा है, वे सब पूरी की जाएँगी।

इसलिए हम “बाट जोहते हैं” (रोमियों 8:23)। हमें निराश होने की आवश्यकता नहीं है, चाहे जीवन कितना ही अन्धकारमय क्यों न हो—क्योंकि वह दिन निकट है जब परमेश्वर तुम्हारे आँसू पोंछ देगा। और हम “धीरज से उसकी बाट जोहते भी हैं” (पद 25)। अब ही सब कुछ पाने की लालसा रखने की कोई आवश्यकता नहीं है, चाहे वह कितना ही आकर्षक क्यों न प्रतीत हो—क्योंकि वह दिन भी निकट है जब परमेश्वर आपको वह सम्पूर्ण आनन्द और तृप्ति देगा, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। इसलिए आज आपका ध्येय उत्सुकता और धैर्य हो।

रोमियों 8:18-25

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: जकर्याह 13–14; लूका 24:1-35 ◊

29 दिसम्बर : प्रतीक्षा का समय

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“[परमेश्वर] ने उसको बाहर ले जा के कहा, ‘आकाश की ओर दृष्‍टि करके तारागण को गिन, क्या तू उनको गिन सकता है?’फिर उसने उससे कहा, ‘तेरा वंश ऐसा ही होगा।’ उसने यहोवा पर विश्‍वास किया; और यहोवा ने इस बात को उसके लेखे में धर्म गिना।” उत्पत्ति 15:5-6

यदि हमारे विश्वास की नींव दीर्घ प्रतीक्षा के समयों में भी अटल रहनी है, तो हमें इन दो सत्यों में दृढ़ विश्वास रखना होगा: पहला, कि परमेश्वर में सामर्थ्य है कि जो कुछ उसने प्रतिज्ञा किया है, वह उसे पूरा करे; और दूसरा, कि परमेश्वर स्वयं हमारे हर काल में हमारी प्रत्येक आवश्यकता के लिए पर्याप्त है।

अब्राहम का विश्वास उसके जीवन के प्रतीक्षा कक्ष में परखा गया। वह कई वर्षों तक एक परदेशी भूमि में रहा और परमेश्वर की प्रतिज्ञा के पूर्ण होने की बाट जोहता रहा कि उसका “निज पुत्र” संसार में आएगा (उत्पत्ति 15:4)। और यह उसकी प्रतीक्षा के बीच परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास ही था, जिसे परमेश्वर ने “उसके लेखे में धर्म गिना।”

प्रेरित पौलुस जब अब्राहम के इस विश्वास का वर्णन करता है, तो वह लिखता है: “न अविश्वासी होकर परमेश्‍वर की प्रतिज्ञा पर सन्देह किया, पर विश्‍वास में दृढ़ होकर परमेश्‍वर की महिमा की; और निश्चय जाना कि जिस बात की उसने प्रतिज्ञा की है, वह उसे पूरा करने में भी समर्थ है” (रोमियों 4:20–21)। दूसरे शब्दों में, अब्राहम ने यह विश्वास किया कि कोई भी वस्तु, कोई भी शक्ति, परमेश्वर के वचन की पूर्ति में बाधा नहीं डाल सकती—यहाँ तक कि जब उसे यह भी दिखाई नहीं दे रहा था कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा को किस प्रकार पूरी करेगा। उसका विश्वास अन्धकार में एक अन्धी छलांग नहीं था; वरन् यह विश्वास परमेश्वर के चरित्र पर आधारित था।

आज के युग में, हम भी एक महान प्रतिज्ञा को थामे हुए हैं—कि प्रभु यीशु ने हमसे यह वादा किया है कि वह हमारे लिए एक स्थान तैयार कर रहा है और वह हमें अपने पास ले जाने के लिए लौटेगा (यूहन्ना 14:3)। इसलिए जब हम उसके वचन को थामते हैं, तो हमें स्वर्ग की आशा मिलती है। हमें यह पूर्ण निश्चय है कि यीशु व्यक्तिगत रूप से लौटेगा, वह दृश्य रूप से प्रकट होगा और वह अपने लोगों के लिए आएगा। ये प्रतिज्ञाएँ उतनी ही अटल और निश्चित हैं जितनी कि वह प्रतिज्ञा जो परमेश्वर ने अब्राहम को दी थी, जिसके पूर्ण होने के लिए उसे 25 वर्षों तक प्रतीक्षा करनी पड़ी।

इसके अतिरिक्त हम अब्राहम के अनुभव से यह भी सीखते हैं कि केवल परमेश्वर ही पर्याप्त है कि वह हमें प्रतीक्षा के समयों से निकाल कर अपने समय में अपने उद्देश्य की ओर ले चले। उत्पत्ति 17 में, परमेश्वर ने फिर से अब्राहम पर प्रगट होकर उसके विश्वास को दृढ़ किया। कैसे? अपने आपको प्रकट करके कि वह वास्तव में कौन है: “जब अब्राम निन्यानवे वर्ष का हो गया, तब यहोवा ने उसको दर्शन देकर कहा, ‘मैं सर्वशक्तिमान [एल-शद्दाई] परमेश्वर हूँ; मेरी उपस्थिति में चल और सिद्ध होता जा’” (उत्पत्ति 17:1)। इब्रानी शब्द “एल-शद्दाई” का अर्थ है: “परमेश्वर जो पर्याप्त है।” अर्थात, परमेश्वर ने अब्राहम को अपनी प्रतिज्ञाओं का आश्वासन अपने ही चरित्र के आधार पर दिया।

मसीही जीवन प्रतीक्षा का जीवन है। और परमेश्वर के प्रत्येक “अभी नहीं” और “थोड़ा ठहरो,” उसके उद्देश्य का भाग हैं। प्रतीक्षा का हर समय एक अवसर है कि आप परमेश्वर के वचन पर विश्वास करें। और जब आप प्रतीक्षा में हों, तब निश्चयपूर्वक यह जान लें कि वही परमेश्वर आपकी हर आवश्यकता को पूरा करने में सक्षम है। इसी में विश्राम पाएँ: जिस परमेश्वर पर आपने विश्वास किया है, वह अपनी प्रत्येक प्रतिज्ञा को पूरा करने में सक्षम है।

उत्पत्ति 17:1-8

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: जकर्याह 9–12; लूका 23:26-56