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28 अक्तूबर : चौकस रहो!

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28 अक्तूबर : चौकस रहो!
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“कुत्तों से चौकस रहो, उन बुरे काम करने वालों से चौकस रहो, उन काट कूट करने वालों से चौकस रहो। क्योंकि खतना वाले तो हम ही हैं।” फिलिप्पियों 3:2-3

प्रेरित पौलुस ने अपनी सभी पत्रियों में शायद ही कहीं इतना तीव्र और स्पष्ट वक्तव्य दिया हो जितना इस पद में दिया है। अपने समय के झूठे शिक्षकों को “कुत्ते” कहकर सम्बोधित करना आज की तुलना में उस समय और भी अधिक साहसी और टकरावपूर्ण था। लेकिन पौलुस ने इस भाषा का उपयोग केवल प्रभाव डालने के लिए नहीं किया; वह गम्भीर रूप से चिन्तित था क्योंकि कुछ खतरनाक लोग फिलिप्पी की कलीसिया में घूम रहे थे।

झूठे सम्प्रदाय और झूठे शिक्षक प्रायः आनन्दहीन होते हैं, और फिलिप्पी के ये दुष्ट पुरुष कोई अपवाद नहीं थे। वे जो होने का दावा करते थे, उससे बिल्कुल विपरीत थे—वे इस बात पर ज़ोर दे रहे थे कि पुराने नियम की धार्मिक विधियाँ सच्चे मसीही होने के लिए आवश्यक थीं। वे उन फिलिप्पी विश्वासियों से, जिन्होंने प्रभु में आनन्द प्राप्त किया था, मूल रूप से यह पूछ रहे थे: यदि तुम बाहरी खतना की विधि पर ध्यान नहीं देते तो क्या तुम सच में सच्चे मसीही हो? पौलुस की यह चेतावनी कि “चौकस रहो” (फिलिप्पियों 3:2), इस युवा कलीसिया को यह स्मरण दिलाने के लिए थी कि जब मसीही विश्वास में कुछ जोड़ दिया जाता है, तो वह वास्तव में सुसमाचार को बिगाड़ देता है। सुसमाचार में कुछ भी जोड़ने से हमेशा उसमें से आनन्द और यहाँ तक कि उद्धार भी निकल जाता है।

इसलिए जब हम इस पद में “कुत्ते” शब्द पढ़ते हैं, तो हमें एक प्यारे पारिवारिक पालतू जानवर की कल्पना नहीं करनी चाहिए। पौलुस यहाँ किसी गोल्डन रिट्रीवर की बात नहीं कर रहा था। इसके बजाय, एक ऐसे आवारा, रोगग्रस्त कुत्ते की कल्पना करें जो कूड़ेदानों के आस-पास घूमता रहता है और जिसके काटने से आप गम्भीर रूप से घायल हो सकते हैं। पौलुस ने यह स्पष्ट रूप से कहा कि ये लोग, जो अनुग्रह के योग्य बनने के लिए लोगों से विधिवत आवश्यकताओं को पूरा करने की मांग कर रहे थे, उन कुत्तों के समान ही खतरनाक थे। वे मसीह से ध्यान हटा रहे थे और उसकी मृत्यु, पुनरुत्थान, और स्वर्गारोहण की पर्याप्तता को कम कर रहे थे।

पौलुस ने लगातार झूठी शिक्षा के दुखद परिणामों के बारे में चेतावनी दी—और क्योंकि वह फिलिप्पी की कलीसिया के लोगों से प्रेम करता था, उन्हें अपना “आनन्द और मुकुट” (फिलिप्पियों 4:1) कहकर सम्बोधित करता था, इसलिए वह किसी भी व्यक्ति और किसी भी चीज़ का विरोध करता था जो उन्हें महिमा के एकमात्र मार्ग से भटका देती। वह चाहता था कि वे चौकस रहें।

हम भी बहुत आसानी से यह भूल सकते हैं कि सुसमाचार का सन्देश केवल यह है, “अपना सर्वोत्तम करो और पर्याप्त रूप से अच्छे बनो!” जबकि सुसमाचार का सच्चा सन्देश यह है: “तुम्हारा सर्वोत्तम कभी पर्याप्त नहीं होगा—परन्तु यीशु पर्याप्त है।”

इसलिए शुभ समाचार यह है: केवल मसीह में विश्वास के द्वारा हम सच्चा “खतना” हैं—अर्थात वे लोग जो परमेश्वर की सच्ची प्रजा के रूप में अलग किए गए हैं, इसलिए नहीं कि हमारे शरीर से कुछ काटा गया है, बल्कि इसलिए कि मसीह हमारे लिए काटा गया। हर पीढ़ी में कुछ लोग होते हैं जो विश्वास के बाहरी रूपों पर ज़ोर देते हैं और—प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से—उन रीति-रिवाजों को उद्धार के लिए आवश्यक बना देते हैं। लेकिन कोई भी बाहरी अनुष्ठान या धार्मिक कार्य हमें उद्धार नहीं दे सकता। अपने शरीर पर भरोसा न रखें—न अपनी कलीसिया में उपस्थिति पर, न अपनी दैनिक बाइबल पढ़ने की आदत पर, न अपने पति या पत्नी, माता-पिता, कर्मचारी या सुसमाचार प्रचारक के रूप में प्रदर्शन पर। अपना सारा भरोसा मसीह में रखें। वह और केवल वही पर्याप्त है।

गलातियों 2:11-21

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 9–11; 1 यूहन्ना 2

27 अक्तूबर :यीशु द्वारा स्वीकार किया गया

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27 अक्तूबर :यीशु द्वारा स्वीकार किया गया
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“‘बालकों को मेरे पास आने दो और उन्हें मना न करो, क्योंकि परमेश्‍वर का राज्य ऐसों ही का है। मैं तुम से सच कहता हूँ कि जो कोई परमेश्‍वर के राज्य को बालक के समान ग्रहण न करे, वह उसमें कभी प्रवेश करने न पाएगा।’ और उसने उन्हें गोद में लिया, और उन पर हाथ रखकर उन्हें आशीष दी।” मरकुस 10:14-16

21वीं सदी में जब हम बच्चों के बारे में सोचते हैं, तो हम अक्सर उनके व्यक्तिगत गुणों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं; वे प्यारे और कोमल होते हैं और कभी-कभी हम यह सोचने की गलती कर बैठते हैं कि वे सिद्ध हैं और सारी सृष्टि का केन्द्र हैं। बच्चों के प्रति यह आधुनिक दृष्टिकोण वास्तव में हमें यीशु की इस बात के अर्थ को समझने में रुकावट डालता है, “बालकों को मेरे पास आने दो।”

यीशु की इस उपमा के केन्द्र में वास्तव में बच्चों के वस्तुनिष्ठ गुण हैं। बच्चे न तो मतदान करते हैं, और न उनके पास ड्राइविंग लाइसेंस होता है। वयस्क आमतौर पर उनसे उनके जीवन या अपने परिवार के महत्त्वपूर्ण अवसरों पर अन्तिम निर्णय लेने के बारे में भी नहीं कहते। अपनी प्रारम्भिक अवस्था में वे पूरी तरह किसी और पर निर्भर होते हैं। सीधे शब्दों में कहें, तो छोटे बच्चे छोटे और असहाय होते हैं, उनके पास कोई विशेष बाहरी योग्यता या दावा दिखाई नहीं देता।

क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि बच्चों को यीशु इतनी गर्मजोशी से अपनाता है? लेकिन यद्यपि यह सचमुच आश्चर्य की बात है, तौभी हमें चकित नहीं होना चाहिए—विशेषकर जब हम यह देखते हैं कि परमेश्वर कितनी बार नम्र और तुच्छ समझे जाने वालों का उपयोग महान कार्यों के लिए करता है। हम स्वर्ग में अपने गुणों या आत्म-मूल्य के आधार पर प्रवेश करने की आशा नहीं कर सकते। बल्कि परमेश्वर का राज्य उन लोगों का है जो जरूरतमंद हैं, अकेले हैं, असहाय हैं, जिनके पास अपने बल पर कोई दावा या योग्यताएँ नहीं हैं—अर्थात ऐसे लोग जो बिल्कुल बच्चों के समान हैं।

जैसे-जैसे हम यह समझने लगते हैं कि “बच्चों के समान” होने का क्या अर्थ है, हमें यह स्पष्ट दिखने लगता है कि परमेश्वर के राज्य में प्रवेश तभी सम्भव है जब हम अपनी असहायता और पूर्ण निर्भरता को स्वीकार कर लें। हम मसीह के पास अपने गुणों या उपलब्धियों से भरे हाथों के साथ नहीं, बल्कि खाली हाथों के साथ आते हैं—ऐसे हाथ जो प्राप्त करने को तैयार होते हैं। और यह उल्लेखनीय है कि सुसमाचार हमें उसी परमेश्वर की ओर देखने के लिए कहता है, जिसने स्वयं देहधारण किया और एक असहाय शिशु के रूप में संसार में आया। इसलिए यह एकदम उचित है कि उसके राज्य में वही प्रवेश करेंगे जो उसके इस नम्र उदाहरण का अनुसरण करते हैं।

यीशु द्वारा बच्चों को गले लगाना—जैसा हम इन वचनों में देखते हैं—हमारे अहंकार को धराशायी करता है और हमारी निर्बलता में हमें थाम लेता है। शायद आप अपने कार्य को सराहनीय मानते हैं, या अपनी पदवी को कुछ विशेष समझते हैं, और आप स्वयं दाता बनाना चाहते हैं, लाभार्थी नहीं। या फिर सम्भव है कि आप जानते हैं कि लोग आपको बहुत छोटा समझते हैं—या आप स्वयं को बहुत छोटा समझते हैं—और यह जानकर चौंकते हैं कि परमेश्वर आपको कुछ भी देना चाहता है, यहाँ तक कि आपके साथ अनन्तकाल बिताने की इच्छा रखता है। परन्तु चाहे आपका स्वभाव जैसा भी हो, या आपकी परिस्थितियाँ कैसी भी हों—हर दिन अपनी कमजोरी और असहायता को जानते हुए एक बालक जैसे विश्वास के साथ यीशु के पास आएँ। उसके राज्य में प्रवेश पाने का और उसके निकट रहने के आशीष को अनुभव करने का एकमात्र मार्ग यही है।

लूका 11:1-13

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 6– 8; 1 यूहन्ना 1 ◊

26 अक्तूबर : थामे रखने वाली थियोलॉजी

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26 अक्तूबर : थामे रखने वाली थियोलॉजी
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“यूसुफ ने अपने भाइयों से कहा, ‘मैं तो मरने पर हूँ; परन्तु परमेश्‍वर निश्चय तुम्हारी सुधि लेगा, और तुम्हें इस देश से निकालकर उस देश में पहुँचा देगा, जिसके देने की उसने अब्राहम, इसहाक, और याकूब से शपथ खाई थी’… इस प्रकार यूसुफ एक सौ दस वर्ष का होकर मर गया।” उत्पत्ति 50:24, 26

बाइबल में अनेक व्यक्तियों की मृत्यु का उल्लेख हमें अपनी मृत्यु की वास्तविकता का सामना करने के लिए प्रेरित करता है। हम सभी के दिन सीमित हैं। परमेश्वर ने हमारे प्रस्थान की तिथि हमें प्रकट नहीं की है, परन्तु भजनकार हमें बताता है कि हमारे जीवन का प्रत्येक दिन परमेश्वर की पुस्तक में पहले से ही लिखा हुआ है (भजन 139:16)। यूसुफ 110 वर्ष तक जीवित रहा—परन्तु अन्ततः, हम सभी के समान उसे भी अपनी नश्वरता को स्वीकार करना पड़ा।

यूसुफ ने अपनी मृत्यु को समझा और स्वीकार किया। कवि डिलन थॉमस के शब्दों में कहें,[1] तो उसमें “प्रकाश के बुझने पर क्रोधित होने” जैसी कोई बात नहीं थी, बल्कि जैसा हमारे प्यूरिटन पूर्वज कहते थे, यह एक “अच्छी मृत्यु” थी। वह क्या है जो हमें अच्छी मृत्यु की ओर ले जाता है? एक ठोस थियोलॉजी—एक गहरी समझ कि परमेश्वर कौन था और कौन है। अन्त समय में, यूसुफ ने अपने विश्वास को इस तरह मजबूत किया कि उसने अपने जीवन भर परमेश्वर की देखभाल और अपने लोगों के लिए उसकी प्रतिज्ञाओं को याद किया। परमेश्वर की भलाई में विश्वास के कारण वह मृत्यु का सामना बिना डरे और बिना स्वार्थ के कर सका। उसने न तो भ्रम को थामने की कोशिश की, न ही व्यर्थ की आशाओं में चिपका। बल्कि उसके शब्द संक्षिप्त थे, और उसका ध्यान उसके परिवार और परमेश्वर पर केन्द्रित था। ऐसी प्रतिक्रिया केवल तभी सम्भव है जब हमारी दृष्टि परमेश्वर के स्वभाव और उद्देश्यों से गढ़ी गई हो।

क्या हम यूसुफ की तरह यह विश्वास रखते हैं कि परमेश्वर अपने लोगों को छुड़ाएगा? क्या हमारे जीवन में इस विश्वास का प्रमाण दिखाई देता है? क्या हमने परमेश्वर की विश्वासयोग्यता को पीछे मुड़कर देखा है और यह पाया है कि चाहे हमने कैसी भी कठिनाई या टूटापन झेला हो, फिर भी हम भजनकार के साथ कह सकते हैं, “मेरे उद्धार और मेरी महिमा का आधार परमेश्वर है; मेरी दृढ़ चट्टान, और मेरा शरणस्थान परमेश्वर है” (भजन 62:7)?

हमें जीवन में जो थामे रखता है और मृत्यु के संघर्ष में जो हमें सान्त्वना देता है, वह हमारी भावनाएँ नहीं, अच्छी थियोलॉजी होती है। जब कठिन दिन आते हैं, तब हम उसी सत्य को थामते हैं जिसे हम जानते हैं—जो अटल और अपरिवर्तनीय है। यूसुफ और उसके जीवन से हम यह अद्‌भुत सत्य सीख सकते हैं: जिस परमेश्वर ने हमें अपने हाथों से रचा है, उसी ने हमारे जीवन के हर दिन के लिए हर एक कदम निर्धारित किया है, और वह हमारे जीवन को अपनी सम्प्रभु योजना की महान कहानी में बुन रहा है—एक ऐसी योजना जिसमें वह अपनी प्रतिज्ञाओं को अपनी प्रजा के लिए पूर्ण करता है। इस परमेश्वर पर विश्वास रखकर, हम मृत्यु का सामना भी गीत गाते हुए कर सकते हैं:

करुणा और न्याय के साथ उसने मेरा समय बुना;

दुख की ओस भी उसकी प्रेम की आभा से दमक उठी;

मैं उस हाथ को धन्य कहूँगा जिसने मेरा मार्गदर्शन किया,

मैं उस हृदय को धन्य कहूँगा जिसने मेरी योजना बनाई,

जब मैं महिमा में विराजमान रहूँगा इम्मानुएल के देश में।[2]

भजन 62

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 3–5; 1 तीमुथियुस 6


[1] इन कण्ट्री स्लीप, ऐण्ड अदर पोएम्स  में “डू नॉट गो जेण्टल इनटू दैट गुड नाईट” (डेण्ट, 1952)

[2] ऐनी आर. कज़न, “द सैण्ड्स ऑफ टाईम आर सिंकिंग” (1857).

25 अक्तूबर : शरीर में काँटा

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25 अक्तूबर : शरीर में काँटा
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“इसलिए कि मैं प्रकाशनों की बहुतायत से फूल न जाऊँ, मेरे शरीर में एक काँटा चुभाया गया, अर्थात् शैतान का एक दूत कि मुझे घूँसे मारे ताकि मैं फूल न जाऊँ।” 2 कुरिन्थियों 12:7

यदि आप विभिन्न प्रतिभाशाली संगीतकारों को इकट्ठा करें, जो केवल अपने व्यक्तिगत भागों में ही रुचि रखते हैं, तो वे एक ऑर्केस्ट्रा नहीं बना सकते। वे केवल असंगत शोर उत्पन्न करेंगे, जो श्रोताओं के कानों के लिए अपमानजनक होगा। परन्तु जब वही प्रतिभा निस्वार्थ भाव और दीनता में एक संचालक के अधीन और एक स्वरूप के नियम के अनुसार उपयोग की जाती है, तो वह सुन्दर और सामंजस्यपूर्ण संगीत उत्पन्न करती है।

जिस प्रकार किसी संगीतकार की व्यक्तिगत महानता की इच्छा ऑर्केस्ट्रा की उपयोगिता के लिए विनाशकारी होती है, वैसे ही हमारे मसीही विश्वास के साथ भी है। आत्मिक वरदान कभी भी घमण्ड का स्रोत नहीं होना चाहिए—क्योंकि, आखिरकार, यह एक वरदान है! फिर भी, हमें अक्सर यह प्रलोभन होता है कि हम परमेश्वर द्वारा दिए गए वरदानों को अपनी उपलब्धि समझें, मानो हमने उन्हें स्वयं विकसित किया हो या हम उनके योग्य हों, या फिर हम उनका उपयोग केवल अपने लिए करें, मानो वे हमारे अपने हों। यह हमें अपने महत्त्व के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर सोचने के गम्भीर खतरे में डाल देता है—और जिनके पास सबसे महत्त्वपूर्ण वरदान होते हैं, वे सामान्यतः इस खतरे में सबसे अधिक होते हैं।

पौलुस को स्वयं इस प्रलोभन का सामना करना पड़ा। वह अत्यन्त बुद्धिमान था, उसने उत्तम शिक्षा प्राप्त की थी, वह एक प्रतिष्ठित पृष्ठभूमि से था, और वह बहुतों के जीवन में प्रभावशाली रहा था (फिलिप्पियों 3:4-6 देखें)। जब वह अपने समय के झूठे प्रेरितों का सामना कर रहा था, जो परमेश्वर के विषय में अपने ज्ञान के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर दावे कर रहे थे, तो पौलुस ने ईमानदारी से वर्णन किया कि उसने असाधारण दर्शन देखे थे (2 कुरिन्थियों 12:2-4)। वह अहंकार से भर जाने के लिए एक आसान लक्ष्य था।

उसे इससे किसने बचाया? उसके शरीर में एक काँटे ने। पौलुस यह स्पष्ट रूप से नहीं बताता कि यह क्या था, और इसलिए हमें भी अनुमान लगाने से बचना चाहिए। महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि वह काँटा क्या था, बल्कि यह कि उसने क्या उद्देश्य पूरा किया; क्योंकि पौलुस ने स्वीकार किया कि यह काँटा परमेश्वर की ओर से उसे उसकी दुर्बलता की याद दिलाने के लिए दिया गया था, ताकि वह अपने महत्त्व पर घमण्ड न करे और निरन्तर परमेश्वर पर निर्भर रहे।

उन झूठे शिक्षकों की तरह, जिनसे पौलुस ने मसीही समुदाय की रक्षा की, हमारे सामने भी यह प्रलोभन आते हैं कि अपने प्रभाव और बाहरी सफलता के आधार पर हम अपने मूल्य को आँकें। परन्तु अन्ततः ये सब अस्थाई चीजें अस्थाई ही सिद्ध होंगी और समाप्त हो जाएँगी। परमेश्वर की बुद्धिमानी और भलाई में, पौलुस का “काँटा” हमें हमारी कठिनाइयों को समझने में सहायता करता है—चाहे वह बीमारी हो, आर्थिक संघर्ष हो, सम्बन्धों की समस्याएँ हों, बच्चों का पालन-पोषण हो, या पाप से निरन्तर संघर्ष हो। परमेश्वर जानता है कि वह हमारे जीवन में इन आवश्यक, असुविधाजनक, और निरन्तर चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों को क्यों अनुमति देता है।

बेहतर है कि हम दीन और संघर्षरत विश्वासी बने रहें, जिनके जीवन में काँटे हों, बजाय इसके कि हम अहंकारी और आत्मनिर्भर होकर विश्वास से दूर हो जाएँ और किसी भी संघर्ष से मुक्त हो जाएँ। हमें अपनी दुर्बलता को पहचानने की आवश्यकता है, ताकि हम अपने अनन्त उद्धार के लिए परमेश्वर के अनुग्रह और अपने दैनिक जीवन के लिए उसके सामर्थ्य पर पूरी तरह निर्भर रहें।

प्रश्न यह नहीं है कि काँटे आपके जीवन में आएँगे या नहीं, बल्कि यह है कि क्या आप परमेश्वर को अपने “काँटों” का उपयोग करने देंगे, ताकि वह आपको यह स्मरण कराए कि आपके वरदानों का एकमात्र स्रोत वही है और वही आपको आत्मिक रूप से उपयोगी बनाता है।

2 कुरिन्थियों 11:30 – 12:10

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 शमूएल 1–2; 1 तीमुथियुस 5 ◊

24 अक्तूबर : उद्धार के गीत

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24 अक्तूबर : उद्धार के गीत
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“तू मेरे छिपने का स्थान है; तू संकट से मेरी रक्षा करेगा; तू मुझे चारों ओर से छुटकारे के गीतों से घेर लेगा।” भजन 32:7

यदि आप रॉबिन हुड या राजा आर्थर की पुरानी ब्लैक एण्ड व्हाईट फ़िल्में देखें, तो आपको रानियाँ युद्ध के मैदानों में घोड़ों पर सवार दिखाई देंगी। वे अकेली यात्रा नहीं करतीं, बल्कि उनके चारों ओर घुड़सवार सैनिक होते हैं जो उनकी सुरक्षा करते हैं।

कठिन दिनों में, हम अपने आप को यह स्मरण दिला सकते हैं कि परमेश्वर “अपने दूतों को तेरे [हमारे] निमित्त आज्ञा देगा, कि जहाँ कहीं तू जाए [हम जाएँ], वे तेरी [हमारी] रक्षा करें” (भजन 91:11)। इसके अतिरिक्त, उसने हमें उन विश्वासियों की संगति में रखा है जो मसीह के ध्वज का अनुसरण कर रहे हैं—अर्थात हमारी कलीसिया। मसीही जीवन एक व्यक्तिगत यात्रा नहीं, बल्कि एक सामूहिक यात्रा है। हमें इस अद्‌भुत अवसर का लाभ उठाना चाहिए कि हम मसीह के उद्देश्य के लिए एक साथ खड़े हो सकते हैं। हमें उन लोगों से घिरा रहना चाहिए जो “छुटकारे के गीतों” को गाते हैं। जब हम सामूहिक रूप से आराधना करते हैं, तो हम उस उद्धार के आशीर्वादों का अनुभव करते हैं जो परमेश्वर हमें प्रदान करता है।

जब हम जीवन की परेशानियों से घिरे होते हैं या अपनी कमजोरियों, असफलताओं, निराशाओं और सन्देहों से अवगत होते हैं, तो समाधान यह नहीं है कि हम अपने ही बल पर खड़े होने की कोशिश करें। बल्कि हमें यह देखना चाहिए कि यीशु ने हमारे लिए क्या किया है और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारे भाई-बहन हमें यह याद दिला रहे हैं कि मसीह ने हमारे लिए क्या किया है। परमेश्वर के वचन के साथ एक साधारण भजन-संग्रह की सहायता से हम एक-दूसरे को अंधकारमय दिनों में प्रोत्साहित कर सकते हैं और अपने मनों को पवित्रशास्त्र और गीतों के माध्यम से सत्यों से भर सकते हैं।

एलेक मोट्यर ने एक बार लिखा, “जब कोई सत्य किसी विश्वास-संहिता या भजन-संग्रह में समाहित हो जाता है, तो वह पूरी कलीसिया की आत्म-विश्वासपूर्ण सम्पत्ति बन जाता है।”[1] जब हम उन गीतों को गाते हैं जो गहरी आत्मिक सच्चाइयों से भरे होते हैं, तो हम प्रतिदिन अपने आप से कह सकते हैं, “मसीह ही मेरे लिए पर्याप्त है।” फिर परमेश्वर के लोगों के साथ मिलकर हम सामूहिक आराधना कर सकते हैं और अपने प्रभु से अनुग्रह और शान्ति माँग सकते हैं। एक जीवित कलीसिया हमेशा गाने वाली कलीसिया होगी।

आपको केवल एकान्त में आराधना करने के लिए नहीं बुलाया गया है। सामूहिक आराधना का एक उद्देश्य यही है: उद्धार के गीतों से घिरे रहना। आपके सृजनहार ने आपको इस रीति से बनाया है कि आप उन लोगों के साथ खड़े हों जो इन स्मरणीय शब्दों के द्वारा इस सच्चाई की आपके लिए पुष्टि करें और आप उनके लिए इसकी पुष्टि करें:

गाओ, मेरे उद्धारकर्ता के विषय में गाओ!

उसने अपने लहू से मुझे मोल लिया;

क्रूस पर उसने मेरी क्षमा को सुनिश्चित किया,

ऋण चुका दिया और मुझे स्वतन्त्र कर दिया।[2]

भजन 147

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 30–31; 1 तीमुथियुस 4


[1] लुक टू द रॉक: ऐन ओल्ड टेस्टामेण्ट बैकग्राऊण्ड टू आवर अण्डरस्टैण्डिग ऑफ क्राईस्ट (क्रेगेल, 2004), पृ. 222 टिप्पणी 48.

[2] पि. पि. ब्लिस, “आई विल सिंग ऑफ माई रिडीमर” (1876).

23 अक्तूबर : नया और उत्तम आदम

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23 अक्तूबर : नया और उत्तम आदम
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“क्योंकि जैसा एक मनुष्य के आज्ञा न मानने से बहुत लोग पापी ठहरे, वैसे ही एक मनुष्य के आज्ञा मानने से बहुत लोग धर्मी ठहरेंगे।” रोमियों 5:19

आदम, जो पहला मनुष्य था, परमेश्वर के स्वरूप में बनाया गया था। प्रभु ने आदम को सारी सृष्टि में एक अनूठी भूमिका दी थी, लेकिन वह अपनी जिम्मेदारी को पूरा करने में असफल रहा और उसे अदन से निकाल दिया गया। फिर परमेश्वर ने इस्राएलियों के साथ एक नया आरम्भ किया; उन्हें उसकी प्रजा के रूप में बुलाया गया ताकि वे उसके व्यवस्था-विधान का पालन करके उसके चरित्र को प्रकट करें। लेकिन आदम की तरह इस्राएल भी अपने बुलावे में असफल रहा और उन्हें निर्वासन में भेज दिया गया।

लेकिन जब हम नए नियम में आते हैं, तो हम देखते हैं कि जहाँ आदम और इस्राएल असफल हुए, वहाँ यीशु ने पूर्ण सफलता पाई। यीशु वही है जो परमेश्वर की प्रजा को होना चाहिए था—अर्थात नया और उत्तम आदम, सच्चा इस्राएल। वह आदम का वंशज है और आदम की सन्तान के साथ पूरी तरह से एक है। यीशु हमारे साथ पूरी तरह से एक हो गया, फिर भी आदम पाप कर बैठा था, लेकिन जब यीशु की परीक्षा ली गई, तो उसने कभी पाप नहीं किया (इब्रानियों 4:15)।

प्रभु यीशु वह एकमात्र व्यक्ति है जिसने सिद्ध रूप में परमेश्वर की पूरी आज्ञाकारिता की, और जिससे परमेश्वर सदा प्रसन्न है। उसने व्यवस्था के प्रत्येक शब्द का पालन किया। इसलिए यीशु एकमात्र मनुष्य है जो परमेश्वर की उपस्थिति से निकाले जाने के योग्य नहीं था। लेकिन फिर भी, उसे निकाला गया। क्रूस पर उसने स्वेच्छा से वह दण्ड झेला जिसे आदम की सन्तानों को भुगतना चाहिए था, जो आदम के पाप में बंधे हुए पापी हैं।

सम्पूर्ण मनुष्यजाति अपनी प्रकृति और वंश के द्वारा आदम से जुड़ी हुई है। हम पाप में जन्मे हैं और परमेश्वर के विरुद्ध आदम के विद्रोह में भागीदार हैं। इसमें कोई अपवाद नहीं है। इस स्थिति का एकमात्र उत्तर यही है कि मनुष्य उस एकमात्र व्यक्ति को जानें जिसने पूरी व्यवस्था को सिद्ध रूप से पूरा किया और जो परमेश्वर की उपस्थिति से निकाले जाने के योग्य नहीं था, लेकिन जिसने हमारे लिए क्रूस पर मृत्यु तक आज्ञाकारिता दिखाई ताकि हम अनुग्रह द्वारा विश्वास से वह सब पा सकें जो वह पाने के योग्य था, बजाय इसके कि हम वह सब भुगतें जिसे आदम ने भुगतना था।

यह सत्य हर बात का केन्द्र बिन्दु है। विश्वासियों के बारे में जो कुछ पहले सत्य था, उसकी जड़ आदम के एक ही कार्य में थी, लेकिन अब विश्वासियों के बारे में जो कुछ सत्य है, वह मसीह की आज्ञाकारिता का परिणाम है।

यदि आप आश्वासन में कमी महसूस कर रहे हैं, तो शायद आप अपने आत्मिक जीवन की जाँच इस दृष्टि से कर रहे हैं कि क्या आप पर्याप्त रूप से कार्य कर रहे हैं। लेकिन याद रखें कि आपका उद्धार आपके द्वारा किए गए किसी भी कार्य के कारण नहीं हुआ है। जैसे कि एक भजनकार हमें स्मरण कराता है, हमें उस कार्य के द्वारा बचाया गया है जो हमारे लिए किया गया है:

क्योंकि निर्दोष उद्धारकर्ता मरा,

मेरा पापी प्राण स्वतन्त्र ठहरा,

धर्मी परमेश्वर सन्तुष्ट हुआ,

उसे देखकर मुझे क्षमा किया।[1]

रोमियों 5:6-21

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 27–29; 1 तीमुथियुस 3 ◊


[1] चारिटी लीस बानक्रोफ्ट, “बिफोर द थ्रोन ऑफ गॉड अबव” (1863).

22 अक्तूबर : प्रत्येक उत्तर जो हमें चाहिए

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22 अक्तूबर : प्रत्येक उत्तर जो हमें चाहिए
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“जब पौलुस एथेंस में उनकी बाट जोह रहा था, तो नगर को मूरतों से भरा हुआ देखकर उसका जी जल गया। अतः वह आराधनालय में यहूदियों और भक्तों से, और चौक में जो लोग उससे मिलते थे उनसे हर दिन वाद–विवाद किया करता था। तब इपिकूरी और स्तोईकी दार्शनिकों में से कुछ उससे तर्क करने लगे।” प्रेरितों 17:16-18

जब पौलुस एथेंस नगर में अपने समय के बुद्धिजीवियों को सम्बोधित कर रहा था, तब उसने पाया कि उसके श्रोता दो मूलभूत विचारधाराओं से प्रभावित थे: स्टॉइकवाद और एपिक्यूरियनवाद। स्टॉइकवाद यह मानता है कि संसार की घटनाएँ एक कठोर, भावशून्य और व्यक्तिगत रूप से असम्बद्ध नियति द्वारा नियन्त्रित होती हैं, जबकि एपिक्यूरियनवाद यह सिखाता है कि “अच्छाई” वही है जिससे सबसे अधिक सुख मिलता है। लेकिन ये दोनों ही विचारधाराएँ सर्वशक्तिमान परमेश्वर की सन्तान के लिए उपयुक्त नहीं हैं।

मसीही विश्वास की एक विशिष्ट विशेषता यह है कि हम संसार को देखने और समझाने के अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत कर सकते हैं। अपने चारों ओर की संस्कृति के विपरीत, हम जानते हैं कि हमारा समय परमेश्वर के हाथ में है (भजन 31:15)—कि हम किसी अंधी ताकत के शिकंजे में फँसे हुए नहीं हैं और न ही हम किस्मत की लहरों पर उछाले जा रहे हैं। चाहे कोई व्यक्ति मार्क्सवाद, हिन्दू धर्म, नास्तिकता या किसी अन्य दर्शन या धर्म से प्रभावित हो—हर कोई अन्ततः उन प्रश्नों और असुरक्षाओं का सामना करता है जो उनकी आस्था के भीतर छिपे होते हैं। क्या वे एक वर्गहीन समाज के संघर्ष में उलझे हुए हैं या जन्म और पुनर्जन्म के अन्तहीन चक्र में? शायद वे मानते हैं कि जीवन का कोई अर्थ ही नहीं है। लेकिन किसी के प्रश्न या मान्यताएँ चाहे जो भी हों, परमेश्वर उनके हर प्रश्न का उत्तर देता है।

एक मूर्खतापूर्ण और असंवेदनशील नियति के बन्धन में जीने, या अनिश्चितता की गिरफ्त में रहने के बजाय, विश्वासी लोग अब अटल आशा के साथ जीवन जीते हैं। पौलुस की तरह ही अब हमें भी वे उत्तर सौंपे गए हैं जो परमेश्वर ने अपने वचन के द्वारा हमें दिए हैं—वे उत्तर जिन्हें हमें इस संसार से साझा करना है। परमेश्वर ने हमें एक महान भरोसा दिया है और उसका नाम है यीशु।

इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि क्या हमारे पास ऐसा सन्देश है जो प्रत्येक मनुष्य की गहरी तड़प और हर दर्शन या धर्म की आपत्तियों का उत्तर दे सकता है—क्योंकि हमें ऐसा ही सन्देश दिया गया है। असली प्रश्न तो यह है कि क्या हम उस सन्देश को साझा करेंगे? जब पौलुस एथेंस में था, तो उसने वह देखा जो दूसरों ने नहीं देखा था। उसने उन प्रभावशाली स्थलों का आनन्द नहीं लिया, न ही वह नगर की बौद्धिक प्रतिष्ठा से अभिभूत हुआ। उसने देखा कि यह नगर मूर्तिपूजा में डूबा हुआ है—और “उसका जी जल गया,” क्योंकि हर बार जब किसी मूर्ति की पूजा की जाती है, तो प्रभु यीशु की उस महिमा को छीना जाता है, जो केवल उसी को मिलनी चाहिए। और इसलिए अपनी प्रतिष्ठा की परवाह किए बिना, पौलुस ने उस नगर के नागरिकों के साथ तर्क किया और उन्हें पुनरुत्थान की आशा का सुसमाचार सुनाया (प्रेरितों 17:18)।

आज जहाँ भी आप रहते हैं, किसी न किसी रूप में आप अपने आप को एक आधुनिक एथेंस में पाते हैं। आपके आस-पास के लोग किन मूर्तियों की पूजा कर रहे हैं? क्या उन्हें देखने से आपका जी भी जल उठता है? आपके पास वह उत्तर है जो किसी भी मूर्ति की तुलना में अधिक सन्तोष दे सकता है। आपके पास परमेश्वर को महिमा देने का अवसर है। आज आप किससे बात कर सकते हैं और कह सकते हैं: “क्या आप देख सकते हैं कि जिसे आप पूज रहे हैं, वह आपको सन्तुष्ट नहीं कर सकता? क्या मैं आपको सावधान कर सकता हूँ कि आप उस परमेश्वर की उपेक्षा कर रहे हैं जो अर्थ और आशा देता है—परन्तु जिसका उपहास नहीं किया जा सकता? क्या मैं आपको यीशु मसीह को जानने में मिले उत्तरों के बारे में बता सकता हूँ?”

1 थिस्सलुनीकियों 1:1-10

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 25–26; 1 तीमुथियुस 2

21 अक्तूबर : परमेश्वर की स्वीकृति

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21 अक्तूबर : परमेश्वर की स्वीकृति
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“अपने आप को परमेश्‍वर का ग्रहणयोग्य और ऐसा काम करने वाला ठहराने का प्रयत्न कर, जो लज्जित होने न पाए।” 2 तीमुथियुस 2:15

आप किसकी सराहना के लिए जी रहे हैं?

स्वभाव से ही हम दूसरों से स्वीकृति पाने की इच्छा करते हैं। लेकिन विश्वासियों के रूप में जिस स्वीकृति की हमें सबसे अधिक चाहत रखनी है, वह है परमेश्वर की स्वीकृति। इस अद्‌भुत सत्य पर विचार करने के लिए समय निकालना आवश्यक है कि आज हम जो कुछ भी करते हैं, वह उस परमेश्वर को प्रसन्न कर सकता है, जो सारी सृष्टि का पालक है (1 थिस्सलुनीकियों 4:1), और एक दिन, वह उन लोगों का स्वागत करेंगे जिन्होंने उसके लिए पूरी तरह से जीवन व्यतीत किया, और स्वागत के समय ये शब्द बोलेगा, “धन्य, हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास” (मत्ती 25:21, 23)। कल्पना कीजिए कि दिव्य होंठों से आपको ये शब्द सुनने को मिलेंगे!

तो फिर, कैसे हम “अपने आप को परमेश्‍वर का ग्रहणयोग्य और ऐसा काम करने वाला ठहराने का प्रयत्न करें, जो लज्जित होने न पाए”?

सर्वप्रथम, हमें अन्त तक विश्वास बनाए रखने का संकल्प लेना होगा। पौलुस ने अपनी दौड़ के अन्तिम मोड़ पर तीमुथियुस से कहा, “मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैंने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैंने विश्वास की रखवाली की है” (2 तीमुथियुस 4:7)। पौलुस का जीवन क्षणिक उत्साह के झटकों और फिर लम्बे निष्क्रियता के दौरों से भरा हुआ नहीं था। वह जानता था कि विश्वास की दौड़ एक आजीवन चलने वाली मैराथॉन है, जिसे अन्त तक दृढ़ता से दौड़ना होता है।

हम नहीं चाहते कि हमें केवल कभी-कभार आने वाले छोटे-छोटे उत्साह के झोंकों के लिए जाना जाए। विशेषकर हमें ऐसे लोग बनने से बचना चाहिए जो परमेश्वर का कार्य केवल तभी करते हैं, जब अन्य मसीही लोग हमें देख रहे हों। इसके बजाय, हमें हर दिन पूरी लगन से दौड़ लगानी है, यह स्मरण रखते हुए कि परमेश्वर की दृष्टि सदा हम पर बनी रहती है।

जब हम विश्वास में आगे बढ़ते हैं, तो हम यह याद रख सकते हैं कि हमें “धर्म का वह मुकुट” प्रतिज्ञा किया गया है, जो हमारे लिए “रखा हुआ है” और “जिसे प्रभु, जो धर्मी और न्यायी है,” हमें देगा (2 तीमुथियुस 4:8)। और हमें यह याद रखना चाहिए कि हम अपनी ताकत से नहीं दौड़ रहे हैं। बल्कि हमें यह पूरा विश्वास रखना चाहिए कि “जिसने तुम में अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा” (फिलिप्पियों 1:6)। परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है कि वह हमें मार्ग में कभी अकेला नहीं छोड़ेगा (इब्रानियों 13:5)। यदि समापन रेखा अभी दूर है, तो हमें उस पर ध्यान केन्द्रित करने के बजाय यीशु पर ध्यान लगाए रखना है, और अपनी आँखें “विश्वास के कर्ता और सिद्ध करने वाले” पर लगाए रखनी हैं (इब्रानियों 12:2)।

कभी भी उस एक जीवन के प्रभाव को कम मत आँकिए जो पूरी तरह परमेश्वर की महिमा के लिए जीया गया हो। उस दिन की कल्पना करें, जब आप अपने स्वर्गिक पिता के सामने एक स्वीकृत सेवक के रूप में खड़े होंगे और यह विचार आपके दिल में नम्रता भर देगा और आप कहेंगे, “प्रभु, मैं पूरे मन से यही चाहता हूँ कि मेरे जीवन पर तेरी स्वीकृति बनी रहे। ‘मैं केवल एक हूँ, लेकिन मैं ही हूँ। जो मैं कर सकता हूँ, वह मुझे करना चाहिए। और जो मुझे करना चाहिए, उसे मैं तेरे अनुग्रह से करूँगा।’”[1]

मत्ती 25:14-46

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 22–24; 1 तीमुथियुस 1 ◊


[1] एडवर्ड एवरेट हेल को श्रेय दिया जाता है।

20 अक्तूबर : अलौकिक धैर्य

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20 अक्तूबर : अलौकिक धैर्य
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“हे भाइयो, हम तुम्हें समझाते हैं कि जो ठीक चाल नहीं चलते उनको समझाओ, कायरों को ढाढ़स दो, निर्बलों को सम्भालो, सब की ओर सहनशीलता दिखाओ।” 1 थिस्सलुनीकियों 5:14

धैर्य एक महान गुण है। यह एक बड़ी चुनौती भी है!

जब प्रेरित पौलुस ने थिस्सलुनीकियों को अपनी पहली पत्री समाप्त की, तो उसने अमूल्य सिद्धान्तों की एक शृंखला लिख डाली। प्रत्येक सिद्धान्त माला में लगे एक रत्न की तरह है, एक पवित्र सत्य जिसे हमें अपने जीवन के राह पर चलते हुए अपने गले में धारण करना चाहिए (नीतिवचन 3:3)। इन सिद्धान्तों में सबसे प्रमुख आदेश है धैर्य रखना।

यूनानी भाषा में पौलुस ने ‘makrothumeo’ शब्द का उपयोग किया है, जिसका शाब्दिक अर्थ है “लम्बे दिल वाला” और जिसे पवित्रशास्त्र में आमतौर पर परमेश्वर के चरित्र को व्यक्त करने के लिए उपयोग किया गया है (उदाहरण के लिए, रोमियों 2:4; 2 तीमुथियुस 1:16; याकूब 5:10)। धैर्य का मतलब है उन लोगों के प्रति जल्दी गुस्सा न होना जो असफल होते हैं। पौलुस हमें बताता है कि हमें इस प्रकार का दिव्य धैर्य रखना चाहिए, जब हमारा सामना आलसी, निराश और कमजोर भाइयों-बहनों से होता है। इनका सामना करने से हमें परमेश्वर के धैर्य को अपने जीवन में जीने का अवसर मिलता है।

हम इस तरह का धैर्य कैसे प्राप्त करें? यह स्वाभाविक रूप से नहीं आता! सबसे पहले हमें परमेश्वर को देखना होगा। हमारा परमेश्वर ऐसा परमेश्वर है, जो “दयालु और अनुग्रहकारी, विलम्ब से कोप करने वाला [makrothumeo] और अति करुणामय है” (भजन 103:8)। वह हमारे पापी और विद्रोही दिलों को देखता है और फिर भी हमें माफ कर देता है। वह हमारी बार-बार होने वाली असफलताओं को देखता है और फिर भी हमें त्यागता नहीं है। वह हमारी शंकाओं और चिन्ताओं को देखता है और फिर भी हमारे साथ कोमल रहता है। हमें इस प्रकार के धैर्य को अपने जीवन में दर्शाना है। और इसलिए हमें परमेश्वर से मदद मांगनी होगी। यह अलौकिक धैर्य केवल परमेश्वर ही अपने पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे जीवनों में उत्पन्न कर सकता है।

उदाहरण के लिए, पौलुस ने प्रार्थना की कि कुलुस्से के विश्वासी “उसकी महिमा की शक्ति के अनुसार सब प्रकार की सामर्थ्य से बलवन्त होते जाएँ, यहाँ तक कि आनन्द के साथ हर प्रकार से धीरज और सहनशीलता दिखा सकें” (कुलुस्सियों 1:11)। हममें से प्रत्येक को कोई ऐसा व्यक्ति चाहिए जो हमारे लिए यह प्रार्थना करे, और साथ ही हमें स्वयं के लिए भी यह प्रार्थना करनी चाहिए। हममें से प्रत्येक को दूसरों के लिए भी यही करना चाहिए, क्योंकि यह एक ऐसी प्रार्थना है जिसका उत्तर देने के लिए परमेश्वर तत्पर है। जब परमेश्वर की शक्ति हमारे जीवन में प्रकट होती है, तो हम तब भी सहन कर सकते हैं जब हमें हार मान लेने का मन होता है, और हम तब भी धैर्य दिखा सकते हैं जब भीतर से सब कुछ खो देने जैसा महसूस होता है।

आप दैनिक जीवन की परेशानियों का कैसे जवाब देंगे—जब आप किसी लाइन में खड़े हों, या हरी बत्ती खड़े हों लेकिन आपके सामने वाली कार नहीं चल रही हो? आप उन भाई-बहनों से कैसे पेश आएँगे जो आलसी, निराश, या कमजोर हैं? उन परिस्थितियों में और उन लोगों के साथ आपका बस एक ही नारा होना चाहिए—धैर्य। हो सकता है कि आपके आस-पास के लोग आपके धार्मिक ज्ञान से ज्यादा प्रभावित न हों, लेकिन वे निश्चित रूप से आपकी अधीरता को देखेंगे, जो यह दर्शाता है कि आप दूसरों की तुलना में अपने समय और रुचियों को अधिक महत्त्वपूर्ण मानते हैं। लेकिन इसके विपरीत, वे आपके धैर्य को भी देखेंगे, जो उन्हें यह बताएगा है कि आप दूसरों की भलाई और उनकी जरूरतों को अपने से ऊपर मानते हैं (फिलिप्पियों 2:3)—ठीक वैसे ही जैसे हमारा स्वर्गिक पिता करता है।

निश्चित रूप से आज आपको ऐसे अवसर मिलेंगे जब आप मानव अधीरता दिखाने के बजाय ईश्वरीय धैर्य दिखा सकें। उन क्षणों में, परमेश्वर के धैर्य की विशालता को पहचानें जो उसने आपके प्रति दिखाया है और आप निश्चित रूप से दूसरों के लिए अपने धैर्य में वृद्धि करेंगे।

कुलुस्सियों  1:9-12

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 19–21; 2 पतरस 3

19 अक्तूबर : चुप्पी और दुख

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19 अक्तूबर : चुप्पी और दुख
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“अय्यूब के इन तीन मित्रों ने इस सब विपत्ति का समाचार पाया जो उस पर पड़ी थीं। तब वे . . . अपने-अपने यहाँ से उसके पास चले . . . वे सात दिन और सात रात उसके संग भूमि पर बैठे रहे, परन्तु . . . किसी ने उससे एक भी बात न कही . . . तब तेमानी एलीपज ने कहा, ‘यदि कोई तुझसे कुछ कहने लगे, तो क्या तुझे बुरा लगेगा? परन्तु बोले बिना कौन रह सकता है?” अय्यूब 2:11, 13; 4:1-2

अय्यूब के दोस्तों ने हमें यह दिखाया कि जब कोई व्यक्ति गहरे दर्द और शोक से गुजर रहा हो, तो हमें कैसे प्रतिक्रिया देनी चाहिए—और फिर उन्होंने यह भी दिखाया कि हमें क्या नहीं करना चाहिए।

अय्यूब के दोस्तों को उसके दुखों का साक्षी बनने का अवसर मिला था, और वे उसे अपने शब्दों से कोई सान्त्वना नहीं दे पाए थे। उनका अन्तिम प्रत्युत्तर पूरी तरह से शाब्दिक था और बहुत अप्रभावी था।

यदि हमें सामने वाले व्यक्ति के जैसा अनुभव नहीं हुआ है या हमने उसे अच्छे से सुनने और परमेश्वर से विनम्रता से प्रार्थना करने में समय नहीं बिताया है, तो दुख भोग रहे उस व्यक्ति के बारे में टिप्पणी करना या उसे सलाह देना बहुत खतरनाक हो सकता है। अय्यूब 16 में इन दोस्तों को “मूर्खता भरी सान्त्वना देने वाले” कहा गया है—जो अय्यूब के खिलाफ “बातें जोड़ सकते थे” और जिनके शब्दों का अन्त नहीं था (16:4)। अय्यूब के दुख का तुरन्त इलाज और त्वरित उत्तर पाने की कोशिश करते हुए उसके दोस्तों ने उस पर आरोपों की बौछार कर दी। विशेष रूप से सोपर ने अय्यूब को यह याद दिलाया कि उसके साथ इस समय जो कुछ हुआ था, वास्तव में उसके साथ इससे भी बुरा होना चाहिए था (अय्यूब 11:4-6)।

इसी प्रकार, एलीपज ने यह सुझाव दिया कि शायद अय्यूब परमेश्वर से भटक गया था और उसे परमेश्वर से अधिक सावधानी से सुनने की आवश्यकता थी (22:21-23)। इन पुरुषों ने अय्यूब के दुख के लिए एक अत्यधिक सरल दृष्टिकोण अपनाया—एक ऐसा दृष्टिकोण जो उपचार करने के बजाय और भी पीड़ादायी था। वे अय्यूब के प्रत्येक विलाप का उत्तर देने के लिए तत्पर थे। जब एलीपज ने पहली बात बोली और पूछा, “बोले बिना कौन रह सकता है?” तो उसे स्वयं को यह उत्तर देना चाहिए था, “मैं!”

अय्यूब ने उनके परामर्श के तरीके पर तीखा प्रहार किया: “तुम लोग झूठी बात के गढ़ने वाले हो; तुम सबके सब निकम्मे वैद्य हो। भला होता कि तुम बिलकुल चुप रहते, और इससे तुम बुद्धिमान ठहरते!” (अय्यूब 13:4-5)। और वास्तव में, उसके दोस्तों ने आरम्भ में ठीक यही किया था। वे एक सप्ताह तक बिना कुछ बोले उसके पास बैठे रहे थे।

दुख के अनुभव में, पीड़ित के सामने मौन रहना अक्सर बहुत शब्दों से कहीं अधिक सहायक होता है। यह पूरी सम्भावना है कि यदि उसके दोस्त अपनी प्रारम्भिक प्रतिक्रिया बनाए रखते—उसके पास चुपचाप बैठे रहते—तो अय्यूब को अधिक आराम और साथ मिल सकता था।

मौन अक्सर हमारे दुखों के प्रति प्रतिक्रिया में गायब रहने वाला तत्व होता है। जबकि यह निश्चित रूप से एकमात्र आवश्यक प्रतिक्रिया नहीं है, तौभी इसके महत्त्व को बहुत कम आंका जाता है। यदि हम बिना किसी उद्देश्य के अपने चारों ओर के शोर से अलग हो जाएँ और पीड़ितों की आवाज़ों को सुनने का प्रयास करें, तो हम मौन चिन्तन में इतनी अधिक प्रगति कर सकते हैं, जितनी हमने कल्पना भी नहीं की होगी। और तब हमारे पास कहने के लिए बहुत अधिक उपयोगी बातें हो सकती हैं, और हमें पता होगा कि हमें क्या कहना है और कैसे कहना है। अय्यूब निश्चित रूप से ऐसा ही सोचता था। क्या इस सप्ताह कोई ऐसा व्यक्ति है जिसे आप अपनी शान्त उपस्थिति से आशीषित कर सकते हैं?

भजन 42 – 43

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 शमूएल 17–18; 2 पतरस 2 ◊